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मेरा कोना

बिरादरी के लोगों के लिए न वकील जूझते हैं, न पत्रकार

: प्रिंस लेनिन के मामले में वकील खामोश बैठे हैं, जैसे जागेंद्र सिंह हत्‍याकांड में पत्रकारों ने कान में तेल डाल रखा था : बात-बात पर हंगामा करने वाला अधिवक्‍ता समुदाय पिछले एक महीने से खामोश है :  लेनिन ने जागेंद्र का मामला सम्‍भाला था, मैं भी लेनिन के मामले में जुटा हूं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बधाई दोस्‍तों। अब आप चाहे वह वकील हों या फिर पत्रकार, आपकी कार्यशैली और आपका कार्य-चरित्र चूंकि एक-समान है, इसीलिए ही मैं आप सभी को आपकी इस समानता के लिए बधाई देना चाहता हूं। लेकिन हैरत की बात है कि आप दोनों ही समुदाय-प्रवर दुनिया की बात भले ही भारी-मोटी लन्‍तरानियां फेंका-छौंका करें, लेकिन अपने खुद की जात-बिरादरी का मामला देखते ही अपना मुंह बिचका देते हैं। एक अजब सा हिकारत भाव अपने चेहरे और कामकाज की शैली पर छा जाता है। कम से कम दो घटनाएं तो हमारे सामने हैं ही, जिस के आधार पर मैं आपकी पीड़ा आप सब के सामने व्‍यक्त कर सकता हूं।

जागेंद्र सिंह को जिन्‍दा फूंके जाने के हादसे पर मेरी अन्‍य स्‍टोरीज को पढ़ने के लिए अगर इच्‍छुक हों, तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा

जांबाज जागेंद्र

पहली घटना : यहां मैं ठीक तीन साल पहले जांबाज पत्रकार जागेंद्र सिंह के संदर्भ में कह रहा हूं, जिसे शाहजहांपुर में अखिलेश यादव सरकार के दबंग मंत्री राममूर्ति वर्मा की साजिश के चलते वहां की कोतवाली शहर के कोतवाल श्रीप्रकाश राय और उसके साथी पुलिसवालों ने मार डाला था। जागेंद्र की लेखनी ही उसकी मौत बन गयी थी। जागेंद्र की लेखनी से राममूर्ति वर्मा बेहद खफा था। एक दिन कोतवाल व अन्‍य पुलिसदल ने उसके घर घेराबंदी की और वहां मौजूद जागेंद्र सिंह को दबोच कर उस पर पेट्रोल डाल कर जिन्‍दा फूंक डाला। इसका खुलासा जागेंद्र ने अपने मृत्‍यु-पूर्व बयान पर किया था। लेकिन पत्रकारों ने जागेंद्र का साथ नहीं दिया। बल्कि वे उसे ब्‍लैकमेलर और माफिया ही साबित करने लगे। इतना ही नहीं, शाहजहांपुर के पत्रकारों ने राममूर्ति वर्मा को पत्रकारिता दिवस, श्रमिक दिवस आदि अपने हर कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि के तौर पर आमंत्रित कर उसे सम्‍मानित किया।

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लेकिन मैंने शाहजहांपुर कर पहुंच कर इस मामले की गहरी छानबीन शुरू कर दी। हालांकि उस वक्‍त मैं बेहद बीमार था, ब्रेन-स्‍ट्रोक का एक जबर्दस्‍त आघात का गहरा असर मुझ पर काफी था। मैंने छानबीन में पाया कि जागेंद्र के ईमानदार और जुझारू तथा अपने कामकाज में बेहद निष्‍ठावान पत्रकार है। अपनी इसी फाइंडिंग के आधार पर मैंने ताबड़तोड़ स्टोरीज छापनी शुरू कर दी। यह क्रम महीनों चला, और हंगामा खड़ा हो गया। लखनऊ में बैठे पत्रकार नेता इस मामले में अपनी पूंछ अपने पेट में घुसेड़े बैठे थे, लेकिन मेरे प्रयासों के चलते वे अपने-अपने बिल से बाहर निकलने पर मजबूर हो गये और फिर जागेंद्र सिंह को न्‍याय दिलाने का अभियान शुरू हो गया। हालांकि पूरी सरकार मंत्री को बचाने में जुटी थी, इसके बावजूद सरकार ने मामला दबाने के लिए जागेंद्र के आश्रितों को बीस लाख रूपयों की मदद की। उधर मामले के अपराधियों ने भी अपनी खाल बचाने के लिए उस परिवार को तीस लाख रूपयों का भुगतान किया।

और तो और, मेरी स्‍टोरीज से उभड़े माहौल से बौखला कर सरकार यह तक ऐलान कर दिया था कि वह सीबीआई जांच के लिए तैयार है। हालांकि बाद में भारी मुआवजा अदा कर मामला रफादफा कर दिया गया था।

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लर्नेड वकील साहब

दूसरी घटना : पिछली सात मई, और 30 मई को ख्‍यातिनाम अधिवक्‍ता प्रिंस लेनिन और उनके वयोवृद्ध वकील माता-पिता के साथ पुलिसवालों ने तोड़फोड़ की, मारा-पीटा भद्दी गालियां भी दीं। मौके पर मैजूद उनकी अविवाहित बहन को भी पुलिसवालों ने घसीटा, पीटा, गालियां दीं, और उसके बाल घसीटते हुए हुसैनगंज थाना-कोतवाली तक ले गये। इस दौरान बहन के कपड़े फट गये, और सड़क पर घसीटने से उसके पैरों में भारी घाव हो गया। इतना ही नहीं, इन पुलिसवालों ने प्रिंस की बहन को पुरूष हवालाता में ठूंस डाला। बाद में जब मामले की दरख्‍वास्‍त दी गयी, तो पुलिस ने उसे दर्ज ही नहीं, किया। बाद में घटना के आठ दिन बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया, लेकिन उसे हल्‍का करने के लिए दो अन्‍य मुकदमे भी प्रिंस की बहन और उनके माता-पिता पर भी ठोंक दिया गया।

जागेंद्र सिंह के मामले में किसी भी पत्रकार या उसके किसी भी संगठन ने पहल नहीं की थी। लेकिन प्रिंस लेनिन ने इस मामले में स्‍वत: संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज किया था। याचिका में मांग की गयी थी कि इस मामले में सीबीआई की जांच की जानी चाहिए। इसके लिए तथ्‍य भी लेनिन ने जुटाये थे, और याचिका पर आने वाला पूरा खर्चा भी लेनिन ने ही वहन किया था।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

कहने की जरूरत नहीं कि प्रिंस लेनिन की यह पहलकदमी उस शख्‍स की गहरी संवेदनशीलता का प्रतीक और प्रमाण था।

लेकिन हैरत की बात है कि प्रिंस लेनिन के घर हुए इस हादसों पर अधिवक्‍ता ने अपना-अपना कान बंद किये बैठा है। ठीक उसी तरह, जैसे जागेंद्र सिंह हत्‍याकांड में अधिकांश बिरादरी को सांप सूंघ गया था। इसीलिए मैं प्रिंस लेनिन के इस मामले में लगातार हस्‍तक्षेप कर रहा हूं। और कम से कम तक अपना यह दखल बनाये रखूंगा, जब तक अधिवक्‍ता समुदाय खुद इस मामले को अपने हाथ में नहीं लेता।

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पत्रकार पत्रकारिता

पत्रकार के पुत्र बनारसी फिल्‍मकार को फाल्‍के पुरस्‍कार

: अक्‍कड़-बक्‍कड़ नाम से एक छोटी-सी फिल्‍म बना कर उज्‍ज्‍वल ने काशी का नाम सुफल कर दिया : फाल्‍के समारोह में बनारस के उज्‍ज्‍वल पुरस्‍कृत किया गया : प्रख्‍यात पत्रकार प्रेम प्रकाश का पुत्र है कोहबर वाला यह नवोदित फिल्‍मकार :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्ली : आठवें दादा साहब फाल्के फिल्म फेस्टिवल 2018 के मौके पर शोर्ट फिल्म सेक्शन मे वाराणसी के फिल्मकार उज्ज्वल पाण्डेय द्वारा निर्देशित शोर्ट फिल्म 'अक्कड़ बक्कड़' को बेस्ट फिल्म, बेस्ट डाइरेक्शन और बेस्ट स्क्रिप्ट, इन तीन कैटगरीज मे 'सिनेमा फार द एक्सीलेंस' अवार्ड से नवाजा गया। भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के के नाम पर 2011 मे शुरू किये सिनेमा फार द एक्सीलेंस अभियान का यह आठवां फिल्म फेस्टिवल था।

