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अभ्‍यर्थी कुढ़न में, अफसर बदला लेने और सरकार मौज में

: जब जब पांव पड़े हैं संतन के, तब तब हुआ है बंटाधार : सीबीआई जांच से क्षुब्ध लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष छात्रों से बदला लेने पर आमादा : गलत प्रश्‍न-उत्‍तर तैयार करने वाले विशेषज्ञों पर कोई भी कार्रवाई नहीं, थोप दी परीक्षाएं :

अवनीश पाण्‍डेय

इलाहाबाद : लोक सेवा आयोग के पूर्व तथा वर्तमान अध्यक्ष सीबीआई जांच के दायरे में हैं। परीक्षा समिति के अध्यक्ष तथा सदस्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य ही होते हैं, जब प्रतियोगी छात्रों को लोक सेवा आयोग की शुचिता तथा निष्ठा पर से विश्वास ही समाप्त हो गया है। तथा इस तथ्य से अवगत होकर ही राज्य सरकार सीबीआई जांच करा रही है फिर इनके रहते शुचिता पूर्ण परीक्षा कैसे संभव है।

लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित पीसीएस 2016 की मुख्य परीक्षा सितम्बर 2016 में हुई थी। जिसका परिणाम अभी तक नहीं आया है। हालत यह है कि इस परीक्षा में गलत प्रश्नों तथा गलत उत्तर को खासा विवाद खड़ा हो चुका है। परीक्षार्थी बेहाल हैं, और दौड़-भाग में जुटे हैं ताकि कोई रास्‍ता निकल पाये, सरकार और आयोग के कानों पर जूं रेंग सके। लेकिन सरकार को अपनी राजनीतिक शतरंत की गोटियों को बिछाने और हटाने से ही फुरसत नहीं है। मजा ले रहा है लोक सेवा आयोग, ताकि जितना भी हो सके, मामले को और भी ज्‍यादा लटकाया जा सके। उसका मकसद इस परीक्षा के विवाद का निस्तारण करने नहीं, बल्कि उसे लम्बित रखना ही है।

यदि PCS 2016 के परिणाम आने के बाद PCS 2017 की परीक्षा होती हो उन बेरोजगार युवकों को नौकरी का अवसर प्राप्त होता जो अभी तक बेरोजगार हैं । दोनों मुख्य परीक्षा में हजार से अधिक कामन छात्र हैं और नौकरी में हैं । लोक सेवा आयोग प्रत्येक PCS की प्रारम्भिक परीक्षा में 10 से 12 गलत प्रश्न रखता रहा है इस बार भी यही किया है । मामला कोर्ट में गया है, कोर्ट को भी यह समझने की आवश्यकता है कि प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित संस्था से बार बार यह लगती क्यों हो रही है ? सही तो यह है कि न्यायालय को आयोग के प्रश्न बनाने वाले तथा उत्तर बनाने वाले एक्सपर्ट के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करनी चाहिए ताकि इसकी पुनरावृत्ति न हो ।

गड़बडि़यां तब से शुरू होने लगीं, जब से लोक सेवा आयोग में अनिल यादव का अध्यक्ष पद पर पदार्पण हुआ। उनकी करतूतों के चलते ही प्रतियोगी छात्रों को एक महीने का भी समय मुख्य परीक्षा हेतु नही मिला, और हालत आज भी सुधरने के बजाय लगातार बदतर ही होती जा रही है। मुख्य परीक्षा में 2 विषय के चार पेपर, सामान्य अध्ययन के दो पेपर, सामान्य हिंदी तथा निबन्ध के पेपर होते हैं, आखिर 20 दिन में छात्र कैसे कर सकता है तैयारी। सरकार बदलने के बाद यह उम्मीद जगी थी न्याय मिलेगा किन्तु आयोग की मनमानी आज भी उसी तरह जारी है जैसे पूर्व सरकार में जारी थी ।

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बदहाल है यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली फैक्‍ट्री

एक प्रकार से लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य छात्रों से सीबीआई जाँच का बदला ले रहे हैं तथा सरकार बेबस दिख रही है।

