भरी हाईकोर्ट में छलक पड़ी थी इस "लेखपाल" की आंख

: हाईकोर्ट की भरी कोर्ट नम्‍बर एक में जज ने कड़े सवाल किये थे एसएन शुक्‍ला से : अपने जीवन में हर दायित्‍व को लटकाया नहीं, बल्कि उसे धर्मयुद्ध की तरह लड़ा है इस लेखपाल ने : सभी भारतीयों की तरफ से शुक्ला जी को और आपको हार्दिक आभार :

आरडी शाही

लखनऊ : एसएन शुक्ला से मेरा परिचय तो नहीँ है लेकिन वो शायद मुझे पहचानते ज़रूर होंगे क्यों कि मै विगत कई सालों से उन्हे नमस्कार करता हूं . वैसे वो low frofile रहते हैं .उनको कोई तवज्जह भी नहीँ देता .उन्हे "लोक प्रहरी " के माध्यम से कई बार न्यायालाय मे PIL के लिये धक्के खाते देखता था तो मुझे उन पर गुस्सा भी आता था .सोचता था इतने भले आदमी को इतना अपमान और पीडा क्यों ? हम अच्छे cause के लिये संघर्षरत लोगों को अच्छे से क्यों नही देखते ? लेकिन वो कर्मयोगी हैं .आज उनकी कई सालों का प्रयास रंग लाया जब सरकार की हीला हवाली और टाल मटोल के वावजूद सुप्रीम कोर्ट का आदेश रंग लाया और सभी पूर्व माननीय अपना दूसरा ठिकाना तलाश रहे हैं ........

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

Virendra Vikram Singh : उन्हें और आप को बधाई ।

Prem Prakash Singh सर, शायद ऐसे और लोगों की जरूरत है ,हमारे बीच भी हैं कुछ एक --प जैसे ,जिनके होने से कुछ होने का विश्वास होता है।।

Savita Bhagwat : आदरणीय शाही जी, चुंधियाते काँच के ढेर (तथाकथित रतनों ) में हीरा बमुश्किल और देर से ही पहचान में आता है, उसे आना ही होता है ,यह "कुछ" जौहरी जान भी रहे होते हैं(स्व सन्दर्भ ही लें.....हम noble cause के लिए संघर्षरत लोगों को अच्छे से क्यों नहीं देखते? लेकिन वे कर्मयोगी हैं.....किसी संज्ञा विशेषण के पारदर्शी और चमकदार "मूल्य"बनने बनाने में, "धातुकर्म" के प्रक्रम से तो गुजरना ही होता है........और यही इन "आदर्श हीरे" के साथ भी हुआ है।

G L Yadav Adv : बेहद सटीक और सुन्दर टिप्पणी भ्राता श्री।

Savita Bhagwat : G L Yadav Adv हे वत्स! तुम्हें "मानवीय मूल्यपोषक" इसी आर्ष परम्परा का "पाणिनि"और "व्यास " होना है यदुश्री जी एल। ....और तुम सम्भवनाओ से भरे भी हो। आदरणीय

Shahi Shahi : जी KE " मुक्त "गुरुकुल" मेंतुम सरीखे "मर्मज्ञ" अनुभव कर लोकहित में "मुखरित" होते हैं तो लोकधर्म भी सधता है ,और आनंदानुभूति भी होती है

Mohit Dwivedi : हमने कोर्ट no1 में उन्हें आहत होकर भरे हुए गले और आंखो में भी देखा है जब 'sirजी' ने उनकी credentials को doubt किया था। जनहित याचिकाओं पर काम कर अपनी शोहरत बटोरने वालों में से शायद ही किसी महारथी में से कभी ऐसा ऐसा व्यवहार दिखाया हो।

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लर्नेड वकील साहब

Shahi Shahi : Sir jee jaise longo kaa ilaz krte krte kabhee kabee mera hath idhar udhar mud jata hae aur meree kirkiree ho jatee hae.hahaha.

Kamlesh Shukla : Ji, Bhai Saheb, Shukla Ji bahut hi humble person hain.

Pramod Singh Gahmari : ऐसे ही कर्मयोगीयो की आज ज़रुरत है बेईमान और ऊचक्के आज के सत्ता लोभी मकान चोरो को ऐसे लोग ही सही कर सकते है

Jitendra Pratap Singh : क्या कोई आदेश हुआ है भाई साहब ?

Ashok Shahi : आंच आती है ।शायद इस लिये लोग उपेक्षा करते है। कैसे स्वीकार करे ।

Shrikant Shukla : This is also a type of addiction. Why you ignore Sibbal & Prashant only because he belongs to your category.

Devesh Kumar Misra : शुक्ला जी बहुत ही प्रशंसा के पात्र हैं।

Shiivaani Kulshresthhaa : सर अभी भी कई विषयों पर जनहित याचिका होना जरुरी हैं पर नही हो पा रही। यदि अधिवक्ता चाहे तो कई विभागों के स्कैम बाहर ला सकते हैं पर हम मे से कोई ऐसा नही करेगा। हम सिर्फ मशीनें हैं। जबकि अधिवक्ता सोशल इंजीनियर होते हैं...

VP Singh Chauhan : धन्यवाद शाही साहब.. माननीय सुप्रीम कोर्ट को माननीयों के अवैध कब्जे छुङाने के लिये आदेश पारित करने की नींव रखने वाले शुक्ला जी का नाम हर किसी को नही मालूम होगा.. सभी भारतीयों की तरफ से शुक्ला जी को और आपको हार्दिक आभार..

Surendra Pratap Singh : Father and son both can live in village if they have no house in lucknow in there grand father house

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बड़ा बाबू

( आरडी शाही का लखनऊ हाईकोर्ट में वकील हैं। जन-सामान्‍य में उनकी छवि एक मानवीय और सरल, लेकिन वाकई एक विद्वान अधिवक्‍ता की मानी जाती है। हमने शाही का यह पत्र उनकी एफबी वाल से बटोरा है। आपको बता दें कि एसएन शुक्‍ला यूपी के वरिष्‍ठ आईएएस रह चुके हैं, और रिटायर होने के बाद अब वकालत में जुटे हैं। हाल ही यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्रियों समेत बड़े दिग्‍गज राजनीतिज्ञों द्वारा सरकारी बंगलों पर काबिज प्रवृत्ति को गैरकानूनी बताते हुए मुकदमा जो दायर किया था, उसमें सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने विशालकाय बंगलों पर काबिज सारे ऐसे नेताओं को अवैध करार दे दिया है। जाहिर है कि हड़कम्‍प मचा हुआ है। यहां लेखपाल शब्‍द का उल्‍लेख और उच्‍चारण-प्रयोग एसएन शुक्‍ला को लेकर ही है, क्‍यों कि वे राजस्‍व से जुड़े प्रशासनिक ढांचे की पहली सीढ़ी को सम्‍भालते रहे हैं। ) ( क्रमश:)

सरकारी बंगलों में सरकारी खजाने से मालपुआ उड़ाने पूर्व मुख्‍यमंत्रियों पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय के करारे हमले ने नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा की जाने वाली सरकारी खजाने की लूट का खुलासा तो किया है। इस प्रकरण पर हम लगातार श्रंखलाबद्ध स्‍टोरी आप तक पहुंचाते रहेंगे। उससे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कमाल का लेखपाल