Meri Bitiya

Tuesday, Sep 25th

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

मेरा कोना

चौराहे पर पुलिस ने पीटा पत्रकारों को, चैनल पुक्‍क-पुक्‍क

: दोस्तों मुझे कवरेज़  के दौरान बुरी तरह पीटा गया, चिल्‍ला रहा है न्‍यूज नेशन का रिपोर्टर : सभी चैनलों ने मेरा साथ दिया, पर मेरा ही संस्थान भांग कर धड़ाम : क्‍या वाकई स्टिंगर-रिपोर्टर बिलकुल कुक्‍कुर होते हैं, आर्द्र स्‍वर में सवाल उछाल रहे हैं छोटे पत्रकार :

मेरी बिटिया संवाददाता

औरैया : अगर हम लोगो के साथ घटना होती तो अभी तक चैनल तहलका काट चुका होता। स्टिंगर भी इंसान होते है सर। आज जो मेरे साथ हुआ है कल और किसी स्टिंगर के साथ हो सकता है। पर क्या हम स्टिंगर तो कुकुर है। आपके लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया हमने। आपने जब हमें आपकी जरूरत थी, तो आपने मेरे साथ दूध की मक्‍खी से भी बदतर व्‍यवहार किया। हम गर्व से कहते रह हैं कि न्यूज नेशन न्‍यूज चैनल हमारा जीवन है, हमारी सांस है, हमारा लक्ष्‍य और हमारा उद्देश्‍य है। लेकिन हम सड़क पर पिटते रहे, मगर आपके चैनल से कोई भी हमारे पास नही आया मदद के लिए। इस लिए मैं आज न्यूज स्टेट न्यूज नेशन छोड़ रहा हूं। अगर स्टॉफर रिपोर्टर ही सब कुछ है तो स्टिंगर क्यों रक्‍खे जाते हैं। उलटा कानपुर नगर न्यूज के रिपोर्टर आये तो लेकिन हाल चाल पूछने की वजह जानने के बाद बोले: स्ट्रिंगर्स तो कुक्‍कुर होते हैं। मेहनत हम लोग करते हैं, स्टिंगर स्टॉफर क्या करते हैं। उनको तो पकी-पकाई मिलती है।

पुलिस से जुड़ी खबरों को देखने के लिए क्लिक कीजिए:-

बड़ा दारोगा

यह दर्द है न्‍यूज नेशन न्‍यूज चैनल के ओरैया के जिला रिपोर्टर का। मेरी बिटिया डॉट कॉम के साथ एक बातचीत में अश्विनि ने बताया कि आज मेडिकल के दौरान बहुत बुरा हुआ मेरे साथ। कोई गलती हुई होतो मुझे माफ़ करना।  मेरे सभी स्टिंगर भाइयो हमारे साथ क्या क्या हुआ इस वीडियो में देखियेगा। लेकिन आज भी मुझे मेरे संस्थान ने एक बार भी फ्लैश तक नही किया कि मैं पीटा गया हूं। क्योंकि मैं स्टिंगर हूं, कुक्‍कुर हूं न, इस लिए। आप लोगो का इतना प्यार मिला इस छोटे स्टिंगर को न्यूज नेशन की तरफ से अगर कोई गलती की हो तो माफ करना

दो पत्रकार पिट रहे थे, साहब (पुलिस) सो रहे थे !!!!

अगर आप खुद को पत्रकार मानते हैं.. तो ये वीडियो देखने के बाद आपका खून ज़रूर उबाल मारेगा। इससे संबंधित कहानी कुछ यूं है कि बीते शनिवार को औरेया जिले के 2 युवा पत्रकारों अश्वनी बाजपेयी (न्यूज़ नेशन/न्यूज़ स्टेट), अंजुमन तिवारी (चैनल वन) को पुलिस द्वारा ट्रकों से वसूली की जानकारी मिली। खबर बनाने के दौरान उन्होंने देखा कि देवकली चौकी प्रभारी मदन गुप्ता और उनके मातहत के संरक्षण में उक्त वसूली हो रही है। अभी यह लोग पूरे माहौल की रिपोर्टिंग कर रहे थे, कि अचानक करीब आधा दर्जन गुंडे पहुंचकर दोनों पत्रकारों पर ये कहते हुए जानलेवा हमला कर देते हैं। बोले, और बनाओ पुलिस के खिलाफ ख़बर।

हैरत है कि ये घटना देवकली पुलिस चौकी पर घटित हुई। घटना के बाद पीड़ित पत्रकार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। मुकदमा तो छोडिए, उनका मेडिकल अभी तक पुलिस ने नहीं करवाया। ऐसे में समझा जा सकता है कि छोटे जिलों के पत्रकारों का किस तरह शोषण होता है। वीडियो आपके सामने है...देखने वालों पर निर्भर है कि इसे कौन 'मजा' के तौर पर देखेगा और कौन  'सजा' के तौर पर। सोचिएगा... आज ये हैं.. कल हमारा नंबर भी आएगा!!!!

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार पत्रकारिता

मी लॉर्ड! चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखो, छक्के छूट जाएंगे

: अपर जिला जज होना किसी मां के दायित्‍वों पर कैसे भारी पड़ सकता है मी-लॉर्डों, तुमको जरूर समझना चाहिए : किसी शेरनी के शावकों पर बुरी निगाह डाल कर देखिये तो, जवाब तत्‍काल मिल जाएगा : मीलार्ड ! आप क्या हैं? हर शख्‍स के पास आत्‍मरक्षा के विशेष अधिकार हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सोचता हूं कि कि सुना ही दूं चंद घटनाएं। शायद आपके काम भी आ जाए। तो जनाब, यह भले ही एक कोरी कल्‍पना भले ही हो, लेकिन आपको इससे इस घटना को समझने में मदद मिल सकती है। तो किस्‍सा-कोताह यह कि शेरनी का अपने सिंह-शावक के बीच एक अद्भुत प्रेम-नेह संबंध होता था। एक दिन मैंने देखा कि एक शेरनी अपने इकलौते सिंह-शावक के साथ घूम रही थी। अचानक किन्हीं वजहों से शेरनी अपने शावक से थोड़ा दूर हटी, तो कुछ दो-कौड़ी के नीच लकड़बग्घों ने उसके शावक पर हमला कर दिया। शावक की चीखें घुटी-घुटी थी, बिल्कुल मरणासन्न। जैसे उसकी बोटियों नोच रहे हों लकड़बग्घे। शेरनी को कुछ समझ नहीं आया।  मगर उसे अपनी छठी इंद्री से इतना जरूर एहसास हो गया कि उसके प्राणों से भी प्‍यारा शावक मुसीबत में है और हमलावरों के चुंगल में है।

व्याकुल शेरनी बदहवास हो गई। बिना कुछ सोचे समझे उसने अपने शावक की ओर छलांग लगा दी और पहुंच गई अपने शावक के पास, जिसकी बोटियों कुछ दरिंदे लकड़बग्‍घे  नोच रहे थे। शेरनी ने दिखा कि वह उन लकड़बग्घा से अकेले मुकाबला नहीं कर सकती, लेकिन इसके बावजूद वह टूट पड़ी एक लकड़बग्घे पर जो उस शेरनी पर चिढ़ा रहा था। शेरनी तानकर अपना पंजा निकाला और सीधे उस लकड़बग्घे के चेहरे पर दे मारा। शेरनी ने इस हस्तक्षेप से शिकारे लकड़बग्घे अपने पिछवाड़े में अपने पूंछ दबाकर भाग निकले।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

कहानी इससे भी आगे भयावह है। लेकिन फिलहाल, इतना समझ लीजिए कि वह सिंह-शावक कोई शेर-बच्चा नहीं था बल्कि एक 20 बरस का एक छात्र था जो अपना भविष्य विधि-जगत में बनाना चाहता था। और अपने इसी संकल्प के तहत उसने देहरादून की पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी में एडमिशन किया था। इस हमले के दौरान उसका यह इस यूनिवर्सिटी में तीसरा बरस था। सिंह-शावक पर हमला करने वाले लोग लकड़बग्घे नहीं थे, बल्कि शायद उनसे भी क्रूर, निर्मम और अमानवीय जानवरों का झुंड थे जिन्‍होंने देहरादून के एक थाने पर अड्डा जमा लिया था। और आखिरी बात है कि वह शेरनी दरअसल एक जीता-जागता इंसान थी। बल्कि इस से भी बेहतर कहें तो वह एक जिद भी थी। ऐसी नैसर्गिक जिद, जिसमें न्याय के प्रति समर्पण की भावनाएं कूट-कूट कर भरी हुई थीं। और सर्वोच्‍च बात यह कि वह जिद एक मां थी, उसमें भरा मातृत्व थी।

इस शेरनीनुमा मां के सिंह-शावकनुमा विधिशास्त्र के छात्र बच्चे पर देहरादून के लकड़बग्घा पुलिसवालों ने जितना अपमान हो सकता था, किया। इस बच्चे को उसके हॉस्टल में घुसकर पीटा गया। उसको किसी को कुख्यात अपराधी की तरह पुलिस जीप में ठूंस कर मां-बहन की गाली दी। यह पुलिसवाले पूरे यूनिवर्सिटी में जुलूस निकालते रहे और आखिर में पुलिस थाने पर पहुंचकर उसे सरेआम उस बच्चे की मां के सामने मां-बहन-बेटी की अश्‍लील गालियां देते रहे।

अब आप बताइए कि आप अगर उस समय मां होते और आपका बच्चा कुछ लकड़बग्घों के चंगुल में फंसा होता तो आप क्या करते हैं ? शायद मैं आपको नहीं समझा पा रहा हूं कि उस वक्‍त आप अगर होते तो क्‍या करते। लेकिन इतना जरूर है कि अगर मैं उस बच्‍चे की मां की भूमिका में वहां मौजूद होता, तो मैं क्या करता।  सुनिये, मैं बताता हूं आपको, कि मैं अपना पूरा ध्यान अपने बच्चे को बचाने पर लगाता और मेरे बच्चे के हमलावरों से जूझ पड़ता। उस वक्‍त मैं केवल मां होता, जो अपने नैसर्गिक न्‍याय की भावना से ओतप्रोत होता। जूझ जाता उन लकड़बग्घों से जो हमारे बच्चे की बोटियों पर निशाना लगा रहे होते, नोंच रहे होते या फिर अपनी लकड़बग्घा स्टाइल में उसका मजाक उड़ा रहे होते। मैं अपना पंजा उठाता और तान कर हमलावरों में से किसी न किसी के चेहरे पर रसीद कर देता।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

खैर, अब आप बताइए कि ऐसी हालत में अगर आप होते तो क्या करते हैं? अपने कलेजे के टुकड़े को पिटते-गालियां खाते हुए चुपचाप खड़े रहते या फिर सीधे हस्तक्षेप कर देते। आप भी प्रतिरोध पर उतर आये, बिना सोचे-बिचारे के लकड़बग्‍घों के झुंड में आप बुरी तरह फंस सकते हैं। लेकिन उस समय आपको अपने नैसर्गिक और प्राकृतिक दायित्‍व निभाते, फिर भले ही आपकी जान या प्रतिष्‍ठा अथवा आजीविका चली जाती। आप सब कुछ भूल जाते और सिर्फ बच्‍चे को बचाने में अपना ध्‍यान देते।

आप बताइए ना, कि आप भी ऐसा ही करते ना?

वेरी गुड। लेकिन ठीक यही दायित्‍व तो जया पाठक ने भी किया। जया पाठक, यानी उस बच्चे की मां जो अपनी बच्‍चे के आर्तनाद सुनकर तत्‍काल मौके पर पहुंच गई और ठीक उसी मौके पर उसने हमलावर लोगों पर तमाचा जड़ दिया। भले ही उसके बाद वहां मौजूद उन सारे लकड़बग्घों के झुंड ने मिलकर उसका तियां-पांचा कर दिया। लेकिन कम से कम उस मां ने इतना तो जाहिर कर ही दिया कि उसके लिए अपनी जिंदगी बेकार है अगर वह अपने बच्चे की जिंदगी नहीं बचा सकती। न्‍याय भी तो यही कहता है न मी लॉर्ड।

अब आखिरी सवाल आप मीलार्ड लोगों से। मीलार्ड ! आप क्या हैं? माना कि आपके पास कुछ विशेष अधिकार हैं। लेकिन ठीक इसी तरीके से विशेष अधिकार तो एक मां के पास भी होते हैं ? यह बात भी छोड़ दीजिए तो सामान्‍य अधिकार तो उस बच्चे के पास भी थे। खैर, मुझे इतना तो बताइए क्या सामान्य नागरिक को अपनी बात कहने या बोलने या सुरक्षा करने का कोई अधिकार है या नहीं? आप तो मी लॉर्ड हैं, फैसला कीजिए न कि जया पाठक की जगह अगर आप उस बच्चे की मां होते, तो आप खुद क्या करते हैं? आईपीसी की धारा 96, 97 , 98 और उसके बाद की तत्‍सम्‍बन्‍धी धाराएं इसी जमीन पर कायम हैं मी लॉर्ड। और आपको यह सिखाने की जरूरत नहीं है कि कानून किताबों से नहीं, मानवीय व्‍यवहार पर तय होते हैं। इसीलिए बहस होती है, जहां एक ओर कट्टर कानून होते है, वहीं दूसरी ओर मानवता का समंदर। निष्‍ठुरता का नाम है कांक्रीट का मकान, जबकि उसमें मानवता, भावुकता और ममत्‍व-स्‍नेह बसता है।

तो मी लॉर्ड ! सिर्फ कानून मत बांचिये, चो‍टहिल मातृत्‍व की पीड़ा देखिये ? आपके छक्के न छूट जाएं, तो मेरा भी नाम कुमार सौवीर नहीं।

