99 पत्रकारों के पंख नोंचा जालिम कप्‍तान ने

: गणतंत्र दिवस पर खिलजी की शमशीर ने हलाक कर डाली बड़े-बड़े पत्रकारों की इज्‍जत : पंख नोंचे गये अधिकांश पत्रकार वाकई गंभीरता के साथ अपने पेशे में संलग्न हैं : विज्ञापन के धंधे के बावजूद पत्रकार संघ के महामंत्री की कुर्सी पर जमे लोगों के औचित्‍य पर उठे सवाल :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बहुत उड़ रहे थे। जहां-तहां डींगें मारा करते घूमते रहते थे कि हम यह कर देंगे, हम वह कर देंगे, हम यह कर सकते हैं,  हम ऐसा कर सकते हैं, वगैरह-वगैरह। लेकिन जब मौका आया तो डींगें  मारने वाले पत्रकारों ने अपनी पूंछें अपने पिछवाड़े में घुसेड़ डाली, और दूर भाग गए। जो ज्‍यादा तिकड़मी थे उन्होंने  दूसरा  शॉर्टकट निकाला और पुलिसिया प्रकोप से बचकर पूरे इलाके में अपनी नाक  कटने से  बचा कर लिया। मगर कप्तान भी गजब  हौसलेमंद निकला। उस कप्तान ने तेज धार वाली  कैंची उठाई और खिलजी की तलवार की तरह जौनपुर के 99 पत्रकारों के पर पूरी तरह कतर डाले। अब यह सारे पर-कटे पत्रकार यत्र-तत्र-सर्वत्र घूमते हुए कोशिश कर रहे हैं कि उस घटना को लेकर कोई चर्चा ना हो पाये, जिसके चलते उनकी छीछालेदर या पक्का फजीहत ना हो पाए। मगर जो होना था वह तो हो गया। और जो हो रहा है वह भी घर-घर गांव-मोहल्‍ले में तेजी पर चल रहा है।

मामला है बनारस की कमिश्नरी के सबसे बड़े जिले जौनपुर का। हजारों साल तक का अपना इतिहास, शौर्य और सम्मान की आलीशान इबारतें यहां के गजेटियर में दर्ज है। लेकिन ताजा घटना में पुलिस ने यहां के सारे पत्रकारों के गाल पर एक जोरदार तमाशा जड़ दिया। दर्द पूरे जिले की गली-मोहल्ले और गांव-कस्बे तक ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों में भी धधक रहा है। वही खबर मैं आज लेकर लखनऊ मैं लिख रहा हूं

पहले खबर की पेशबंदी सुन लीजिए। यहां के जिला सूचना अधिकारी कार्यालय में सूचीबद्ध पत्रकारों की तादाद पूर्वांचल में सबसे ज्यादा है। एक सौ दस। हालांकि इससे ज्यादा कई गुना ज्यादा पत्रकार  प्रदेश के कई दीगर जिलों में हैं लेकिन जौनपुर के इन पत्रकारों की संख्या यहां सूचना विभाग में बाकायदा रजिस्टर्ड है। मतलब यह कि सरकारी कामकाज और सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को बुलाया जाता है। अब तक तो यही दस्तूर रहा है। हालांकि इस लिस्ट पर भी हादसे विवाद चलते रहे हैं कि यहां के प्रशासन ने जिले के बेरोजगार लोगों को मानव पत्रकारिता का तमगा उनके छाती पर टांग दिया कि जाओ बेटा, सरकारी खुली छूट है। बाजार पर निकलो और जहां भी हो पाए, झपटमारी कर अपना काम धंधा चमकाते रहो। प्रशासन का मकसद अपनी जी-हुजूरी करने में लोगों की भीड़ जुटाना होता है। मगर इनमें कई पत्रकार ऐसे हैं जो किसी समाचार संस्थान में कार्यरत नहीं है। ऐसे अधिकांश लोग अपने  डॉट कॉम या वाट्सऐप ग्रुप पर समाचार देखते रहते हैं। लेकिन इसके बावजूद उन्हें प्रशासन की ओर से सूचीबद्ध किया गया है।

लेकिन इन 110 पत्रकारों में अधिकांश पत्रकार वाकई गंभीरता के साथ अपने पेशे में संलग्न हैं। व्यस्त हैं और पत्रकारिता का झंडा बुलंद करते रहते हैं। बावजूद इसके कि उनकी आर्थिक माली हालत खासी कमजोर रहती है। लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले हैं और उन्होंने पत्रकारिता का आलम अपने हाथों में पूरी मजबूती के साथ थाम रखा है। यह सच बात है कि यह पत्रकार किसी भी समाचार संस्थान में मौलिक समाचार जनक या खोजी माने जाते हैं।लेकिन जौनपुर के कप्तान ने 26 जनवरी को पत्रकारों की पूरी असलियत को बकायदा नंगा कर डाला। ऐसी बेइज्जती की कल्पना तक न तो पत्रकारों ने कभी सुनी सोची थी और ना ही जिले में कहीं और हुआ।

यह कि परंपरा के तहत गणतंत्र दिवस की परेड में अभी तक उन पत्रकारों को आमंत्रित किया जाता था जो सूचना विभाग से सूचीबद्ध हैं। लेकिन इस बार पुलिस कप्तान ने 110 में से 99 पत्रकारों को आमंत्रित नहीं किया। सिर्फ 11 पत्रकार भी इस गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में आमंत्रित किये गये।हां, कई पत्रकार सूची से बाहर होते हुए भी परेड में शामिल हुए थे लेकिन वे ऐसे लोग थे, जिन्होंने कुछ ही समय पहले ही अखबार की दुनिया छोड़कर अपनी राजनीतिक दुकान खोल दी थी। और अब इस गणतंत्र दिवस परेड में राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नेता के तौर पर परेड में शामिल हुए।

कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें लिखना तो दूर, बोलने तक की तमीज नहीं होती। हैरत की बात है कि जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह इस परेड में शामिल तो हुए, लेकिन भाजपा के नेता की भूमिका और वेशभूषा में आकर ही उन्‍हें यह मौका मिल पाया। उन्हें पुलिस कप्तान ने उन्‍हें पत्रकार के तौर पर मान्यता नहीं दी, जबकि संघ के महामंत्री मधुकर तिवारी को कप्तान ने पर-कटा बनाकर फेंक दिया। वैसे भी मधुकर तिवारी का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं। बल्कि मधुकर तिवारी का असली धंधा तो शुरू से ही दूसरा ही रहा है, पत्रकारिता से कोसों दूर। सरकारी प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त होने के बावजूद मधुकर तिवारी पूरे धड़ल्ले के साथ अपना फ्लेक्स प्रिंटिंग का धंधा चमका रहे हैं। ऐसे लोगों की तादात खासी ज्‍यादा बतायी जाती है।