Meri Bitiya

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मेरा कोना

बुढापे में सठियाया या डिसैटिस्फैक्शन बढ़ जाता है, क्‍या वाकई ?

: पढि़ये, धारणाओं-मान्‍यताओं पर आपकी आंख खोल देगा यह लेख : लेफ्ट ब्रेन और कुछ राईट ब्रेन वालों का क्‍या मसला है : थॉमस स्मिथ की पुस्तक 'सक्सेसफुल ऐडवरटाइजिंग' ने लोगों की धारणाओं पर गम्‍भीर काम किया :

हनुमानचंद जैन

हुबली : हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो इस तथ्य के प्रति आश्वस्त हैं कि मनुष्य अपने 10% मस्तिष्क का ही प्रयोग कर पाता है ?

कितने ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि कुछ लोग लेफ्ट ब्रेन और कुछ राईट ब्रेन वाले होते हैं ?

कितनों को लगता है कि अल्फ़ा स्टेट एक गहन आराम की अवस्था होती है ?

कितनों को लगता है कि मोजार्ट या फ़िर कुछ विशेष तरह के संगीत उनकी बुद्धिमत्ता को बढ़ा सकते हैं ?

कितनों को लगता है कि जिंकगो या इस तरह की दूसरी औषधियों के सेवन से आपकी बुद्धिमता बढ़ सकती है ?

हममें से कितने लोग इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि हमनें आजतक जो कुछ भी देखा या महसूस किया है वो सभी कुछ हमारे दिमाग में एक वीडियो की तरह स्टोर है, भले ही हम उसे एक्सेस न कर पाते हों ?

इसके साथ ही कितने लोग मानते हैं कि मनुष्य में केवल पाँच तरह के सेंस होते हैं ?

या फ़िर कितनों को लगता है कि कम रोशनी में पढ़नें से आँखें कमजोर हो जाती हैं ?

हममें से कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें लगता है कि लोग बुढ़ापे में सठिया जाते हैं या उनमें डिसैटिस्फैक्शन बढ़ जाता है ?

अच्छा कितनों को लगता है कि आइंस्टीन को डिस्लेक्सिया था ?

शायद आप इस तथ्य पर विश्वास न कर पाएं लेकिन ये सभी बातें जो ऊपर लिखी हैं वह सभी केवल और केवल एक भ्रम हैं. आपके मन में ये सभी भ्रम केवल इसलिए बैठे हैं क्योंकि ये सभी बातें आपने तथ्य के तौर पर अलग अलग समाचार पत्रों में, कई सारे आर्टिकल्स में, टीवी में और यहाँ तक की कई सारी किताबों में पढ़े हैं. और यहीं सबसे पढ़कर कई लोगों नें आपको बताया भी होगा. मनोविज्ञान में इसे Illusory Truth Effect कहते हैं, जिसका कारण होता है रेपिटेशन यानी दोहराव.

जब कोई चीज आपको बार बार बतायी जाती है तब वो चीज आपको सच लगने लगती है, भले ही सच्चाई से उसका दूर दूर तक कोई नाता ही न हो. इसी तथ्य का प्रयोग करते हुए टेलीविजन में विज्ञापन बार बार दिखाए जाते हैं. यह उसी दोहराव का ही नतीजा होता है कि जिस प्रोडक्ट का विज्ञापन बार बार आता है उसके बारे में लोगों में एक आम राय बन जाती है कि यह प्रोडक्ट बहुत बढ़िया है. मैंने इस पोस्ट के अंत में खासकर विज्ञापन के लिए ही थॉमस स्मिथ की पुस्तक 'सक्सेसफुल ऐडवरटाइजिंग' का एक अंश लगाया है, उसे पढ़कर आप इस Illusory Truth Effect and Processing Fluency Miracle को अच्छे से समझ सकते हैं कि यह किस तरह से काम करता है. जब कोई कंपनी इस इफ़ेक्ट का प्रयोग करके आपको अपना प्रोडक्ट तक बेंच सकती है, तो आप इसकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं. आप इन सभी बातों को न्यूज़ में बार बार दिखाई जाने वाली ख़बरों से, ढ़ेर सारे मिथकों जैसे चेचक का देवी से कनेक्शन, बिल्ली का रास्ता काटना इत्यादि से आसानी से जोड़ सकते हैं और समझ सकते हैं कि क्यों कोई ऐसी बात राष्ट्रीय मुद्दा बन जाती है जैसी सैकड़ों बातें हर रोज घटित होती हैं, क्यों कोई नेता झूठे प्रचार के दम पर चुनाव जीत जाता है, क्यों इतने ढ़ेर सारे मिथक देशव्यापी हो जाते हैं.

मैं इस भ्रम को दूर करने के लिए ये सब नहीं लिख रहा, न ही ऊपर लिखी हर बात का स्पष्टीकरण लिखने जा रहा हूँ, मेरा उद्देश्य उस मनोविज्ञान को स्पष्ट करने की कोशिश करना था जिसके तहत ये सभी भ्रम आपके मन में बैठे हैं.

आप चाहें तो ऊपर लिखी हर बात के स्पष्टीकरण के लिए गूगल की शरण में जा सकते हैं मगर सतर्क रहें, वहाँ भी आपको अधिकतर लेख ऐसे ही मिलेंगे जिनमें तथ्य के तौर पर उपरोक्त बातें ही प्रयोग की जायेंगीं क्योंकि ये सभी विश्वव्यापी भ्रम हैं. मैंने ऊपर अंग्रेजी शब्द जानबूझकर इसलिए लिखे हैं ताकि इस मनोविज्ञान के बारे में ज्यादा समझने की इच्छा रखने वाले जीव उन कीवर्ड्स का प्रयोग करके आसानी से गूगल से जानकारी माँग सकें.

यह सब आज इसलिए लिखा क्योंकि दो तीन दिन के घटनाक्रम मुझे इसपर लिखने के लिए उत्तेजित कर रहे थे, समयाभाव में कल इसपर पढ़कर जानकारियाँ जुटायीं और आज लिखा। एक और विषय है जिसपर लिखने का मन कर रहा है वह है, मनुष्य का वो स्वभाव जिसके तहत जब उसके भ्रमों का सच्चाई से सामना होता है, तब वह उस भ्रम को नहीं मिटा पाता और ज्यादा पढ़ा लिखा हो तो सच्चाई को भी नहीं झुठला पाता और ऐसी स्थिति में वो एक नयी कहानी गढ़ता है जो किसी तरह दोनों बातों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती है. और मनुष्य का वो स्वभाव जिसके तहत किसी विशेष विषयवस्तु में अपनी धारणा बना चुके लोगों के सम्पर्क में जब कोई विपरीत तथ्य सामने आता है तो वे उसमें सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते हैं.

जैसे किसी विशेष पार्टी के समर्थक के पास जब कोई पार्टी विरोधी तथ्य सामने आता है, तो वह उसे स्वीकार नहीं पाता और उसमें अच्छाई ढूंढ़ने या उन्हें बचाने का प्रयत्न करता है, जबकि ऐसा ही तथ्य जब किसी विशेष पार्टी के विरोधी के पास आता है तो वह उसमें और भी ज्यादा कमियाँ ढूंढ़कर उसे और बुरा बनाने की कोशिश करता है.और अधिकतर मामलों में दिल के अच्छे लोगों के साथ यह स्वतः होता है, वह ऐसा करते नहीं. यानी अगर जिस पार्टी के बारे में वह पहले से कोई विचारधारा बना चुके हैं कि वह पार्टी अच्छी नहीं है तो उसका कोई अच्छा काम भी उसे नहीं पसन्द आता, और अगर उससे थोड़ी सी कॉमन मिस्टेक भी हो जाती है तो वो उसे बहुत ही बड़ी लगने लगती है. जबकि यही घटना अगर उसके समर्थन वाली पार्टी के साथ होती है तो वह उसे इग्नोर कर देता है

तो ये सब क्यों होता है और इसका क्या मनोविज्ञान है ???

