जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

: अपनेजीवन-मूल्‍यों का निचोड़ नहीं, हालातों की हकीकत बयान की है राजेंद्र सिंह ने : धुर बेईमान गायत्री प्रजापति की जमानत पर भड़के विवाद पर पूरी जीवन भर की ईमानदार छवि टूटने का दुख राजेंद्र सिंह की लेखनी से टपकती है : हाईकोर्ट की जजी गयी, उसका दुख नहीं। जज्‍बा आज भी मौजूद है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : उस शख्स के जीवन की एक-एक सारी घटनाओं और प्राप्तियों को सिलसिलेवार रख कर किसी चलचित्र की तरह देखने की कोशिश कीजिए। शुरूआत से लगभग अंत तक जिस शख्‍स का जीवन किसी दुर्धर्ष योद्धा की तरह बीता हो। ईमानदारी जिसके खून में रही हो, और रग-रग में रची-बसी रही हो। अपने मूल्‍यों के लिए वह कभी भी नहीं डिगा हो। कठोर परिश्रम और सरल व्यवहार। अधिकारियों द्वारा दी गयी प्रशंसाओं का ढेर उसकी पर्सनल फाइलों में दर्ज हो। लेकिन अचानक ही यह सारा कुछ किसी रेत के टीले की तरह ढह जाए। ऐसे में आप क्‍या सोचेंगे।

जरा कल्‍पना तो कीजिए, उस शख्‍स के खाते में अंत में जो प्राप्तियां दर्ज होनी चाहिए, किसी मजबूत म्‍युचुअल-फण्‍ड की परिपक्‍वता की तरह, लेकिन अचानक उसके हाथों से सारा कुछ छिन जाए। उसकी हथेली की उंगलियों से सारी उपलब्धियां रेत की मानिंद फिसल जाए। अकारण।

तो क्‍या होगा ?

इस सवाल का जवाब तो केवल यही मिलेगा कि यह आदमी हमेशा-हमेशा के लिए टूट-बिखर जाएगा। लेकिन इस मामले में ऐसा हर्गिज नहीं है। हां, वह टूटा जरूर है, लेकिन बिखरा नहीं। इतना ही नहीं, तब भी नहीं टूटा जब उसकी मां का देहांत न केवल इन्‍हीं तनावों के दौर में हो गया, बल्कि उनकी मृत्‍यु तब हुई जब उसके बेटे की शादी को केवल दो दिन बचे थे।

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लर्नेड वकील साहब

इस शख्‍स का नाम है राजेंद्र सिंह। न्‍यायपालिका में अपनी पूरी श्रेष्‍ठता के बल पर राजेंद्र सिंह लखनऊ के जिला और सेशंस जज थे। उनकी काबिलियत को देखते हुए उनका नाम हाईकोर्ट के जज के तौर पर हाईकोर्ट द्वारा प्रस्‍तावित किया जा चुका था। लेकिन अचानक वर्तमान में बेईमानी के सिरमौर गायत्री प्रजापति की जमानत पर विवाद भड़का, और सारा ठीकरा राजेंद्र सिंह के माथे पड़ा। हाईकोर्ट ने राजेंद्र सिंह को चंदौली तबादले पर भेज दिया। लेकिन सबसे ज्‍यादा कष्‍टप्रद घटना यह हुई कि उनके हाईकोर्ट पर एलीवेट करने की प्रक्रिया को हाईकोर्ट ने वापस ले लिया। किसी भी लोअर जजी में किसी भी अफसर की सर्वोच्‍च ख्‍वाहिश यही होती है कि उसे हाईकोर्ट में जज की कुर्सी मिल जाए।

मैं राजेंद्र सिंह से कभी भी नहीं मिला। मुलाकात की ऐसी कोई जरूरत भी नहीं पड़ी। हालांकि मैं लोगों में मिलना-जुलना ज्‍यादा पसंद करता हूं, लेकिन न्‍यायाधिकारियों के बारे में मेरी राय जरा अलहदा होती है, कि वे खुद में ही सिमटे रहते हैं। खुद की श्रेष्‍ठता-बोध का इतना भारी वजन उन पर होता है, कि उसे ढोने में उनकी रीढ़ दोहरी होने लगती है। कुछ तो बाकायदा बदतमीज भी होते हैं, लेकिन अन्‍य प्रशासनिक या अधीनस्‍थ सेवाओं के अफसरों के मुकाबले न्‍यूनतम। हां, उन्‍हें मुस्‍कुराने में खासी मशक्‍कत करनी होती है, बनावट और आडम्‍बर उनकी जीवन-शैली में घुस-बस जाता है न, इसलिए। बल्कि कहें तो यह उनकी मजबूरी ही होती है। वरना लोअर ज्‍यूडिसरी के किसी अफसर में तनिक भी आरोप लग जाए तो पूरी छवि धूमिल हो जाने का खतरा बना ही रहता है। अधीनस्‍थ न्‍यायापालिका के मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि हाईकोर्ट के कुछ जज इसी ताक में रहते हैं कि कब कौन मिले, तो उसे खौखिया लिया जाए। खैर, राजेंद्र के बारे में उनके तनावों के बारे में कई वकीलों और जजों से बातचीत हुई थी। सभी एकमत थे इसी बात पर, कि राजेंद्र सिंह जैसा शख्‍स बहुत कम ही होता है।

