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मेरा कोना

ठाकुर साहब पों-पों: हर घर में लहलहाता है 52 एकड़ पुदीना

: ज्‍यादातर के पास 52 एकड़ पुदीना की खेती : प्रतापगढ़ समेत पूरे अवध क्षेत्र तो है ठाकुरों और राजाओं की थोक मंडी : रायबरेली, अमेठी, सुल्‍तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर में ऐसे राजाओं की मारामारी मची रहती है : पुरखों पर डींगें बेहिसाब और बात-बात पर, लेकिन खुद पर पूछिये तो बगलें झांकना शुरू कर देंगे : ठाकुर साहब पों-पों - चार :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हमारे एक घनिष्‍ठ मित्र हैं पद्यनाभ पाण्‍डेय। दिल से भी और दिमाग से भी विद्वान। व्‍यवहार में भी, और तर्क में भी सहज। नाबार्ड में बड़े अफसर हैं, और फिलहाल रांची में झारखण्‍ड मुख्‍यालय में हैं। क्‍या पता, रिटायर भी हो चुके हैं, तो कोई अचरज की बात नहीं। उनका रांची वाला मोबाइल फोन नम्‍बर किसी दूसरे को अलाट हो चुका है। बहरहाल,

करीब 15 बरस पहले उन्‍होंने एक लम्‍बी बाचतीत के दौरान मुझे कई रोचक घटनाएं बतायीं, जो उनके निजी जीवन में हो चुकी थीं। सब की सब घटनाएं एक से बढ़ कर एक। लाजवाब, रोचक और प्रेरणास्‍पद भी। लेकिन जिक्र मैं करने जा रहा हूं, वह घटना प्रतापगढ़ की है, जब उनकी पोस्टिंग हुआ करती थी, या कुछ ऐसा ही कुछ और हुआ था। खैर, तो जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूं, वह कोई अनोखी नहीं है। बल्कि हमारे आसपास ऐसी ही तमाम घटनाएं पसरी ही पड़ी हैं, और खूब हैं। और खास तौर पर अवध क्षेत्र में ऐसी कहानियां खूब पसरी-पछोरी पड़ी हैं। अवध क्षेत्र, यानी जिसमें बहराइच से लेकर जौनपुर और बाराबंकी, गोंडा, श्रावस्‍ती, फैजाबाद, सुल्‍तानपुर, अम्‍बेदकरनगर, अमेठी, रायबरेली, प्रतापगढ़ जैसे इलाके भी शामिल हैं। हां, यह दीगर बात है कि चार जिलों की एक पट्टी खास तौर पर महत्‍वपूर्ण है, जिसमें रायबरेली, अमेठी, सुल्‍तानपुर, प्रतापगढ़ और जौनपुर जिला शामिल है।

अब यह कहने की जरूरत नहीं कि प्रतापगढ़ समेत पूरे अवध क्षेत्र ठाकुरों और राजाओं की मंडी माना जाता है। छोटा-मोटा जमींदार या हैसियतदार ठाकुर को यहां राजा साहब कहा जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे राजस्‍थान में ठाकुरों-राजपूतों के बन्‍ना पुकारा जाता है। अब हमारे आसपास मंडराने वालों में से अधिकांश की आर्थिक-स्‍वार्थ, सामाजिक दशा-दुदर्शा, और परम्‍परागत सोच ऐसी ही है कि वे अमीर व समर्थवानों की चमचागिरी में अतिरंजना में गहरे उतर जाते हैं। ज्‍यादा तेल लगाने वालों में अव्‍वल आने की रेस-दौड़ में यह लोग ऐसे ठाकुरों को महराज या सम्राट तक कह अपना सम्‍मान थमा देते हैं।

जाहिर है कि वहां थोक भाव में राजे-रजवाड़े मौजूद हैं, थे और रहेंगे भी। मूंछ ताने रहते हैं, चाहे जमीन कब्‍जाने का मामला हो, या फिर तालाब का। बकैती तो प्रतापगढ़ का पुख्‍ता मायका माना जाता है। राज-पाट तो दक्क्षिण दिशा में प्रस्‍थान हो गया, लेकिन गाथाएं उनकी जुबानों में दर्ज हैं, जो अक्‍सर थूक से दूसरे के सीने या चेहरे पर पड़ ही जाती है, बशर्ते आप सतर्क न हों।

