हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी।

: देहरादून में उन्‍नाव की अपर जिला जज ने सिपाही को तमाचे रसीद किये, लेकिन हर थाने में केवल पैशाचिक-नर्तन करते हैं पुलिसवाले : एक महिला के सामने उसके बेटे को अश्‍लील गालियां देते हुए सरेआम पीटना किस पुलिस-संहिता में दर्ज है : प्रेमनगर का थानाध्‍यक्ष नरेश राठौड़ का नाम कुख्‍यात पुलिसवालों में शुमार है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह सच है कि किसी भी घटना पर तत्‍काल प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करना अनुचित होता है।  चाहे वह प्रभावित व्‍यक्ति हो, अथवा कोई न्‍यायाधीश। हां, आपात हालातों में यह अधिकार उच्‍च न्‍यायालय और सर्वोच्‍च न्‍यायालय के जजों का यह अधिकार है, कि वे किसी भी घटना पर, किसी भी समय, कहीं भी स्‍थान पर अपना फैसला सुना सकते हैं। लेकिन उन्‍नाव की अपर जिला जज को यह अधिकार नहीं था कि वह किसी पुलिसवाले पर हमला कर उसे तमाचे रसीद कर देतीं। वह भी सरेआम, सैकड़ों लोगों के सामने। कानून की भाषा में यह अपराध है। और अगर एक जज ही जब इस तरह की प्रतिक्रियाओं का प्रदर्शन करेगा, तो फिर सामाजिक व्‍यवस्‍था की ही चिन्दियां उड़ जाएंगी।

इसीलिए सच यही है कि उन्‍नाव की इस जज जया पाठक ने एक सिपाही पर सार्वजनिक रूप से हमला कर उन्‍हें तमाचे मार कर कानून की धज्जियां उड़ायी हैं। वाकई जया पाठक का यह कृत्‍य कुकृत्‍य की श्रेणी में आता है, और जाहिर है कि यह संज्ञेय अपराध भी है, जो जया पाठक ने कर डाला है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्‍ट्रार ने देहरादून की एसएसपी निवेदिता कुकरेती के तत्‍सम्‍बन्‍धी पत्र पर तत्‍काल कार्रवाई की, और आदेश जारी किया कि जया पाठक के कृत्‍य पर आवश्‍यक और सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की जाए। उधर प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जया पाठक को निलम्बित कर भी दिया है।

आइये, हम आपको दिखाते हैं कि थाने में क्‍या होता है महिलाओं के साथ। हमारे पास है एक थाने पर पहुंची एक महिला की वीडियो-क्लिप, जिसमें थानाध्‍यक्ष ने उस महिला को इतनी अश्‍लील गालियां दी हैं, कि किसी भी जिन्‍दा शख्‍स को गुस्‍सा आ ही जाए। उस वक्‍त थाने में करीब पांच दर्जन लोग मौजूद थे, लेकिन उनमें से एक में भी यह साहस नहीं हुआ कि वे इस कमीने दारोगा की करतूतों पर विरोध कर पाते। हां, थाने में उस वक्‍त मौजूद एक व्‍यक्ति इस हादसे का चश्‍मदीद था, और उसने साहस जुटा कर उस दारोगा की पूरी अमानवीय हरकत को अपने मोबाइल पर शूट कर लिया। यह दर्दनाक वीडियो देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

यह दारोगा नहीं, नृशंस अपराधी है

लेकिन सवाल का जवाब यहीं तक नहीं खत्‍म हो जाता है। यही से तय होती है अपराध की फैक्‍ट्री बनी पगडंडी, जिसे पुलिस के रवैये ने बनायी है। इस पूरे मामले पर नजर डालिये तो आपको इसमें लोचा ही लोचा, और सवाल दर सवाल ही उठते दिखेंगे। क्‍या वजह है कि 11 सितम्‍बर को पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों के बीच हुई मारपीट में  जब पुलिस ने हस्‍तक्षेप कर दोनों पक्षों को थाने पर बुलाया, तो रोहन पाठक को बाल पकड़ कर क्‍यों इस तरह पीटा गया, मानो वह कोई छात्र नहीं, बल्कि के लिए बलि के लिए ले जा रहा कोई बकरा हो, जो अपनी जान बचाने के लिए छटपटा रहा हो। रोहन पाठक ही जया पाठक का बेटा है। और मामले की खबर पा कर जया अपने पति के साथ थाने पर चली गयी थीं। दिल्‍ली के पत्रकार और मिडनाइट एक्‍सप्रेस के सम्‍पादक संदीप अग्रवाल बताते हैं कि थाने में नरेश राठौड़ ने रोहन को कुछ इस तरह दबोच कर पीटना शुरू कर दिया, मानो वह अभी उसकी हड्डी-पसली एक कर तोड़ देगा। उसके बाद बाकी पुलिसवालों ने भी उस पर भी अपनी ताकत की आजमाइश की। थाने में दिनदहाड़े सड़क के सामने एक महिला के सामने उसके बेटे को मां-बहन-बेटी जैसी निहायत शर्मनाक गालियां दी गयीं।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

सोचिये तनिक, कि कोई बेटा अगर थाने में पुलिसवालों से बुरी तरह पीटा जा रहा हो, तो उसकी मां पर क्‍या बीतेगी। जया बिफर पड़ी, तो एक सिपाही ने जय के व्‍यवहार की वीडियो बनाना शुरू कर दिया। वह सिपाही उसके आसपास मंडराते हुए उसी वीडियो बना रहा था। अब जरा कल्‍पना कीजिए, कि एक तरफ तो अपने बेटे की पैशाचिक पिटाई से जया बुरी तरह आहत थी, छटपटा रही थी, दूसरी ओर सिपाही की हरकतों ने उसके सब्र की सीमा ही तोड़ दी। बौखलायी जया ने आव देखा न ताव, सीधे तड़ातड़ दो-चार झांपड़ रसीद कर दिये।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्‍ट्रार ने जया पाठक पर यह कार्रवाई की है। माना यही माना जा रहा है कि जया पाठक ने गलत किया। मैं भी मानता हूं कि जया पाठक ने ऐसा करके गलत किया। उस पर कार्रवाई होनी ही चाहिए।

लेकिन सच बात कहूं तो अगर जया पाठक की जगह मैं वहां होता, तो मैं भी जया पाठक जैसा ही व्‍यवहार कर बैठता। किसी भी अत्‍याचार की हद होती है साहब। नरेश राठौड़ ने अत्‍याचार की सारी सीमाएं तोड़ डाली थीं, ऐसे में अगर जया पाठक की भी संयम की हद टूट गयी, तो उसमें गलत क्‍या हुआ। अत्‍याचार का जवाब अत्‍याचार नहीं होता है। लेकिन अत्‍याचार का विरोध उतना ही अनिवार्य होता है। मैं तो जया पाठक के साहस की प्रशंसा कर रहा हूं कि उसने अमानवीय व्‍यवहार करने वाले खाकी वर्दी से भरे लोगों के सामने अकेले जूझने का हौसला दिखाया।

हैट्स-ऑफ जया। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी।