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भरी हाईकोर्ट में छलक पड़ी थी इस "लेखपाल" की आंख

: हाईकोर्ट की भरी कोर्ट नम्‍बर एक में जज ने कड़े सवाल किये थे एसएन शुक्‍ला से : अपने जीवन में हर दायित्‍व को लटकाया नहीं, बल्कि उसे धर्मयुद्ध की तरह लड़ा है इस लेखपाल ने : सभी भारतीयों की तरफ से शुक्ला जी को और आपको हार्दिक आभार :

आरडी शाही

लखनऊ : एसएन शुक्ला से मेरा परिचय तो नहीँ है लेकिन वो शायद मुझे पहचानते ज़रूर होंगे क्यों कि मै विगत कई सालों से उन्हे नमस्कार करता हूं . वैसे वो low frofile रहते हैं .उनको कोई तवज्जह भी नहीँ देता .उन्हे "लोक प्रहरी " के माध्यम से कई बार न्यायालाय मे PIL के लिये धक्के खाते देखता था तो मुझे उन पर गुस्सा भी आता था .सोचता था इतने भले आदमी को इतना अपमान और पीडा क्यों ? हम अच्छे cause के लिये संघर्षरत लोगों को अच्छे से क्यों नही देखते ? लेकिन वो कर्मयोगी हैं .आज उनकी कई सालों का प्रयास रंग लाया जब सरकार की हीला हवाली और टाल मटोल के वावजूद सुप्रीम कोर्ट का आदेश रंग लाया और सभी पूर्व माननीय अपना दूसरा ठिकाना तलाश रहे हैं ........

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

Virendra Vikram Singh : उन्हें और आप को बधाई ।

Prem Prakash Singh सर, शायद ऐसे और लोगों की जरूरत है ,हमारे बीच भी हैं कुछ एक --प जैसे ,जिनके होने से कुछ होने का विश्वास होता है।।

Savita Bhagwat : आदरणीय शाही जी, चुंधियाते काँच के ढेर (तथाकथित रतनों ) में हीरा बमुश्किल और देर से ही पहचान में आता है, उसे आना ही होता है ,यह "कुछ" जौहरी जान भी रहे होते हैं(स्व सन्दर्भ ही लें.....हम noble cause के लिए संघर्षरत लोगों को अच्छे से क्यों नहीं देखते? लेकिन वे कर्मयोगी हैं.....किसी संज्ञा विशेषण के पारदर्शी और चमकदार "मूल्य"बनने बनाने में, "धातुकर्म" के प्रक्रम से तो गुजरना ही होता है........और यही इन "आदर्श हीरे" के साथ भी हुआ है।

G L Yadav Adv : बेहद सटीक और सुन्दर टिप्पणी भ्राता श्री।

Savita Bhagwat : G L Yadav Adv हे वत्स! तुम्हें "मानवीय मूल्यपोषक" इसी आर्ष परम्परा का "पाणिनि"और "व्यास " होना है यदुश्री जी एल। ....और तुम सम्भवनाओ से भरे भी हो। आदरणीय

Shahi Shahi : जी KE " मुक्त "गुरुकुल" मेंतुम सरीखे "मर्मज्ञ" अनुभव कर लोकहित में "मुखरित" होते हैं तो लोकधर्म भी सधता है ,और आनंदानुभूति भी होती है

Mohit Dwivedi : हमने कोर्ट no1 में उन्हें आहत होकर भरे हुए गले और आंखो में भी देखा है जब 'sirजी' ने उनकी credentials को doubt किया था। जनहित याचिकाओं पर काम कर अपनी शोहरत बटोरने वालों में से शायद ही किसी महारथी में से कभी ऐसा ऐसा व्यवहार दिखाया हो।

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लर्नेड वकील साहब

Shahi Shahi : Sir jee jaise longo kaa ilaz krte krte kabhee kabee mera hath idhar udhar mud jata hae aur meree kirkiree ho jatee hae.hahaha.

Kamlesh Shukla : Ji, Bhai Saheb, Shukla Ji bahut hi humble person hain.

Pramod Singh Gahmari : ऐसे ही कर्मयोगीयो की आज ज़रुरत है बेईमान और ऊचक्के आज के सत्ता लोभी मकान चोरो को ऐसे लोग ही सही कर सकते है

Jitendra Pratap Singh : क्या कोई आदेश हुआ है भाई साहब ?

Ashok Shahi : आंच आती है ।शायद इस लिये लोग उपेक्षा करते है। कैसे स्वीकार करे ।

Shrikant Shukla : This is also a type of addiction. Why you ignore Sibbal & Prashant only because he belongs to your category.

