मी लॉर्ड! चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखो, छक्के छूट जाएंगे

: अपर जिला जज होना किसी मां के दायित्‍वों पर कैसे भारी पड़ सकता है मी-लॉर्डों, तुमको जरूर समझना चाहिए : किसी शेरनी के शावकों पर बुरी निगाह डाल कर देखिये तो, जवाब तत्‍काल मिल जाएगा : मीलार्ड ! आप क्या हैं? हर शख्‍स के पास आत्‍मरक्षा के विशेष अधिकार हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सोचता हूं कि कि सुना ही दूं चंद घटनाएं। शायद आपके काम भी आ जाए। तो जनाब, यह भले ही एक कोरी कल्‍पना भले ही हो, लेकिन आपको इससे इस घटना को समझने में मदद मिल सकती है। तो किस्‍सा-कोताह यह कि शेरनी का अपने सिंह-शावक के बीच एक अद्भुत प्रेम-नेह संबंध होता था। एक दिन मैंने देखा कि एक शेरनी अपने इकलौते सिंह-शावक के साथ घूम रही थी। अचानक किन्हीं वजहों से शेरनी अपने शावक से थोड़ा दूर हटी, तो कुछ दो-कौड़ी के नीच लकड़बग्घों ने उसके शावक पर हमला कर दिया। शावक की चीखें घुटी-घुटी थी, बिल्कुल मरणासन्न। जैसे उसकी बोटियों नोच रहे हों लकड़बग्घे। शेरनी को कुछ समझ नहीं आया।  मगर उसे अपनी छठी इंद्री से इतना जरूर एहसास हो गया कि उसके प्राणों से भी प्‍यारा शावक मुसीबत में है और हमलावरों के चुंगल में है।

व्याकुल शेरनी बदहवास हो गई। बिना कुछ सोचे समझे उसने अपने शावक की ओर छलांग लगा दी और पहुंच गई अपने शावक के पास, जिसकी बोटियों कुछ दरिंदे लकड़बग्‍घे  नोच रहे थे। शेरनी ने दिखा कि वह उन लकड़बग्घा से अकेले मुकाबला नहीं कर सकती, लेकिन इसके बावजूद वह टूट पड़ी एक लकड़बग्घे पर जो उस शेरनी पर चिढ़ा रहा था। शेरनी तानकर अपना पंजा निकाला और सीधे उस लकड़बग्घे के चेहरे पर दे मारा। शेरनी ने इस हस्तक्षेप से शिकारे लकड़बग्घे अपने पिछवाड़े में अपने पूंछ दबाकर भाग निकले।

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कहानी इससे भी आगे भयावह है। लेकिन फिलहाल, इतना समझ लीजिए कि वह सिंह-शावक कोई शेर-बच्चा नहीं था बल्कि एक 20 बरस का एक छात्र था जो अपना भविष्य विधि-जगत में बनाना चाहता था। और अपने इसी संकल्प के तहत उसने देहरादून की पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी में एडमिशन किया था। इस हमले के दौरान उसका यह इस यूनिवर्सिटी में तीसरा बरस था। सिंह-शावक पर हमला करने वाले लोग लकड़बग्घे नहीं थे, बल्कि शायद उनसे भी क्रूर, निर्मम और अमानवीय जानवरों का झुंड थे जिन्‍होंने देहरादून के एक थाने पर अड्डा जमा लिया था। और आखिरी बात है कि वह शेरनी दरअसल एक जीता-जागता इंसान थी। बल्कि इस से भी बेहतर कहें तो वह एक जिद भी थी। ऐसी नैसर्गिक जिद, जिसमें न्याय के प्रति समर्पण की भावनाएं कूट-कूट कर भरी हुई थीं। और सर्वोच्‍च बात यह कि वह जिद एक मां थी, उसमें भरा मातृत्व थी।

इस शेरनीनुमा मां के सिंह-शावकनुमा विधिशास्त्र के छात्र बच्चे पर देहरादून के लकड़बग्घा पुलिसवालों ने जितना अपमान हो सकता था, किया। इस बच्चे को उसके हॉस्टल में घुसकर पीटा गया। उसको किसी को कुख्यात अपराधी की तरह पुलिस जीप में ठूंस कर मां-बहन की गाली दी। यह पुलिसवाले पूरे यूनिवर्सिटी में जुलूस निकालते रहे और आखिर में पुलिस थाने पर पहुंचकर उसे सरेआम उस बच्चे की मां के सामने मां-बहन-बेटी की अश्‍लील गालियां देते रहे।