झारखंड के पूर्व चीफ सेक्रेट्री सजल का जेल में विक्षिप्‍त होने का मतलब

: नीरा यादव, एपी सिंह के बाद अब झारखंड के चीफ सजल कुमार : नीरा और अखंड की छीछालेदर से हर्ष, मगर सजल की दुर्गति ईमानदार और सज्‍जन की होने से दुख की लहर : नौकरशाहों को भी अपने रवैये में बदलाव नहीं किया तो हालात लगातार नये-नये  शर्मनाक मोड़ तक पहुंचते जाएंगे :

श्‍वेतपत्र संवाददाता

रांची : चारा घोटाले में सजा पाए रिटायर आईएएस, झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती की इस हालत पर सबके विचार अलग हो सकते हैं। पर मेरा मानना है कि एक अभियुक्त ही सही, लेकिन शारीरिक तौर पर लाचार व्यक्ति की इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? अगर अदालत में यह हाल है तो जेलों में क्या होता होगा? अगर अभियुक्त और अपराधी के कोई अधिकार नहीं हैं और जिसकी लाठी उसकी भैंस ही होना है तो हम कैसी व्यवस्था में रह रहे हैं। देश में अदालतों की जो हालत है उसमें मुकदमा लड़ते या अपना बचाव करते हुए ही आदमी सजा से ज्यादा कष्ट भोग लेता है। इस कष्ट का कहीं कोई हिसाब नहीं है। अगर इसे प्राकृतिक न्याय माना जाए तो अदालतों में क्या होता है?

यह राय है दिल्‍ली के पत्रकार संजय कुमार सिंह की। संजय ने यह राय अपनी वाल पर दर्ज की है। मगर पत्रकार राय तपन भारती ने इस पूरे काण्‍ड पर पूरा पोथन्‍ना लिख मारा है। उन्‍होंने सजय के मसले पर कई सवाल उठाये हैं, मगर साथ ही साथ सजल की सरलता का बखान भी किया है। हालांकि कई ऐसे मसले छोड़ दिये हैं तपन ने, जिसका कोई भी जवाब नहीं दिया गया है। तपन लिखते हैं कि संपन्न होने पर भी सजल ने ऐसा क्यों किया, सजा मिलने के बाद आईएएस की मानसिक हालत ठीक नहीं

तपन लिखते हैं:- सजल चक्रवर्ती, जो झारखंड कैडर के मशहूर आईएएस अफसर रहे, की ये तस्वीरें हमारे एक करीबी ने रांची से कल ही भेजी। वे झारखंड सरकार में मुख्य सचिव पद से रिटायर हुए। वे मिलनसार थे, पत्रकारों और तमाम संघर्षशील लोगों को सहयोग करते थे। पत्रकार होने के नाते मेरे भी उनसे 1984 से 1988 तक अच्छे संबंध रहे। कुछ वर्षों के लिए वे रांची में मेरे पिता के बास भी रहे। पिताजी डिप्टी कलेक्टर और सजल जिले के उपायुक्त यानी जिला कलेक्टर। पिताजी कहते थे, सजलजी एक नेक इंसान हैं और उन्होंने उनके साथ हमेशा अच्छा व्यवहार किया। पर इस फोटो से पता लगा कि चारा घोटाले के दो केस में 4-5 सजा मिलने के बाद से सजल आजकल मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गये हैं और दुर्भाग्यवश अनगिनत दोस्तों ने उनसे कन्नी भी काट ली है। हे ईश्वर यह कैसा न्याय है?

