मां: इनकी प्रताड़ना, दशा, पीड़ा और प्रेरणा टटोलिये

: महिलाओं से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएं, जो किसी को भी दहला सकती है : झांसी की एक बेबस मां ने जिस तरह अपनी नवीं बच्‍ची को पटक कर डाला : किस तरह अपने गीले अंत:वस्‍त्रों को लपेटे रहती थीं मेरी मां : बहराइच की लड़कियों को साइकिल चलाने का श्रेय सुशिक्षा अनुपम मिश्र को :  बेबस मां -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : चार दिन बीत गये हैं, लेकिन मातृ दिवस को लेकर अब तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या सोचा, छांटा और लिखा जाए।

ऐसा नहीं कि लिखने के लिए कोई बहुत महत्वपूर्ण बात ही नहीं है। ज्‍यादातर बात हमेशा छोटी ही होती है, हमारी समझ उसे छोटी या बड़ी बनाती है। खासकर मानवीय संदर्भ में तो यही शर्त लागू होती है। हमें खोजना होता है उसके अंतर-विषय को, कि हम किस गहराई तक पहुंचा और देख सकते हैं। आम आदमी की सम्वेदनाओं को प्रभावित करने का जिम्मा संभाले लेखकों, चिंतकों और पत्रकारों की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसे मौके खोजें, उनका छिद्रान्वेषण करें और उन्हें व्याख्यायित कर जनसाधारण तक पहुंचा दें।

दिक्कत तब होती है जब किसी लेखक के पास लिखने के लिए विषयों का बेशुमार भंडार तो हो, लेकिन उसकी लेखनी और वाणी स्तब्ध हो सन्निपात की हालत तक पहुंच चुकी हो, जुबान और दिमाग सुन्‍न हो जाए। आप लिखना तो चाहें, लेकिन लिख नहीं पाते हालत किसी भी और अवसाद की हालत से कम नहीं होती। मेरे पास भी कई गहरे मसले हैं जो घटनाओं के स्तर पर बेहद मार्मिक होने के चलते समाज को गहरे तक प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे भी नहीं, ये इतने पीड़ाजनक भी हैं कि उसे सुन कर आम आदमी अपना चेहरा भी न छुपा पाएगा।

खैर, विलम्‍ब के लिए आप सभी से दिल से और संवेदना रूप से भी क्षमा याचना चाहता हूं कि मैंने इतना विलंब कर दिया। साथ ही संकल्प भी लेता हूं कि आइंदा ऐसा नहीं होगा। तो दोस्तों, मेरे पास फिलहाल तीन प्रमुख घटनाएं हैं, जिनसे मैं शुरूआत करने की इजाजत चाहता हूं। पहले तो झांसी की एक महिला की घटना है। इस महिला ने भरी अदालत में एक ऐसा सच कुबूल कर लिया, जो भले ही उसको आजीवन कारावास तक पहुंचा सके लेकिन उसके इस सच ने हमारे समाज को उसकी सभ्यता उसकी संवेदनशीलता उसकी भावुकता और उसकी असल औकात चिंदी-चिंदी तार-तार कर डाला। इस श्रंखला के पहले अंक में हम उस घटना का जिक्र करेंगे।

बाकी दूसरी और तीसरी घटनाएं हमारे परिवार से जुड़ी हुई हैं। इनमें हमने भरसक ऐसे माहौल को दिखाने की कोशिश की है जिसे समाज सामान्य तौर पर उचित-अनुचित के दायरे में कस लेता है, लेकिन मैं उस पूरे माहौल को पूरे संयमित भाव शब्दों में जगजाहिर करने की कोशिश करूंगा।

इसमें मैं मेरी ननिहाल में सबसे बड़ी मौसी से लेकर उनके पूरे जीवन-काल का किस्सा बयान करूंगा, जो इस वक्त भले ही मुंबई के एक ओल्ड-एज होम में अपनी अंतिम सांसें ले रही हैं, लेकिन उस महिला ने 70 साल पहले जिस जिजीविषा का प्रदर्शन किया था वह बेमिसाल था। इतिहास में यह घटनाएं भले ही दर्ज न हो पायें, लेकिन बहराइच और गोंडा जैसे बेहद पिछड़े इलाकों में आज स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की ज्‍वाला आपको धधकती दिख रही है, उसका श्रेय अगर किसी एक व्‍यक्ति पर है। और वह हैं मेरी मौसी। नाम है सुशिक्षा अनुपम मिश्र।

श्रंखला के चौथे अंक में मैं खुद अपनी मां के साथ जुड़े कुछ किस्से बयान करना चाहता हूं जो किसी भी महिला के अंतरंग वस्त्रों से जुड़े हैं। याद पुरानी शायद 50 साल पहले की है, तब किसी भी स्त्री या महिला का अपने अंतरंग वस्त्र का तनिक भी दिख पड़ जाना ही उसके अभद्र, अश्‍लील, चालू व्‍यवहार का स्‍वत: प्रदर्शन माना जाता था।

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां