श्रमिक दिवस आज: काहे बे मादर.... इत्‍ती मजूरी?

: कड़ी मेहनत से निकले पसीने से बनियाइन में छेद बनते हैं। मतलब यह कि अब आप श्रमिक नहीं रहे : सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान आज बन चुका है घर-घुस्‍सू : झूठों और मक्‍कारों का उल्‍लास-पर्व बनता जा चुका है विश्‍व मजदूर दिवस : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज अचानक करीब तीस बरस पुरानी बात याद आ गयी है। तब लोगों की बनियाइन-गंजी दो-एक महीनों में ही झर्रीदार यानी छलनी जैसी हो जाती थी। पहले छोटे-छोटे दाना साइज के छेद बनते थे, फिर मटर-नुमा और फिर बाकायदा किसी छोटी तश्‍तरी तक जैसे फटही हो जाती थी वह गंजी-बनियाइन। शुरूआत होती थी पैबंद-थेलगी लगाने से। लेकिन दो-तीन थेलगी के बाद ही अहसास हो जाता था कि ऐसे प्रयास निष्‍फल ही होंगे। वजह यह कि जल्‍दी ही एक छोटे-नन्‍हें छेद एकसाथ मिल कर एक बड़े-बड़े छेदों में तब्‍दील हो जाते थे। तब वह बनियाइन लुगदी की शक्‍ल ले लेती थी। उसका इस्‍तेमाल तब घर की महिलाएं पोंछा लगाने तक से परहेज करती थीं। नतीजा यह कि सायकिल या स्‍कूटर की साफ-सफाई में ही उसका इस्‍तेमाल हो जाता था।

क्‍या आप यह जानना चाहेंगे कि आखिर क्‍यों ऐसा होता था?  इस सवाल का जवाब देते हैं गोमतीनगर स्थित राजकीय होम्‍योपैथी कालेज के प्रोफेसर डॉक्‍टर एसडी सिंह। अपनी क्‍लीनिक में मरीजों से बातचीत से बातचीत के दौरान प्रो सिंह बताते हैं कि तब लोग परिश्रम करते थे, पसीना निकलता था। और उसकी क्षारीय गुणों का असर बनियाइन पर पड़ता था, जिसे उनकी बनियाइन बड़े छेद-दार बन जाती थी।

लेकिन अब ऐसा होना बंद हो चुका है। इसलिए नहीं कि आज की बनियाइनें ज्‍यादा मोटी और टिकाऊ होती जा रही हैं। आज तो और भी महीन और बेहद हल्‍की गंजी-बनियाइनों का दौर आ चुका है। मगर मजाल है कि उन पर कोई छेद बन भी सके? बरसों-बरस तक उस पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता। पुरानी बनियाइन होकर मटियाली और फेड हो जाती है, लेकिन फटती नहीं। वजह है मेहनत की गैरहाजिरी। शारीरिक परिश्रम करना हमारे संस्‍कार से दूर छूट चुका है। अब तो कोई परिश्रम करता ही नहीं। आरामदेह जीवन शैली है। सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान इस वक्‍त घर-घुस्‍सू बन चुका है। हर घर कूलर-एसी। कम्‍प्‍यूटर और इलेक्‍ट्रानिक सामान और लकदक सोफा-बिस्‍तर है। धूल नहीं पड़नी चाहिए, इसलिए घर को पिंजरा बना दिया। पैक्‍ड। जो कुछ भी होना है, घर के भीतर ही करो। न मेहनत होगी, और न निकलेगा पसीना। हचक कर भोजन करो, और जाम छलकाओ। यूरिक और ट्राइग्लिसराइड बड़ जाएगा और दिल बात-बात पर हांफना शुरू कर देगा। दिक्‍कत हुई, तो डॉक्‍टर मोटी रकम का खर्चा बता कर बोलेगा:- आराम करो।

फिर क्‍या? फिर यह कि मेहनत और वर्जिश करना बंद, जो पहले से ही बंद था। पहले भी यही सब हो रहा था, जिसके चलते आज इसकी नौबत आ गयी।

लेकिन हां, समाज में हमारे समाज में कुछ तबका-समुदाय आज भी मौजूद है, जिसकी बनियाइन हमेशा की तरह छेददार ही होती है। वह तबका है मजदूर और श्रमिक। वह भी वह तबका जो संगठित नहीं, बल्कि असंगठित क्षेत्र में काम करता है। यानी दिहाडी पर पर काम करने वाला मजदूर। मानव-मंडी पर बैठते मेहनतकश लोगों का हुजूम। गलाफाड़ आवाजें निकाल कर सब्‍जी बेचने वाले लोग। रिक्‍शाचालकों और ठेलियावालों का झुण्‍ड। जिसके मजूरी मांगते ही आपकी छाती फटने लगती है:- काहे बे मादर---- इत्‍ता पैसा?

ऐसे में पहली मई के दिन श्रमिक-दिवस मनाने, जश्‍न मनाने, जुलूस निकालने और सड़क पर लकदक वेशभूषा में दुनिया के मजदूरों एक हो, मजदूर की आजादी जिन्‍दाबाद जैसे नारे लगाने-उछालने का क्‍या औचित्‍य है। कार्ल्‍स मार्क्‍स ने ही यह नारा दिया था कि दुनिया के मजदूरों एक हो, लेकिन अगर मार्क्‍स को यह अलहाम हो जाता कि उनकी कल्‍पनाओं वाला श्रमिक-नेता ऐसा होता, तो मैं तो दावा करता हूं कि कार्ल्‍स मार्क्‍स यह नारा तो हर्गिज नहीं देते। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस