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मंडल-गिरोह ने महिलाओं का ब्रा-हनन कर डाला

: बेरोजगार होते ही दिलीप मंडल का सामने आ गया असली चेहरा : नये मुहावरे गढ़े गये हैं कि कर दी न,ब्राह्म्‍णों वाली बात, और नहाओ, धोओ। क्‍या ब्राह्मण की तरह मुंह बना रखा है : ब्राह्मण को नंगा करने के लिए जो प्रतीक गढ़े हैं इस गिरोह ने, उसका नाम रखा गया है ब्रा हनन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ब्राह्मण जब पतित होने लगता है तो अपने समुदाय के लिए भी कैंसर जैसा घाव पैदा कर देता है। ताजा नजीर हैं दिलीप मण्‍डल। अब यह तो पता नहीं है कि दिलीप मंडल जन्‍मना क्‍या थे, लेकिन इतना जरूर है कि उन्‍होंने शुरूआती जीवन में अध्‍ययन और ब्रह्म पर शोध किया और बाकायदा ब्राह्मण हो गये। तो, दिलीप जब तक पढ़ते-सोचते-लिखते रहे, तब वाकई ब्राह्मण ही थे। इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं में रहे, लेकिन अचानक पढ़ना-लिखना बंद हुआ तो सोचने का क्रमवार रसातल में रपटने-फिसलने लगा। नतीजा, इंडिया टुडे का साथ छूट गया। किसी और पत्रिकाओं ने उन्‍हें घास नहीं डाली। नतीजा, वैचारिक गंदगी में डुबकी लगाते हुए पूर्णकालिक मूर्खता में जुटे हैं।

आज उन्‍होंने कुछ नये मुहावरे गढ़े हैं। मसलन:-

कर दी न,ब्राह्म्‍णों वाली बात

नहाओ, धोओ। क्‍या ब्राह्मण की तरह मुंह बना रखा है।

ब्राह्मण का कुत्‍ता न घर का, न मंदिर का।

मार-मार कर ब्राह्मण बना दूंगा

ब्राह्मण की बुद्धि घुटने में होती है। वगैरह-वगैरह।

आज उनकी वाल पर उन्‍होंने और उनकी टोली ने ब्राह्मणों के खिलाफ एक नया शब्‍द गढ़ लिया है। ब्रा हनन। यानी स्‍तनों को नंगा कर देना।

आपको बता दें कि बौद्धिक चिंतन से जुड़े समुदाय में दिलीप मंडल का नाम एक घटिया सोच के तौर पर दर्ज है। वे समाज सुधार नहीं, समाज को सड़ा-गला डालने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने भावातिरेक में मंडल और उनके यार यह भूल गये हैं कि ब्रा तो अब हर जाति की महिलाएं पहनती हैं।

सच बात तो यही है कि इस सोच ने ब्राह्मण पर हमला किया है अथवा नहीं, लेकिन उनकी विष-बौछार सभी समुदाय और जाति की महिलाओं पर अनिवार्य रूप से पड़ी है। ऐसे मुहावरे गढ़ने वालों के घर में भी यही मुहावरा लागू हो सकता है, काश वे यह समझ सकते।

बहरहाल, इस घटना से इतना तो तय हो ही गया है कि जाति नजरिया से समाज सुधारने का दम्‍भ-घमंड पाले लोगों की मानसिकता महिलाओं पर स्‍नेहशील नहीं, आक्रामक और बलात्‍कारी ही होती है।

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर यानी पिघलना चट्टानों का

: वो दिन लद गए जब पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए मरने-जीने को तैयार रहते थे : प्रोफेशनल लाइफ के साथ पर्सनल लाइफ भी प्रैक्टिकल बना दिया लोगों ने : एक-दूसरे के इमोशन्स और फिलिंग से दूर : पत्नी की प्रेग्नेंसी के चलते सेक्सुअल डिज़ायर पूरी न होने से पुरुषों के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना बढ़ जाती है :

मोनिका जौहरी

मुम्‍बई : बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती आकांक्षाएं, उम्मीदें या विश्‍वास की कमज़ोर होती डोर… वजह चाहे जो भी हो, मगर ये सच है कि पिछले एक-डेढ़ दशक से हमारे देश में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के मामले बढ़े हैं.आख़िर क्यों लोगों को अपने घर के बाहर प्यार तलाशना पड़ रहा है, क्यों शादी का रिश्ता कमज़ोर होता जा रहा है ? आइये जानते है

दो तरह के होते हैं एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स :-विशेषज्ञों की मानें तो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर ख़ासकर दो तरह के होते हैं :-

पहला सेक्सुअल और दूसरा इमोशनल. सेक्सुअल एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में दो ऐसे लोग क़रीब आते हैं, जो अपने-अपने पार्टनर से संतुष्ट नहीं होते और अपनी सेक्सुअल डिज़ायर को पूरा करना चाहते हैं. इमोशनल एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर दो लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए क़रीब आते हैं. रिसर्च के अनुसार, अधिकांशतः महिलाएं इमोशनल अटैचमेंट यानी भावनात्मक ज़ुडाव के चलते एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की ओर क़दम बढ़ाती हैं जबकि पुरुष अक्सर सेक्सुअल डिज़ायर को पूरा करने के लिए.

कमज़ोर होते रिश्ते :-प्रोफेसर एवं काउंसलर रश्मि अग्निहोत्री के अनुसार, “वो दिन लद गए जब पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए मरने-जीने को तैयार रहते थे. आज रिश्तों की डोर कमज़ोर हो गई है. जिसे टूटने में पलभर का भी समय नहीं लगता. इसकी सबसे बड़ी वजह है प्यार में कमी. यंगस्टर्स प्यार से ज़्यादा अब अपने कंफर्ट को महत्व देने लगे हैं. वो जीवनसाथी का चुनाव इसलिए नहीं करते, क्योंकि वो उनसे प्यार करते हैं, बल्कि अपनी सहूलियत के लिए ऐसे जीवनसाथी का चुनाव करते हैं, जिनके साथ को नहीं, बल्कि जिनके साथ वो ज़िंदगी को एंजॉय कर सकें. ऐसे में जब रिश्ते की नींव ही कमज़ोर होती है, तो रिश्ता टूटने में देरी नहीं लगती.”

समय की कमी ने लाई प्यार में कमी :-रिसर्च के अनुसार, वर्क प्लेस पर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना अधिक होती है. आज मेट्रो सिटीज़ में अच्छी लाइफस्टाइल के लिए कपल्स ने ख़ुद को इस हद तक बिज़ी कर दिया है कि उनके पास घर-परिवार की छोड़िए, एक-दूसरे के लिए भी समय नहीं है. 8-10 घंटे की जॉब और ट्रैवलिंग में 1-2 घंटे बर्बाद करने के बाद वो इस क़दर थक जाते हैं कि एक-दूसरे से बात करने कि बजाय नींद की आगोश में जाना ज़्यादा पसंद करते हैं. नतीजतन दोनों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं और पार्टनर की प्यार की कमी की भरपाई के लिए वो बाहर प्यार तलाशने लगते हैं.

ज़रूरत से ज़्यादा प्रैक्टिकल होना :-सबसे आगे निकलने की होड़ और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने युवाओं बहुत कम उम्र में प्रैक्टिकल बना दिया है. प्रोफेशनल लाइफ के साथ-साथ वो अब अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में भी प्रैक्टिकल होकर सोचने लगे हैं. एक-दूसरे के इमोशन्स, फिलिंग आदि से उन्हें कोई ख़ास मतलब नहीं होता. ऐसे में ख़ुद को ख़ुश रखने के लिए वो प्रैक्टिकल तरी़के से सोचते हुए एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को ग़लत नहीं समझते.

