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आजम के बुरे दिन शुरू, नौकरी घोटाले में मुकदमा दर्ज

: यूपी जल निगम में 13 सौ पदों को अनियमित तरीके से भर्ती करने का आरोप, भारी घोटाले का आरोप : मामले में आजम खान और पूर्व एमडी पीके आसुदानी पर भी तलवार गिरी : अब तक सवा सौ इंजीनियरों को अनियमित भर्ती के आरोप में बर्खास्‍त कर चुकी है योगी सरकार :

कुमार सौवीर

लखनऊ : भाजपा के अच्‍छे दिन भले ही न आये हों, लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के बुरे दिनों का आगाज हो गया है। अपने विरोधियों और खास तौर पर जयाप्रदा जैसी महिलाओं के खिलाफ मुंह से आग बरसाने में कुख्‍यात आजम खान के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज हो गया है। अखिलेश यादव की सपा-सरकार में जल निगम में 13 सौ लोगों को नौकरी देने के मामले में आजम खान और तब के एमडी पीके आसुदानी के विरूद्ध चल रही जांच पूरी होने जाने के बाद पुलिस ने यह मामला दर्ज किया है।

आजम ने इस खबर पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि अगर 13 सौ लोगों को नौकरी देना जुर्म है, तो वे अपना यह जुर्म कुबूल करते हुए जेल जाने को तैयार हैं। आजम खान का कहना है कि अदालतों के फैसले उनके पक्ष में हैं लेकिन राजनेताओं का फैसला उन जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है. उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे। उधर पुलिस का दावा है कि आजम और आसुदानी ने 13 सौ पदों के लिए बहुत बड़ा षडयंत्र किया और इसमें भारी घोटाला किया गया था।

आज जल निगम भर्ती घोटाले में सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान और तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी के खिलाफ एसआईटी ने योगी सरकार को रिपोर्ट सौंप दी थी। कहने की जरूरत नहीं कि इससे  पूर्व मंत्री आजम खान की मुश्किलें बढ़ सकती है। रिपोर्ट में आजम खान के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई थी कि इस मामले में आजम खान और आसुदानी पर मुकदमा दर्ज कराने की अनुमति दी जाए। उसके बाद से ही आज शाम को ही सरकार के आदेश पर आजम खान व एमडी पीके आसुदानी पर उसी रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश जारी हो गया।

इस मामले में अपना पक्ष जाहिर करते हुए आजम खान का कहना है कि अदालतों के फैसले उनके पक्ष में हैं लेकिन राजनेताओं का फैसला उन जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है। उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे। उनका कहना था उन्‍होंने बेरोजगारों को नौकरी दी है, और ऐसा करना कोई करप्शन का चार्ज नहीं है। आजम बोले कि न हमारे ऊपर और न उस वक़्त के किसी अधिकारी के ऊपर। लेकिन राजनेताओं का फैसला हमारे जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है। आज़म खान ने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे।

गौरतलब है कि अखिलेश सरकार में आजम खान जल निगम विभाग के मंत्री थे. उस दौरान उनके विभाग में 1300 पदों पर भर्तियां हुई थीं। जानकारी के अनुसार, एसआइटी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री व जल निगम के तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति मांगी है. आजम खान अखिलेश सरकार में जल निगम के अध्यक्ष थे। अपनी रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा है कि आजम के खिलाफ भ्रष्टाचार समेत कई आरोपों के पर्याप्त सबूत हैं. एसआईटी इंचार्ज आलोक प्रसाद ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अभियोग चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। सरकार से अनुमति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इस मामले में 122 असिस्टेंट इंजीनियर को सरकार बर्खास्त कर चुकी है। इससे पहले 22 सितंबर को एसआईटी का जल निगम के हेडक्वार्टर्स पर छापा पड़ा था और 5 दिसंबर को तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी से पूछताछ हुई थी। अब तक इस मामले में 8 अफसरों के बयान एसआईटी दर्ज कर चुकी है। इस घोटाले में सहायक अभियंता- 122, अवर अभियंता- 853, नैतिक लिपिक - 335, आशुलिपिक- 32 समेत 1300 पदों पर भर्तियां की गई थीं।  भर्ती के लिए वित्त विभाग से अनुमति भी नहीं ली गई थी। सरकार के बजाय जला निगम के चेयरमैन के स्तर पर ही भर्ती को मंजूरी दे दी गई थी. जांच में एसआईटी को भर्ती आदेश पर आजम खान के हस्ताक्षर मिले हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही कहा था कि अखिलेश के कार्यकाल में हुई हर सरकारी विभाग की भर्तियों की जांच कराएंगे। जल निगम में हुई भर्तियों की जांच बीते सितंबर महीने में एसआईटी को दी गई थी। इस मामले में अब तक पूर्व नगर विकास सचिव एसपी सिंह के बयान भी दर्ज हो चुके हैं। आईएएस एसपी सिंह अब रिटायर हो चुके हैं।

