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माफिया ब्रजेश ने अमर उजाला को दी मानहानि की नोटिस

: दुर्दांत माफिया को चिंता है मानहानि की, बनारस अमर उजाला संपादक और एक समाजसेवी को नोटिस : "हम लोग का बैकग्राउंड है राजनीति, ऐसी खबरों से हमारी प्रतिष्ठा धूमिल हुई" : अमर उजाला ने मामले में चुप्‍पी साधी, मामला अपनी लीगल सेल के हवाले किया :

मेरी बिटिया संवाददाता

वाराणसी : समाज तो सबरंग है। कोई समाजसेवा, कोई रासरंग, कोई आनंद, कोई शोध, कोई निर्माण तो कोई धर्म-सत्‍संग आदि कृत्‍यों से लगातार समाज की उन्‍नति में जुटा रहता है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्‍होंने अपना पूरा जीवन केवल अपराध को समर्पित कर दिया है। उनको हत्‍या, खून-खूंरेजी, आतंक, भय, लूट और डकैती जैसे घिनौने कृत्‍यों में आनंद मिलता है। बेधड़क लोग ऐसे अपरधियों को कुख्‍यात माफिया या दुर्दांत अपराधी कहते हैं, जबकि डरपोंक देने वाले लोग उन्‍हें बाहुबली की उपाधि देते घूमते हैं। पुलिस उनकी सतत आपराधिक-माफियागिरी को देखकर हिस्ट्रीशीट खोलकर थाने के सूचना पट्ट पर इनके नाम-पिता का नाम-पता सहित दर्ज कर लेती है, ताकि आम आदमी इनकी करतूतों से वाकिफ हों, प्रशासन को भी पहचानने में सुभीता हो।

आज यहां बात हो रही है जुर्म की दुनिया के कुख्यात बादशाह बृजेश सिंह की, जो लूट, हत्या, धमकी, नरसंहार का मुल्जिम है। ब्रजेश के यह सारे किस्‍से पुलिस की डायरी में भरे-संजोये हुए हैं। हिस्‍ट्री-शीट बताती है कि किस तरह ब्रजेश सिंह और उसके परिवारी जनों ने पूर्वांचल ही नहीं, पूरे यूपी, बिहार, छत्‍तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, एमपी, उत्‍तराखंड समेत कई राज्‍यों में जरायम की दुनिया का सिंहासन हासिल किया और आपराधिक गंदगी पर बैठकर पूंजीपतियों, दुकानदार ,ट्रांसपोर्टर, कोयला व्यापारियों को डरा धमकाकर अपनी तिजोरी भरी।

पुलिस हिस्‍ट्रीशीट के अनुसार ब्रजेश सिंह ने सिकरौरा कांड नरसंहार में दुधमुंहे बच्चे पर भी रहम नहीं किया औऱ यमलोक पहुंचा दिया। जिसके आतंक ने भतीजों को भी बिन पूंजी का व्यापार दे दिया औऱ दिवंगत भाई के गले में विधायक का हार दे दिया। कुनबे को मजबूत कर यह शातिराना अंदाज में प्रगट और गायब होता रहा और अंदर ही अंदर यूपी से बाहर दूसरे प्रदेशों में अपने आर्थिक साम्राज्य को बढ़ाता रहा। यहां इसके भतीजे इसके नाम को भुना कर आगे बढ़ते रहे। अपने तीन दशक के अपराधिक जीवन में बृजेश ठेकों से अरबों कमाता रहा। इसके नाम का आतंक ऐसा रहा कि हर बड़े व्यापार में इसको कमीशन चाहिए था। जो इंकार करता उसकी अंतिम तिथि भी तय हो जाती थी।

खैर समय बदला औऱ कुख्याति चरम पर हुई तो बस नाम ही काफी है। बृजेश ने सोचा कि जब टेरर तो बन चुका है तो क्यों न भाई-भतीजे की तरह नाम के आगे माननीय लगवा लूं। इसी मकसद को अंजाम देने के लिए बृजेश ताना बाना बुनने लगा। क़ामयाबी तब मिली जब चंदौली के मूल निवासी एक स्वजातीय कद्दावर नेता जो इनका सब राज जानते हुए भी इनका 'नाथ' बनने को तैयार हो गए वो वर्तमान में वो केन्द्रीय औऱ 'घर'के मंत्री हैं।

सूत्रों की माने तो इसी योजना के तहत एक दशक पूर्व दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उड़ीसा से अरुण सिंह उर्फ बृजेश सिंह को गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी किसी नाटक से कम नही था।