स्ट्रेस कम करने के लिए भी रखते हैं अफेयर :-रिसर्च की मानें तो मेट्रो सिटीज़ में रहने वाले कपल्स हेक्टिक लाइफस्टाइल और स्ट्रेस को कम करने के लिए एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखते हैं. इस विषय में मनोवैज्ञानिक निमिषा रस्तोगी कहती हैं “वर्क प्लेस पर होने वाले एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की एक वजह स्ट्रेस भी है, जिससे छुटकारा पाने के लिए कुछ पाटर्नर अपने कलीग के साथ सेक्सुअल रिलेशन बनाते हैं. इससे उन्हें सुख का एहसास होता है और वो ख़ुद को संतुष्ट भी महसूस करते हैं. ऐसे लोग एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को ज़्यादा एंजॉय करते हैं, क्योंकि ऐसे अफेयर्स में पार्टनर के प्रति उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती है.”

ईगो भी है एक वजह :-जहां प्यार होता है, वहां अहंकार की कोई जगह नहीं होती, लेकिन आज कपल्स के बीच प्यार के लिए कोई जगह नहीं है, उनकी नज़र में ईगो ही सबसे बड़ा हो जाता है, जिसकी वजह से न वो पार्टनर के आगे कभी झुकते हैं और ना ही कभी आपसी सहमति से रिश्तों की नींव को मज़बूत बनाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन अहंकारवश हमसफ़र के आगे झुकने की बजाय वो किसी और से रिश्ता जोड़ना बेहतर समझते हैं.

एक्स्पर्ट स्पीक ( ताकि न आए ऐसी नौबत ) :-किसी ने सच ही कहा है ताली एक हाथ से नहीं बजती, अगर आप दोनों के बीच किसी तीसरे ने जगह ले ली है, तो इसका मतलब स़िर्फ ये नहीं कि आपका पार्टनर ही ग़लत है, हो सकता है कि कुछ कमी आपमें भी हो.अपनी शादी को एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से बचाने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें :-झगड़ा छोटा हो या बड़ा, एक-दूसरे से बातचीत बंद न करें, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करें और समस्या का हल ढूंढ़ें. वरना आपकी चुप्पी आपके रिश्ते में दरार डाल सकती है. न स़िर्फ शारीरिक संतुष्टि, बल्कि पार्टनर की मानसिक संतुष्टि का भी ख़्याल रखें, कई बार पार्टनर मानसिक सुख और सुकून की आस में भी किसी तीसरे की ओर क़दम बढ़ाते हैं, ख़ासकर महिलाएं.

घर या बाहर की अनगिनत ज़िम्मेदारियां भले ही आपके कंधों पर हों, मगर जीवनसाथी को नज़रअंदाज़ करने की ग़लती न करें. आपकी ओर से ध्यान हटने पर हो सकता है कि उनका ध्यान किसी दूसरे में लग जाए.ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी के लिए स़िर्फ एकसाथ घर में रहना काफ़ी नहीं, पार्टनर के साथ क्वालिटी टाइम बिताना भी ज़रूरी है.

न स़िर्फ पार्टनर, बल्कि शादी जैसे पवित्र बंधन पर भी विश्‍वास रखें.पार्टनर पर हावी न हों. जीवनसाथी को उनके मन मुताबिक जीने दें. कई मामलों में पार्टनर का डॉमिनेटिंग होना भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की वजह होता है.रिसर्च के अनुसार, ऐसी महिलाएं जिनके पति कई महीनों या वर्षों के लिए घर-देश से दूर रहते हैं, वो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की ओर जल्दी आकर्षित होती हैं.रिसर्च के अनुसार, पत्नी की प्रेग्नेंसी के चलते सेक्सुअल डिज़ायर पूरी न होने से पुरुषों के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना बढ़ जाती है.

