Meri Bitiya

Saturday, Jul 21st

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

मेरा कोना

हाईकोर्ट: चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

: अमां यार। क्‍या इसी को ज्‍यूडिसरी कहते हैं ? : इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश को भेजा गया गोपनीय पत्र मीडिया तक पहुंचा : नाबालिग से रेप में गायत्री प्रजापति ऐंड कम्‍पनी पर पॉक्‍सो जज ने दी थी जमानत : हाईकोर्ट ने दंडित किया था दो जिला जजों को :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कहावतें तो बेहिसाब हैं, जो किसी भी मसले को बेहद खूबसूरती के साथ और अपने मन्‍तव्‍य को प्रभावशाली ढंग से प्रस्‍तुत कर सकती हैं। मसलन, बात करो ईरान की तो बोलेंगे तूरान की, गये गजोधर झांड़ा फिरने, ड्यूढै पहुंची बरात तो समधन लगै हगास, तब क्‍या पछतावे जब चिडि़या चुग गयी खेत। वगैरह-वगैरह। सच बात तो यही है कि किसी भी पूरे किस्‍से को एक छोटी सी लाइन में समझाने में पर्याप्‍त होती है सशक्‍त कहावतें। लेकिन ताजा मसले में जो कहावत मैं पेश करने जा रहा हूं, उससे बेहतर कोई भी कहावत नहीं हो सकती। कहावत है:- सत्‍ते ने लेटर भेजा फत्‍ते को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर।

मामला है यूपी की न्‍यायापालिका में पैसा उगाह कर फैसला देने को लेकर चल रही चर्चाओं का। इस पर सबसे भोंड़ा प्रदर्शन तब हुआ जब पूर्व समाजवादी पार्टी की सरकार में शामिल और अब तक के सबसे बड़े बेईमान खनन माफिया के तौर पर कुख्‍याति हासिल कर चुके पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति समेत तीन अभियुक्‍तों को लखनऊ के पॉक्‍सो कोर्ट के जज ने जमानत दे दी गयी। गजब बात यह है कि इससे पहले गायत्री ऐण्‍ड कम्‍पनी ने अपनी गिरफ्तारी को लेकर सर्वोच्‍च न्‍यायालय में एक याचिका लगायी थी, जिसमें कहा गया था कि उन्‍हें गिरफ्तार नहीं किया जाए। लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस याचिका को खारिज किया था। गायत्री और उसके इन साथियों पर आरोप है कि उन्‍होंने एक नाबालिग बच्‍ची के साथ दुराचार किया।

आपको बता दें कि इस मामले में इलाहाबाद उच्‍चन्‍यायालय के चीफ जस्टिस दिलीप बी भोंसले ने गायत्री प्रजापति को गैर-कानूनी तरीके से जमानत देने वाले पॉक्‍सो कोर्ट के एडीजे ओपी मिश्र को मुअत्‍तल कर दिया था, जबकि लखनऊ जिला एवं सेशंस जज राजेंद्र सिंह को हटा कर उन्‍हें चंदौली भेज दिया गया था। माना गया कि हाईकोर्ट प्रशासन ने इस मामले में भारी गड़बड़ और मोटी रकम का लेनदेन की बात मानी थी।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

हाईकोर्ट के इस फैसले से जिस ओपी मिश्र पर जो गाज गिरी, उन्‍हें 16 दिन पहले ही यह कुर्सी मिली थी। लेकिन सबसे ज्‍यादा नुकसान तो राजेंद्र सिंह को हुआ था। उन्‍हें राजधानी के जिला व सेशंस जज की कुर्सी से तो हटाया गया ही, हाईकोर्ट ने कोलोजियम को भेजे गये उस प्रस्‍ताव को भी खारिज कर दिया जिसमें राजेंद्र सिंह को हाईकोर्ट में जस्टिस के पद पर पदोन्‍नत किया जाना था। कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी शख्‍स को अपने जीवन में इससे बड़ा कोई भी धक्‍का नहीं हो सकता है, कि उसे हाईकोर्ट कुर्सी पर बिठाने की प्रक्रिया को रद कर दिया जाए।