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी।

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

हाईकोर्ट: चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

देहरादून कांड में न्यायिक अधिकारी जया पाठक दोषी

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

जज पर दबाव : मामला गंभीर, दबाव तो पड़ता ही है

बरेली सीजेएम के घर झंझट, जमानत अर्जी खारिज

आज अगर ऐसा हो तो सांप्रदायिक तनाव हो जाए

: जब बलराज साहनी ने हबीब तनवीर को रसीद किया था एक करारा तमाचा : याद रखना कि एक जरूरी चीज होती है जिसे ‘मसल मेमोरी’ : कमाने के लिए अंगूर बेचे, सर्कस और रेडियो में काम किया, नाइटक्लब में गाया भी :

तारेंद्र किशोर

मुम्‍बई : हबीब तनवीर की जितनी थियेटर पर पकड़ थी, उतनी ही मज़बूत पकड़ समाज, सत्ता और राजनीति पर थी. वे रंगमंच को एक पॉलिटिकल टूल मानते थे. उनका कहना था कि समाज और सत्ता से कटकर किसी क्षेत्र को नहीं देखा जा सकता.

21वीं सदी में कला माध्यमों की जगह इंटरनेट, उच्च तकनीक वाले गैजेट्स और सूचना क्रांति के तमाम दूसरे साधनों ने ले ली है, लेकिन 20वीं सदी सिनेमा और थियेटर की सदी थी. इसी सदी में भारतीय थियेटर भी विकसित हुआ और अपनी बुलंदी पर पहुंचा.इसी दौर में भारतीय थियेटर जगत को उसको उसका सबसे नायाब किरदार हबीब तनवीर मिला. हबीब तनवीर एक ऐसे रंगकर्मी का नाम है, जो बुद्धिजीवी वर्ग में जितना स्वीकार्य है उतना ही आम लोगों में भी लोकप्रिय है. एक ऐसा रंगकर्मी जो भारत में नाट्य कला माध्यम की पहचान बन गया.उनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह वो सीख थी, जो उन्हें लंदन में तालीम हासिल करते वक्त मिली थी कि मंच पर कहानी दर्शकों को आसानी से समझ में आनी चाहिए.

1 सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब साहब का पूरा नाम हबीब अहमद खान था. पिता पेशावर से थे और मां रायपुर की. बचपन में वो पढ़ने में काफी होशियार थे इसीलिए उनके मन में ख्याल आया था कि वो भारतीय सिविल सेवा में जाएंगे. वो आर्ट्स पढ़ना चाहते थे लेकिन पढ़ने में अच्छे थे तो उनके शिक्षकों का ख्याल था कि उन्हें साइंस पढ़ना चाहिए.छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा लेने के बाद उन्होंने नागपुर के मॉरिस कॉलेज में दाखिला ले लिया और फिर उर्दू में एमए करने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे लेकिन वो फर्स्ट ईयर से आगे नहीं जा सके. धीरे-धीरे सिविल सेवा में जाने का भी उनका इरादा खत्म हो गया. अब वो एक शिक्षक बनने के बारे में सोचने लगे.वैसे ये ख्याल भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहा क्योंकि फिर वो फिल्मों में जाने के बारे में सोचने लगे. इन्हीं दिनों में जब उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कीं, तो अपने नाम में ‘तनवीर’ तखल्लुस जोड़ लिया. इस तरह से वह हबीब अहमद खान से हबीब तनवीर बन गए.एक पत्रकार के तौर पर ऑल इंडिया रेडियो से अपने करिअर की शुरुआत करने वाले हबीब साहब ने कई फिल्मों की पटकथा लिखी और करीब नौ फिल्मों में अभिनय भी किया. उनकी आखिरी फिल्म थी सुभाष घई की ब्लैक एंड व्हाइट.

हबीब तनवीर अपने बड़े भाई को नाटक में काम करते हुए देख कर बड़े हुए थे. उनके बड़े भाई अक्सर नाटकों में औरतों का किरदार निभाते थे. ऐसे ही एक नाटक मोहब्बत के फूल में उनके बड़े भाई ने प्रेमिका का किरदार निभाया था, जिसका प्रेमी घायल हो जाता है और वो उनसे मिलने जाती है. इस नाटक को देखते हुए तनवीर रोने लगे थे. तनवीर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पड़ोस में रहने वाले नबी दर्जी अक्सर इस नाटक का जिक्र कर उन्हें छेड़ा करते थे कि कैसे वे नाटक के दौरान रोने लगे थे. यहां तक कि जब वो बड़े हो गए और बॉम्बे चले गए, तब भी जब कभी लौटना होता तो नबी दर्जी उन्हें बुलाते और चाय पिलाते फिर उस दिन की बाद याद दिलाकर चिढ़ाते, ‘याद है न कैसे उस दिन तुम नाटक देखते हुए रोने लगे थे.’

