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कुम्‍भ-पर्व: कहीं पे निगाहें,कहीं पे निशाना

: लक्ष्य है चुनाव-चुनाव, माध्यम है कुंभ और खजाना है सरकार का : अफसरों ने अभूतपूर्व कमर कस ली, खबरों की बात भूल जाइये : प्रसून जोशी की कंपनी को दिया गया रेवड़ियां बांटने का काम, जितना मुंह होगा, विज्ञापन ठूंस दिये जाएंगे :

कुमार सौवीर

लखनऊ : शतरंज का खेल। जिसके नाम पर बाकायदा एक फिल्म तक बॉलीवुड बनाई जा चुकी है, लखनऊ में लोकेशन थी और गोमती नदी के किनारे से लेकर चौक के इलाके तक फिल्माए गए थे। कलाकार थे संजीव कुमार और अमजद खान। लेकिन यह तो सिर्फ कहानी थी, मगर उसके पीछे जो चालें बिखेरी और चली गई थीं उसने ही इस फिल्म को कामयाब करा दिया था।

ठीक ऐसी कहानी अब कुंभ पर्व को लेकर रची जा रही है। अलग-अलग निशाने हैं, अलग-अलग निगाहें हैं। अलग-अलग लक्ष्‍य है, अलग-अलग बाण हैं। अलग-अलग माध्यम हैं, अलग-अलग पात्र हैं। लेकिन इसमें आत्मा के तौर पर जिस चीज को चिन्हित किया गया है उसका नाम है सरकारी खजाना। यह सरकारी खजाना ही तो वह साधन है, जो भाजपा का डंका बजा सकता है, अगर निशाना सटीक पड़ा, तो।

जी हां, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ पर्व वहां आयोजित होने वाले  विश्व विख्यात मेला और उसकी तैयारियों को लेकर जो सरकारी कवायद चल रही है, उसमें बेशुमार रकम फूंकने की कोशिश हो रही है। सूत्र बताते हैं कि इस मेला के प्रचार में इतनी रकम फूंक डाली जाएगी, कि पिछली अखिलेश सरकार के आंकड़े फेल हो जाएंगे।

विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि यह पूरा आयोजन कहने को तो कुंभ पर्व और उसके मेला को लेकर खर्च किया जाएगा। लेकिन इसके माध्यम से सरकार सीधे सन 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी मजबूत हैसियत बनाने की जुगत में है। क्योंकि यह पूरा आयोजन ठीक उसी वक्त पर हो रहा होगा जब लोकसभा चुनाव में चल रहे होंगे। ऐसी हालत में सरकारी खजाने से खर्च होने वाली रकम का लाभ भाजपा को चुनाव में मजबूती दिला सके, इसके लिए कुंभ पर्व की रणनीति प्रशासनिक तौर पर बनाई जाने की जोर-शोर कवायद चल रही हैं।

दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया किया कि कुम्‍भ पर्व में पूरी प्रचार कैंपेन की बागडोर एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी को थमा दे दी गई है जिसका नाम है 'मैकऐन इरिक्सन'। फैसले के तहत यह कंपनी ही इस पूरे मेला और पर्व क्षेत्र में न्यूज़ चैनल, टीवी चैनल, अखबार, आउटडोर और बैनर होर्डिंग का काम करेगी। यही कम्‍पनी क्रिएटिव, फोटो सेशन, चलाएगी आउटडोर शूटिंग करायेगी, और इसके अलावा जो भी उसके मन में आएगा, करेगी। यूपी सरकार के अफसर इस कंपनी के सामने हाथ जोड़े खड़े रहेंगे।