ऐसे राजा-महाराजा, सम्राटों के वंशजों से आप कहीं भी मिल सकते हैं। क्‍या देसी का ठेका या फिर सफारी-स्‍कॉर्पियो। बम्‍बई में उनका अक्‍सर आना-जाना रहता ही है। उनसे बातचीत कीजिए, तो वे यह कभी भी नहीं बतायेंगे कि वे खुद क्‍या करते हैं। हां, डींगें खूब हांकेंगे कि उनके दादा-परदादा की तूती बजती थी एक वक्‍त हुआ करता था। बहरहाल, ऐसे लोगों में ज्‍यादातर के पास 52 एकड़ की खेती सिर्फ पुदीना की होती है। जमीन का इंतखाब कहां दाखिल-खारिज हुआ, यह पूछते ही वे बगलें झांकना शुरू कर देंगे। वैसे अधिकांश ऐसे लोगों ने ने अपनी जमीन अपने शौक में बेच डाली, और उनके बच्‍चे दर-दर भटक रहे हैं। जबकि जो समझदार निकले, वे अपने शौक के साथ अपनी पुश्‍तैनी मकानों पर स्‍कूल-कॉलेज खोले नोट छाप रहे हैं।

खैर, ऊसर और आंवला भी वहां बहुतायत में मिलता है।

तो इस कहानी के अगले मोड़ तक आपको पहुंचाने के इस रास्‍ते में चलते-चलते हम आपको बता दें कि इन जिलों में पीसीएस परम्‍परा बेहिसाब, बेशुमार और परम्‍परागत व्‍यवहार में शामिल हो चुकी है। लेकिन यहां के लोगों में इस परम्‍परा पर न तो कोई गर्व है, और न कोई क्षोभ।

न शिकवा, न गिला।

न तो यहां के लोग इसकी वजह खोजने की जरूरत समझते हैं, और न ही इसके निदान की कोई जरूरत महसूस होती है इन लोगों को। ( क्रमश:)

यह सिर्फ एक कहानी भर ही नहीं, बल्कि हमारे समाज के सर्वाधिक प्रभावशाली समुदाय की असलियत भी है, जिसका नाम है क्षत्रिय। वंस अपॉन अ टाइम, जब देश को क्षत्र देने का जिम्‍मा इन्‍हीं ठाकुरों पर था। इस लेख या कहानी-श्रंखला में हम आपको इस समुदाय की वर्तमान परिस्थितियों का रेखांकन पेश करने की कोशिश करेंगे। दरअसल, बाबू-साहब समाज में आये बदलावों पर यह श्रंखलाबद्ध कहानी को उकेरने की कोशिश की है प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने। आप में से जो भी व्‍यक्ति इस कहानी को तार्किक मोड़ दे कर उसे विस्‍तार देना चाहें, तो हम आपका स्‍वागत करेंगे। आइये, जुड़ जाइये हमारी इस लेख-श्रंखला के सहयोगी लेखक के सहयोगी के तौर पर।

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ठाकुर साहब पों-पों

यौन-शिक्षा: खुलेआम अश्‍लीलता, जिम्‍मेदार आप

: सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए : बढ़ती उम्र के साथ बढ़ने लगती है टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी : किशोर बच्‍चे हर प्रकार का अनुभव करना चाहते हैं इस उम्र में बच्चे : सेक्‍स-एजूकेशन - पांच :

मोनिका जौहरी

लखनऊ : अपनी सेक्स जिज्ञासा को शांत करने के लिए टीनएजर्स बेझिझक यौन संबंध बना रहे हैं, जिससे न स़िर्फ उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि करियर भी प्रभावित होता है. “सेक्स को टैबू की बजाय नैचुरल चीज़ की तरह पेश करके, सहजता से बात करके, रियल-अनरियल सेक्स यानी नैचुरल सेक्स और पोर्नोग्राफ़ी का फ़र्क समझाकर बच्चों को अपराध की राह पर चलने से रोका जा सकता है.”

सेक्स और नशे की लत में बच्चे :- Teenage की उम्र में हर तरह का Experiment करना चाहते हैं। सेक्स से ले कर नशा तक - वो हर प्रकार का अनुभव करना चाहते हैं इस उम्र में बच्चे बहुत तेज़ी से आकर्षित होते हैं हर प्रकार की चीज़ से।

मीडिया एक्सपोज़र से बहकते क़दम :- “टीवी सीरियल, फ़िल्में, मैगज़ीन, फैशन शो आदि में जिस तरह खुलेआम अश्‍लीलता परोसी जा रही है, बच्चों का उनसे प्रभावित होना लाज़मी है. इन सब माध्यमों की वजह से वे उम्र से पहले ही बहुत कुछ जान लेते हैं और परदे पर दिखाई गई चीज़ों को असल ज़िंदगी में करने की कोशिश में ग़लत राह पर चल पड़ते हैं. इसके लिए बहुत हद तक पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, उनके द्वारा इस मुद्दे पर बात न किए जाने के कारण बच्चे उत्सुकतावश या उतावलेपन में सेक्स अपराधों में लिप्त हो जाते हैं.”

समय की मांग है सही सेक्स एज्युकेशन :- दिनोंदिन सेक्स संबंधी अपराधों में बच्चों, ख़ासकर टीनएजर्स की बढ़ती भागीदारी न स़िर्फ पैरेंट्स, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स एज्युकेशन के ज़रिए ही बच्चों को सही-ग़लत का फ़र्क समझाया जा सकता है. “आज के दौर में जहां एक्सपोज़र और ऑपोज़िट सेक्स के साथ इंटरेक्शन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ऐसे में टीनएजर्स को सेक्स के बारे में सही जानकारी होनी ज़रूरी है. बढ़ती उम्र के साथ टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी बढ़ने लगती है, लेकिन उन्हें इस पर क़ाबू रखना नहीं आता, जो सेक्स एज्युकेशन से ही संभव है. सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए.” (क्रमश:)

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मोनिका जौहरी

जागरण-पुराण: हम नौकरों को झाड़ पर चढ़ाया अखबार-मालिक ने

: 25 हजार प्रतियां बिकीं, तो शानदार पार्टी दूंगा। बोले महेंद्र मोहन : चाय-समोसा खिला कर अपनी छाती फुला डाली मालिकों ने : अपने माथे पर आए बालों को अपनी उंगलियों में लपेटते रहे शेखर त्रिपाठी, और चंद दिनों में ही सर्कुलेशन एक लाख के पार हो गया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह शायद सन-88 की बात थी। शाम का वक्त था। तब लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली ठीक सामने वाली सड़क, जहां भार्गव स्टेट हुआ करता था, वहां के 75 नंबर के बड़े मकान में दैनिक जागरण का कार्यालय और प्रेस हुआ करता था। पहली मंजिल पर संपादकीय विभाग के लोग बैठते थे, जबकि नीचे भूतल में प्रेस और विज्ञापन वगैरह। सीढि़यों के नीचे के केबिन में एक बुढ़ऊ कैशियर थे, जो हमारे वेतन से दो-तीन रूपया झटक लिया करते थे। अंदाज ऐसा, मानो वे भूल गये हों। रेजगारी तो वे ले लेते थे, लेकिन अदा करते वक्‍त चिल्‍हर की समस्‍या बता कर अठन्‍नी-चवन्‍नी मार लिया करते थे यह कैशियर बुढ़ऊ। यह उस वक्‍त का वाकया है, जब वेतन नकद ही मिला करता था। और स्‍थानीय सम्‍पादक के तेवर से ही दफ्तर का सामान्‍य कारोबार समझा-जाना जाता था। सर्कुलेशन के मैनेजर दिनेश पांडेय तो दफ्तर आने से पहले चपरासी से यह पूछताछ कर लेते थे कि :- भइया ( सम्‍पादक विनोद शुक्‍ला) का मूड कैसा है।

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पत्रकार पत्रकारिता

बहरहाल, एक दिन महेंद्र मोहन हमारे ऑफिस पहुंचे। महेंद्र मोहन यानी दैनिक जागरण के मालिकों यानी मोहन-ब्रदर्स में दूसरे नम्‍बर के भाई। तब नरेंद्र मोहन जीवित थे। जाहिर है कि हम सब सतर्क हो गए। महेंद्र मोहन ने उसी शाम हॉल में एक बैठक ली जिसमें संपादकीय सहयोगी को शामिल किया गया था बैठक में स्थानीय संपादक विनोद शुक्ला थे, शेखर त्रिपाठी थे, विष्‍णु त्रिपाठी थे, डॉक्‍टर उपेंद्र पाण्‍डेय थे, ब्रजेश शुक्‍ला थे, सुदेश गौड़ थे, स्वदेश कुमार थे, वीरेंद्र सक्सेना थे, और मैं कुमार सौवीर भी। सुदेश गौड़ इस वक्‍त भोपाल में दैनिक भास्‍कर के स्‍थानीय सम्‍पादक हैं, विष्‍णु त्रिपाठी दैनिक जागरण में एनसीआर संस्‍करण के स्‍थानीय सम्‍पादक हैं, डॉ उपेंद्र पाण्‍डेय दैनिक ट्रिब्‍यून में नेशनल ब्‍यूरो हेड हैं, जबकि स्‍वदेश कुमार उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त हैं। इसके अलावा भी कई और भी सहयोगी वहां मौजूद थे। और हां, राजू मिश्र भी थे उस वक्‍त वहां।

इस लेख के नीचे की फोटो उसी दौर की है। यानी करीब 30-31 बरस पहले की, जब हम तीनों जागरण में काम करते थे। तीन यानी, एक तो मैं, बीच में शेखर त्रिपाठी और तीसरे हैं सुदेश गौड़, जो इस वक्‍त भोपाल में दैनिक भास्‍कर के स्‍थानीय सम्‍पादक हैं। सच बात तो यह है आज में जो भी जोश मौजूद है, वह इन और उन जैसे साथियों के साथ होने की वजह से ही है। इस फोटो के लिए आजीवन सुदेश गौड़ का आभारी रहूंगा।

बहरहाल, इस बातचीत के दौरान संपादकीय सहयोगियों के क्रियाकलाप और उनके कार्य-योगदान पर महेंद्र मोहन ने चर्चा छेड़ दी। समीक्षा के दौरान महेंद्र मोहन हम सब की कोशिशों पर मोहित हो गए थे। उत्साह में, उत्तेजना में, हर्ष में या फिर अपने संस्‍थान के सुखद भविष्य की कल्पनाओं में डूबे महेंद्र मोहन ने न सिर्फ दो बार सभी को चाय पिलाई, बल्कि एक बार समोसा और दूसरी बार एक बेसन के लड्डू के साथ चाय की चुस्कियां भी करायीं।

हिन्‍दी पत्रकारिता-जगत में एक अप्रतिम और विशालकाय ग्रह थे शशांक शेखर त्रिपाठी। उनसे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

शशांक शेखर त्रिपाठी

अपनी शैली के अनुसार विनोद शुक्ला महेंद्र मोहन के हर सवाल और सुझाव पर शेखर त्रिपाठी की ओर मुंह ताकने लगते थे। बीच में महेंद्र मोहन ने एक बार एक लंबी सांस खींची और बोले यह बड़े हर्ष की बात है कि यह हमारा अखबार आज 17000 प्रतियों तक पहुंच गया है। यह सर्कुलेशन कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, बल्कि आप सब की मेहनत की प्रतीक है। हम आप सब के हौसले और आपकी मेहनत को सलाम करते हैं। लेकिन हम यह भी उम्मीद करते हैं यानी कुछ वर्षों में कि हमारा यह अखबार लगातार बढ़ता ही रहेगा।

दैनिक ट्रिब्‍यून में आज नेशनल ब्‍यूरो हेड डॉक्‍टर उपेंद्र पाण्‍डेय को याद है कि तब शेखर त्रिपाठी ने महेंद्र मोहन की बात पर उचक कर जवाब दिया:-हो जाएगा सर, हो जाएगा।

महेंद्र मोहन को शायद इसी जवाब का इंतजार था। उन्‍होंने चुनौती-सी देते हुए कहा:- जिस दिन यह सर्कुलेशन 25,000 हजार तक पहुंच जाएगा, मैं तुम्‍हें एक आलीशान पार्टी दूंगा।

बाद में अपने अंदाज के तहत मीटिंग के बाद विनोद शुक्ला ने शेखर त्रिपाठी की खिल्ली उड़ाते हुए कहा:- बहुत बोलते हो शेखर तुम।

लेकिन शेखर त्रिपाठी अपने बाएं हाथ से अपने माथे पर आए बालों को अपनी उंगलियों में लपेटते रहे। मुस्‍कुराते रहे।

और कहने की जरूरत नहीं कि चंद हफ्तों में ही दैनिक जागरण लखनऊ संस्करण में प्रकाशित होने वाली प्रति यू की संख्या 40 हजार तक पहुंच गई। और सन 89 की पहली जनवरी तक एक लाख प्रतियां बिकने लगीं। (क्रमश:)

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जागरण-पुराण


वैचारिक बेईमानी: डीजीपी को बेटन थमा गए सुलखान

: उस दौर में जब पुलिस का दायित्व लोकसेवा होता है, पुलिस को डंडा देने का क्या अर्थ था : अपने रिटायरमेंट के अंतिम दिन अपने वंशजों को लाठी थमा कर क्‍या संदेश देना चाहते हैं सुलखान सिंह : बेटन का अर्थ केवल हमला ही होता है, यानी आक्रमण। आप क्‍या चाहते हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बेईमानी दरअसल एक बहु-आयामों वाला शब्‍द है। इसमें ढेर सारे अर्थ-अनर्थ सन्निहित होते हैं। इन आयामों में सबसे निकृष्ट बेईमानी होती है चारित्रिक। और उसके बाद आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक वगैरह-वगैरह। इसी क्रम में एक बड़ी बेईमानी होती है, जिसे वैचारिक बेईमानी कहा जाता है। हालांकि बेईमानियों की मूल जननी होती है वैचारिक बेईमानी, लेकिन ताजा हालातों में अब इसे बहुत हल्का माना जाने लगा है। घर में नन्‍हें-मुन्‍ने जब कालांतर में बड़े होकर जब बलशाली हो जाते हैं, तब मां यानी जननी को कौन पूछता है, ठीक इसी शैली में दीगर बेईमानियों में सबसे कमजोर जननी, यानी निर्बल की जोरू की हालत हो चुकी है वैचारिक बेईमानी की। बावजूद इसके कि वैचारिक स्तर पर ही सारी बीमारियों की गंगोत्री निकलती है।

बहरहाल, सुलखान सिंह पर कभी कोई भी आर्थिक, चारित्रिक आरोप नहीं लगा है, लेकिन अपनी वैचारिक बेईमानी को लेकर सुलखान सिंह अपनी नौकरी के आखिरी क्षणों में बेहद चर्चा में आ चुके हैं। उनकी वैचारिक बेईमानी की ताजा आखरी नजीर साबित हुआ है एक डण्‍डा, जिसका नाम है बेटन। सुल्तान सिंह ने एक नई परंपरा के तौर पर बेटन के बारे में सोचा, आकार दिया, गढ़ा और अंतत: अपने रिटायरमेंट के आखिरी दिन उसे लागू भी कर लिया। उन्होंने एक डंडे को बेटन का नाम दिया, और अपने वंशजों को थमा दे दिया, कि जा बेटा। अब मौज कर। डंडा अब तेरे हाथ में है। जो चाहे कर ले, तेरा अब कोई नहीं उखाड़ पायेगा।

हैरत की बात है कि यह काम वह उस शख्‍स ने किया, जिसे पुलिस महकमे के अपनी सबसे मजबूत कुर्सी दी थी।