यह सत्य है कि आईएएस होने पर भी सजल की जिंदगी में खुशहाली कभी नहीं रही। उनकी शादी हुई पर जल्दी ही #तलाक हो गया। उदार स्वभाव होने के कारण उन्होंने बतौर जिला उपायुक्त चारा घोटालेबाजों से शायद एक-दो बार मुलाकात कर ली और अदालत ने इसी बात को संज्ञान में ले लिया। सीबीआई ने अदालत से कह दिया कि कुछ दोस्तों के कहने पर उन्होंने चारा घोटालेबाज से एक लैपटाप उपहार भी ले लिया। जबकि वे संपन्न परिवार से थे। आईएएस होने के नाते भी वेतन, भत्ते और तमाम सुविधाओं के हकदार थे।

चारा घोटाले में जब सजल चक्रवर्ती को सजा मिली तो मुझे बहुत दुख हुआ कि एक सज्जन आईएएएस अफसर रिटायर होने के बाद भी भ्रष्टाचार की सजा में जेल की चक्की पिस रहा है। अदालत के फैसले पर मुझे कुछ नहीं कहना। पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को विचार करना चाहिए कि बिना रकम बरामद हुए भी किसी को भ्रष्ट घोषित कर सजा दी जा सकती है?

पर सजल चक्रवर्ती को जीवन में यह जो सजा भोगनी पड़ रही है उससे उन अफसरों को संदेश मिलता है कि छोटे लालच या मित्रता में कानून तोड़ कर किसी की कोई मदद नहीं करो। नहीं तो उदार होने पर तुम्हारा भी सजल जैसा हाल होगा। अगर मेरी यह लाइन सजल चक्रवर्ती तक पहुंचे तो मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि दोषी नहीं होने पर भी जौ के साथ गेहूं कैसे पास्ता है सजल इसके ताजा उदाहरण हैं।

हाईकोर्ट: चला था पेपरलेस, हो गया ऑर्डरलेस

: हाईकोर्ट बार में बह रहे हैं जमीनी मसलों के चुनावी झोंके : लखनऊ बेंच में बिजली चोरी और वकीलों के चेम्बर के अलॉटमेंट को ले कर झौं-झौं : बिल्डिंग के निर्माण की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए कि नहीं, सवाल तो वाकई गंभीर हैं : पदाधिकारी लगे हैं जजों की चापलूसी में :

श्‍वेतपत्र संवाददाता

लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्‍डपीठ में वकीलों के संगठन यानी अवध बार एसोसियेशन को लेकर नेता वकीलों ने मैदान पर अपनी-अपनी ताल ठोंकनी शुरू कर दी हैं। अब चूंकि जीतने के लिए इसके पहले की कमेटी के कामकाज को खारिज करना होगा, पुराने पदाधिकारियों को नाकारा साबित करना पड़ेगा, और पुरानी व्‍यवस्‍थाओं को खारिज करते हुए नयी फलक पर खुद को स्‍थापित करना किसी भी चुनाव की फितरत और जरूरत भी होती है, ऐसे में अवध बार एसोसियेशन भी इसी रौ में दौड़-तैर रहा है। ताजा मामला है हाईकोर्ट के नये परिसर में वकीलों के चैम्‍बर और वहां हो रही बिजली की खपत का घोटाला और अराजकता।

बार में चुनाव में अपनी जमीन खोजने की कवायद अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने शुरू कर दी है। उनके आरोप भले ही शक-शुबहों पर अमान्‍य किये जाएं, लेकिन जो मसले उन्‍होंने सवाल उठाये हैं, उनकी ओर कोई भी सवाल फिलहाल अब तक नहीं दिया गया है। अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने अभी दो दिनों पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में वकीलों के चेम्बर के अलॉट्मेंट को ले कर एक प्रस्ताव OUDH BAR के पास भेजा है, ये अपने आप में वकीलों की स्थिति को बखान करने वाला है।