बहरहाल, जस्टिस दिलीप बी भोंसले ने इसी मामले पर एक गोपनीय पत्र देश के तब के सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर को भेजा था। इसमें गायत्री ऐंड कंपनी को जमानत देने के पूरे प्रकरण का जिक्र किया गया था, साथ ही इसमें इन दोनों जजों पर दायित्‍व भी निर्धारित किये गये थे। खास बात यह है कि यह पत्र पूरी तरह गोपनीय था। और ऐसे प्रवृत्ति के पत्र को सुरक्षा की परम्‍पराओं के तहत चीफ जस्टिस द्वारा सील बंद कर विशेष पत्रवाहक द्वारा सीधे सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश के हाथों में ही थमाया जाता है।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

अब हालत यह है कि यह तो अब तक नहीं पता चला है कि दिलीप बी भोंसले का यह गोपनीय पत्र जेएस खेहर के हाथों तक पहुंचा भी या नहीं। लेकिन अब यह पत्र मीडिया के हाथों में है, जो उसकी प्रतियां बना कर कभी पानी में जहाज बना रही है, या फिर उसकी बत्‍ती बना कर जहां-तहां बुन-सिल कर प्रयोग कर रही है। इससे बड़ा मजाक और क्‍या होगा, जब  इस तथाकथित पत्र की कॉपी प्रतिवादी टाइम्‍स ऑफ इंडिया के वकील ने इस मामले में भरी अदालत में मामले के वादी के हाथों में थमा दी। इस पत्र में जो कुछ भी भोंसले द्वारा लिखा गया बताया जाता है, उस पर अब कड़ी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गयी हैं। क्‍योंकि इस कथित पत्र का हवाला देते हुए विभिन्‍न मीडिया संस्‍थानों ने जो खबरें प्‍लांट की हैं, उसमें का‍फी विवाद खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं, आरोप तो यहां तक लगाये जा रहे हैं कि यह एक साजिश के तौर पर पत्र लीक किया गया है, ताकि एक जज को हाईकोर्ट में प्रोन्‍नत करने की प्रक्रिया को रद कराया जा सके। कुछ भी हो, सवाल तो यह है कि इन दोनों शीर्ष जस्टिस के बीच होने वाले इस पत्रचार का खुलासा मीडिया में हो जाना खासा संवेदनशील मसला बताया जा रहा है।

अब जरा देखिये तो तनिक, कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के उस गोपनीय पत्र को किस-किस बड़े मीडिया समूहों ने अपनी सुर्खियां बना कर पेश किया था:- टाइम्‍स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्‍स यानी एनबीटी, जागरण डॉट कॉम, आई नेक्‍स्‍ट, हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, अमर उजाला, मेन स्‍ट्रीम, इंडिया टुडे, आजतक समेत दर्जनों आदि। सारा झंझट इसी कवायद को लेकर अब अदालत से लेकर सड़क तक फैलता जा रहा है।

है न हैरत की बात ?

इसी प्रकरण पर यह कहावत समीचीन है कि:- चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

पुनश्‍च: खास बात यह है कि कहावतें हमेशा वक्‍त की लम्‍बी सान पर चढ़ा कर ही जन-सामान्‍य में अपनी मान्‍यता हासिल कर पाती है, जबकि मैं आपको जानकारी दे दूं कि यह कहावत मैंने बिलकुल ताजा तैयार की है।

जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

एक आलोक बोस हैं, और एक थे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी

बीमार जज ने दिया इस्‍तीफा। इलाज सरकार से नहीं, मैं खुद कराऊंगा

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

जज पर दबाव : मामला गंभीर, दबाव तो पड़ता ही है

बरेली सीजेएम के घर झंझट, जमानत अर्जी खारिज

हंसिया-हथौड़ा नहीं कमल संभालो, जो सूखा तो फिर न खिलेगा

: इस वामपन्‍थी बूढ़े कामरेड का तर्क सुन कर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी :  हंसिया-हथौड़ा तो टूट गया है तुम्‍हारा, अब क्‍या करोगे : नया हत्‍थ बन जाएगा, धार ज्‍यादा पैनी हो जाएगी, मगर मुश्किल तो तब होगी अगर कमल मुरझाने लगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक बूढ़े कम्‍युनिस्‍ट की बात सुन लेंगे आप, तो कलेजा धक्‍क हो जाएगा।

