दल्‍लागिरी नहीं, अब पत्रकारिता पर बाध्‍य हो रहे हैं सोनांचल के पत्रकार

: सोनांचल की पत्रकारिता आभारी है योगी सरकार से, खबरें छपनी शुरू : सरकारी महकमों से हर महीने लाखों की बख्‍शीश उगाहते थे सोनांचल के पत्रकार, आजकल ठनठन-गोपाल : भारी-भरकम उगाही भी और मन-भर ऐयाशी भी, लंगोटी फेंक कर :

कुमार सौवीर

सोनभद्र : अकूत प्राकृतिक सम्‍पदा पसरी है सोनांचल में। लेकिन उसे लूटने के लिए माफिया, नेता और अफसरों के साथ ही साथ पत्रकारों का गिद्ध-दल किसी कुशल शिकारी की तरह जहां-तहां अपनी जड़ें जमाये बैठते रहे हैं। दशकों से चलती ही रही इस लूट पर योगी-सरकार ने प्रतिबंध क्‍या लगाया, सबसे बड़ा असर तो पत्रकारिता पर पड़ गया। हालत यह है कि यहां दल्‍लागिरी नहीं, पत्रकारिता सीखने पर बाध्‍य हो रहे हैं सोनांचल के पत्रकार।

सच बात तो यह है कि सोनांचल की पत्रकारिता कभी भी योगी सरकार का ऋण नहीं चुका पायेगी। यह योगी सरकार की कोशिशों की ही देन है कि आज इस पूरे सोन-क्षेत्र में पत्रकारिता अब अपने उरूज में चढ़ती दिख रही है। नित नये-नये आयाम स्‍थापित किये जा रहे हैं। सादे कागजों पर कालिख पोतने के बजाय अब उन पर अब समाचार के शब्‍द उकेरने की कोशिशें शुरू हो गयी हैं। खबर क्‍या होती है, उसे समझना शुरू कर दिया है पत्रकारों ने, और कई दशक बाद सोनांचल के लोगों को यह पता चलना शुरू हो गया कि खबर दरअसल क्‍या होती है।

तो अब पहले यह समझ लीजिए कि पूरे सोनांचल में खबर का मतलब क्‍या होता था। केवल दुर्घटना में इतने मरे, कितने घायल, नक्‍सलियों के इलाकों पर पुलिस की कार्रवाई, डीएम और एसपी का बयान और नेताओं का माल्‍यार्पण तथा अभिनन्‍दन और उनके फोटो समेत भाषण। इसके अलावा अगर कुछ छपता था कि यहां की फैक्ट्रियों और बिजलीघरों के पीआरओ की ओर से जारी किये गये प्रेस-नोट और स्‍कूलों-कालेजों में होने वाले कार्यक्रम। इसके अलावा सिर्फ विज्ञापन ही छापे जाते थे यहां के अखबारों में। बाकी खत्‍म। अखबार जितना खोला, उतना ही बंद कर लपेट दिया जाता था।

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सोनांचल

जबकि हकीकत यह थी कि यहां का सबसे बड़ा धंधा है अवैध खनन। चाहे वह बालू-मोरम का धंधा हो या फिर पत्‍थरों का क्रशर। हजारों क्रशर मशीनें और उनकी मदद में जुटी जेसीबी, डाला, ट्रक और ट्रैक्‍टर वगैरह यहां होने वाली अवैध आर्थिक गतिविधियों का मुख्‍य आधार हुआ करते थे। जिसके बल में यहां के अफसर और नेताओं ने अपनी कई-कई पुश्‍तों तक के लिए पर्याप्‍त और अकूत सम्‍पत्ति जुटा ली थी। जो बचा-खुचा होता था, वह यहां के पत्रकारों के पास चल जाता था। केवल इस लिए ताकि यहां हो रही आपराधिक अवैध खनन की गतिविधियों पर एक भी शब्‍द नहीं लिखा जाए।

केवल खनन माफिया ही नहीं, बल्कि बड़े अफसर और खास तौर पर खनन विभाग के अफसर यहां के पत्रकारों के पास बाकायदा और नियमित रूप से रिश्‍वत की रकम पहुंचा देते थे। साथ में खाने-पीने का सामान भी। ऐयाशी के सामान भी, लेकिन उन पत्रकारों के लिए ही यह सहूलियत मिलती थी, जिनका रूतबा बड़े अफसरों पर ज्‍यादा हुआ करता था। इसके लिए अफसरों के इशारे पर यहां के बड़े और आलीशान गेस्‍टहाउसों में सारी सुविधाएं मुहैया करा दी जाती थीं। कई बड़े पत्रकार तो अपने सम्‍पादकों को यहां आमंत्रित कर उन्‍हें इसी तरह की आनंद सामग्रियां उपलब्‍ध कराने में कुख्‍यात रह चुके हैं।

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पत्रकार पत्रकारिता

लेकिन योगी सरकार में अवैध खनन पर बंदी क्‍या लागू हुई, इन पत्रकारों की छुच्‍छी ही निकल गयी। पहले तो नेताओं, माफियाओं और अफसरों से उन्‍हें नियमित रूप से लिफाफे मिल जाते थे। और तो और, अकेले खनन महकमा यहां के पत्रकारों को दस्‍तूर बांधे रहता था। इनमें दैनिक जागरण, अमर उजाला और हिन्‍दुस्‍तान अखबार के ब्‍यूरो चीफ को पचास हजार से लेकर 70 हजार रूपया महीना, मंझोले पत्रकारों को 25 हजार रूपया, न्‍यूज चैनल के पत्रकारों को 20 से 25 हजार और बाकी छोटे अखबारों के पत्रकारों को 3 से 10 हजार रूपयों की रकम बंधी रहती थी। लेकिन अब चूंकि सरकार ने अवैध खनन पर रोक लगा दी है, इसलिए यह रकम पत्रकारों तक पहुंचना ही बंद हो गया।

नतीजा यह कि इन पत्रकारों ने अब असल खबरों पर ध्‍यान देना शुरू कर दिया है।