तो आइये, जरा समझ लिया जाए कि यह 'मैकऐन इरिक्सन' नामक कंपनी का आधार क्या है। कोई भी खास आधार नहीं है जनाब, कुछ भी नहीं। सिवाय इसके कि कंपनी के अध्यक्ष प्रसून जोशी हैं जो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। और हाल ही नरेंद्र मोदी के करीबी बन चुके हैं। उसके बाद से ही उनकी पहुंच देश व यूपी के सभी बड़े भाजपा नेताओं तक हो गयी। फिर क्‍या था, प्रसून की इस कम्‍पनी की तूती कुम्‍भ पर्व में भी बजने लगी। सूत्र बताते हैं कि सूचना विभाग और मुख्यमंत्री सचिवालय के बड़े-बड़े अफसर इस कम्‍पनी के इस दायित्व को पूरा करने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। सभी माध्यम मीडिया में विज्ञापन वाले लोग प्रसून जोशी के दरवाजे पर अरदास लगाते हैं।

बताते हैं कि अखबारों और चैनलों को उनकी मांग से ज्यादा पैसा उनके मुंह में ठूंसा जा चुका है। ऐसे में अब यह उम्मीद पालना बंद कर दीजिएगा कि आपको आम आदमी को जोड़ने वाली खबर मिलेगी। सच बात तो यही रहेगी कि अब जो भी परोसा जाएगा चैनल और अखबारों में, वह वही मिलेगा जो सरकार चाहती है और जिसे अफसर उनके मुंह पर फेंकेंगे।

लक्ष्‍य होगा मिशन-2019

दो वकीलों को जज बनाने पर केंद्र का रोड़ा, लिस्‍ट वापस

: केएम जोसफ की प्रोन्‍नति के लफड़े के बाद अब यूपी न्‍याय-क्षेत्र पर हस्‍तक्षेप : कोलिजियम से भेजी गयी लिस्‍ट में से यूपी के दो नामों पर केंद्र सरकार ने नहीं दी मंजूरी : कानून मंत्रालय ने लखनऊ बेंच के मोहम्मद मसूर और इलाहाबाद पीठ के बशारत अली खान के नाम पुनर्विचार के लिये वापस भेजे :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्‍ली : अभी उतराखंड के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केएम जोसफ के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नित की फाइल वापस भेजने का मामला ठंडा भी नही हुआ था कि केंद्र सरकार ने एक नया बवाल कर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज बनाने के लिये भेजे गये दो नाम मोहम्मद मंसूर और बशारत अली खान के नाम को कानून मंत्रालय ने फिर से वापस कर दिया है। दलील दी गई है कि इन दोनों के खिलाफ कुछ शिकायते हैं।

आपको बता दें कि यह दूसरी बार हुआ है जब इन दोनों के नामों को कानून मंत्रालय ने पुनर्विचार के लिये वापस किया है। इससे पूर्व में भी 2016 में इन दोनों के नाम सरकार ने पुनर्विचार के लिये वापस भेजे थे परंतु सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इन दोनों नामों की सिफारिश कर दी थी कि दोनों के खिलाफ की गई शिकायतें फर्जी हैं। पर सुप्रीम कोर्ट ने लगभग डेढ़ साल तक फाइल को दबाये रखा और अब फिर से दोनों नामों को वापस भेज दिया। कानून के जानकार बताते हैं कि ये कानूनी रूप से गलत है। क्यूंकि अगर किसी नाम की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट दुबारा कर देती है तो उस नाम को जज बनाना सरकार के ऊपर बाध्यकारी हो जाता है। परंतु सरकार ने फिर भी दोनों नामों को वापस भेज दिया।

इन दोनों में से ज्यादा चर्चित नाम मोहम्मद मंसूर का है। मंसूर लखनऊ हाईकोर्ट में लगभग बीस सालों से प्रैक्टिस कर रहे हैं और सपा सरकार में मुख्य स्थायी अधिवक्ता भी रहे हैं। वे फौजदारी मामलों के जानकार बताये जाते हैं। इनके पिता स्वर्गीय जस्टिस सगीर अहमद सुप्रीम कोर्ट के जज रहे हैं। कहा जाता है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार के दौरान जस्टिस सगीर को कश्मीर के मुद्दे पर बनी एक कमिटी का अध्यक्ष बनाया गया था। उस कमिटी ने कश्मीर में शांती के लिये कश्मीर को आज़ादी देने की पैरवी की थी। जब ये रिपोर्ट बाहर आई थी तब इस पर काफी हल्ला भी हुआ था और भाजपा ने खुले तौर पर इस रिपोर्ट का विरोध भी किया था।