सरकार से अनुरोध है कि पहले भष्ट अध्यक्ष/सदस्यों को उनके पद से हटाए, उसके बाद ही कोई परीक्षा सम्पन्न कराए । यह सम्भव है कि सरकार जल्दी भर्ती चाहती हो तो इसका विकल्प है कि 2 वर्ष के लिए लोक सेवा आयोग उत्तर प्रदेश की सभी परिक्षाओं को सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी संघ लोक सेवा आयोग को सौंप दें । संविधान में यह प्रावधान है कि केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार की संस्तुति पर किसी भी लोक सेवा आयोग की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग को दी जा सकती है ।

यह माँग उन छात्रों की है जिन्होंने पूर्ववर्ती सरकार के विरुद्ध आवाज उठाई, 48 बार लाठी खाये, 3 बार गोली चली, सैकड़ो छात्र जेल गए यहां तक कि छात्रों को 5 हजार का इनामी अपराधी तक घोषित किया गया। सरकार बदले इस उम्मीद से की वर्तमान सरकार में उनके जायज मांग को सुना जाएगा लेकिन 2 लाख ट्वीट लाखों मेल के बाद भी सरकार के कोई निर्णय न लेने पर छात्रों में वर्तमान सरकार के प्रति भी आक्रोश व्याप्त हो रहा है।

सपाई बीन पर जोगी सरकार के खर्राटे: लोकसेवा आयोग

: पूरे यूपी में हंगामा, मगर सरकार और जनप्रतिनिधि अलमस्‍त : अकर्मण्‍य आयोग के सपाई अध्‍यक्ष पर कोई भी कार्रवाई नहीं : दो पीसीएस परीक्षाओं का परिणाम की चाभी त्रिवेणी में फेंकी : यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली फैक्‍ट्री ही नहीं, लाखों युवाओं का भविष्‍य भी धूमिल :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इससे बेहतर तो अखिलेश यादव थे। अखिलेश ने अनिल यादव को भले ही रेवड़ी की तरह यूपी लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष की कुर्सी थमा दी थी। लेकिन जैसे ही अदालत ने अनिल यादव पर कड़ी प्रतिक्रिया की, अखिलेश ने अदालत का सम्‍मान किया और बिना किसी चीं-चुपड़ के ही अनिल यादव को विदा कर दिया। भले ही अगला अध्‍यक्ष अनिरूद्ध यादव भी अखिलेश यादव का ही खासमखास निकला। लेकिन इसके बावजूद ताश की गड्डी फेंटने में जो साफगोई अखिलेश यादव ने दिखायी, वह बेमिसाल रही।

लेकिन अब हालत यह है कि आयोग की काहिली, नाकारापन के लिए जिम्‍मेदार अनिरूद्ध सिंह पर योगी सरकार चूं तक नहीं बोल पा रही है। पीसीएस की दो परीक्षाओं का परिणाम तक अनिरूद्ध सिंह नहीं घोषित कर पाये हैं, लेकिन आनन-फानन नयी परीक्षाओं की तारीख घोषित जरूर कर डाली। जाहिर है कि इससे सामान्‍य अ‍भ्‍यर्थियों का गुस्‍सा भड़क गया है। किसी भी सोशल साइट पर आप यूपी लोकसेवा आयोग की कार्यशैली पर तनिक भी कमेंट कर दीजिए, रोते-बिलखते युवक-युवतियां भरभरा कर वहीं पहुंच जाएंगे।

जरा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के इतिहास की हालिया हरकतों पर नजर डालिये, तो आपको साफ पता चल जाएगा कि आयोग में कार्यशैली और व्‍यवस्‍था के नाम पर केवल भ्रष्‍टाचार और बेईमानी ही रची-बसी रही है। पद बेचे-खरीदे गये हैं, परीक्षा-घोटाले भरमार हैं। जिसकी भी क्षमता होती है, वह अपने-अपनों के बच्‍चों के लिए मनचाहा पद लेकर भाग निकल जाते हैं। मोटी रकम की जरूरत होती है, या फिर राजनीतिक पहुंच। अखिलेश सरकार ने तो यहां बेईमानी की एक गजब दूकान खुलवा दी थी।