खैर गिरफ्तारी के बाद हर जगह यह गिरफ्तारी चर्चा में रही। बाद में बृजेश को वाराणसी के सेंट्रल जेल में रखा गया। समय के साथ बृजेश ने योजना के तहत अपनी पत्नी को ' भारी ले-देकर' एक पार्टी से एमएलसी बनाया। बाद में उस पार्टी में भाव न मिलने पर चन्दौली के सैयदराजा से चुनाव लड़ा मगर करोड़ो रूपये पानी की तरह बहाने के बाद भी निर्दल मनोज सिंह डब्लू से मुँह की खा गया। उसके बाद स्थानीय निकाय चुनाव में करोड़ो रूपये पानी की तरह बहाने और 'नाथ' के अदृश्य समर्थन के बाद सपा प्रत्याशी मीना सिंह से 1986 मतों से बृजेश ने जीत दर्ज की। और यहीं से मान या न मान है कर मेरा जबरन सम्मान की शुरुआत हुई ।

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जिया रजा बनारस

एमएलसी बनते ही बृजेश के नाम के साथ माननीय शब्द ऐसे जुड़ गया। सूत्रों की माने तो एमएलसी बनते ही अपने टेरर को धार और काली कमाई को व्यापार बनाने के लिए बृजेश ने अपने गुर्गो को काम पर लगा दिया। एक तो मिनिस्टर 'नाथ'का साथ ऊपर से माननीय का दर्जा। यही कारण है कि सत्तासीन सरकार इस माफिया के लिए आंखें मुंद कर पड़ी रहने लगी। लोगों की माने तो इसी का नाजायज फायदा उठा बृजेश ने अपने मकसद को अंजाम देने के लिए येन केन प्रकारेण बीमारी का बहाना बना जेल से पूर्व के मुकदमों को प्रभावित करने और वसूली ठेको के लिए इलाज की आड़ में बीएचयू में डेरा डाल दिया। जब लम्बे समय तक हॉस्पिटल में पड़े रहने की खबर वाराणसी के अखबारों को हुई तो जाहिर सी बात है लोकतांत्रिक खम्भा ने अपना फर्ज निभाया और बृजेश के इलाज पर सवाल खड़े होने लगे। इससे तिलमिलाये माफिया मास्टर यानी बृजेश ने उन अखबारों को अर्दब और दवाब में लेने के लिए मानहानि का नोटिस भेज दिया।

आम तौर पर सामान्‍य लोग कहते घूमते रहते हैं कि इन अखबारों को नोटिस से कोई फर्क नही पड़ता है। क्योंकि मान उसी का है जो सम्मानित हो औऱ जो हिस्ट्रीशीटर हो उसका मान सम्मान कैसा और क्यों..?अभी कुछ दिनों पहले ही वाराणसी जिले के एक विधायक के बीजेपी अध्यक्ष ने एक सवाल के जवाब में 'चोर' कह दिए तो जिस एमलसी की पूरी जवानी जिंदगानी वसूली, रंगदारी ,अपराध में गुजरी हो उसका कैसा मान कैसी हानि..? बल्कि उसे तो अपने पूर्व के कर्मो के लिए उन पीड़ितों जो इसके अपराध कर्मो की वजह से अपनो को खो चुके हैं उनसे माफी मांगनी चाहिए आप माफिया से माननीय हो सकते हैं मगर आपसे लुटे पिटे बर्बाद हुए और उन विधवाओं की सुनी मांग चीख चीख कर आपको माफिया मर्डरर ही कहेगा क्योंकि आप सफेद शर्ट पर सैकड़ों खून के धब्बे हैं जो इस जीवन में आपको मान नही दिला सकते

औऱ ख्यात और कुख्यात में जनता फर्क जानती है आप जनता और अखबार से जबरन मान चाहते हैं तो आपका भरम है कम से कम मुझसे और मेरे अखबार से यह उम्मीद तो नही होनी चाहिए।

हम तो अपराध अपराधियों भ्र्ष्टाचार भ्र्ष्टाचारियों के खिलाफ यूँ ही मुखर रहेंगे चाहे भले ही अंजाम गौरी लंकेश जैसा हो। ( इनपुट: अमित मौर्या के साथ)