इस फिल्म फेस्टिवल मे बेस्ट फीचर फिल्म, बेस्ट डॉक्यूमेंटरी, बेस्ट शोर्ट फिल्म, बेस्ट एनीमेशन, बेस्ट म्यूजिक वीडियो और बेस्ट ऐड फिल्म आदि विभिन्न कैटगरीज मे अवार्ड दिये जाते है। इस फिल्म फेस्टिवल मे भारत समेत 90 से अधिक देशो के प्रतिभागी पार्टीसिपेट करते है। हिन्दी फिल्म इण्डस्ट्री के लिहाज से इस आयोजन की प्रासंगिकता इस महत्व के कारण है कि इसमे प्रोफेशनल फिल्ममेकर्स के साथ साथ नये और युवा फिल्ममेकर्स को प्रतिभाग के लिए समान अवसर और प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जाता है। यह फिल्म फेस्टिवल दादा साहब फाल्के के जन्मदिवस 30 अप्रैल को प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।

उज्ज्वल पाण्डेय वाराणसी के युवा फिल्म निर्देशक है। विभिन्न विषयों और मुद्दों पर इनकी सौ से अधिक शोर्ट फिल्म्स और डॉक्यूमेंटरीज यूट्यूब पर मौजूद है। इनमे तीन मिनट की शोर्ट फिल्म 'ब्यूटीफुल' और भोजपुरी शोर्ट फिल्म 'कोहबर' सर्वाधिक चर्चित फ़िल्मों मे से है। ब्यूटीफुल के दर्शकों की संख्या यूट्यूब पर छियालिस लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है, वहीं 'कोहबर' साठ हजार से अधिक दर्शकों द्वारा अबतक देखी व सराही जा चुकी है।

पिछले दिनो उज्ज्वल की दो शोर्ट फिल्मों 'अक्कड़ बक्कड़' और 'मेघा' का सेलेक्शन फ्रान्स और लंदन इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स के लिए भी हो चुका है। 'मेघा' जहाँ मूक बधिर बच्चों के मेडिकल और सोशल ट्रीटमेंट पर आधारित फिल्म है, वहीं 'अक्कड़ बक्कड़' विशुद्ध रूप से एक मनोरंजन फिल्म है। इन दोनो फिल्मों का प्रसारण नेशनल टीवी चैनल एनडीटीवी प्राइम पर हो चुका है। दादा साहब फाल्के फिल्म फेस्टिवल मे भी इन दोनो फ़िल्मों का चयन हुआ था लेकिन जूरी द्वारा बेस्ट डाइरेक्शन, बेस्ट स्क्रिप्ट तथा बेस्ट शोर्ट फिल्म कैटगरी मे अवार्ड के लिए 'अक्कड़ बक्कड़' को चुना गया।फिल्म का निर्माण 'क्रिएटिव जिप्सी' के बैनर तले पिछले साल जून मे किया गया था। फिल्म का आइडिया, कहानी, स्क्रिप्ट लेखन और निर्देशन उज्ज्वल पाण्डेय का है।

उल्लेखनीय है कि उज्ज्वल इन दिनों अपनी ही भोजपुरी शोर्ट फिल्म 'कोहबर' के विषय और भोजपुरी ग्रामीण संस्कृति पर आधारित इसी नाम की फुल लेन्थ फीचर फिल्म के निर्माण के सिलसिले मे अपनी टीम के साथ आरा, बलिया और सिवान जिलों के बीच फैले गंगा के दियारे मे कैम्प कर रहे है। यह फिल्म उज्ज्वल के अपने प्रोडक्शन हाउस आरोहन फिल्म्स के बैनर पर बन रही है। हिन्दी और भोजपुरी सइनेमा को अपने इस युवा फिल्ममेकर से बहुत उम्मीदें है।

