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पूरे शहर में उसकी धाक थी, मगर चुनाव हार गया

: जन-सरोकारों से जुड़ कर अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करना, और पदार्थवादी चुनाव में जीतना अगल-अलग बात है : शहर छोटा सा सही, मगर बच्‍चों व अभिभावकों का लाडला था यह मेधावी युवक : हर शख्‍स तुम्‍हें बहादुर और परिश्रमी मानता है, लड़ जाओ चुनाव : जीत गया कुमार सौवीर -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह एक मेधावी, जुझारू और जन-समर्पित युवक की कहानी है। गरीब परिवार था, लेकिन इसके बावजूद गढ़वाल के श्रीनगर में रहने वाले इस युवक ने गणित से एमएससी किया था। नौकरी तो मिली नहीं, तो उसने ट्यूशन शुरू कर दिया। पूरे मोहल्‍ले में उसकी पढ़ाई की धाक हो गयी। आसपास के स्‍कूली-कालेज के छात्र उसके पास आने लगे। ज्‍यादातर गरीब परिवार के छात्र थे। उनकी ऐसी हैसियत नहीं थी कि वे पैसा दे सकते, उधर इस युवक को भी गरीबी की पीड़ा का खूब अहसास था। ऐसा में पढ़ाई होने लगी, ट्यूशन से पैसा आये या न आये। युवक के पास भीड़ लगने लगी। पूरे श्रीनगर में उसको सम्‍मान मिलने लगा। अधिकांश छात्र और उसके अभिभावक तक उसके चरण-स्‍पर्श कर अपना जीवन धन्‍य करने लगे।

परिवार में दायित्‍व बढ़ने लगे, तो इस युवक ने इधर-उधर हाथ संभावनाएं खोजना शुरू कर दिया। एक गम्‍भीर अभिभावक ने सलाह दी कि नौकरी नहीं है तो कोई बात नहीं। जब तक नहीं मिल पा रही है, तब तक ट्यूशन को व्‍यावसायिक तौर पर शुरू कर दो, लेकिन कट्टर के साथ। मगर युवक से यह नहीं हो पाया। उसके अपने आदर्श थे, और बेरोजगारी के दंश की अनुभूतियां भी। वैसे भी वह ज्ञान बांटने में विश्‍वास करता था, किसी कठोर साहूकार की तरह निर्मम उगाही नहीं। जिस में क्षमता हो, वह पैसा दे। और जिसके पास पैसा न हो, वह मुफ्त में पढ़े। यही फलसफा था उस युवक का। यह जानते-बूझते भी कि उसके इस संकल्‍प और आदर्श की आड़ में कई छात्र और अभिभावक ट्यूशन की फीस देने से कतराते हैं। लेकिन इससे क्‍या फर्क पड़ता है। जिसे जो करना हो, वह करता रहे। किसी की बेईमानी भरी हरकत से हम अपना विश्‍वास कैसे डिगा सकते हैं, यह साफ मानना था इस युवक का।

इसी बीच श्रीनगर नगर पालिका परिषद का चुनाव की तारीख घोषित हो गयीं। उसने तय किया कि वह इस बार चुनाव लड़ेगा, और अपना भविष्‍य राजनी‍ति में खोजेगा-खंगालेगा। साथियों से बातचीत की, ढांढस बढने लगा। लोग बोले कि तुम्‍हारे बारे में तो पूरे शहर को जानकारी है, हर शख्‍स तुम्‍हें बहुत बहादुर और परिश्रमी मानता है। ईमानदार हो, कलंक नहीं है, बिना पैसा लिये भी लोगों के बच्‍चों को पढ़ाते हो, और कमाल की पढ़ाई कराते हो। लड़ जाओ बेटा, लड़ जाओ। कूद पड़ो इस नये रणक्षेत्र में।

तो भइया, वह आदर्शवादी युवक चुनाव-समर में कूद पड़ा। डंका बज गया। जिससे भी पूछो, हर शख्‍स उसकी साख पर कासीदे काढ़ने लगा था। प्रचार जोरों पर चला, मगर बिना खर्चा के। युवक का साफ कहना था कि जब हमें कमीशन नहीं खाना है, घूस नहीं खानी है, तो हम अनावश्‍यक क्‍यों खर्चा करें। हमारी सारी पूंजी तो हमारी साख ही है, और इस बारे में हर शख्‍स को खूब जानकारी है, तारीफ होती है मेरे कामधाम की।