अभ्‍यर्थियों के लिए जूझने के मुताबिक आप गौर कीजिए कि 29 मार्च 2015 पीसीएस 2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर लीक होता है। छात्रों के उग्र आंदोलन के बाद प्रथम पाली का परीक्षा निरस्त किया गया और छात्रों के साथ गंदा मजाक किया गया। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता है। समीक्षा अधिकारी 2016 का पेपर भी लीक होता है जिसका जांच आज भी लंबित है और अभ्यर्थियों के अमूल्य समय को बर्बाद किया जा रहा है। यह सब एक सुनियोजित तरीके से होता रहा और भ्रष्टाचार का सिलसिला बढ़ता गया। हमारे नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता रहा सरकारें चुप थी और नौजवान परेशान था।

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बदहाल है यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली फैक्‍ट्री

यहां लोकतंत्र में लोक खत्म हो गया था। और तंत्र ही बचा था। इसकाउदाहरण उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध में उतरे लाखों प्रतियोगी छात्रों पर 48 बार लाठीचार्ज 7 बार फायरिंग वाटर कैनन,आंसू गैस के गोले छोड़े गए। प्रतियोगी छात्रों को जेल भेजा गया बात यहीं नहीं खत्म होती है। कई बार तो  छात्रों पर संगीन धाराएं लगाई गई। जैसे 7A /CLA गुंडा एक्ट। यहां तक कि कुछ छात्रों को 5000 का इनामी अपराधी तक घोषित कर दिया गया था। इस बात से उस समय में लोकतंत्र का अनुमान लगाया जा सकता है । लोक सेवा आयोग के भ्रष्टाचार को करीब से समझने और लिखने वाले इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्रा कहते हैं, आयोग में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था जब लागू हुआ तो छात्रों ने इसके खिलाफ आंदोलन किया बाद में आयोग ने इसे बदला तो भ्रष्टाचार खुलकर सामने आया।

बहरहाल, अनिल यादव के बदले गये, और उनकी जगह अनिरूद्ध बैठे। उसके बाद निष्क्रियता की भयावह हालत पैदा हो गयी। हैरत की बात है कि योगी के मुख्‍यमंत्री बनने के सवा बरस बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस आयोग पर कोई भी ध्‍यान नहीं दिया। एक बार भी सरकार ने यह नहीं सोचा कि यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली इस फैक्‍ट्री यानी यूपी लोक सेवा आयोग को चुस्‍त-दुरूस्‍त करना ही नहीं, बल्कि युवाओं में बढ़ती जा रही हताशा को दूर करने के लिए भी आयोग को सुधारना जरूरी है।

हालत यह है कि अपने भविष्‍य से भयभीत इन अभ्‍यर्थियों ने योगी सरकार पर ही लानत भेजना शुरू कर दिया है।

चौराहे पर पुलिस ने पीटा पत्रकारों को, चैनल पुक्‍क-पुक्‍क

: दोस्तों मुझे कवरेज़  के दौरान बुरी तरह पीटा गया, चिल्‍ला रहा है न्‍यूज नेशन का रिपोर्टर : सभी चैनलों ने मेरा साथ दिया, पर मेरा ही संस्थान भांग कर धड़ाम : क्‍या वाकई स्टिंगर-रिपोर्टर बिलकुल कुक्‍कुर होते हैं, आर्द्र स्‍वर में सवाल उछाल रहे हैं छोटे पत्रकार :