बीजेपी का सीएम: पहले अहंकार, अब बेशर्मी

: उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री ने जो भी किया, शर्म-ओ-हया को दरकिनार करके : बुजुर्ग शिक्षिका उत्‍तरा पंत को अब त्रिवेंद्र रावत सरकार ने किया सस्‍पेंड : मुख्‍यमंत्री से अभद्रता वाली घटना पर आरोप लगाया कि गैरहाजिर थी उत्‍तरा पंत : शिक्षा सचिव ने दिया मूर्खतापूर्ण कारण :

कुमार सौवीर

लखनऊ : घर का पुरखा, यानी गृह-स्‍वामी हमेशा बेहद शांत, सौम्‍य, ईमानदार, पक्षपातविहीन, और भेदभाव से कोसों दूर रहने वाला माना जाता है। लेकिन यह शर्त अब उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर लागू नहीं होती है। पहाड़ के एक दुर्गम क्षेत्र में सरकारी विद्यालय की बुजुर्ग शिक्षिका उत्‍तरा पंत के साथ जो व्‍यवहार उत्‍तराखंड की सरकार ने की है, इससे एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्‍यमंत्री रावत से कथित अभद्रता के मामले में सरकार ने उस घटना को छिपा लिया है, मगर उस पर केवल इस आधार पर निलम्बित कर दिया है, कि वह काम से गैरहाजिर चल रही थी।

इस मामले में सरकार की तरफ से प्रदेश की शिक्षा सचिव डॉ भूपेंद्र कौर ने स्‍पष्‍टीकरण दिया है। यह पूरा बयान सिरे से बेवकूफी भरा है। कौर बोलीं हैं कि उत्‍तरा पंत काम ही नहीं करती थी, हमेशा गैरहाजिर रहती थी। सन-08 और सन-11 में भी काम से लापता होने पर उसे सस्‍पेंड किया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद सन-15 से सन-17 के बीच वह कई महीनों तक ड्यूटी पर से लापता रही। विगत 9 अगस्‍त-17 को वह फिर लापता रही। लेकिन सन-15 के बाद से उत्‍तरा पंत पर क्‍या कार्रवाई की गयी, उसका कोई भी जवाब डॉ कौर के पास नहीं है। कौर बोली हैं कि उत्‍तरा पंत के गैरहाजिर होने से शिक्षा तबाह होती रही, लेकिन उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की थी त्रिवेंद्र रावत सरकार ने।

उधर उत्‍तरा पंत लगातार त्रिवेंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं। उनका आरोप है कि यह अपराधियों की सरकार हैं, और उसके चलते पूरी व्‍यवस्‍था ही तबाह होती जा रही है। स्‍वार्थलिप्‍सा असमान पर है। मुख्‍यमंत्री अपनी पत्‍नी की तो पोंस्टिंग करा ले गये लेकिन मेरे जैसे तमाम लोगों का काम जानबूझ कर बिगाड़ा जा रहा है।

नमक का फर्ज किया उत्‍तराखंड के संपादकों ने

: सस्पेंड करो इसको, ले जाओ इसको, कस्टडी में लो इसको : उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को सलाह कि सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट के भरोसे ना रहें : उत्तरा प्रकरण पर सरकार के समर्थन में उतरे कुछ भाड़े के जैसे लोगों को मुंह की खानी पड़ी और मैदान छोड़ना पड़ा :

दिनेश जुआल

देहरादून : उत्तरा प्रकरण पर अपनी टिप्पणी के साथ मैंने अखबारों की भूमिका पर भी छोटी सी टिप्पणी कर दी थी। लानत तो खुद को भेजी थी। कुछ पुराने साथी नाराज है और होना ही चाहिए , नहीं तो मेरी वो टिप्पणी व्यर्थ जाती। उत्तराखंड में सोशल मीडिया पर शुक्रवार को जितनी पोस्ट उत्तरा जी के मामले पर दिखी उतनी अब तक शायद ही किसी और मामले पर हुई हों। Ndtv, ajtak, avpnew से लेकर रीजनल, लोकल चैनल्स तक ने चिंता के साथ इस घटना को रखा। उत्तराखंडी ही नहीं राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों, विचारवान लोगों ने सोशल मीडिया पर सरकार के मुगलिया बादशाही अंदाज की निंदा की। ऐसे में देहरादून के अखबारों में सरकार की छवि की गंभीर चिंता के साथ खबर को सही ढंग से ना देने पर यहां के पत्रकारों को भी खूब गालियां पड़ी। ये गालियां मैंने नहीं दी। कुछ न्यूज पोर्टल देखे उनमें भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। यहां के पत्रकारों की प्रतिक्रिया भी है।

मीडिया प्रभारी, मीडिया सलाहकार, मीडिया समन्वयक सब अपनी ड्यूटी कर रहे थे, नमक का फर्ज अदा कर रहे थे। लेकिन जब लगा कि संपादक पर मीडिया समन्वयक भारी पड़ गए तो लोगों ने जो महसूस किया, लिख दिया। इनका काम सरकार की अच्छी छवि पेश करना और जनता के मतलब की सूचनाएं मीडिया के माध्यम से पहुंचाना है। जब ये खुद संपादक की हैसियत में आ जाते हैं। खबर का एंगल बताते हैं या गलत जानकारी फीड करने लगते हैं तो मीडिया की हत्या करने लगते हैं। ऐसे ही मीडिया को लुभाने भरमाने वाले लोगों की वजह से हमारे देश का मीडिया प्रेस की आजादी के मामले में १३८वें स्थान पर आ गया है।

अगर मीडिया की समालोचना का अपराध हुआ तो इसमें मेरे साथ सैकड़ों और लोग शामिल हैं। हम सबने ये बहुत अच्छा गुनाह कर डाला। चलो हिंदुस्तान में इस प्रकरण का फॉलोअप तो दूसरे दिन पहले पेज पर आया। सवाल तो अब भी है कि जब असल घटना हुई तो धोकर अन्दर क्यों खदेडी गई । आज अन्दर एक पैकेज भी है। कल वाकई निराशा हुई थी, जबकि इस अखबार में पूरन बिष्ट जैसे पहाड़ के प्रति बेहद संवेदनशील समाचार संपादक, और एक एक बीट पर एक्सपर्ट जानकारी रखने वाले वरिष्ठ रिपोर्टर हैं। तो क्या जिस तरह खबर परोसी गई उसके पीछे इस अखबार के रिपोर्टर रह चुके सूचना समन्वयक दर्शन रावत की मेहनत थी। या फिर बॉस की? अगर ऐसा होता रहता है तो उन पत्रकारों का क्या मनोबल रहेगा जो काबिल हैं और इस अखबार से बड़ी आस्था से जुड़े हैं। जागरण में काफी हद तक जनभावनाओं की कद्र दिख रही है। यहां के धीर गंभीर संपादक कुशल जी विवादों से दूर रहते हैं। आज के उनके पैकेज में भी कुछ चिंताएं दिख रही हैं। अमर उजाला ने कल भले ही पूरा भाव न पकड़ा हो लेकिन प्लेसिंग सबसे अच्छी थी। टॉप बॉक्स। आज भी पहले पेज पर फ्लायर के अलावा अन्दर पूरा पेज, जिसमें उत्तराखंड की उत्तराओं की चिंता दिख रही है। संपादक जी ने शहर से बाहर होते हुए भी अपनी टीम को गाइड किया उसके लिए सराहना।

मैं आज सोशल मीडिया का प्रभाव भी देख रहा हूं। यहां बात सिर्फ इस प्रकरण की हो रही हैं और मेरा मानना है कि ऐसे ही और मुद्दों पर भी ये दबाव बनना चाहिए। वैसे सोशल मीडिया पर सब कुछ बहुत अच्छा नहीं हो रहा है। वहां तो चुनाव लडा जा रहा है। ये देखना भी सुखद रहा कि उत्तरा प्रकरण पर सरकार के समर्थन में उतरे कुछ भाड़े के जैसे लोगों को मुंह की खानी पड़ी और मैदान छोड़ना पड़ा।

