निवेश तो रिश्‍तों में करना चाहिए: नया मैनेजमेंट गुरू

: पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान की स्‍टेपिंग आउट सेरेमनी में एक नव-प्रबंधक ने रच डाली मैनेजमेंट पर एक नयी परिभाषा : यूपी के वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश जुआल का बेटा है भरत, कमाल की डगर बुन ली : समग्रता में समझना होगा जीवन को, हर एक महत्‍वपूर्ण। यहां तक कि कुत्‍ते और चिडि़या भी :

कुमार सौवीर

पुणे : प्रबंधकों को मैनेजमेंट की दुनिया में आम तौर पर बेहद कठिन-क्लिष्‍ट और केवल आर्थिक बोझा लादने की मशीन के तौर पर ही देखा और समझा जाता है। जहां की हर डगर हर कदम पर रूखी और केवल काम से काम रखने वाली शर्तें ही बिखरी होती है। पथरीला रास्‍ता केवल भौतिक और आर्थिक उपलब्धियों तक ही सिमटा रहता है, जैसे कोई खच्‍चर-घोड़ा जिसकी आंख को केवल सीध पर ही रखने के लिए एक खास पर्दा लगा दिया जाता है। ऐसे घोड़ों-खच्‍चरों की जिन्‍दगी इससे ज्‍यादा न कुछ देख सकती है, न समझ सकती है, और न ही कुछ कर सकती है।

मगर ऐसी भीड़ में अचानक जब कोई गजब धावक एक ऐसी डगर को तोड़ कर एक अनोखे मानवीय आयामों को मजबूत करने की लाजवाब कोशिश करता है, तो वाकई कमाल हो जाता है। खास तौर पर तब, जब यह धावक सहज-सरल और मानवीय तन्‍तुओं की जमीन पर अपनी शिक्षा-दीक्षा की नींव बुनने जा रहा हो। पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान में बीते दिनों यही हुआ। यहां पढ़ कर निकलने जा रहे एक नव-प्रबंधक ने जीवन को कुछ इस तरह समझा और उसे सार्वजनिक तौर पर प्रस्‍तुत किया, कि सुनने-देखने वाले लोग दंग हो गये। उनकी आंखें गीली हो गयीं।

उस घटना का जिक्र किया है एक वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश जुआल ने। अपनी पत्रकारिता में करीब साढ़े तीन दशक की पारी खेलने के बाद हाल ही अमर उजाला से सेवानिवृत्‍त दिनेश जुआल ने अपने बेटे के शब्‍दों को जिस तरह प्रस्‍तुत किया है, वह लाजवाब और बेहद भावुक भी है। जुआल के बेटे भरत के इस स्‍व-अनुभूत शब्‍दों ने जिन भावों की प्रवाह-धारा पर वहां मौजूद लोगों को झकझोर दिया। पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान की स्‍टेपिंग आउट सेरेमनी में भरत ने जो बोला, वह अनुकरणीय तो है ही, समाज के प्रति उसकी जीवन की प्राप्ति और उसके सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण भी है। कहने की जरूरत नहीं कि भरत ने अपने भाषण में जो कुछ भी बोला, उससे समझा जा सकता है कि हमारे बच्‍चे किसी शुष्‍क-प्रबंध की ठोस-निर्जीव ईंट मात्र नहीं हैं, बल्कि जीवन में मानवीय क्षेत्र में खुद को किसी बेहद भावुक और सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण निवेश से ज्‍यादा बलशाली हैं। इससे साबित होता है कि प्रबंध क्षेत्र में केवल कालेज ही नहीं, परिवारिक पाठशाला भी एक बेहद अहम शिक्षालय होता है, जहां एक नया समीकरण और जीवन-शैली का तानाबाना बुना जा सकता है।

अपने अनुभवों को लेकर दिनेश जुआल लिखते हैं कि:- सिम्बोयसिस पुणे में बेटे भरत की स्टेपिंग आउट सेरेमनी में शामिल होने वाले हम अकेले पेरेंट्स थे। बेटे ने हमारे लिए भी तालियां पिटवा दी।

अपने बैच को रिप्रेजेंट करने के लिए भरत बाबू को मंच पर बोलने के लिए बुलाया गया। जब उन्होंने अपनी एमबीए की पढाई के सबक किनारे छोड़ते हुए अपना निष्कर्ष दिया कि संबंधों यानी रिश्तों में निवेश न किया तो क्या व्यवसाय किया, उनके लिए तालियां बजी। उन्होंने कहा कि कैंपस के दो कुत्तों लीरा और दीनार से भी उन्होंने जीवन के अहम् सबक सीखे हैं, इन दोनों प्राणियों को उन्होंने silent teachers कहा, मुझे उनकी बचपन में लिखी डायरी के पन्ने याद आ गए । यह सुनना मेरे लिए अद्भुत और सुखद था। सबसे अंत में जब उन्हें अपनी क्लास के बेस्ट स्टूडेंट की ट्रॉफी मिली तो पूरे हॉल ने तालियां बजाई। इस ख़ुशी को शेयर करना तो बनता है भाई।

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