Devesh Kumar Misra : शुक्ला जी बहुत ही प्रशंसा के पात्र हैं।

Shiivaani Kulshresthhaa : सर अभी भी कई विषयों पर जनहित याचिका होना जरुरी हैं पर नही हो पा रही। यदि अधिवक्ता चाहे तो कई विभागों के स्कैम बाहर ला सकते हैं पर हम मे से कोई ऐसा नही करेगा। हम सिर्फ मशीनें हैं। जबकि अधिवक्ता सोशल इंजीनियर होते हैं...

VP Singh Chauhan : धन्यवाद शाही साहब.. माननीय सुप्रीम कोर्ट को माननीयों के अवैध कब्जे छुङाने के लिये आदेश पारित करने की नींव रखने वाले शुक्ला जी का नाम हर किसी को नही मालूम होगा.. सभी भारतीयों की तरफ से शुक्ला जी को और आपको हार्दिक आभार..

Surendra Pratap Singh : Father and son both can live in village if they have no house in lucknow in there grand father house

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बड़ा बाबू

( आरडी शाही का लखनऊ हाईकोर्ट में वकील हैं। जन-सामान्‍य में उनकी छवि एक मानवीय और सरल, लेकिन वाकई एक विद्वान अधिवक्‍ता की मानी जाती है। हमने शाही का यह पत्र उनकी एफबी वाल से बटोरा है। आपको बता दें कि एसएन शुक्‍ला यूपी के वरिष्‍ठ आईएएस रह चुके हैं, और रिटायर होने के बाद अब वकालत में जुटे हैं। हाल ही यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्रियों समेत बड़े दिग्‍गज राजनीतिज्ञों द्वारा सरकारी बंगलों पर काबिज प्रवृत्ति को गैरकानूनी बताते हुए मुकदमा जो दायर किया था, उसमें सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने विशालकाय बंगलों पर काबिज सारे ऐसे नेताओं को अवैध करार दे दिया है। जाहिर है कि हड़कम्‍प मचा हुआ है। यहां लेखपाल शब्‍द का उल्‍लेख और उच्‍चारण-प्रयोग एसएन शुक्‍ला को लेकर ही है, क्‍यों कि वे राजस्‍व से जुड़े प्रशासनिक ढांचे की पहली सीढ़ी को सम्‍भालते रहे हैं। ) ( क्रमश:)

सरकारी बंगलों में सरकारी खजाने से मालपुआ उड़ाने पूर्व मुख्‍यमंत्रियों पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय के करारे हमले ने नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा की जाने वाली सरकारी खजाने की लूट का खुलासा तो किया है। इस प्रकरण पर हम लगातार श्रंखलाबद्ध स्‍टोरी आप तक पहुंचाते रहेंगे। उससे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कमाल का लेखपाल

वकील: जेठानी न खुद धोएंगी, न देवरानी को धोने देंगी

: इलाहाबाद में सरेआम कत्‍ल किये गये वकील राजेश श्रीवास्‍तव को लेकर वकीलों में असंतोष चरम पर : एक वकील ने खुला विरोध-पत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को भेजा : बार अध्‍यक्ष ने कहा कि कुछ वकीलों का पत्र मिला है, उस पर रणनीति होगी :

मेरी बिटिया संवाददाता

इलाहाबाद : एक अधिवक्‍ता की सरेआम हुई हत्‍या को लेकर अब वकीलों का गुस्‍सा लगातार भड़कता ही जा रहा है। निशाने पर हैं पुलिस और प्रशासन के अफसरों के साथ ही साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसियेशन के अध्‍यक्ष इंद्रकुार चतुर्वेदी। हालत यह है कि बार के लोगों ने चतुर्वेदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनका आरोप है कि राजेश श्रीवास्‍तव की हत्‍या के मामले को चतुर्वेदी जी दबा रहे हैं, जबकि बार को चाहिए था कि वे इस मामले पर निर्णायक लड़ाई छेड़ते। पत्र में लिखा गया है कि अगर कोई प्रभावी रणनीति तैयार नहीं की गयी तो शक है कि हमने अपना नेतृत्व एक बहुत ही कमजोर व्यक्ति के हाथ मे सौप दिया है।

उधर बार एसोसियेशन के अध्‍यक्ष आईके चतुर्वेदी का दावा है कि किसी भी बार की अपनी सीमाएं होती हैं, और उसी के हिसाब से ही कोई भी एसोसियेशन किसी घटना पर अपनी रणनीति तैयार करती है। मेर‍ी बिटिया संवाददाता से बातचीत में चतुर्वेदी का कहना था कि कुछ वकीलों ने इस मामले पर एक पत्र बार को भेजा है, जिस पर जल्‍दी ही विचार करने के लिए बैठक आयोजित की जाएगी, और उसके बाद ही बार अपना स्‍टैंड क्लियर करेगा।