मेरी बिटिया संवाददाता

औरैया : अगर हम लोगो के साथ घटना होती तो अभी तक चैनल तहलका काट चुका होता। स्टिंगर भी इंसान होते है सर। आज जो मेरे साथ हुआ है कल और किसी स्टिंगर के साथ हो सकता है। पर क्या हम स्टिंगर तो कुकुर है। आपके लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया हमने। आपने जब हमें आपकी जरूरत थी, तो आपने मेरे साथ दूध की मक्‍खी से भी बदतर व्‍यवहार किया। हम गर्व से कहते रह हैं कि न्यूज नेशन न्‍यूज चैनल हमारा जीवन है, हमारी सांस है, हमारा लक्ष्‍य और हमारा उद्देश्‍य है। लेकिन हम सड़क पर पिटते रहे, मगर आपके चैनल से कोई भी हमारे पास नही आया मदद के लिए। इस लिए मैं आज न्यूज स्टेट न्यूज नेशन छोड़ रहा हूं। अगर स्टॉफर रिपोर्टर ही सब कुछ है तो स्टिंगर क्यों रक्‍खे जाते हैं। उलटा कानपुर नगर न्यूज के रिपोर्टर आये तो लेकिन हाल चाल पूछने की वजह जानने के बाद बोले: स्ट्रिंगर्स तो कुक्‍कुर होते हैं। मेहनत हम लोग करते हैं, स्टिंगर स्टॉफर क्या करते हैं। उनको तो पकी-पकाई मिलती है।

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बड़ा दारोगा

यह दर्द है न्‍यूज नेशन न्‍यूज चैनल के ओरैया के जिला रिपोर्टर का। मेरी बिटिया डॉट कॉम के साथ एक बातचीत में अश्विनि ने बताया कि आज मेडिकल के दौरान बहुत बुरा हुआ मेरे साथ। कोई गलती हुई होतो मुझे माफ़ करना।  मेरे सभी स्टिंगर भाइयो हमारे साथ क्या क्या हुआ इस वीडियो में देखियेगा। लेकिन आज भी मुझे मेरे संस्थान ने एक बार भी फ्लैश तक नही किया कि मैं पीटा गया हूं। क्योंकि मैं स्टिंगर हूं, कुक्‍कुर हूं न, इस लिए। आप लोगो का इतना प्यार मिला इस छोटे स्टिंगर को न्यूज नेशन की तरफ से अगर कोई गलती की हो तो माफ करना

दो पत्रकार पिट रहे थे, साहब (पुलिस) सो रहे थे !!!!

अगर आप खुद को पत्रकार मानते हैं.. तो ये वीडियो देखने के बाद आपका खून ज़रूर उबाल मारेगा। इससे संबंधित कहानी कुछ यूं है कि बीते शनिवार को औरेया जिले के 2 युवा पत्रकारों अश्वनी बाजपेयी (न्यूज़ नेशन/न्यूज़ स्टेट), अंजुमन तिवारी (चैनल वन) को पुलिस द्वारा ट्रकों से वसूली की जानकारी मिली। खबर बनाने के दौरान उन्होंने देखा कि देवकली चौकी प्रभारी मदन गुप्ता और उनके मातहत के संरक्षण में उक्त वसूली हो रही है। अभी यह लोग पूरे माहौल की रिपोर्टिंग कर रहे थे, कि अचानक करीब आधा दर्जन गुंडे पहुंचकर दोनों पत्रकारों पर ये कहते हुए जानलेवा हमला कर देते हैं। बोले, और बनाओ पुलिस के खिलाफ ख़बर।

हैरत है कि ये घटना देवकली पुलिस चौकी पर घटित हुई। घटना के बाद पीड़ित पत्रकार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। मुकदमा तो छोडिए, उनका मेडिकल अभी तक पुलिस ने नहीं करवाया। ऐसे में समझा जा सकता है कि छोटे जिलों के पत्रकारों का किस तरह शोषण होता है। वीडियो आपके सामने है...देखने वालों पर निर्भर है कि इसे कौन 'मजा' के तौर पर देखेगा और कौन  'सजा' के तौर पर। सोचिएगा... आज ये हैं.. कल हमारा नंबर भी आएगा!!!!

