सच है कि अधिकांश महिला पीसीएस अफसर होती हैं बेहद तर्रार, ईमानदार

: काश यही तेवर सभी पीसीएस अफसरों में होता जो निधि ने दिखाया : चंदा निगम तो साक्षात नर्क रहीं, लेकिन रेखा गुप्‍ता, मंजू चन्‍द्रा, श्रद्धा, पुष्‍पा, संघमित्रा जैसी महिलाओं ने पीसीएस अफसरों की नाक बचायी : बधाई दीजिए, सीतापुर की ईमानदार और बहादुर एसडीएम को, जिसे एक मंत्री ने सस्‍पेंड करा रखा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पश्चिम और बुंदेलखंड के लोग शब्‍दावली और उनके बहुअर्थी भावों को समझ पाने में अक्‍सर गच्‍चा खा जाते हैं, लेकिन पूर्वांचल और अवध में पीसीएस का अर्थ अलग लगाया जाता है, और एसडीएम का अर्थ दूसरा। बहरहाल, हकीकत यही है कि एसडीएम वाले पीसीएस अफसरों का चरित्र गजब पलटा खाता रहता है। उनकी मजबूरी भी होती है, सरकार और आईएएस अफसरों का भारी बोझा उनकी पीठ पर होता है कि उसके चलते वे सीधे खड़े भी नहीं पाते। ऐसे में उनमें चारित्रिक स्‍खलन बहुत जल्‍दी हो जाता है। लेकिन गनीमत यह है कि इस सेवा की नाक को हमेशा इसी सेवा की महिलाओं ने बचाये रखा है। लखनऊ की एडीएम ( वित्‍त-राजस्‍व) निधि श्रीवास्‍तव ने कल जो गरज कर ललकार दी है जो आजकल के अफसरों में बिरला ही है। लखनऊ में वकीलों द्वारा पीसीएस अफसरों और अदालत-कक्षों में हुए हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए निधि बोलीं:- हम अपनी गरिमा और इज्‍जत बेच कर नौकरी नहीं करेंगे।

सलाम है लखनऊ की ऐसी बहादुर एडीएम निधि श्रीवास्‍तव को। हकीकत यही है कि पीसीएस अफसरों की नाक इस संवर्ग की महिला अफसरों ने ही बचायी है। चाहे वह उनकी कार्यशैली हो, मेहनत हो, समर्पण हो, और या फिर वह बहादुरी-जाबांजी, जो निधि ने दिखायी है। हालांकि इस संवर्ग के इतिहास में ऐसी कलंक जैसी महिलाएं भी अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं, जो जीवन और सेवा के हर क्षेत्र में किसी भद्दे और डरावने काला धब्‍बा से कम नहीं है। इस छोटी सी लिस्‍ट में चंदा निगम जैसी चंद महिला अफसरों का नाम पहले पायदान में दर्ज हैं।

लेकिन सच बात तो यही है कि इस संवर्ग में महिलाओं की शासकीय निष्‍ठा और गम्‍भीरता हमेशा हमेशा सर्वोच्‍च रही है। चाहे वह रेखा गुप्‍ता रही हों, या फिर मंजू चंद्रा, श्रद्धा मिश्रा,  पुष्‍पा सिंह, संघमित्रा शंकर और ऐसी कई महिलाएं। इनमें से कई महिलाओं को षडयंत्र के तहत कई बार दंडित भी किया गया और उनकी छवि धूमिल करने की साजिशें की गयीं, लेकिन यह महिलाएं अपना बनाये रहीं, और अपने संवर्ग की शान बनी ही रहीं। आज भी इन महिलाओं का नाम समाज और उनके संवर्ग में बेहद सम्‍मान और गर्व के साथ लिया जाता है।

रेखा गुप्‍ता ने लखनऊ में पूरी नौकरी भले ही जीवन भर की, लेकिन इस लखनऊ को खूब दिया भी। भाजपा सरकार में नगर विकास मंत्री रहे लालजी टंडन ने रेखा गुप्‍ता को आयरन लेडी के नाम से पुकारना शुरू कर दिया था। मंजू चंद्रा, श्रद्धा मिश्रा का पूरा जीवन बेदाग रहा, हालांकि श्रद्धा पर नौकरी के अंतिम दौर में निलम्‍बन की तलवार चल गयी, लेकिन इसमें भी वे बेदाग निकलीं। यही हालत पुष्‍पा सिंह और संघमिश्रा शंकर की भी रही। हालांकि यह इन दोनों के पास एक राजनीतिक विरासत मौजूद थी, लेकिन इसके बावजूद इन लोगों ने उसका कभी भी प्रयोग अपनी नौकरी पर नहीं किया।

आज यह कहने का मकसद यह नहीं है कि हम यूपी के पुरूष पीसीएस अफसरों को कमतर साबित कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि पुरूष पीसीएस अफसर नाकाबिल और नाकारा हैं, लेकिन इतना तो जरूर ही है कि इन अफसरों ने प्रतिकूल हालातों को शायद कम ही महसूस किया होगा। बहरहाल, इस पूरी बात को कहने का मकसद केवल इन महिलाओं का हौसला-आफजाई करना ही है।

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