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लर्नेड वकील साहब

क्षुब्‍ध वकीलों की ओर से बार के अध्‍यक्ष चतुर्वेदी जी को एक अधिवक्ता शरदेन्दु कुमार पाण्डेय जी ने एक पत्र भेजा है, इस पत्र में पाण्‍डेय ने लिखा है कि आपने कहा कि स्व_राजेश_श्रीवास्तव के हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए रितीश श्रीवास्‍तव का प्रोटेस्ट उनका इंडिविजुअल ऐक्ट है, लेकिन यह कैसे उनका इंडिविजुअल ऐक्ट है....?? आप हमारे चुने प्रतिनिधि है और एशिया के सबसे बड़े बार के अध्यक्ष है और आपका एक अधिवक्ता भाई मारा गया है। इस पर तो आपको स्वयं स्टैंड लेना चाहिए और आप चुप है। क्या ये शर्मनाक स्थिति नही है..??

पांडेय ने लिखा है कि जहाँ आपको खड़ा होना चाहिए वहाँ मात्र दो चार वन्दे खड़े होकर प्रोटेस्ट कर रहे है। ईश्वर न करे आपके साथ कोई घटना घटे अन्यथा आपके कातिल भी मज़े से घूमेंगे और एक मात्र ऋतेश एंड उनकी टीम कातिलों को पकड़ने के लिए प्रोटेस्ट करेगी। बाकी आप ही की तरह एचसीबीए तमाशा देखेगी। पांडेय ने लिखा है कि इन हालातों में चतुर्वेदी जी विचार करे और आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करे और कातिलों को जेल पहुँचाने का काम करे। अन्यथा मुझे लगेगा कि मैंने अपना नेतृत्व एक बहुत ही कमजोर व्यक्ति के हाथ मे सौप दिया है....सोचे सर.....।।

बड़ी बिडम्बना है कि यह दम्भ भरा जाता है कि हम एशिया के सबसे बड़े बार एसोशिएशन है और एक स्ट्रांग अधिवक्ता एकता का नारा बुलंद किया जाता है उसके बावजूद भी अधिवक्ता गाजर मूली की तरह काटा जाता है और हम सबसे बड़े बार वाले तमाशा देखते है और कातिल मौज करते है......अत्यंत दुःखद और हास्यास्पद स्थिति है दुनिया के सबसे बड़े बार की....और इसका एकमात्र कारण है बार की गुटबाजी और अहंकार

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

लाट-साहबों की औकात दिखा दी एक "लेखपाल" ने

: लॉन में मस्‍ती करते शाहंशाहों के पांवों तले बिछी कालीन खींच कर भाग गया एक अदना-सा लेखपाल : पीएम आवास योजना का लाभ लूटने वालों की भीड़ से भी बदतर हो गयी हालत, अब कुंकुंआ रहे हैं यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्री लोग : जिसे हौंकते थे नेता, उन्‍हीं को हौंक दिया बड़ा बाबू ने :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह किस्‍सा उन राजा-महराजाओं की है, जो आजादी के बाद राजा-रजवाड़े बने थे। लोकतंत्र के नये बड़े जमीन्‍दार। इन लोगों ने किसी शाहंशाह की तरह उन्‍होंने यूपी के मुखिया की कुर्सी सम्‍भाल कर प्रदेश की ऐसी की तैसी की, और आम जनता के बजाय अपनी बाकी उम्र सुख-सुविधा से भरपूर करने के लिए राजकोष को जी-भर कर लुटाया। सरकारी जमीन और सरकारी विशालकाय बंगलों-महलों को कब्‍जाया और बाकायदा विधानसभा से अपने लिए यह सुविधा आजीवन हासिल करने की जुगत भिड़ा ली, कि वे जब तक कब्र में नहीं जाएंगे, सरकारी जमीन पर बने सरकारी महल में सरकारी खजाने से बिलकुल महराजा की तरह रहेंगे।

जी हां, हम आज आपको उन्‍हीं लोगों की ताजा तस्‍वीर दिखाने जा रहे हैं, जो अपने वक्‍त में हाकिम-ए-हुकूमत हुआ करते थे। वजीर-ए-आला, यानी मुख्‍यमंत्री। लेकिन उनकी करतूतों से आजिज जनता ने जब उनको दुत्‍कार कर दूसरे हो राजदण्‍ड थमा दिया, तो वे बेरोजगार हो गये। लेकिन चूंकि जनता की औकात को यह लोग खूब समझते थे, इसलिए उन्‍होंने सरकारी ओहदा गंवाने के पहले ही कानून बनवा लिया कि हर पूर्व-मुख्‍यमंत्री को एक विशालकाय आवास सरकारी खर्चे से थमा दे दिया जाएगा, जिसकी देखभाल की जिम्‍मेदारी सरकारी खजाना ही करेगा। इतना ही नहीं, यह सुविधा उन्‍हें तब तक मिलती रहेगी, जब तक वे जिन्‍दा रहेंगे।

