Meri Bitiya

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मेरा कोना

मासिक धर्म अभिशाप नहीं। रचयिता हैं हम…

: We are the creators : -कक्षा 11 में एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मेरी सोच बदल दी : When my friend got her periods between the class, this is what I learnt :

साशा सौवीर

लखनऊ : Akshay Kumar..thanx

Thanks for the initiative you took and the courage you gathered to create a movie on such a sensitive issue (which is not actually, but in India it is).

Atleast you made us move a step forward towards our freedom.

Otherwise that useless fear of periods..its a silent killer.

Thankyou really for announcing it loud that those 8 pack of napkin is actually not a dynamite, so people no need to turn around and peep in our hands as we step out of the pharmacy.

I am really thankful Mr. Akshay Kumar..You proved again that you rule in our hearts. (Waiting eagerly for the movie)

Meanwhile, I would really like to share an incident which happened when I was in class 11th. A friend of mine had her periods between the class. Cramps began and she couldn’t handle. She burst out of tears and we were really really afraid by her reaction.

A female teacher then came and took her to the rest room.

We knew very well what actually happened (obviously, we suffer every single month).

The girl in her worse condition stressfully screamed, “it’s a curse. An injustice God has done. Why we girls??? Why not boys.”

Probably every girl on her first day murmer this…

A very senior teacher Preetilata Goswami ma’am then entered the room and called upon all the girls from 11 and 12 class.

She gave an off subject lecture, I still remember.

Goswami Ma’am said…

“Its not a curse my child. It’s a blessing. God has chosen us..we female for this blessing. We can give birth because of this process. Its absolutely not a curse.

God has chosen us to give birth..we give life…please realize the depth.

Remember..We are the creators.”

What words!!

Ma’am this is surely unforgettable. Thanks for the lesson.

-Sasha

( लखनऊ की रहने वाली लेखिका साशा सौवीर पत्रकार और चिंतक हैं)

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

: फिर कल मीडिया-ट्रायल करने क्‍यों पहुंचे थे आप मिस्‍टर जस्टिस : ठन गयी तो सीधे मीडिया में पहुंच गये, अब इस बयान का क्‍या अर्थ समझा जाए : मीडिया का इस्‍तेमाल कर आप अपनी हांडी में क्‍या पका रहे रहे हैं, पूरा मुल्‍क समझ रहा है : गजब हावभाव दिखने लगा है इन जजों के रवैयों में :

कुमार सौवीर

लखनऊ : अभी दो दिन ही हुआ है, जब भारत की न्‍याय-पालिका के कारनामों से पूरी दुनिया दहल गयी। अपने 70 बरस पुराने इस देश की आजाद न्‍यायपालिका ने शांत होने के भ्रम को तोड़ दिया और खुलेआम ऐलान कर दिया और वे अपने सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश से बगावत बैठे। यह एक अभूतपूर्व संकट था, जिसकी कल्‍पना तक कोई नहीं कर सकता था। देश को अपने कानों पर यकीन तक नहीं आया कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के दूसरे पायदान पर खड़े एक वरिष्‍ठतम जस्टिस के नेतृत्‍व में चार जजों ने सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश की सल्‍तनत से बगावत कर दी थी। किसी ट्रेड-यूनियन के नेताओं के डेलीगेशन की तरह हारे-लुटे-पिटे यह चारों जज पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ कर पहुंचे, और बेहद विनम्र स्‍वर में बोले कि उनकी बात लीजिए, और उनकी बात पूरे देश की जनता तक पहुंचायी जाए।

लेकिन आज अचानक ही इन जजों के रवैये में गजब बदलाव आ गया। दीपक मिश्र के बाद के दूसरे नम्‍बर के जज कुरियन जोसेफ शनिवार को बदले-बदले अंदाज में दिखे। कोच्चि में उन्‍होंने यह बयान भी दिया कि न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कोच्चि में कहा कि शीर्ष न्यायालय में कोई भी संवैधानिक संकट नहीं है और जो मुद्दे उन लोगों ने उठाए हैं, उनके सुलझने की पूरी संभावना है। उन्‍होंने कहा कि, " हमने एक मुद्दा उठाया है। संबंधित लोगों ने इसे सुना है। इस तरह के कदम भविष्य में नहीं दिखेंगे। इसलिए (मेरा) मानना है कि मुद्दा सुलझ गया है। मामले को हल करने के लिए बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि यह मामला संस्था के भीतर हुआ है। इसे हल करने के लिए संस्था की ओर से जरूरी कदम उठाए जाएंगे।"