अभिनय की दुनिया में पहला कदम तो उन्होंने 11-12 साल की उम्र में शेक्सपीयर के लिखे नाटक किंग जॉन प्ले के जरिये रखा था, लेकिन एक रंगकर्मी के रूप में उनकी यात्रा 1948 में मुंबई इप्टा से सक्रिय जुड़ाव के साथ शुरू हुई. उस वक्त का एक दिलचस्प वाकया है जो हबीब तनवीर बाद में सुनाया करते थे. इप्टा के एक नाटक के रिहर्सल के दौरान हबीब तनवीर एक डायलॉग को सही से बोल नहीं पा रहे थे. तब कई बार के प्रयासों के बाद बलराज साहनी ने उन्हें एक जोरदार तमाचा जड़ दिया था. इसके बाद एक बार में ही हबीब तनवीर ने वो डायलॉग सही से बोल दिया. साहनी ने इसके बाद कहा कि थियेटर में एक जरूरी चीज होती है जिसे ‘मसल मेमोरी’ कहते है. ये जो थप्पड़ तुम्हें पड़ा है, यही ‘मसल मेमोरी’ है जिससे तुम्हें डायलॉग एक बार में याद हो गया.

शायद इसीलिए वो बलराज साहनी को अपना गुरु मानते थे. जब इप्टा के सभी सदस्य जेल में थे तो इप्टा को संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी. उसी वक्त वहीं रहते हुए प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े. उस वक्त के इन दोनों ही महत्वपूर्ण आंदोलनों का असर उनकी ज़िंदगी पर ताउम्र रहा और वे हमेशा राजनीतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ अपने कला से जुड़े कलाकार रहे.

1954 में दिल्ली आकर वे कुदसिया जैदी के हिंदुस्तानी थियेटर से जुड़े थे और बच्चों के लिए नाटक करना शुरू किया था. यही उनकी मुलाकात अभिनेत्री और निर्देशिका मोनिका मिश्रा से हुई जिनसे बाद में उन्होंने शादी की. 1955 में हबीब तनवीर यूरोप चले गए और ब्रिटेन के रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामाटिक आर्ट में दो सालों तक थियेटर सीखा. इन दो सालों के बाद वो एक साल तक यूरोप में भटकते रहे, खूब नाटक देखे, पैसे कमाने के लिए अंगूर बेचे, सर्कस और रेडियो में काम किया, नाइटक्लब में गाया भी

फिर एक दिन वो बर्तोल्त ब्रेख्त से मिलने के लिए ट्रेन से बर्लिन पहुंच गए लेकिन उनके पहुंचने से कुछ ही हफ्ते पहले उनकी मौत हो गई थी. वो बर्लिन में आठ महीने रहे और ब्रेख्त के ढेर सारे नाटक देखे. उनके कलाकारों से मुलाकात की और नाटकों को लेकर खूब सीखा.यूरोप प्रवास के दौरान ही पेरिस में 1955 में उनकी मुलाकात फ्रेंच अभिनेत्री जिल मैकडोनाल्ड से हुई थी. उस समय जिल 17 साल की थी और हबीब 32 साल के. दोनों के बीच प्रेम हुआ और बाद में दोनों की एक बेटी ऐना भी हुई. बहुत दिनों तक ये बात किसी को पता नहीं थी. यहां तक कि तनवीर की दूसरी बेटी नगीन तनवीर को भी 15 साल की उम्र में पता चला कि उनकी कोई बड़ी बहन भी है.

हबीब तनवीर की मृत्यु के बाद ये बात मीडिया में आई कि उनका इंग्लैंड में भी एक परिवार है और नगीन के अलावा एक और बेटी भी है. हार्पर कॉलिंस से 2016 में एक किताब आई है अ स्टोरी फॉर मुक्ति, मुक्ति तनवीर के नाती का नाम है जो कि ऐना का बेटा है.

यह किताब हबीब तनवीर के उन खतों का संकलन है जो कि उन्होंने भारत लौटने के बाद जिल मैकडोनाल्ड को लिखे थे. जिल इस किताब में लिखती हैं कि जब हबीब को 1964 में पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं तो उसने अपने कदम वापस खींच लिए. मेरी मां उस वक्त हबीब के इस तरह खामोशी से चले जाने से बहुत नाराज हुई थीं. उन्हें लगा था कि मुझे छोड़ दिया गया है.इसके नौ साल बाद 1973 में हबीब की बेटी ऐना से मुलाकात हुई. उसके बाद ऐना लगातार उनकी मृत्यु तक उनके संपर्क में रहीं.