हालांकि यह कोई कहानी है, या फिर हकीकत में हुई कोई गम्‍भीर बातचीत नुमा तर्क-वितर्क। लेकिन इसमें निकले जवाब बेहद खासे रोचक भी हैं, चेतावनी से भरे भी हैं।

अनिल जनमेजय ने किन्‍हीं इलाहाबादी दुर्गा के हवाले से पुरबिया बोली में इस बारे में लिखा है। आम आदमी की समझ के लिए मैं उसका खड़ी बोली में तर्जुमा यानी अनुवाद कर रहा हूं।

एक बूढ़े कामरेड और एक बूढ़े संघी में खासी पुरानी आत्‍मीयता और मित्रता है। हाल ही आपसी बातचीत के दौरान उस बूढ़े संघी ने देश के बदले ताजा राजनीतिक भगवा माहौल पर अपनी छाती फुला कर 56 इंची किया और बूढ़े कामरेड मित्र की ओर दर्प-भाव में देखते हुए सम्‍बोधित किया:- अब तो तुम्‍हारा हंसिया-हथौड़ा तो टूट गया है। तुम लोग अब क्‍या करोगे। उसी कांग्रेसियों के दरवाजों पर पानी भरने का पुराना धंधा ही करोगे न, हा हा हा।

बूढ़े कामरेड ने बहुत स्थिर भाव में जवाब दिया:- बेंट-हत्‍था ही तो टूटा है न, अरे नया बन जाएगा यार। और जो हंसिया की जो धार भोथरी हो गयी है न, उसे सान पर चढ़ा कर दोबारा धारदार करा लिया जाएगा यार। इससे उसकी धार पहले से भी ज्‍यादा पैनी हो जा सकेगी। ऐसे में हमारी चिंता छोड़ दो मेरे दोस्‍त। तुम लोग अपना कमल सम्‍भाल लो। क्‍योंकि अगर यह कमल कभी सूखा या मुरझाया, तो फिर कमल दुबारा नहीं खिल पायेगा।

जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

: अपनेजीवन-मूल्‍यों का निचोड़ नहीं, हालातों की हकीकत बयान की है राजेंद्र सिंह ने : धुर बेईमान गायत्री प्रजापति की जमानत पर भड़के विवाद पर पूरी जीवन भर की ईमानदार छवि टूटने का दुख राजेंद्र सिंह की लेखनी से टपकती है : हाईकोर्ट की जजी गयी, उसका दुख नहीं। जज्‍बा आज भी मौजूद है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : उस शख्स के जीवन की एक-एक सारी घटनाओं और प्राप्तियों को सिलसिलेवार रख कर किसी चलचित्र की तरह देखने की कोशिश कीजिए। शुरूआत से लगभग अंत तक जिस शख्‍स का जीवन किसी दुर्धर्ष योद्धा की तरह बीता हो। ईमानदारी जिसके खून में रही हो, और रग-रग में रची-बसी रही हो। अपने मूल्‍यों के लिए वह कभी भी नहीं डिगा हो। कठोर परिश्रम और सरल व्यवहार। अधिकारियों द्वारा दी गयी प्रशंसाओं का ढेर उसकी पर्सनल फाइलों में दर्ज हो। लेकिन अचानक ही यह सारा कुछ किसी रेत के टीले की तरह ढह जाए। ऐसे में आप क्‍या सोचेंगे।

जरा कल्‍पना तो कीजिए, उस शख्‍स के खाते में अंत में जो प्राप्तियां दर्ज होनी चाहिए, किसी मजबूत म्‍युचुअल-फण्‍ड की परिपक्‍वता की तरह, लेकिन अचानक उसके हाथों से सारा कुछ छिन जाए। उसकी हथेली की उंगलियों से सारी उपलब्धियां रेत की मानिंद फिसल जाए। अकारण।

तो क्‍या होगा ?