अमरेंद्र ने पूछा है कि HC की नयी बिल्डिंग में बिजली का जितना दुरुपयोग होता है वो किसी से छुपा नहीं है, यहाँ तो कोर्ट का चपरासी भी AC चला कर सोता है, हर कर्मचारी हो कोर्ट परिसर में, बाइथेने के लिए air conditioned space मिली हुयी है। सारी कोर्ट रूम chilled रहती हैं, पूरी रात हाई कोर्ट जगमग रहता है बिना बात के चारों तरफ lights जल रही होती हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य में ये ऐय्याशी! जितने gadgets कोर्ट में साहब लोगों के तरफ लेगे हैं और उन से जितनी बिजली की खपत होती है, क्या वो सब जुड़ीशियल functioning के लिए आवस्यक है? क्या इस के बिना dispensation ऑफ justice संभव नहीं है?

जब वकीलों के चेम्बर के अलॉट्मेंट की बात आई तो फिर वही राग, वकील pre-paid मीटर लगाएगा।

क्या railway station पर passenger pre-paid मीटर ले कर प्लैटफ़ार्म का उपयोग करता है, क्या customer pre-paid मीटर लगा कर बैंक में घुसता है?...........

और वकीलों के चेम्बर में खर्च होने वाली बिजली, हाई कोर्ट में कुल बिजली की खपत का कितना प्रतिशत होने वाला है? लग रहा है जैसे वकील बिजली चुरा के जेब और बस्ते में भर के घर ले जाएगा!

फिर किस न्यायपालिका का दायित्व पूरे HIGH COURT परिसर में फ्री un-interrupted पावर सप्लाइ प्रदान करने की नहीं है?

ऊपर से मुंसी लोग air-condition में बैठेंगे। सरकारी वकील भाई लोग भी air-condition में बैठेंगे, सारे जुड्ग साहब, सारा HIGH COURT स्टाफ, चपरासी, अर्दली, सफाई कर्मचारी सब के सब.......

हाँ कुछ गिने चुने व्हाइट कोलर वाले वकील भाई लोग भी (जिनके पास भरपूर पैसा है) air-condition में बैठेंगे ।

बस जो लोग बिजली का बिल अफफोर्ड नहीं कर सकते वो अंधेरे और गर्मी, में बैठ के client का इंतज़ार करें, और फिर सुरू होगा तथाकथित बड़े और छोटे वकील में अंतर दिखने वाली ब्यवस्था और फिर उसी के नाम पर दोहन शुरू.........

गांधीजी कोई भी कम करने से पहले, जिस अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचने की बात करते थे, वो बेचारा कहीं कोने में बैठा सब देख रहा है।

ये कैसी विडम्बना है प्रभु, ये HIGH COURT तो तो चला था paperless होने, और हो गया ORDER-LESS।

इसे कोई तो बचाये। बात अब अधिवक्ताओं के अस्तित्व की आ पड़ी है, ये न्यायपालिका सुविधाभोगी हो चली है, इसे केवल अपनी सुविधाओं की चिंता है। कोर्ट को mall of justice में बादल दिया, और लग रहा है की बिना 5 स्टार होटल की सुविधाओं के justice delivery संभव ही नहीं है। कोई पूछने वाला नहीं है की 1 साल के अंदर ही कोर्ट की दीवारों पर लगे पत्थरों को पेंच से कसने की जरूरत क्यों पड़ गयी, और क्या पत्थर को ड्रिल करने से पत्थर में दरार नहीं पड़ रही होगी, उस की भव्यता पर आंच नहीं आ रही है, क्या?, और इस बिल्डिंग के निर्माण की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए कि नहीं?, large scale corruption की बू आ रही है इसके निर्माण में कि नहीं?