1959 में उन्होंने भारत में अपनी पत्नी मोनिका मिश्रा और छह छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को साथ लेकर नया थियेटर की स्थापना की. वह एक प्रयोगधर्मी रंगकर्मी थे. उन्होंने लोकनृत्य को थियेटर से जोड़कर थियेटर को नई परिभाषा और आयाम दिया. छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय थियेटर का ऐसा सामंजस्य बैठाया कि लोक से लेकर विश्व थियेटर एक क्रम में नज़र आने लगते हैं. यहां भाषा और राष्ट्रीयता का भेद ख़त्म कर वो एक विश्व मानव की परिकल्पना को साकार करते दिखते हैं.

इन्हीं संदर्भों में उन्हें कुछ विद्वानों ने ब्रेख्त का उत्तराधिकारी माना है. हबीब अपने बारे में खुद कहते हैं कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की खोज यूरोप के माध्यम से की है. उनका झुकाव दुखांत नाटकों की ओर था. वे मानते थे कि अत्यधिक खुशी के क्षणों में भी दुख का तत्व विद्यमान रहता है.

हबीब तनवीर अपने बहुचर्चित और बहुप्रशंसित नाटकों ‘चरणदास चोर’ और ‘आगरा बाज़ार’ के लिए हमेशा याद किए जाते हैं. चरणदास चोर 1982 में एडिनबरा इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में सम्मानित होने वाला पहला भारतीय नाटक था.उनकी अन्य प्रमुख नाट्य प्रस्तुतियां पोंगा पंडित, बहादुर कलारिन, शतरंज के मोहरे, मिट्टी की गाड़ी, गांव मेरी ससुराल नांव भोर दमाद, जिन लाहौर नहीं वेख्या, उत्तर रामचरित, जहरीली हवा ने भी दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी है.

पोंगा पंडित को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने काफी विरोध किया था क्योंकि इसमें हिंदू धर्म में होने वाले भेदभाव और असहिष्णुता पर तल्ख टिप्पणी की गई थी. मध्य प्रदेश के विदिशा में सितंबर 2003 में उनके इस नाटक के मंचन के समय जब हमला हुआ, तब उन्होंने कड़ी सुरक्षा में मुट्ठी भर लोगों के बीच यह नाटक किया.उन्होंने उस वक्त वहां मौजूद छात्रों से पूछा था कि क्या वो नाटक देखना चाहते हैं? भीड़ में से आवाज़ आई थी कि हम यह नाटक नहीं देखना चाहते. तब उन्होंने कहा कि मैं छात्रों से पूछता हूं, अगर वो चाहते हैं तो हम यह नाटक कर सकते हैं. मैं अपनी ओर से आश्वस्त करता हूं. पुलिस की बात मैं नहीं जानता. मैं दर्शकों की प्रतिक्रिया चाहता हूं, वो चाहते हैं तो फिर ठीक है, पुलिस जानती है कि उसे क्या करना है.

इसके बाद लगभग हॉल खाली हो गया. आठ-दस लोग मुश्किल से बचे रह गए थे. फिर उन्होंने कहा कि मैं आज पुलिस वालों को यह नाटक दिखाना चाहता हूं. मैंने मुख्यमंत्री से बात कर ली है और हम यहां नाटक दिखाने आए हैं, जो दिखाकर ही जाएंगे. आप कानून संभालिए, हम नाटक खेलते हैं.फिर उन्होंने लगभग खाली हॉल में यह नाटक खेला था. हबीब के साथी कलाकार उदयराम उनके बारे में बताते हैं कि वो थियेटर के बिना नहीं जी सकते थे. अगर मरने के समय यमराज भी आए तो वो कहते कि एक मिनट रुक जाओ जरा यह एक सीन कर लेने दो फिर मैं आता हूं. इस तरह के इंसान थे वो.

भारत सरकार ने हबीब को अपने दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण और फ्रांस सरकार ने अपने प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स’ से सम्मानित किया था. इसके अलावा कला क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कालिदास राष्ट्रीय सम्मान, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेशनल रिसर्च प्रोफेसरशिप से नवाजा गया.

हबीब तनवीर की जितनी पकड़ नाटक थियेटर पर थी उतनी ही मजबूत पकड़ समाज, सत्ता और राजनीति पर थी. वे रंगमंच को एक पॉलिटिकल टूल भी मानते थे. वे कहा करते थे कि समाज और सत्ता से काटकर किसी भी क्षेत्र को न देखा जा सकता है, न ही समझा जा सकता है तब नाटक और रंगमंच कैसे अपवाद हो सकते हैं.

जिस साल वे ‘नया थियेटर’ की 50वीं वर्षगांठ मना रहे थे, उसी साल 8 जून 2009 को वे ज़िंदगी के रंगमंच को अलविदा कह गए. साल 2008 में 1 सितंबर के दिन नाट्य मंडली ‘सहमत’ ने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में तनवीर का 85वां जन्मदिन मनाया था. वहां उन्होंने मौजूदा राजनीतिक-सांस्कृतिक हालात पर एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया था. कौन जानता था कि वो हबीब तनवीर का अंतिम संबोधन होने वाला है.