पत्रकार हैं बांगड़-बिल्‍ला, आज फिर मनायेंगे श्रमिक-दिवस

: अभी भी वक्‍त है। कलम में ईमानदारी की स्‍याही भर कर मैदान में उतरो और दल्‍लागिरी बंद करो : क्‍या तुम्‍हें पता है कि समाज में आज कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई खबरंडी : अधिकांश लोग तो पत्रकारिता की अर्थी सजाने में व्‍यस्‍त हैं : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बाकी बात तो बाद में होगी, सबसे पहले तो उन झंडाबरदारों की जमात से कुछ सवाल पूछना लाजमी और बेहद जरूरी है जो खुद को समाज का सबसे जिम्‍मेदार कहते-कहलाने में दर्प-घमंड पाले घूमा करते हैं। यह न इधर के होते हैं, और न ही उधर के। मगर खुद को दोनों ही ओर के लोगों में शुमार होने के दावे करते हैं। यह लोग खुद को पीडि़त-उत्‍पीड़त सर्वहारा श्रमिक समाज का नुमाइंदा और उनकी आवाज उठाने वाला होने का दावा करते हैं। जबकि दूसरी ओर आसन लगाये और पूंजी पर काबिज लोगों की जी-हुजूरी करते हैं। मकसद यह कि कैसे भी हो, उनका पेट भरता रहे। यह सरकारी रकम हड़पने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। मगर कभी भी श्रमिक वर्ग के बारे में कोई भी आवाज नहीं उठाते।

जी हां, सही सोचा आपने। मेरा यह सवाल उपत्रकार-बिरादरी से जुड़े अधिकांश लोगों से ही है। ऐसा नहीं कि सारे पत्रकार घटिया हैं और पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं। यह कहना गलत होगा। लेकिन यह भी सच है कि इस बिरादरी के अधिकांश लोगों के बारे में आम आदमी की राय बेहद गम्‍भीर है। कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई तुम्‍हें खबरंडी पुकारता है। कोई भांड़ कहता है, तो कोई घुटिया बिचौलिया। जो चुल्‍लू भर दारू में अपनी आत्‍मा बेचने पर आमादा होता है। लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्‍ता जीएल यादव ने आज लिखा है कि, "भारतीय मीडिया गूँगी , अन्धी और बहरी हो गयी है। इनकी आत्मा तक बिक गयी है। देश की दुर्दशा पर ऐसी चुप्पी!"

तो ऐसा है पत्रकार जी, तुम बताओ तो कि, तुम श्रमिक दिवस मनाने वाली नौटंकी काहे करते हो? खुद को इजारेदारों के खिलाफ आवाज उठाते हो, मगर कभी भी तुमने अपने समाचार-संस्‍थान के मालिकों की करतूतों पर कोई आवाज ? तुम बताओ न कि ओवर-टाइम और बोनस जैसे शब्‍द अब तुम्‍हारी आवाजों से गायब कैसे हो गये? किसी भी संस्‍थान में चल रहे उत्‍पीड़न पर तुम अपनी आवाज उठाने के बजाय सीधे सम्‍पादक के तलवे चाटने पर ही क्‍यों आमादा रहे हो? मजीठिया आयोग ने तो तुम्‍हारे लिए सारे रास्‍ते खोल दिये थे, लेकिन तुम ही लपक कर मालिकों के पक्ष में चिट्ठी-पत्री लिखना शुरू कर देते हो, आखिर काहे? तुम्‍हारे सारे नेता क्‍यों कलंकित चेहरा काहे रखे घूमा करते हैं? झूठे नारे, झूठे दावे। किसकी रकम से तुम देश-विदेश घूमा करते हो? कौन होता है तुम्‍हारा फाइनेंसर? और उसका मकसद क्‍या होता है ऐसे आर्थिक सहयोग देने का? अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए खुद को श्रमिक कहलाते हो? जबकि हो पक्‍के नपुंसक। कापुरूष। खैर, जल्‍दी ही तुम लोगों पर तो अब एक श्रंखलाबद्ध आलेख रिपोर्ट तैयार कर ही रहा हूं। प्रतीक्षा करना।

