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पति हो तो क्‍या? पायरिया का इलाज कराओ, या तलाक

: जरा उन महिलाओं की बदहाली के बारे में सोचिये तो आपका दिल-दिमाग हिल जाए, जिनके पति पायरिया से पीडि़त हैं : अगर मैं अपने मित्र की ब्‍याहता होती तो, पहली ही रात केवल यही लानत-मलामत करती कि जब मुंह इलाज की तमीज नहीं है, तो शादी काहे कर लिया बे : महिलाएं कितना बर्दाश्‍त करती हैं पायरिया से सड़ते मुंह को :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मेरा एक मित्र है। घनिष्‍ठ। पत्रकार है वह। हम दोनों एक-दूसरे को बहुत बरसों से बहुत करीबी में देखते-समझते रहे हैं। निजी रिश्‍ते बेहिसाब मजबूत हैं।

खैर, मेरे मित्र को पायरिया की शिकायत है। जब वह हमारे साथ लखनऊ में दैनिक जागरण में काम करता था, तो हल्‍की बदबू आया करती थी उसके बोलने पर। लेकिन छह महीने बाद ही यह बदबू तेज ही होती रही। यह करीब 28 साल पहले की बात है। बाद में वह परदेस चला गया, सपरिवार। बीच-बीच में जब भी उससे मेरी मुलाकात हुई तो भी उसकी पायरिया वाली गन्‍दी महक बदस्‍तूर महसूस की। लेकिन पिछले पखवाडा जब वह लखनऊ आया तो उसके गले मिलते ही मुझे उसके मुंह से भयंकर बदबू लगी।

मैंने छिटक कर दूसरी कुर्सी पर बैठा और सवाल उछाला:- अरे यार, दूर रहो मुझसे। कित्‍ती बदबू आती है तुम्‍हारे मुंह से। तुम अपने मुंह का इलाज क्‍यों नहीं कराते हो ?

हैरान मित्र का जवाब आया:- नहीं यार, तुम्‍हें भ्रम होगा। मुझे तो ऐसी कोई दिक्‍कत नहीं है।

मैं बोला:- बिस्‍तुइया इस बारे में तुमसे शिकायत नहीं करती है ? ( बिस्‍तुइया, यानी उसकी बीवी। मैं उसे मारे स्‍नेह के बिस्‍तुइया पुकारता हूं। मतलब छिपकली। बहुत स्‍नेह से मैं कभी उसे बिस्‍तुइया कहता हूं, तो कभी घरैतिन कह कर पुकारता हूं। दुबली-पतली-इकहरी है वह। फूंक मार दो, अलगनी में फैले पेटीकोट की तरह उसका पूरा अस्तित्‍व फड़फड़ा जाए।

न न, बिलकुल नहीं। कभी भी नहीं। :- मित्र का जवाब था

यह सुनते ही मैंने अपनी एक टांग उठायी, अपना जूता निकाला, जूता हाथ में पकड़ा और फिर उसके बाद वही जूता दिखाते हुए उससे कहा:- अबे साले, आज तो सिर्फ जूता दिखा रहा हूं। अगली बार अगर तूने अपने पायरिया का इलाज नहीं कराया तो, यही जूता तुम्‍हारे सिर पर रसीद कर दूंगा। मारूंगा सौ, गिनूंगा एक। और अगर भूला तो फिर से गिनती शुरू करूंगा। उल्‍लू का पट्ठा कहीं का।

( मैंने उसे जमकर गरियाया। लेकिन हैरत की बात है मित्रों ! महिलाएं कितना बर्दाश्‍त करती हैं पायरिया से सड़ते मुंह को। वह भी तब, जब वे अंतरंग क्षणों में हों। और आश्‍चर्य की बात है कि उफ तक नहीं करती हैं। दर्दनाक बलात्‍कार से भी ज्‍यादा क्रूर। हर दिन, रोजाना। मैं अगर महिला होती, तो पहली ही रात तो सारे कार्यक्रम कैंसिल कर पहले लानत-मलामत करती कि जब तुम्‍हें अपने मुंह की तमीज नहीं है, तो शादी काहे कर लिया था बे? उसके अगले ही दिन अपने साथ लेकर उसे अस्‍पताल ले चलती। अल्‍टीमेटम दे देती कि अगर हफ्ते तक मामला नहीं सुधरा, तो जिम्‍मेदार तुम होगे, और मैं तुम्‍हारी शक्‍ल तक कभी पसंद नहीं करूंगी। तलाक की कार्रवाई शुरू कर देती।