फर्जी रेप मामलों पर पुरूष अधिकार ढांचा जरूरी: अमिताभ ठाकुर

: यूपी के पुलिस महानिरीक्षक अमिताभ ने फूंका बिगुल : Court is keen about these complaints : Now time has come for review & restructuring of our constitution in the interest of Justice :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : पिछले डेढ़ दशकों से मुतवातिर संघर्ष कर रहे हैं यूपी के पुलिस आईजी अमिताभ ठाकुर। मूलत: बिहार के रहने वाले अमिताभ को अपनी आधी नौकरी का वक्‍त या तो निलम्‍बन पर बिताना पड़ा है, या फिर फर्जी मुकदमों से निपटने में। उन्‍हें कभी गायत्री प्रजापति जैसे नराधम कहे जाने वाले नेताओं से जूझना पड़ा, तो कभी समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो रह चुके मुलायम सिंह यादव ने उन्‍हें सीधे धमका दिया कि उनका अंजाम बहुत बुरा हो जाएगा। केवल इतना ही नहीं, अमिताभ को बसपा की सरकारों के अफसरों की नाराजगी भी खूब उठानी पड़ी। और ताजा मामला तो उन पर ऐसा पड़ा जिसमें कुछ महिलाओं ने उनके साथ बलात्‍कार का आरोप तक लगा दिया।

हालांकि ऐसे आरोप अदालत में झूठे साबित हो चुके हैं, लेकिन अमिताभ नेताओं की ऐसी साजिशों से बेहाल भले न हुए हों, मगर अब व यह हर्गिज नहीं चाहते हैं कि भविष्‍य में किसी अन्‍य व्‍यक्ति पर ऐसा कोई घिनौना फर्जी आरोप लगाया जा सके। आज उन्‍होंने एक नया मुद्दा उछाला है, जिसमें कहा गया है कि महिलाओं द्वारा पुरूषों पर भी रेप और यौन शोषण के फर्जी आरोप लगाये जा रहे हैं। ऐसी हालत में जिस तरह महिला अधिकारों को लेकर कोई अधिकार दिया गया है, उसी तरह पुरूषों को भी सुरक्षात्‍मक अधिकार भी दिया जाना चाहिए।  लिंकडेन पर उनके इससे जुड़े एक लेख कर उन काफी प्रतिक्रियाएं आयी हैं। आप भी उन्‍हें पढ़ना चाहें तो:-

Amitabh Thakur :-

With false rape and sexual assault charges increasing in number, we need equal protection of Men's Right as that of Women's Rights. Open options for S.D Vijeyan’s post

sidharth sarthi LAW CLERK-CUM-RESEARCH ASSISTANT:-

Court is keen about these complaints

Arrest in S. 498A , S 497 and S. 376 of IPC were already in question. Now court taken action against arrest in SC & ST Cases than BJP and many other political parties made this as issue of safety to SC & ST. Many of my friend declared this as #Return_of_MANUVAD. Misuse of law can only be understood by the victim of that misuse no-one can justify the same by sitting in AC Room.

Srinath Kashyap Contract Management Specialist at SAP Labs:-

Justice is same for everyone. No one should use word like 'counter'. Courts cannot get the nittygrirtys of the issues. If the same situation continues men and women forums starts fighting on roads. Media and police will be confused  whom to support. Along with them..gays, lesbians, transgenders starts their fight for equal rights then..that would be the peak stages of Democracy.

Adv Sushil Raaja MA.MBA.LLM Addl Standing Central Govt. Counsel:-

Now time has come for review & restructuring of our constitution in the interest of Justice

sidharth sarthi LAW CLERK-CUM-RESEARCH ASSISTANT:-

R u thinking so? If one talk to amend any provision of IPC you will suggest to rewrite the Constitution. Were you seriously a law student?

subodh bansal False dowry charges are also very high.:-

Mostly home women are giving threat to Lodge dowry charges  or sexual assault charges. Women are creating  pressure at Men.

