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मेरा कोना

वरना दुनिया कहेगी, "मजबूरी का नाम शी जिनपिंग"

: फिलहाल तो विश्‍व कर रहा है कोर्निश, सम्राट शी जिनपिंग कहिए जनाब : नये चीनी समाजवाद की रूपरेखा है शी जिनपिंग थॉट : वीन का अब पहला कदम होगा दुनिया से अमेरिकी वर्चस्व को समाप्त कर स्‍वयं को विश्व का नेतृत्व करना :

विनोद कुमार पाण्डेय

इलाहाबाद : चीन में 12मार्च को एक बड़े संवैधानिक परिवर्तन को अंतिम रूप दिया गया। सही अर्थों में कहा जाय तो चीन अब तथाकथित जनवादी लोकतंत्र से एक औपचारिक अधिनायक तंत्र में तब्दील हो गया है। अभी जहां चीन पर कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था वहीं अब पार्टी महज एक ढांचा बन कर रह जाएगी।अब शी जिनपिंग को जीवन पर्यन्त चीन का महाराजाधिराज घोषित कर दिया गया है। अब उनकी प्रभुता को चुनौती देने के सारे रास्ते औपचारिक तौर पर बंद कर दिए गए हैं।

हाल ही में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पेश किया था जिसमें संविधान संशोधन के द्वारा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के दो कार्यकाल की संवैधानिक सीमा को समाप्त करने की मांग की गई थी।चीन की संसद ने  12 मार्च 2018 इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी, इसके साथ ही '"शी जिनपिंग थाट"को भी संविधान में शामिल कर दिया गया ।

चीनी समाजवाद के संसथापक माओत्से तुंग के बाद शी जिनपिंग पहले चीनी नेता हैं जिनकी विचारधारा को देश के संविधान में शामिल किया गया है। विश्लेषकों का कहना है कि शी को माओ के बराबर का दर्जा दिया गया है किंतु यह बात महज यहीं तक सीमित नहीं है ,मौजूदा परिस्थिति में इसके परिणाम स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।इन परिणामों में सबसे पहला तो यह है कि शी जिनपिंग माओ के अबतक सबसे ताकतवर उत्तराधिकारी बन कर सामने आए हैं बल्कि कई माईनों में माओ से भी ज्यादा ताकतवर हैं। माओ अपने समय में चीन के सबसे ताकतवर नेता जरूर थे किंतु तब चीन का दुनियां में इस कदर दबदबा नहीं था जैसा कि आज है ।जिस शी जिनपिंग थाट को संविधान में शामिल किया गया है उसमें एक नये चीनी समाजवाद की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है,जो दो चरणों में 2050 तक पूर्ण रूप में आयेगा। शी जिनपिंग की सभी योजनाओं और भाषणों में सबसे ज्यादा जिस बात का संकेत होता है वह यह कि चीन दुनियां की अगुवाई करेगा और अमेरिकी वर्चस्व को तोड़ेगा। आज के दौर में रूस की जगह चीन अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन

चुका है और यह उपलब्धि उसने अपनी आर्थिक शक्ति के द्वारा हासिल की है। माओ ने दशकों पहले शांतिपूर्ण उदय की जिस नीति को चुना था आज वह अपने शिखर पर नजर आ रही है। अब चीन वो सब करने के लिए अपने आप को तैयार कर रहा है जो विश्व में अमेरिकी वर्चस्व को तोड़े और उसकी जगह अपने आप को स्थापित करे। शी जिनपिंग एक बात को बार-बार दोहराते हैं कि हम विकासशील देशों सामने एक नया विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं । चीन ने काफी कुछ इस दिशा में किया भी है उसके द्वारा स्थापित New Development Bank जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान , सड़क और रेल परियोजनाएं उदाहरण के तौर पर हमारे सामने हैं।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि चीन में शी जिनपिंग की एकात्म सत्ता नये वैश्विक परिदृश्य की ओर संकेत करती है।अब चीन माओ की शांतिपूर्ण उदय की नीति से आगे सक्रिय वैश्विक महाशक्ति की नीति पर आगे बढ़ने के लिए तैयार हो रहा है। उसका भी लक्ष्य वही होगा जो पहले रूस का हुआ करता था , दुनियां से अमेरिकी वर्चस्व को समाप्त कर विश्व का नेतृत्व करना ।।किंतु महज आर्थिक और सैन्य शक्ति दम पर क्या यह संभव है ? शी जिनपिंग को इस प्रश्न का उत्तर अवश्य तलाशना ही होगा नहीं तो उनका भी हश्र वही होगा जो पहले रूस का हो चुका है।क्योंकि मजबूत अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति के बावजूद भी चीन चंद देशों के अलावा विश्व में अपनी स्वीकार्यता नहीं हासिल कर पा रहा है और जो चंद देश चीन के नजदीक हैं भी वो भी किसी न किसी मजबूरी के कारण हैं । चीन की सीमित स्वीकार्यता के पीछे मुख्य कारण उसकी विचारधारा और नीतियां ही हैं।