हाँ एक वादकारी का पक्ष भी है, वो मारा कुचला निरीह प्राणी कि सुध लेने वाला कोई नहीं है, न उसके बैठने कि जगह है न खड़े होने कि और न ही उसके लिये कोई भी सुविधा। जनता के पैसे पर और जनता के नाम पर नंगा नाच चल रहा है।

ऐसे बना के रख दिया है कि जैसे, हम सब फिर से सामंतवादी व्यवस्था में आ गए हैं या फिर, फिरसे अंगराजों के गुलाम हो गए हैं, ये गुलामी के दौर की मानसिकता वाली जुडीसीयरी लगती है, जो हर तरह के सुविधाओं से लैस है, और उसका काम केवल और केवल शाशन और सत्ता के काले कारनामों पर मुहर लगा कर, न्याय का मौखल उड़ाना भर रह गया है।

एक आम आदमी, जो की किसी बड़े वकील या सीनियर वकील को afford नहीं कर सकता, उसकी सुनवाई में न्यायपालिका उदासीन लगती है। बेचारा छोटा वकील ...

सब चुप हैं, हस्तिनापुर का दरबार बना के रख दिया है और द्रोपदी की चीरहरण जारी है।

सुना है की पेंच लगाने का भी ठेका दिया गया है, माननीय लोगों के लिये क्रिकेट की पिच तैयार की गयी है, लोग अब क्रिकेट की प्रैक्टिस करेंगे और अपना कौशल चमकाएंगे। खबर है कि OUDH BAR ने भी क्रिकेट टूर्नामेंट करवाया है, (हो सकता है बार कि तरफ से पैसे भी लुटाये गए होंगे, कोई बात नहीं कोई भी चारण प्रथा को त्यागने को तैयार नहीं है), और न जाने क्या क्या है जो कोर्ट room के उस तरफ हो रहा है और जिसे सीआरपीएफ़ के पहरे में रखा जाता है, कितने ही किस्से कोर्ट कॉरिडॉर में सुनने को मिलते हैं। जाने क्या क्या ...

बार के पदाधिकारी चुन के बार के सदस्यों के लिये कुछ करने के बजाए अधिक से अधिक जजेस कि चाटुकारिता में लगे हुये हैं। मत भूलिए आप हमारे वोट से आए हैं।

मासिक धर्म अभिशाप नहीं। रचयिता हैं हम…

: We are the creators : -कक्षा 11 में एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मेरी सोच बदल दी : When my friend got her periods between the class, this is what I learnt :

साशा सौवीर

लखनऊ : Akshay Kumar..thanx

Thanks for the initiative you took and the courage you gathered to create a movie on such a sensitive issue (which is not actually, but in India it is).

Atleast you made us move a step forward towards our freedom.

Otherwise that useless fear of periods..its a silent killer.

Thankyou really for announcing it loud that those 8 pack of napkin is actually not a dynamite, so people no need to turn around and peep in our hands as we step out of the pharmacy.

I am really thankful Mr. Akshay Kumar..You proved again that you rule in our hearts. (Waiting eagerly for the movie)

Meanwhile, I would really like to share an incident which happened when I was in class 11th. A friend of mine had her periods between the class. Cramps began and she couldn’t handle. She burst out of tears and we were really really afraid by her reaction.

A female teacher then came and took her to the rest room.

We knew very well what actually happened (obviously, we suffer every single month).

The girl in her worse condition stressfully screamed, “it’s a curse. An injustice God has done. Why we girls??? Why not boys.”

Probably every girl on her first day murmer this…

A very senior teacher Preetilata Goswami ma’am then entered the room and called upon all the girls from 11 and 12 class.

She gave an off subject lecture, I still remember.

Goswami Ma’am said…

“Its not a curse my child. It’s a blessing. God has chosen us..we female for this blessing. We can give birth because of this process. Its absolutely not a curse.

God has chosen us to give birth..we give life…please realize the depth.

Remember..We are the creators.”

What words!!

Ma’am this is surely unforgettable. Thanks for the lesson.

-Sasha

( लखनऊ की रहने वाली लेखिका साशा सौवीर पत्रकार और चिंतक हैं)

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