इस सवाल का जवाब तो केवल यही मिलेगा कि यह आदमी हमेशा-हमेशा के लिए टूट-बिखर जाएगा। लेकिन इस मामले में ऐसा हर्गिज नहीं है। हां, वह टूटा जरूर है, लेकिन बिखरा नहीं। इतना ही नहीं, तब भी नहीं टूटा जब उसकी मां का देहांत न केवल इन्‍हीं तनावों के दौर में हो गया, बल्कि उनकी मृत्‍यु तब हुई जब उसके बेटे की शादी को केवल दो दिन बचे थे।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

इस शख्‍स का नाम है राजेंद्र सिंह। न्‍यायपालिका में अपनी पूरी श्रेष्‍ठता के बल पर राजेंद्र सिंह लखनऊ के जिला और सेशंस जज थे। उनकी काबिलियत को देखते हुए उनका नाम हाईकोर्ट के जज के तौर पर हाईकोर्ट द्वारा प्रस्‍तावित किया जा चुका था। लेकिन अचानक वर्तमान में बेईमानी के सिरमौर गायत्री प्रजापति की जमानत पर विवाद भड़का, और सारा ठीकरा राजेंद्र सिंह के माथे पड़ा। हाईकोर्ट ने राजेंद्र सिंह को चंदौली तबादले पर भेज दिया। लेकिन सबसे ज्‍यादा कष्‍टप्रद घटना यह हुई कि उनके हाईकोर्ट पर एलीवेट करने की प्रक्रिया को हाईकोर्ट ने वापस ले लिया। किसी भी लोअर जजी में किसी भी अफसर की सर्वोच्‍च ख्‍वाहिश यही होती है कि उसे हाईकोर्ट में जज की कुर्सी मिल जाए।

मैं राजेंद्र सिंह से कभी भी नहीं मिला। मुलाकात की ऐसी कोई जरूरत भी नहीं पड़ी। हालांकि मैं लोगों में मिलना-जुलना ज्‍यादा पसंद करता हूं, लेकिन न्‍यायाधिकारियों के बारे में मेरी राय जरा अलहदा होती है, कि वे खुद में ही सिमटे रहते हैं। खुद की श्रेष्‍ठता-बोध का इतना भारी वजन उन पर होता है, कि उसे ढोने में उनकी रीढ़ दोहरी होने लगती है। कुछ तो बाकायदा बदतमीज भी होते हैं, लेकिन अन्‍य प्रशासनिक या अधीनस्‍थ सेवाओं के अफसरों के मुकाबले न्‍यूनतम। हां, उन्‍हें मुस्‍कुराने में खासी मशक्‍कत करनी होती है, बनावट और आडम्‍बर उनकी जीवन-शैली में घुस-बस जाता है न, इसलिए। बल्कि कहें तो यह उनकी मजबूरी ही होती है। वरना लोअर ज्‍यूडिसरी के किसी अफसर में तनिक भी आरोप लग जाए तो पूरी छवि धूमिल हो जाने का खतरा बना ही रहता है। अधीनस्‍थ न्‍यायापालिका के मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि हाईकोर्ट के कुछ जज इसी ताक में रहते हैं कि कब कौन मिले, तो उसे खौखिया लिया जाए। खैर, राजेंद्र के बारे में उनके तनावों के बारे में कई वकीलों और जजों से बातचीत हुई थी। सभी एकमत थे इसी बात पर, कि राजेंद्र सिंह जैसा शख्‍स बहुत कम ही होता है।

बहरहाल, राजेंद्र सिंह अब सेवानिवृत्‍त हैं। लेकिन अपनी नौकरी के अंतिम दौर में उन्‍होंने जो खोया है, उसकी पीड़ा उनकी वाल पर साफ दिखायी पड़ती है। किसी झन्‍नाटेदार तमाचा की तरह राजेंद्र की एक पोस्‍ट उनकी फेसबुक वाल पर दिखी तो मैं भीतर तक हिल गया:- No need to be honest otherwise you will be crucified !

अब जरा देखिये कि राजेंद्र सिंह की इस पोस्‍ट पर लोगों की प्रतिक्रिया क्‍या हुई।

Ashok Awasthi : Virtue is it's own reward.

Rajendra Singh : इस खंडित दुरूह चक्रव्यूह से मत कर,

स्वयं न्याय की वह अप्रतिम आशा,

यह अपराजेय चिर समर , कर ध्वंस

व्यूह ,वरण जीत , कर पूरी अभिलाषा।

"राज"

Vikas Saxena : Yahaan nh to kahin aur reward milega

DrArvind Mishra : सार्वभौम मूल्य तो अपरिवर्तित हैं। उन्हें व्यष्टिगत परिप्रेक्ष्य में नही देखा जाना चाहिए। अन्ततोगत्वा विजय सत्य की ही होती है। किन्तु अग्निपरीक्षायें अनेक हैं

Manoj Shukla : कुछ लोग पद से महान होते हैं, कुछ लोगों से पद महान होता है।

Virendra Nath Singh : Really. Afraid teaching children about honesty

Vijay K Singh : i will like to be crucified than licking shoe of Rahul like congress leaders

Dara Singh : Although lines tell what's happening these days,yet honest people are more respectable than manipulaters.