अरे नेपाल-यात्रा पर गोस्‍वामीजी से भी कुछ पूछ लो यार

: बिहार का जनमानस, जानकी, राम और गोस्‍वामी तुलसीदास बनाम नरेंद्र मोदी की ताजा बस-यात्रा : आम बिहारी अपनी बेटी का विवाह राम-क्षेत्र से करने में बिदकता है : रामशलाका की चौपाइयों को मैं बिहार की बेटियों के विवाह से जोडूं, या धार्मिक बस-यात्रा योजना में :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मैं मूलत: अघोरी-घुमन्‍तू प्राणी हूं। धूल-कींचड़ से लेकर खीर-पकवान तक जो भी मिल जाए, रस बटोरता रहता हूं। इसी क्रम में करीब तीन बरस पहले मैं बिहार के छपरा यानी सारण के निवासी और वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता बीरेंद्र नारायण सिंह से भी मिला था। न्‍याय-कर्म उनका पुश्‍तैनी धर्म है। गहन पाठक, गजब विश्‍लेषक और कुशल वक्‍ता हैं सिंह जी। बातचीत के दौरान चर्चा शुरू छिड़ गयी बिहार के मुकाबले बाकी पश्चिम भारत से सम्‍बन्‍धों पर। अचानक कोई टीस-सी लगी वयोवृद्ध श्री बीरेंद्र सिंह के दिल में। वे बरबस बोल ही पड़े कि हम बिहारी लोग बाकी पश्चिम क्षेत्र पर बेटी नहीं ब्‍याहते हैं। हालांकि अब नये माहौल में यह मान्‍यताएं टूटने लगी हैं, लेकिन आज भी अधिकांश बिहारी यह पसंद नहीं करता है कि उनकी बहन या बेटी की शादी बिहार से बाहर और खास कर पश्चिम राज्‍यों पर हो।

जाहिर है कि मैंने ही अगला सवाल उछाला, कि आखिर क्‍यों। जवाब था कि हम बहुत छले जा चुके हैं। हमारे सांस्‍कृतिक और धार्मिक ग्रंथ और उनकी गाथाएं बताती हैं कि धोखा हुआ है हम बिहारियों से। सिंह साहब ने अपनी बात को और विस्‍तार देना शुरू कर दिया। बोले:- हमारी धार्मिक आस्‍थाओं में है बेटी। बेटी हमारे समाज में सर्वोपरि स्‍थान रखती है। इतना सम्‍मान और आदर शायद ही किसी और समाज में दिया जाता हो, जितना सामान्‍य बिहारी समाज अपनी बेटी और बहन को देती है।

श्री बिरेंद्र नारायण सिंह का तर्क था कि त्रेतायुग में हम बिहारियों ने अपनी बेटी सीता पश्चिम के राजा अयोध्‍या को सौंपी थी। लेकिन वे लोग हमारी उस बेटी को लगातार अपमानित ही करते रहे। कहां-कहां की धूल फांकती रही सीता। इतना असुरक्षित माहौल दिया गया हमारी बेटी को, कि उसका अपहरण तक हो गया। बाद में अबला और गर्भवती सीता को राम के आदेश पर लक्ष्‍मण ने बियावान जंगल में फेंक दिया। सीता ने उफ तक नहीं की।

मगर कुछ भी गया हो, कभी भी सीता ने राम को कभी भी नहीं छोड़ा। राजपरिवार और राम लगातार सीता पर जुल्‍म ढाते रहे, लेकिन तब भी सीता ने कुछ भी आवाज नहीं उठायी। तब भी नहीं, जब राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा देने का आदेश जारी कर दिया। वह भी सरेआम, सार्वजनिक रूप से। सीता ने तब भी अपनी पीड़ा और अपने आंसू पी डाले, लेकिन चूं तक नहीं की। सीधे कदम उठाया और अग्नि के ज्‍वाला-कुण्‍ड में अपना प्राण दे दिया। श्री बीरेंद्र नारायण सिंह जी बताते हैं कि उनकी जानकारी में कई ऐसी घटनाएं हैं, जब बिहार की बेटी बिहार से पश्चिम ब्‍याह दी गयीं, लेकिन उनका सम्‍मान तो दूर, उन्‍हें हमेशा अपमान ही हुआ। हर क्षण, हर कदम। श्री सिंह पूछते हैं कि इन्‍हीं घटनाओं को देख कर अगर आम बिहारी अपनी बेटी-बहन का विवाह बिहार से पश्चिम करता है, तो क्‍या गलत करता है। तुम्‍हारे यहां बेटी और बहन के साथ क्‍या होता है, क्‍या संस्‍कार हैं तुम्‍हारे, हमें इसे जानने-समझने की क्‍या जरूरत है। हम तो केवल यह देख-समझ रहे हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, अपनी बेटी बिहार से पश्चिम मत देना चाहिए। खैर,