कमाल है। गजब बात कह दी है जस्टिस कुरियन जोसेफ ने। दो दिन पहले दीपक मिश्र के खिलाफ जेहाद छेड़ देना, और फिर अब उनका यह बयान देना, कि कोई संकट नहीं है न्‍यायपालिका और सर्वोच्‍च न्‍यायालय में, बेहद गहरे सवाल पैदा करने लगा है। खास तौर पर तब, जबकि जस्टिस कुरियन जोसेफ के अनुसार मामले को हल करने के लिए बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं दिख रही है, क्योंकि यह मामला संस्था के भीतर हुआ है। इसे हल करने के लिए संस्था की ओर से जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

क्‍या गजब बात कह रहे हैं आप जस्टिस कुरियन जोसेफ जी। आपको बता दें कि इन्‍हीं जस्टिस कुरियन समेत चार जजों ने दो दिन पहले ही पूरे मुल्‍क को हिला दिया था। पूरा देश भौंचक्‍का हो चुका था इन जजों के बयान और जाहिर है कि न्‍यायपालिका के तौर-तरीकों और उठापटक से। हालत इतनी बिगड़ चुकी थी कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र तक को सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश के घर जाते देखा गया। हालांकि बाद में नृपेंद्र मिश्र के यहां से यह सफाई दी गयी कि वे नये साल की मुबारकबाद वाला कार्ड देने को दीपक मिश्र के घर गये थे, लेकिन कार्ड उनके घर के दरवाजे पर ही सौंप देकर वापस चले गये। मगर यह जवाब समझ में नहीं आता है, खास तौर पर तब जबकि नये साल को पूरा एक पखवाड़ा बीत चुका हो।

लेकिन अब एक ओर जोसेफ कुरियन यह बयान दे रहे हैं कि अब कोई संकट नहीं है, वहीं दूसरी ओर मुल्‍क के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बयान दिया कि सभी जजों के साथ मिलकर इस मामले को सुलझा लेंगे। एक खबर यह भी आ रही है कि जस्टिस चेलमेश्वर और सीजेआई की शनिवार को मुलाकात न होने पाने के चलते पूरा विवाद लम्‍बा खिंच सकता है। फिर सवाल यह है कि जब कुरियन जोसेफ को यह मामला इतना छोटा दिख रहा था, तो उस पर वे खुलेआम प्रेस कांफ्रेंस करने क्‍यों पहुंच गये। क्‍या वजह है कि अचानक आज इतने शांत क्‍यों हो गये। क्‍यों वेगुगोपाल इस मामले को एक विवाद के तौर पर देख रहे हैं। क्‍यों नृपेंद्र मिश्र जैसा एक कद्दावर नौकरशाह जो सीधे प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव हो, वह सर्वोच्‍च न्‍यायालय के घर क्‍यों पहुंच गया है। वे भी बेवक्‍त।

जरा गौर कीजिए कि कुरियन जोसेफ के उस बयान पर जिसमें उन्‍होंने कहा है कि ‘‘मामले को हल करने के लिए बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि यह मामला संस्था के भीतर हुआ है। इसे हल करने के लिए संस्था की ओर से जरूरी कदम उठाए जाएंगे।’’ उन्होंने कहा कि प्रधान न्यायाधीश की तरफ से कोई संवैधानिक खामी नहीं है, लेकिन उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए परंपरा, चलन और प्रक्रिया का अनुसरण किया जाना चाहिए। जबकि यही जस्टिस कई मामलों के ‘‘चुनिंदा’’ तरीके से आवंटन और कुछ न्यायिक आदेशों के विरुद्ध देश के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ बाकायदा बगावत पर आमादा दिखे थे।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

‘‘हम सिर्फ मामले को उनके संज्ञान में लाए हैं.’’, ‘‘न्याय और न्यायपालिका के पक्ष में खड़े हुए. यही चीज कल वहां (नयी दिल्ली में) हमने कही.’’, ‘‘एक मुद्दे की ओर ध्यान गया है. ध्यान में आने पर निश्चित तौर पर यह मुद्दा सुलझ जाएगा.’’, ‘‘न्यायाधीशों ने न्यायपालिका में लोगों का भरोसा जीतने के लिए यह किया.’’, ‘‘शीर्ष अदालत में हालात सही नहीं हैं’, ‘‘अपेक्षा से कहीं कम’, ‘‘... कभी उच्चतम न्यायालय का प्रशासन सही नहीं होता है और पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई चीजें हुई हैं जो अपेक्षा से कहीं कम थीं.’’,‘‘चयनात्मक’’, ‘‘कोई संकट नहीं है.’’ वगैरह-वगैरह बातें इस पूरे मामले पर सही रौशनी डाल पाने में सक्षम नहीं दीखती हैं।

