Meri Bitiya

Saturday, Jul 21st

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

हमारे लिए महत्‍वपूर्ण हैं हमारी बेटियां और इसीलिए है मेरी बिटिया डॉट कॉम

दाती महराज पर सनिच्‍चर की साढ़े-साती, जेल जाएंगे

: दाती महाराज के खिलाफ महिला ने लगाया आरोप, बरसों तक करते रहे बलात्‍कार : राजस्‍थान की युवती ने दाती के कई चेलों पर भी रेप का आरोप जड़ा : महरौली में है दाती महराज का विशाल आश्रम, फतेहपुर बेरी में मुकदमा दर्ज :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : स्‍वयं को शनि भगवान का सर्वोच्‍च भक्‍त कहलाने वाले दाती महराज पर आज खुद ही सनिच्‍चर महराज उचक कर चढ़ गये। उनकी एक शिष्या ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इतना ही नहीं, इस युवती ने दाती महराज के साथ ही साथ उनके कई चेलों-चापड़ों पर भी लगातार यौन-उत्‍पीड़न के आरोप जड़ दिये हैं। इस युवती ने दिल्‍ली महिला आयोग पर इस बाबत शिकायत दर्ज की थी। उसके बाद ही दक्षिणी दिल्‍ली के फतेहपुर बेरी थाने ने युवती के खिलाफ यौन उत्‍पीड़न का आरोप दर्ज कर लिया। यह युवती राजस्‍थान की रहने वाली बतायी जाती है। करीब 70 बरस के दाती महराज का जन्‍मदिन अगली 10 जुलाई को भव्‍य तरीके से आयोजित करने की तैयारियां चल रही हैं।

करीब पचीस बरस की इस युवती ने पुलिस को बताया कि वह करीब एक दशक से महाराज की अनुयायी थी। लेकिन महाराज और चेलों द्वारा बार-बार बलात्कार किए जाने के बाद वह अपने घर राजस्थान लौट गई थी। युवती ने आरोप लगाया है कि बाबा की एक अन्य महिला अनुयायी उसे महाराज के कमरे में जबरन भेजती थी। मना करने पर धमकाती थी कि वह सभी से कहेगी कि पीड़िता अन्य चेलों के साथ भी यौन संबंध बनाती है। वह करीब दो साल पहले आश्रम से भाग गई थी और लंबे समय से अवसाद में थी. अवसाद से उबरकर उसने अपने माता-पिता को पूरी बात बताई और उनके साथ पुलिस को शिकायत दी है।

दाती महाराज ‘शनि शत्रु नहीं मित्र है’ कार्यक्रम करके चर्चा में आए थे. मालूम हो कि दाती महाराज देशभर में हिंदू देवता शनिदेव के दुष्प्रभाव से जुड़े उपाय सुझाने और कर्मकांडों के लिए जाने जाते हैं. इसके अलावा अक्सर वह विभिन्न चैनलों पर ज्योतिष से संबंधित कार्यक्रम पेश करते हुए नज़र आते हैं। महिला ने अपनी शिकायत में दावा किया है कि दाती महाराज के आश्रम में अन्य कई महिलाओं का भी यौन शोषण हुआ है। महिला का कहना है कि दाती महाराज की प्रसिद्धि से वह डरी हुई थी, इस वजह से उसने दो साल तक शिकायत दर्ज नहीं करवाई। दाती महाराज के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 376, 377, 354 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने बताया है कि दाती महाराज द्वारा कथित रूप से बलात्कार की शिकार हुई युवती की कहानी बेहद डरावनी है। ऐसा लगता है कि वह भीषण प्रताड़ना से गुजरी है। उसकी जान को खतरा है। स्‍वाति का अनुरोध है कि दिल्ली पुलिस को उसे तुरंत सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा है. दाती महाराज को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। महिला का आरोप है कि दो साल पहले दाती महाराज ने शनिधाम में उनके साथ केर किया था लेकिन डर की वजह से वह इतने दिनों तक चुप रहीं और कोई शिकायत नहीं की। दाती महाराज दिल्ली के शनिधाम के संस्थापक हैं और कई टीवी चैनलों पर नियमित रूप से राशिफल प्रस्तुत करते हैं। दक्षिणी दिल्ली में उनका एक विशाल फार्म हाउस है।

आसाराम और गुरमीत राम रहीम के बाद एक और स्वयंभू संत दाती महाराज पर बलात्कार का मामला दर्ज हुआ है. स्वयंभू संत दाती महाराज पर उनकी शिष्या ने ही बलात्कार का आरोप लगाया है. पुलिस ने बलात्कार और शोषण से जुड़ी धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज़ कर लिया है। अब स्वयंभू संत दाती महाराज के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 376, 377, 354 और 34 के तहत केस दर्ज हुआ है। दक्षिण दिल्ली के फतेहपुर बेरी में स्थित शनिधाम मंदिर के साथ उनका आश्रम है.