लेकिन आज उन सब की हालत बेहद दयनीय हो गयी है। वजह है यूपी का एक अदना सा लेखपाल। आप उसे बड़ा बाबू भी पुकार सकते हैं। यूपी की बड़ा बाबूगिरी की जमात यानी आईएएस की सेवा में करीब 33 बरस तक रहने वाले इस लेखपाल एसएन शुक्‍ला ने अपने जीवन में और कोई काम किया हो, या न किया हो, लेकिन इन सारे मुख्‍यमंत्री लोगों की भीड़ की ऐयाशियों को औकात में लाकर उन्‍हें सड़क पर खड़ा कर दिया है।  बड़ा बाबू टाइप इस लेखपाल ने सरकारी खजाने की लूट के खिलाफ सर्वोच्‍च न्‍यायालय तक में इतना हल्‍ला-गुल्‍ला मचाया, कि आखिरकार सुप्रीमकोर्ट ने यह आदेश कर ही दिया कि इन सब मनुष्‍यरूपेण मृगाश्‍चरांति पूर्व मुख्‍यमंत्रियों को सरकारी बंगलों से बेदखल कर दिया जाए।

हालत यह है कि यूपी के आधा दर्जन पूर्व मुख्‍यमंत्री जहां-तहां भटकते दिख रहे हैं। इनमें से आंध्रप्रदेश राजभवन-फेम वाले नारायण दत्‍त तिवारी, लड़कों से गलती हो जाती है और अयोध्‍या-कांड फेम वाले मुलायम सिंह यादव, पिता से सरेआम दो-दो हाथ करने वाले सुपुत्र अखिलेश यादव, करोड़पति माला फेम वाली मायावती, नकल अध्‍यादेश फेम वाले राजनारायण सिंह के साथ ही साथ कई पूर्व मुख्‍यमंत्रियों के रिश्‍तेदारों-आश्रितों के सहयोग से विशालकाल बंगलों को हथियाये लोगों का नाम शामिल है।

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बड़ा बाबू

सच बात यही है कि इन सभी की हालत इस लेखपाल के चलते बहुत दयनीय हो गयी है। अगर आप इन लोगों की हालत को समझना चाहें तो  किसी भी जिलाधिकारी कार्यालय में भटकती भीड़ के बीच जरा कुछ वक्‍त बिताने की जहमत फरमाइये। आपको वहां दिखेगी अपाहिज, अशक्‍त, बेसहारा और निरीह लोगों की भारी रेलमपेल। जहां स्‍त्री-पुरूष लोग सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिये जहां-तहां भटकते मिलेंगे। किसी को वृद्धावस्‍था पेंशन योजना का लाभ हासिल करने की दरकार होगी, तो किसी विधवा-पेंशन के लिए जहां-तहां भटकती दिख रही होगी। किसी को विकलांग भत्‍ता चाहिए था, जो महीनों की दौड़भाग के बावजूद नहीं मिल पा रहा है, तो किसी की फाइल ही गायब है।

कहीं किसी दफ्तर में उन लोगों को बार-बार दौड़ाया जाएगा, कि आज साहब नहीं हैं, या मंडल या मुख्‍यालय गये हैं। इसलिए वह दस-पांच दिन बाद ही दफ्तर में सम्‍पर्क करे। किसी को बताया जाएगा कि बजट खत्‍म होने वाला है और भीड़ बहुत है, इसलिए उसी को उस योजना का लाभ मिल पायेगा, जो साहब की मुट्ठी गरम कर देगा। किसी को तो साफ-साफ बता दिया जाएगा कि पचास हजार से कम में काम नहीं होगा, उतनी रकम टेंट में हो तब ही अगली बार आना। किसी को अपमानित किया जाएगा, किसी को दुत्‍कार कर अगले महीने आने को कहा जाएगा। किसी के कागज को अपर्याप्‍त और गड़बड़ बताया जाएगा, और किसी को सलाह दी जाएगी कि वह फलां दलाल से मिल कर आपनी फाइल चेक करवा ले। किसी को अफसर डांटता दिख जाएगा कि बार-बार डीएम से ही मिलने जाती हो, तो अब यहां क्‍या उखाड़ने आती हो।

लेकिन दर-दर भटकती यह भीड़ इतना अपमान के बावजूद हर एक मुमकिन बाबू-अफसर के सामने गिड़गिड़ाने पर आमादा रहती है। कोई कागज-पत्‍तर सुधारती है, तो कोई मीन-मेख, तो कोई चुपचाप वापस चली जाती है। यूपी के पूर्व मुख्‍यमंत्री रह चुके इन लोगों की हालत कमोबेश ऐसी ही है। कम से कम मकान को लेकर वे तो किसी प्रधानमंत्री आवास योजना के श्रेष्‍ठ सुपात्र की तरह ही दीखने लगे हैं। ( क्रमश:)