और हां, एक सवाल मेरे उन सभी दोस्‍तों से है जो जो सिगरेट पीते हों। जरा अपनी पत्‍नी से पूछना जरूर कि तुम्‍हारे सिगरेट से गंधाये तुम्‍हारे मुंह को वो कैसे सहन कर पाती हैं? )

साथियों को अवैध कब्‍जा सिखायेंगे गोंडा के बड़े पत्रकार

: हनकदारी में खासा रसूख पाले पत्रकारों ने आश्रय-हीन पत्रकारों की आवासीय समस्‍या का समाधान खोजने के लिए खोजा नायाब तरीका : जरूरत पड़ी तो बाकायदा प्रशिक्षण शिविर होगा, अथवा व्‍यक्तिगत प्रयास भी आयोजित होंगे : सरकारी जमीनों पर नेताओं-अफसरों की मिलीभगत से होने वाले अवैध कब्‍जों का कौशल विकसित किया जाएगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : "चल, इधर आ बे। अबे अपना मूं धोने की जरूरत नहीं है इसमें, दिमाग खोलना जरूरी है इस कला को समझने-सीखने के लिए। हां, तो बेटा, दिल-दिमाग खोल लो, और इसके बाद अब उन विधियों-प्रविधियों को समझने के लिए तैयार हो जाओ। हम तुम्‍हें यहां उन कानूनी-सानूनी लटकों-झटकों के दांव-ओ-पेंच सिखायेंगे। कैसे किस टेढ़े-मेंढे नेता और अफसर के ढीले-ढाले किस्‍म शौक को पहचान कर उसे अपने जाल में फंसाना है। ऐसा दबोचना है कि उसके मुंह से आवाज बरबस निकल ही पड़े कि:- हाय मोरी अम्‍मा। बस इस ध्‍वनि में जितना भी आर्तभाव छिपा होगा, समझ लेना कि तुम अपने मिशन में उतनी दूरी तक सफर कर सकोगे।"

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विशाल ककड़ी: हाथ का हथियार, पेट का भोजन

जी हां। यह उस प्रशिक्षण के उन ब्रह्म-वाक्‍य हैं जो जिला प्रदेश अथवा देश के उन पत्रकारों को समझायेंगे, जिनके पास भले ही अपना मकान अथवा कोई इंच भर जमीन भी न हो। फायदा यह होगा कि इसके बाद उन दीन-हीन-अबलों-कमजोर पत्रकारों को उनका अपना खुद का आशियाना या मकान मुहैया हो सकेगा। इसमें प्रशिक्षण देंगे गोंडा के वे वरिष्‍ठ पत्रकार जो अपने जीवन में सरकारी या गैर सरकारी अथवा किसी दूसरे की जमीन पर अवैध रूप से काबिज हो चुके हैं, और इसके लिए उन्‍होंने बाकायदा खासी दिक्‍कतों से जूझने के बाद ही अपने मिशन में सफलता हासिल की है। ऐसे प्रशिक्षण देने वाले पत्रकारों का नाम दिया गया है अवैध कब्‍जा-मित्र विशेषज्ञ। गोंडा में करीब दो दर्जन से ज्‍यादा ऐसे एकल अथवा सामूहिक तौर पर आयोजित होने वाले ऐसे कार्यक्रमों में प्रतिभागियों को अपने इस विषय पर महारथी माना जाता है और उनका सम्‍मान किसी विशालकाय प्रकाश-स्‍तम्‍भ से कम नहीं है। यह सारे अवैधकब्‍जा-मित्र लोग बड़े-बड़े समाचार संस्‍थानों से जुड़े हुए हैं।