गोद में बच्‍चा लिये मछली बोली, स्‍वामी ! यह मकरध्‍वज है

: झमाझम बारिश का क्रेडिट हनुमान जी को है,  बकलोल पर अभी पूंछ तरेर दूं तो फौरन चड्ढी गीली कर बैठेगा कि ठर्रे में हनुमान बसते हैं : रंभा-मेनका नाचेंगी, हाहा-हूहू गायेंगे, इंद्र ड्रिंक्‍स लेंगे , विष्‍णु जी लक्ष्‍मी जी से गोड़ दबवायेंगे : काला भैंसा लेकर यमराज जी वारंट तामील करते हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तो दोस्‍तों, सच बात तो यही है कि मैं इसीलिए भगवान-वगवान और ईश्‍वर-फिश्‍वर पर बहुत आस्‍था रखता हूं। बल्कि भगवान और ईश्‍वर ही नहीं, उनकी फेमिली के जितने देवि-देवता हैं, उन पर भी मेरी कड़ी आस्‍था, प्रेम, दोस्‍ती वगैरह है। दरअसल यह सब लोग बहुत सिस्‍टम के साथ काम करते हैं। हंसी-ठिठोली भी करेंगे, गुस्‍सा भी करेंगे, दोस्‍ती भी करेंगे, झंझट भी करेंगे और सामान्‍य कामधाम भी करेंगे। रंभा-मेनका नाचेंगी, हाहा-हूहू गायेंगे, इंद्र जी ड्रिंक्‍स लेते रहेंगे, विष्‍णु जी शेषनाग पर लेकर लक्ष्‍मी जी से अपना गोड़ दबवाते रहेंगे। सरस्‍वती जी वीणा बजायेंगी। अपना काला भैंसा लेकर यमराज जी झोंटा पकड़ कर फाइनल वारंट तामील करने निकल जाया करेंगे।

भोजन-पानी तो चलता ही रहता है, उसके बिना तो किसी सम्‍पादक और जज ही नहीं बल्कि मंत्री-राज्‍यपाल तक का काम नहीं चलता। यकीन न हो तो संपादक उपेंद्र राय, पीके तिवारी, तरूण तेजपाल, बाबा आसाराम बापू, राधे मां, हिमाचल वाले वीरभद्र, हरियाणा वाले गोपाल कांड़ा, आंध्रप्रदेश राजभवन वाले विश्‍वविख्‍यात नरायण दत्‍त तिवारी, तमिलनाडु वाली जयललिता, सपरिवार दुराचारी अमरमणि त्रिपाठी, बांदा वाले पुरूषोत्‍तम द्विवेदी, अनन्‍त मिश्र अंटू, दिल्‍ली वाला मंत्री संदीप बंसल, अदालतों वाले ओपी मिश्रा और एसपी शुक्‍ला, यूपी के मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल, पुराने आलोक रंजन, प्रदीप शुक्‍ला वगैरह-वगैरह। छोडि़ये आखिर किसका-किसका नाम बताया जाए।

खैर, मैंने मंगलवार को लिखा था कि गर्मी-उमस बेहिसाब है, लेकिन भगवान कुछ नहीं कर रहे हैं। मानसून की बारिश वाले डिपार्टमेंट वाले प्रमुख मेघनाथ और उनकी मेघनथनी जी से मैंने अप्‍लीकेशन लगायी थी। लिखा था कि वे अब रहम करें मानवों-प्राणियों को। उस पत्र का मजमून मैं निम्‍नलिखित चिपकाये दे रहा हूं।

"हे मेघनाथ और मेघनथनी जी !

हमें आपकी यह फोटू (फोटोशॉप ही सही) देख कर ही पता चल गया था कि आप लोग आजकल बहुत बिजी चल रहे हैं। लेकिन गुजारिश है कि इसी बीच आप लोगों को अगर अपनी इश्क़बाजी से थोड़ी फुरसत मिल जाए तो हम लोगों पर भी तनिक कृपा बरसा लेना!

यहाँ गर्मी से मरे जा रहे हम यार।

बाई गॉड की कसम, अब तो इतना पसीना भी नहीं निकल रहा है, जितना हमारे किसान सूखे के अंदेशे से आंसू बहाने शुरू कर चुके हैं।

तुम तो देवि-देवता लोग हो। तुम्हारा तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। लेकिन किसान बर्बाद हो जाएंगे। सूखा-राहत को लेकर मारामारी होगी। अमीन, तहसीलदार, एसडीएम और डीएम लोग जश्न मनाएंगे। मुनाफाखोर बनिया दोनों हाथों से रुपया लूटेंगे। सचिवालय के छोटे -बड़े बाबू फाइलें लटकाएँगे।

जनता अपनी छाती पीटेगी"

अब देखिये न, कि कितनी गम्‍भीरता से वहां त्‍वरित कार्रवाई होती है। रात को ही हनुमान जी ने मुझे सपने में आकर तब दर्शन दिया, जब मैं हजरतगंज का जायजा ले रहा था। गांधी प्रतिमा पार्क पर ही रखीं बेंच पर मैं बैठा था, सम्‍मान में उठ कर खड़ा हो गया। उन्‍होंने आत्‍मीयता के साथ मेरा कंधा थपथपाया, और बोले कि बस आज आपकी अर्जी मिली जो आपने भेजी थी, मेघनथनी ने अपना नोट लेकर मुझे फारवर्ड कर दिया था। खैर, यह रही आपकी अर्जी, अब बताइये कि मुझे क्‍या करना है।