चुनाव हुआ। मतदान हुआ। मतगणना हुई। घोषणा भी हो गयी। और यह क्‍या, यह युवक बुरी तरह पराजित हुआ। बस चंद दर्जन वोट ही इस युवक को मिले। इसके बावजूद उसने पत्रकारिता का कोर्स किया, कुछ वक्‍त बाद उसे नौकरी भी मिल गयी।

कल तक गढ़वाल के श्रीनगर में अपनी चप्‍पल चटखाने वाला वह युवक आज झांसी विश्‍वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग का प्रमुख है। नाम है चंडीप्रसाद पैन्‍यूली। (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखाऊंगा, और उसकी व्‍याख्‍या भी करूंगा। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

हमारे चैनल का क्‍या हुआ, पूछा था अखिलेश ने

: ब्रजेश मिश्र के तलाक के बाद अब तक इद्दत की मियाद खत्‍म हो गयी, तो नेशनल वायस का नया तलाक-नामा तैयार हो गया : गजब खेल है कि पता ही नहीं चल पाता कि किसने कितनी रकम का भुगतान किया, शर्तें भी खामोश : सवाल यह है कि अब बिजेंदर सिंह का अगला हाथ क्‍या होगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक भारी रकम अदा करने के बाद यह चैनल विजेंद्र के हाथ से निकलकर बृजेश मिश्रा के पास पहुंच गया। कामधाम अब धूमधाम से शुरू हुआ। अपनी स्टाइल वाले और सच बेचते नारे के साथ बृजेश की फोटो प्रदेश भर की सड़क से लेकर रेलवे स्टेशन बस अड्डा और एयरपोर्ट तक लग गई जिसमें बृजेश की फोटो के साथ आक्रामक का अंदाज नेशनल वायस के भोपू बने दिख रहे थे। लेकिन 3 महीने में ही बृजेश को पता चल गया कि उनके साथ धोखा हुआ। पता चला इस डील में बिजेंदर ने नेशनल वायस के नाम पर एक टोपा जैसा भोंपू थमा दिया है। पहली बार बृजेश को गच्चा मिला, और भारी रकम का धक्का बृजेश मिश्रा पर पड़ गया। इतना ही नहीं, ब्रजेश को यह भी पता चल गया कि अगर उन्होंने तत्काल इस डील को खारिज नहीं किया तो उनके कैरियर पर गहरा दाग पड़ जाएगा। जिसमें उनका भविष्य भी तबाह हो जाएगा।

यह समझते ही बृजेश ने नेशनल वॉइस से अपना पिंड छुड़ाया और एक नया चैनल शुरू कर दिया। नाम रखा भारत समाचार। गनीमत है कि प्रयोगधर्मी बृजेश मिश्रा फिलहाल इस नए भारत समाचार न्यूज़ चैनल की परफॉर्मेंस से संतुष्ट हैं। यह चैनल उनकी उम्मीदों पर फिलहाल ठीकठाक चल रहा है। लेकिन यह तो पता नहीं है कि इस नई डील का एक किस करवट बैठा था और उसने कितना भुगतान किसको किसने किया लेकिन यह तो तय हो ही गया कि विजेंदर सिंह को उनका यह चैनल वापस मिल गया।

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पत्रकार पत्रकारिता

लेकिन अब साल भर बाद फिर संकट उठ गया है नेशनल वॉइस को लेकर। पता चला है कि विजेंद्र सिंह ने  यह चैनल किसी दूसरे को थमा दिया है और उससे उसके एवज में सारी रकम अदा हो गई। लेकिन यह रकम कितनी है पता नहीं चल पा रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि इसमें लेनदेन भारी-भरकम हुआ है।

सूत्र बताते हैं यह डील समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता ने की है। यह नेता समाजवादी पार्टी की पिछली अखिलेश सरकार में दौरान ही राजनीति में जन्‍मा था,  और जाहिर है कि सपा में वह नवोदित नेता है। इसका श्रीचरण समाजवादी पार्टी में घुसा था इस नेता के पिता एक बड़े नौकरशाह बताये जाते हैं। जिनकी करीबी समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ थी।

कहने की जरूरत नहीं जिन हालातों में नेशनल वॉइस का अंदाज यूपी की खबरें की टोन और उनके तेवर में बदलाव कैसा रखेगा। क्‍योंकि उसके नए खरीददार समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता हैं इसलिए इस चैनल की आवाज नेशनल वॉइस के बजाय समाजवादी वॉइस या बीजेपी-विरोधी वॉइस के तौर पर ज्यादा प्रभावी हो सकती है। एक सूत्र ने बताया कि इस नए चैनल की इस रिलांचिंग की रूपरेखा के पहले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने एक कार्यक्रम में एक बार चर्चा भी करते हुए सवाल उठा दिया था कि हम लोगों का चैनल कब लांच होगा। ( क्रमश: )

किसी बड़े खेल के मैदान में दर्जनों खिलाडि़यों के बीच बार-बार पर लात खाने पर अभिशप्‍त हो चुका है यूपी का पहला न्‍यूज चैनल नेशनल वायस। खबरों की दुनिया में शायद इतनी बदतरीन किस्‍मत किसी भी चैनल की नहीं रही होगी, जितनी इस नेशनल वायस की हुई है। बार-बार निकाह, और फिर बार-बार मुताह। गजब छीछालेदर फैल रही है इस चैनल में।

यह श्रंखलाबद्ध रिपोर्ट है। इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नेशनल वायस चैनल का नया मुताह


"नेशनल वायस" चैनल का नया भतार, शैली मुताह सी

: जन्‍म से पहले ही बेहद कुपोषित और शायद गुणसूत्र की गड़बड़ी से डगमगाता रहा है यह न्‍यूज चैनल : अब तक तीन बार बिक्री हो चुकी इस चैनल की, चटखारों में यह गंठबंधन मुताह की शैली में चलेगा क्‍या : पांच महीने के संबंध के बाद ब्रजेश मिश्र ने हाल ही इस चैनल को तलाक दिया था :

कुमार सौवीर

लखनऊ : अपने जन्म से ही बुरी तरह कुपोषित और गंभीर संक्रमणों में फंसे रहे नेशनल वायस नाम के न्‍यूज चैनल की हालत मुताह-निकाह तक सिमट गयी है। खबर है कि इस चैनल को अब फिर एक नया भरतार मिल गया है। खबर है इस बार नया निकाह पिछली सरकार में एक बड़े हाई-फाई नेता के घर हुआ है। वैसे यह तो पता नहीं चल पाया है कि इस नये चैनल ने निकाह के लिए कितना मैहर तय कुबूल किया है, लेकिन इतना जरूर है एक बड़ी मोटी डील जरूर हो गई है।

अब आप सुन लीजिए किस्सा। मेरठ से लेकर अपना झंडा उठाने वाले विजेंद्र सिंह ने अपने धंदे की शुरुआत एक मोबाइल फोन कंपनी से दी थी। साथ ही साथ विजेंद्र ने इलेक्ट्रॉनिक चैनल के लिए घर-घर कनेक्शन खींचने वाली कंपनी में भी हिस्सेदारी ली। दरअसल, यह पता चल गया था कि किसी दीगर धंधे से बेहतर धंधा तो न्‍यूज चैनल का होता है, जहां किसी दूसरे धंधे से ज्यादा पैसा तो उसे चैनलों के खबरों को बेचकर किया जा सकता है। ऐसे में बिजेंद्र सिंह ने एक नया चैनल लांच कर दिया और उसका नाम रखा नेशनल वायस।

शुरूआत में तो छह महीने तक तो यह चैनल ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन उसके बाद ही उसे पता चल गया उसका यह इस चैनल पर राहु-केतु की टेढी नजर है, और इसीलिए वह अपने जन्म से पहले यानी भ्रूण अवस्था से ही काफी कुपोषित था या फिर उसके डीएनए में ही कुछ गड़बड़ घुस गयी थी। सूत्र बताते हैं क‍ि जल्‍दी ही आर्थिक संकट बहुत खराब होने लगे। कर्मचारियों को वेतन भुगतान का भी गंभीर संकट आ गया। चैनल के दीगर खर्चे भी सुरसा की तरह भयावह मुंह खोलने लगे थे।

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पत्रकार पत्रकारिता

इसी बीच ईटीवी लखनऊ में रहे संपादक बृजेश मिश्र ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। ब्रजेश लखनऊ छोड़ना नहीं चाहते थे और लखनऊ में कोई समुचित नौकरी की संभावनाएं लगातार सिकुड़ती जा रही थीं। ऐसे में ब्रजेश मिश्र ने तय किया था कि वह अब नौकरी नहीं करेंगे। लेकिन फिर क्या करेंगे, यह सवाल उन्हें परेशान कर रहा था। ऐसे में उन्होंने किया कि वह अपना खुद का चैनल शुरू करेंगे।

लेकिन यह योजना खासी दिक्कत तलब थी, झंझट भी बेहिसाब थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि नया चैनल शुरू करने से मैं काफी समय लग सकता था। चुनाव सिर पर थे, और ब्रजेश की प्‍लानिंग चुनाव से ही पहले अपने को लांच कर देना था। ऐसे में बृजेश ने तय किया कि किसी गरजू को दबोचा जाए। सामने खड़े दिख गए विजेंदर सिंह जो पहले से ही अपना कटोरा लिए बैठे थे। बातचीत शुरू हुई, दोनों ही लोग इसमें भागीदारी पर सहमत हो गये। ( क्रमश: )

किसी बड़े खेल के मैदान में दर्जनों खिलाडि़यों के बीच बार-बार पर लात खाने पर अभिशप्‍त हो चुका है यूपी का पहला न्‍यूज चैनल नेशनल वायस। खबरों की दुनिया में शायद इतनी बदतरीन किस्‍मत किसी भी चैनल की नहीं रही होगी, जितनी इस नेशनल वायस की हुई है। बार-बार निकाह, और फिर बार-बार मुताह। गजब छीछालेदर फैल रही है इस चैनल में।

यह श्रंखलाबद्ध रिपोर्ट है। इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नेशनल वायस चैनल का नया मुताह

इसे पहचानो, जिसने पत्रकार-साथी की मौत बेच डाली

: साथी पत्रकार की मौत के नाम पर इस बड़े पत्रकार ने मोटा माल उगाहा है : शिक्षा समेत कई विभागों और अफसरों से मदद के लिए गुहार लगायी थी, और रकम लेकर रफूचक्‍कर हो गया : पत्रकार संघ ने भी ठोस मदद नहीं, सिर्फ श्रद्धांजलि-समारोह कर अनुष्‍ठान सम्‍पन्‍न करा दिया :

मेरी बिटिया संवाददाता

जौनपुर : आपको याद होगा कि कुछ महीना पहले जौनपुर के एक पत्रकार की मौत हो गई थी। सड़क दुर्घटना में। इतनी गंभीर चोटें आई कि मौके पर ही उसने दम तोड़ दिया। अस्पताल तक जाने की नौबत ही नहीं आएगी। इस पत्रकार का नाम था यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज"।

इस पत्रकार की मौत पर जाहिर है कि पत्रकार बिरादरी काफी दुखी थी। उसके असमय काल कलवित होने की घटना के बाद पत्रकार बिरादरी ने अपनी शोक श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पत्रकार संघ भवन पर एक बैठक बुलाई थी। सभी दुखी थे। सभी ने यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" को याद किया और उससे जुड़ी अपनी यादें साझा किया। बैठक में पत्रकारों ने तय किया कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के शोक संतप्त परिवारीजनों को आर्थिक सहायता दिलाने के लिए सरकार से अपील की। इस बारे में तय किया गया कि संघ के लोग एक अर्जी मुख्यमंत्री कोष से आर्थिक सहायता हासिल करने के लिए भेजेंगे। अब उस अर्जी का क्या हुआ इस बारे में तो किसी को कोई अता पता ही नहीं, लेकिन लोग कहते हैं कि संघ के महामंत्री ने यह अर्जी लिखने का वायदा किया था और जिसे संघ अध्यक्ष के हस्ताक्षर से लखनऊ भेजने की बात की गई थी। इतना ही नहीं, उस आर्थिक सहायता देने वाली अर्जी के साथ जौनपुर के बड़े भाजपाई, नेताओं, विधायक, मंत्रियों के साथ ही साथ जिला प्रशासन के लोगों को भी अग्रसारित करा कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भेजने की बात हुई थी। लेकिन अब तक यह पता नहीं पाया कि ऐसा हुआ या नहीं।

मगर इतना जरूर हो गया यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत कुछ निकृष्ट पत्रकार की मुट्ठी गरम कर गई, यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के घर का चूल्‍हा भले ही ठण्‍डा पड़ा हो, लेकिन इस निकृष्‍ट पत्रकार के घर नोटों की बारिश हो गई। और इस तरह मनोज दुबे की मौत इस निकृष्‍ट पत्रकार के घर खुशाली की बयार ले आई। कई दिनों तक मौज ही मौज मनाया इस पत्रकार और उसके परिवार ने।

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पत्रकार पत्रकारिता

विश्‍स्‍त सूत्रों के अनुसार मामला है बड़ा संगीन। हुआ यह इस बड़बोले पत्रकार ने जिले के कुछ दफ्तरों और अफसरों के पास जाकर यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत पर खूब आंसू बहाए थे और यह कहा था कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" चूंकि ईमानदार पत्रकार-सेनानी था इसलिए उसके शोक संतप्त परिवारीजनों को कुछ आर्थिक सहयोग जरूर दिया जाना चाहिए। निजी तौर पर कुछ अफसरों ने क्या लेनदेन किया, इसका तो कोई पुख्ता खबर नहीं है लेकिन शिक्षा विभाग के एक दफ्तर में यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत उस पत्रकार के घर छप्पर फाड़ के खुशहाली हो गयी।

सूत्र बताते हैं कि खुद को बड़ा पत्रकार कहलाने वाले इस शख्‍स ने इस बड़ा दार्शनिक अंदाज में तमाम घडि़याली आंसू बहाते हुए आर्त स्वर में अपील की थी कि मृत यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के परिवार का सहयोग करना मानवता ही नहीं, बल्कि पत्रकार हित और उनके ईमानदार सेनानियों को भी बल भी देगा। इसके लिए उस पत्रकार ने चंदा भी जुटाया। बताते हैं कि एक दिन के भीतर केवल अकेले एक दफ्तर से 25000 रूपयों से ज्‍यादा की कर ली थी। इस ववरिष्ठ पत्रकार तो दूर, कुछ अन्‍य हवा-हवाई पत्रकारों ने भी अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों से यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के घरवालों के नाम पर भारी पैसा उगाया था।

गौरतलब बात यह है कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के परिवारी जनों तक इन दफ्तरों या व्यक्तियों से जुटायी गई रकम का एक धेला तक नहीं पहुंचा।

हाईकोर्ट में फिर गरमाने लगी है महाभियोग-कव्‍वाली

: अनियमित सुनवाई के मामले में पिछले तीन महीना से जबरन अवकाश पर बैठे हैं जस्टिस एसएन शुक्‍ल : दीपक मिश्र ने शुक्‍ला पर महाभियोग चलाने की सिफारिश केंद्र सरकार को उसी वक्‍त कर दी थी : सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश पर छिड़े हंगामे से लटक गया था शुक्‍ला वाला मामला, खबर कि शुक्‍ला ने छुट्टी की अर्जी दी है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : महाभियोग को लेकर पूरे देश में खूब जमकर हुई थी नौटंकी। देश के सर्वोच्च न्यायाधीश दीपक मिश्रा को येन-केन-प्रकारेण कुर्सी से खींच कर नीचे उतार देने वाली कव्वाली को लेकर भले ही अब चर्चाएं और विवाद खड़े हो गए हों लेकिन इस प्रक्रिया में एक जज पर महाभियोग चलाने का मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है। अब तो यहां तक हालत हो गई है कि इस जज को कब तक नौकरी पर बनाए रखा जाएगा, यह सवाल फिर से सिर उठाने लगा है। हालत यह है कि इस जस्टिस के पास कोई काम-धाम भी नहीं रह गया है, और दूसरी ओर गौरतलब बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्देशों के तहत इस जस्टिस को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था।

इस जज का नाम है जस्टिस एसएन शुक्ला। शुक्‍ला जी पिछले कई दिनों से न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि किसी भी गांव, कस्बे के मोहल्ले-नुक्कड़ पर भी खासे चटखारे की तरह इस्‍तेमाल किये जाने लगे हैं। जातिगत आधारों को लेकर भी जबर्दस्‍त उठापटक चल रही है। वकील तो सीधे-सीधे तौर पर दो-फाड़ हैं, या फिर वे लखनऊ के वकील हों, या फिर इलाहाबाद के। अन्‍य प्रदेशों में भी शुक्‍ल जी का नाम खासा गरमी दे देता है। फिलहाल हालत तो यह है कि देश के सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश दीपक मिश्रा और एसएन शुक्ला के साथ ही साथ कुद्दूसी की चर्चाएं भी खूब चल रही हैं। बहुत दूर क्यों जाते हैं, यूपी में खनन माफिया के तौर पर अपनी ख्याति जमा चुके समाजवादी पार्टी के मंत्री और अकूत संपत्ति के मालिक बन चुके दो-कौड़ी के गायत्री प्रजापति को जमानत देने के मामले में लखनऊ के पाक्सो जज ओपी मिश्रा जैसे न्‍यायाधीश भी अपनी नौकरी और अपने नाम-प्रतिष्‍ठा तक को अदालत-परिसरों में पोंछा लगाने लायक बन चुके हैं।

आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद जस्टिस एस एन शुक्ला ने जो फैसले सुना दिया वह अपने आप में बेहद आश्चर्यजनक और अदालतों में चल रहे गंभीर अराजकता का एक बड़ा नमूना है जहां न्याय की बिक्री ठीक इसी तरीके से हो जाती है जैसे मध्य युगीन समाज में मानव मंडी। जिसके पास पैसा है आज वह कुछ भी खरीद सकता है। कम से कम जस्टिस शुक्ला और ओपी मिश्रा जैसे जजों ने उसे चरितार्थ कर दिया था। अरूणाचल के पूर्व मुख्‍यमंत्री कलिखो पुल ने वहां के मुख्‍यमंत्री पद रहते हुए भी जिस तरह आत्‍महत्‍या कर ली थी, और उसके पहले 60 पन्‍ने का सुसाइड-नोट लिख कर देश की न्‍यायपालिका की चूलें हिला दी थी, वह बेशर्म न्‍यायपालिका की दिशा ही मजबूत कर रहा है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

इस मामले में हंगामा और गंभीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं। चर्चाओं के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के बड़े न्यायाधीश का प्रश्रय जस्टिस एसएन शुक्ला पर था। और जस्टिस शुक्ला द्वारा कुछ अभियुक्‍तों को जमानत देने का वह फैसला उस न्यायाधीश के संकेत पर ही किया गया था। कुछ भी हो, यह मामला खुला तो दीपक मिश्रा ने एसएन शुक्ला को न्यायकार्य से विरत करने का आदेश जारी कर दिया और उन्हें फोर्स-लीव यानी जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया। पिछले करीब 3 महीनों से ऐसे ही शुक्ला ऐसे जबरन अवकाश पर हैं। मतलब यह कि उन्हें वेतन और सुविधाएं तो दी जा रही हैं। मगर कोई भी फाइल उनके पास नहीं पहुंच रही है। सही शब्दों में कहें तो एक एस एन शुक्ला फिलहाल एक ढक्कन की तरह है बनकर रह गए, जिनकी कोई भी उपयोगिता हाईकोर्ट को नहीं बच पायी।

आश्चर्य की बात है कि ऐसे माहौल में कि जब अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है और उस के मुकाबले जजों की संख्या न्यूनतम है, ऐसी हालत में लंबे समय तक जज को खाली पर बैठाना बेहद दुखद हालातों का परिचायक होता है। अगर न्याय प्रशासन ने यह फैसला किया था कि किसी जज को जबरन छुट्टी पर भेजा जाएगा या उसे महाभियोग के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा तो फिर उस महाभियोग कार्रवाई को अब तक क्यों नहीं क्रियान्वित किया गया। क्या वजह है कि पिछले कई महीनों से ऐसे ही शुक्ला का मामला दिल्ली की सत्ता गलियारों में दबाए बैठा है और सरकार न तो नए जजों की भर्ती कर रही है और नहीं महाभियोग चलाने का कोई फैसला ही कर पा रही है।

इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ यह आया है कि एसएन शुक्ला ने अपनी छुट्टी की अर्जी और बढ़ा दी है। विश्‍वस्‍त सूत्र बताते हैं कि शुक्ला ने अपनी छुट्टी की अवधि और बढ़ाने की दरख्‍वास्त चीफ जस्टिस को भेज दी है। लेकिन न्याय प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि न्याय प्रशासन इस मामले में जस्टिस शुक्ला को अब अधिक छुट्टी देने के पक्ष में नहीं है।

कुछ भी हो यह हालत बेहद गंभीर और दयनीय भी है।

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लर्नेड वकील साहब

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