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मेरा कोना

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

: किसी फूहड़ नौटंकी में तब्‍दील होती जा रहा है देश की सुप्रीमकोर्ट का प्रहसन : बताइये कि कलिखो पुल, लोया और कर्णन प्रकरण की असलियत क्‍या थी : हम तो आपसे जवाब चाहते हैं, कुछ दिनों में हुई कतिपय न्‍यायिक घटनाओं पर स्‍पष्‍टीकरण दीजिए :

कुमार सौवीर

लखनऊ : अभी चौबीस घण्‍टा पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के एक मुखर अधिवक्‍ता और अवध बार एसोसियेशन के पूर्व महामंत्री आरडी शाही ने एक बयान दिया था। जरा उस पर ठीक से बांच लीजिए तो बात आगे बढ़ायी जाए। शाही ने लिखा कि:- जो लोग गाँव से हैं और 80 के दशक मे बालिग हो चुके थे, उन्होने फूहड़ नौटंकी ज़रूर देखी होगी। उसमे एक ही कलाकर एक बार मुकुट पहन कर राजा का रोल करता था और आवश्यकता पड़ने पर पायजामा पहन कर राजा का वजीर य़ा कोई कारिन्दा भी बन जाता था। चूंकि वो अलग-अलग role मे stage पर अलग-अलग समय आता था, इसलिये ये संभव था। परंतु सभी को यह समझ लेना चाहिए कि न्यायिक कार्य कोई फूहड़ नौटंकी नहीं है।

हालांकि आरडी शाही की यह टिप्‍पणी किसी दीगर मसले पर थी। लेकिन आज सर्वोच्‍च न्‍यायालय परिसर में जो कुछ भी हुआ, वह शायद ऐसे ही किरदारों द्वारा निभाई गयी भूमिकाओं के चलते बेहद फूहड़ नौटंकी सरीखा ही बन कर रह गया। बावजूद इसके इस घटना के खासे दूरगामी परिणाम निकलेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि यह घटना बेहद संवेदनशील है। इसे पिछले 70 बरस में बसी, दबी, कुचली और एक निहायत अराजक न्‍यायिक प्रणाली के तौर पर पहचाना जा सकता है, जो अपने भी तरत एक बड़े ज्‍वालामुखी की तरह सुलगती-पकती रही है। और जब पानी सिर से ऊपर होने लगा, तो चार बड़े जज बगावत पर आमादा हो गये।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

खैर, अब चूंकि इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के यह चार जज आदमी के सामने आये हैं, बाकायदा एक प्रेस-कांफ्रेंस आयोजित की है। पूरी बातचीत के दौरान एक निरीह और प्रताडि़त व्‍यक्ति की तरह अपना हाथ लगातार जोड़े ही रहे हैं। इसलिए हम चंद सवाल इन अथवा उन जजों से पूछना चाहते हैं। इसलिए नहीं कि हम न्‍यायपालिका की बारीकियों को खूब जानते-समझते हैं और ऐसी न्‍यायिक उलझते सवालों का समाधान खोजने में माहिर हैं। बल्कि हम तो देश के एक सजग नागरिक की तरह पिछले दिनों हुई कतिपय न्‍यायिक घटनाओं पर आपसे स्‍पष्‍टीकरण चाहते हैा। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे बयान ही हमारे जेहन में खौलते सवालों को साफ कर न्‍याय पालिका को मजबूत कर सकते हैं।

मी लॉर्ड। जब आपके अधिकार, सम्‍मान पर हमला हुआ, तब ही आपकी समझ में आया कि न्‍यायपालिका में क्‍या चल रहा है। इसके पहले तक आप क्‍यों खामोश बने रहे। क्‍या सिर्फ इसलिए कि आप इस न्‍यायिक व्‍यवस्‍था में अपनी मन-माफिक गोटियां फिट करने में जुटे थे, जो आपको अधिकतम मुहैया करा सके।