अपनी शिकायत में शिष्या ने आरोप लगाया गया था कि शनि धाम मंदिर के अंदर दाती महाराज ने दो साल पहले उसके साथ बलात्कार किया था और इसके बारे में किसी को भी न बताने की धमकी दी थी।

भाजपा सरकार में चौपतिया-पत्रकारों की पौ-बारह

: जनसंदेश टाइम्‍स के समूह सम्‍पादक के मामले में शासन व प्रशासन लचर : वीकऐंड टाइम्‍स नामक चौपतिया अखबार-मालिक की फर्जी रिपोर्ट पर सचिव-पुलिस भागीरथ बने : प्रमुख सचिव ने जम कर हड़काया था संजय शर्मा को, कि मुझे मामले की पूरी जानकारी है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हैरत की बात है कि भाजपा सरकार में अफसरों की प्राथमिकताएं बदली हुई लग रही हैं। गम्‍भीर और देश में अपनी अभूतपूर्व छवि रखने वाले वरिष्‍ठ पत्रकारों के मामलों में तो अफसरों और पुलिसवालों का नजरिया उपेक्षापूर्ण रहता है, लेकिन अभी अगर किसी चौपतिया अखबार के किसी चिरकुट जैसे शख्‍स का कोई फर्जी मामला हो तो पुलिस सिर के बल खड़ी हो जाती है। आनन-फानन मुकदमा दर्ज करेगी, और थाने और एसएसपी से लेकर प्रमुख सचिव जैसे अफसर तक उसकी ड्योढ़ी पर सिर झुकाने पहुंच जाएंगे।

अभी साल भर पहले गोमती नगर से निकलने वाले चौपतिया अखबार वीकएंड टाइम्स के मालिक संजय शर्मा के छापाखाना के बकैत-गुण्‍डे ने अपने पड़ोस में खुले रेस्टोरेंट से मुफ्त माल का खिलाने का दबाव बनाया था। रेस्‍टोरेंट के मालिक ने जब ऐसा करने से मना कर दिया, तो उस रेस्टोरेंट के मालिक पर न केवल हमला किया था बल्कि उसे मारपीट कर भी किया गया था या मारपीट सरेआम हुई थी।

आपको बता दें कि वीकएंड टाइम्‍स और 4 पीएम जैसे चौपतिया अखबार बिकने के लिए नहीं, बल्कि फ्री में नेताओं, अफसरों और पुलिसवालों के दफ्त्‍र और घर तक पहुंचाने होते हैं, ताकि अफसरों और नेताओं तक धमक बन जाए। इसके लिए इन अखबारों के मालिक संजय शर्मा ने अखबार को पहुंचाने की व्‍यवस्‍था करा रखी है। कहने की जरूरत नहीं कि इन अखबारों के नाम पर संजय शर्मा का असल धंधा दीगर ही है।

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार पत्रकारिता

बहरहाल, उस घटना के तत्‍काल बाद  संजय शर्मा के गुंडों की इस करतूत की माफी मांगने के बजाय कुछ पत्रकार भी एकजुट हो गए। हालांकि बाद में इन पत्रकारों को जब संजय शर्मा और उनके लोगों की करतूत का एहसास हुआ तो एक-एक कर छंटने। लेकिन तब तक संजय शर्मा ने इस मामले को अपने पक्ष में भुना ही डाला। उस रेस्टोरेंट के मालिक और उसके कर्मचारियों पर संगीन अपराध की धाराओं से एकएफआईआर दर्ज करायी गयी। संजय के घर लखनऊ का एसएसपी, एसपी सिटी, सीओ और इंस्‍पेक्‍टर तक अपने-अपने सिर नवाने पहुंच गये। इतना ही नहीं, सूचना विभाग के प्रमुख सचिव अविनाश अवस्थी भी इस चौपतिया अखबार के दफ्तर पहुंच गए और अपने उस घटना पर अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त कर आये।