आज की दुनियां खुलेपन में जीने की आदी है,सरकारों में भी खुलापन और सहभागिता विश्वास की पहली शर्त मानी जाती है जो कि चीन तो क्या कोई भी कम्युनिस्ट देश पसंद नहीं करता है,इसके अलावा चीन की अपने पड़ोसियों के प्रति अपनायी जाने वाली दादागीरीरी की नीति भी एक बड़ी वजह है , क्योंकि चीन का किसी भी पड़ोसी मुल्क के साथ मधुर संबंध न होना साधारण बात नहीं है। इसलिए किसी भी देश के लिए "मजबूरी का नाम शी जिनपिंग" हो सकता है न कि स्वाभाविक आकर्षण।।

(लेखक विनोद कुमार पाण्डेय मिर्जापुर के पीआरपीजी महिला महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान विषय के सहायक प्रोफेसर हैं।)

मक्‍का में व्‍यापारियों से लूट, कत्‍लोगारत, और कुछ भी

: काफ़िरों ,मुशरिकोंऔर मुनाफिकों के खिलाफ जंग कर, उनकी गर्दनें उतारने का अभियान छेड़ा : मदीना में धर्म के लिए मोहम्‍मद ने विरोधियों पर युद्धक-कार्रवाइयां कीं : मुशरिकों ,मुनाफिकों व काफ़िरों को लड़ाई के बाहर भी मार दिया गया : इस्‍लाम - तीन :

राकेश कुमार मिश्र

लखनऊ : मक्का में रहते हुए पैगंबर मुहम्मद ने अपने नए धर्म का प्रचार पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीक़े से किया था ।वहाँ उन्हे व उनके नए धर्म को स्वीकार करने वालों को अपने कुनबे ,क़बीले के लोगों का भारी विरोध व उत्पीड़न सहना पड़ा किन्तु फिर भी उन्होंने सैन्य प्रतिरोध व राजनैतिक संगठन की कोई कोशिश नहीं की ।

मगर मदीने में पैगंबर मुहम्मद धार्मिक नेता के साथ एक कुशल सैन्य व राजनैतिक संगठन कर्ता की भूमिका में भी नज़र आते हैं ।अपने इस नए रूप में उन्होंने मक्का के अपने कुल -ख़ानदान के लोगों ,जिन्होंने मक्का में उनके धर्म के खिलाफ ,उनके व उनके अनुयायियों /मददगारों को हिजरत के लिए मजबूर किया था और मक्का में भी उनके ख़ात्मे की योजनाएँ बना रहे थे ,के खिलाफ लंबी और कामयाब जंगी कार्यवाही की । ६३२ ई में अपनी वफात के वक़्त तक मुहम्मद साहब मक्का तो फतेह कर ही लिया था ,समूचे अरब के कबीलों ने भी उनके नए धार्मिक सिद्धान्तों और राजनैतिक वरीयता को क़बूल कर लिया था ।