Important issue is that gang rape is increasing. Dowry is increasing.

Dowry death is increasing.

Stern Law can not solve the problem.

I plan ideas. I can not change the law.

One thing I can do is to start campaign.

I want to give sex policy through social media. I wrote content. I need good team to prepare videos. This will address all problems of sexuality.

2. For false cases issue. I can start campaign which will explain why a person should not Lodge false cases or false witness. I wrote content. I need good team to record videos and circulate on social media.

Mira Swaminathan Intern at European Centre for Press & Media Freedom (ECPMF) :-

I understand the impact a false rape/assault case can have, however the need for a "men's rights law" is appalling especially when there is a deep rooted structure of patriarchy that is existing in our system.

There's a difference between a 'reported rape case' and an 'unreported rape case'.  In a study of say, 49% of rape cases in Delhi are false, one should understand that the statistics only highlights the numbers of the reported ones, completely ignoring the fact that many true incidents are unreported because of the social system that silences victims. Moreover, even in the reported ones, most of them are filed by families for revenge in case of eloping.

I understand there can be a  misuse of the law, however, misuse of a law shouldn't be the only reason why a parallel law should be made.  This is just a counter argument to the idea.

Palak Mathur Manager, Software Engineering at Capital One :-

Agree with you Mira Swaminathan. An introduction of a parallel law to counter the fake cases is not going to solve the issue. These laws are meant so that the victims find the judicial system accessible. Few false positives doesn’t mean that you have to retaliate with a counter law. Anyway, how do you know the false positives are actually false positives and not false negatives? Based on evidence, right. If that is the case, then existing law sufficiently handles that. The counter-laws for a law will just lead to a cyclic disorder, which will not be easier to maintain.

Apurv Jain Junior Consultant- Energy Practice at ICF:-

I agree. Section 497 could be a good start too.

Its appalling why our so called "feminist" are shut on this. Lets talk about equality here also.

Mira Swaminathan Intern at European Centre for Press & Media Freedom (ECPMF) :-

Section 497 is a 'sexist' provision and not a 'feminist' provision. Both the sexes are affected by it.

"Consent and connivance of the husband" is taken into consideration implying that women are treated as property. And also,  wife cannot file a case of Adultery against her husband, only the husband can, thus proving the law is sexist in nature.  It should be decriminalized for the right reason.

Anant Jha, Company SecretarySecretarial Audit, Advisory on CSR,Corporate Law Practice,FEMA,RBI,Companies  : Act, Internal Audit, Compliance, SOP

Welcome steps. Gender equality can't be suppressed

Vishal Gandhi

and national training provider and automatic Rice Mill installation, in India

Haaaa , ha dar gaye h kya e neta se jim jayeye or yoga kejeye ,hanuman j puja kareye

Aashish Gupta Planning Professional :-

Fully Agreed

Kapil Gupta Associate Director - Talent Supply Chain at HCL Technologies :-

Very true.  Though constitution is based upon equal opportunity eight for all,  however number of rules and regulations fails to meet this fundamental right

RAJJYA RAMBIIR SHARMAA Senior Software Engineer in Govt. of India Company :

I agree sir

If any need of help then I am ready

bhagat singh Plaza Manager at Essel infra :-

Absolutely right sir

असली रेपिस्‍ट तो अफसर हैं, उनको फांसी दो

: संविधान, कानून और जनभावनाओं से दुराचार करने वाले अफसर फांसी के असली हकदार : नन्ही बच्चियों से सामूहिक बलात्कार के हादसों को कभी डीएम, कप्तान और दरोगा ने बेचा, तो कभी नेता, समाजसेवी और पत्रकार तक ने : ताजा अपराधी तो उन्‍नाव का प्रशासन है, जिसकी करतूतों से जेल में घायल की मौत हुई :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मासूम बच्चिचों, किशोरियों और महिलाओं के साथ बलात्‍कार केवल दुराचारी ही नहीं करता है। सच बात तो यह है कि ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदातों के असल मुजरिम वे होते हैं, जो अपने ओछे-टुच्‍चे स्‍वार्थों के लिए ऐसे अपराधों पर राख डाल कर उसे रफा-दफा करने की साजिशें बुनते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे शर्मनाक मुजरिमों में पहला नम्‍बर तो होता है खुद उन लोगों का, जो सरकारी अफसर-कर्मचारी होते हैं, लेकिन मलाईदार ओहदे की लालच में किसी भी नीचे स्‍तर तक उतर जाने पर आमादा होते हैं। अपने राजीनीतिक हुक्‍मरानों को खुश करने के लिए वे उस हद तक पहुंच जाते हैं कि आम आदमी शर्म से गड़ जाए। इनमें जिलों से लेकर लखनऊ तक आला कुर्सियों पर बैठे अफसरों के साथ ही साथ पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की लम्‍बी फेहरिस्‍त है।