पक्‍की खबर है कि गोंडा में अवैध कब्जा करने में मशहूर इन माहिर लोग बेहाल-परेशान आम पत्रकारों के लिए एक ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाने पर सहमत हो गये हैं जिनके पास मकान नहीं है। कहने की जरूरत नहीं कि यह अवैध कब्जा-मित्र जैसे ओहदेदार पत्रकार लोग इस समय मशहूर समाचार संस्‍थानों से सम्‍बद्ध हैं। और अपनी इसी शैली तथा हनक के बल पर वे पत्रकार अपने जिले के नेताओं, मंत्रियों और अफसरों को पदनी का नाच नचाते रहते हैं। सपा सरकार में हनकदार मंत्री रहे पंडित सिंह की शह पर इन पत्रकारों ने करीब पांच एकड़ जमीन पर कब्‍जा कर लिया था। सूचना मिली है कि ऐसे अवैध कब्‍जा मित्र की भूमिका में यह पत्रकार जल्‍द ही आसपास के जिलों और राज्यों के इच्‍छुक पत्रकारों को प्रशिक्षण देंगे।

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पत्रकार पत्रकारिता

एक वरिष्‍ठ अवैध कब्‍जा-मित्र ने इस योजना का खुलासा किया है, लेकिन अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि यह अभियान जल्‍द ही शुरू होगा। हालांकि इस बारे में कोई विधिवत कोई आदेश जारी नहीं हुआ है और ना ही किसी और मुद्दे पर कोई खुलासा हुआ है लेकिन इतना जरूर है के ऐसा प्रशिक्षण शिविर बहुत जल्दी ही आयोजित किया जाएगा। यह भी स्पष्ट नहीं हुआ है यह शिविर कब शुरू होगा, और यह भी कि वह विधिवत आयोजित किया जाएगा, औपचारिक रूप से अथवा अनौपचारिक रूप से होगा।

इस प्रशिक्षण शिविर में पत्रकारों को सिखाया जाएगा कि वे अपने-अपने क्षेत्र के आने वाली बेशकीमती सरकारी जमीनों पर कैसे कब्जा करें, कैसे उन पर सरकारी और जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाकर हासिल ऐसी जमीनों पर बाउंड्री बनवायें, और कैसे वहां अट्टालिकाएं बनाएं। विशेषज्ञ यानी अवैध कब्‍जा-मित्र इच्‍छुक पत्रकारों को यह भी सिखायेंगे कि अगर कोई बवाल होता है तो वह पत्रकार अपना कब्जा कैसे बनाए रखें, अगर सरकार बदल जाए तो भी यह कब्जा कैसे बरकरार रहे। इस बारे में भी विधिवत प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह भी समझाया जाएगा कि सरकारी अफसरों की कौन सी नस दबा दी जाए जिससे वे सरकारी जमीन पर हुए इनके अवैध होने के बावजूद खामोश बने रहें। ( क्रमश:)

पत्रकार के पुत्र बनारसी फिल्‍मकार को फाल्‍के पुरस्‍कार

: अक्‍कड़-बक्‍कड़ नाम से एक छोटी-सी फिल्‍म बना कर उज्‍ज्‍वल ने काशी का नाम सुफल कर दिया : फाल्‍के समारोह में बनारस के उज्‍ज्‍वल पुरस्‍कृत किया गया : प्रख्‍यात पत्रकार प्रेम प्रकाश का पुत्र है कोहबर वाला यह नवोदित फिल्‍मकार :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्ली : आठवें दादा साहब फाल्के फिल्म फेस्टिवल 2018 के मौके पर शोर्ट फिल्म सेक्शन मे वाराणसी के फिल्मकार उज्ज्वल पाण्डेय द्वारा निर्देशित शोर्ट फिल्म 'अक्कड़ बक्कड़' को बेस्ट फिल्म, बेस्ट डाइरेक्शन और बेस्ट स्क्रिप्ट, इन तीन कैटगरीज मे 'सिनेमा फार द एक्सीलेंस' अवार्ड से नवाजा गया। भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के के नाम पर 2011 मे शुरू किये सिनेमा फार द एक्सीलेंस अभियान का यह आठवां फिल्म फेस्टिवल था।