खैर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जनकपुर में हैं। वहां वे अपने 2019 के चुनाव को लेकर रणनीति को मूर्त आकार देंगे। मसलन, मद्धेसियों को कैसे इस चुनाव से जोड़ा जा सके। किस तरह जनक पुर से अयोध्‍या का रिश्‍ता मजबूत किया जा सके। भले ही उनकी यह रणनीति सामान्‍य तौर पर दो देशों के परस्‍पर रिश्‍तों को मजबूत करने की दिख रही हो, लेकिन सच बात यही है कि इस बस-यात्रा का मूल आधार धार्मिक ही है। कहने की जरूरत नहीं कि बिहार के दरभंगा से सटे नेपाल के उत्‍तरी-पूर्वी में है जनकपुर, जो काठमांडू से करीब चार सौ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्वी नेपाल में है। सीता का नाम मिथिलापुत्री और जानकी भी है। उसका तर्क यह कि जनकपुर ही बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं सीतामढ़ी और आसपास के विशाल मैथिल राज्‍य की प्राचीन राजधानी था। बाद में उस इलाका नेपाल में शमिल हो गया। नेपाल में आज भी सर्वश्रेष्‍ठ भाव को व्‍यक्‍त करने के लिए "रामरौ छ" शब्‍द का प्रयोग किया जाता है। जैसे निकृष्‍ट भाव को व्‍यक्‍त के लिए "गू छ" बोलते हैं आम नेपाली।

बहरहाल, त्रेतायुग और कलियुग के संधि-काल में काशी में एक महाकवि पैदा हुए, जो अवधी में राम नाम का एक महान महा काव्‍य-ग्रंथ लिख गये। उनके ग्रंथ का नाम था रामचरित मानस, और उसके रचयिता थे गोस्‍वामी तुलसीदास जी। गोस्‍वामी जी ने यह जो ग्रंथ लिखा, वह सुखान्‍त कम जबकि अधिकांश दुखान्‍त ही है। अपने ग्रंथ में गोस्‍वामी जी ने कुछ चौपाई भी लिखे हैं, जिनका जिक्र उन्‍होंने अपने ग्रंथ के अंत में बनी प्रश्‍न-वली भी पर भी दर्ज किया है।

मसलन:-

चौपाई:- उधरे अंत न होहि निबाहू , काल नेमी जिमि रावण राहू !

अर्थात:- यह चोपाई बाल काण्ड के आरम्भ की है, कार्य की सफलता में संदेह है ...

चौपाई:-  बिधि बस सुजन कुसंगत परही, फनि मनि सम निज गुण अनुसरही !

अर्थात:- यह चोपाई भी बाल काण्ड के आरम्भ की है, बुरे लोगों का संग छोड़ दो कार्य पूर्ण होने में संदेह है ...

चौपाई:- होई हें सोई राम रचि राखा, को करि तरक बढ़ावहि साथा !

अर्था‍त:- यह चोपाई बाल काण्ड में शिव पार्वती के संंवाद के समय की है, कार्य पूर्ण होने में संदेह है। प्रभु पर छोड़ दो ...

चौपाई:-  बरुन कुबेर सुरेस समीरा, रन सन्मुख धरि काह ना धीरा !

अर्थात:- रावण वध पर मंदोदरी के विलाप के संदर्भ में यह चोपाई है, कार्य पूरा होने में संदेह है ...

उपसंहार:- मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इन चौपाइयों को मैं बिहार की बेटियों से बिहार के बाहर के पश्चिमी क्षेत्र के साथ विवाह से जोड़ कर देखूं, या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज जनकपुर से अयोध्‍या तक शुरू की गयी बस-यात्रा योजना में देखूं।