मेरे पास चंद हादसों का ब्‍योरा है, जिनको जान-सुन कर आपको साफ पता चल जाएगा कि आखिर यह अफसर कितना गिर सकते हैं। हैरत की बात तो यह है कि इन बेशर्म हरकतों में उस समुदाय के चंद लोग भी आगे बढ़चढ़ कर अपनी घटिया हरकतें करते हैं जिन्‍हें अदालतों में न्‍याय दिलाने की जिम्‍मेदारी होती है, यानी वकील समुदाय।

4 साल पहले लखनऊ के मोहनलालगंज के सरकारी स्कूल में एक युवती के साथ हुआ था। सामूहिक दुराचार बर्बरता की हालत यह थी कि इन दुराचारियों ने उसे तड़पा-तड़पा कर मार डाला था। करीब 34 बरस की इस युवती की रक्तरंजित लाश स्कूल में नंगी पड़ी रही। तब लखनऊ के एसएसपी थे नवनीत सिकेरा। तब की एक अपर पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्‍याल तक को नवनीत सिकेरा ने इस मामले में लपेट कर मामला रफादफा करने की कोशिश की, और सुतापा सान्‍याल के नेतृत्‍व में एक फर्जी तरीके से जांच का नाटक किया गया। आज तक उप्र शासन के गृह विभाग तक ने इस बात का जवाब हमारे प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को नहीं दिया है कि आखिर सुतापा सान्‍याल को इस मामले में क्‍यों जोड़ा गया और उसकी जांच का नतीजा क्‍या निकला था। साफ था कि इस मामले में सत्‍ता के करीब लोगों की रूचि का पूरा ध्‍यान दिया गया, न कि मामले का खुलासा करना। नतीजा यही निकला, कि पूरी फर्जी कारवाई करके एक व्यक्ति को सजा दे दी गई। सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले को इसलिए दबाया गया क्योंकि उसकी असली अपराधी ऊंचे बड़े व्यावसायिक और राजनीतिक परिवार से जुड़े हुए

लखनऊ के आशियाना कालोनी में करीब 15 बरस पहले हुए उस हादसे की याद तो आपकी स्‍मृति-पटल पर शायद अब तक दर्ज होगी, जब एक एक नन्ही मजदूर बच्‍ची के साथ चंद बड़े और असरदार लोगों की निरंकुश औलादों ने दुराचार कर उसे मरणासन्‍न हालत तक पहुंचा दिया था। यह पूरा हौलनाक हादसा आज भी आशियाना बलात्‍कार-काण्‍ड के तौर पर जाना-पहचाना जाता है। शाम के धुंधलके में शहर के एक बड़े दबंग और राजनीति लखनऊ के आशियाना में हुआ था। अदालत में इस मामले की धज्जियां तो खूब उधेड़ने की तैयारियां थीं, लेकिन उस सामूहिक दुराचारी लोगों में से एक व्‍यक्ति भी शामिल था, जिसके चाचा समाजवादी पार्टी के बड़े असरदार नेता था।

फिर क्‍या था। लखनऊ के चंद बड़े वकीलों ने मिलकर इस मामले को संवेदनशीलता की जमीन पर नहीं, बल्कि अपने मुअक्किल के रसूख और उनकी खनखनाती रूपहली थैली की भौतिकता के सामने घुटने टेक दिये। कितने शर्म की बात है कि इन वकीलों ने इस मामले को करीब 10 बरसों तक केवल इसी मुद्दे पर लटकाये ही रखा, कि उस सामूहिक दुराचार-काण्‍ड का मुख्‍य अभियुक्‍त हादसे के वक्‍त नाबालिग था। हैरत की बात है कि इन वकीलों की दलीलों का सिक्‍का अदालतों में लगातार पूरी बेशर्मी की धमक के साथ चलता ही रहा। जबकि किसी भी व्‍यक्ति के नाबालिग होने की बात साबित करने के लिए केवल एक डॉक्‍टरी-जांच से ही पर्याप्‍त थी, जिसे अधिकतम एक घंटे में निपटाया जा सकता था। इतना ही नहीं, उन वकीलों ने उस दुराचारी के उम्र को छुपाने की सारी कोशिशें कीं, लेकिन आखिरकार उस दुराचारी की हाईस्‍कूल का प्रमाणपत्र ही इस तथ्‍य को साबित करने के लिए पर्याप्‍त था, जिसमें वह दुराचारी पूरी तरह बालिग था।

