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आप न्‍याय-मित्र हैं ? तीन बरस से जेल में सड़ रहा है शैलेंद्र

: तीन साल से जेल में बंद है यूपी का एक दारोगा : इलाहाबाद की जिला अदालत परिसर में शैलेंद्र सिंह ने नबी वकील को मारी थी गोली : अजमल कसाब को वकील मिल गया, लेकिन शैलेंद्र के खिलाफ वकील एकजुट :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : उत्तर प्रदेश पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह जो लगभग विगत 3 साल से जेल में निरुद्ध हैं। पुलिस सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का नाम तब चर्चा में आया था जब उनके ऊपर आरोप लगा कि उन्होंने इलाहाबाद की जिला अदालत में नबी अहमद नाम के एक वकील को गोली मार दी थी।

ये वो समय था जब न सिर्फ इलाहाबाद के बल्कि पूरे भारत के वकील सड़कों पर आ गए थे। दिल्ली , बंगलौर तक एक स्वर में शैलेन्द्र सिंह को फांसी की मांग की गयी थी और कई वकीलों ने शैलेन्द्र सिंह का केस न लड़ने तक का फरमान सुना दिया था। दहशत कुछ यूं बन गयी थी की खुद शैलेन्द्र सिंह की रिश्तेदारी में पड़ने वाले वकीलों ने भी नबी के समर्थन वाली लॉबी के आगे घुटने तक दिए थे और केस लड़ने से मना कर दिया था। यहाँ ये जानना जरूरी है की इस देश में वकील अजमल कसाब को भी मिल गए , आतंकी और कई निर्दोषों के कातिल याकूब के लिए तो रात दो बजे कोर्ट भी खुलवा देते हैं। यद्द्पि इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमे साफ़ साफ़ शैलेन्द्र सिंह को कई वकीलों से अकेले जूझते देखा जा सकता है और उसमे नबी अहमद नाम के वकील की आवाज साफ़ तेज तेज सुनाई दे रही थी। शैलेन्द्र सिंह के परिवार के अनुसार तो किसी मुकदमे में नबी अहमद के मनमाफिक रिपोर्ट न लगाने के चलते नबी अहमद ने शैलेन्द्र सिंह को कचेहरी बुलाने का पूरा ताना बना बुना था और जैसे ही शैलेन्द्र सिंह कचेहरी पहुंचे उन पर हमला बोल दिया गया जिसके बाद ये दुर्घटना घटी।

यहाँ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी जो घोरतम तुष्टिकरण के चलते अक्सर चर्चा में रहती थी। शैलेन्द्र सिंह को आनन फानन में गिरफ्तार कर लिया गया और मृतक नबी अहमद के परिवार को तत्काल अखिलेश सरकार द्वारा सरकारी सहायता राशि उपलब्ध करवाई गयी। शैलेन्द्र सिंह बार बार कहता रहा कि वो राष्ट्रभक्त है और उस की ही जान को खतरा था पर उसकी एक नहीं सुनी गयी और हालात ये हो गए कि उसे ना पा कर उसके बदले नबी अहमद के कुछ बहुत ख़ास लोगों द्वारा एक सिपाही नागर को गोली मारी गयी। जिसका विरोध कई राष्ट्रवादी वकीलों ने खुद किया और इस हिंसा को गलत ठहराया।

फिर परिस्थितियां इतनी विषम हो गयी की शैलेन्द्र सिंह को इलाहाबाद जेल में भी रखना उनकी जान के लिए खतरा माना जाने लगा। मृतक नबी अहमद दुर्दांत अपराधी अशरफ का बेहद ख़ास था। शैलेन्द्र सिंह को उनकी जान के खतरे को देखते हुए इलाहाबाद से बहुत दूर रायबरेली जेल में रखा गया , उनका साथ देने जो भी सामने आया उसको अदालत परिसर में बेइज्ज्ज़त किया गया जिसमें आईजी अमिताभ ठाकुर की धर्मपत्नी श्रीमती नूतन ठाकुर तक शामिल हैं।  शैलेन्द्र सिंह के परिवार का कहना है की यदि उनके पक्ष को विधिपूर्वक , न्यायपूर्वक और निष्पक्षता से सूना जाय तो निश्चित तौर पर शैलेन्द्र सिंह मुक्त करने योग्य पाए जाएंगे। सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के परिवार के हालात देखें तो अब बेहद दयनीय हालात में पहुंच गया है। उनकी दो बेटियां कभी अपने पिता से मिलने जब जेल में जाती हैं तो वो पुलिस अधिकारी चाह कर भी इसलिए नहीं रो पाता क्योकि उसको पता है की उसके बाद उसकी बेटियां रोयेंगी तब उन्हें बाहर कोई चुप करवाने वाला भी नहीं है। एक बेटी तो ठीक से जानती भी नहीं कि पिता का प्रेम क्या होता है। क्योकि जब वो महज तीन माह की थी तब से ही उनका पिता जेल में है।