सुलखान सिंह ने भले ही अपने इस आखिरी सेवाकाल में इस बेटन को अपने सेवाकाल को भविष्‍य में अपनी याद बनाये रखने, और अपनी यादगार के तौर पर उसे पुलिस की कार्यशैली में शामिल किये जाने की मंशा के तहत किया हो, लेकिन वह यह साबित नहीं कर पाए कि आखिरकार वे अपने वंशजों को इस बेटन सौंपने के तहत क्या संदेश देना चाहते थे। क्‍यों सुलखान ने अपने विशालकाय पुलिस महकमे को थमाने की कोशिश के तहत यह बेटन आने वाले डीजीपी को सौंपी और उसे परम्‍परा में शामिल कर लिया। अगर सुलखान इस बेटन के तहत यह डंडा एक प्रतीक-अस्‍त्र के तौर पर लोक-प्रशासन, विभागीय अनुशासन और अपने विभाग की छवि को और तराशने की कोशिश करना चाहते थे, तो आई ऐम सॉरी टू से मिस्‍टर सुलखान सिंह, इस मामले में भी आप पूरी तरह असफल रहे हैं।

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आखिर बेटन है क्‍या? इसकी जरूरत क्या है? इसका अर्थ क्या है? इसकी उपयोगिता क्या है? इसकी उपादेयता क्या है? उसकी क्रियाशीलता क्या है? क्या यह बेटन आम आदमी के साथ ठीक उसी तरह डील करने की कोशिश है जिस तरह ढोर-डांगर चलाएं-चराये जाते हैं? यह या ऐसे ही तमाम सवाल किसी भी सहज बुद्धि वाले व्यक्ति को मथ सकता है। लेकिन इसके पहले हमें इस बेटन के वास्‍तविक अर्थ को समझना पड़ेगा।

बेटन एक अस्त्र है। आप उसे शब्दकोश यानी डिक्शनरी में खोजना चाहेंगे तो इसके दो उपयोग दिखाई पड़ते हैं। पहला तो कानूनी अर्थ है जिसका प्रयोग शब्द है सेल्फ डिफेंस। और दूसरा है सामाजिक अर्थ है जिसका अर्थ है आक्रमण। दर्शन और उपयोग के स्‍तर पर दोनों ही शब्‍द-संयोजन एक ही दिशा के अलग-अलग गर्म-हवा वाली तरंगों-लहरों के अर्थ हैं। आप कह सकते हैं कि यह दोनों ही क्रियाशील समानार्थी शब्‍द हैं। पर्यायवाची के स्तर तक सगोत्रीय शब्द। यह दोनों दोनों का ही अर्थ सुरक्षा होता है और आक्रमण के ही आसपास।

ऐसे वक्त में जब पुलिस के पास अपराधियों से निपटने के लिए अत्याधुनिक सुख-साधन और उपकरण मौजूद हैं, बेटन की जरुरत क्या थी। उसकी उत्पत्ति के लिए सुलखान सिंह को क्‍यों मथ रही थी। क्यों उसकी जरूरत पड़ी। क्यों एक पुलिस वाले विशाल संगठन के मुखिया को एक डंडे की आवश्यकता पड़ी।

समझने की कोशिश कीजिए जनाब। अर्थ समझ में आ जाएगा। सच बात तो यह है कि सुलखान सिंह ने यह फैसला बहुत सोच-समझकर नहीं लिया होगा। दरअसल पुलिस का यह मुखिया अपने वंशजों और अनुयाइयों को यह समझाना चाहते होगे कि जनता के हाथ-पांव को लाठियों से तोड़-कूट कर अमझोरा बना दो। जनता का जूस निकाल दो, उसे भय से इतना अपंग कर डालो, ताकि उसके पास सोचने-करने की हिम्‍मत नहीं पड़े। इससे फायदा यह भी होगा कि यह हमला किस तरफ से चला, पता नहीं चलेगा और कानूनी शिकंजे बहुत ढीले हो जाएंगे। वगैरह-वगैरह।

जिन्‍दगी भर एक ढर्रे की पुलिसगिरी करने वाला शख्‍स इससे अलग कुछ सोच भी तो नहीं सकता था। (क्रमश:)

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