जौनपुर के भंडारी रेलवे स्‍टेशन के पास तीन बरस पहले देर रात नाली किनारे बरामद हुई थी एक 17 साल की किशोरी बेहोश बरामद हुई थी। अस्‍पताल में तैनात कर्मचारियों का बयान था कि उस किशोरी से बर्बर सामूहिक दुराचार हुआ था। लेकिन तब के जुल्फी-प्रशासन ने उस जघन्‍य हादसे को गटक लिया और पूरा मामला ही रफा-दफा कर दिया। आपको बता दें कि तब के डीएम चंद्रभानु गोस्‍वामी ने इस बच्‍ची की बरामदगी कोई भी मुकदमा दर्ज नहीं कराया, बल्कि बाद में जब प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने उस बच्‍ची से जुड़ी खबरों को उजागर करने का अभियान डछेड़ा तो जुल्‍फी-प्रशासन के अगुआ गोस्‍वामी ने उस बेबस किशोरी को बनारस पागलखाने में भर्ती करने की कवायद छेड़ दी। लेकिन पागलखाना के डॉक्‍टरों ने साफ कर दिया कि वे बिना अदालत के आदेश के उस बच्‍ची को पागलखाने में भर्ती नहीं करेंगे। गोस्‍वामी क्‍या करते, क्‍योंकि उस मामले की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं थी। फिर एक रास्‍ता खोजा गया कि इस बच्‍ची को नारी निकेतन भेज दिया जाए। और इस तरह पूरे मामले को दफ्न कर दिया गया।

जौनपुर में ही बदलापुर में कोतवाली के पास रहने वाली पौने 15 बरस की एक गरीब किशोरी के साथ तीन रईसजादों ने किया था दुराचार। यह घटना ठीक एक बरस पहले की है, जिसमें वह बच्‍ची गर्भवती भी हो गई। मामला पुलिस में पहुंचा, मेडिकल जांच में उसके नाबालिग और गर्भवती होने की बात साबित हुई। लेकिन इसके बाद नोटों की बारिश हुई और पुलिस, प्रशासन, पत्रकार, वकील और दलालों तक पौ-बारह हो गयी। खुद को क्षेत्र के सम्‍भ्रांत और सम्‍मानित नेता, लेखक, पत्रकार, चिंतक तक इस मामले में किनारा कर अपनी लंगोट छोड़ कर भाग निकले। नतीजा यह हुआ कि अपराधियों ने किशोरी का गर्भ गिरा दिया। रिपोर्ट दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने कोई भी कार्यवाही नहीं की और अपराधी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

इतना ही नहीं, हमारे पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को पुख्‍ता खबर मिली थी कि चंदवक के एक निजी अस्‍पताल में एक महिला का कन्‍या-भ्रूण हत्‍या की तैयारी चल रही है। उस महिला को अस्‍पताल में भर्ती कर लिया गया है। यह खबर मुझे रात में मिली, और सुबह दस बजे यह गर्भपात होना था। मैंने डीएम सर्वज्ञराम मिश्र को मोबाइल किया, मगर फोन नहीं उठा। डीएम के घर के फोन मिलाया, तो पता चला कि डीएम किसी पार्टी में व्‍यस्‍त हैं। मैंने यह खबर फोन करने वाले को कर दिया कि अस्‍पताल में कन्‍या-भ्रूण की हत्‍या होगी। मगर प्रशासन ने कोई भी कदम नहीं उठाया। आज वही डीएम सर्वज्ञराम मिश्र आज मथुरा का डीएम बना बैठा है। सूत्र बताते हैं कि कि अपने परिवार के किसी दिवंगत शख्‍स की चर्चा सुनते ही यह डीएम बिलख कर रो पड़ता है।