अब हम आपसे केवल एक सवाल पर आपका जवाब जानना चाहते हैं योर ऑनर। हमारा यह सवाल देश की जनता की ओर से आपसे है। सवाल यह है कि जब सब इतना ही सहज, सरल, साध्‍य, शांत, हल्‍का-फुल्‍का और सुपाच्‍य प्रकरण था यह, तो फिर आपको मीडिया के पास पहुंच कर हाथ जोड़ने की जरूरत क्‍या पड़ी। क्‍यों आप जनता के पास पहुंचे, आप आखिर क्‍या चाहते थे हम से, मीडिया से और खास बात तो यह कि देश की जनता के साथ ही साथ पूरे मुल्‍क से।

योर ऑनर। हम जानते हैं कि आप हमारे इस सवाल का जवाब शायद कभी भी नहीं दे पायेंगे। लेकिन हम इतना तो सोच ही सकते हैं आपके व्‍यवहार से, कि मामला इतना हल्‍का-फुल्‍का नहीं है यह, और यह भी कि आपने हम मीडिया का इस्‍तेमाल किया है। आप हमें हमारे सवालों का जवाब भले न दें, लेकिन इतना यकीन रखिये योर ऑनर, कि पूरा देश कम से कम इतना तो समझ ही रहा है कि इस हांडी में क्‍या-क्‍या पक रहा है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में जो कुछ भी हुआ, वह वाकई बेहद निराशाजनक साबित हुआ है। हमारा प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम इस मसले पर लगातार निगाह रखे है। हम इस मामले पर आपको ताजा विचार और समाचार उपलब्‍ध कराते रहेंगे। इस मसले की दीगर खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक करें:-

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायिक-नौटंकी


निर्लज्‍ज बहुरियों दूर रहो। मुझे आज सज्‍जनों से दक्षिणा मांगनी है

: खिचड़ी यानी मकर-संक्रांति को मैं बहुत व्यस्त रहूँगा : ओमप्रकाश राजभर, रविदास मेहरोत्रा, नवनीत सिकेरा, राकेश शंकर, गोरखपुर मेडिकल के प्रचार्य। अरे कहीं कोई कमी नहीं है यूपी में निर्लज्‍ज लोगों की : ढेर-सारे काम करने हैं ना, इसीलिए :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मकर संक्रांति। भइया, मुझे आज-कल बहुत काम करने हैं। इस दिन लोगों से दान लेना है। दक्षिणा की रकम गिनना, सलीके से सहेजना, सुरक्षित रखना, मिक्स्ड खिचड़ी को बटोरना, नमक के ढेले, तिल और रामदाना के लड्डुओं को यथास्थान रखना ही एक काम होता तो भी गनीमत होती। भिन्न-भिन्न स्त्री-पुरुषों को यथोचित आशीर्वाद देना सहज नहीं होता है। कायर और वीर्यहीन पुरुषों को बहादुरी सिखाने का आशीर्वाद देना पड़ता है। कहना पड़ता है कि जाओ, तुम्हारे नाती-पोते खुश रहें। नाक-कटी और निर्लज्ज को सुशील बहुरिया और गृह-लक्ष्मी करार देना पड़ता है।

नकटे या निर्लज्‍ज बहुरिया। तुम नकटी निर्लज्‍ज बहुरिया नहीं जानते हो। अरे वही जैसे विकलांग विकास मंत्री ओमप्रकाश राजभर जैसे मंत्री, जिन पर उनके विभाग और विश्‍वविद्यालय में चर्चाएं चल रही हैं कि वहां बीसियों करोड़ की उगाही के लिए भर्तियों का धंधा बुना जा रहा है। जैसे उन्‍होंने गाजीपुर के डीएम पर गोबर के छोत-पर-छोत फेंके थे और अपने चेहरे की कालिख को लखनऊ की पुलिस के चेहरे पर कालिख पोतना शुरू किया था। इस मंत्री ने डीएम पर यह कुत्सित अभियान इस लिए छेड़ा, क्‍योंकि उसने राजभर की पार्टी के नेता द्वारा किये गये सार्वजनिक अतिक्रमण के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था।

जैसे नवनीत सिकेरा जैसे पुलिस महानिरीक्षक लोग, जो चिल्‍ल-पों तो खूब करते हैं, लेकिन कामधाम धेला भर नहीं। लाखों शिकायतों की बात तो करते हैं, लेकिन एक भी महिला का सम्‍मान नहीं बचा सकते। जैसे राकेश शंकर जैसे बड़े दारोगा टाइप पुलिसवाले, जो धेला भर काम नहीं करते, बल्कि साजिशों की दूकान सजाये बैठे रहते हैं। कुछ नहीं मिला तो पत्रकारों की खोपड़ी तोड़ दी। अरे जैसे बीआरडी मेडिकल कालेज के डॉक्‍टर, जिनके चलते दर्जनों नन्‍हें-मुन्‍ने बच्‍चे बेमौत मारे गये थे। जैसे पूर्व मंत्री रविदास मेहरोत्रा जैसे सपाई जो अभी तीस लाख रूपयों की पुरानी करेंसी के मामले में दबोचे गये। न जाने क्‍या खेल था रविदास का, और क्‍या करते वह पुरानी करेंसी का, आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। हां, अब वे आयकर विभाग में चक्‍कर काटते दीख रहे हैं।