मैं झुंझला पड़ा। बोला:- हन्‍नू जी, आपने तो बिलकुल वही बात कर दी जो अभिषेक गुप्‍ता की अर्जी पर राज्यपाल नाइक और मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल के मामले में भाजपा के संदीप बंसल के सपोर्टरों ने किया था। मैंने बारिश के लिए अर्जी मेघनाथ को भेजी थी, और आप मुझे हौंकने आ गये। खैर, अब आ ही गये हैं तो बताइये कि क्‍या स्‍वागत किया जाए आपका।

हनुमान जी हड़बड़ा गये, उन्‍होंने आनन-फानन अपने लंगोट से निकलते मूंज के जनेऊ को मरोड़ा और कंधे से जुम्बिश देकर गदा को सम्‍भाला और बोले:- नहीं नहीं। अरे आज मंगलवार है भाई। मंगल के दिन मैं न तो कुछ ऐसा-वैसा खाता हूं, और न ही कुछ पीता-शीता हूं। वह तो हरदोई वाला बकलोल नरेश अग्रवाल है न, जो संसद में अपना चूतियापंथी कर गया, कि ठर्रे में हनुमान। अभी पूंछ तरेर दूं तो फौरन चड्ढी गीली कर बैठेगा। और हैरत की बात तो देखिये कि राम-भक्‍त होने के नाम पर अयोध्‍या में राममंदिर बनाने का सपना बेचने वालों ने उसे भाजपा में ज्‍वाइन करा दिया है।

तो अब मैं आपकी क्‍या सेवा करूं हन्‍नू बाबा? यहां तो अशोक-वाटिका भी नहीं है, और यहां कोई सीता भी नहीं है। क्‍या किया जाए? और रही बात अर्जी की, तो गलती तो हम लोगों से भी हो जाती है। है कि नहीं? अगर ऐसा न होता तो मैं सूरज को पका सेब समझ कर मुंह में ले लेता। हालांकि मम्‍मी बचपन में यही सब समझाती रहती थीं, लेकिन उसके बाद से तो कसम खा ली थी मैंने कि जलता हुआ बल्‍ब मुंह में नहीं लेना चाहिए।

फिर?

फिर क्‍या? कुछ नहीं। मगर यह बताइये कि बारिश कब होगी? अच्‍छा-खासा आदमी एक ही झटके में भुना भुट्टा बना जा रहा है। हन्‍नू बाबा, अब तो बारिश करवा दीजिए। प्‍लीज।

आपकी बात तो मैं सपने में भी टाल सकता हूं। कभी टाला हो तो बताइये। आपको याद होगा कि 34 साल पहले जब सहारा इंडिया सुब्रत राय साप्‍ताहिक सहारा अखबार को बंद कर गया था और श्रमिकों को धेला भर पैसा नहीं देना चाहता था। तब रात को आपके घर पहुंचा था, और इसके पहले सुब्रत राय को भी बता आया था कि बे इसकी टोपी, उसके सिर वाले फ्राडिया। भूल गया कि कब कुमार सौवीर ने पीएसी और हजारों कर्मचारियों के सामने तुम्‍हारे भाई जयब्रत राय को जूतों से कूटा था। इसलिए इस बार दोबारा हरकत मत करो। कुमार सौवीर बहुत गुस्‍सैल आदमी है। तुम भी पिट जाओगे तो कैसे किसी के सामने अपना मुंह दिखाओगे। इसलिए इस बार भी दिमाग से काम करो, और सारे कर्मचारियों का पैसा फौरन अदा करो। और सौवीर जी, अगले ही दिन सुब्रत राय ने आप सब को बुला कर सारा हिसाब चुकता कर दिया था। कुछ याद आया या नहीं? तब एक मंगलवार को आप शाम को हनुमान सेतु वाले मंदिर के सामने दूसरी पटरी के फुटपाथ पर सायकिल टिका कर मुझे भल-भर गरिया रहे थे कि मैं तुमको अब तनिक भी भरोसा नहीं करता, तुम हनुमान नहीं, फ्राड हो। भगवान नहीं, ढोंगी हो। कुछ याद आया सौवीर जी या नहीं? आपने करीब डेढ़ घंटे तक मेरे ही सामने गरियाया था, लेकिन खामोश रहा। आप शायद उस समय समझ रहे थे कि मैं पाषाण-प्रतिमा हूं। लेकिन मैं क्‍या करता। प्रतिमा न बना रहता तो यह भक्‍तगण के नाम पर जिन लोगों की भीड़ मेरे आसपास मंडराती है, वह मुझे नोंच डालती। कि यह काम करो, वह काम करो। घर का घरेलू नौकर बना लेते कि कलुआ जाओ लकड़ी ले आओ, खेत जोत डालो, नाली साफ करो, यह करो, वह करो। धत्‍तेरी की। अरे यह भक्‍त नहीं, बवाल हैं। स्‍वार्थी परले दर्जे के। पहले सिर नवाते थे, फिर बेसन के लड्डू लेकर आये, फिर काजू की बर्फी अब पूरा टोकरा फल-फ्रूट लेकर आते हैं। कहते हैं कि बिजनेस बढ़वा दो, प्रमोशन करवा दो, मकान करवा दो, शादी करवा दो। चूतिया समझ रखा है इन ससुरों ने मुझको। जो लेकर मिठाई-सिठाई लेकर आते हैं, वापसी में वही लेकर लौट जाते हैं। किसी गरीब पर चवन्‍नी नहीं देते। धत्‍त तेरी की, मन तो करता है कि....