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पत्रकार पत्रकारिता

सोशल साइट्स? हा हा हा, योगीजी बहुत मजाक करते हैं

: दो दिन बचे हैं यूपी लोकसेवा आयोग की परीक्षाएं शुरू होने को, लेकिन सरकार खामोश : सवा दो लाख से ज्‍यादा अभ्‍यर्थियों ने अपनी पीड़ा मुख्‍यमंत्री तक ट्विेटर पर भेजी थी, जवाब धेला भर न आया : तनिक देखिये तो कि मेरी एक पोस्‍ट पर कितना विह्वल हो पड़े अभ्‍यर्थी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : उप्र लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं 18 जून से शुरू हो रही हैं। दावा किया जा रहा है कि सेवा आयोग प्रशासन इन परीक्षाओं को सुचारू संचालित कराने के लिए कमर कसे बैठा है। दावे हैं कि दिन रात काम चल रहा है। लेकिन ज्‍यों-ज्‍यों परीक्षाओं के दिन समीप आने लगे हैं, लाखों प्रत्‍याशियों के दिल त्‍यों-त्‍यों बुरी तरह धड़कने लगे हैं। वजह है लोकसेवा आयोग की पिछली पांच-छह बरसों में की गयीं जघन्‍य आपराधिक करतूतें, जिन्‍होंने लाखों परीक्षार्थियों का जीवन तबाह कर दिया।

हैरत की बात है कि सन-16 के पीसीएस की मुख्‍य परीक्षा का अब तक परिणाम सार्वजनिक कर पाने में लोक सेवा आयोग की अक्षमता। इतना ही नहीं, आयोग ने सन-17 की पीसीएस प्राथमिक परीक्षा में हुई गड़बडि़यों को दूर पाने में अपने हाथ खड़े कर दिये हैं। और इसके बावजूद आयोग ने पीसीएस की मुख्‍य परीक्षा की तारीख इकतरफा घोषित कर डाली। जाहिर है कि इससे अभ्‍यर्थियों में गुस्‍सा है। इसकी शिकायत इन परीक्षार्थियों ने हर मंच पर की है। लोक सेवा आयोग से लेकर राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री तक को इसकी खबर दी गयी। मगर कोई भी परिणाम नहीं निकला। शिकायतों पर कभी कान ही नहीं दिया गया।

मगर सबसे ज्‍यादा नाराजगी तो मुख्‍यमंत्री से है इन अ‍भ्‍यर्थियों को, जिन्‍होंने अब तक सवा दो लाख से ज्‍यादा शिकायतें मुख्‍यमंत्री के ट्विटर पर दर्ज की, लेकिन एक भी शिकायत का कोई भी जवाब मुख्‍यमंत्री कार्यालय से नहीं आया। न हां, न ही ना। न तो कोई आश्‍वासन मिला और न ही कोई दो-टूक जवाब। बुरी तरह आहत हैं यह युवक-युवतियां, जो सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए अपनी मेधा की परीक्षा देने पर तत्‍पर हैं। हमने देहरादून के एक पुलिस थाने पर पुलिस वालों की गुंडागर्दी की एक खबर लिखी, जिसमें उन्‍नाव की अपर जिला एवं सेशंस जज जया पाठक को भी पुलिसवालों ने प्रताडि़त किया था।

मी लॉर्ड! चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखो, छक्के छूट जाएंगे

हमने उस खबर का लिंक कई समूहों में डाला, तो प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति समूह के सदस्‍यों की पीड़ा बह निकली।

CHHATRA SANGHRSH SAMITI. : सर इस ग्रुप के छात्रों की पीड़ा मुख्यमंत्री तक पहुचाने में मदद करें , अब सिर्फ कुछ दिन शेष है ...18 जून से परीक्षा

Dhirendra Pratap Singh : तुम परीक्षा दो काहे इतना दिमाग लगा रहे हो

Dhirendra Pratap Singh : और सपोर्ट करो यौगिक को

Dhirendra Pratap Singh : सर प्रणाम , सपोर्ट तो अब नही होगा , सारी पार्टियां एक समान हैं ...