सरकारी बंगलों में सरकारी खजाने से मालपुआ उड़ाने पूर्व मुख्‍यमंत्रियों पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय के करारे हमले ने नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा की जाने वाली सरकारी खजाने की लूट का खुलासा तो किया है। इस प्रकरण पर हम लगातार श्रंखलाबद्ध स्‍टोरी आप तक पहुंचाते रहेंगे। उससे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कमाल का लेखपाल

"बिटिया जनी है" सुन कर मां ने नवजात को मार डाला

: ससुराल के लोग बोले कि बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन : बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है : अल्टीमेटम मिल चुका था कि इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए : हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती : बेबस मां -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : (गतांक से आगे ) इसी बीच पीठासीन अधिकारी उस महिला से एक सवाल पूछ बैठा कि क्या तुम्हें अपनी नन्ही बच्ची का गला दबोचने और उसे मार डालने के पूरे दौरान एक बार भी उस बच्ची पर दया नहीं आई ?

सच बात यह है कि यह एक ऐसा माकूल सवाल था, जिसका जवाब हर शख्‍स चाहता था। सभी जानना चाहते थे कि उस बच्ची की हत्या करते समय उस महिला पर क्या भाव रहा होगा। उधर यह सवाल उठते ही इस महिला में मानो एक भयानक विस्‍फोट हो गया। उसके सब्र का बांध टूट गया। उसे फफक-फफक कर रोते देख पहले तो सारा न्‍याय-कक्ष भौंचक्‍का हो गया, लेकिन जल्‍द ही सभी लोग नम आंखों से हिचकियों की ओर बढ़ने लगे। भावावेश में बुरी तरह रोती हुई महिला ने जो कुछ भी बयान किया वह मौजूद सभी लोगों को भीतर तक हिला दिया। वहां मौजूद सभी लोग शर्म के मारे जमीन पर गड़े जा रहे थे। कोई भी एक दूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहा था सभी लोग कनखियों से लेकिन भरी आंखों से उस महिला को देखने की कोशिश कर रहे थे सभी लोग सुनने को उतावले थे और महिला हिचकियों में अपने शब्द टप-टप गिरा रही थी।

महिला ने जो भी किस्सा बताया, उसके मुताबिक उसकी शादी गरीब 16 साल पहले हुई थी। ससुराल वाले बड़े अरमान के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे कि उनकी बहू की गोद कब भरेगी और कब एक सलोना मुन्ना खिलखिलाता सभी के हाथों पहुंच जाएगा, पूरे घर को अपने किलकारियों से गुंजा देगा। लेकिन साल भर बाद जब इस परिवार में एक जन्‍म हुआ तो लोगों के मन पर जैसे कोई पक्षपात हो गया। वजह नहीं कि उस महिला ने कोई जीवित प्रसव नहीं किया बल्कि सच यह थी कि उस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्‍नी जनी थी। यह घटना इस परिवार पर किसी गहरे तुषारापात से कम नहीं रही। सभी ससुरालीजन भी आखिर क्या करते। उन्हें अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी थी, जब मुन्नी नहीं बल्कि घर का चिराग जन्मेगा। दो साल बाद फिर इस महिला ने फिर जन्म दिया। लेकिन हा-दैवयोग की ही बात तो थी कि इस बार भी इस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्नी को जन्म दे दिया था।  पूरे घर पर जैसे कोई श्‍मशान बन गया हो। हर व्यक्ति गमगीन था। लेकिन फिर भी वक्त को बढ़ना ही था। अगले जन्म में लोग अपनी उम्मीदें पूरी होते देखना चाहते थे लेकिन इस महिला ने तीसरी संतान के तौर पर फिर एक मुन्नी पैदा कर दी। और उसके बाद फिर चौथी जन्‍मी मुन्नी, पांचवी भी मुन्‍नी, छठवीं भी मुन्‍नी, सातवीं मुन्‍नी और आठवीं भी मुन्‍नी ही पैदा हुई।

हर बार वह महिला गर्भवती होती गई, हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती। हर बार ऐसी सारी उम्मीद बुरी तरह टूटती। हर बार पिछले बार के मुकाबले पूजा, पाठ, मनौती, पनौती, संकल्प जैसे कार्यक्रम शुरू होते गए और हर बार ऐसे पाखंडों, टोटकों की असलियत टूटती रही। लेकिन सबसे ज्यादा प्रताड़ना तो उस महिला की होती थी जो पूरे परिवार के लिए जन्म भी दे रही थी और जन्म देने के बाद भी उस पर तानों और आरोपों का सैलाब थोपा जाता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे। परिवार के लोग आखरी बार अल्टीमेटम दे चुके थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए। अब वह महिला अगर कुछ करती भी तो क्या करती। बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है। अगर दैव-इच्छा नहीं होती तो कृष्णजी अपनी मां देवकी के पहले ही प्रसव में जन्म में ही न पैदा हो जाते। क्यों उसके एवज में 8 बच्चियों को मौत के घाट उतारा जाता। वह महिला हमेशा चाहती थी कि अपने ससुराल के वालों की एक बच्चा पैदा कर उनकी बोलती बंद कर दे। लेकिन हर बार वह हार जाती थी। फिर अवसाद, अपनी ही शर्म से जमीन धंसने की लालसा पालने लगती थी।