अरे छोडि़ये बाबा। गुस्‍सा नक्‍को करते। बारिश की बताइये न, प्‍लीज

सौवीर बाबा, आज तो मुझे बख्‍श दीजिए, प्‍लीज। मेरी भी कुछ फैमिली प्रॉब्‍लम समझने की कोशिश कीजिए प्‍लीज।

कौन सी प्रॉब्‍लम ? आपकी कौन सी प्रॉब्‍लम हन्‍नू बाबा?

आप मुझे बारिश करवाने की बात कर रहे हैं। जबकि मुझे पानी से डर लगता है।

आपको लगता है डर? वह भी पानी से? जरा खुलासा समझाइये न।

अरे सतयुग में जब मैं श्रीलंका गया था न, तब एक दिन पूरी लंका ही फूंकनी पड़ी थी मुझे। बचने-बचाने के चक्‍कर में पूंछ जल गयी थी। गर्मी से राहत हासिल करने के लिए मैं समंदर में कूद गया था। फिर अब मुझे तो पक्‍का पता नहीं कि पूरा मामला क्‍या था, लेकिन कुछ दिन बाद रोहित शेखर की माता उज्‍जवला देवि की तरह एक उलझन फंस गयी। एक मछली अपनी गोद में एक बच्‍चा लेकर आयी और बोली कि यह मकरध्‍वज है। बड़ा टेंशन, खैर छोडि़ये। कल बुधवार है, मैं अभी सीधे मेघनाथ-मेघनथनी के पास जाता हूं, और उनसे कह कर बुधवार की बारिश का सेशन शुरू करा देता हूं। डोंट वरी सौवीर जी। हनुमान पर यकीन रखियेगा। बारिश होगी और कल बुधवार को ही होगी। प्रॉमिस।

और देखिये तो हनुमान जी का वचन कि इस वक्‍त लखनऊ में हनहनउव्‍वा बारिश झमाझम चल रही है।

अरे ओ मोदी भाई ! बारिश शुरू हो गयी है, जरा गरमागरम और कम चीनी वाली चाय और दो पकौड़ा तो लपक कर ले आओ।

साक्षात बंदर हैं ऐसे डॉक्‍टर, एकसाथ दर्जन जिलों में छलांग

: थमा दी गयी मोटी रकम की गड्डियां, डिग्री की फोटोकॉपी दिखा कर हथियाया अल्‍ट्रासाउंड सेंटर :  फर्जीवाड़ा से अनुमति, कई सेंटरों में एक ही डॉक्टर, धड़ल्‍ले से हो रहे पंजीकरण से अल्ट्रासाउंड के दुरूपयोग की आशंका भारी : कन्‍याभ्रूण संरक्षण- तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ऐसे रेडियोलाजिस्ट जिले के कई कई अल्ट्रासाउंड केन्द्रों में रजिस्टर्ड है जिसका प्रमाण आरटीआई से मिल चुका है। ऐसा फर्जीवाडा और अल्ट्रासाउंड का दुरूपयोग रोकने के लिए कई सेंटरों में एक ही डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन की अनुमति पर भी रोक लगनी चाहिए। उपरोक्त तथ्यों को देख कर यह आवश्यक हो जाता है की आने वाले समय में ऐसे डॉक्टर्स को चिंहित कर उनकी भी अल्ट्रासाउंड योग्यता का टेस्ट लेना या उनकी ६ माह की ट्रेनिंग कराना अच्छी अल्ट्रासाउंड जांचों तथा जांचोपरांत सही इलाज के लिए परमावश्यक है जिससे स्वास्थय सेवाओं का स्तर ऊँचा रहे और मरीजों के स्वास्थ्य से किसी प्रकार का खिलवाड न हो सके। इसकी संस्तुति पीसीपीएनडीटी एक्ट के २०१४ में संशोधित नियमों में की गयी है।