इस फिल्म फेस्टिवल मे बेस्ट फीचर फिल्म, बेस्ट डॉक्यूमेंटरी, बेस्ट शोर्ट फिल्म, बेस्ट एनीमेशन, बेस्ट म्यूजिक वीडियो और बेस्ट ऐड फिल्म आदि विभिन्न कैटगरीज मे अवार्ड दिये जाते है। इस फिल्म फेस्टिवल मे भारत समेत 90 से अधिक देशो के प्रतिभागी पार्टीसिपेट करते है। हिन्दी फिल्म इण्डस्ट्री के लिहाज से इस आयोजन की प्रासंगिकता इस महत्व के कारण है कि इसमे प्रोफेशनल फिल्ममेकर्स के साथ साथ नये और युवा फिल्ममेकर्स को प्रतिभाग के लिए समान अवसर और प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जाता है। यह फिल्म फेस्टिवल दादा साहब फाल्के के जन्मदिवस 30 अप्रैल को प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।

उज्ज्वल पाण्डेय वाराणसी के युवा फिल्म निर्देशक है। विभिन्न विषयों और मुद्दों पर इनकी सौ से अधिक शोर्ट फिल्म्स और डॉक्यूमेंटरीज यूट्यूब पर मौजूद है। इनमे तीन मिनट की शोर्ट फिल्म 'ब्यूटीफुल' और भोजपुरी शोर्ट फिल्म 'कोहबर' सर्वाधिक चर्चित फ़िल्मों मे से है। ब्यूटीफुल के दर्शकों की संख्या यूट्यूब पर छियालिस लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है, वहीं 'कोहबर' साठ हजार से अधिक दर्शकों द्वारा अबतक देखी व सराही जा चुकी है।

पिछले दिनो उज्ज्वल की दो शोर्ट फिल्मों 'अक्कड़ बक्कड़' और 'मेघा' का सेलेक्शन फ्रान्स और लंदन इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स के लिए भी हो चुका है। 'मेघा' जहाँ मूक बधिर बच्चों के मेडिकल और सोशल ट्रीटमेंट पर आधारित फिल्म है, वहीं 'अक्कड़ बक्कड़' विशुद्ध रूप से एक मनोरंजन फिल्म है। इन दोनो फिल्मों का प्रसारण नेशनल टीवी चैनल एनडीटीवी प्राइम पर हो चुका है। दादा साहब फाल्के फिल्म फेस्टिवल मे भी इन दोनो फ़िल्मों का चयन हुआ था लेकिन जूरी द्वारा बेस्ट डाइरेक्शन, बेस्ट स्क्रिप्ट तथा बेस्ट शोर्ट फिल्म कैटगरी मे अवार्ड के लिए 'अक्कड़ बक्कड़' को चुना गया।फिल्म का निर्माण 'क्रिएटिव जिप्सी' के बैनर तले पिछले साल जून मे किया गया था। फिल्म का आइडिया, कहानी, स्क्रिप्ट लेखन और निर्देशन उज्ज्वल पाण्डेय का है।

उल्लेखनीय है कि उज्ज्वल इन दिनों अपनी ही भोजपुरी शोर्ट फिल्म 'कोहबर' के विषय और भोजपुरी ग्रामीण संस्कृति पर आधारित इसी नाम की फुल लेन्थ फीचर फिल्म के निर्माण के सिलसिले मे अपनी टीम के साथ आरा, बलिया और सिवान जिलों के बीच फैले गंगा के दियारे मे कैम्प कर रहे है। यह फिल्म उज्ज्वल के अपने प्रोडक्शन हाउस आरोहन फिल्म्स के बैनर पर बन रही है। हिन्दी और भोजपुरी सइनेमा को अपने इस युवा फिल्ममेकर से बहुत उम्मीदें है।