ख़ास कर तथाकथित अल्पसंख्यकों के खिलाफ पुलिस विभाग के हाथ पैर बांध कर रखने वाली पिछली अखिलेश सरकार में हुई इस घटना के समय सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह इलाहाबाद के शंकरगढ़ थाने के अंतर्गत आने वाली नारीबारी पुलिस चौकी के प्रभारी थे। शैलेन्द्र सिंह के माता पिता की मृत्य हो चुकी है और उनका एकभाई विक्षिप्त हो गया है। इस प्रकार कभी अपने जिले के सबसे जांबाज़ और तेज तर्रार पुलिस सब इंस्पेक्टरों में से गिना जाने वाले शैलेन्द्र सिंह का पूरा परिवार अब बेहद ही डांवाडोल हालत में है।

हालात इतने विषम हैं की उनकी पत्नी श्रीमती सपना सिंह को अपने तीन मासूम बच्चो के साथ अपने पिता के घर रहना पड़ रहा है जहाँ जैसे तैसे इस परिवार का गुजारा हो रहा है। हालात ये भी हैं की अब तीनों बच्चो की पढ़ाई आदि भी खतरे में पड़ती जा रही है क्योकि अपने पति का मुकदमा लड़ते लड़ते इस परिवार का सब कुछ बिक चुका है और यही हाल रहा तो कल खाने के लिए भी दिक्कत पैदाहो जायेगी। एक पुलिस वाले जो कानून और समाज की रक्षा के लिए वर्दी पहना हो उसकी व् उसके परिवार की ये दुर्दशा किसी पत्थरदिल का भी कलेजा पिघलाने के लिए काफी है।

एकमात्र पुलिस समर्थक न्यूज़ चैनल सुदर्शन न्यूज़ द्वारा उठाई गयी न्याय की इस आवाज को आगे बढाने का संकल्प लीजिये ...  सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह को वर्तमान योगी सरकार #YogiAdityanath से, पुलिस विभाग से और उतना ही राष्ट्रवादी विचारधारा के वकीलों से आशा है की वो उन्हें न्याय दिलाएंगे। यद्द्पि विगत तीन वर्षो में आर्थिक व् सामाजिक रूप से टूट चुके इस परिवार के पास अब पैरवी के लिए मात्र शैलेन्द्र सिंह जी की पत्नी सपना सिंह जी ही हैं जो शायद ही ऐसी कोई चौखट हो जहाँ मत्था टेक कर ना आ चुकी हों अपने पति को न्याय दिलाने की मांग को ले कर। यहाँ सवाल तथाकथित मानवाधिकारियों से भी है, जो नक्सलियों व आतंकवादियों तक के पक्ष में खड़े हो जाते हैं पर निर्दोष पुलिसकर्मियों के पास में नहीं इंस्पेक्टर के परिवार का मोबाइल नम्बर है-  09918366628

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( यह खबर शैलेंद्र सिंह की पैरवी में जुटे पुलिसवालों ने मेरी बिटिया डॉट कॉम तक पहुंचायी है।)

छोड़ा घर और मुसलमानों का ईमान, दोनों तबाह

: समाजवादी फाइव स्टार होटल के हाई-फाई इफ्तार ने सियासी मौलानाओं का रोजा भी कर दिया चौपट : मुल्ला-मोलवी अंधे, शरियत की हिदायतें नदारत : तो क्या पहले सरकारी पैसे के इफ्तार में बुलाये जाते थे हजारों कार्यकर्ता :