इसी सिलसिले में सबसे बड़ा स्‍पष्‍टीकरण को आपसे हम यह चाहते हैं कि अरूणाचल के मुख्‍यमंत्री रहे कलिखो पुल की आत्‍महत्‍या का जिम्‍मेदार कौन है, कौन-कौन है, और कितने-कितने लोग ऐसे जिम्‍मेदार हैं कलिखो पुल की आत्‍महत्‍या नुमा हत्‍या के मामले में। क्‍या वजह थी कि आत्‍महत्‍या करने से पहले कलिखो पुल ने अपने मृत्‍यु-पूर्व बयान के तौर पर पूरे साठ पन्‍ने की एक चिट्ठी लिखी थी। जिसमें लिखा था कि किस तरह देश के मंत्री, बड़े नेता, अफसर, राज्‍यपाल ही नहीं, बल्कि खुद आपकी बिरादरी के आला अफसरों-दिग्‍गजों के चेहरे पर कालिख पुत गयी थी। लेकिन आप खामोश रहे, सवाल यह है कि आखिर क्‍यों।

जस्टिस लोया का मामला क्‍या है। कलिखो पुल और जस्टिस लोया की मौत पर आप का खून क्‍यों नहीं खौला।

जस्टिस कर्णन का मामला क्‍या ठीक वही था, जो आपने देखा, सुना और पाया था। अब तो आप खुल कर सामने आ ही चुके हैं, इसलिए देश की जनता के सामने यह साफ कर दीजिए कि कर्णन के मामले में आपने खुली बहस की जरूरत क्‍यों नहीं समझी, और जिसके चलते कर्णन छह महीनों तक जेल में बंद रहा।

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लर्नेड वकील साहब

कोलेजियम पर जो ताजा विवाद खड़ा हुआ था, उस पर आपकी क्‍या राय है। क्‍या वजह है कि एक पूर्व सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश सरेआम न्‍यायपालिका की दिक्‍कतों पर ठीक उसी तरह के टेसुआ बहाता है, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। लेकिन कोलेजियम का मसला सरकार और न्‍यायपालिका के बीच ठने शीत-युद्ध की तरह अटका ही रहा था। आखिर इस में कौन किंग जोम है, और कौन ट्रम्‍प। और आखिर क्‍यों, और क्‍यों इसका स्‍थाई निदान नहीं खोजा पा रहा है।

क्‍या कारण है कि आप कोर्ट की कार्रवाई पर हस्‍तक्षेप को कन्‍टेम्‍ट ऑफ कोर्ट की नोटिस जारी कर देते हैं। क्‍यों आपने इस व्‍यवस्‍था को न्‍यायपालिका का सबसे बड़ा बज्र अस्‍त्र के तौर पर पहचान लिया है, जो भय का कारक बनी हुई है। आपने तो मर्केण्‍डेय काटजू तक को इसी तरह की नोटिस जारी कर दी थी। आपने उसे हौवा बना रखा है। अधीनस्‍थ कोर्टों को आप द्वारा की गयी प्रताड़ना न्‍यायपालिका की अंधेरी गलियों-कोनों में आज भी सिसकती-सुबकती दिख जाती है।  औश्र सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आप तो सबसे बड़े घराने के मालिकों में से थे, फिर आप ने आज तक देश की न्‍यायिक प्रणाली को सुधारने के लिए कौन सा कदम कब-कब उठाया, और उसका परिणाम क्‍या निकला। इस सवाल का जवाब पूरा देश मांग रहा है योर ऑनर।

खैर, चलिए। चूंकि आपने कैसे भी हो, मगर न्‍यायपालिका में भरी सड़ांध और मवाद को निकालने के लिए एक ऐसा रास्‍ता खोल दिया है, जहां हमेशा से ही गंदगी बह कर पूरी व्‍यवस्‍था को साफ करते रहने की सतत प्रक्रिया में तब्‍दील हो जाएगी।

इसलिए हम आपका सम्‍मान करते हैं, आपको सैल्‍यूट करते हैं। इस उम्‍मीद के तहत कि आप अपने दायित्‍वों को अपने अहंकारों के ढीह-ठूंठ में ही तब्‍दील नहीं रह रहे हैं, बल्कि कुछ ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोलेंगे।

आमीन।।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में जो कुछ भी हुआ, वह वाकई बेहद निराशाजनक साबित हुआ है। हमारा प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम इस मसले पर लगातार निगाह रखे है। हम इस मामले पर आपको ताजा विचार और समाचार उपलब्‍ध कराते रहेंगे। इस मसले की दीगर खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक करें:-

सर्वोच्‍च न्‍यायालय में न्‍यायिक-नौटंकी

मुख्‍तार बीमार: मीडिया नंगी हो गयी, खूब उड़ीं अफवाहें

: अधिकांश अखबारों-चैनलों ने हंगामा कर दिया कि मुख्‍तार और अफशां तक को हार्टअटैक हुआ : अमर उजाला के मुताबिक जेल में मुख्‍तार अंसारी और उसकी पत्‍नी को गम्‍भीर चोटें आयी हैं : सारी खबरें सुनी-कही पर ही चलीं, दावे किसी के नहीं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता तथा बसपा विधायक मुख्तार अंसारी और उनकी पत्नी के अचानक बीमार हो जाने की खबर के बाद प्रशासन और शासन ने क्‍या-क्‍या किया, यह तो दीगर बात है। लेकिन सबसे शर्मनाक रवैया तो मीडिया का रहा, जिसने इस घटना को केवल हंगामे और महज अफवाहों तक ही सिमटाये रखा। किसी समाचार संस्‍थान ने यह ऐलान कर दिया कि जेल में मुख्‍तार और अशफां को हार्ट-अटैक हो गया है। एक अखबार ने यह छाप दिया कि इस हार्ट अटैक में अनहोनी हो चुकी है। बेहद रहस्‍यमय अंदाज में अमर उजाला ने यह दिखा दिया कि जेल में बेहोश होने के बाद से प्रशासन ने इन दोनों के आसपास से मीडिया को जबरन हटा दिया है। इस अखबार के मुताबिक मुख्‍तार और अशफां को गहरी चोटें आयी हैं। लखनऊ में एक पत्रकार ने तो फेसबुक में यह लिख दिया कि जेल में मुख्‍तार और अशफां को चाय में जहर देकर जान से मारने की कोशिश की गयी है।

आपको बता दें कि बांदा जेल में बंद मुख्‍तार अंसारी से मिलने के लिए उनकी पत्‍नी और उनके दोनों बेटे जेल गये थे। यह करीब दोपहर बारह बजे का वक्‍त बताया जाता है, जब मुख्‍तार की तबियत खराब हुई। आनन-फानन डॉक्‍टर बुलाया गया, लेकिन उसी बीच अशफां की हालत बिगड़ गयी। इसके बाद प्रशासन ने मीडिया को मौके से हटाया, और उसके बाद उन्‍हें पहले जिला अस्‍पताल, फिर सीधे लखनऊ रेफर कर दिया गया।

आजतक के रिपोर्टर कुमार अभिषेक के अनुसार बांदा ट्रामा सेंटर से करीब 3.20 बजे मुख्तार अंसारी और उनकी पत्नी अफशां को दो अलग अलग एम्बुलेंस से लखनऊ ले जाया गया. बांदा के सीएमओ डॉ. संतोष कुमार और डीएम महेन्द्र बहादुर सिंह ने बताया कि स्ट्रेचर से एम्बुलेंस ले जाते वक्त मुख्तार अंसारी की आंखें बंद थीं और उनकी पत्नी की आंखें खुली थीं. अब सवाल यह है कि यह रिपौर्टर इस खबर से क्‍या साबित करना चाहता है। मुख्‍तार की आंख बंद और उनकी पत्‍नी की आंखें खुली होने का खुलासा करने का औचित्‍य और मतलब क्‍या है कुमार अभिषेक के लिए, यह तो कुमार अभिषेक ही जानें, लेकिन इतना जरूर है कि इस तरह की मूर्खता की खबर लिख कर इस चैनल ने अपनी विश्‍वसनीयता को आज फिर रौंद डाला। दिलचस्‍प बात तो यह है कि कुमार अभिषेक ने यह खबर लिखते वक्‍त डेटलाइन तो लखनऊ की दर्ज कर दी है, लेकिन एक बार भी यह नहीं बताया है कि इस खबर के इस एंगेल, और इस सूचना का मकसद क्‍या था। जाहिर है कि लखनऊ में लिखते वक्‍त खबरनवीस की मौजूदगी बांदा में तो हर्गिज नहीं रही होगी।

एक खबर तो सभी अखबारों-चैनलों में चली कि इन दोनों को हार्टअटैक हुआ है। लेकिन इस तथ्‍य की ओर किसी ने नहीं गौर करने की जरूरत समझी कि अगर दोनों को ही हार्ट अटैक हुआ तो मुख्‍तार को उसके स्‍पेशल वाहन से, और अशफां को 108 एम्‍बुलेंस पर अलग-अलग क्‍यों भेजा गया। खास तौर पर तब, जबकि पुलिस के आला अधिकारी इस बारे में जेल के भीतर मुख्तार अंसारी और उनकी पत्नी को दिल का दौरा पड़ने की जांच कर रहे हैं. बांदा के डीएम और एसपी को इस मामले की जांच कर शासन को पूरी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है. मगर किसी भी अखबार ने यह जांचने की अथवा प्रशासन से यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर इन दोनों को अलग-अलग क्‍यों लखनऊ भेजा गया।

लखनऊ के पत्रकार ओबैद नासिर ने फेसबुक पर अपडेट किया कि मुख्‍तार और उसकी पत्‍नी को हार्टअटैक हुआ है। ओबैद के अनुसार इन दोनों की तबियत तब बिगड़ी, जब यह पति-पत्‍नी जेल में बैठ कर चाय पी रहे थे, कि अचानक इन दोनों को हार्ट अटैक हुआ। हालांकि अपनी वाल पर उन्‍होंने यह जरूर लिख दिया है कि बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी और उनकी पत्नी को जेल की चाय में ज़हर मिला कर देने की अफवाह जंगल की आग की तरह फैल रही है। लेकिन सवाल यह है कि किसी पत्रकार द्वारा इस तरह की सूचनाओं को अफवाहों के साथ कैसे जस्‍टीफाई किया जा सकता है।

मुख्तार अंसारी के डाक्टर ने बताया क‌ि मुख्‍तार शुगर और बीपी के भी मरीज हैं। हद है कि अमर उजाला के अनुसार इन दोनों की तबियत खराब होने के बाद मुख्‍तार के सुरक्षाकर्मियों ने अस्पताल में दरवाजा बंद कर मीड‌िया को बाहर कर द‌िया है, और सूत्रों की मानें तो इन दोनों को गम्‍भीर चोटें भी आयी हैं।

जो तुम्‍हारा फतवा है न, चाहता हूं कि उसकी बत्‍ती बना दूं

: हे फतवों के ठेकेदार, तुम इंसानों को मेंढक बनाना बंद करो : बैंक में काम करने वाला मुसलमान अपनी मेहनत की तनख्वाह लेता है, हराम का नहीं : तुम भी जिस मदरसे से तनख्‍वाह लेते हो, उसे चंदा देने वालों में से सैकड़ों की कमाई जायज़ नहीं है :

खुर्शीद अनवर खान

मुम्‍बई : हालांकि तुम्हारा फतवा एक सलाह है। फतवा कोई आदेश नहीं होता। फिर कई बार तुम्हारे फ़तवों को सुन कर मन कहता है उसकी बत्ती बना कर तुम्हे दे दूं। तुम जहां चाहो उसे घुसा लो।

हे फतवे के ठेकेदार। तुम जिस मदरसे से तनख्वाह पाते हो वह लाखों मुसलमानों के चंदे से चलता है। इन लाखों में आधे ऐसे भी हैं जो झूठ और दुनिया के कई गलत काम करके पैसे कमाते हैं। मैं सैकड़ों ऐसे चंदा देने वालों को जानता हूँ, जिनकी कमाई जायज़ नहीं है। इस लिए तुम कल से तनख्वाह लेना बंद करो।

क्योंकि बैंक में काम करने वाला मुसलमान अपनी मेहनत की तनख्वाह लेता है। उसकी तनख्वाह का पैसा कहां से आया? यह सवाल तुम्हारी तनख्वाह पर भी लागू होता है। हज़ार कमियों के बाद भी मज़हब अच्छी चीज है। यह इंसान को बुराईयों से डराता है। अच्छाई के रास्ते पर चलने की नसीहत देता है।

लेकिन मज़हब के नाम पर इंसानों को कुएं का मेढ़क बनाना बन्द करो।

(पत्रकारिता से लेकर राजनीति, और अब मुम्‍बई में एक रेस्‍टोरेंट में खानसामा का धंधा चला रहे खुर्शीद मूलत: जौनपुर के बाशिंदा हैं)

शेखर त्रिपाठी की सांस टूटती रही, पर जागरण-मालिक नहीं पहुंचे

: एक बरस में ही एक लाख तक पहुंच चुका था जागरण लखनऊ का सर्कुलेशन : महेंद्र मोहन ने शेखर की ओर झांका तक नहीं। तब भी नहीं, जब श्मशान घाट पर अग्नि देवता की पत्‍नी स्‍वाहा द्वारा शेखर की हवि स्‍वीकार कर रही थी : वादा पूरा करना तो दूर, अपने सहज मानवीय, व्‍यावसायिक, अथवा आत्‍मीय रिश्‍तों से जुड़े किसी भी एक दायित्व का निर्वहन नहीं किया जागरण ने :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ( गतांक से आगे) शशांक शेखर त्रिपाठी के इस आश्वासन पर महेंद्र मोहन इतना गदगद हो गए थे कि उन्होंने शेखर त्रिपाठी की पीठ ठोंकी और कहा कि:- शाबाश शेखर, तुम है हौसला। कर सकते हो तुम यह सब। तुम्‍हारे साहस की मैं प्रशंसा करता हूं। और वायदा करता हूं कि जिस दिन भी हमारे लखनऊ संस्‍करण की प्रतियों की संख्या 17 हजार से बढ़ कर 25 हजार तक पहुंच जाएगी, तुम सभी लोगों को एक जबरदस्त पार्टी दूंगा। प्रॉमिस।

कहने को तो हम सब और दीगर लोग इस संख्या की बढ़ोतरी पर अपनी-अपनी राय और प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं कि आखिर 17000 से यह संख्या 40000 तक इतनी जल्‍दी कैसे पहुंची। क्‍योंकि इस सफलता के दूसरे कारण भी थे। मसलन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आदि कई प्रमुख पहलू-कारक बन गए इस दिशा में। या फिर इस दैनिक जागरण की टीम ने इसके लिए बेतहाशा मेहनत कर डाली थी। कुछ भी हो सकता है, जिस पर फिर कभी चर्चा की जा सकती है, लेकिन सच यही है कि तब तक दैनिक जागरण के लखनऊ में प्रकाशित होने वाली प्रतियों की संख्या 40 हजार तक पहुंच गई थी। और इससे भी बड़ी बात यह कि एक बरस में ही यह अखबार एक लाख से ज्‍यादा छपने लगा था।

हिन्‍दी पत्रकारिता-जगत में एक अप्रतिम और विशालकाय ग्रह थे शशांक शेखर त्रिपाठी। उनसे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