अरे नेपाल-यात्रा पर गोस्‍वामीजी से भी कुछ पूछ लो यार

: बिहार का जनमानस, जानकी, राम और गोस्‍वामी तुलसीदास बनाम नरेंद्र मोदी की ताजा बस-यात्रा : आम बिहारी अपनी बेटी का विवाह राम-क्षेत्र से करने में बिदकता है : रामशलाका की चौपाइयों को मैं बिहार की बेटियों के विवाह से जोडूं, या धार्मिक बस-यात्रा योजना में :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मैं मूलत: अघोरी-घुमन्‍तू प्राणी हूं। धूल-कींचड़ से लेकर खीर-पकवान तक जो भी मिल जाए, रस बटोरता रहता हूं। इसी क्रम में करीब तीन बरस पहले मैं बिहार के छपरा यानी सारण के निवासी और वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता बीरेंद्र नारायण सिंह से भी मिला था। न्‍याय-कर्म उनका पुश्‍तैनी धर्म है। गहन पाठक, गजब विश्‍लेषक और कुशल वक्‍ता हैं सिंह जी। बातचीत के दौरान चर्चा शुरू छिड़ गयी बिहार के मुकाबले बाकी पश्चिम भारत से सम्‍बन्‍धों पर। अचानक कोई टीस-सी लगी वयोवृद्ध श्री बीरेंद्र सिंह के दिल में। वे बरबस बोल ही पड़े कि हम बिहारी लोग बाकी पश्चिम क्षेत्र पर बेटी नहीं ब्‍याहते हैं। हालांकि अब नये माहौल में यह मान्‍यताएं टूटने लगी हैं, लेकिन आज भी अधिकांश बिहारी यह पसंद नहीं करता है कि उनकी बहन या बेटी की शादी बिहार से बाहर और खास कर पश्चिम राज्‍यों पर हो।

जाहिर है कि मैंने ही अगला सवाल उछाला, कि आखिर क्‍यों। जवाब था कि हम बहुत छले जा चुके हैं। हमारे सांस्‍कृतिक और धार्मिक ग्रंथ और उनकी गाथाएं बताती हैं कि धोखा हुआ है हम बिहारियों से। सिंह साहब ने अपनी बात को और विस्‍तार देना शुरू कर दिया। बोले:- हमारी धार्मिक आस्‍थाओं में है बेटी। बेटी हमारे समाज में सर्वोपरि स्‍थान रखती है। इतना सम्‍मान और आदर शायद ही किसी और समाज में दिया जाता हो, जितना सामान्‍य बिहारी समाज अपनी बेटी और बहन को देती है।

श्री बिरेंद्र नारायण सिंह का तर्क था कि त्रेतायुग में हम बिहारियों ने अपनी बेटी सीता पश्चिम के राजा अयोध्‍या को सौंपी थी। लेकिन वे लोग हमारी उस बेटी को लगातार अपमानित ही करते रहे। कहां-कहां की धूल फांकती रही सीता। इतना असुरक्षित माहौल दिया गया हमारी बेटी को, कि उसका अपहरण तक हो गया। बाद में अबला और गर्भवती सीता को राम के आदेश पर लक्ष्‍मण ने बियावान जंगल में फेंक दिया। सीता ने उफ तक नहीं की।

मगर कुछ भी गया हो, कभी भी सीता ने राम को कभी भी नहीं छोड़ा। राजपरिवार और राम लगातार सीता पर जुल्‍म ढाते रहे, लेकिन तब भी सीता ने कुछ भी आवाज नहीं उठायी। तब भी नहीं, जब राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा देने का आदेश जारी कर दिया। वह भी सरेआम, सार्वजनिक रूप से। सीता ने तब भी अपनी पीड़ा और अपने आंसू पी डाले, लेकिन चूं तक नहीं की। सीधे कदम उठाया और अग्नि के ज्‍वाला-कुण्‍ड में अपना प्राण दे दिया। श्री बीरेंद्र नारायण सिंह जी बताते हैं कि उनकी जानकारी में कई ऐसी घटनाएं हैं, जब बिहार की बेटी बिहार से पश्चिम ब्‍याह दी गयीं, लेकिन उनका सम्‍मान तो दूर, उन्‍हें हमेशा अपमान ही हुआ। हर क्षण, हर कदम। श्री सिंह पूछते हैं कि इन्‍हीं घटनाओं को देख कर अगर आम बिहारी अपनी बेटी-बहन का विवाह बिहार से पश्चिम करता है, तो क्‍या गलत करता है। तुम्‍हारे यहां बेटी और बहन के साथ क्‍या होता है, क्‍या संस्‍कार हैं तुम्‍हारे, हमें इसे जानने-समझने की क्‍या जरूरत है। हम तो केवल यह देख-समझ रहे हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी बेटी बिहार से पश्चिम मत देना चाहिए। खैर,

खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जनकपुर में हैं। वहां वे अपने 2019 के चुनाव को लेकर रणनीति को मूर्त आकार देंगे। मसलन, मद्धेसियों को कैसे इस चुनाव से जोड़ा जा सके। किस तरह जनक पुर से अयोध्‍या का रिश्‍ता मजबूत किया जा सके। भले ही उनकी यह रणनीति सामान्‍य तौर पर दो देशों के परस्‍पर रिश्‍तों को मजबूत करने की दिख रही हो, लेकिन सच बात यही है कि इस बस-यात्रा का मूल आधार धार्मिक ही है। कहने की जरूरत नहीं कि बिहार के दरभंगा से सटे नेपाल के उत्‍तरी-पूर्वी में है जनकपुर, जो काठमांडू से करीब चार सौ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्वी नेपाल में है। सीता का नाम मिथिलापुत्री और जानकी भी है। उसका तर्क यह कि जनकपुर ही बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं सीतामढ़ी और आसपास के विशाल मैथिल राज्‍य की प्राचीन राजधानी था। बाद में उस इलाका नेपाल में शमिल हो गया। नेपाल में आज भी सर्वश्रेष्‍ठ भाव को व्‍यक्‍त करने के लिए "रामरौ छ" शब्‍द का प्रयोग किया जाता है। जैसे निकृष्‍ट भाव को व्‍यक्‍त के लिए "गू छ" बोलते हैं आम नेपाली।

बहरहाल, त्रेतायुग और कलियुग के संधि-काल में काशी में एक महाकवि पैदा हुए, जो अवधी में राम नाम का एक महान महा काव्‍य-ग्रंथ लिख गये। उनके ग्रंथ का नाम था रामचरित मानस, और उसके रचयिता थे गोस्‍वामी तुलसीदास जी। गोस्‍वामी जी ने यह जो ग्रंथ लिखा, वह सुखान्‍त कम जबकि अधिकांश दुखान्‍त ही है। अपने ग्रंथ में गोस्‍वामी जी ने कुछ चौपाई भी लिखे हैं, जिनका जिक्र उन्‍होंने अपने ग्रंथ के अंत में बनी प्रश्‍न-वली भी पर भी दर्ज किया है।

मसलन:-

चौपाई:- उधरे अंत न होहि निबाहू , काल नेमी जिमि रावण राहू !

अर्थात:- यह चोपाई बाल काण्ड के आरम्भ की है, कार्य की सफलता में संदेह है ...

चौपाई:-  बिधि बस सुजन कुसंगत परही, फनि मनि सम निज गुण अनुसरही !

अर्थात:- यह चोपाई भी बाल काण्ड के आरम्भ की है, बुरे लोगों का संग छोड़ दो कार्य पूर्ण होने में संदेह है ...

चौपाई:- होई हें सोई राम रचि राखा, को करि तरक बढ़ावहि साथा !

अर्था‍त:- यह चोपाई बाल काण्ड में शिव पार्वती के संंवाद के समय की है, कार्य पूर्ण होने में संदेह है। प्रभु पर छोड़ दो ...

चौपाई:-  बरुन कुबेर सुरेस समीरा, रन सन्मुख धरि काह ना धीरा !

अर्थात:- रावण वध पर मंदोदरी के विलाप के संदर्भ में यह चोपाई है, कार्य पूरा होने में संदेह है ...

उपसंहार:- मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इन चौपाइयों को मैं बिहार की बेटियों से बिहार के बाहर के पश्चिमी क्षेत्र के साथ विवाह से जोड़ कर देखूं, या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज जनकपुर से अयोध्‍या तक शुरू की गयी बस-यात्रा योजना में देखूं।

ऐसे संयम से बेहतर है, कि हम अपनी सीमा तोड़ दें

: पहले तो यह समझ लीजिए कि आप मेंढक नहीं हैं : पानी का तापमान बढ़ते समय मेंढक अपने शरीर को भी एडजस्ट करता रहता है : मेंढक की कहानी, उसकी अनुकूलनता और उसकी परिणति की गाथा आप अब खुद सीधे अजय कुमार सिंह से सुन लीजिए :