लगभग १० साल के सियासी और जंगी के दौर में पैगंबर ने मक्का के अपने ही क़ुरैश ख़ानदान के तिजारती कारवानों पर धावा( raid )मारी व लूट की कार्यवाही की ,मदीने के धनी यहूदियों और मक्का के अपने विरोधियों के खिलाफ भयानक लड़ाइयाँ लड़ीं जिनमें बन्दियों और दुश्मन का साथ देने वाले यहूदियों को क़त्ल सहित कड़ी सजाएं दी गईं ।इस दौर मे नाज़िल क़ुरान की आयतों मे काफ़िरों (अल्लाह को न मानने वाले ),मुशरिकों (अल्लाह की हस्ती में किसी दूसरे को शरीक मानने वाले )और मुनाफिकों (पाखंडी तथा अल्लाह व मुहम्मद को रसूलल्लाह न मानने वाले ईमान के कच्चे लोग )के खिलाफ जंग करने ,उनसे दोस्ती न रखने ,उनकी गर्दनें उतार लेने,वे जहाँ भी मिलें ,उनका क़त्ल करने ,तौबा करके नमाज़ क़ायम किए बिना न छोड़ने ,घात लगा कर हमला करने व मार देने की तथा और भी कठोर निंदात्मक व हिंसात्मक हिदायतें दी गई हैं । वफात के तक़रीबन १७० साल बाद लिखी गई पैगंबर की जीवनी में भी ऐसे वाकये दर्ज किए गए हैं जिनमें बजात ख़ुद या उनके हुक्म की तामील में मुशरिकों ,मुनाफिकों व काफ़िरों को लड़ाई में या बाज़ दफ़ा लड़ाई के बाहर भी मार दिया गया व उनकी ज़मीन ,जायदाद से महरूम किया गया ।

क़ुरान की ऐसी ही मदीनवी आयतों और सीरा(पैगंबर की जीवनी )के ऐसे ही वाकयों के आधार पर अकसर ग़ैर मुस्लिम ही नहीं ऐसे मुस्लिमों के भी खिलाफ जो मज़हब के सियासी जंगी इस्तेमाल के खिलाफ हैं ,अमन पसंद हैं और गैर मुस्लिमों के साथ भाई चारे के हामी हैं ;पवित्त्र युद्ध (holy war)के ऐलान किए जाते हैं ,ज़ोर ज़बर्दस्ती इसलाम क़बूल कराया जाता है तथा खूंरेजी व दहशतगर्दी के ज़रिए मज़हबे इसलाम को शर्मसार किया जाता है । (क्रमश:)

राकेश कुमार मिश्र का यह कर्मकाण्‍ड नुमा यह लेखन लगातार क्रमश: और जारी है। इस की बाकी कडि़यां पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बहस-ऑन-इस्‍लाम

( इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में विज्ञान विषय से पढ़े और प्रशासनिक सेवा में लम्‍बे समय तक लोक-प्रशासन में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं राकेश कुमार मिश्र। बेहद सरल, हंसमुख, और आडम्‍बरहीन भी। पीसीएस से आईएएस बनने के बाद वे यूपी के गृह सचिव पद से सेवानिवृत्‍त हुए। सतत अध्‍ययन करना, चर्चा करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। गजब चरित्र-गाथा प्रचलित है उनके बारे में। कभी कुछ लोग उन्‍हें संघी-भाजपाई बताते हैं, तो उनके कालेज के जूनियर-सीनियर लोग उन्‍हें वामपंथी कह कर आर्तनाद करते हैं। राकेश मिश्र फिलहाल इस्‍लाम को एक नये अंदाज में मगर रोचक अंदाज में पढ़ने-समझने और लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है कि यह उनका यह काम खासा खतरनाक भी है। )

हीरा-गुफ़ाओं में मोहम्‍मद को मिलते थे अल्लाह के संदेश

: बुतपरस्ती ,नशा ,जुआ ,सूद खोरी ,ग़ुलामों व औरतों के साथ बद सलूकी आदि बुराइयों की मुखालिफ़त : मक्का के लोगों को ख़तरा महसूस होने लगा मुहम्मद से, वे उनकी जान के दुश्मन बन गये : मोहम्‍मद ने सैनिक व राजनैतिक नेतृत्व भी अख़्तियार किया इस्‍लामी अभियान में : इस्‍लाम -दो :

राकेश कुमार मिश्र

लखनऊ : मुहम्मद साहब ने ६०९-१० ई में अरब के मक्का शहर से इसलाम की शुरुआत की ।उनका दावा था कि हीरा की गुफ़ाओं में उन्हें जिब्रील फ़रिश्ते के ज़रिए अल्लाह के संदेश मिलते है जिन्हें वे अल्लाह के हुक्म के तहत लोगों तक पहुँचा रहे हैं ।उन्होंने ख़ुद को अल्लाह का आख़िरी रसूल बताया ।इन संदेशों में यह बताया जा रहा था कि अल्लाह एक मात्र ईश्वर है ,उनकी जात में किसी दूसरे को शामिल नहीं किया जा सकता और मुहम्मद उनके रसूल हैं ।इसलाम में तौहीद का सिद्धान्त यही है ।