Virendra Vikram Singh Rathore : Quite true The values are changing

Ram Naresh Misra : Never think so brother. Honesty is the boon of God. Only just and honest man enjoys the peace of mind and respect.God gives reward in different ways to honest .

Ashok Mathur : इमानदारी किसी पर अहसान नहीं है और बेइमानी अपने जोखिम पर है ,जो चाहे अपनाये।

Sanjay Kumar Dey : देता रहा बेगुनाही की शहादत मैं तमाम उम्र, मेरा क़ातिल बड़े मुंसिफ़ाना अंदाज़में मुझे सुनता रहा.....

Vani Ranjan : Moral values are more important than worldly success. Honesty pays in the long run

Shashank Shekhar : No matter what happens, the honest cannot change their nature.

Purnendu Srivastava : When dishonesty is a bliss it is folly to be ....

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

राजेंद्र सिंह हमेशा उस अनुशासित सेनानी की तरह रहे हैं, जिसकी उम्‍मीद न्‍यायपालिका हमेशा से चाहती रही है। अपनी पीड़ा कभी भी राजेंद्र ने खुल कर नहीं प्रदर्शित कर दी। लेकिन इसके बावजूद उनकी पीड़ा का समंदर अक्‍सर छलक ही पड़ता है। कभी किसी कमेंट के तौर पर, तो भी हताशा के तौर पर। लेकिन रूक-रूक कर वे खुद को नास्तिक होते हुए ईश्‍वर के प्रति पूरी आस्‍था दिखा देते हैं। उनकी कुछ पोस्‍ट देखिये, तो आपको पता चलेगा कि इस शख्‍स के दिल में जब-तब क्‍या-क्‍या नहीं चलता रहता है:-

सांप !

तुम सभ्‍य तो हुए नहीं,

नगर में बसना

भी तुम्‍हें नहीं आया।

एक बात पूछूं- ( उत्‍तर तो दोगे?)

तब कैसे सीखा डसना,

विष कहां पाया?

"अज्ञेय"

लेकिन इस सवाल उठाते हुए भी राजेंद्र सिंह यह जरूर जोड़ देते हैं कि:-  "हैव ए क्‍वेश्‍चनेबल डे " अक्‍सर वे किसी पपीहे की तरह आर्तनाद करते हैं कि:- "रॉबिनहुड कहाँ हो । तुम्हारी बहुत याद आ रही है।" और यह भी कि :-" Who will give Justice to me ?" लेकिन इसके साथ ही साथ यह भी लिख देते हैं कि:- "ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं ।"

एक आलोक बोस हैं, और एक थे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी

बीमार जज ने दिया इस्‍तीफा। इलाज सरकार से नहीं, मैं खुद कराऊंगा

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

जज पर दबाव : मामला गंभीर, दबाव तो पड़ता ही है

बरेली सीजेएम के घर झंझट, जमानत अर्जी खारिज

 

कान्‍हा ! अब तो हाईकोर्ट पधारो मेरे श्‍याम सांवरे लाला

: न जाने क्‍यों खफा हैं बड़े मुंसिफ हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से : पूरी फरवरी खाली निपट गयी, लखनऊ दर्शन नहीं कर पाया इंसाफ के सबसे बड़े पहरूआ को : चंद्रचूड़ के जमाने में तय हुआ था कि महीने में दो हफ्ते गुजारा करेंगे आला हाकिम, बस अमल नहीं हो पाया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सारा श्रंगार झुरा गया है। सारी सेज जस की तस पड़ी-पसरी है। सारे फूल-गुलदस्‍ते चीमड़ होकर महक मारने लगे हैं। सारा तामझाम और सारा हल्‍लागुल्‍ला श्‍मशानी शांति तले दबा जा रहा है। सारी शहनाई-नगाड़े खामोश बैठे हैं, हारमोनियम भी खुद में हवा नहीं भर पा रहा है। सारी सजावट और बिजली के सारे लट्टू बुता-बुझा गये लगते हैं। बिछाये गये कालीन और गलीचों पर धूल चढ़ने लगी है। सारी कल्‍पनाएं, सारे सपने, सारी ख्‍वाहिशें, सारी तमन्‍नाएं पल-हर-पल स्‍खलित, मूर्छित, अचेत होती जा रही हैं। वगैरह-वगैरह।