नवेद शिकोह

लखनऊ : रोजा इफ्तार एक मजहबी अनुष्ठान होने के साथ सोशल काज़ भी है। ऐसे आयोजन विभिन्न धर्मों, जातियों और फिरकों को एक प्लेटफार्म पर लाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में गरीब-अमीर, आम और खास में कोई अंतर भी नहीं होता। नफरत की राजनीति में यदि रोजा इफ्तार, होली मिलन और बड़े मंगल पर भंडारा जैसे कार्यक्रमों के बहाने जनमानस को एकत्र कर एकता की मिसाल से राजनीतिक स्वार्थ भी साधा जाये तो इस में कोई हर्ज नहीं। मजहबी प्लेटफार्म किसी भी मौके पर इंसान से इंसान को मोहब्बत से मिलने की मिलनसारी की इजाजत देता है।

राजनीतिक रोजा इफ्तार खास और आम, अमीर और गरीब, हिन्दू-मुसलमान, ब्राह्मण और यादव, शिया और सुन्नी, सांसद, विधायक और मामूली कार्यकर्ता को एक प्लेटफार्म पर ले आता है तो यहां राजनीतिक स्वार्थ भी बुरा नहीं हैं। क्योंकि नफरत और समाज को तोड़ने की राजनीति से तो एकता का स्वार्थ बेहतर ही है।

लेकिन अखिलेश जी आपका होटल ताज वाला हाइटेक रोजा इफ्तार मजहबी एतबार से भी गलत था। चुनिंदा सपा प्रभावशाली ओहदेदारों वाली इस इफ्तार पार्टी में आपकी पार्टी के हजारों गरीब कार्यकर्ताओं का दिल टूटा होगा। ये इस्लामी शरियत के भी खिलाफ है। फाइव स्टार होटल के बजाय ये इफ्तार पार्टी सपा पार्टी दफ्तर या किसी आम जगह आयोजित होता तो इसमें आम सैकड़ों - हजारों कार्यकर्ता और गरीब रोजदारों को बुला कर उन्हें इज्जत भी बख्श सकते थे और इसी बहाने उन्हें आपके करीब आने का मौका भी मिलता। रोजे और इफ्तार का आधार इस्लामी नजरिया भी यही कहता है। राजनीतिक परिपक्वता भी यही कहती है। समाजवाद के समता मूलक सिद्धांत भी यही कहते है।

दूसरी सब से अहम बात ये कि आपके राजनीतिक ग्लैमर में जो उलेमा/आपके खास मुसलमान और रोजदार आपकी इफ्तार पार्टी की दावत में आ गये उनका रोजा भी मकरू (शरियत के खिलाफ) हो गया। क्योंकि शरियत के नजरिए से फाइव स्टार होटल का मांसाहारी भोजन खाने की इजाजत नही है। क्योंकि इस होटलों का गोश्त झटके का कहा जाता है। झटके का मतलब जानवर को इस्लामी मानकों से ना काटना।

ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।

हर मर्ज का इलाज डॉक्‍टर नहीं, वकील भी आइमाइये

: गोंडा के वकील निर्विकार सिंह ने भेजा है यह लाजवाब वाट्सऐप ज्ञान : जिस मर्ज पर डॉक्‍टर ने पांच सौ का खर्चा बताया था, वकील ने डेढ़ सौ वसूल कर चुटकियों में निपटा दिया : समस्याओं के हमेशा एक से अधिक समाधान होते हैं :

निर्विकार सिंह

गोंडा : एक आदमी को बचपन से ही वहम था कि रात में उसके पलंग के नीचे कोई होता है। इसलिये एक दिन वह मनोचिकित्सक के पास गया और उसे बताया, 'मुझे एक समस्या है। जब भी मैं सोने के लिये बिस्तर पर जाता हूँ तो मुझे लगने लगता है कि कोई मेरे पलंग के नीचे छुपा हुआ है। मुझे बहुत डर लगता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं पागल हो जाऊँगा'

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भगवान धन्‍वन्तरि

'तुम साल भर के लिये अपने को मेरे हवाले कर दो', मनोचिकित्सक बोला। 'हफ्ते में तीन बार मेरे पास आओ, मुझसे बात करो, मुझे लगता है मैं तुम्हें इस डर से छुटकारा दिला दूंगा।'

'आप इस इलाज का कितना पैसा लेंगे, डॅाक्टर सा'ब?'

