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मेरा कोना

पत्रकार को लोकप्रिय नेतृत्व चाहिए, गैंग या जगलर नहीं

: यूपी के मान्यता प्राप्‍त पत्रकार समितियों की चुनाव की पिपिहरी बजी, तो विद्रोह-स्‍वर भड़कने लगे :  बड़े पत्रकारों की करतूतों को समझना हो तो यह पत्र पढिये : किसी से छुपी नहीं है कि नेताओं ने अब तक अपना ही स्वार्थ साधा और डटकर स्वयंभू नेता बने रहे :

भारत सिंह

लखनऊ : प्रिय पत्रकार साथियों एवं अग्रजों,

इधर बीच, राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनावों को लेकर फिर से चहलकदमी शुरू हो गई है। चुनावों को लेकर सरगर्मी होनी लाज़मी भी है। अफसोसनाक पहलू ये है कि जिस तरह से पत्रकारों का दो गुट बनाकर चंद लोग अपनी राजनीतिक और निहायत स्वार्थी मनोविकार संक्रमित कर रहे हैं वह पत्रकारिता जगत के लिए बेहद घातक है। यही सबसे बड़ा कारण भी है कि पत्रकारिता जगत की हैसियत सत्ता की नज़रों में बौनी होती जा रही है।

हम, भरोसे के साथ कह सकते हैं कि अधिसंख्य पत्रकार मौजूदा गुटबाजी से सहमत नहीं हैं। इसके बावजूद मुठ्ठी भर लोग स्वाभिमानी, अपने कर्म के प्रति समर्पित कलम के सिपाहियों के तथाकथित नेता बने हुए हैं। कोई भी समाज या संगठन अपना मुखिया इसलिए चुनता है कि वह उसके हितों की चिंता और सुरक्षा करे। जिन लोगों ने अमुक व्यक्ति को अपना नेता माना वह त्याग के साथ जरूरतमंद साथियों का कंधा मजबूती के साथ मजबूत कर सके।

फिलहाल तो अब तक यह सपना ही बना हुआ है। ये हकीकत किसी से छुपी नहीं है कि नेताओं ने अब तक अपना ही स्वार्थ साधा और डटकर स्वयंभू नेता बने रहे। असंतोष बढ़ा तो दो गुट हो गए। सोचने वाली बात है कि इसमें सामान्य सदस्यों का क्या भला हुआ। आखिर जिस राजनीति की सड़ाँध पर हम नाक सिकोड़ते हैं और जिस प्रपंच को हम उठते-बैठते गाली देते हैं वही सड़ी सियासत तो हमारे बीच पनप चुकी है।

दोस्तों, मौजूदा गुटबाजी और उसके कारण उपजी गंदगी को यही समेटा जाना अपरिहार्य हो चला है। लिहाजा आप सभी स्वाभिमानी, बुद्धिजीवी और कर्मयोद्धाओं से मेरी विनम्र अपील है कि इस पत्रकारीय गुटबाजी को यहीं दफ्न करने में आगे आइए। इसका इलाज यही है कि जब तक सर्व सम्मति से मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति एक न हो तब तक कोई भी चुनाव वैधानिक न माना जाय।

सभी सम्मानित पत्रकार बंधुओं से ये आह्वान भी है कि यदि जबरन हमारे ऊपर समिति के नाम पर गुटबाजी थोपी जाती है तो हम किसी भी चुनाव में हिस्सेदारी न कर विरोध दर्ज कराएं। पत्रकार, स्वाभिमानी और बुद्धिजीवी वर्ग है, इसे राजनीति की तर्ज पर भेड़ों का झुंड समझने का दुस्साहस किसी को नहीं करना चाहिए। पूरी पत्रकारिता जगत के लिए बेहतर यही होगा कि सर्वसम्मति से एक समिति अटूट समिति रहे। समिति का हर सदस्य सम्मानित होता है, इसे लोकप्रिय नेतृत्व की जरूरत है किसी गैंग लीडर या जगलर की नहीं।

दोस्तों, इस आशय का पत्र शासन में भी समर्थ अधिकारियों तक पहुँचाया जाएगा जिससे समिति चुनाव के नाम पर अराजकता का तांडव न होने पाए।

अपेक्षा है कि मेरे मत से सहमत होंगे तो साथ आकर पत्रकार हितों का मनोबल जरूर बढ़ाएंगे। सकारात्मक सुधार की गुंजाइश हो तो भी आप सब की राय हर्ष पूर्वक सुनने और मानने को आतुर...