तुम ठेके पर काम करते हो, यानी ठेकेदार हो। है न?  विज्ञापन का काम करते हो, इसलिए विज्ञापन प्रतिनिधि हो। है न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? गड़बड़ काम कराने का जिम्‍मा लेते हो, इसलिए दलाल हो। हो न? आम आदमी से पैसा उगाहते हो, तो ब्रजेश सिंह और मुन्‍ना बजरंगी हो। हो न? अफसरों-नेताओं का चरण-चुम्‍बन करते हो, तो भांड हो। हो न? चलो, मान लिया कि तुम सजग पत्रकार हो। तो फिर यह बताओ कि मुख्‍तार अंसारी को पिछले महीनों जब तबियत खराब होने के दावे पर लखनऊ भेजा गया था, तो उसकी असलियत क्‍या थी? उस पर तुमने कौन सी खबर लिखी? वह क्‍या वजह है कि एक-समान घटना पर अलग-अलग झूठों वाले तथ्‍यों वाली रिपोर्टिंग तुम कैसे लिख पाते हो। क्‍या वजह है कि तुम्‍हारे जैसों की अधिकांश खबरें आखिरकार झूठी या बकवास साबित हो जाती हैं।

जो काम तुम्‍हारा काम है वह तुम करते नहीं, और जो काम तुम्‍हारा नहीं है वही काम तुम लपक-लपक कर करते घूमा करते हो। आज से दो-ढाई दशक पहले तक श्रमिक जगत की खबरें अक्‍सर और खूब छपा करती थीं, लेकिन अब उन्‍हें जगह नहीं मिल पाती है। वजह तुम बताओ न कि आखिर ऐसा क्‍यों हो रहा है। खबरें लिखते वक्‍त कहां घुस जाती है तुम्‍हारी श्रमिक-संवेदनशीलता?

तुम्‍हारा काम खबर लिखना है, लेकिन तुम मालिकों को तेल लगाने से ही फुरसत नहीं पाते हो न? जहां मालिक कमजोर हुआ, तो वहां सम्‍पादकों के लिए धंधाबाजी करना शुरू कर देते हो न? फर्जी खबरें लिखने में तुम्‍हें महारत है। आम आदमी की खबर को डस्‍टबिन पर फेंकते हो, जबकि कोई बड़ा-बाबू टाइप अफसर अगर पाद भी मारे तो उस पर बाकायदा कालिदास की तरह पाद-शाकुंतलम जैसा महाग्रंथ तक लिख मारोगे। कुछ दिन पहले ही वरिष्‍ठ फोटो-पत्रकार आरबी थापा ने पत्रकारों से चुनौती दी थी कि पत्रकारिता में जुटे लोगों में अधिकांश लोगों को अगर राष्‍ट्र-गीत लिखने को कहा जाए तो वे बगलें झांकना शुरू कर देंगे।

तो गुजारिश है तुमसे मेरे दोस्‍त। अभी भी सम्‍भल जाओ। दल्‍लागिरी बंद करो। कलम उठाओ, और पैनी खबरें लिखने की कोशिश करो।

हालांकि मुझे पता है कि यह कर पाना तुम्‍हारे वश की बात नहीं रही है अब। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस

श्रमिक दिवस आज: काहे बे मादर.... इत्‍ती मजूरी?