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डॉक्‍टर

नियम तो इस बात की है कि अल्‍ट्रासाउंड के लिए हर जिले के सीएमओ या पीसीपीएनडीटी के समुचित अधिकारी इस प्रकार के रेडियोलाजिस्ट की सूची तैयार करें। इसमें ऐसे रेडियोलोजिस्ट्स के अल्ट्रासाउंड ज्ञान का आंकलन हो सके और किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर अल्ट्रासाउंड ट्रेनिंग कराई जा सके। लेकिन ऐसा होता नहीं है। वहज है भारी भ्रष्‍टाचार। अक्षम लोग अपनी डिग्रियों का किराया वसूल कर सड़कछाप सेंटरों के हाथों में अपनी डिग्री बेच लेते हैं। इसकी एवज में उन्‍हें हर महीने या हर हफ्ते मोटी रकम मिल जाती है। सेंटर की अनुमति सीएमओ से हासिल करने में आने वाला पूरा खर्चा ऐसे सेंटर के मालिक ही उठाते हैं।

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चिकित्‍सक

इसका खुलासा तब हुआ जब प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने पूरे देश और खास तौर पर यूपी के सभी जिलों में सरकारी कागजों और वहां दर्ज सूचनाओं का जायजा लिया। मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारियों, मुख्‍य चिकित्‍सा अधीक्षकों, जिलाधिकारियों, पीसीपीएनडीटी के तहत गठित समिति के पदाधिकारियों, सभी मेडिकल कॉलेजों तथा देश के सभी एम्‍स और भारतीय चिकित्‍सा परिषद तथा सभी प्रदेशों के चिकित्‍सा परिषदों से इस बारे में विस्‍तृत जानकारियां हासिल करने का प्रयास किया था।

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दुर्दशा कन्‍या भ्रूण की

इस प्रयास के तहत जो भी सूचनाएं मिलीं, वे हैरतनाक, आश्‍चर्यजनक होने के साथ ही प्रशासनिक व सरकारी कामकाज के बेहद अराजक और खतरनाक स्‍तर तक की थीं। इन सूचनाओं से साफ स्‍पष्‍ट होता है कि कन्‍या भ्रूण के संरक्षण और कन्या भ्रूण हत्‍या के खिलाफ झंडा उठाने वाले पीसीपीएनडीटी कानून के अनुपालन की असलियत क्‍या है। साफ पता चला है कि जिस कानून को कन्या भ्रूणहत्या रोकने के उद्देश्‍य के लिए बनाया और लागू कराया गया था, वह अपंग साबित हो रहा है।

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भगवान धन्‍वन्तरि

सीटी स्कैन और एमआरआई से लिंग  की जांच अल्ट्रासाउंड से भी ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकती है. लिंग जाच के कारण लगातार गिरते जा रहे स्‍त्री : पुरूष अनुपात को देखते हुए सीटी स्कैन और एमआरआई को भी पीसीपीएनडीटी एक्ट के दायरे में शीघ्रतम लाना भी अनिवार्य हो गया है। इस तथ्य पर अभी तक किसी का ध्यान न जाने की वजह से इन दोनों जांचो के गलत उपयोग के बारे में किसी को पता ही नहीं है। इनको को एक्ट के दायरे में लाने के साथ ही साथ ये भी आवश्यक होगा की केवल उन्ही रेडियोलाजिस्ट का रजिस्ट्रेशन हो जो भारतीय चिकित्‍सा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त डिग्री के धारक हों तथा जिनके समय में उनके विभाग में सीटी स्कैन और एमआरआई की मशीन लग चुकी हो और वो इन जांचो को करने योग्य हों। अन्य रेडियोलाजिस्ट के लिए योग्यता का टेस्ट और उसे पास न करने पर ट्रेनिंग का नियम लागू किया जाना होगा जिससे इन जांचो का लिंग परीक्षण में गलत उपयोग करने वाले रेडियोलाजिस्ट पर लगाम लगायी जा सके.