शशांक शेखर त्रिपाठी

लेकिन दर्दनाक बात तो यह है कि शेखर त्रिपाठी ने महेंद्र मोहन गुप्‍ता से किया गया अपना दावा तो पूरा किया, लेकिन दैनिक जागरण के मालिक महेंद्र मोहन ने अपना वादा पूरा करना तो दूर, अपने सहज मानवीय, व्‍यावसायिक, अथवा आत्‍मीय रिश्‍तों से जुड़े किसी भी एक दायित्व का निर्वहन नहीं किया। ऐसे में एक कर्मचारी अपने संस्‍थान के मालिकों के प्रति कैसे जी-जान लड़ने की साहस जुटा सकता है, यह सवाल अब बेहद उलझाऊ होता जा रहा है।

शेखर त्रिपाठी द्वारा किये गये उस वायदे को आज पूरा 31 साल पूरा हो चुका है। आखिरी दौर में वे खुद में ही नहीं, सामाजिक तौर पर भी बेहद कमजोर और अकेले हो चुके थे। इतना ही नहीं, उनके संस्‍थान दैनिक जागरण तक ने उनसे अपना पल्‍ला झाड़ लिया था, जबकि इसमें साजिश अखबार के प्रबंधन की थी, लेकिन पूरा ठीकरा शेखर ने अपने ही सिर-माथे पर फोड़वा लिया था। शेखर त्रिपाठी की मौत हो चुकी है।

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पत्रकार पत्रकारिता

बावजूद इसके कि अपने संस्थान के मालिकों के प्रति किये गये अपने हर वादे पर शेखर त्रिपाठी हमेशा खरे उतरे थे। बल्कि उनके कोशिशों का ही है कि लखनऊ संस्करण की प्रतियां लाखों तक पहुंच गई लेकिन महेंद्र मोहन ने अपना काम निकलने के बाद अपने वायदे की तरफ झांका तक नहीं। खास तौर पर तब जबकि शेखर बिलकुल अकेले हो चुके थे। लेकिन जागरण के मालिक मोहन-बंधुओं ने तब भी शेखर की ओर नहीं झांका, जब शेखर त्रिपाठी बीमार हो चुके थे। तब भी नहीं, जब शेखर त्रिपाठी गाजियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल में बुरी तरह बीमार होकर भर्ती थे। तब भी नहीं, जब शेखर के इलाज का बिल बीस लाख के उचकता जा रहा था। तब भी नहीं, जब शेखर त्रिपाठी ने दम तोड़ दिया। और तो और, तब भी नहीं जब शेखर की लाश दिल्ली के निगम बोध श्मशान घाट पर अग्नि देवता की पत्‍नी स्‍वाहा द्वारा धूधू कर स्‍वीकार की जा रही थी।

जागरण की यादों को सहेटे हुए इस लेख-श्रंखला के अगले अंकों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जागरण-पुराण

सच बात तो यही है कि दैनिक जागरण के मालिकों को अपने नौकरों पत्रकारों और प्रबंधकों का इस्तेमाल करना खूब पता होता है मगर उनकी हालत बिगड़ते ही यही मोहन परिवार उन लोगों को दूध में पड़ी मक्खी की तरह झटक कर बाहर फेंक देता है। शेखर त्रिपाठी के अंतिम दौर में ही नहीं, बल्कि उनकी चिता के दौरान और उसके बाद भी दैनिक जागरण के मालिकों का एक भी सदस्य शेखर त्रिपाठी या उनके परिजनों के पास फटका तक नहीं।

हां, शेखर चौपाटी को देखने सीजीएम सत्येंद्र श्रीवास्तव अस्पताल गये, निगम बोध घाट पर पहुंचे। इतना ही नहीं, एनसीआर के स्‍थानीय सम्‍पादक विष्णु त्रिपाठी भी निगम बोध घाट पर  गए। इसके बावजूद विष्‍णु त्रिपाठी के भाई अस्‍पताल में गंभीर रूप से बीमार थे।


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