लेकिन देश के ख्‍यातिनाम संपादक और प्रख्यात कवि-चिंतक सुभाष राय के घर पुलिसवालों की गुण्‍डागर्दी पर पुलिसवालों ने लगातार दो दिन तक पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। और तो और, प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी तक ने भी उस गुंडे इंस्पेक्टर की करतूतों से प्रताड़ित सुभाष राय और उनके परिवार पर मलहम लगाने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि सुभाष राय बताते हैं कि अवनीश अवस्‍थी ने इस मामले में अफसरों को निर्देशित किया था।

कुछ भी हो, इन्हीं दोनों घटनाओं से साफ समझा जा सकता है कि सरकार और उसके नौकरशाहों की नजर में गंभीर पत्रकारों और चौपटिया घोटालेबाज पत्रकारों के प्रति क्या नजरिया है।

पुलिस से जुड़ी खबरों को देखने के लिए क्लिक कीजिए:-

बड़ा दारोगा

संपादक के घर हंगामा पर मवाली दारोगा सस्‍पेंड

: डीजीपी ने मामले पर की कार्रवाई, दोपहर बाद हुआ आदेश : सम्‍पादक के घर एसटीएफ हंगामे पर आज गांधी स्मारक पर पत्रकार करेंगे मौन प्रदर्शन : डीजीपी इस सवाल पर खामोश, कि दारोगा के साथ दर्जन भर एसटीएफ के गुंडों पर क्‍या होगी कार्रवाई : बाकी एसटीएफ के गुंडों पर कार्रवाई पर पुलिस खामोश :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आम आदमी ही नहीं, देश के एक बड़े कवि, पत्रकार और एक राष्‍ट्रीय समाचारपत्र के समूह सम्‍पादक को यह धमकाने कि तू मेरा क्या उखाड़ लेगा, वाले एसटीएफ के बिगड़ैल गुण्‍डे रणजीत राय  इंस्पेक्टर आज सस्पेंड हो गया। महानिदेशक ने इस मामले पर संपादक सुभाष राय की फेसबुक पर इस मामले पर दर्ज एक पोस्‍ट का संज्ञान लेते हुए दारोगा का निलम्बित कर दिया। इसके पहले पत्रकारों ने इस पूरी घटना पर अपना जबरदस्त आक्रोश व्यक्त किया था। आखिरकार इस मामले के मुख्य आरोपी एसटीएफ के इंस्पेक्टर रणजीत राय को सस्पेंड कर दिया गया। हालांकि अब तक पता नहीं चल पाया है कि संपादक के घर हंगामा करने गए रणजीत राय के साथ शामिल एसटीएफ के बाकी 11 लोगों पर क्या कार्रवाई हुई है।

आपको बता दें कि 10 जून की सुबह यूपी एसटीएफ के एक पालतू बिगड़ैल गुंडे इंस्पेक्टर रंजीत सिंह के साथ उसके करीब एक दर्जन से ज्यादा पुलिसवालों ने जनसंदेश टाइम्स समूह के समूह संपादक सुभाष राय के घर जबरदस्त हंगामा किया था। इस गुंडे दारोगा इस बात पर नाराज था कि उसे उसके एक पारिवारिक दोस्‍त को क्‍यों दिक्‍कत हो रही है। इस दिक्‍कत का कारण थे देश के एक प्रमुख पत्रकार और कवि-चिंतक सुभाष राय, जिन के घर के पास निर्माणाधीन मकान के मालिक से विवाद हुआ था, जिसने अपनी निर्माण सामग्री सुभाष राय के घर के ठीक सामने कुछ इस तरह ढेर कर दिया था ताकि निकलना तक मुश्किल था।

पुलिस से जुड़ी खबरों को देखने के लिए क्लिक कीजिए:-

बड़ा दारोगा

कई बार निर्माणाधीन मकान मालिक की इस हरकत पर ऐतराज जताया गया था। सुभाष राय ने कई बार इस मामले पर डायल हंड्रेड पर फोन किया था, लेकिन हर बार पुलिस वालों ने पाया कि सारी गलती पड़ोसी की है। पुलिस वालों ने यह भी निर्देशित किया कि वह जल्दी से जल्दी सुभाष राय के घर के दरवाजे पर बड़ी निर्माण सामग्री को हटा दें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि 10 जून को सुबह रणजीत राय अपने साथियों के साथ सुभाष राय के घर पहुंचा और फिर एक जबर्दस्‍त हंगामा खड़ा हो गया। इस दारोगा ने जितनी भी अभद्रता हो सकती है, उस दौरान बेहिसाब कर डाली थी।