कुछ ही दिनों बाद ही ससुराल वालों को पता चल गया कि बहू के पांव फिर भारी हैं। फिर टोटके लगाने शुरू हो गए, फिर पूजा-पाठ, फिर संकल्प, फिर पाखंड और फिर बार-बार यह ताईद करने की सख्त कोशिश कि चाहे कुछ भी हो, इस बार मुन्ना, और सिर्फ मुन्‍ना।

जो जैसे-जैसे दिन प्रसव के आने लगे, महिला की बेचैनियां और घरवालों के उत्साह मिश्रित आशंकाएं पूरे घर में जब जोड़ती जा रही थी। ऐन वक्‍त पर दाई बुलायी गयी। ससुराल वाले के लोग कान लगाये  धड़कनें थामे परेशान थे। दाई ने कुछ ही देर में अपना काम निपटाया, और फिर मायूस भाव में ऐलान किया कि:- बिटिया जनी है।

यह सुनते ही पूरा परिवार सन्नाटे में आ गया सभी लोग अपने-अपने कमरे में शोकाकुल हो गए। दाई अपने काम निपटा कर चली गई। बची वह महिला और उसकी वह बाकी आठ बच्चियां, जो आपस में हंसना, खेलना, रोना, चिल्लाना, झगड़ने में व्‍यस्‍त थीं। जबकि उधर महिला की मनोदशा बेहद गंभीर थी। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि उस से कौन सा अपराध हुआ। वह खुद को असहाय और निरर्थक मानने लगी। उसे खुद पर शर्म आ रही थी कि वह इतना भी नहीं कर पाई कि वह अपने ससुराल वालों की अपेक्षाओं के अनुरूप उन्हें गुड्डा दे पाती। इस महिला को पश्‍चाताप और अवसाद के साथ ही साथ धीरे-धीरे इस नई नवजात बच्ची के प्रति घृणा और क्रोध की ज्वाला की तरह धड़कने लगी। घृणा और उपेक्षा के चलते उसने इस नई जन्मी बच्ची को अपनी छातियों तक छूने तक की इजाजत नहीं दी। बच्ची रोती रही, लेकिन घर के बाकी लोग उसकी ओर बिल्कुल उपेक्षा भाव में थे। कौन उस अभागी बच्‍ची की ओर ध्‍यान देता।

पूरा दिन दिन बीत गया। अब वह बच्ची धीरे-धीरे रोने की आदत भूलती जा रही थी। वजह यह कि भूख-प्यास से वह अशक्‍त होती जा रही थी। इतना भी नहीं कर पा रही थी कि रो भी सके। साफ था कि वह भूख-प्यास से बेदम होती जा रही है। लेकिन इस महिला में क्रोध-घृणा और नैराश्‍य भाव लगातार बढ़ता जा रहा था।

और आखिरकार उसने सबके घरवालों के सामने ही उसे पटक कर मार डाला। घरवाले यही समझे कि उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है, वह पगला गयी है और अब अपनी इस बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

महिलाओं के अरमानों का कत्‍ल कर गयी पीयूष की मौत

: दिलों का राजा था पीयूष आर दुबे, फरीदाबाद में हुई मौत से सदमे में हैं प्रशंसक : इस अनोखे चातक की चाहतें देश भर में पसरी पड़ी थीं : कई महिलाओं की जिन्‍दगी में सिर्फ पीयूष ही पीयूष भरा पड़ा था : मेरा इश्क मलंग..बंजारा दिल, मैंने मोहब्बत का मकबरा नहीं देखा ... :

कुमार सौवीर

लखनऊ : न जाने कितनी महिलाएं उसके इश्‍क में बेहाल थीं। उसके एक इशारे पर ही नहीं, बल्कि उसके नाम पर भी वे अपना घर-दुआर छोड़ने तक तैयार थीं। उनमें से अधिकांश ने तो उसे देखा तक नहीं था। उसके प्रति उनकी जो भी वाकफियत थी, वह या तो फोन के माध्‍यम से थी, या फिर उसके शब्‍दों और फोटोज पर निर्भर थी। लेकिन बेमिसाल समर्पण और प्रेम। उसकी एक आवाज पर ही वे अपनी जान देने तक पर आमादा थीं। वह भी तब, जबकि उनमें से ज्‍यादातर को न तो पीयूष नाम का अर्थ पता था, और न ही उसमें दर्ज आर शब्‍द का मतलब।