'पाँच सौ पचास रुपये, हर बार का', डॅाक्टर ने जवाब दिया।

'ठीक है, डॅाक्टर सा'ब, मैं पलंग पर सोना चालू करता हूँ और यदि जरुरत पड़ी, तो आपके पास आता हूँ', ऐसा बोलकर वो चल दिया।

छ: माह बाद, अचानक ही उसकी मुलाकात उस मनोचिकित्सक से सड़क पर हो गई।

'तुम फिर आए नहीं; लौटकर, अपने डर के इलाज के लिए?' मनोचिकित्सक ने पूछा।

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डॉक्‍टर

'हाँ..दरअसल हर बार का पाँच सौ रुपया...हफ्ते में तीन बार...वो भी साल भर तक!! बहुत ही महँगा सौदा था; मेरे लिये, डॅाक्टर सा'ब। जबकि मेरे एक "वकील " दोस्त ने डेढ़ सौ रुपए में ही मेरा इलाज करवा दिया। मनोचिकित्सक को बताया।

'सच? ऐसा है क्या?' कहते हुए फिर थोड़े व्यंग्यात्मक लहजे में मनोचिकित्सक ने आगे पूछा, 'क्या मैं जान सकता हूँ कि कैसे तुम्हारे "वकील "दोस्त ने, डेढ़ सौ रुपए में ही तुम्हारा इलाज करवा दिया?'

'हाँ, मेरे दोस्त ने मुझे अपने पलंग के चारों पायों को किसी बढ़ई से कटवा लेने की सलाह दी थी। अब मेरे पलंग के नीचे कोई नहीं रहता, डॅाक्टर सा'ब।'

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

मॉरल ऑफ द स्टोरी :

हर बीमारी के लिये डॅाक्टरों के पास दौड़ने की जरुरत नहीं है।

"वकील " दोस्तों के पास भी चले जाया करें और उनसे बात किया करें। समस्याओं के हमेशा एक से अधिक समाधान होते हैं।

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लर्नेड वकील साहब

लड़का तो मूर्ख था ही, बहू भी बकलोल मिल गयी

: यूपी लोक सेवा आयोग की करतूतों ने देश-प्रदेश के युवाओं को हलकान कर दिया, मगर सरकार आंखें मूंदे बैठी है : योगी जी, जवान खून में कहीं उमंगों के बजाय, नैराश्‍य न भर जाए : इस बेईमान संस्‍थान को सुधार की कोशिश कीजिए, युवाओं की अरदास सुनिये :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पता नहीं कि इस कहानी का कोई सिरा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की मौजूद हालात से कहीं जुड़ा हुआ दिखेगा या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि योगी सरकार के माथे पर अखिलेश यादव ने एक ऐसी बहू थोप दी है, जिसके चलते यूपी लोक सेवा आयोग में हंगामा बरपा गया है। आम प्रतिभागीगण मानने लगे हैं कि इस आयोग के अध्यक्ष के तौर पर इस नई बहू ने आयोग की परीक्षाओं के प्रतिभागियों के नाक में दम कर दिया है। प्रतिभागीगण तो इस पूरा का पूरा आयोग को अनिरुद्ध सिंह के नेतृत्व में किसी क्रूर, मूर्ख और विचित्र कौरव सेना से कम नहीं देखते हैं।

बहरहाल, पूरा किस्‍सा सुनने से पहले एक कहानी सुन लीजिए:-

पंडित जी ने लड़के और लड़की की जन्‍मपत्री को कई घंटों तक बांचा और बिचारा। और आखिरकार मारे खुशी के बोल पड़े। बोले:- बधाई हो, बधाई हो जजमान। पूरे के पूरे 36 गुण मिल गए हैं।

यह सुनते ही लड़के वाले उठ के जाने लगे

भौंचक्‍के लड़कीवालों ने लड़केवालों को रोका, और बोले:- क्यों भइया, क्या हुआ?