इसकी जानकारी एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश को दी गयी थी। लेकिन इसके बावजूद एसटीएफ के लोग खामोश ही रहे। आज सुबह सुभाष राय ने इस मामले पर एक आईएफआर विभूति खंड थाने पर जा कर दी थी लेकिन इस अर्जी पर रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। थाने पर मौजूद पुलिस वालों ने बताया कि थानाध्यक्ष इस समय किसी दूसरी ड्यूटी पर हैं और उनके बाद लौटने के बाद ही यह मामले को दर्ज करने या ना करने का फैसला लिया जाएगा।

इस पूरे मामले पर सुभाष राय ने जो अपना एक फेसबुक अपडेट किया, जिस पर पत्रकार जगत में आग-सी लग गयी। पुलिस की कार्यशैली से पहले से ही बेहिसाब आलोचना में रह चुकी एसटीएफ को पत्रकारों ने आड़े हाथों लिया। विरोध का दौर शुरू हो गया। इससे बचने के लिए एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश ने उस गुंडे इंस्पेक्टर को ड्यूटी से हटा दिया और पत्रकारों को बताया कि उस घटना पर निर्णय ले लिया गया है।

पत्रकारों का आक्रोश थमा नहीं। पत्रकार साफ-साफ मान रहे थे कि अमिताभ यश उस गुण्‍डे इंस्पेक्टर को उसकी करतूतों के लिए दंडित करने के बजाए उसे साफ-साफ बचा ले जाने की कोशिश कर कर रहे हैं। इसलिए डीजीपी से लेकर के गृह सचिवालय और मुख्यमंत्री कार्यालय तक पत्रकारों ने जोर आजमाइश करना शुरु कर दिया।

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

 

पत्रकार पत्रकारिता

इतना ही नहीं, पत्रकारों ने ऐलान किया कि इस घटना पर कड़ी कार्रवाई और सख्त निंदा का दौर शुरू किया जाएगा। इसके लिए 12 जून को 11 बजे से गांधी प्रतिमा हजरतगंज चौराहे पर पत्रकारों ने एक सामूहिक मौन सभा आयोजित करने की अपील की। पत्रकार इस पूरे मामले पर एकजुट हो गये, साथ ही सामाजिक संगठनों को भी इससे जुड़ने की कवायद शुरू की गई थी।

इसके बाद ही पुलिस को इस मामले की गम्‍भीरता का अहसास हुआ। आनन-फानन डीजीपी ओपी सिंह ने इस मामले की जानकारी हासिल की और दोपहर के बाद शाम तक यह फैसला कर लिया गया कि सुभाष राय के घर हंगामा करने वाले उस गुंडे एसटीएफ इंस्पेक्टर रणवीर सिंह को सस्पेंड कर दिया जाए। आदेश भी जारी हो गया।

लेकिन अब तक विभूति खंड थाने में सुभाष राय की रिपोर्ट दर्ज नहीं की है। अंतिम समय मिलने तक इस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई। हालांकि आश्‍वासन दे दिया गया है कि रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी। उधर रणवीर राय के साथ गए करीब एक दर्जन एसटीएफ के गुणों की पहचान की जरूरत पुलिस या एफटीएफ ने नहीं महसूस की है, और ना ही उन्हें दंडित करने की कोई कोशिश शुरू की गई है। समझा जाता है कि रणवीर सिंह पर कार्रवाई की आड़ में बाकी इन सभी गुंडों को बेदाग छुड़ा लिया जाएगा।

आज अगर ऐसा हो तो सांप्रदायिक तनाव हो जाए

: जब बलराज साहनी ने हबीब तनवीर को रसीद किया था एक करारा तमाचा : याद रखना कि एक जरूरी चीज होती है जिसे ‘मसल मेमोरी’ : कमाने के लिए अंगूर बेचे, सर्कस और रेडियो में काम किया, नाइटक्लब में गाया भी :

तारेंद्र किशोर

मुम्‍बई : हबीब तनवीर की जितनी थियेटर पर पकड़ थी, उतनी ही मज़बूत पकड़ समाज, सत्ता और राजनीति पर थी. वे रंगमंच को एक पॉलिटिकल टूल मानते थे. उनका कहना था कि समाज और सत्ता से कटकर किसी क्षेत्र को नहीं देखा जा सकता.