: कड़ी मेहनत से निकले पसीने से बनियाइन में छेद बनते हैं। मतलब यह कि अब आप श्रमिक नहीं रहे : सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान आज बन चुका है घर-घुस्‍सू : झूठों और मक्‍कारों का उल्‍लास-पर्व बनता जा चुका है विश्‍व मजदूर दिवस : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज अचानक करीब तीस बरस पुरानी बात याद आ गयी है। तब लोगों की बनियाइन-गंजी दो-एक महीनों में ही झर्रीदार यानी छलनी जैसी हो जाती थी। पहले छोटे-छोटे दाना साइज के छेद बनते थे, फिर मटर-नुमा और फिर बाकायदा किसी छोटी तश्‍तरी तक जैसे फटही हो जाती थी वह गंजी-बनियाइन। शुरूआत होती थी पैबंद-थेलगी लगाने से। लेकिन दो-तीन थेलगी के बाद ही अहसास हो जाता था कि ऐसे प्रयास निष्‍फल ही होंगे। वजह यह कि जल्‍दी ही एक छोटे-नन्‍हें छेद एकसाथ मिल कर एक बड़े-बड़े छेदों में तब्‍दील हो जाते थे। तब वह बनियाइन लुगदी की शक्‍ल ले लेती थी। उसका इस्‍तेमाल तब घर की महिलाएं पोंछा लगाने तक से परहेज करती थीं। नतीजा यह कि सायकिल या स्‍कूटर की साफ-सफाई में ही उसका इस्‍तेमाल हो जाता था।

क्‍या आप यह जानना चाहेंगे कि आखिर क्‍यों ऐसा होता था?  इस सवाल का जवाब देते हैं गोमतीनगर स्थित राजकीय होम्‍योपैथी कालेज के प्रोफेसर डॉक्‍टर एसडी सिंह। अपनी क्‍लीनिक में मरीजों से बातचीत से बातचीत के दौरान प्रो सिंह बताते हैं कि तब लोग परिश्रम करते थे, पसीना निकलता था। और उसकी क्षारीय गुणों का असर बनियाइन पर पड़ता था, जिसे उनकी बनियाइन बड़े छेद-दार बन जाती थी।

लेकिन अब ऐसा होना बंद हो चुका है। इसलिए नहीं कि आज की बनियाइनें ज्‍यादा मोटी और टिकाऊ होती जा रही हैं। आज तो और भी महीन और बेहद हल्‍की गंजी-बनियाइनों का दौर आ चुका है। मगर मजाल है कि उन पर कोई छेद बन भी सके? बरसों-बरस तक उस पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता। पुरानी बनियाइन होकर मटियाली और फेड हो जाती है, लेकिन फटती नहीं। वजह है मेहनत की गैरहाजिरी। शारीरिक परिश्रम करना हमारे संस्‍कार से दूर छूट चुका है। अब तो कोई परिश्रम करता ही नहीं। आरामदेह जीवन शैली है। सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान इस वक्‍त घर-घुस्‍सू बन चुका है। हर घर कूलर-एसी। कम्‍प्‍यूटर और इलेक्‍ट्रानिक सामान और लकदक सोफा-बिस्‍तर है। धूल नहीं पड़नी चाहिए, इसलिए घर को पिंजरा बना दिया। पैक्‍ड। जो कुछ भी होना है, घर के भीतर ही करो। न मेहनत होगी, और न निकलेगा पसीना। हचक कर भोजन करो, और जाम छलकाओ। यूरिक और ट्राइग्लिसराइड बड़ जाएगा और दिल बात-बात पर हांफना शुरू कर देगा। दिक्‍कत हुई, तो डॉक्‍टर मोटी रकम का खर्चा बता कर बोलेगा:- आराम करो।

फिर क्‍या? फिर यह कि मेहनत और वर्जिश करना बंद, जो पहले से ही बंद था। पहले भी यही सब हो रहा था, जिसके चलते आज इसकी नौबत आ गयी।

लेकिन हां, समाज में हमारे समाज में कुछ तबका-समुदाय आज भी मौजूद है, जिसकी बनियाइन हमेशा की तरह छेददार ही होती है। वह तबका है मजदूर और श्रमिक। वह भी वह तबका जो संगठित नहीं, बल्कि असंगठित क्षेत्र में काम करता है। यानी दिहाडी पर पर काम करने वाला मजदूर। मानव-मंडी पर बैठते मेहनतकश लोगों का हुजूम। गलाफाड़ आवाजें निकाल कर सब्‍जी बेचने वाले लोग। रिक्‍शाचालकों और ठेलियावालों का झुण्‍ड। जिसके मजूरी मांगते ही आपकी छाती फटने लगती है:- काहे बे मादर---- इत्‍ता पैसा?