लड़के वालों ने झुंझला कर जवाब दिया:- हमारा लड़का तो पूरा चूतिया है...तो अब क्या बहू भी चूतिया ले आएं?

खैर, आपको बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद कई बदलाव का संकेत दिया था जिसमें उन्होंने अपने संकल्पों उद्देश्य का खुलासा किया था। अपने अभियान के तहत उन्होंने कई बोर्डो, परिषदों, प्राधिकरणों, आयोगों, समितियों आदि पर काबिज लोगों को हटाने की कवायद छेड़ी थी, जिन्हें पिछली समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार ने जमाया था। लेकिन उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग पर कोई भी गाज नहीं डाली गयी। जबकि प्रतिभागियों की मानें तो अनिरुद्ध सिंह एक लचर-असफल अध्यक्ष, असंवेदनशील प्रशासक और बेहद थके और अकर्मण्य आयोग परीक्षा आयोजक साबित हुए। कई प्रतिभागियों ने प्रमुख न्यूज़ पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को बताया कि आयोग अध्यक्ष के पूरे कार्यकाल में एक भी सकारात्मक पहल नहीं छेड़ी। भले ही वह पुराने धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार, अनैतिकता और कदाचार करने की कोशिश पर अंकुश लगाने की रही हो या फिर हो चुकी परीक्षाओं की गड़बड़ियों को सुधार कर उनकी उनके परिणामों को घोषित करने की।

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बदहाल है यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली फैक्‍ट्री

अनिरूद्ध सिंह यादव के पहले अनिल यादव की करतूतें बच्चे बच्चे की जुबान पर पहुंच गई थी, किसी लोकगाथा की तरह। हालत यह हुई थी कि हाईकोर्ट के आदेश पर अनिल यादव को बर्खास्त किया गया। इस पर अखिलेश सरकार ने फिर अपने खासमखास अनिरुद्ध को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया था। मौजूदा आयोग बोर्ड में अखिलेश के भरे हुए लोग मौजूद हैं। और कहने की जरूरत नहीं कि प्रतिभागियों के अनुसार अध्यक्ष के नेतृत्व में या पूरा का पूरा आयोग निहायत शर्मनाक नकारात्मक भाव पैदा करता जा रहा है।

लेकिन इसके बावजूद योगी सरकार ने प्रदेश के लाखों प्रतिभागियों की भावनाओं को समझने, उनकी समस्याओं को समझने, प्रतिभागियों में हर्ष और उल्लास के बीच परीक्षाएं संपन्न कराने की कवायद छेड़ने के बजाय आयोग को पूरी तरह निरंकुश अराजक और बना दिया।

आज यह छात्र न्यायालययों तथा इलाहाबाद से लेकर लखनऊ तक सत्ता के हर ड्योढ़ी-गलियारे पर अपनी व्यथा-गाथा सुनाते घूम घूम रहे हैं। बार-बार पुलिस से उनकी झड़प हो रही है, आक्रोश भयावह है। आयोग की कार्यशैली की असलियत केवल इसी तथ्य से समझी जा सकती है कि यहां की गड़बड़ियों की जांच अब सीबीआई कर रही है कई परीक्षाओं में भारी गड़बड़ियां हुई है। चयन को लेकर भारी रकम उगाही गई और राजनीतिक लाभों के लिए कई लोगों को नौकरी दी गई, हर पद के लिए 25 से 50 तक की उगाही हुई है। लेकिन इन चीजों को सुधारने या पिछली परीक्षाओं पर ऐसी गड़बड़ियां न करने की संभावनाएं खोजने के बजाए योगी सरकार ने योग की तरफ से मुंह मोड़ लिया।