21वीं सदी में कला माध्यमों की जगह इंटरनेट, उच्च तकनीक वाले गैजेट्स और सूचना क्रांति के तमाम दूसरे साधनों ने ले ली है, लेकिन 20वीं सदी सिनेमा और थियेटर की सदी थी. इसी सदी में भारतीय थियेटर भी विकसित हुआ और अपनी बुलंदी पर पहुंचा.इसी दौर में भारतीय थियेटर जगत को उसको उसका सबसे नायाब किरदार हबीब तनवीर मिला. हबीब तनवीर एक ऐसे रंगकर्मी का नाम है, जो बुद्धिजीवी वर्ग में जितना स्वीकार्य है उतना ही आम लोगों में भी लोकप्रिय है. एक ऐसा रंगकर्मी जो भारत में नाट्य कला माध्यम की पहचान बन गया.उनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह वो सीख थी, जो उन्हें लंदन में तालीम हासिल करते वक्त मिली थी कि मंच पर कहानी दर्शकों को आसानी से समझ में आनी चाहिए.

1 सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब साहब का पूरा नाम हबीब अहमद खान था. पिता पेशावर से थे और मां रायपुर की. बचपन में वो पढ़ने में काफी होशियार थे इसीलिए उनके मन में ख्याल आया था कि वो भारतीय सिविल सेवा में जाएंगे. वो आर्ट्स पढ़ना चाहते थे लेकिन पढ़ने में अच्छे थे तो उनके शिक्षकों का ख्याल था कि उन्हें साइंस पढ़ना चाहिए.छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा लेने के बाद उन्होंने नागपुर के मॉरिस कॉलेज में दाखिला ले लिया और फिर उर्दू में एमए करने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे लेकिन वो फर्स्ट ईयर से आगे नहीं जा सके. धीरे-धीरे सिविल सेवा में जाने का भी उनका इरादा खत्म हो गया. अब वो एक शिक्षक बनने के बारे में सोचने लगे.वैसे ये ख्याल भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहा क्योंकि फिर वो फिल्मों में जाने के बारे में सोचने लगे. इन्हीं दिनों में जब उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कीं, तो अपने नाम में ‘तनवीर’ तखल्लुस जोड़ लिया. इस तरह से वह हबीब अहमद खान से हबीब तनवीर बन गए.एक पत्रकार के तौर पर ऑल इंडिया रेडियो से अपने करिअर की शुरुआत करने वाले हबीब साहब ने कई फिल्मों की पटकथा लिखी और करीब नौ फिल्मों में अभिनय भी किया. उनकी आखिरी फिल्म थी सुभाष घई की ब्लैक एंड व्हाइट.

हबीब तनवीर अपने बड़े भाई को नाटक में काम करते हुए देख कर बड़े हुए थे. उनके बड़े भाई अक्सर नाटकों में औरतों का किरदार निभाते थे. ऐसे ही एक नाटक मोहब्बत के फूल में उनके बड़े भाई ने प्रेमिका का किरदार निभाया था, जिसका प्रेमी घायल हो जाता है और वो उनसे मिलने जाती है. इस नाटक को देखते हुए तनवीर रोने लगे थे. तनवीर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पड़ोस में रहने वाले नबी दर्जी अक्सर इस नाटक का जिक्र कर उन्हें छेड़ा करते थे कि कैसे वे नाटक के दौरान रोने लगे थे. यहां तक कि जब वो बड़े हो गए और बॉम्बे चले गए, तब भी जब कभी लौटना होता तो नबी दर्जी उन्हें बुलाते और चाय पिलाते फिर उस दिन की बाद याद दिलाकर चिढ़ाते, ‘याद है न कैसे उस दिन तुम नाटक देखते हुए रोने लगे थे.’

अभिनय की दुनिया में पहला कदम तो उन्होंने 11-12 साल की उम्र में शेक्सपीयर के लिखे नाटक किंग जॉन प्ले के जरिये रखा था, लेकिन एक रंगकर्मी के रूप में उनकी यात्रा 1948 में मुंबई इप्टा से सक्रिय जुड़ाव के साथ शुरू हुई. उस वक्त का एक दिलचस्प वाकया है जो हबीब तनवीर बाद में सुनाया करते थे. इप्टा के एक नाटक के रिहर्सल के दौरान हबीब तनवीर एक डायलॉग को सही से बोल नहीं पा रहे थे. तब कई बार के प्रयासों के बाद बलराज साहनी ने उन्हें एक जोरदार तमाचा जड़ दिया था. इसके बाद एक बार में ही हबीब तनवीर ने वो डायलॉग सही से बोल दिया. साहनी ने इसके बाद कहा कि थियेटर में एक जरूरी चीज होती है जिसे ‘मसल मेमोरी’ कहते है. ये जो थप्पड़ तुम्हें पड़ा है, यही ‘मसल मेमोरी’ है जिससे तुम्हें डायलॉग एक बार में याद हो गया.