झुरा जाना समझते हैं आप? अवध में झुराने का मतलब होता है सूख जाना। लेकिन अवध के न्‍याय-क्षेत्र में अब न्‍यायिक व्‍यवस्‍थाएं लगता है कि झुरानी जा रही हैं। मामला है इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का, जहां के अधिकांश जिले अवध क्षेत्र के शामिल हैं। केवल इस अवधी बेंच में काफी कुछ सन्‍नाटा ही पसरा दिख रहा है।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

वहज है हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, जो इलाहाबाद में ही जमे रहते हैं। लखनऊ की ओर रूख करने की उनकी कोई ख्‍वाहिश ही नहीं दीखती। बेहाल हैं लखनऊ खंडपीठ से जुड़े वकील, कर्मचारी और वादीगणों। बेहाल लोगों में झगड़ालू और अपराधी भी शामिल हैं। दरअसल, इन सब की ख्‍वाहिशें हैं कि अगर चीफ साहब लखनऊ में ज्‍यादा वक्‍त देना शुरू कर दें, तो लखनऊ खण्‍डपीठ की व्‍यवस्‍थाएं ज्‍यादा चौकस और व्‍य‍वस्थित हो सकती हैं।

मगर काश ऐसा हो पाता।

अब यह खुदा ही जाने कि मुख्‍य न्‍यायाधीश की क्‍या मजबूरियां हैं कि वे नियमित रूप से लखनऊ क्‍यों नहीं आ ही पा रहे हैं। वजह क्‍या है, इसको लखनऊ खण्‍डपीठ से जुड़े वकील भी नहीं समझ पा रहे हैं। लेकिन हकीकत यही है कि जब से लखनऊ बेंच का नया न्‍याय-भवन बना है, इसके प्रति मुख्‍य न्‍यायाधीश की रूचि ही खत्‍म सी हो गयी प्रतीत होती है। आलीशान भवन का आधा से ज्‍यादा हिस्‍सा खाली पड़ा है। किसी के भी यह समझ में ही नहीं पा रहा है कि आखिर जब आवश्‍यकता नहीं थी, तो इतना अभूतपूर्व इमारत काहे बना कर खड़ी कर दी गयी। इसकी इतनी सजावट है कि लोग भौंचक्‍का रह जाएं, लेकिन इस बेंच भवन में मुख्‍य न्‍यायाधीश द्वारा कम वक्‍त दिये जाने को लगता है कि इस भवन में मुखिया के स्‍वागत की सारी तैयारियां जस की तस धरी ही रहेंगी क्‍या।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

परम्‍परा के अनुसार इलाहाबाद के मुख्‍य न्‍यायाधीश चार में से तीन हफ्ते इलाहाबाद में बिताते थे, जबकि एक हफ्ता लखनऊ को देखते थे। निवर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह व्‍यवस्‍था की थी कि इसे तीन और एक के बजाय दो और दो हफ्ते के हिसाब से आवंटित किया जाए। हालांकि चंद्रचूड़ की यह व्‍यवस्‍था केवल प्रॉसेज तक ही सीमित रही। जजों की संख्‍या नहीं बढ़ पायी, और इसीलिए इस व्‍यवस्‍था को लागू भी नहीं किया जा सका।

लखनऊ बेंच से जुड़े एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता नेता इस बारे में एक आंकड़ा पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले तीन महीने का मामला देख लीजिए, तो आपको यह बात समझने में आसानी हो जाएगी कि चीफ साहब की मौजूदगी लखनऊ में कैसी रही। आंकड़ों के अनुसार दिसम्‍बर-17 में केवल एक ही दिन मौजूदा चीफ जस्टिस लखनऊ में रहे। जनवरी-18 में केवल तीन दिन ही लखनऊ आये। 23, 24 और 25 जनवरी। लेकिन फरवरी में तो एक भी दिन आला मुंसिफ का दर्शन नहीं हो पाया।

Page 8 of 140