ऐसे में पहली मई के दिन श्रमिक-दिवस मनाने, जश्‍न मनाने, जुलूस निकालने और सड़क पर लकदक वेशभूषा में दुनिया के मजदूरों एक हो, मजदूर की आजादी जिन्‍दाबाद जैसे नारे लगाने-उछालने का क्‍या औचित्‍य है। कार्ल्‍स मार्क्‍स ने ही यह नारा दिया था कि दुनिया के मजदूरों एक हो, लेकिन अगर मार्क्‍स को यह अलहाम हो जाता कि उनकी कल्‍पनाओं वाला श्रमिक-नेता ऐसा होता, तो मैं तो दावा करता हूं कि कार्ल्‍स मार्क्‍स यह नारा तो हर्गिज नहीं देते। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस

दूसरे की बीवी हड़पने के चक्‍कर में है "जोशीला" विधायक

: अमनम‍णि त्रिपाठी पर चल रहा है अपनी ही बीवी की हत्‍या का संगीन आरोप, उसके बावजूद उन्‍हें अब दूसरे की बीवी भी चाहिए : मधुमिता शुक्‍ला और सारा हत्‍याकाण्‍ड से कलंकित है यह त्रिपाठी-खानदान : बांगरमऊ में अपनी करतूतों को झंडा बुलंद कर रखा था कुलदीप सेंगर ने : जोगीजी आह-आह दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यूपी के पूर्वांचल में ऐसे ही अपराधी छवि वाले एक माननीय विधायक जी, जो नेपाल से सटे विधानसभा से चुनाव जीत गये। इस विधायक ने एक दूसरे युवक की पत्नी को अपनी पत्नी करार दे दिया है। वह भी एकतरफा इश्‍क में। नारा यह है कि दूसरे का माल अब मेरा ही होगा, किसी ने छुआ या नजरें तरेंरीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा। विधायक जी ने उस युवक को इतना तक धमका दिया कि अगर उसने अपनी इस नई नवेली प्रेमिका से बातचीत करने की कोशिश तक की तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा। बातचीत पर जब युवक ने अपना प्रतिरोध दर्ज करना चाहा तो इस माननीय जी ने गालियों की बौछार फेंकीं, और धमकियों का कींचड़ डालने की चेतावनी तक दे डाली। बोले कि:- मादर----, मैं तुम्‍हारा जीना मुहाल कर दूंगा। इस विधायक की एक फोन-कॉल की ऑडियो-क्लिप आजकल वायरल हो चुकी है, जिसमें इस "जोशीले" विधायक ने इस युवक से को धमकी दी है कि वह उसकी पत्नी से भूलकर भी न तो फोन करें और ना ही बातचीत करें। विधायक ने यह धमकी दी है कि अगर उसकी बात नहीं मानी गई तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा। इस विधायक का कहना था वे उस महिला के पति बन चुके है और अब उससे कोई रिश्ता कत्‍तई न रखे।

यह किस्सा अमरमणि त्रिपाठी है उसकी पत्नी का नहीं है बल्कि या गुल खिलाया है इस दंपत्ति के चिराग अमनमणि त्रिपाठी ने आपको याद होगा सिर्फ डेढ़ साल पहले सारा नाम की युवती की हत्या हुई थी अमनमणि त्रिपाठी उसी सारा का पति था और दिल्ली से कार में लौटते समय एक दुर्घटना में सारा की मौत हो गई थी। पुलिस ने इस मामले की जांच की तो पाया कि सारा की मौत दुर्घटना में नहीं बल्कि बाकायदा हत्या थी और यह हत्या अमन त्रिपाठी ने की थी। यह खुलासा होने के बाद पुलिस ने अमन मणि त्रिपाठी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था लेकिन नौतनवा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय एमएलए जीतने के बावजूद अमनमणि त्रिपाठी किसी छुट्टा सांड की तरह अपने अपराध में लिप्त हैं। बेखौफ।