एक बात साफ है कि इस प्रकरण में अगर बात कुछ न्याय की तरफ जाती है, मुख्यमंत्री परोक्ष रूप से ही सही अपनी गलती का अहसास करते हैं, ठस्की अफसरों और खुद को ख़ुदा मान बैठे लोगों को थोड़ी सी भी अक्ल आत्ती है तो क्रेडिट उन सैकड़ों लोगों को जाता है जो कल से अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे थे। सब इसलिए दुखी थे कि एक शिक्षिका का भरे दरबार में अपमान हुआ। सबको अपनी प्राइमरी शिक्षक की शक्ल याद आयी होगी । जिसने हमें अक्षर ज्ञान ही नहीं जीवन के बुनियादी पाठ पढ़ाए थे। मुख्यमत्री ने भी प्राइमरी जरूर पढ़ी होगी, लेकिन उनके लिए सब नौकर है। वो मालिक ठहरे सूबे के। सस्पेंड करो इसको, ले जाओ इसको, कस्टडी में लो इसको...... उत्तरा जी के कानों ये इसको ... इसको.... इसको ... बार बार गूंज रहा था। पति की मौत के बाद बिखरी गृहस्थी से दुखी शिक्षिका के लिए न्याय नहीं है तो ऐसा अपमान तो ना करो। ऐसी तो जेलर की भी भाषा नहीं होती । बहरहाल शिक्षिका थी कुछ तो सबक सिखाया ही। परोक्ष रूप से ही सही। चोर उचक्के तो उन्होंने एक बिरादरी के लिए कहा और यकीन मानिए सामने चाटुकार कुछ भी कहें पीठ पीछे आम जनता इस बिरादरी को ऐसे और इससे मिलते जुलते संबोधनो से नवाजती है। यहां मीडिया से द्रवित होने की अपेक्षा थी। रिपोर्ट कर रहे और खबर तय कर रहे लोगों में भी कुछ शिक्षकों की संतान होंगे और उन्हें पता होगा सम्मान और स्वाभिमान का महत्व शिक्षक क्या बताते हैं।

मीडिया में अगर कुछ लोग ये गलतफहमी पाले बैठे हैं कि सच तो वहीं माना जाएगा जो हम लिखेंगे तो पोलैंड की तानाशाही का इतिहास पढ़ लें । हम तो भारत जैसे लोकतंत्र में हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को नेक सलाह कि सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट के भरोसे ना रहें। यहां की राजनीति में टांग खींचने का खेल आप तो जानते ही हैं।

(अमर उजाला और हिन्‍दुस्‍तान समाचार पत्र में कई संस्‍करणों में संपादक रह चुके हैं दिनेश जुआल। उनका यह आलेख उनकी वाल से साभार है)

एक दिन सम्‍पादक के घर

: कानपुर, देहरादून और अमर उजाला में कानपुर, देहरादून तथा बरेली में सम्‍पादक रह चुके हैं दिनेश जुआल : लैब्राडोर तो ऐसा कूदा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो : वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ का हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं :

कुमार सौवीर

देहरादून : किसी से सहमति अथवा असहमति तो अलग बहस बन सकती है। लेकिन इतना जरूर है कि दिनेश जुयाल से भेंट करना किसी को भी एक अलहदा अनुभूति करा सकता है।

बरेली के अमर उजाला में संपादक पद से रिटायरमेन्ट के बाद जुयाल जी अब देहरादून में बस गए हैं। यहां देहरादून में भी वे हिंदुस्तान दैनिक में सम्पादक रह चुके हैं। मिला, तो लगा कि मुझसे मिलने की ख्वाहिश उन्हें मुझसे ज्यादा थी। एक ही बड़े भूखंड में तीनों भाइयों के परिवार रहते हैं। सब का अलग मकान, लेकिन एक ही परिसर। रसोई भी एक।