आपका ही,

भारत सिंह

सुपाड़ी जर्नालिज्‍म: अखबार पास करेगा कालोजियम की लिस्‍ट ?

: इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोलेजियम द्वारा भेजे गये नामों पर टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने सवाल उठाये : कई प्रस्‍तावों पर हस्‍तक्षेप, जजों के रिश्तेदार हैं : अगर किसी वकील का रिश्‍तेदार जज है, तो उसकी अर्हता पर आक्षेप कैसे : अखबार में छपी इस सूची का स्रोत क्‍या है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हाईकोर्ट में पूरी जिन्‍दगी खपा चुके वकीलों को खुद को जज की कुर्सी हासिल करने के लिए अब केवल कोलोजियम की ही अनुमति ही पर्याप्‍त नहीं होगी। बल्कि उसके लिए उन्‍हें एक अनिवार्य बाधा पार करनी ही होगी। वहां से अपना चरित्र-प्रमाणन कराने के बाद ही यह तय हो पायेगा कि कौन वकील हाईकोर्ट में वकील बनने लायक है अथवा नहीं। इस बाधा का नाम है टाइम्‍स ऑफ इंडिया। इस अखबार की कवायदों को देखते हुए तो यही साबित होता दिख रहा है कि हाईकोर्ट में जस्टिस बनने के लिए अंतिम बैरियर अखबार ही उठायेगा, और तय करेगा कि अमुक को जज बनाया जाना होगा और अमुक को बाबा जी का ठिल्‍लू थमाया जाएगा।

सोमवार 12 फरवरी-18 को सुबह अंग्रेज़ी के एक बेहद प्रतिष्ठित अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने जो खबर छापी है, उससे तो यही साबित होता है कि अब हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में भी यह अखबार अपना हस्‍तक्षेप करने पर आमादा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस अखबार को लेकर अब वकील समुदाय में अब गहरा आक्रोश फैल रहा है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

इस अखबार के अनुसार हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कोलेजियम ने जो 33 वकीलों के नाम हाईकोर्ट जज बनाने के लिये सुप्रीम कोर्ट को भेजे थे उनमें से अधिकांश नाम ऐसे हैं जो किसी न किसी सिटिंग या रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज के संबंधी हैं। कोई वकील किसी जज का लड़का है तो कोई भतीजा। कोई किसी बड़े नेता की पत्नी का बिज़नेस पार्टनर है तो कोई किसी बड़े वकील का जूनियर।

हो सकता है कि यह बातें सही हों, और यह सारे प्रस्‍ताव उन वकीलों के अटूट परिश्रम, उनके अध्‍ययन, और उनकी प्रैक्टिस के परिणामों के आधार पर तैयार किये गये हों। उधर यह भी हो सकता है कि  कि यह नाम सिफारिश से आये हों। वैसे भी कई बार यह आरोप लगते ही रहे हैं कि कई जजों के रिश्‍तेदार वकालत में लिप्‍त हैं और उनके जजों के प्रभाव के चलते ही उन वकीलों की प्रैक्टिस फलती-फूलती रहती है। कई बार तो विभिन्‍न मंचों से ऐसे जजों और उनके रिश्‍तेदारों की सूची तक सार्वजनिक हो चुकी है।

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पत्रकार

मगर उधर दूसरी ओर सवाल यह भी उठता है कि अगर यह सब बातें सच हैं तो इन सब तथ्यों की जांच के लिये केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। वैसे भी जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा आइबी द्वारा दी गई गोपनीय रिपोर्ट भी होती है जिसके आधार पर ही हर एक वकील का बैकग्राउंड चेक किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है की जब ये सारी प्रक्रिया अभी चल ही रही थी, तो ऐसे में इस अंग्रेजी अखबार को क्या जरूरत पड़ी ऐसी खबर छापने की?

इसको लेकर कई संशय और आरोप भी उठने लगे हैं। सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या ये किसी के इशारे पर हो रहा है?

एक विश्‍वस्‍त सूत्र यह सवाल उठाते हैं कि जिन जजों पर बातचीत इस अखबार ने छेड़ी है, उसका स्रोत क्‍या है। क्‍या यह सूचना हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा तैयार की गयी है। और अगर हां, तो फिर वह गोपनीय जानकारी कैसे सार्वजनिक हो रही है। सूत्र बताते हैं कि कोलोजियम को शामिल किये जाने वाले वकीलों के नामों की लिस्‍ट गोपनीय तोर पर सीलबंद लिफाफे होकर ही सुप्रीम कोर्ट को भेजी है। फिर क्‍या ऐसी ही कोई सूची इस अखबार के हाथों कैसे लग गई? क्या जजों की नियुक्ति को लेकर कोई राजनीति चल रही है? अगर ऐसी राजनीति चल भी रही है तो क्या किसी प्रतिष्ठित अखबार को इसका हिस्सा बनना चाहिये?

एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता का सवाल यह है कि:- क्या ये सुपाड़ी जर्नलिस्म नही हैं?

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लर्नेड वकील साहब

चित्‍त-निर्मल कर गयी सहवाग की क्षमा-याचना

: केरल में सांप्रदायिक बढ़ा देने वाली एक टिप्‍पणी को न केवल हटाया, बल्कि सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी : क्रिकेट-प्रशंसकों के भगवान हैं सहवाग, ट्विटर पर हैं 1.6 करोड़ फॉलोअर : क्रिकेट या फिल्मी लोगों भी दूसरे क्षेत्रों पर राय रखने का पूरा हक है, लेकिन सतर्कता जरूरी :

रामचंद्र गुहा

नई दिल्‍ली : मैं अमूमन इतिहास और राजनीति पर टिप्पणियां करता रहता हूं, पर मैं एक क्रिकेट लेखक भी हूं। ज्यादातर मौकों पर मेरा पेशा और मेरा जुनून दो ध्रुवों पर होते हैं, मगर कभी-कभार वे आपस में टकराते भी हैं।

ऐसा ही एक मौका 24 फरवरी को आया, जब मैंने ट्विटर पर देखा कि वीरेंदर सहवाग ने केरल में हुए एक नफरत-प्रेरित अपराध के बारे में आधा सच बताया। वहां मधु नामक एक लड़के को हिंदू और मुस्लिमों की एक मिली-जुली जमात ने बुरी तरह पीटा था। अपराधियों के नाम पहले से ही कई अखबारों और ट्विटर पर उजागर हो गए थे। फिर भी, सहवाग ने दो मुस्लिम नाम चुने, उन्हें पीड़ित हिंदू के नाम से जोड़ा और घटना को ‘सभ्य समाज के लिए शर्मनाक’ घोषित कर दिया।मैं सहवाग की बैटिंग का महान प्रशंसक रहा हूं। जब उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया गया था, तब मैंने उनकी प्रशंसा में अपनी शैली से इतर एक काव्यात्मक ‘कॉलम’ भी लिखा था।