सच बात तो यही है कि मैंने अपनी पूरी जिन्‍दगी में ऐसा एक भी शख्‍स नहीं देखा है, जिस पर लोग दिल फेंक कर मारते हों। महिलाएं खास तौर पर। कुछ तो ऐसी भी हैं, जो पीयूष के लिए कुछ भी कर बैठने को तैयार रहती हैं। उनके तन-मन में केवल और केवल पीयूष ही पीयूष। ऐसा भी नहीं कि वह कोई फिल्‍मी हीरो रहा हो। कविताएं और सहज व्‍यवहार और हल्‍के-फुल्‍के अंदाज दिखाती फोटोज। बस्‍स्‍स्‍स। शायद अविवाहित रहे पीयूष आर दुबे का निधन पिछली 8 मई को हो गया। वजह थी दिल या फेफड़े में संक्रमण।

करीब न जाने कितनी महिलाओं की फेसबुक वाल पर केवल उनका नाम ही दर्ज था। लेकिन उन पर हर शब्‍द, हर हर्फ, हर फोटो और हर मर्म उनके इश्‍क का ही था। किसी का इश्‍क उसके बदन को लेकर था, किसी का उसकी आवाज को लेकर था, कोई उसके शब्‍दों पर दीवानी थी, तो कोई उसकी फोटोज पर जान देती थी। हैरत की बात है कि इन महिलाओं ने अपनी वाल पर अपनी नहीं लगायी, बल्कि या तो पीयूष की छवि थी वहां, या फिर वहां एक खालीपन का सा अहसास है। एक-दूसरे के क्षेत्र, भाषा, रहन-सहन और जलवायु से कोसों दूर पीयूष के ऐसे प्रशंसक-मित्र देश भर में थे। लेकिन भीड़ नहीं, बल्कि चुनिंदा। पीयूष की फालोइंग केवल 31 तक ही सिमटी है। हालांकि फरीदाबाद में रहते थे पीयूष, लेकिन उनके लिखने का अंदाज बिहारी था।

महाराष्‍ट्र में रहने वाली मेरी एक महिला शुभ्रा देशपाण्‍डे ने 14 को मुझे फोन करके बताया कि पीयूष की मृत्‍यु हो गयी है, और वे चाहती हैं कि उनके बारे में कुछ शब्‍द श्रद्धांजलि स्‍वरूप लिख दें। इसके दो दिन बाद ही दिल्‍ली की मेरी एक महिला मित्र अर्चना दुबे ने यही अनुरोध किया। मेरे साथ समस्‍या यह थी कि बिना किसी शख्‍स को जाने-समझे में किसी के बारे में क्‍या लिख सकता हूं। मैं कभी भी पीयूष से नहीं मिला। हां, करीब तीन बरस पहले बोकारो की रहने वाली मित्र डॉ राजदुलारी की एक पोस्‍ट पर चर्चा के दौरान पीयूष की रचनाओं का जिक्र किया था। उनका कहना था कि वे व्‍यक्ति नहीं, बल्कि विचार-भाव से प्रभावित थीं।

जाहिर है कि उसके बाद मैंने पीयूष की वाल को टटोलना शुरू किया। सहज प्रेम से जुड़े दुख, हर्ष, आनंद, विछोह, आंसू, और उठापटक जैसे भाव पसरे हुए थे। यह भी हो सकता है कि एक पुरूष होने के नाते मैं पीयूष को अधिक समझने लायक नहीं समझ पाया। लेकिन अचानक जब एकसाथ शुभ्रा और अर्चना ने यह आग्रह किया, तो मैं चौंक पड़ा। डॉ राजदुलारी का अता-पता तक नहीं था। न फोन, न मैसेंजर। वाट्सऐप पर वे रहती नहीं, और फेसबुक लगता है कि उन्‍होंने आजकल ऑपरेट करना बंद कर रखा है। ऐसे में मैंने पीयूष के मित्रों को टटोलना शुरू कर दिया। लेकिन हैरत की बात थी कि उनमें से अधिकांश ने मेरे मैसेंजर पर एक भी संदेश का कोई भी जवाब नहीं दिया। सिवाय राजस्‍थान की रहने वाली मित्र डॉ भावना अस्तित्‍व ने, जिन्‍होंने केवल हल्‍की-फुल्‍की बातें ही बतायीं। मगर वे बताती हैं कि पीयूष एक बेहद संजीदा और समझदार व्‍यक्ति थे।