उन्नाव में भी यही हुआ। बांगरमऊ में हुए तथाकथित बलात्कार में भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर की संलिप्‍तता थी अथवा नहीं, यह सवाल अभी भी लोगों के गले से नहीं उतर रहा है। मगर इतना जरूर है उन्नाव की पुलिस कप्तान पुष्पांजलि और उनकी पुलिस ने कुलदीप सेंगर के इशारे पर उस व्यक्ति को बुरी तरह पीटकर जेल भेज दिया था जिसकी बेटी पर बलात्कार का आरोप है। इतना ही नहीं, कुलदीप सेंगर के इशारे पर ही पुलिस ने उस व्यक्ति पर आनन-फानन 22 से ज्यादा मुकदमे दर्ज कर उसे जेल में सड़ा डालने की साजिश की थी। जेल भेजने से पहले उस बुरी तरह घायल व्‍यक्ति का मेडिकल जरूर कराया गया, लेकिन उसका इलाज की जरूरत पुलिस ने नहीं समझी। इतना ही नहीं, यह भी वजह जांचने की जरूरत नहीं समझी पुलिस ने कि उस व्‍यक्ति को किस शख्‍स ने बर्बरता के साथ पीटा था। बहरहाल, बुरी तरह घायल उस व्यक्ति की मौत 5 दिन बाद ही जेल में हो गई। अब पुष्पांजलि इस मामले में अपनी तत्परता कर दिखाने का पाखंड करती दिख रही हैं, और पूरी सरकार तथा उसके अफसर मामले पर राख डालने की कवायद कर रहे हैं।

फांसी की सजा तो इन लोगों पर आयद होनी चाहिए। बोलिए, है कि नहीं ? (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

इस सीरीज की अगली कडि़यों को पढ़ने में यदि इच्‍छुक हों तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला

सतयुग हो या सपा-भाजपा सरकार: सिर्फ पॉक्‍सो ही पॉक्‍सो

: यह तो खोजिए कि इस घिनौनी आंधी का मूल कारण, कौन सी ताकतें और मूल अपराधी कौन हैं : आक्रोश में लिए फैसले आत्मघाती होते हैं,  उनका दूरगामी प्रभाव दूरगामी प्रतिकूल भी : ऐसी ही जघन्‍य वारदातों के आंखियों को थामने में असफल अखिलेश यादव से आम आदमी को सपा-सरकार से घृणा हो गयी थी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : दोस्तों । मेरे कई पाठकों ने मेरी राय पर बहुत गुस्सा जाहिर किया है। कई ने तो यहां तक कह दिया कि अगर ऐसा हादसा अगर आप के परिवार की महिलाओं पर हो तो आपका नजरिया क्या होगा। उनका गुस्सा बिल्कुल जायज है। लेकिन यह केवल उनका गुस्सा ही है, जबकि ऐसे मामलों पर शांतचित्त मस्तिष्‍क से ही फैसला करना चाहिए। गुस्सा यानी आक्रोश में लिए गए फैसले हमेशा आत्मघाती होते हैं और उनका काफी दूरगामी प्रतिकूल असर पड़ता है। इस मामले में भी यही हुआ है। ऐसी हालत में हमें देखना पड़ेगा कि अचानक ऐसा कौन सी घिनौनी आंधी कैसे चल पड़ी, उसके मूल क्या कारण हैं, उसके पीछे कौन सी ताकतें है और उसके मूल अपराधी कौन हैं।

क्या इसके पहले समाजवादी पार्टी यह दिल्ली समेत किसी और क्षेत्र में ऐसी कोई घटना नहीं हुई। हुई हैं, और खूब हुई हैं। आज ही नहीं बल्कि हर युग में हुई महाभारत की शुरुआती पॉक्सो जैसे हालातों से पैदा हुई थी। आप याद कीजिए कि निषाद राज की पुत्री सत्यवती जिसकी उम्र तकरीबन 16 बरस की थी, उसके साथ ऋषि पाराशर ने संभोग किया था। वह कृत्य तब हुआ जब वह बच्ची उस ऋषि को नाव पर बिठाकर नदी के उस पार ले जा रही थी। पाराशर ने उस पूरे यात्रा के दौरान एक धुंध-कोहरा जैसा बुन-बींध दिया था। और आपको कहने की जरूरत नहीं है कि कोहरा का आशय उस घटना में किस व्यवहार का प्रतीक था।

कुंती के पुत्र का नाम कर्ण था। कहा जाता है कि वह कुंती के कान से पैदा हुआ था कर्ण। इतना तय है कि उसके जैविक पिता का नाम सूरज था। हम नहीं जानते कि वह सूरज कोई व्यक्ति था या नहीं अथवा दहकते आग का सूरज था वह,  लेकिन इतना जरूर है कि किसी भी बच्चे का जन्म किसी स्त्री के कान से नहीं हो सकता। इसके पहले राम काल में शूर्णपखा नामक एक युवती के नाक और कान काट लिया गया था। और आपको समझने की जरूरत नहीं है कि किसी महिला की नाक-काट लेना किस प्रवृत्ति या काण्‍ड का प्रतीक और किन परिस्थितियों का परिचायक होता है।