Mahendra Pratap Singh : मामा जी प्रणाम आप विगत दिनों की घटनाओं से अवगत होते हुए ऐसा कह रहे हैं परीक्षा तो हम लोग देना ही चाहते हैं पर इस प्रकार से नहीं आप जुलाई में कह कर जून में करा रहे हैं

Dhirendra Pratap Singh : सभी पार्टियां चोर हैं

Dhirendra Pratap Singh : हम तो पीड़ा समझ ही रहे हैं इसीलिए ना कह रहे हैं कि सब ध्यान हटा कर पढ़ाई पर मन लगाओ 4 दिन और बचा है बस

Mahendra Pratap Singh : सोशल मीडिया हब का उद्घाटन बड़े धूमधाम से सरकार कर रही है पर सोशल मीडिया हब पर लगभग सवा दो लाख ट्विटर प्रतियोगी छात्रों ने किए हैं पर सरकार की तरफ से एक भी जवाब नहीं आया ऐसे ही रहा तो हो गया इनका कल्याण

Dhirendra Pratap Singh : कल्याण तो होना ही है

Mahendra Pratap Singh : यही तो हम लोगों का दुर्भाग्य है

Pankaj Singh : सरजी प्रणाम। पी सी एस प्रतियोगीयो की मदद करें

Sandeep Dubey : सर अब तो लग रहा कोई रास्ता ही नही बचा है शासन के सभी स्तंम्भो तक ये बात पहुंच चुकी है न्यायपालिका की मर्जी का आभास तो हो ही गया है अब जो हो सकता है या होना है वह शासन स्तर से ही सम्भव है

Aditya Mohan Gupta : मदद करें श्रीमान।

Ravi SrivastavaRavi : We need your help Sir...

बधाई हो। तुम्हारे घर बाबू पैदा हुआ, इंसान नहीं

यूपी लोकसेवा आयोग अध्‍यक्ष पर लटकी इस्‍तीफे की तलवार, कुर्सी के लिए झौं-झौं शुरू

आयोग और उसके रिजल्‍ट का भरोसा नहीं, चली है अफसर बनने

प्रतिभागियों की लॉटरी निकालने वाले उप्र लोकसेवा आयोग पर शनि की साढ़े-साती

सिंहासन खाली करो, कि सीबीआई आती है

सेवा आयोग तक पहुंची सीबीआई, अनिल यादव की खैर नहीं

लोकसेवा आयोग में चौथे बर्खास्‍त अध्‍यक्ष हैं अनिल यादव

उप्र लोकसेवा आयोग: तीन सत्र शून्‍य, परीक्षा फिर टली

कुड़ुक हो गया है लोकसेवा आयोग, नौकरी नहीं देता

सलाम तुमको अवनीश पांडे, तुमको पीढ़ियां याद करेंगीं

सेवा आयोग: 40 हजार सीधी भर्तियों में खुली बेईमानी

सेवा आयोग: 40 हजार सीधी भर्तियों में खुली बेईमानी

सेवा आयोग: सीबीआई लाने वाले युवाओं के सपने भस्‍म

मी लॉर्ड! चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखो, छक्के छूट जाएंगे

: अपर जिला जज होना किसी मां के दायित्‍वों पर कैसे भारी पड़ सकता है मी-लॉर्डों, तुमको जरूर समझना चाहिए : किसी शेरनी के शावकों पर बुरी निगाह डाल कर देखिये तो, जवाब तत्‍काल मिल जाएगा : मीलार्ड ! आप क्या हैं? हर शख्‍स के पास आत्‍मरक्षा के विशेष अधिकार हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सोचता हूं कि कि सुना ही दूं चंद घटनाएं। शायद आपके काम भी आ जाए। तो जनाब, यह भले ही एक कोरी कल्‍पना भले ही हो, लेकिन आपको इससे इस घटना को समझने में मदद मिल सकती है। तो किस्‍सा-कोताह यह कि शेरनी का अपने सिंह-शावक के बीच एक अद्भुत प्रेम-नेह संबंध होता था। एक दिन मैंने देखा कि एक शेरनी अपने इकलौते सिंह-शावक के साथ घूम रही थी। अचानक किन्हीं वजहों से शेरनी अपने शावक से थोड़ा दूर हटी, तो कुछ दो-कौड़ी के नीच लकड़बग्घों ने उसके शावक पर हमला कर दिया। शावक की चीखें घुटी-घुटी थी, बिल्कुल मरणासन्न। जैसे उसकी बोटियों नोच रहे हों लकड़बग्घे। शेरनी को कुछ समझ नहीं आया।  मगर उसे अपनी छठी इंद्री से इतना जरूर एहसास हो गया कि उसके प्राणों से भी प्‍यारा शावक मुसीबत में है और हमलावरों के चुंगल में है।

