आगरा व बरेली में दी गयी थी रेप पर फांसी की सजा

: आशियाना कांड में जिस तरह अपराधी को बचाने की साजिशें हुईं, उससे न्‍याय के प्रति समाज की आस्‍था ही चकनाचूर हो गयी थी : वकीलों ने पूरे दस बरस तक झूठी दलीलें दीं, और जजों ने उन दलीलों को सुनने में पूरा एक दशक लगा दिया : फास्‍ट ट्रैक कोर्ट से आशा बंधी है, पर सूखी जमीन पर चंद बूंदों सी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : करीब 15 बरस पहले लखनऊ के आशियाना कालोनी में एक बच्‍ची से हुए सामूहिक बलात्‍कार में जिस तरह वकीलों और जजों ने कानून का माखौल उड़ाया था, वह हमारे समाज और वादकारी हित सर्वोच्‍च का नारा देने वाली न्‍यायपालिका के चेहरे पर किसी भयावह कालिख से कम नहीं थी। इस मामले में अपराध और राजनीति से जुड़े एक बड़े खानदान के युवक को बचाने के लिए वकीलों ने भरसक साजिशें बुनी थीं। और शर्मनाक की बात तो यह रही थी कि उस अपराधी के पक्ष में बड़े दिग्‍गज वकीलों की झूठी दलीलों के सामने अदालत के बड़े-बड़े जज भी घुटने टेकते रहे। वकीलों की साजिश थी कि कैसे भी हो, उस मुजरिम को नाबालिग साबित कर दिया जाए, ताकि उसे एकाध बरस की हल्‍की सजा देने के लिए किशोर-गृह भेज दिया जाए। इस साजिश को पूरे करीब एक दशक तो सच साबित करने की कोशिशें हुईं। जबकि किसी भी व्‍यक्ति के बालिग होने अथवा न होने का प्रमाण किसी भी डॉक्‍टर अथवा डॉक्‍टरों की टीम से जांच कराने में चंद घंटे ही पर्याप्‍त होते हैं। वह तो गनीमत रही कि दस साल तक झूठ की इमारत खड़ी होने के बावजूद सच का पलड़ा भारी पड़ गया।

इस अथवा ऐसे मामलों से प्रमाणित होता है कि सच को झूठ और झूठ को सच के तौर पर पेश करने की कवायद में कौन लोग लिप्‍त होते हैं। ऐसे में यह जिम्‍मेदारी केवल जजों की ही होती है कि वह न्‍याय के पक्ष में रहें। और ऐसा भी नहीं है कि अतीत में जजों ने अपने इस दायित्‍व का निर्वहन नहीं किया है। कम से कम फास्‍ट-ट्रैक कोर्ट की अवधारणा ने सुलभ न्‍याय की सम्‍भावनाओं का सुखद सपना पूरा करने की कोशिश तो की ही है। लेकिन ऐसी चंद अदालतों से समस्‍या का समाधान की सम्‍भावनाओं को पूरा नहीं खोजा जा सकता है।

मेरे पास कम से कम दो मामले मौजूद हैं जिसमें न्‍यायाधीशों ने मुकदमों की सुनवाई में न्‍यूनतम समय लगा कर न्‍याय-प्रक्रिया के प्रति अपनी पूरी संवेदनशीलता का गंभीर प्रदर्शन किया था। उन जजों ने ऐसे मामलों पर त्‍वरित सुनवाई कर फैसला किया था। फैसला भी ऐसा, जिसमें कैपिटल पनिशमेंट यानी सर्वोच्च दंड सुनाया गया। अर्थात फांसी की सजा। लेकिन इसके विपरीत अधिकांश मामलों पर न्यायपालिका का जो रवैया होता है उसे समाज में न्यायपालिका और राज्यसत्ता के प्रति दयनीय चरित्र का प्रदर्शन करता है और इन हालातों के चलते ऐसी हालत में समाज में नैराश्य और तदनुरूप अवसाद भाव तक का भयावह संक्रमण हो जाता है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

पहला मामला तो आगरा का है जहां एक नन्ही बच्ची के साथ एक दुराचारी में इतना यौन-नृशंस व्यवहार किया कि उसकी मौत हो गई। उस बच्ची के गुप्तांगों पर उस दुराचारी ने भारी और जानलेवा हमला किया था। यह मामला जब अदालत में पहुंचा तो उस वक्त जज की कुर्सी पर आसीन थे आलोक कुमार बोस। आलोक बोस ने इस मामले को प्राथमिकता के साथ में सुना, तथ्‍यों का विश्‍लेषण किया और अन्‍तत: दुराचारी को फांसी की सजा सुना दी। जबकि यह एक ऐसा मामला था जिसमें अदालत के फैसले पर किसी ने भी कोई आपत्ति नहीं की। कोई आवाज नहीं उठायी गयी। चंद लोगों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी सभी लोग इस फैसले से संतुष्ट और प्रसन्न थे। इस मामले में अदालत ने जिस तरह तथ्‍यों का विश्‍लेषण कर यह फैसला सुनाया था, उसे सुप्रीम कोर्ट तक में हुई अपील का कोई भी फर्क नहीं पड़ा, और दुराचारी हत्‍यारे को फांसी की सजा बरकरार ही रही। इस वक्‍त उसकी दया याचिका राष्‍ट्रपति के पास लटकी हुई है।

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लर्नेड वकील साहब

दूसरा मामला था यूपी के रुहेलखंड क्षेत्र के बरेली का। इस मामले में भी एक मासूम बच्ची के साथ बेहद डरावना और रोंगटे खड़ा कर देने वाला जघन्य अपराध किया गया था। बच्ची पर इतना अत्याचार किया गया कि उसकी मौत हो गई। इस मामले की सुनवाई की थी तब के जज राजेंद्र सिंह ने। राजेंद्र सिंह ने इस मामले की गंभीरता को देखा और इस मामले के गुण-दोष को परखने के लिए सभी पक्षों को अपनी बात समय बद्ध तरीके से पेश करने का आदेश दिया था। बरेली में हमारे सूत्र बताते हैं कि बहुत ही कम ही समय में राजेंद्र सिंह ने इस मामले की सुनवाई को खत्म किया, और अभियुक्त दुराचारी तथा नराधम हत्‍यारा करार देते हुए अपराधी को फांसी की सजा सुना दी थी। (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला