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जेब ढीली कर, तेरी मौत टालने को मृत्‍युंजय पाठ करूंगा

: मृत्‍युंजय मंत्र तुम्‍हारे मन को त्राण, और मृत्‍यु से साक्षात्‍कार करता है : ताली मार कर मच्‍छर खूब मारते हो, पर अपनी मौत को सोच कर फटने लगती है : ककड़ी की बेल ही तो डीएनए है, और तुम पकी ककड़ी। अब टूटना शुरू करो : मेरा इकलौता पारिवारिक दायित्‍व 13 अक्‍टूबर को सम्‍पन्‍न होगा, बेटी का विवाह :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ओम् त्रयम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !!

यह है मृत्‍युंजय मंत्र। अकाल-मृत्‍यु से प्राण-रक्षा के लिए इस मंत्र के जाप का प्राविधान है, कुछ ऐसी ही कहानियां सुनाते हैं हमारे समाज के वे लोग, जो तथाकथित तौर पर अपने का ज्ञानी और पंडित बनने का दावा करते हैं। जजमान को यह बताया जाता है कि उसकी आयु अब खत्‍म होने को है। अकाल मृत्‍यु हो सकती है तुम्‍हारी। कोई भयावह दुर्घटना हो सकती है, कोई सांप-सपेरा सूंघ कर तुम्‍हारा तियां-पांचा कर सकता है। कोई मुठकरनी कर सकता है, तुम्‍हारा काम लग सकता है।

निदान, चलो बेटा सतर्क हो जाओ। मैं तुम्‍हारी पीड़ा समझ चुका। मर्ज की नस पकड़ में आ गयी है, तो उसे गर्दनियां देकर उसका टेंटुआ दबोच दूंगा। मृत्‍युंजय मंत्र का सवा लाख जाप करना होगा। इसमें कुछ हफ्ते लग सकते हैं, कई लोग जुटाये जाएंगे, और उसके बाद तुम बिलकुल चकाचक हो जाओगे। बस, अपनी जेब-टेंट खाली करो। मकसद होता है अनिष्‍ट की आशंकाओं से ग्रसित और भयभीत लोगों का "काम" लगा कर उनका भयादोहन किया जाए। दो-टूक बोले तो:- दो जून की रोटी।

खैर, यहां मेरा आशय पंडित-ज्ञानी बन कर लोगों को डरा कर रकम झटकना नहीं है। बल्कि मैं तो इसके माध्‍यम से केवल दो बातें स्‍पष्‍ट करना चाहता हूं। पहली तो यह कि मेरे हिसाब से मंत्र का जाप मन के त्राण यानी शांति प्राप्‍त करने के लिए होता है। और यह तब ही हो सकता है, जब हम मंत्र को रटने के बजाय उसे ठीक से समझने की सतत कोशिश करते रहें। मंत्र के भाव का दर्शन करने के माध्‍यम से ही मंत्र और मंत्रोच्‍चार करने वाले का त्राण यानी शांति मुमकिन है। आप उसे योग भी कह सकते हैं, या फिर आध्‍यात्‍म भी। जिसमें प्रदर्शनी लगा कर चिल्‍ल-पों करना नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकना एकमात्र माध्‍यम, दर्शन और लक्ष्‍य होता है।

तो इसके लिए पहले यह समझ लिया जाए कि यह मृत्‍युंजय मंत्र आखिर है क्‍या। सचाई तो यह है कि यह मंत्र किसी की भी प्राण-रक्षा नहीं करता। वह किसी को मौत से बचाने का गंदा-धंधा नहीं करता। जन्‍म और मृत्‍यु तो प्रकृति का अकाट्य और अनिवार्य स्‍वाभाविक चरित्र है। जो जन्‍मा है, वह मरेगा ही। ताली मार-मार कर मच्‍छर तो खूब मारते हो, लेकिन अपनी मौत को सोच कर हृदय की त्‍वचा फटने लगती है। अरे, बचपन को बूढा ही होगा। तो कोई भी मंत्र आपको मौत से बचाने की औकात नहीं रखता, बल्कि वह तो साक्षात मृत्‍यु से साक्षात्‍कार कराता है। वह मृत्‍यु, जो आपको भविष्‍य के हर अगले कदम पर आपके लक्ष्‍य और उद्देश्‍य  हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म -मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है, उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म-मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।

तो दोस्‍तों, दूसरी बात यह कि मैं अब इस महा मृत्‍युंजय मंत्र को जपने के बजाय उसे हमेशा हृदयंगम करने की प्रक्रिया में रहता हूं। उसके संदेश, उसके दर्शन और उसकी व्‍याख्‍याएं को समझने की कोशिश के तहत अपने जीवन और उसके दायित्‍वों पर काम कर रहा हूं। इसमें सबसे पहली कोशिश तो अपने दायित्‍वों को सकुशल निपटाना है। और उसमें भी सबसे निजी और पारिवारिक दायित्‍वों को पूरा करना है। तो अब मेरी इकलौता पारिवारिक दायित्‍व बचा है मेरी बेटी। इसी 13 अक्‍टूबर को उसका विवाह तय हुआ है।

और उसके बाद मेरे पारिवारिक दायित्‍व न्‍यूनतम होते जाएंगे, जबकि सामाजिक दायित्‍व उत्‍तरोत्‍तर बढ़ते जाएंगे। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि सार्वजनिक-सामाजिक दायित्‍वों के चलते आसाराम बापू, स्‍वामी चिन्‍मयानन्‍द या रामरहीम की लीक-डगर लपक लूंगा। हा हा हा।

खैर, 13 अक्‍टूबर के बाद से मेरी यह जीवन-ककड़ी अपनी बेल से पूरी तरह टूट जाएगी। बीज बिखर जाएंगे, लेकिन किसी न किसी के मनोमस्तिष्‍क में उसके अंकुरण हो जाएगा, अवश्‍य। और इस तरह मेरा वैचारिक पुनर्जन्‍म होता रहेगा। जैसे लाखों-करोड़ों जैसे आदिकाल से होता रहा है, और जैसे भविष्‍य के अनन्‍त काल तक होता रहेगा। कोई बात नहीं कि मेरे पास रानियां नहीं हैं, लेकिन इस सत्‍य को कोई कैसे झुठला सकता है कि मैं ही आदि था और मैं ही अनन्‍त रहूंगा। अहम् ब्रह्मास्मि।

ओम शांति: ओम शांति: ओम शांति:

ज्ञानी लोग ऐसे हाथ मिलाते हैं कि वियाग्रा तक शरमा जाए

: बेईमानों के पास अद्भुत सांगठनिक एकता, ईमानदार बिखरे-बिखरे : बेईमान के पास चिलांडलुओं-तेलांडुओं की बाकायदा फौज दिखेगी : धत्‍त त्‍तेरी ईमानदार की। तुमसे तो लाख अच्‍छे हैं बेईमान : वाकई नीर-क्षीर विवेकी हैं बेईमान :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आप किसी भी बेईमान के पास जाइये। उसके आसपास चिलांडलुओं-तेलांडुओं की बाकायदा फौज दिखेगी, जबकि ईमानदार लोगों के चेहरे से तुनुक-मिजाजी टप्‍प-टप्‍प चूती-टपकती रहती है। जिन्‍हें औसत क्षमता-बुद्धि है, वे हमेशा प्रफुल्लित दिखेंगे। दौड़-दौड़ कर काम करने-कराने में महारत होगी उनमें। उनका एक औरा या प्रभा-मंडल होगा। उनके आसपास लोगों की भीड़ होगी, आने-जाने वाले को पुकारेंगे, लिपटेंगे, सम्‍मान देंगे। तनिक बात पर भी वे सब एकमत हो जाते हैं बेईमान, साथी को संकट देखते ही वे एकजुट हो जाते हैं। भले वो ईमानदार हो या बेईमान। जबकि जिन्‍हें आप क्षीर-विवेकी यानी पढ़े-लिखे मानते हैं, वे अक्‍सर अक्‍खड़, ऐंठू, घमण्‍डी दिखेंगे। अक्‍सर तो दूसरों को गरियाते रहेंगे। गर्मजोशी कोसों दूर, दूसरों की ओर अपना हाथ ऐसे सौंपेंगे, कि वियाग्रा तक अपनी असफलता पर शर्मिंदा हो जाए। सिर्फ ज्ञान बघारेंगे, तुनुक-मिजाजी टप्‍प-टप्‍प चूती-टपकती रहेगी।

आज यूं ही एक बहस में शामिल हो गया मैं। प्रश्‍न था कि नीर -क्षीर विवेकी होना य़ा किसी से अप्रभावित होना, आप को अकेला व नीरस बना सकता है? प्रश्‍न के साथ ही समाधान भी देने की कोशिश की थी अवध बार एसोसियेशन के पूर्व महामंत्री आरडी शाही ने। मैंने भी अपना ज्ञान छौंका कि नीर-क्षीर विवेकी होने का अर्थ कभी भी नीरस और अकेला कदापि नहीं हो सकता। जो तलछट तक के मर्म को समझने गया है, वह वापसी में अगर अकेला और नीरस बन गया, तो मैं नोटरी प्रमाणपत्र जारी करवा सकता हूं कि ऐसा व्‍यक्ति रेन-कोट पहन कर स्‍नान करने की कोशिश करता रहा है, और इस तरह अपने ऐसे स्‍नान-कर्म से शुद्ध होने का भरम दूसरों पर थोपता रहा है। ऐसा व्‍यक्ति नीर-क्षीर विवेकी कैसे हो सकता है? और अगर ऐसा दावा करने वाले ने स्‍वप्‍न में भी क्षीर को नहीं अपनाया, केवल भयभीत ही रहा है। ऐसे में तो दर्प-घमण्‍ड की ही चट्टानी-फसल ही होगी। नीर-क्षीर विवेकी तो केवल वही हो सकता है जो जल के कण-कण-परमाणुओं तक पहुंचने के लिए उत्‍सुक हो, और उसी जिज्ञासा भाव में वहां गहरे तक पहुंच चुका हो। और यह अच्‍छी तरह समझ चुका हो कि वह नीर-क्षीर के ऊपर नहीं, उसके जैसे असंख्‍य तत्‍वों में से एक है। ऐसे व्‍यक्ति सरल, प्राणवान, जीवन्‍त और सतत जिज्ञासु होगा, दर्प के विपरीत ध्रुव पर।

अब जरा बेईमान और ईमानदार के चरित्र का विश्‍लेषण कीजिए, तो सारी धुंध साफ हो जाएगी। जिन्‍हें आप बेईमान कहते हैं, वे अपने साथी को संकट देखते ही एकजुट हो जाते हैं। भले वो ईमानदार है अथवा बेईमान। हमला कर बैठते हैं। शिकार के पहले से ही वे अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्धारण कर देते हैं कि किसको किस ओर से कैसा हमला करना है जाहिर है कि हमला सटीक होता है, और शिकार चारों खानों चित्‍त। उसके बाद वे अपने शिकार के टुकड़े-टुकड़े करते हैं, अपने-अपने हिस्‍से पर बंटवारा करते हैं।

जबकि ईमानदारों में सांगठनिक क्षमता का धात लगातार टपकता ही रहता है। ऐसे लोग अपने आसपास के करीबी लोगों के प्रति अनजाने से भय से ग्रसित होते हैं। एक-दूसरे को नीचा गिराना, चुगली करना, माखौल उड़ाना जैसी गतिविधियों में होते हैं। आदर्श का गजब पाखंड उनके चेहरे पर किसी दैवीय नूर की तरह छाया रहता है। इतना कि बेईमानियों के हर दमकते सूरज को वे पछाड़ दें। मैं बहुत ईमानदार हूं, इकलौता ईमानदार हूं। मुझसे जो लोग जुड़े हुए हैं, सिर्फ इसलिए जुड़े हैं क्‍योंकि उनके अपने निजी भ्रष्‍ट एजेंडे हैं। वे भेड़ की खाल में छिपे भेडि़ये होते हैं। चूंकि मैं पवित्र हूं, इसलिए मैं अपने पवित्र एजेंडे को सफलीभूत करने-कराने के लिए ऐसे पाखंडियों का साथ ले रहा हूं, लेकिन वक्‍त आते ही उनका काम लगा दूंगा। क्‍योंकि मैं ईमानदार हूं, और केवल ईमानदारों को ही प्रश्रय दूंगा। और चूंकि मैं इस जगत में इकलौता ईमानदार हूं, इसलिए बाकी सारे लोग बेईमान हैं।

और भी सबसे बहुत महत्‍वपूर्ण सवाल तो यह है कि आखिर आप किसी को बेईमान किस आधार पर घोषित कर देते हैं। जब भी देखिये-सुनिये, पता चलता है कि खुद को ईमानदार कहलाने वाला शख्‍स उन सभी बाकी लोगों को बेईमान साबित करने का प्रमाणपत्र जारी करता रहता है, लेकिन जब उसका निजी मामला फंसता है, तो फिर उसी बेईमान के सामने गिड़गिड़ाता है। और जैसे ही उसका काम निकल जाता है, आपकी निगाह में आपका वही मददगार आपकी निगाह में दोबारा गिर जाता है।

आप अपने इसी ओढ़े हुए दर्प में दबे रहते हैं, कि आप श्रेष्‍ठ हैं, और इसी बीच कोई तीसरा उनका काम लगा कर भाग निकल जाता है।

सॉरी यार। प्रवचन तो बाद में बढेगा, लेकिन इतना जरूर बताते जाइयेगा कि आप बेईमान हैं कि ईमानदार। वह क्‍या है कि दोस्‍ती की पींगें तो जात को पहचान कर ही तो की जा सकती है न, इसलिए।

अखिलेश दास के सुशील बने दूध की मक्खी, हटाये गये

: अखिलेश दास के बाद से ही बेटे ने भंग कर दी दास-मंडली, कई को दरवाजे से बाहर किया गया : वायस आफ लखनऊ के मुख्‍य मुनीजर सुशील दुबे का पत्‍ता : अखबार के नये गवर्नर बनाये गये हैं रामेश्‍वर पाण्‍डेय उर्फ काका :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : डॉ अखिलेश दास की मृत्‍यु के बाद उनके बेटे ने जो अपनी सल्‍तनत में लगा दी झाडू़, उसमें अखिलेश दास के के कई खासमखास का काम तमाम हो गया। विराज के इस स्‍वच्‍छता अभियान में दास-मंडली का लगभग पूरा सफाई ही हो गया है। सबसे बड़ी गाज गिरी है, दास के अखबार वायस आफ लखनऊ के मुख्‍य सर्वे-सर्वा सुशील दुबे। विराज के इस सफाई अभियान के दौरान सुशील बाहर हो गये हैं।

हालांकि यह खबर काफी विलम्‍ब से मिली थी। उसके बाद सुशील दूबे से सम्‍पर्क होने में खासा वक्‍त लग गया। फिर सुशील ने वायदा किया कि वे अपना पक्ष रखने के लिए वे खुद ही जल्‍दी ही सम्‍पर्क करेंगे, लेकिन ऐसा भी नहीं हो पाया। आखिरकार प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस खबर को प्रकाशित करने का फैसला कर लिया है।

तो पता चला है कि अखिलेश दास के अखबार में एकछत्र राज करने वाले सुशील दुबे को पूरी बेदर्दी के साथ निपटा दिया गया है। कई और भी लोग निकाले गए हैं इस यज्ञ में। लेकिन इसमें सुशील दुबे पर इस अखबार के संपादन से लेकर प्रबंधन तक का जिम्मा था। सुशील की विदाई से पूरे अखबार ही नहीं, बल्कि दास-मंडली के बाकी बचे सदस्‍यों के लिए काफी चौंकाने वाली रही है।

आपको पता दें कि लखनऊ में अपने जीवन की पारी एक सहकारी बैंक से शुरू करने वाले अखिलेश दास को कांग्रेस ने लखनऊ में मेयर की कुर्सी अता फरमायी थी। इसी बाद से कांग्रेस के कई सभासदों से दास की करीबी हुई। दास लगातार आगे बढ़ते रहे, हालांकि उनके सहकारी बैंक की हालत लगातार पतली ही होती रही

आज से दस बरस पहले डॉ अखिलेश दास से कुमार सौवीर ने लम्‍बी बातचीत की थी। उस वक्‍त डॉ दास लखनऊ से लोकसभा चुनाव के प्रचार में व्‍यस्‍त थे। यदि आप उस बातचीत को देखने में इच्‍छुक हों, तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-'

चिडि़या बदनाम हुई डॉ अखिलेश दास तेरे लिये: दास्‍तान-ए-बैडमिंटन

अखिलेश दास की टीम में सुशील दुबे वगैरह लोग शुरू से भी शामिल थे। उनके चुनाव के लिए इन सब लोगों ने प्‍लानिंग की। मसलन, होली पर मिठाई, रंग, ईद और दीपावली में काजू की बर्फी और करवा चौथ पर पूरा झमाझम पैकेज पूरे शहर के हर घर-घर तक पहुंचाने में इन्हीं लोगों की सोच का नतीजा था। लेकिन यह योजना फेल हो गई और अखिलेश दास धड़ाम से गिर चुके, मगर दास-मंडली बनी ही रही।

मगर अब विराज ने दास की मृत्‍यु के बाद से पूरे संस्‍थान में सफाई कार्यक्रम छेड़ कर दिया। अब सुशील दुबे की जगह अब दस्तरखान पर मौजूद हैं रामेश्वर पांडे। रामेश्वर पांडेय उर्फ काका दैनिक जागरण के प्रदेश संपादक पद से हटने के बाद कुछ दिन उन्होंने जनसत्तान्‍यूज डॉट कॉम में काम कर चुके हैं।

चलते-चलते आपको बता दें कि दास-मंडली को अपने इस अवसान का इलहाम पहले ही हो गया था। करीब चार महीना पहले ही सुशील दुबे ने पत्रकारों के एक नवजात संगठन के बैनर पर विराज दास को मंच पर बिठा कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश की थी। इस समारोह में कई पत्रकारों को सम्‍मानित करते हुए यह संदेश दिया गया था कि सुशील की पकड़ पत्रकारों में खासी है। लेकिन विराज ने इस सब को खारिज कर दिया और साबित कर दिया कि वे विराज हैं, अखिलेश दास नहीं। वैसे दास-मंडली के एक सदस्‍य ने मेरीबिटिया डॉट कॉम को बताया कि दास-मंडली को भंग कराने का फैसला विराज का नहीं, बल्कि विराज की मां का है। खैर, इस बारे में जानकारी देने के लिए न तो सुशील मुंह खोल रहे हैं, और न ही दास परिवार से कोई सम्‍पर्क ही हो पा रहा है।

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार पत्रकारिता

अधिवक्ता हत्याकांड में आरोपी गया जेल

: 19 अप्रैल-18 को चांदा के इंदौली निवासी वकील ओंकारनाथ यादव की हुई थी गोली मार कर हत्‍या : प्रतापगढ़ के आसपुर दवसरा निवासी आरोपी लबिशंकर मिश्र को पुलिस दबोचा था : पुलिस टीम को कप्‍तान ने दिया पंद्रह हजार का इनाम :