व्याकुल शेरनी बदहवास हो गई। बिना कुछ सोचे समझे उसने अपने शावक की ओर छलांग लगा दी और पहुंच गई अपने शावक के पास, जिसकी बोटियों कुछ दरिंदे लकड़बग्‍घे  नोच रहे थे। शेरनी ने दिखा कि वह उन लकड़बग्घा से अकेले मुकाबला नहीं कर सकती, लेकिन इसके बावजूद वह टूट पड़ी एक लकड़बग्घे पर जो उस शेरनी पर चिढ़ा रहा था। शेरनी तानकर अपना पंजा निकाला और सीधे उस लकड़बग्घे के चेहरे पर दे मारा। शेरनी ने इस हस्तक्षेप से शिकारे लकड़बग्घे अपने पिछवाड़े में अपने पूंछ दबाकर भाग निकले।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

कहानी इससे भी आगे भयावह है। लेकिन फिलहाल, इतना समझ लीजिए कि वह सिंह-शावक कोई शेर-बच्चा नहीं था बल्कि एक 20 बरस का एक छात्र था जो अपना भविष्य विधि-जगत में बनाना चाहता था। और अपने इसी संकल्प के तहत उसने देहरादून की पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी में एडमिशन किया था। इस हमले के दौरान उसका यह इस यूनिवर्सिटी में तीसरा बरस था। सिंह-शावक पर हमला करने वाले लोग लकड़बग्घे नहीं थे, बल्कि शायद उनसे भी क्रूर, निर्मम और अमानवीय जानवरों का झुंड थे जिन्‍होंने देहरादून के एक थाने पर अड्डा जमा लिया था। और आखिरी बात है कि वह शेरनी दरअसल एक जीता-जागता इंसान थी। बल्कि इस से भी बेहतर कहें तो वह एक जिद भी थी। ऐसी नैसर्गिक जिद, जिसमें न्याय के प्रति समर्पण की भावनाएं कूट-कूट कर भरी हुई थीं। और सर्वोच्‍च बात यह कि वह जिद एक मां थी, उसमें भरा मातृत्व थी।

इस शेरनीनुमा मां के सिंह-शावकनुमा विधिशास्त्र के छात्र बच्चे पर देहरादून के लकड़बग्घा पुलिसवालों ने जितना अपमान हो सकता था, किया। इस बच्चे को उसके हॉस्टल में घुसकर पीटा गया। उसको किसी को कुख्यात अपराधी की तरह पुलिस जीप में ठूंस कर मां-बहन की गाली दी। यह पुलिसवाले पूरे यूनिवर्सिटी में जुलूस निकालते रहे और आखिर में पुलिस थाने पर पहुंचकर उसे सरेआम उस बच्चे की मां के सामने मां-बहन-बेटी की अश्‍लील गालियां देते रहे।

अब आप बताइए कि आप अगर उस समय मां होते और आपका बच्चा कुछ लकड़बग्घों के चंगुल में फंसा होता तो आप क्या करते हैं ? शायद मैं आपको नहीं समझा पा रहा हूं कि उस वक्‍त आप अगर होते तो क्‍या करते। लेकिन इतना जरूर है कि अगर मैं उस बच्‍चे की मां की भूमिका में वहां मौजूद होता, तो मैं क्या करता।  सुनिये, मैं बताता हूं आपको, कि मैं अपना पूरा ध्यान अपने बच्चे को बचाने पर लगाता और मेरे बच्चे के हमलावरों से जूझ पड़ता। उस वक्‍त मैं केवल मां होता, जो अपने नैसर्गिक न्‍याय की भावना से ओतप्रोत होता। जूझ जाता उन लकड़बग्घों से जो हमारे बच्चे की बोटियों पर निशाना लगा रहे होते, नोंच रहे होते या फिर अपनी लकड़बग्घा स्टाइल में उसका मजाक उड़ा रहे होते। मैं अपना पंजा उठाता और तान कर हमलावरों में से किसी न किसी के चेहरे पर रसीद कर देता।