मगर उनके उस ट्वीट ने मुङो काफी निराश किया। ऐसा महज इसलिए नहीं कि उन्होंने ‘सेलेक्टिव’ रुख अपनाया था, बल्कि इसलिए कि हरियाणा के नफरत-प्रेरित अपराधों पर उनकी चुप्पी बरकरार थी, जबकि वहां पर वह अपना स्कूल भी चलाते हैं। लिहाजा मैंने उनकी भूल को लेकर ट्वीट किए और लिखा, ‘अगर सहवाग में थोड़ी सी भी इंसानियत है, तो उन्हें अपना ट्वीट हटा लेना चाहिए’। ट्विटर पर सहवाग के करीब 1.6 करोड़ फॉलोअर हैं। जाहिर है, इनमें से कई के लिए उनके शब्द अक्षरश: सत्य होंगे। मैं परेशान था कि क्रिकेट की उनकी यह प्रसिद्धि सांप्रदायिक तनाव को हवा दे सकती है। इसलिए खुद ट्वीट करने के अलावा मैंने वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को सहवाग की इस गंभीर गलती के बारे में बताया।

राजदीप के ट्वीट करने के बाद सहवाग ने एक माफीनामा लिखा कि उन्हें गलत जानकारी मिली थी। मगर वह मूल ट्वीट उसी तेवर में तब भी मौजूद था। बाद में, राजदीप की गुजारिश के बाद सहवाग ने उसे डिलीट किया।20वीं सदी की शुरुआत में मैनचेस्टर गाजिर्यन के महान संपादक सीपी स्कॉट ने कहा था, ‘टिप्पणी स्वतंत्र होती है, पर तथ्य अक्षय होते हैं’। मगर 21वीं सदी में इस सिद्धांत को हर क्षण सोशल मीडिया पर तार-तार किया जाता है। ट्रॉल करने वाले और खास विचारधारा के लोग तो जान-बूझकर हर वक्त झूठ परोसते रहते हैं, पर नाम व उपलब्धि कमा चुके लोगों को उच्च मानक का पालन जरूर करना चाहिए। बेशक एक नागरिक होने के नाते क्रिकेटरों या फिल्मी कलाकारों को भी अपने क्षेत्र से इतर बातें रखने का पूरा हक है, लेकिन भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव जैसे मसलों पर अपनी राय जाहिर करने से पहले उन्हें यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तथ्य सही हों और बिना किसी भेदभाव के लोगों के सामने परोसे गए हों। (क्रमश:)

( क्षमा-याचना से चित्‍त निर्मल कर देने वाले इस आलेख का पहला हिस्‍सा आप गतांक में पहले ही पढ़ चुके हैं। अब इस आलेख का दूसरा और अंतिम हिस्‍सा अगले अंक में पढि़येगा। क्रमश:- जाफरी-बेटियों को निर्वस्त्र कर फूंका गया, झूठ लिखा था अरूंधति ने )

बहु-आयामी प्रतिभा के स्‍वामी रामचंद्र गुहा का नाम देश में चोटी के इतिहास-लेखकों में गिना जाता है।

जाफरी-बेटियों को निर्वस्त्र कर फूंका गया, झूठ लिखा था अरूंधति ने

: ‘हम सब सन्न और स्तब्ध हैं। हम सभी भाई-बहनों में सिर्फ मैं भारत में रह रहा हूं.. मेरे भाई व बहन अमेरिका में रहते हैं.’ : अहमदाबाद दंगे पर साफ झूठ लिखा अरूंधति राय ने : कोई आपकी गलती बताए, तो अच्छा यही है कि उसे सुधारें और माफी मांग लें :

रामचंद्र गुहा

नई दिल्‍ली : ( क्षमा-याचना से चित्‍त निर्मल करने वाले इस आलेख का पहला हिस्‍सा आप गतांक में पहले ही पढ़ चुके हैं। अब इस आलेख का दूसरा और अंतिम हिस्‍सा पढि़ये)