अब जरा इस विधायक का चेहरा भी देख लीजिए। यह विधायक उस खानदान का है जहां अपनी प्रेमिकाओं का देह-शोषण के बाद उनकी हत्या की जाती है। वह भी किसी पारिवारिक परंपरा की तहत। इतना ही नहीं, इस परिवार की ख्याति पूर्वांचल के त्रिपाठी खानदान से है जिसका मुखिया है अमरमणि त्रिपाठी। अमरमणि त्रिपाठी कई पार्टियों से विधायक रह चुका है और राजनीति में उसकी छवि एक अय्याश, दलाल और प्रोफेशनल हत्यारे की है। आपको बता दें प्रतिभाशाली कवियत्री मधुमिता शुक्ला को अपने प्रेम में फंसाने के बाद अमरमणि त्रिपाठी में उसकी हत्या कर दी थी। यह हत्या तब हुई जब मधुमिता शुक्ला 5 महीने की गर्भवती थी। इस मामले की सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के बजाय उत्तराखंड हाई कोर्ट में कराने का फैसला किया था ताकि किसी भी मामले में अमरमणि किसी कोई भी अडंगे बाजी न कर पाए और ना ही न्यायिक प्रक्रिया को बाधित कर सकें। इस मामले में अमरमणि त्रिपाठी और उसकी पत्नी भी शामिल थी और अदालत में इन दोनों को मधुमिता शुक्ला और उसके गर्भस्थ बच्चे की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा दे रखी है। फिलहाल यह दोनों ही पति-पत्नी जेल मैं चक्की पीस रहे है।

अब जरा आइए यूपी के बाकी विधायकों और उनके रिश्तेदारों की करतूत का खुलासा दिखा दिया जाए। उन्नाव के बांगरमऊ विधायक कुलदीप सिंगर ने जिस तरह एक व्यक्ति को पूरी तरह मार कर अधमरा कर दिया और उसे को जेल ठूंस दिया वह अपने आप में यूपी सरकार की असफलताओं का सबसे बड़ा झंडा है। जिसमें पुलिस और प्रशासन के साथ ही साथ डॉक्टर भी शामिल थे। लेकिन उस मृत व्यक्ति के बदन में आयीं चोटों पर कोई भी चर्चा करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। नतीजा यह हुआ कि जेल में इलाज ही नहीं कराया गया। जबकि उसके पेट की आतें पिटाई से बुरी तरह चोटिल हो गई थीं। शरीर में बाहर और भीतर भारी लगातार रक्त स्राव हो रहा था। पीड़ा से तड़प-तड़प कर इस युवक ने 5 दिन बाद ही जेल में दम तोड़ दिया। (क्रमश:)

एक बरस में ही यूपी सरकार की कलई उतरने लगी है। समाजवादियों की सरकार की भीषण गुण्‍डागर्दी से त्रस्‍त होकर जनता ने लपक कर अपने वोट भगवा-कटोरे में झरझरा कर उड़े लिया था, कि चाहे कुछ भी हो जाए, दमघोंटू अखिलेश सरकार से पिंड छूट जाए। लेकिन एक बरस होते-होते ही भाजपा सरकार ने सपा-सरकार के रिकार्ड तक चकनाचूकर कर दिये। फिलहाल तो बलात्‍कारों और हत्‍याओं की बाढ़ से यूपी सुलग रहा है, तो अराजकता का माहौल से जनता त्राहि-माम त्राहि-माम चिल्‍ला रही है। उधर सत्‍ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों की गुण्‍डागर्दी ने यूपी का कमल सुखा डालने की साजिश बुन दी है। यह एक श्रंखलाबद्ध आलेख है, जिसको हम लगातार क्रमश: प्रकाशित करने जा रहे हैं।

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जोगीजी आह-आह

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