तो हमें भ्रमित मत कीजिए। आइये, कम से कम हम शांतचित्त होकर इस पूरे प्रकरण को समझने की ईमानदारी को दिखायें।

हमें समझना पड़ेगा कि आखिर क्या कारण थे जिनमें अखिलेश यादव की सरकार में बलात्कारों की एक बाढ़ तक आ गई थी और पूरे 5 बरस तक अखिलेश सरकार बलात्कारियों की सरकार के तौर पर को कुख्यात हो गई थी। हालत इतनी बुरी हो गई थी कि प्रदेश की पीड़ित जनता के दिलों पर समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष रहे मुलायम सिंह यादव ने इतना तक मिर्च झोंक दिया था क‍ि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, और इसका मतलब नहीं कि उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। वहां मुलायम सिंह यादव अपने इस बयान पर भले ही फांसी शब्द का दूसरी व्याख्या कर रहे हों लेकिन इतना जरूर है कि उस बयान से इतना जरूर साबित हो गया कि उनकी सोच बलात्कारी लड़कों के प्रति क्या है।

नतीजा यह हुआ कि अखिलेश की सरकार के प्रति आम आदमी को घृणा हो गयी।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने उस बयान से पीडि़त जनता के घावों पर मल्हम तो नहीं लगाया, बल्कि उसे और भी कुरेद दिया था। बेहतर होता कि मुलायम सिंह अपने प्रशासन को और संवेदनशील बनाते और ऐसे अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई करते हुए समाज विज्ञानियों से आग्रह करते ताकि ऐसे जघन्य हरकतों का निदान खोजा जा सके। इसके साथ ही साथ वे प्रदेश में एक बहस छेड़ते कि राजसत्‍ता को ऐसे तांडवों से कैसे निपटना चाहिए।

अखिलेश सरकार को राजगद्दी से बाहर करने और पदस्‍थ कर सत्‍ता पर हासिल करने वाली भाजपा सरकार ने इस ताजा तांडव पर जो भी फैसला किया, उस पर गुण-दोष की समीक्षा करना समय की सख्‍त जरूरत है। यहां सवाल यह नहीं है कि किसी अपराधी पर क्या सजा दी जाए, बल्कि सवाल यह है कि जनता को विश्‍वास में लेकर जो भी हो सके, फैसला किया जाए वह सर्वमान्‍य हो।

किसी भी मामले पर क्रूरतम सजा देने के फैसला देना भावुकता का विषय कैसे हो सकता है। सच तो यह है कि यह प्रश्‍न का समाधान तो सरकार और समाज की संवेदनशीलता से ही खोजा जा सकता है। और दुख की बात है कि सरकार ने इस पूरे प्रकरण पर पूरी तरह आम आदमी की भावुकताओं को सान पर चढ़ाया है, मगर अपनी संवेदनशीलता का एक बार भी प्रदर्शन नहीं किया। (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला

रेप पर अध्‍यादेश, यानी जनाक्रोश का नकदीकरण

: ऐसे हादसों की लहर जब देश को अशांत कर दे, तब राष्‍ट्रव्‍यापी बहस की जरूरत होती है, त्‍वरित फैसलों की नहीं : मुझे बलात्‍कार-हत्‍या जैसे जघन्‍य अपराधों से घृणा है, लेकिन फांसी जैसे दंड से भी नफरत : हाईकोर्ट ने अध्‍यादेश पर जायज सवाल उठाये : सरकार ने जनाक्रोश थामा है, या उसे अपने पक्ष में कैश किया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पिछले दो महीनों से बलात्‍कार की घटनाएं हमारे देश में दमघोंटू कोहरे की तरह पसरती रही हैं, जिसमें देशवासियों की आत्‍मा बुरी तरह छटपटा रही हैं। मोड़ ऐसे खतरनाक मोड़ पर है जहां रेप जैसे जघन्य अपराध शब्द सुनते ही पूरा समाज क्रोध से भड़क जाता है। ऐसी हालात में राजसत्‍ता का दायित्‍व होता है कि वह ऐसे प्रकरणों पर सको लेकर भड़के गुस्‍सों को थामने की कोशिश करे, देश-व्‍यापी बहस छेड़ने का माहौल तैयार करे, ऐसे हादसों के कारणों को खोजने की कोशिश करे, और गुण-दोषों के आधार पर ऐसा कोई रास्‍ता खोजे, जो सर्वमान्‍य बन सके। लेकिन हैरत की बात है कि इस मामले में केंद्र सरकार ने जो रास्‍ता अख्तियार किया, उसमें समाधान का सद्-प्रयास तो न्‍यूनतम था, जबकि उस माहौल को अपने राजनीतिक पक्ष में मोड़ने की कवायद शामिल थी।