आखिरी वक्त में वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे जो तीन भागों में आने वाली थी लेकिन अपनी मृत्यु तक वे सिर्फ एक ही भाग लिख पाए थे जिसमें उनकी ज़िंदगी की 1954 तक की कहानी दर्ज है. यह भाग हबीब तनवीर: मेमॉयर्स नाम से पेंगुइन प्रकाशन ने छापा तो है, लेकिन उनकी ज़िंदगी के वो अनदेखे हिस्से हमेशा के लिए अधूरे ही रह गए.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

फुफ्फा चिल्‍लाए कि जोगियापुरा में फाड़ी जा रही है चड्ढी

: भाईजारापार्टी के महामंत्री के इशारे पर डण्‍ठल बाबू ने उनकी चड्ढी में तेजाब डाल दिया : क्‍वेरी हुई कि सोयल बाबू ने 25 लाख रूपयों की तेल की शीशी क्‍यों मांगी, क्‍या इस्‍तेमाल करेंगे, किस पर प्रयोग होगा : ढिबरीदीन के गेस्‍टॉपो में फत्‍ते को नमाज की शैलियां सिखानी शुरू हुई। पहले ही प्रयास में आह, फिर वाह :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सचिवालय के आसपास आज दोपहर अचानक ही डुगडुगी बजने से लोग चौंक गये। साथ में ही गगनचुम्‍बी नारों पर टंकार सुनायी पड़ने लगी। संगत में थे  चिमटा, डमरू और खड़ताल, झमाझमा बजना शुरू हो गया। पता चला कि राजभवन के आसपास से यह जुलूस निकला है और सचिवालय के आसपास पहुंच गया है। जब मजमा जोरदार जुट चुका, तो माइक लेकर फलाने ने ऐलान कर दिया कि जोगियापुरा में फत्‍ते की चड्ढी कमलीवाले लोगों ने सुलगाकर छेददार बना डाली है। हाय हाय। फलाने का निष्‍कर्ष था कि कमल की यह चड्डी अब चड्ढी नहीं रही, बल्कि बिलकुल जाली बन गयी है, छलनी बन गयी है। जहां 72 नहीं, बल्कि अब तो बेशुमार छेद दिख रहे हैं। हवा, पानी, मच्‍छर, कीड़ा-मकौड़े आराम से आ-जा रहे हैं, जैसे एक्‍सप्रेस-वे पर हों। इस चड्ढी में जो भी रख दो, वह या तो उड़ जाता है, गिर जाता है या फिर टपक जाता है। पहनने का औचित्‍य ही बेमतलब हो गया है। पहनना या नहीं पहनना के बीच का फर्क भी गुम हो गया है। चड्ढी शब्‍द में जितने भी अक्षर हैं, सब छनछनाकर बिखरे जा रहे हैं।

बीच बाजार हंगामा हुआ तो खोजबीन शुरू हो गयी। पता चला कि फत्‍ते मूलत: कमलपुरम के रहने वाले हैं, और उनको जोगियापुरा के कुछ काली-कमली वालों ने फंसा कर बर्बाद कर दिया है। दरअसल,  फत्‍ते ने अपने बुढ़ऊ फलाने फुफ्फा से शिकायत की कि वे अपनी अलगनी पर चड्ढी सुखा रहे थे। इसी बीच भाईजारापार्टी के कुछ लोगों ने मना किया, बोले कि अगर अपनी चड्ढी सुखा कर उसमें बैक्‍टीरिया खत्‍म करना है, तो 25 लाख की आने वाली सुगंधित तेल की शीशी लेकर आना पड़ेगा। फत्‍ते के पास इतनी हैसियत नहीं थी, तो उन्‍होंने मना कर दिया। इस पर भाईजारापार्टी के महामंत्री उनील कंसल बाबू के इशारे पर सोयल बाबू ने उनकी चड्ढी में तेजाब डाल दिया। अब जब अनजाने में फत्‍ते ने उसे पहना, तो वह बुरी तरह कनकना पड़ा। मारे तेजाबी गरमी के, पूरा गुप्‍तांग झुलस गया।