शायद इसीलिए वो बलराज साहनी को अपना गुरु मानते थे. जब इप्टा के सभी सदस्य जेल में थे तो इप्टा को संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी. उसी वक्त वहीं रहते हुए प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े. उस वक्त के इन दोनों ही महत्वपूर्ण आंदोलनों का असर उनकी ज़िंदगी पर ताउम्र रहा और वे हमेशा राजनीतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ अपने कला से जुड़े कलाकार रहे.

1954 में दिल्ली आकर वे कुदसिया जैदी के हिंदुस्तानी थियेटर से जुड़े थे और बच्चों के लिए नाटक करना शुरू किया था. यही उनकी मुलाकात अभिनेत्री और निर्देशिका मोनिका मिश्रा से हुई जिनसे बाद में उन्होंने शादी की. 1955 में हबीब तनवीर यूरोप चले गए और ब्रिटेन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामाटिक आर्ट में दो सालों तक थियेटर सीखा. इन दो सालों के बाद वो एक साल तक यूरोप में भटकते रहे, खूब नाटक देखे, पैसे कमाने के लिए अंगूर बेचे, सर्कस और रेडियो में काम किया, नाइटक्लब में गाया भी

फिर एक दिन वो बर्तोल्त ब्रेख्त से मिलने के लिए ट्रेन से बर्लिन पहुंच गए लेकिन उनके पहुंचने से कुछ ही हफ्ते पहले उनकी मौत हो गई थी. वो बर्लिन में आठ महीने रहे और ब्रेख्त के ढेर सारे नाटक देखे. उनके कलाकारों से मुलाकात की और नाटकों को लेकर खूब सीखा.यूरोप प्रवास के दौरान ही पेरिस में 1955 में उनकी मुलाकात फ्रेंच अभिनेत्री जिल मैकडोनाल्ड से हुई थी. उस समय जिल 17 साल की थी और हबीब 32 साल के. दोनों के बीच प्रेम हुआ और बाद में दोनों की एक बेटी ऐना भी हुई. बहुत दिनों तक ये बात किसी को पता नहीं थी. यहां तक कि तनवीर की दूसरी बेटी नगीन तनवीर को भी 15 साल की उम्र में पता चला कि उनकी कोई बड़ी बहन भी है.

हबीब तनवीर की मृत्यु के बाद ये बात मीडिया में आई कि उनका इंग्लैंड में भी एक परिवार है और नगीन के अलावा एक और बेटी भी है. हार्पर कॉलिंस से 2016 में एक किताब आई है अ स्टोरी फॉर मुक्ति, मुक्ति तनवीर के नाती का नाम है जो कि ऐना का बेटा है.

यह किताब हबीब तनवीर के उन खतों का संकलन है जो कि उन्होंने भारत लौटने के बाद जिल मैकडोनाल्ड को लिखे थे. जिल इस किताब में लिखती हैं कि जब हबीब को 1964 में पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं तो उसने अपने कदम वापस खींच लिए. मेरी मां उस वक्त हबीब के इस तरह खामोशी से चले जाने से बहुत नाराज हुई थीं. उन्हें लगा था कि मुझे छोड़ दिया गया है.इसके नौ साल बाद 1973 में हबीब की बेटी ऐना से मुलाकात हुई. उसके बाद ऐना लगातार उनकी मृत्यु तक उनके संपर्क में रहीं.

1959 में उन्होंने भारत में अपनी पत्नी मोनिका मिश्रा और छह छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को साथ लेकर नया थियेटर की स्थापना की. वह एक प्रयोगधर्मी रंगकर्मी थे. उन्होंने लोकनृत्य को थियेटर से जोड़कर थियेटर को नई परिभाषा और आयाम दिया. छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय थियेटर का ऐसा सामंजस्य बैठाया कि लोक से लेकर विश्व थियेटर एक क्रम में नज़र आने लगते हैं. यहां भाषा और राष्ट्रीयता का भेद ख़त्म कर वो एक विश्व मानव की परिकल्पना को साकार करते दिखते हैं.