वीरेंदर सहवाग के प्रसंग ने मुझे एक पुरानी घटना याद दिला दी। उसमें एक सेलिब्रिटी ने अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए आधा-अधूरा सच नहीं, बल्कि सरासर झूठ बोला था। वह वाकया साल 2002 में गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद हुआ था। उस हिंसा में हजारों मुस्लिमों के साथ पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी मारे गए थे। जब अहमदाबाद में उनके घर को हिंसक भीड़ ने घेर लिया था, तब उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं को मदद के लिए फोन किया। मगर उन्हें सहायता नहीं मिली और सोसायटी में रहने वाले अन्य तमाम लोगों के साथ वह भी भीड़ की भेंट चढ़ गए।

दंगा थमने के बाद उपन्यासकार अरुंधति राय ने उन पर एक लेख लिखा। उन्होंने लिखा था कि भीड़ ने सांसद को मारने से पहले ‘उनकी बेटियों को निर्वस्त्र किया और जिंदा जला दिया’।

ये तथ्य बिना पुष्ट किए लिखे गए थे, जिस पर सर्वप्रथम ऐतराज जाफरी के बेटे ने जताया। उन्होंने लिखा, राय के लेख को पढ़ने के बाद । ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘हम सभी भाई-बहनों में सिर्फ मैं भारत में रह रहा हूं.. मेरे भाई व बहन अमेरिका में रहते हैं..’।

साल 2002 के फरवरी व मार्च में गुजरात में हुए दंगे वाकई बहुत भयानक थे। अंग्रेजी मीडिया ने उसकी खूब (और संवेदनशीलता से) रिपोर्टिग की थी। तब राज्य और केंद्र, दोनों जगह भाजपा की सरकारें थीं और वह रक्षात्मक मुद्रा में आ गई थी। मगर राय की अपुष्ट लेखनी ने उसे जवाबी हमला करने का मौका दे दिया। पार्टी के नेता कहने लगे कि मीडिया नए तथ्यों को ‘गढ़कर’ सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में दिलचस्पी ले रहा है। एक बड़े नेता ने तो यह भी कहा कि राष्ट्रवादी तत्वों को गलत रूप में चित्रित करने के लिए लेखक कल्पनाशीलता का सहारा ले रहे हैं।

बहरहाल, लेख छपने के तीन हफ्ते के बाद अरुंधति राय ने माफी मांग ली।

सहवाग सौभाग्यशाली थे कि जब उन्होंने यह गंभीर गलती की, तो ट्विटर जैसा मंच अस्तित्व पा चुका था, इसीलिए वह संभल सके। मुङो उम्मीद है कि सहवाग प्रकरण पर वे तमाम अन्य सेलिब्रिटी भी ध्यान देंगे, जिन्होंने अपने क्षेत्र में मुकाम हासिल कर लिया है और इतर विषयों पर टिप्पणी करने की इच्छा रखते हैं। यदि वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं या नजरअंदाज करते हैं, फिर चाहे वह जान-बूझकर किया गया हो या अज्ञानता में, तो वे न सिर्फ अपनी छवि खराब करते हैं, बल्कि देश के नाजुक सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

यह तो सहवाग प्रकरण का पहला सबक है। दूसरा सबक यह कि अगर कोई आपकी गलती बताए, तो अच्छा यही है कि उसे सुधारें और माफी मांग लें। मुझे कुछ संतोष हुआ, जब सहवाग ने आंशिक माफी मांगी, पर खुशी तब मिली, जब दूसरे के दबाव में ही सही, उन्होंने उस ट्वीट को हटा लिया।

गलती करना इंसानी फितरत है, पर हमारे कुछ फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और सबसे ऊपर राजनेताओं को यह लगता ही नहीं कि वे कभी गलती भी करते हैं। गलती बताने के बाद सहवाग ने जो किया, वह उन्हें याद रखना चाहिए। ऐसा करना उन्हें और मानवीय ही नहीं, अधिक से अधिक पसंदीदा भी बनाएगा। ( समाप्‍त )

बहु-आयामी प्रतिभा के स्‍वामी रामचंद्र गुहा का नाम देश में चोटी के इतिहास-लेखकों में गिना जाता है।

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