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लोअर कोर्ट बुलशिट, हाईकोर्ट जाऊंगा। बोला बड़ा पत्रकार

: इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा ने खंखार के थूका और हाईकोर्ट से स्टे ले आए : जब ऊंचे रिश्‍ते हैं, मीडिया की हनक है, और पैसे की कमी नहीं, तो फिर कोई बकलोल  ही होगा जो लोअर कोर्ट की गली में खड़ा हो : सीजेएम ने जारी किया था रजत शर्मा आदि पर एनबीडब्‍ल्‍यू का वारंट :

कुमार सौवीर

लखनऊ : फर्जी खबर फैलाने के आरोप में सीजेएम की अदालत में चल रहे एक मुकदमे पर हाईकोर्ट ने इंडिया टीवी न्‍यूज चैनल के मुखिया रजत शर्मा के सारे कष्‍टों का हरण कर उनकी लाइन-क्लियर कर दी है। उनकी ओर से हाईकोर्ट के वकील प्रशांत चंद्रा नेे हाजिरी लगायी और झट से रिलीफ मिल गयी। ठीक उसी तरह, जैसे अपने कष्‍ट के समय में श्रीराम का बेड़ा पार कर दिया था महाबीर हनुमान ने। खैर, अब रजत शर्मा को निचली अदालत में सीजेएम कोर्ट में नहीं खड़ा होना पड़ेगा।

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लर्नेड वकील साहब

आपको बता दें कि इंडिया टीवी समेत देश के विभिन्‍न हिन्‍दी-अंग्रेजी के अखबारों, चैनलों और वेब-पोर्टलों ने एक खबर चलायी थी। लेकिन इस खबर पर ऐतराज़ करते हुए लखनऊ में जिला जज रह चुके राजेंद्र सिंह ने उसे फर्जी और अपमानजनक बताया था। उन्होंने इंडिया टीवी और रजत शर्मा समेत तकरीबन 15 समाचार संस्थानों पर नोटिस भेजी और कहा कि उन द्वारा प्रकाशित-प्रसारित की गई बातें पूरी तरह निराधार है अतः यदि वह तत्काल उस फर्जी बातों का अविलम्‍ब खंडन नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ अदालत में मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। यह अपराध का मुकदमा होगा।

जैसे कि उम्मीद ही थी कि दो समाचार संस्थानों ने क्षमा याचना तो कर ली लेकिन बाकी अपने पत्रकारीय अहंकार के एवरेस्ट पर चढ़े रहे। उन्‍होंने यह भी जानने-समझने की कोशिश नहीं की कि उन्होंने कितना बड़ा अपराध कर दिया। एक ऐसा अपराध जो एक समाचार संस्थान जैसा बड़ा समूह होने के चलते जन-आस्था और विश्‍वास पर बेहद मेहनत के साथ तामीर किया जाता है। लेकिन इस तथ्‍य को इन सभी समाचार संस्थानों ने बकवास मानते हुए इस नोटिस को कूड़ेदान में फेंक दिया।

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पत्रकार पत्रकारिता

नोटिसों का जवाब न मिलने पर राजेंद्र सिंह ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी लखनऊ की अदालत में इन सब को अभियुक्त बनाते हुए मुकदमा दायर कर दिया। मगर इसके बावजूद इन बड़े हेकड़ीबाज पत्रकारों ने नोटिसों का कोई भी जवाब देने के बजाय कोर्ट के सम्‍मनों-वारंटों को भी कूड़ेदान में फेंक दिया। कई बार ऐसा हुआ। वारंट जारी हुए लेकिन पेशी पर कोई हाजिर नहीं हुआ।आखिरकार अदालत ने नियमानुसार कार्रवाई शुरू की और इन सभी अभियुक्तों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। आदेश दिया गया किन सभी अभियुक्तों को तत्काल अदालत में पेश किया जाए।