इसके अलावे मुहम्मद ने बुतपरस्ती ,नशा ,जुआ ,सूद खोरी ,ग़ुलामों व औरतों के साथ बद सलूकी आदि बुराइयों की ख़िलाफ़त की तथा ग़रीबों व बेसहारा लोगों की मदद के लिए ज़कात (दान )देने पर ज़ोर दिया । धीरे धीरे मुहम्मद के इन संदेशों को मंज़ूर करने वालों की तादाद बढ़ती गई और इसलाम एक लोकप्रिय आंदोलन बन गया जिससे मक्का के ताक़तवर लोगों को ख़तरा महसूस होने लगा और वे मुहम्मद व उनके संदेश पर ईमान लाने वालों की जान के दुश्मन बन गए ।अन्तत:६२२ ई में मुहम्मद व उनके तमाम अनुयायियों ने मक्का छोड़ कर याथ्रिब (नबी का शहर मदीना )चले गए ।इस घटना को इसलाम के इतिहास में ‘हिजरत ‘के नाम से जाना जाता है ।

मदीने में भी मुहम्मद व उनके अनुयायियों के खिलाफ मक्का के उनके दुश्मनों ने अपनी साज़िशें व हमले जारी रखे जिसके कारण मजबूर होकर मुहम्मद ने उनके नए धर्म इसलाम पर ईमान लाने वालों के धार्मिक नेता की भूमिका के साथ साथ सैनिक व राजनैतिक नेतृत्व भी अख़्तियार किया और मक्का व अरब के उन लोगों के खिलाफ जंग लड़ी जो उनके व उनके साथियों पर हमलावर थे और उन्हें नेस्त नाबूद करने के लिए आमादा थे । (क्रमश:)

राकेश कुमार मिश्र का यह कर्मकाण्‍ड नुमा यह लेखन लगातार क्रमश: और जारी है। इस की बाकी कडि़यां पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बहस-ऑन-इस्‍लाम

( इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में विज्ञान विषय से पढ़े और प्रशासनिक सेवा में लम्‍बे समय तक लोक-प्रशासन में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं राकेश कुमार मिश्र। बेहद सरल, हंसमुख, और आडम्‍बरहीन भी। पीसीएस से आईएएस बनने के बाद वे यूपी के गृह सचिव पद से सेवानिवृत्‍त हुए। सतत अध्‍ययन करना, चर्चा करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। गजब चरित्र-गाथा प्रचलित है उनके बारे में। कभी कुछ लोग उन्‍हें संघी-भाजपाई बताते हैं, तो उनके कालेज के जूनियर-सीनियर लोग उन्‍हें वामपंथी कह कर आर्तनाद करते हैं। राकेश मिश्र फिलहाल इस्‍लाम को एक नये अंदाज में मगर रोचक अंदाज में पढ़ने-समझने और लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है कि यह उनका यह काम खासा खतरनाक भी है। )

एक नौकरशाह जुटा इस्‍लाम का छिद्रान्‍वेषण करने

: इस्लाम अपने बुनियादी रूप में अन्य धर्मों की तुलना में कहीं ज़्यादा सरल ,सुगम ,सादा और समता मूलक धर्म : राकेश मिश्र ने पहले ही साफ कर दिया कि ईश्वर या किसी रूप में दैवीयता ,देव दूत ,पैगंबर ,अवतार ,दैवी किताबों पर उन्‍हें तनिक भी यक़ीन नहीं : इस्लाम -एक :

राकेश कुमार मिश्र

लखनऊ : इस्लाम अपने बुनियादी रूप में अन्य धर्मों की तुलना में कहीं ज़्यादा सरल ,सुगम ,सादा और समता मूलक धर्म है ।

इस्लाम की अनिवार्य मान्यताएं सिर्फ़ निम्न हैं :

1 .कलमा -ला इलाहा इल अल्लाह ,मुहम्मदुर्रसूलल्लाह -यह विश्वास कि ईश्वर एक है ,उसके अलावे दूसरा कोई ईश्वर नहीं और मुहम्मद ईश्वर के संदेशवाहक हैं ।