अरे क्या किया जाए। जो जैसा है, वो वैसा नहीं दिखना चाहता है और जो जैसा नहीं होता है वैसा ही बनना चाहता है। धर्मनिरपेक्ष लोगों को धर्म-व्याख्या की घुट्टी सीखना है। पापी को निष्पाप दिखना है। लुच्चे को चाहिए कि वो धवल चरित्र दिखे। बेईमान चाहता है कि समाज में वो ईमानदारी का झंडाबरदारी करता दिखे। कमीने को नेकनीयती सिखाना पड़ता है। जातिवादी लोग चाहते हैं कि मैं उन्हें खुद को जाति से ऊपर उठने का पाखण्ड सिखाऊं। जनता की रैली में झूठे सपने दिखाएं बसपाई-सपाई, और शंख बजाऊं मैं।

और यह सारा जिम्मा लोग-बाग़ मुझ एक अकेला गरीब ब्राह्मण से ही अपेक्षा रखते हैं।

खुद तो सालोंसाल मुझ पर अपना बलगम थूकते-गरियाते रहते हो। कभी मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज कराते हो, कभी प्रलाप करते हो। कभी गालियां, तो कभी निंदा। लेकिन जब तुम्‍हारी चिरी-फटी की जयजयकार होने लगती है, तो तुम मेरे पास पूंछ पेट में दबोचे भाग कर पहुंच जाते हो। आवाज कूं-कूं की सी। तो, सच बात तो यही है कि ऐसी बदहाली से लाख बेहतर है कि मैं अपना भिक्षा-पात्र खींच कर तुम्हारे चेहरे पर दे मारूं।

तो अब तुम भाड़ में जाओ। मैं हमेशा की ही तरह अपने दोस्तों के साथ फेसबुक वाल वाली मुंडेर पर ही गुटर-गूं करता रहूँगा।

कैसा आइडिया है दोस्तों ?

अगर यह तरीका तुम्‍हें पसंद आया हो तो, तो कम से कम इस एक दिन तो मेरे रीते-रिक्‍त भिक्षा-पात्र में दान-दक्षिणा डाल दो।

ये दोनों तोते इसको मीलॉर्ड मीलॉर्ड कहते रहते हैं

: वायरल हो चुका है वकील-दूकानदार के बीच न्‍यायिक खुलासे से जुड़ा यह हास्‍य-प्रहसन : पक्षी-मंडी में जब एक अधिवक्‍ता साहब वहां एक तोता खरीदने गये थे : एक सीआरपीसी का एक्‍सपर्ट, दूसरा मास्‍टर है, जबकि तीसरा सिर्फ टांय-टांय चिल्‍लाते रहता है :

वाट्सऐप विश्‍वविद्यालय संवाददाता

नई दिल्‍ली : एक वकील साहब तोता खरीदने तोते वाली दुकान पर गए।

वकील साहब: कोई कानूनी खासियत वाले तोते होगें तुम्हारे पास?

तोते वाला: हाँ साहब हैं।

और तोते वाले ने तीन पिंजरे वकील साहब के सामने पेश कर दिये,

पहले वाले पिंजरे में एक मोटा तगडा तोता था,

दूसरे वाले पिंजरे में एक दुबला पतला तोता था,

और तीसरे पिंजरे में एक मरियल सा तोता था।

वकील साहब: ये मोटा वाला तोता कितने का है?

तोते वाला: साहब यह 10000 का है।

वकील साहब: इतना महंगा! ऐसी क्या खासियत है इसमें?

तोते वाला: साहब यह Cr.P.C का Expert है।

वकील साहब: ये दुबला वाला तोता कितने का है?

तोते वाला: साहब यह 20000 का है।

वकील साहब: इसकी क्या खासियत है?

तोते वाला: साहब यह Cr.P.C.का Master है।

वकील साहब: ये मरियल वाला तोता कितने का है?

तोते वाला: साहब यह 50000 का है।

वकील साहब: इसकी क्या खासियत है?

तोते वाला: साहब खासियत तो इस साले में कुछ नहीं है बस पता नहीं क्यों ये दोनों तोते इसको मियालॉर्ड... मियालॉर्ड कहते रहते है।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में जो कुछ भी हुआ, वह वाकई बेहद निराशाजनक साबित हुआ है। हमारा प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम इस मसले पर लगातार निगाह रखे है। हम इस मामले पर आपको ताजा विचार और समाचार उपलब्‍ध कराते रहेंगे। इस मसले की दीगर खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक करें:-

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायिक-नौटंकी

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