लेकिन इसके बावजूद इन पत्रकारों ने अपना हेकड़ी का भाव बनाए रखा और मुख्य नायक दंडाधिकारी की अदालत में खुद होने के बजाय वे सीधे हाईकोर्ट पहुंच गए। इसके लिए इंडिया टीवी ने अपने मामले पर अदालती कार्रवाई पर स्‍टे कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में कार्यरत प्रशांत भूषण जैसे दिग्गज वकील की सेवाएं लीं।

खबर है कि 16 मई को लखनऊ हाई कोर्ट में प्रशांत चंद्रा ने इस मामले की सुनवाई की और जज जस्टिस महेंद्र दयाल ने इस मामले पर रजत शर्मा पर जारी गैर जमानती वारंट वाली कार्यवाही पर स्‍टे कर दिया। इसके साथ ही साथ इंडिया इंडिया टाइम्स ऑफ इंडिया आदि पर सीजेएम द्वारा जारी की गई कार्यवाही पर भी स्थगन आदेश जारी कर दिया है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका


कंगाल चैनल : भूखे केकड़े ने दूसरे को मारा, दोनों बेहोश

: लखनऊ में एक न्‍यूज चैनल में हुई भारी जूतमपैजार, मची हौंका-हौंकी : मांगलिक रिश्ते के मूल रिश्तों को उजागर करते गीत मुंह से निकले, हाथ से घूंसे, पैरों से जूता और लात : पूरे हजरतगंज में गूंजती रहीं नंगी गालियां और चीख-चिल्‍लाहट :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह दोनों ही नहीं, बल्कि पूरा स्‍टाफ ही भूखा था। कई महीनों-बरसों से भुखमरी की हालत। भूख बढ़ने लगी, तो तनाव बढ़ने लगा। तनाव बढ़ा, तो गुस्‍सा बढ़ा। गुस्‍सा बढ़ा, तो सहनशीलता घटना लगी। सहनशीलता बढ़ने लगी, तो भुखमरी से बेहाल लोगों का अंदाज ही हमलावर होने लगा। नतीजा यह हुआ कि एक छोटी सी बात उछल कर तिल का ताड़ बन गयी। दो भुक्‍खड़ों में नौबत झगड़े से होते ही मादर-सिस्‍टर तक पहुंची, जुबान लातों-हाथों में तब्‍दील हो गयी। एक भूखे ने दूसरे पर हमला कर दिया, नतीजा में दूसरे भूखे ने भी पहले भूखे पर प्रति-हमला किया। एक भूखे ने दूसरे को मारा, और आखिरकार दोनों ही बेहोश होकर गिर पड़े।

यह नजारा दिखा लखनऊ में एक न्‍यूज चैनल में, जहां हुई भारी जूतमपैजार, मची हौंका-हौंकी। कोहबर की महिलाओं की तरह दोनों ने ही दोने के प्रति मांगलिक रिश्ते के मूल रिश्तों को उजागर करते गीत मुंह से गाना शुरू कर दिया। हाथ से घूंसे, पैरों से जूता और लात, उप्‍पर-नीच्‍चे। पूरे हजरतगंज में गूंजती रहीं नंगी गालियां और चीख-चिल्‍लाहट। तेरी बहन से लेकर तेरी मां तक के बीच जो सकर्मक क्रिया का प्रदर्शन करते आत्‍मीय और रससिक्‍त शब्‍दों-वाक्‍यों के प्रति जो आस्‍था का प्रदर्शन किया गया, वह अप्रतिम था। साथ ही नुसरत अली खां के तबले की थाप की तरह मारो और बचाओ जैसे सस्‍वर टुकड़े। उफ, या अल्‍लाह।

अब सुनिये किस्‍सा। इस चैनल में अटेंडेंट रजिस्टर पर रिपोर्टरों की वरीयता-क्रम को लेकर भड़का। यहां के एक वरिष्ठ सहकर्मी जो पूरा टेक्निकल मामला संभालते हैं, ने सभी लोगों की अटेंडेंस के लिए एक रजिस्टर प्लान किया। इसमें सबसे नीचे जिसका नाम दर्ज था, उसने इस पर ऐतराज कर दिया। स्कूटर का कहना था कि जानबूझकर ऐसा किया है। जबकि उस इंचार्ज का कहना था कि उसकी ऐसी कोई भी मंशा नहीं थी।