हालांकि अधिकांश के लिए पीयूष का इश्‍क सूफियाना था। पीयूष की मौजूदगी का अहसास उनमें जीवन की हिलोरों की तरह था। भोपाल में पीयूष की एक महिला मित्र ने मुझे बताया कि उन्‍होंने जब पीयूष की मृत्‍यु वाली पोस्‍ट लिखी, तो तीन-चार महिलाओं ने मित्र-प्रस्‍ताव आ गये। वे बताती हैं कि इन सभी वाल में केवल पीयूष की रचनाएं ही भरी पड़ी थीं। उन से मैसेंजर पर उन्‍होंने जब इस बारे में चर्चा शुरू की थी, तो उन महिलाओं का कहना था कि वे केवल पीयूष को प्‍यार ही नहीं करतीं, बल्कि पीयूष उनकी सम्‍पूर्ण दुनिया थे। पीयूष की एक कविता काफी आकर्षक है:- मैंने मोहब्बत का मकबरा नहीं देखा ...

हैरत की बात है कि पीयूष के पास कोई बड़ी मित्र-मंडली नहीं थी। लेकिन उसमें महिलाओं की सक्रियता बेहिसाब थी। पीयूष की मृत्‍यु के बाद जो पीड़ा का प्रदर्शन लोगों ने किया, उनमें महिलाएं आगे थीं। जिन भी महिलाओं से मैंने बातचीत की, उन्‍होंने शुरूआत में तो यह कुबूल किया कि वे मैसेंजर पर पीयूष से बात करती थीं। लेकिन उन सबने आखिरकार यह भी स्‍वीकारा कि उनकी बातचीत फोन पर अक्‍सर होती रहती थी। कई महिलाओं ने यह भी बताया कि वे अपना फोन नम्‍बर किसी को भी नहीं देती हैं, लेकिन पीयूष को खुद दिया था अपना नम्‍बर। हालांकि यह सभी महिलाएं इस बात से इनकार करती हैं कि उन्‍हें पीयूष से इश्‍क था, मगर वह यह नहीं बता पायीं कि तब वे लम्‍बे फोन कॉल्‍स पर उससे किस विषय पर बातचीत करती रहती थीं। पीयूष ने अपनी वाल पर स्‍लोगन दर्ज किया है:-  मेरा इश्क मलंग..बंजारा दिल।

फरीदाबाद का रहने वाला था पीयूष। उसके ज्‍यादा उसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं। सिवाय इसके कि उसकी आखिरी पोस्‍ट पर इश्‍क के ठुकराने जैसा भाव था।

" तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा "

मैं कई दिन से बीमार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

बहुत ही बेबस, बहुत लाचार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

असीम पीड़ा, बदन में दर्द लिए बेचैनी

मुझे तेज बुखार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

क्योंकि तुम मग्न थी, थी विचर रही बहारों में

मैं कराहता हुआ, था कैद उन दीवारों में

बस तुम्हारे , एक फोन का इंतजार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

शायद तुम्हें मेरी खबर नहीं होगी

या कहूँ , मुझ पर नजर नहीं होगी

शायद की तुम भी , व्यस्त होगी कामों में

या तुम्हें, मेरी फिकर नहीं होगी

मगर मैं उस पल भी बेकरार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

एक अन्‍य लाइनें:-

खूबसूरत तो बेहिसाब हो तुम !

हाँ सच है की लाजवाब हो तुम ! !

एक उम्र गुज़ारी है , इन आँखों ने इंतजार में !

हाँ वही , वही एक ख्वाब हो तुम ! !

कुछ अन्‍य:-

तुम्हारे बाद , जीवन का , गुजारा हो ना पायेगा ।

अब तो , इश्क भी हमसे , दोबारा हो ना पायेगा ।।

कैसे ! बाँट लूँ बिस्तर , तुम्हारी ओर का बोलो ।

तुम्हे ही चाहता है दिल , आवारा हो ना पायेगा ।।

फिर यह भी:-

तू मेरी फिक्र में हर पल , तू मेरे जिक्र में हर-सू

तू मेरे हिज्र में तड़पे , मैं तेरे हिज्र में तड़पू

चढ़ा , प्रीत-रंग , मेरे अंग-अंग

मैं प्रेम रंग में रंग गई रे

तू मुझ सा दिखने लगा सजन

मैं तुझ सी दिखने लग गई रे

एक अन्‍य लाइनें:-

सूखी हुई एक शाम की टहनी से !

बिखरे जो तेरी याद के पत्ते गिर कर !

फिर जमीं पर दिल के कुछ बूंदें टपकी !

बेवज़ह मेरी आँख से आँसू बनकर ! !

हसरतों पर चर्चा:-

थक गये हैं ख़्वाब को आराम देना चाहिए !

हसरतों को शीघ्र ही विराम देना चाहिए ! !

कब तलक गुमनामियों के तम में भटकेगी उमर !

इस सफर , इस जिंदगी को नाम देना चाहिए ! !

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