गेट से घुसते ही दो-मंजिले मकान की सीढ़ियों पर खड़े जुयाल जी देख कर चहक पड़े। कंधे पर सवार थी एक पालतू बिल्ली, और नीचे भौंकता कुत्ता लैब्राडोर। स्वर आत्मीय। बाद में पता चला कि दोनों एक ही थाली में खाना खाते हैं, बिना गुर्राए। नो झंझट, नो लपड-झपड़।

इधर जुयाल जी से हाथ मिलाने की कोशिश की ही थी, कि बिल्ली उचक कर मेरे कांधे पर सवार हुई। बिना टिकट। लैब्राडोर तो इतना कूदने लगा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। उम्र बमुश्किल एक बरस, मगर स्नेह और ऊर्जा का विशाल भंडार। शिशुवत।

कोई भी औपचारिकता नहीं। जिसके जो मन करे, करता रहे। कुछ देर तक मेरे कंधे पर मुफ्त सफर करने के बाद बिल्ली तो राजाजी अभ्यारण्य में रहने वाली अपनी बड़ी भांजियों ( शायद बड़ी बिल्लियों ) से भेंट-मुलाकात करने निकल गयी, लेकिन इधर कुत्ता अपने जात-बिरादरी यानी हम जैसे वाच-डॉग्स से चुहल करने लगा। रिमोट और जुयाल जी का चश्मा मुंह में दबोचना उसका खास शगल है। बेधड़की इत्ती, कि जिस प्लास्टिक वाली पाइप से उसे डांटा जाता है, उसे वह चबा लेता है।

रागिनी भाभी तो जन्मना प्रसन्न व्यक्तित्व। बिना मुस्कान के उनकी कोई भी बात शुरू ही नहीं होती। भोजन तो कुछ ऐसी खास रुचिकर प्रविधि से बनाती हैं कि कोई भी शख्स 25 फीसदी अतिरिक्त राशन उठा ले। मोटे लोग सावधान। बातचीत में अव्वल, जुआल जी की वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ उन्हें न केवल याद हैं, बल्कि उसका हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं भाभी। अभी कुछ दिनों से वे बीमार हैं। इसलिए हमारे आने की खबर सुनकर उनकी देवरानी किचन में जुट गई। वह भी गजब की व्यक्तित्व निकली।

दिनेश जी से लंबी बात हुई। रिकार्ड किया। वे खुलकर बोलते हैं, जो सवाल आप न पूछ पाए, उसका भी जवाब दे देंगे। बेहिचक। लेकिन कई मसलों पर साफ कह देंगे कि:-यह ऑफ द रिकार्ड है।

रात को शर्बत-ए-जन्नत हचक कर आत्मसात किया। आधा पेग एक्स्ट्रा खींच लिया मैंने। भोजन के बाद सुबह स्वादिष्ट पोहा। लैब्राडोर से नातेदारी बन ही गई थी। अब शायद उसे विदाई का अहसास हो चुका था, वह शांत लग रहा था। गम के बादल छंट जाएं, यह सोच कर मैंने चलते वक्त उसका माथा चूम लिया।

बस फिर क्या था, अपनी औकात में आ गया। आदमकद छलांगे-कुलांचें मुझ पर भरने लगा। उसकी लार से सारा कपड़ा भीगने के डर से मैं जुयाल जी के भाई की कार में झपट कर घुस गया, जो मुझे पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी परिसर छोड़ने जा रहे थे।

आधा घंटा के सफर के दौरान जुयाल जी के छोटे भाई ने मुझे पहाड़ के बारे में कई मोटी-मोटी मगर गहरी जानकारियां थमा दी।

अब बताइए, कि अब कोई कैसे भूल सकता है जुयाल जी के परिवार को।

(दिनेश जुयाल जी से कई मसलों पर मैंने लम्‍बी बातचीत की है। लेकिन लैपटॉप न होने के चलते उन्‍हें मैं अपलोड नहीं कर पाया। अब उसे विभिन्‍न विषयों पर अलग-अलग वीडियो-क्लिप लगाने की कोशिश करूंगा। )

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