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पत्रकार पत्रकारिता

आपको बता दें कि इस समय यह चैनल भयावह कंगाली से गुजर रहा है। कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलता है। कर्मचारी अपना जीवन यापन इस संस्थान से न मिलने पर, बाहर मार्केट से येन केन प्रकारेण उगाहते हैं। मगर इसके बावजूद इन सब में ऐंठन, जलन, गुस्‍सा, जैसे भाव ऐसे भरे पड़े हैं, मानो वे इस कंगाल चैनल के कर्मचारी नहीं, बल्कि योगी सरकार के उपमुख्‍यमंत्री हों।

तो साहब, भूखे केकड़े रिपोर्टर ने उस रजिस्टर को फाड़ कर एक नया रजिस्‍टर  तैयार किया, तो इंचार्ज ने उस नए रजिस्टर को तो खारिज कर उसे फाड़ दिया और पुराने वाले रजिस्टर को ही लागू कर दिया। बात आगे बढ़ी तो बातें तनातनी भी शुरू हो गई। बताते हैं कि एक महिला सहकर्मी पर कुछ चुभती हुई बातें हुई। एक पक्ष ने दूसरे के परिवार की महिलाओं के साथ मांगलिक रिश्तो की नयी चटाई बजाना शुरू कर दिया। मंगल गीत शुरू हुए। साथ ही साथ मारपीट की भी धुन बजने लगी।

सच बात यही है कि इस हालत ने उस कहावत को तो लागू कर ही दिया जिसमें कहा जाता है कि भूखे ने भूखे को मार दिया, दोनों ही गश खाकर गिर पड़े।

हत्‍या-व्‍यथा। क्रूर मां नहीं, हत्‍यारे आप खुद हैं

: बेबस झांसी की रानी वाली यह दारूण-गाथा पूरे समाज की क्रूरता का प्रतीक है : मातृ दिवस पर नमन की नौटंकी नहीं, ठोस संकल्‍प लीजिए : नमन के बजाय अगर आप अपने स्‍वार्थों के बजाय समाज की महिलाओं की भावनाओं को सम्‍मान दें तो कितना भव्‍य माहौल बन जाए : बेबस मां -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इसके पहले कि घरवाले कुछ समझ पाते, अपनी सौरी ( प्रसव-कक्ष ) में लेटी वह महिला अचानक तेज आवाज में चीखी। उसने उस नवजात को उसकी टांगों से पकड़ा। बच्‍ची को उसी तरह उल्‍टा लटकाये हुए वह घर के आंगन तक चीखती हुई पहुंची। शोर सुन कर घर के लोग आंगन पर आ गये। इसके पहले कि वहां मौजूद कुछ लोग समझ पाते, धोबीपाट की शैली में महिला ने उस बच्‍ची को उस जमीन पर जोरों से पटक दिया। कई बार। तब तक, जब तक उस बच्‍ची लहू-लुआन होकर मौत के हवाले न हो गयी।

घरवाले यह समझ गये कि उस महिला की मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है। वह पगला गयी, और अब अपनी इस नवीं बच्‍ची को खा गयी यह डायन।

मैं हमेशा आजीवन आभारी रहूंगा यूपी हाईकोर्ट में वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश रह चुके अपने अग्रज समान शख्‍स का, जिन्‍होंने मुझे इस महिला की कहानी से पहचान करायी। इस श्रंखला में मैं इस महिला को हत्‍यारिन या डायन के तौर पर पुकारने का अपराध सपने में भी नहीं कर सकता। मेरे लिए तो यह महिला बाकायदा झांसी वाली बेबस रानी-मां थी। इस झांसी की रानी मां इतिहास में भले कोई प्रभाव नहीं डाल पायी, लेकिन उसने अपने क्रूरतम व्‍यवहार से अपने आसपास के समाज पर एक जोरदार तमाचा तो जरूर ही मारा। भले ही यह स्‍वीकारोक्ति उस महिला ने अपने पूरे भोलेपन में और अनजाने में ही कर डाली थी, लेकिन उसने उस भयावह सच का खुलासा कर दिया जिसे सुन कर मेरी आत्मा कांप उठी। भय और आत्‍मग्‍लानि से रोंगटे खड़े हो गए कि हम जैसे लोग ही समाज नामक ऐसी बेहद संवेदनशील संगठन को अपने निम्‍नतम व्‍यवहार के चलते ही उसे क्रूरतम संस्था का रूप देने में नहीं हिचकते हैं।