आज मैं भी रेप से जुड़े कुछ तथ्य आपके सामने पेश करना चाहता हूं। मैं बलात्कार से सख्त नफरत करता हूं और ऐसे दुष्कर्म करने वालों की निंदा करता हूं। लेकिन जिस तरीके से इधर कुछ समय से बलात्कार और खासतौर पर नन्ही बच्चियों के साथ दुराचारों उसके बाद उनकी हत्या के हादसे सामने आए हैं उसको लेकर सरकार ने मुजरिमों के लिए मौत की सजा मुकर्रर की है, मैं इसकी सख्त मुखालिफत करता हूं। हाईकोर्ट ने भी आज इससे संबंधित याचिका पर टिप्पणी की है और सरकार से पूछा है कि इस अध्यादेश में प्रताड़ित बच्चियों की उम्र 12 बरस तक रखने का क्या औचित्य है और उसके प्रति सरकार का नजरिया और आधार क्या है।  हाईकोर्ट के सवाल-जवाब से कम से कम इतना तो सही हो गया है कि केंद्र सरकार द्वारा इस मसले पर आनन-फानन लिया गया फैसला पूरी तरह निर्दोष नहीं है। जाहिर है इस से आने वाले वक्‍त में खासी दिक्कतें सामने आ सकती हैं।

इन हालातों में हमें देश के नेतृत्व से इससे जुड़े कुछ सवाल तो पूछना ही चाहिए। जनता को जानना चाहिए कि अचानक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का तूफान कैसे खड़ा हो गया, वह क्या हालात थे जब सरकार को फांसी का फैसला लेना पड़ा। और सबसे बड़ा सवाल तो यह कि इतना बड़ा फैसला लेने के पहले सरकार ने केवल गुस्साए और तमतमाए हुए जनाक्रोश के सामने अपने घुटने टेक दिए या फिर उस जनाक्रोश का अपने पक्ष में नगदीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली।

सरकार को जवाब देना चाहिए कि उसने इस पूरे मामले में देश के लोगों के गुस्से के सामने चटपट फैसला क्‍यों लिया। जबकि उसे इस पूरे मामले को सबसे पहले शांत करने की कवायद करनी चाहिए थी, और उसके बाद बेहद शांत चित्त हो चुके देश की भावनाओं पर राष्ट्रव्यापी बहस करनी चाहिए थी। जहां वह इस पूरे बलात्कार के माहौल के कारणों, उनके उफान और उसके  सामाजिक-राजनीतिक  फलकों पर  व्यापक बहस छेड़  कर आम जनता को जागरुक करती और फिर एक समवेत स्वर में एक फैसला लेती। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि सरकार ने इस मामले पर बेहद हल्के तरीके से ही फैसला लिया और फैसला लेने का उसका तरीका पूरी तरह से मनमर्जी भरा था।

इस मसले पर सरकार ने फैसला तो किया, लेकिन वह स्‍वस्‍थ समाज का फैसला नहीं था, यह वह फैसला नहीं था जो एक शांतचित्‍त देश का होना चाहिए था। बल्कि सच बात तो यही है कि इसमें सरकार ने जनआक्रोश को अपने राजनीतिक लाभ के लिए नगदीकरण जैसा षडयंत्र चक्र रच लिया।

हैरत की बात है कि बस चंद घटनाएं हुईं, मीडिया ने उसे उछाला और राजनीतिक दलों ने उसे भड़काया। फिर सरकार ने एक के बाद एक अपने तुरुप के पत्ते खोलने शुरू किए और आखिरकार केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश तैयार कर राष्ट्रपति को भेज दिया कि रेप करने वाले मामलों पर अभियुक्तों को फांसी की सजा दे दी जाएगी। राष्‍ट्रपति ने आनन-फानन इस पर फैसला कर लिया कि फांसी दी जाएगी।  (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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