2 .नमाज -ईश्वर की रोज़ाना ५ बार प्रार्थना ।

3 . ज़कात -आमदनी काराई फ़ीसद का दान ।

4 .रोजा - रमज़ान के महीने में दिन का उपवास ।

5 .हज -समर्थ होने पर मक्का की यात्रा ।

इस्लाम ईश्वर और मनुष्य के बीच किसी मध्यस्थ का प्राविधान नहीं करता है और न ही विस्तृत कर्मकांडों व पुरोहित तंत्र का प्राविधान करता है ।इस्लाम न ही ब्रह्मचर्य व घर बार छोडकर सन्यासी जीवन का आदर्श पेश करता है ।इस्लाम के मुताबिक़ मस्जिद सिर्फ़ इबादत के लिए मुस्लिम समुदाय के इकट्ठा होने की जगह है ,हिन्दू मन्दिरों या ईसाई गिरिजाघरों की तरह मस्जिद किसी दैवीयता का इज़हार करने वाले स्थान नहीं हैं और न ही स्रद्धालुओं से चढ़ावा प्राप्त करने के केन्द्र हैं ।

क़ुरान इस्लाम की पवित्र किताब है जो कि प्रत्येक मुस्लिम के मार्गदर्शन के लिए सुलभ है । यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि कोई मुस्लिम क़ुरान समझने के लिए किसी दूसरे की व्याख्या का मोहताज हो ।

क़ुरान में मुस्लिम समुदाय के लिए धार्मिक राज्य स्थापित करने का कोई निर्देश नहीं है और न ही दार उल हर्ब (land of non Islamic faith ),दार उल इस्लाम (land of Islam )की कोई अवधारणा है । ग़ैर इस्लामी धर्म ,संस्कृतियों के मुल्कों पर हमला करने या ज़ोर ज़बर्दस्ती ग़ैर मुस्लिमों को इस्लाम क़बूल करने के लिए मजबूर करने के लिए भी कोई हिदायत नहीं दी गई है ।

इन अनिवार्य मान्यताओं ,अवधारणाओं और हिदायतों से साफ़ है कि बुनियादी इस्लाम धर्म व उसके मानने वालों के दूसरे धर्मों व उनके मानने वालों से टकराव की गुंजाइश न के बराबर है ।

इस्लाम के विनम्र विद्यार्थी के रूप में मैंने इस्लाम के बाबत अपनी राय व समझ पेश की है । मुमकिन है कि मेरी राय व समझ दोषपूर्ण हो । ऐसे विद्वान गैर मुस्लिम मित्र जो इस्लाम से नफ़रत के किसी पूर्वाग्रह से मुक्त हैं और विद्वान मुस्लिम मित्र मेरी समझ अगर दोषपूर्र्ण पाएँ तो ज़रूरी संदर्भों के साथ दुरुस्त कर दें ,ख़ुशी होगी ।

हाँ ,स्पष्ट करता हूँ कि ईश्वर या किसी रूप में दैवीयता ,देव दूत ,पैगंबर ,अवतार ,दैवी किताबों पर मेरा अपना कोई यक़ीन नहीं है । यह पोस्ट मैंने सिर्फ़ अकादमिक नुक्तेनजर से लिखी है । (क्रमश:)

राकेश कुमार मिश्र का यह कर्मकाण्‍ड नुमा यह लेखन लगातार क्रमश: और जारी है। इस की बाकी कडि़यां पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बहस-ऑन-इस्‍लाम

( इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में विज्ञान विषय से पढ़े और प्रशासनिक सेवा में लम्‍बे समय तक लोक-प्रशासन में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं राकेश कुमार मिश्र। बेहद सरल, हंसमुख, और आडम्‍बरहीन भी। पीसीएस से आईएएस बनने के बाद वे यूपी के गृह सचिव पद से सेवानिवृत्‍त हुए। सतत अध्‍ययन करना, चर्चा करते रहना उनकी दिनचर्या में शामिल है। गजब चरित्र-गाथा प्रचलित है उनके बारे में। कभी कुछ लोग उन्‍हें संघी-भाजपाई बताते हैं, तो उनके कालेज के जूनियर-सीनियर लोग उन्‍हें वामपंथी कह कर आर्तनाद करते हैं। राकेश मिश्र फिलहाल इस्‍लाम को एक नये अंदाज में मगर रोचक अंदाज में पढ़ने-समझने और लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है कि यह उनका यह काम खासा खतरनाक भी है। )

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