यह सज्जन हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस रह चुके हैं। बेहद सहज, सरल, तार्किक और माननीय भावों का समावेश है इन में। अपने न्‍यायिक जीवन में उन्‍होंने न केवल किसी घटना उसके पूरे कानूनी परिवेश में ही विवेचन कर फैसला देने की भरसक कोशिश की। लेकिन साथ ही साथ, जब कभी ऐसी घटनाओं का जिक्र होता है तो वह अपने फैसलों को दरकिनार कर उस घटना के मानवीय पक्षों को समझने के लिए अपने दिल को टटोलते हैं, और फिर खोजने की कोशिश करते हैं कि असल पीड़ा क्‍यों-कब-कैसे-कितनी-कहां है। सहज भी है, कोई व्यक्ति भले ही किसी पद पर हो, कभी न कभी अपने अंतर्मन को तो टटोलता ही है।

जैसा उन्‍होंने मुझे बताया, अपने एक नवजात बच्चे की हत्या के मामले में एक महिला अदालत में पेश की गई थी। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि उस उसी नवजात मृत बच्ची की मां थी। कहने की जरूरत नहीं थी कि खचाखच न्याय कक्ष में मौजूद सभी लोग यह जानना चाहते थे कि यह महिला कैसे इतनी क्रूर हो गई जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को अपनी छाती का दूध पिलाने, उसकी किलकारियों को सुनने और उसको दुलराने-सहलाने-चूमने के बजाय सीधे उनके मौत के घाट उतारने का फैसला कर लिया।

बस शुरू हो गई। वकीलों के बहस तर्क-वितर्क शुरू हुए। पूछताछ में महिला ने भी स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी नवजीत बच्ची को मौत के घाट उतारा है। उसने कुबूल किया कि उस महिला ने उसने जो कुछ भी किया है, वह उसके लिए कुछ भी सजा भुगतने को तैयार है। साफ हो गया कि उस बच्ची की असली हत्यारिन वह महिला ही थी। उसकी इस स्‍वीकारोक्ति के बाद अब एक वकील का कहना था कि यह हत्‍यारिन है, इसलिए उसे फांसी दी जानी चाहिए। जबकि दूसरे पक्ष का तर्क था कि उस महिला का यह कृत्‍य उसके पागलपन के चलते हुआ है, इसलिए उसे पागलखाने में भेजा जाना चाहिए।

कुछ भी हो, कोई भी पक्ष इस बच्‍ची को उसकी ससुराल या उसके मायके में भेजने को तैयार नहीं था। सभी भयभीत थे कि न जाने कब यह महिला किसी अन्‍य पर भी इसी तरह का कातिलाना हमला कर दे, कोई भी भरोसा नहीं। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

60 % झुलसे बदन में तब्‍दील है गैंगरेप पीडि़त किशोरी

: किसी भी सामान्‍य किशोरी बच्‍ची की तरह इस बच्‍ची में भी थे अनगिनत सपने, लेकिन अब झुलसे मांस में तब्‍दील हो चुकी है यह जौनपुर की अल्‍हड़ बच्‍ची : हे भगवान। मेरी हालत के जिम्‍मेदारों के आश्रितों की हालत कभी भी मेरी दर्दनाक मौत जैसी न करना देना मेरे प्रभु :