मेरी बिटिया संवाददाता

सुलतानपुर : अधिवक्ता ओंकारनाथ हत्याकांड में चांदा पुलिस ने दूसरे आरोपी को गिरफ्तार कर आलाकत्ल के साथ सीजेएम कोर्ट में पेश किया। जिसकी रिमांड स्वीकृत कर प्रभारी सीजेएम अनुराग कुरील ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया है।

मालूम हो कि चांदा थाना क्षेत्र के इंदौली निवासी अधिवक्ता ओंकारनाथ यादव की बीते 19 अप्रैल को गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस मामले में प्रकाश में आये आरोपी लबि शंकर मिश्रा निवासी अकारीपुर थाना आसपुर देवसरा प्रतापगढ़ को 315 बोर  तमंचा व जिंदा कारतूस के साथ शनिवार की सुबह कोथरा तिराहे के पास से गिरफ्तार कर पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में पेश किया। आरोपी की रिमांड स्वीकृत कर अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया।

थानाध्यक्ष एसके मिश्र ने बताया कि पुलिस की इस सफलता पर टीम को एसपी ने 15 हजार का पुरस्कार दिया है।

अफसरों की भर्ती: मगर जिम्‍मेदारी कौन लेगा

: सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश की वकालत तो सन-05 में की थी प्रशासनिक आयोग ने, 13 बरस लग गये सोचने में : सीधे और चयनित नौकरशाहों में होगा झोंटा-नुचव्‍वर : लोक प्रशासन के बजाय यह लोग कारपोरेट हितों पर ही ज्‍यादा जोर देंगे :

अविनाश पांडेय

इलाहाबाद : नौकरशाही के शीर्ष  क्षेत्र मे पार्श्व प्रवेश को संस्थागत बनाने का मोदी सरकार का निर्णय देश के सभी क्षेत्रों में नौकरशाही की गड़बड़ी  और लालफीताशाही को रोकने तथा भारतीय नौकरशाही में कुशलता  को बढाने के लिए है। वर्ष 2005 दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने  सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश  ( पार्श्व प्रवेश )  की अनुशंसा की थी। लेकिन तब इस प्रस्ताव का भारी विरोध मुख्य रूप से आई ए एस अधिकारीयों द्वारा किया गया था।

यह निर्णय मुख्य रूप से नौकरशाही को कार्पोरेट हितों के अनुरूप बनाने के लिए है। जिससे  आगे चलकर  आम जनता का हित नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है और कल्याणकारी  राज्य की अवधारणा को क्षति पहुंच सकती है। पार्श्व प्रवेश के द्वारा  आये नौकरशाह और यूपीएससी के द्वारा चयनित  नौकरशाहों के बीच  आपसी टकराहट बढेगी जो समस्त कार्यपालिका की कार्यप्रणाली को नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर शक्तियों के पृथक्कीरण के सिद्धांत को नुकसान पहुंचा सकती है। अतीत का अनुभव  और अन्य देशों के  उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि इससे निजीकरण का गति में और तीव्रता  आएगी।

इस तरह का कदम कम योग्यता वाले लेकिन राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों के लिए पिछला दरवाजा खोलकर उच्चतम स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करेगा। सिविल सेवक,जिन्होंने बहुत ही प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से सिस्टम में प्रवेश किया है, हतोत्साहित होंगे क्योंकि इन संयुक्त सचिव (जेएस) स्तरों पर उनकी पदोन्नति संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।सरकार कुछ चयनित कंपनियों और निगमों के सीईओ का पक्ष ले सकती है और  ये लोग  आगे चलकर सार्वजनिक हित में निर्णय लेने की बजाय अपनी कंपनी के हित में निर्णय लेना प्रारंभ कर दे।।

पार्श्व मार्ग से प्रवेश पाये नौकरशाहों  से अनुशासन, जवाबदेही और प्रतिबद्धता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि उनके पास सदैव एक बेहतर विकल्प  उपलब्ध है। जो ज्यादा दबाव में हो, वो त्यागपत्र देकर अपने दायित्व से मुक्त हो।

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