अजय कुमार सिंह

लखनऊ : जीवन में विभिन्‍न पहलुओं पर आने वाले चढ़ाव-उतार को लेकर समाज के विभिन्‍न लोगों का नजरिया अलग-अलग होता है। अपनी हालातों से बेहाल दीखते लोगों के प्रति सामान्‍य तौर पर लोग-बाग यही सुझाव देते दिख जाएंगे कि जरा हर चीज को माहौल के हिसाब से ही देखा-समझा और जीना चाहिए। इसके लिए तर्क विभिन्‍न तरीके से दिये जाते हैं। और कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे तरीकों के आयाम और उसके परिणाम हमेशा एक से ही नहीं होते हैं। जीवन के कोई भी हिस्‍से से होने वाली समस्‍याएं हमेशा एक सी नहीं होती हैं। केवल शुष्‍क गणित के कठिन समीकरण ही नहीं होते हैं जीवन के सवाल। एक ही समस्‍या की पहचान, उसके कारक-तत्‍व और उससे निपटने को अगर ठीक से समझ भी लें, तो भी ऐसा नहीं होता है कि उसका समाधान शर्तिया हो ही जाए। माहौल और परिस्थितियां भी एक बहुत बात होती है।

कुछ भी हो, किसी भी समस्‍या या खतरों को लेकर सामंजस्‍य-तालमेल बिठाना एक बेहतर तरीका होता है, लेकिन हर चीज की हद जरूर होनी चाहिए। जो पेड़ नहीं झुक पाते, वे झोंकों में ढह जाते हैं। लेकिन हर झुकाव जीवन को खत्‍म भी कर सकता है। जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्‍ता अजय कुमार सिंह ने एक बेहद मार्मिक कथा सुनायी है। यह समस्‍याओं के प्रति प्राणी के अनुकूलन की प्रक्रिया को लेकर है। इस कहानी में केंद्र-नायक रखा पहचाना गया है मेंढक। अब इस मेंढक की कहानी, उसकी अनुकूलनता और उसकी परिणति की गाथा आप अब खुद सीधे अजय कुमार सिंह से सुन लीजिए। हालांकि हम आपको चेतावनी भी देना चाहते हैं कि अजय कुमार सिंह ने खुद ही इस कहानी में साफ लिख दिया है कि इस कहानी का मूल-संदेश हर चीज पर लागू नहीं हो सकता है।

खैर, अब आप अजय कुमार सिंह से मेंढक और उसकी अनुकूलनता का किस्‍सा सुन लीजिए। निष्‍कर्ष आपको खुद ही पता चल जाएगा।:-

क्या आप जानते है, अगर एक मेंढक को ठंडे पानी के बर्तन में डाला जाए और उसके बाद पानी को धीरे धीरे गर्म किया जाए तो मेंढक पानी के तापमान के अनुसार अपने शरीर के तापमान को समायोजित या एडजस्ट कर लेता है।

जैसे जैसे पानी का तापमान बढ़ता जाएगा वैसे वैसे मेंढक अपने शरीर के तापमान को भी पानी के तापमान के अनुसार एडजस्ट करता जाएगा।

लेकिन पानी के तापमान के एक तय सीमा से ऊपर हो जाने के बाद मेंढक अपने शरीर के तापमान को एडजस्ट करने में असमर्थ हो जाएगा। अब मेंढक स्वंय को पानी से बाहर निकालने की कोशिश करेगा लेकिन वह अपने आप को पानी से बाहर नहीं निकाल पाएगा।

वह पानी के बर्तन से एक छलांग में बाहर निकल सकता है लेकिन अब उसमें छलांग लगाने की शक्ति नहीं रहती क्योंकि उसने अपनी सारी शक्ति शरीर के तापमान को पानी के अनुसार एडजस्ट करने में लगा दी है। आखिर में वह तड़प तड़प मर जाता है।

मेंढक की मौत क्यों होती है ?

ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि मेंढक की मौत गर्म पानी के कारण होती है।

लेकिन सत्य यह है कि मेंढक की मौत सही समय पर पानी से बाहर न निकलने की वजह से होती है। अगर मेंढक शुरू में ही पानी से बाहर निकलने का प्रयास करता तो वह आसानी से बाहर निकल सकता था।

सामंजस्य बिठाने की मेरी अपनी लिमिट है, उस सीमा के बाहर सामंजस्य क्यों नहीं बिठाता इस प्रसंग को पढ़कर समझना चाहें तो समझ ले सकते हैं।)

( विभिन्‍न विषयों पर गहरी नजर रखने वाले लेखक अजय कुमार सिंह जबलपुर हाईकोर्ट में अधिवक्‍ता हैं। )

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