कुमार सौवीर

जौनपुर : यह करीब एक बरस पहले की बात है, जब किसी भी सामान्‍य बच्‍ची की तरह इस किशोरी की कल्‍पनाओं में भी आकर्षक सुनहले-रूपहले सपने हुआ करते हुए होंगे। घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली अपनी मां की बड़ी दुलारी इस बच्‍ची को तब दिन में भी गजब सपने जरूर आते रहते होंगे। बैठे-बैठे भी उस अनाथ बच्‍ची को दूसरे सम्‍पन्‍न परिवार के बच्‍चों की किलकारियां, खेल-कूद, और मौज-मस्‍ती की हिलोरें उमड़ती रही होगी। सोचती रही होगी कि उसके पास भी अच्‍छे कपड़ों का ढेर होगा। लकदक स्‍कूली ड्रेस होगी, जूते चमचम करते रहते होंगे। स्‍कूली बस में आना-जाना होगा। किताब-कॉपियों का बैग, और बेहिसाब सहेलियां होंगी। हर दिन होली, रात दिवाली मनायी जाएगी। भरपेट और स्‍वादिष्‍ट भोजन का ढेर होगा। बड़ा मकान, हर सुख-सुविधा, और और और। सिर्फ आनंद ही आनंद होगा।

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जुल्‍फी प्रशासन

क्‍या क्‍या नहीं सोचती रही होगी वह किशोर वय की बच्‍ची। लेकिन इस बच्‍ची की कल्‍पनाओं में अब ऐसी खुशियां हमेशा-हमेशा के लिए दम तोड़ गयी हैं, जहां कल्‍पनाओं का कोई अस्तित्‍व तक नहीं हो सकता। वजह यह है कि इस बच्‍ची के पास अपनी छटपटाहती असह्य पीड़ा और अपने झुलसे-संड़ाध मारते मांस की बदबू के बीच सुखद कल्‍पनाओं की गुंजाइश ही नहीं रह बची होगी। अपने छोटे से शहर में अपने सपने संजोने वाली बात को दोबारा दुहरा पाने की ताकत ही उसके दिमाग में नहीं आ सकती। कोई अगर कोई उसे उसकी कल्‍पनाओं का जिक्र भी करना चाहे, तो वह उन्‍हें सुन पाने तक की क्षमता खो चुकी है। वह केवल दर्द से छटपटाती है, बस। और इसके अलावा कुछ भी नहीं।

दरअसल, यह बच्‍ची पिछले करीब 20 दिनों से हिन्‍दू काशी विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कालेज के बर्न-वार्ड में भर्ती है। उसका पूरा बदन पूरी तरह जल चुका है, चमड़ी उधड़ चुकी है, पूरा बदन फूल गया है। वह अब न कुछ सोच सकती है, न कर सकती है, और न ही कुछ बोल पाने की ताकत ही बची है उसमें। दवाओं का असर जब तक रहता है, वह बेहोश पड़ी रहती है, लेकिन अधिकांश वक्‍त तक तो वह केवल अपनी दर्दनाक चीखों को ही निकालती रहती है, जिसे आसपास के मरीज और उनके तीमारदार भी दहलते रहते हैं।

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हर सू जौनपुर

काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कालेज में भर्ती इस बच्‍ची की देखभाल में जुटे डॉक्‍टरों का कहना है कि वह बच्‍ची 60 फीसदी तक जल चुकी थी। हालांकि डाक्‍टर लोग उसकी देखभाल में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन सच बात तो यही है कि आज भी उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही है। उसके भविष्‍य के बारे में पूछने पर उसके डॉक्‍टर केवल अपने हाथ आसमान की ओर देख कर इशारा करते हैं कि अब जो कुछ भी होगा, ऊपर वाला ही करेगा।

हैरत की बात यह है कि जिला प्रशासन और पुलिस कप्‍तान की करतूतों का खामियाजा अपनी दर्दनाक मौत की दहलीज तक पहुंच चुकी इस बच्‍ची को अब इस बात तक की समझ नहीं बची है कि वह अपने साथ हो चुके गैंगरेप और पुलिस-प्रशासन के व्‍यवहार पर लानत तक भेज सके। हां, यह जरूर हो सकता है कि अपनी तेज मगर अस्‍पष्‍ट चीखों को अगर कोई समझ सके, तो वह इतना जरूर कहना चाहती होगा कि:- हे भगवान। मुझे ऐसी सरकार, ऐसे जिलाधिकारी, पुलिस कप्‍तान और दलालों को इतना जरूर समझा देना कि किसी बच्‍ची के साथ के साथ ऐसा अन्‍याय नहीं किया जाना चाहिए, जहां तड़पते-बिलखते जीवन की हालत मौत से भी बदतर हो जाए। ( क्रमश: )