बहरहाल, राजेंद्र सिंह अब सेवानिवृत्‍त हैं। लेकिन अपनी नौकरी के अंतिम दौर में उन्‍होंने जो खोया है, उसकी पीड़ा उनकी वाल पर साफ दिखायी पड़ती है। किसी झन्‍नाटेदार तमाचा की तरह राजेंद्र की एक पोस्‍ट उनकी फेसबुक वाल पर दिखी तो मैं भीतर तक हिल गया:- No need to be honest otherwise you will be crucified !

अब जरा देखिये कि राजेंद्र सिंह की इस पोस्‍ट पर लोगों की प्रतिक्रिया क्‍या हुई।

Ashok Awasthi : Virtue is it's own reward.

Rajendra Singh : इस खंडित दुरूह चक्रव्यूह से मत कर,

स्वयं न्याय की वह अप्रतिम आशा,

यह अपराजेय चिर समर , कर ध्वंस

व्यूह ,वरण जीत , कर पूरी अभिलाषा।

"राज"

Vikas Saxena : Yahaan nh to kahin aur reward milega

DrArvind Mishra : सार्वभौम मूल्य तो अपरिवर्तित हैं। उन्हें व्यष्टिगत परिप्रेक्ष्य में नही देखा जाना चाहिए। अन्ततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। किन्तु अग्निपरीक्षायें अनेक हैं

Manoj Shukla : कुछ लोग पद से महान होते हैं, कुछ लोगों से पद महान होता है।

Virendra Nath Singh : Really. Afraid teaching children about honesty

Vijay K Singh : i will like to be crucified than licking shoe of Rahul like congress leaders

Dara Singh : Although lines tell what's happening these days,yet honest people are more respectable than manipulaters.

Virendra Vikram Singh Rathore : Quite true The values are changing

Ram Naresh Misra : Never think so brother. Honesty is the boon of God. Only just and honest man enjoys the peace of mind and respect.God gives reward in different ways to honest .

Ashok Mathur : इमानदारी किसी पर अहसान नहीं है और बेइमानी अपने जोखिम पर है ,जो चाहे अपनाये।

Sanjay Kumar Dey : देता रहा बेगुनाही की शहादत मैं तमाम उम्र, मेरा क़ातिल बड़े मुंसिफ़ाना अंदाज़में मुझे सुनता रहा.....

Vani Ranjan : Moral values are more important than worldly success. Honesty pays in the long run

Shashank Shekhar : No matter what happens, the honest cannot change their nature.

Purnendu Srivastava : When dishonesty is a bliss it is folly to be ....

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

राजेंद्र सिंह हमेशा उस अनुशासित सेनानी की तरह रहे हैं, जिसकी उम्‍मीद न्‍यायपालिका हमेशा से चाहती रही है। अपनी पीड़ा कभी भी राजेंद्र ने खुल कर नहीं प्रदर्शित कर दी। लेकिन इसके बावजूद उनकी पीड़ा का समंदर अक्‍सर छलक ही पड़ता है। कभी किसी कमेंट के तौर पर, तो भी हताशा के तौर पर। लेकिन रूक-रूक कर वे खुद को नास्तिक होते हुए ईश्‍वर के प्रति पूरी आस्‍था दिखा देते हैं। उनकी कुछ पोस्‍ट देखिये, तो आपको पता चलेगा कि इस शख्‍स के दिल में जब-तब क्‍या-क्‍या नहीं चलता रहता है:-

सांप !

तुम सभ्‍य तो हुए नहीं,

नगर में बसना

भी तुम्‍हें नहीं आया।

एक बात पूछूं- ( उत्‍तर तो दोगे?)

तब कैसे सीखा डसना,

विष कहां पाया?

"अज्ञेय"

लेकिन इस सवाल उठाते हुए भी राजेंद्र सिंह यह जरूर जोड़ देते हैं कि:-  "हैव ए क्‍वेश्‍चनेबल डे " अक्‍सर वे किसी पपीहे की तरह आर्तनाद करते हैं कि:- "रॉबिनहुड कहाँ हो । तुम्हारी बहुत याद आ रही है।" और यह भी कि :-" Who will give Justice to me ?" लेकिन इसके साथ ही साथ यह भी लिख देते हैं कि:- "ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं ।"

एक आलोक बोस हैं, और एक थे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी

बीमार जज ने दिया इस्‍तीफा। इलाज सरकार से नहीं, मैं खुद कराऊंगा

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

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