पेट में पहचान कर मारी जा रही हैं भविष्‍य में स्‍त्री बन सकने वाले कन्‍या-भ्रूण। सड़क-नाले के किनारे गुमटी खोले अप्रशिक्षित और झोलाछाप डॉक्‍टरों की करतूतों पर मेरी बिटिया का एक सशक्‍त हमला। पूरा मामला समझने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

कन्‍या-भ्रूण

अधिकांश अल्‍ट्रासाउंड सेंटर का मतलब अब किसी कत्‍लगाह से कम नहीं रह गया है, जहां मां के पेट में जन्‍म लेने की तैयारी कर रहे कन्‍या भ्रूण की आपराधिक पहचान कर उसे मौत के घाट उतारने की साजिशों की जाती हैं। इससे जुड़ी खबरों को देखने को अगर इच्‍छुक हों तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कन्‍या भ्रूण के कत्‍लगाह

डिग्री है कनकौव्‍वा उड़ाने वाली, करते हैं अल्‍ट्रासाउंड

: मेरी बिटिया डॉट कॉम के अभियान में हुआ गड़बड़झाला खुलासा : पीसीपीएनडीटी कानून के रखवाले खुद ही फर्जीवाड़ा करते हैं: जन सूचना अधिकार अधिनियम से पता चला कि अल्‍ट्रासाउंड में होता है भारी फर्जीवाड़ा : कन्‍याभ्रूण संरक्षण- दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : जिन डॉक्‍टरों का श्रीगणेश ही धोखाधड़ी वाली लूप-लाइन यानी चोर-गली से होगा, वे अल्‍ट्रासाउंड की मशीन में केवल गैरकानूनी काम ही तो करेंगे। आपके पास अल्‍ट्रासाउंड की डिग्री है या नहीं, अब यह बहस छेड़ने का जमाना बीत चुका है। डिग्री गयी भाड़ में, अब तो केवल अफसरों की जेब भरने के लिए झोला-भर नोटों की जरूरत पड़ती है। इसके बाद फिर धंधेबाजों की पौ-बारह हो जाती है। पैसा फेंकिये, तमाशा देखिये। पान-चाय की दूकान की तरह अल्‍ट्रासाउंड वाली गुमटी लगा कर नोट छापने की मशीन बन जाइये। और फिर इसके बाद यह कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह सिर्फ और सिर्फ ऐसे गैरकानूनी काम ही किये जा सकते हैं, जिनसे पीसीपीएनडीटी कानून की धज्जियां उड़ जाएं।

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डॉक्‍टर

अब यह जग-जाहिर हो चुका है कि वर्तमान समय में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एमडी रेडियोलोजी की डिग्री के लिए दो करोड़ रुपये तक देकर दाखिला हो जाता है। और इनमें अधिकांश कॉलेजों में शिक्षा का स्तर घटिया होता है। इतना ही नहीं, भले ही यह कॉलेज सरकारी क्षेत्र का हो, या फिर निजी क्षेत्र में बने मेडिकल कालेजों का हो, दोनों ही मेडिकल कॉलेजेस में अल्ट्रासाउंड प्रशिक्षण की सुविधाएं आज भी अपर्याप्त हैं। इस कारण केवल एमडी रेडियोलोजी की डिग्री होने से ही किसी डॉक्टर को एक काबिल अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञ मान लेना सरासर गलत और त्रुटिपूर्ण है।

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चिकित्‍सक

जी हां, यह है कन्‍या भ्रूण संरक्षण और कन्‍या-भ्रूण हत्‍या निषेध कानून की जमीनी हकीकत। केवल यूपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में यही हालत चल रही है। गर्भस्‍थ भ्रूण की स्‍वास्थ्‍य-सम्‍बन्‍धी असलियत को परखने का मौका न किसी के पास है, और न ही किसी में इतना दम-खम होता है कि वह इसकी जांच कराने की हैसियत जुटा सके। एक गिरोह की तरह संचालित होती हैं अल्‍ट्रासाउंड मशीनों लगाये व्‍यापारियों की सड़कछाप दूकानें। धोखाधड़ी, अराजकता और इंसानी-भ्रूण को पेट में ही मार डालने वालों की क्रूर गीदड़ों-चीलों-गिद्धों की जमात। पैसा ही सारे कानूनों का टेंटुआ दबोच देता है। इसके बाद तो जिसका जो भी मन करता है, वह इसका मनचाहा इस्‍तेमाल कर इस कानून की चिंदियां बिखेर देता है।

कन्‍या भ्रूण को मां की पेट में ही मार डालने से जुड़ी दर्दनाक घटनाएं और उससे निपटने वाली सरकारी मशीनरी को समझने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

दुर्दशा कन्‍या भ्रूण की

इसका खुलासा तब हुआ जब प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने पूरे देश और खास तौर पर यूपी के सभी जिलों में सरकारी कागजों और वहां दर्ज सूचनाओं का जायजा लिया। मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारियों, मुख्‍य चिकित्‍सा अधीक्षकों, जिलाधिकारियों, पीसीपीएनडीटी के तहत गठित समिति के पदाधिकारियों, सभी मेडिकल कॉलेजों तथा देश के सभी एम्‍स और भारतीय चिकित्‍सा परिषद तथा सभी प्रदेशों के चिकित्‍सा परिषदों से इस बारे में विस्‍तृत जानकारियां हासिल करने का प्रयास किया था।