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लर्नेड वकील साहब

खैर, अब आप बताइए कि ऐसी हालत में अगर आप होते तो क्या करते हैं? अपने कलेजे के टुकड़े को पिटते-गालियां खाते हुए चुपचाप खड़े रहते या फिर सीधे हस्तक्षेप कर देते। आप भी प्रतिरोध पर उतर आये, बिना सोचे-बिचारे के लकड़बग्‍घों के झुंड में आप बुरी तरह फंस सकते हैं। लेकिन उस समय आपको अपने नैसर्गिक और प्राकृतिक दायित्‍व निभाते, फिर भले ही आपकी जान या प्रतिष्‍ठा अथवा आजीविका चली जाती। आप सब कुछ भूल जाते और सिर्फ बच्‍चे को बचाने में अपना ध्‍यान देते।

आप बताइए ना, कि आप भी ऐसा ही करते ना?

वेरी गुड। लेकिन ठीक यही दायित्‍व तो जया पाठक ने भी किया। जया पाठक, यानी उस बच्चे की मां जो अपनी बच्‍चे के आर्तनाद सुनकर तत्‍काल मौके पर पहुंच गई और ठीक उसी मौके पर उसने हमलावर लोगों पर तमाचा जड़ दिया। भले ही उसके बाद वहां मौजूद उन सारे लकड़बग्घों के झुंड ने मिलकर उसका तियां-पांचा कर दिया। लेकिन कम से कम उस मां ने इतना तो जाहिर कर ही दिया कि उसके लिए अपनी जिंदगी बेकार है अगर वह अपने बच्चे की जिंदगी नहीं बचा सकती। न्‍याय भी तो यही कहता है न मी लॉर्ड।

अब आखिरी सवाल आप मीलार्ड लोगों से। मीलार्ड ! आप क्या हैं? माना कि आपके पास कुछ विशेष अधिकार हैं। लेकिन ठीक इसी तरीके से विशेष अधिकार तो एक मां के पास भी होते हैं ? यह बात भी छोड़ दीजिए तो सामान्‍य अधिकार तो उस बच्चे के पास भी थे। खैर, मुझे इतना तो बताइए क्या सामान्य नागरिक को अपनी बात कहने या बोलने या सुरक्षा करने का कोई अधिकार है या नहीं? आप तो मी लॉर्ड हैं, फैसला कीजिए न कि जया पाठक की जगह अगर आप उस बच्चे की मां होते, तो आप खुद क्या करते हैं? आईपीसी की धारा 96, 97 , 98 और उसके बाद की तत्‍सम्‍बन्‍धी धाराएं इसी जमीन पर कायम हैं मी लॉर्ड। और आपको यह सिखाने की जरूरत नहीं है कि कानून किताबों से नहीं, मानवीय व्‍यवहार पर तय होते हैं। इसीलिए बहस होती है, जहां एक ओर कट्टर कानून होते है, वहीं दूसरी ओर मानवता का समंदर। निष्‍ठुरता का नाम है कांक्रीट का मकान, जबकि उसमें मानवता, भावुकता और ममत्‍व-स्‍नेह बसता है।

तो मी लॉर्ड ! सिर्फ कानून मत बांचिये, चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखिये ? आपके छक्के न छूट जाएं, तो मेरा भी नाम कुमार सौवीर नहीं।

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी।

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

हाईकोर्ट: चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

देहरादून कांड में न्यायिक अधिकारी जया पाठक दोषी

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

जज पर दबाव : मामला गंभीर, दबाव तो पड़ता ही है

बरेली सीजेएम के घर झंझट, जमानत अर्जी खारिज

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