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस सूचना के आधार पर अपनी पड़ताल शुरू की, तो कई डरावने सच सामने आ गये। यह मामला अब श्रंखलाबद्ध प्रकाशित किया जाएगा। इस शर्मनाक हादसे से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए आप से अनुरोध है कि आप से लगातार जुड़े ही रहें। और इस खबर की अन्‍य कडि़यों-खबरों को पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

बदलापुर-हादसा

बेशर्म कप्‍तान। रेपिस्‍टों को शह, बच्‍ची फूंक दी गयी

: क्‍यों बड़े दारोगा, इसी बच्‍ची के घर रेपिस्‍टों ने दीवाली की रात पटाखे दगाये थे न ? जौनपुर में गैंग-रेप पीडि़त बच्‍ची को एक साल बाद जिन्‍दा फूंका : साल पहले हुआ दर्ज हुआ था मामला, दबंगों ने बच्‍ची का गर्भ तक गिराया था : जान मारने की धमकी देते रहे दुराचारी, पुलिस उगाही में जुटी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तनिक उस परिवार की मनोदशा की कल्‍पना कीजिए, जिसकी एक नाबालिग बच्‍ची के साथ तीन दबंगों ने सामूहिक बलात्‍कार किया हो, मामले की रिपोर्ट भी पुलिस दर्ज हो चुकी हो, लेकिन नामजद दुष्‍कर्मी न केवल सरेआम घूम रहे हों, बल्कि पिछले कई दिनों से उस बच्‍ची के घर के सामने पटाखे जला कर अपनी ताकत का इजहार कर रहे हों। कहने की जरूरत नहीं कि यह बच्‍ची और उसके परिजन दहशत में रहे हों, और उनकी दीपावली किसी स्‍याह-डरावनी अमावस्‍या की तरह उनके भविष्‍य की रूपरेखा बुन चुकी हो। दुराचारियों के हौसले बढ़े हों, उन्‍होंने पीडि़त बच्‍ची का गर्भ गिरवा दिया हो। दलाल, जनप्रतिनिधि, समाजसेवी, नेता-पनेता और पत्रकार तक पूरे मामले में या तो खामोश हों, या फिर उन दुराचारियों से मोटी उगाही में जुटे हों। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू तो यह हो कि पुलिस और प्रशासन भी रूपहले सिक्‍कों में बिक चुका हो। और नतीजा यह हो कि आखिरकार हौसलेमंद अपराधियों ने सारे सुबूत मिटाने के लिए उस बच्‍ची को जिन्‍दा फूक डाला हो।

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जुल्‍फी प्रशासन

लेकिन असल सवाल तो यह है कि जौनपुर का  बड़ा दारोगा आखिरकार तब क्‍या कर रहा था ? सच बात तो यही है कि केवल बेशर्मी पर ही आमादा था जिला का पुलिस महकमा और उसका मुखिया पुलिस कप्‍तान। इसी कप्‍तान ने ही दुराचारियों को छुट्टा छोड़े रखा था। यह जानते हुए भी कि यह मामला पौने 15 बरस की एक बेहद अल्‍पआयु बच्‍ची का प्रकरण होने के चलते पॉक्‍सो-कानून की कड़ी धाराओं से सम्‍बद्ध है, जिसमें त्‍वरित कार्रवाई की जानी चाहिए थी। हैरत की बात है कि पुलिस मामला दर्ज होने के बाद जब उस बच्‍ची का मेडिकल कराया गया, तो उसमें वह मासूम बच्‍ची दो महीने की गर्भवती पायी गयी थी। लेकिन जौनपुर का बेशर्म बड़ा दारोगा अपनी अलग ही खिचड़ी पकाने में व्‍यस्‍त रहा। जब भी बातचीत की गयी इस कप्‍तान से, जवाब यही मिला कि हम मामले की छानबीन कर रहे हैं।