इस प्रयास के तहत जो भी सूचनाएं मिलीं, वे हैरतनाक, आश्‍चर्यजनक होने के साथ ही प्रशासनिक व सरकारी कामकाज के बेहद अराजक और खतरनाक स्‍तर तक की थीं। इन सूचनाओं से साफ स्‍पष्‍ट होता है कि कन्‍या भ्रूण के संरक्षण और कन्या भ्रूण हत्‍या के खिलाफ झंडा उठाने वाले पीसीपीएनडीटी कानून के अनुपालन की असलियत क्‍या है। साफ पता चला है कि जिस कानून को कन्या भ्रूणहत्या रोकने के उद्देश्‍य के लिए बनाया और लागू कराया गया था, वह अपंग साबित हो रहा है।

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भगवान धन्‍वन्तरि

इन तथ्यों से यह सपष्ट होता है कि एक बड़ी संख्या में अपनी डिग्री के आधार पर रेडियोलाजिस्ट कहलाये जाने वाले तथा अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञ माने जाने वाले ऐसे डॉक्टर्स का पीसीपीएनडीटी एक्ट में रेडियोलाजिस्ट की श्रेणी में रजिस्टर्ड होना इस एक्ट का उल्लंघन है तथा तथ्यों को छुपाकर या अनदेखा कर शासन की आँखों में धूल झोंकने जैसा है।

अधिकांश अल्‍ट्रासाउंड सेंटर का मतलब अब किसी कत्‍लगाह से कम नहीं रह गया है, जहां मां के पेट में जन्‍म लेने की तैयारी कर रहे कन्‍या भ्रूण की आपराधिक पहचान कर उसे मौत के घाट उतारने की साजिशों की जाती हैं। इससे जुड़ी खबरों को देखने को अगर इच्‍छुक हों तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कन्‍या भ्रूण के कत्‍लगाह

पेट में पहचान कर मारी जा रही हैं भविष्‍य में स्‍त्री बन सकने वाले कन्‍या-भ्रूण। सड़क-नाले के किनारे गुमटी खोले अप्रशिक्षित और झोलाछाप डॉक्‍टरों की करतूतों पर मेरी बिटिया का एक सशक्‍त हमला। पूरा मामला समझने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

कन्‍या-भ्रूण

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे जस्टिस विनीत सरन !

: सर्वोच्‍च न्‍यायालय में रिक्त हो रहे सात पदों के लिये जल्द हो सकता है नामों की ऐलान, न्‍याय-क्षेत्र में खलबली : इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सुप्रीम कोर्ट कोटे की एक सीट हो गई है रिक्त, एपी शाही, विक्रम नाथ व सुधीर अग्रवाल : सब की निगाहें कोलेजियम की अगली बैठक पर टिकीं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : खबर है कि मूलरूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज एवं वर्तमान में ओड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विनीत सरन को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जा सकता है। जस्टिस सरन वर्ष 2002 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज बने थे। वर्ष 2015 में उनका तबादला कर्नाटका हाईकोर्ट कर दिया गया था। वर्ष 2016 में इनको मुख्य न्यायाधीश के पद पर प्रोन्नति देकर ओड़ीसा का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। तब से जस्टिस सरन वहीं पर तैनात हैं।

आपको बता दें कि हाल ही जस्टिस आरके अग्रवाल के सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हो जाने के कारण उत्तर प्रदेश के कोटे का एक पद सुप्रीम कोर्ट में रिक्त हो गया है। दरअसल हर राज्य का एक कोटा होता है सुप्रीम कोर्ट जज और चीफ जस्टिस के पदों पर तैनाती को लेकर। उत्तर प्रदेश का कोटा दो चीफ जस्टिस और दो सुप्रीम कोर्ट जज का है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कोटे के दो चीफ जस्टिस के पदों पर जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस कृष्ण मुरारी तैनात हैं। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट जज के दो पदों के कोटे में से एक पर जस्टिस अशोक भूषण तैनात हैं व दूसरे पर तैनात रहे जस्टिस आरके अग्रवाल मई में रिटायर हो चुके हैं।

सूत्र बताते हैं कि ऐसी हालत में उस एक पद पर तैनाती के लिये जस्टिस विनीत सरन के नाम की चर्चा ज़ोरों पर है। इसी तरह अगर जस्टिस सरन सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नत हो जाते हैं तब उत्तर प्रदेश के कोटे का चीफ जस्टिस का एक पद भी रिक्त हो जायेगा। उस पद पर तैनाती के लिये इलाहाबाद हाईकोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस एपी शाही, जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस सुधीर अग्रवाल में से किसी की प्रोन्नति की चर्चा भी हो रही है।

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