हाईकोर्ट में लोकसेवा आयोग पर सुनवाई शुक्रवार को

: "यूपी लोकसेवा आयोग की बेहूदगी पर चार चांद लगा गयी हमारे कुछ साथियों की कानूनी पहल" : आखिर इस कानूनी लड़ाई का औचित्‍य क्‍या था : हम धन्‍नासेठ नहीं, हमारे गरीब अभिभावक अपना पेट काट कर हमें तैयारी के लिए भेजते हैं :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : युवाओं के भविष्‍य को बिलकुल मजाक बनाने पर आमादा है यूपी लोकसेवा आयोग का प्रशासन। यह पहली बार हुआ है जब आयोग की इस तरह की बेहूदगियों पर यूपी सरकार भी खामोशी अख्‍तियार किये बैठी हो। खासतौर पर जब यह स्‍पष्‍ट है कि आयोग के अध्‍यक्ष जिस अखिलेश यादव सरकार द्वारा नियुक्‍त किये हैं, जिस पर भ्रष्‍टाचार, जातिवाद और अनैतिकता का आरोप योगी सरकार लगातार लगाती ही जा रही है। बहरहाल, ताजा खबर यह है कि आयोग से प्रताडि़त अ‍भ्‍यर्थियों की एक याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनी जाएगी। पता चला है कि इस बारे में याचिका दायर की जा चुकी है।

आयोग की ऐसी करतूतों से प्रतिभागियों में गुस्‍सा तो है ही, साथ ही साथ उनमें विभिन्‍न गुट भी उत्‍पन्‍न होते जा रहे हैं। सोशल साइटों पर हंगामा हो रहा है। आरोप-प्रत्‍यारोपण चल रहे हैं। सर्वोच्‍च न्‍यायालय में लड़ाई हारने के बाद अब चर्चा शुरू हो गयी कि आखिरकार इस लड़ाई का औचित्‍य क्‍या था। यह तो गले में नमाज फंस जाने की कहावत के तौर पर साबित हो रही है। कईयों की एफबी वाल पर तो गालियां चलनी शुरू हो गयी हैं, जिनमें योगी सरकार से लेकर अपने साथी लोगों पर हमला किया जा रह है। आत्‍महत्‍या की चेतावनी के साथ ही तोड़फोड़ जैसे हिंसक आंदोलन की भी धमकियां भी शामिल हैं। कई लोगों ने तो इस कानूनी लड़ाई के खर्च का हिसाब मांगा जाना शुरू कर दिया है।

एक प्रतियोगी के अनुसार प्रतियोगी छात्रों पर तुषारापात आयोग के अध्यक्ष के तुग़लकी फरमान द्वारा किये जाने के पश्चात हताश छात्रों की रहनुमाई के नाम पर आगे आने वाले तथाकथित छात्रहित समर्थक रंगे सियारों द्वारा ऐसा गंदा खेल खेला गया जो कि निकृष्टता की पराकाष्ठा है। पहले तो प्रशासन से बात की जा रही है कि प्रशासन सुन नही रह कहकर सरकार के विरुद्ध छात्रों में मन मे विद्वेष पैदा किया गया और उसके पश्चात कोर्ट को आखिरी मार्ग बात कर कोर्ट  में लड़ने हेतु मोती रकम चंदे के रूप में वसूल की गई। वो छात्र जो सब्जी भी सबसे सस्ती खरीद के खाते है अर्थाभाव में उन्होंने अपने किन किन आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ करके चंदे का जुगाड़ किया हो वो ईश्वर ही बता सकता है । कोर्ट में लचर पैरवी के कारण फैसला  छात्रों के विरुद्ध रहा जिसमे की चंदे की कितनी रकम खर्च हुई और कितनी बची इसका हिसाब देने वाला कोई नही । ये किसके इशारे पर किया गया ये विचारणीय विषय है क्योंकि इससे छात्र दिग्भ्रमित होकर परीक्षा स्थगित करवाने का अन्य कोई मार्ग न अपना सके तथा उनका आक्रोश आयोग विरोधी के साथ साथ सरकार विरोधी भी हो गया ये बातें किसी को तो फायदा पहुंचा रही होंगी ।

उधर प्रतिभागियों के एक गुट के नेता कौशल सिंह ने स्‍पष्‍ट किया है कि आज हाईकोर्ट में इसी मामले पर एक याचिका को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ताओ से विस्तृत चर्चा हुई है, जिसमें  सभी पहलुओं पर ध्यान भी दिया जा रहा है। कौशन के अनुसार कल शुक्रवार को हाईकोर्ट पर सुनवाई होगी। उन्‍होंने अपील की है कि शांति के साथ अध्ययन जारी रखिए ! सत्यमेव जयते !

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बदहाल है यूपी को अफसरों की आपूर्ति करने वाली फैक्‍ट्री

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