यह शर्मनाक और दर्दनाक मामला है जौनपुर का। यहां के बदलापुर बाजार में स्‍थानीय तीन धनपशुओं ने एक नाबालिग मासूम बच्‍ची की जिन्‍दगी ही रौंद डाली। हैरत की बात थी कि यह घटना बदलापुर थाने से चंद कदम दूर ही हुई।लेकिन मामले की एफआईआर दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। नतीजा, यह कि पहले तो रिपोर्ट दर्ज होने के बाद तीनों दुष्‍कर्मी कहीं भाग गये थे, लेकिन अब मामला शांत होता समझ कर वे वापस लौट आये। इतना ही नहीं, इन मनबढ़ बलात्‍कारियों ने पिछले कई दिनों से उस बच्‍ची के घर के बाहर तड़ातड़ पटाखे छुड़ा कर अपनी ताकत का ऐलान किया और अपनी सफलता के झंडे गाड़ना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि हर ओर से अकेली पड़ चुकी इस बच्‍ची और उसके परिजन भय से थरथराते हुए घर में ही दुबके रहने पर मजबूर रहे थे।

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हर सू जौनपुर

आइये, हम आपको इस हादसे के बारे में तफसील से जानकारी देते हैं। 20 अक्‍तूबर-17 की सुबह-सुबह मेरे पास जौनपुर के मछलीशहर के करीब बरईपार गांव के रहने वाले सुनील कुमार पाण्‍डेय का फोन आया। सुनील पाण्‍डेय यहां सिंगरामऊ स्थित हरपाल सिंह डिग्री कालेज में एमएड कर रहा है और छात्र राजनीति के साथ सामाजिक दायित्‍वों को लेकर भी सक्रिय है। सुनील ने प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को इस हादसे के बारे में विस्‍तार से बताया। और यह भी बताया कि इस मामले में पुलिस, कतिपय पत्रकार और तहसील के कुछ अफसरों के साथ ही साथ कई अन्‍य सरकारी अधिकारी-कर्मचारी तथा अन्‍य सामाजिक नेता मामले में मिट्टी डालने पर आमादा हैं। इनमें से कई ने तो मामले में लिप्‍त अभियुक्‍तों और उनके परिजनों से भारी उगाही भी कर ली है।

मैंने इस मामले छानबीन शुरू कर दी, और अपने निष्‍कर्षों से जुड़ी खबरें छापना शुरू किया। इसी बीच एक डरावनी खबर मिली कि मामले में वांछित दुराचारियों ने इस बच्‍ची का चार महीने का गर्भ गिरा दिया है। गरीब परिवार की यह बच्‍ची आखिर क्‍या करती, लेकिन उसकी मां ने भरसक दौड़भाग किये रखी। वह पुलिस थाने से लेकर पुलिस कप्‍तान तक से मिलती रही। मगर कप्‍तान ने बाद में तो उससे मिलने तक से इनकार कर दिया था।

नतीजा यह हुआ कि पुलिस की शह के चलते हौसलों से भरे दुराचारियों ने आखिरकार एक ऐसा डरावना काण्‍ड कर दिखा दिया कि सुनने वालों पर भय फैल जाए। खबर है कि पिछली 26 अप्रैल-17 को इस बच्‍ची को जिन्‍दा फूंक दिया गया।

इसमें शर्मनाक हादसा तो जौनपुर के पुलिस कप्‍तान का ही रहा, जिसने अपराधियों को इतनी शह दे दी और उन्‍हें जेल में बंद करने के बजाय बाहर छुट्टा घूमने दिया। ( क्रमश: )

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस सूचना के आधार पर अपनी पड़ताल शुरू की, तो कई डरावने सच सामने आ गये। यह मामला अब श्रंखलाबद्ध प्रकाशित किया जाएगा। इस शर्मनाक हादसे से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए आप से अनुरोध है कि आप से लगातार जुड़े ही रहें।

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बदलापुर-हादसा

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