यह शिकायत सुनते ही बुढऊ फलाने फुफ्फा का अंग-अंग फुंक गया। उनकी सलाह पर ही फत्‍ते ने ईमेल से फलाने फुफ्फा के पास शिकायत भेज दी। अब फलाने फुफ्फा चूंकि नागपुर में प्रशिक्षित हैं, इसलिए उन्‍होंने फत्‍ते की शिकायत पर पूरा ब्‍योरा-खर्रा लिख कर जोगियापुरा के मुखिया को एक चिट्ठी रजिस्‍टर्ड डाक में पोस्‍ट-ऑफिस को भेजी थी। यह भी दर्ज कर दिया कि डण्‍ठल बाबू 25 लाख रूपयों की तेल की शीशी क्‍यों मांग रहे हैं, उसका क्‍या इस्‍तेमाल करेंगे, किस पर प्रयोग किया जाएगा, वगैरह-वगैरह। वह ढमाके के आफिस पहुंची तो जरूर, लेकिन ढमाके के आफिस में किसी साजिश की तहत जोगियापुरा सचिवालय के दफ्तर की दराज से किसी ने चुपके से निकाल लिया है।

हालांकि कहने वाले लोग यहां तक भी कहते हैं कि अमित-टोला के उनील कंसल बाबू के इशारे पर ही जोगियापुरा में पूरा गैंग-संचालित होता है। जोगियापुरा-गैंग के मुखिया है सोयल बाबू। और जोगियापुरा-टोला में जितने लोग हैं, उनमें से ज्‍यादातर लोग उनील कंसल बाबू के इशारे पर हैं। अमित-टोला के गज्‍जू-बाबू ने ही उनील कंसल को वहां का जंगल-सेकरेटरी अधिकृत किया है। अब चूंकि जोगियापुरा के मूल निवासियों को उनील बाबू की अति-सक्रियता नापसंद है, इसलिए उन्‍होंने ही यह पत्र चुपके से उठाया है, और जनसाधारण के विचार-विमर्श हेतु उसकी फोटोकॉपी करवा कर  वायरल कर दिया है।

यह पता चलते ही कंसल बाबू की कमलिनी जैसी पत्तियां एकदम से भक्‍क-सुलग गयीं। उन्‍होंने जोगियापुरा के दारोगा ढिबरीदीन को बुलाया। मजेदार बात यह कि ढिबरीदीन कहने को तो जोगियापुरा में तैनात है, लेकिन असल में वह है अमित-टोला के उनील कंसल का खासुलखास। काम फन्‍नेदार करता है। ढिबरीदीन को खूब पता है कि फत्‍ते कहां मिलेगा, उसकी नस किधर है, डण्‍डा कहां से आयेगा, प्रवेश-द्वार किधर है, किस पर तरह को नमाज की शैली में झुकाया जाता है। ढिबरीदीन को खूब पता है। दारोगा है तो क्‍या हुआ, उसे कानून-शानून से तो कोई मतलब ही नहीं होता है। अरे घाट-घाट का पानी पिये हुए है यह ढिबरीदीन।

तो भइया, उसने गोल्‍डेन-चैरियट मंगवाया, जिसमें पचासों सारथी जुते हुए थे। यह स्‍वर्ण-रथ पूरे सम्‍मान के साथ फत्‍ते के घर पहुंचा। सारथियों ने बिना पूछे-ताछे फत्‍ते को अपने कांधे पर ऐसे टांग लिया जैसे फत्‍ते जी सीधे ओलम्पिक में गोल्‍ड-मैडल जीत कर लौटे हों। पब्लिक जयजयकारा लगाती ही रही, और ढिबरीदीन ने अपने गेस्‍टॉपो में फत्‍ते को नमाज की शैलियां सिखानी शुरू कर दी। पहले ही प्रयास में ही आह की चीत्‍कार निकली, और उसके कुछ ही मिनट बाद ही वाह-वाह वाह-वाह की स्‍वर-लहरियां बिखेरती कोयल की कू-हू कू-हू निकलने लगी। मौसम सुखद हो गया। जो बौर आम पर भराभर गया था, वह पके आम में तब्‍दील हो गया।

फत्‍ते सम्‍पूर्ण विश्राम के लिए अज्ञात-स्‍थान की ओर प्रस्‍थान कर गया, जबकि ढिबरीदीन ने डण्‍डा दूर फेंक दिया। उसका इस्‍तेमाल आखिर करते भी ढिबरीदीन, तो क्‍या करते। उसमें थोड़ी गंदगी जो लग चुकी थी न, इसलिए।

कुछ और दिलचस्‍प खबरें अगर आप देखना चाहें तो निम्‍न शीर्षकों पर क्लिक कीजिएगा:-

अपराध हुआ तो सीएम ऑफिस से, मुकदमा पीडि़त पर

पुलिस ने घंटों लगाया पीडि़त को एनीमा, फिर छुच्‍छी निकाल ली। "अब आराम है"

यह पुलिस की गुंडागर्दी है, या गुंडों की पुलिसगिरी ?

बिरादरी के लोगों के लिए न वकील जूझते हैं, न पत्रकार

Page 3 of 140