अब आप बताइए कि आप अगर उस समय मां होते और आपका बच्चा कुछ लकड़बग्घों के चंगुल में फंसा होता तो आप क्या करते हैं ? शायद मैं आपको नहीं समझा पा रहा हूं कि उस वक्‍त आप अगर होते तो क्‍या करते। लेकिन इतना जरूर है कि अगर मैं उस बच्‍चे की मां की भूमिका में वहां मौजूद होता, तो मैं क्या करता।  सुनिये, मैं बताता हूं आपको, कि मैं अपना पूरा ध्यान अपने बच्चे को बचाने पर लगाता और मेरे बच्चे के हमलावरों से जूझ पड़ता। उस वक्‍त मैं केवल मां होता, जो अपने नैसर्गिक न्‍याय की भावना से ओतप्रोत होता। जूझ जाता उन लकड़बग्घों से जो हमारे बच्चे की बोटियों पर निशाना लगा रहे होते, नोंच रहे होते या फिर अपनी लकड़बग्घा स्टाइल में उसका मजाक उड़ा रहे होते। मैं अपना पंजा उठाता और तान कर हमलावरों में से किसी न किसी के चेहरे पर रसीद कर देता।

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लर्नेड वकील साहब

खैर, अब आप बताइए कि ऐसी हालत में अगर आप होते तो क्या करते हैं? अपने कलेजे के टुकड़े को पिटते-गालियां खाते हुए चुपचाप खड़े रहते या फिर सीधे हस्तक्षेप कर देते। आप भी प्रतिरोध पर उतर आये, बिना सोचे-बिचारे के लकड़बग्‍घों के झुंड में आप बुरी तरह फंस सकते हैं। लेकिन उस समय आपको अपने नैसर्गिक और प्राकृतिक दायित्‍व निभाते, फिर भले ही आपकी जान या प्रतिष्‍ठा अथवा आजीविका चली जाती। आप सब कुछ भूल जाते और सिर्फ बच्‍चे को बचाने में अपना ध्‍यान देते।

आप बताइए ना, कि आप भी ऐसा ही करते ना?

वेरी गुड। लेकिन ठीक यही दायित्‍व तो जया पाठक ने भी किया। जया पाठक, यानी उस बच्चे की मां जो अपनी बच्‍चे के आर्तनाद सुनकर तत्‍काल मौके पर पहुंच गई और ठीक उसी मौके पर उसने हमलावर लोगों पर तमाचा जड़ दिया। भले ही उसके बाद वहां मौजूद उन सारे लकड़बग्घों के झुंड ने मिलकर उसका तियां-पांचा कर दिया। लेकिन कम से कम उस मां ने इतना तो जाहिर कर ही दिया कि उसके लिए अपनी जिंदगी बेकार है अगर वह अपने बच्चे की जिंदगी नहीं बचा सकती। न्‍याय भी तो यही कहता है न मी लॉर्ड।

अब आखिरी सवाल आप मीलार्ड लोगों से। मीलार्ड ! आप क्या हैं? माना कि आपके पास कुछ विशेष अधिकार हैं। लेकिन ठीक इसी तरीके से विशेष अधिकार तो एक मां के पास भी होते हैं ? यह बात भी छोड़ दीजिए तो सामान्‍य अधिकार तो उस बच्चे के पास भी थे। खैर, मुझे इतना तो बताइए क्या सामान्य नागरिक को अपनी बात कहने या बोलने या सुरक्षा करने का कोई अधिकार है या नहीं? आप तो मी लॉर्ड हैं, फैसला कीजिए न कि जया पाठक की जगह अगर आप उस बच्चे की मां होते, तो आप खुद क्या करते हैं? आईपीसी की धारा 96, 97 , 98 और उसके बाद की तत्‍सम्‍बन्‍धी धाराएं इसी जमीन पर कायम हैं मी लॉर्ड। और आपको यह सिखाने की जरूरत नहीं है कि कानून किताबों से नहीं, मानवीय व्‍यवहार पर तय होते हैं। इसीलिए बहस होती है, जहां एक ओर कट्टर कानून होते है, वहीं दूसरी ओर मानवता का समंदर। निष्‍ठुरता का नाम है कांक्रीट का मकान, जबकि उसमें मानवता, भावुकता और ममत्‍व-स्‍नेह बसता है।

तो मी लॉर्ड ! सिर्फ कानून मत बांचिये, चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखिये ? आपके छक्के न छूट जाएं, तो मेरा भी नाम कुमार सौवीर नहीं।

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी।

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