इन्हीं संदर्भों में उन्हें कुछ विद्वानों ने ब्रेख्त का उत्तराधिकारी माना है. हबीब अपने बारे में खुद कहते हैं कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की खोज यूरोप के माध्यम से की है. उनका झुकाव दुखांत नाटकों की ओर था. वे मानते थे कि अत्यधिक खुशी के क्षणों में भी दुख का तत्व विद्यमान रहता है.

हबीब तनवीर अपने बहुचर्चित और बहुप्रशंसित नाटकों ‘चरणदास चोर’ और ‘आगरा बाज़ार’ के लिए हमेशा याद किए जाते हैं. चरणदास चोर 1982 में एडिनबरा इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में सम्मानित होने वाला पहला भारतीय नाटक था.उनकी अन्य प्रमुख नाट्य प्रस्तुतियां पोंगा पंडित, बहादुर कलारिन, शतरंज के मोहरे, मिट्टी की गाड़ी, गांव मेरी ससुराल नांव भोर दमाद, जिन लाहौर नहीं वेख्या, उत्तर रामचरित, जहरीली हवा ने भी दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी है.

पोंगा पंडित को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने काफी विरोध किया था क्योंकि इसमें हिंदू धर्म में होने वाले भेदभाव और असहिष्णुता पर तल्ख टिप्पणी की गई थी. मध्य प्रदेश के विदिशा में सितंबर 2003 में उनके इस नाटक के मंचन के समय जब हमला हुआ, तब उन्होंने कड़ी सुरक्षा में मुट्ठी भर लोगों के बीच यह नाटक किया.उन्होंने उस वक्त वहां मौजूद छात्रों से पूछा था कि क्या वो नाटक देखना चाहते हैं? भीड़ में से आवाज़ आई थी कि हम यह नाटक नहीं देखना चाहते. तब उन्होंने कहा कि मैं छात्रों से पूछता हूं, अगर वो चाहते हैं तो हम यह नाटक कर सकते हैं. मैं अपनी ओर से आश्वस्त करता हूं. पुलिस की बात मैं नहीं जानता. मैं दर्शकों की प्रतिक्रिया चाहता हूं, वो चाहते हैं तो फिर ठीक है, पुलिस जानती है कि उसे क्या करना है.

इसके बाद लगभग हॉल खाली हो गया. आठ-दस लोग मुश्किल से बचे रह गए थे. फिर उन्होंने कहा कि मैं आज पुलिस वालों को यह नाटक दिखाना चाहता हूं. मैंने मुख्यमंत्री से बात कर ली है और हम यहां नाटक दिखाने आए हैं, जो दिखाकर ही जाएंगे. आप कानून संभालिए, हम नाटक खेलते हैं.फिर उन्होंने लगभग खाली हॉल में यह नाटक खेला था. हबीब के साथी कलाकार उदयराम उनके बारे में बताते हैं कि वो थियेटर के बिना नहीं जी सकते थे. अगर मरने के समय यमराज भी आए तो वो कहते कि एक मिनट रुक जाओ जरा यह एक सीन कर लेने दो फिर मैं आता हूं. इस तरह के इंसान थे वो.

भारत सरकार ने हबीब को अपने दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण और फ्रांस सरकार ने अपने प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स’ से सम्मानित किया था. इसके अलावा कला क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कालिदास राष्ट्रीय सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेशनल रिसर्च प्रोफेसरशिप से नवाजा गया.

हबीब तनवीर की जितनी पकड़ नाटक थियेटर पर थी उतनी ही मजबूत पकड़ समाज, सत्ता और राजनीति पर थी. वे रंगमंच को एक पॉलिटिकल टूल भी मानते थे. वे कहा करते थे कि समाज और सत्ता से काटकर किसी भी क्षेत्र को न देखा जा सकता है, न ही समझा जा सकता है तब नाटक और रंगमंच कैसे अपवाद हो सकते हैं.

जिस साल वे ‘नया थियेटर’ की 50वीं वर्षगांठ मना रहे थे, उसी साल 8 जून 2009 को वे ज़िंदगी के रंगमंच को अलविदा कह गए. साल 2008 में 1 सितंबर के दिन नाट्य मंडली ‘सहमत’ ने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में तनवीर का 85वां जन्मदिन मनाया था. वहां उन्होंने मौजूदा राजनीतिक-सांस्कृतिक हालात पर एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया था. कौन जानता था कि वो हबीब तनवीर का अंतिम संबोधन होने वाला है.

आखिरी वक्त में वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे जो तीन भागों में आने वाली थी लेकिन अपनी मृत्यु तक वे सिर्फ एक ही भाग लिख पाए थे जिसमें उनकी ज़िंदगी की 1954 तक की कहानी दर्ज है. यह भाग हबीब तनवीर: मेमॉयर्स नाम से पेंगुइन प्रकाशन ने छापा तो है, लेकिन उनकी ज़िंदगी के वो अनदेखे हिस्से हमेशा के लिए अधूरे ही रह गए.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

होम्‍योकॉलेज प्राचार्य के लिए फर्जी प्रमाणपत्र जरूरी

: लखनऊ के राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में प्रधानाचार्य की नियुक्ति पर विवाद भड़का : बिना मुख्यमंत्री की संस्तुति के बना दिया दागी को प्रधानाचार्य : यह सीधी भर्ती का पद था, पदोन्नति के आधार पर भर दिया गया आयुष विभाग में :

कुमार सौवीर

लखनऊ : विश्वसनीयता और घोटालों का पर्याय बनते जा रहे है उत्तर प्रदेश के होम्योपैथिक विभाग में राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में प्रधानाचार्य के पद पर  पदोन्‍नति पर बवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि रेवडि़यों की तरह बांटे गये ऐसे पदों पर उसको कुर्सी थमा दी गयी, जिसका अनुभव प्रमाणपत्र ही फर्जी करार हो चुका है। मगर विभाग वालों ने एक गलत विज्ञापन निकाला और अपने खास लोगों को खपाने के लिए एक ऐसे शख्स को प्रधानाचार्य की कुर्सी थमा दी। इतना ही नहीं, ऐसे शख्‍स की सचिव स्‍तरीय जांच भी चल रही है, लेकिन इसके बावजूद इस नियुक्ति के लिए मुख्‍यमंत्री की अनिवार्य अनुमोदन की शर्त भी दरकिनार कर दी गयी।

इतना ही नहीं आयुष विभाग में घोंटी गयी भांग का असर यहां के कामकाज पर किस तरह हावी हो चुका है उसका नजीर है यह नियुक्ति। सूत्रों के अनुसार यह पूरा मामला विभाग में आला हाकिमों की ख्‍वाहिशों के मुताबिक ही किया गया है। हैरत की बात है कि जिसे नियुक्ति दी गई उसकी जांच चल रही है लेकिन विभाग ने उसे प्रधानाचार्य बना दिया और तो और इस नियुक्ति के लिए विभाग के लोगों ने मुख्यमंत्री से अनुमोदन तक नहीं कराया। सूत्र इसे अनियमित प्रक्रिया मानते हैं, उनका तर्क है कि यह एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसका दरकिनार कर दिया गया था।  हालत यह है कि इस नियुक्ति को लेकर आरोपों के घाव धड़कने लगे हैं कि इस मामले में जातिवाद का डमरू भी बज रहा है।

होम्‍योपैथिक विभाग से लेकर शिक्षकों तक में यह आरोप गूंज रहे हैं। कुछ शिक्षकों ने मेरी बिटिया संवाददाता को इस नियुक्ति पर एतराज जताते हुए बताया कि जब क्षैतिज आरक्षण की स्थिति है तो दो पद में 1 पद आरक्षित नहीं हो सकता। शिक्षकगण ने शासनादेश की संख्या 18-199 सा-दो 99- दिनांक 26 फरवरी 1999 का जिक्र करते हुए इस पदोन्नति को अवैधानिक मान रहे हैं।

आपको बता दें कि मूल शैक्षिक अनुभव प्रमाण पत्र ही ऐसे कुर्सी के लिए अनिवार्य होता है और जिस व्यक्ति को यस मेडिकल कॉलेज का प्रिंसिपल बताया गया है उसका अनुभव प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी है। इसका जिक्र होम्योपैथिक अधिकारी डॉ जयराम राय की रिपोर्ट में पहले ही स्पष्ट हो चुका है। इतना ही नहीं, इस मामले पर आश्वासन समिति के निर्देश पर एक जांच भी चल रही है जो विभाग के विशेष सचिव यतींद्र मोहन कर रहे हैं और इसमें जिस जिन जिन लोगों का नाम जांच के दायरे में है इस व्यक्ति का नंबर 22 बताया जाता है।

Page 9 of 704