पत्रकारिता: तब हम वाकई वॉच-डॉग थे, अब कुत्‍ता बन गये

: पहले अपने समाज की सुरक्षा के लिए चारों ओर मूत्र-विसर्जन करते थे हम लोग, अब अपनों पर ही मूतने में जुट गये : केकड़ों से भी बदतर हो गयी है पिछले बरसों के दौरान पत्रकारों की राजनीति, इसको दबाओ, उसको काटो और उसको नोंचो : सभी प्रत्‍याशियों को किसी घड़े-सुराही की तरह जांचो, वरना हालत और ज्‍यादा बिगड़ेगी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : नाम पर मुंह मत बिचकाइयेगा। वॉच-डॉग यानी पहरेदारी करने वाला इंसान। समाज पर आने वाले खतरों को पहले ही सूंघ कर षडयंत्र करने वालों पर भौंकने की फितरत मानी जाती है वॉच-डॉग में। उसे पहरेदार कुत्‍ता इसलिए कहा जाता था, क्‍योंकि कोई भी कुत्‍ता अपने समाज की सुरक्षा के लिए अपने दायरे बनाया करता था, इसके लिए अपने इलाके को पहचाना करता था, उसके घेराबंदी के लिए बाकायदा एक टांग उठा-उठा कर मूत्र-विसर्जन किया करता था। और उस में घुसपैठ करने वालों पर भौंकता, और काट लिया करता था। मंत्री और अफसरों तथा अपराधियों पर दांत गड़ा दिया करते थे ऐसे वॉच-डॉग। एक दौर हुआ करता था, जब वॉच-डॉग होना किसी भी पत्रकार के लिए गर्व और सीना चौड़ा कर देने के लिए पर्याप्‍त हुआ करता था।

लेकिन अब वह दौर बीते वक्‍त की बात हो चुका है। सच बात तो यह है कि हम-आप में से काफी लोग वॉच-डॉग की भूमिका भूल चुके हैं। मेरे प्‍यारे दोस्‍त, मेरे शब्‍दों पर बुरा मत मानियेगा, लेकिन हकीकत यही है कि आज मैं सच बोलने पर आमादा हूं। पूछना चाहता हूं कि पिछले दस-पंद्रह बरस पहले तक बेहद सम्‍मानित माने जाने वाले पत्रकारों की हैसियत इतनी बुरी कैसे हो गयी, उनकी खबरें अविश्‍वसनीय कैसी होने लगीं, उनमें सच कैसे गायब होने लगा, कैसे अफसर और नेतागण हमारे पत्रकारों को अपनी जेब में कैसे बैठाने लगे, और हमने यह सुविधा अपने जमीर को बेच कर कैसे दे दी दूसरों को।

सच बात तो यही है कि अब हम खुद ही कुत्‍ता बनने पर आमादा होने लगे हैं। वहज है हमारे नेतागण। पत्रकारों के जो भी मसले उठते हैं, हमारे नेतागण उसमें पत्रकारों के हित-अहित के बजाय अपनी लाभ-हानि का गुणा-जोड़ करना शरू कर देते हैं। जो कुत्‍ते सत्‍ता, नेता और अफसरों की साजिशों पर भौंका करते थे, वे अब सत्‍ता, नेता, अफसरों की सुरक्षा, वाहवाही और दलाली पर आमादा हैं, और जो मूत्र-विसर्जन समाज को सुरक्षित घेरा दिलाने के लिए किया करते थे हमारे वॉच-डॉग, वे अब हमारी ही बिरादरी यानी पत्रकारों पर मूतने पर आमादा हैं, साथियों पर ही भौंक रहे हैं और उनके हितों पर कुठाराघात करने पर आमादा दिख रहे हैं।

वजह है हमारे ही अपने साथी, जो हमारी सरपरस्‍ती का दावा करते हुए उप्र राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति पर काबिज होते रहे हैं, और इस बीच किसी निहायत घटिया और सड़कछाप मवाली की तरह उन्‍होंने हमारे संगठन को अगवा कर उसे बाकायदा बेच डाला। वरिष्‍ठ पत्रकारों और उनके नेताओं का यह नैतिक दायित्‍व था कि वे नये-नवोदित पत्रकारों का दिशा-निर्देश करें, उनका मार्गदर्शन करें, उन्‍हें सिखायें, उनकी मदद करें, उन्‍होंने अपने इस दायित्‍व से मुंह मोड़ लिया। वजह था उनकी दलाली और उनका दर्प-घमंड। पत्रकारों ने अपने घटिया स्‍वार्थों के चलते हमारी समिति को तोड़ा-मरोड़ा और उसका छिन्‍न-भिन्‍न करने की हर कोशिश की। कमेटी दो-फाड़ तक हुई। पूरे नैतिक मूल्‍य और आदर्श इन नेताओं के चलते चकनाचूर हो गये।

खैर, कहने की जरूरत नहीं है कि इन लोगों-गिरोहों की करतूतों ने हमारी पत्रकारिता और पत्रकार संगठनों की अस्मिता पर भयावह कुठाराघात किया है, लेकिन इसके बावजूद मेरा आज भी यही मानना है कि अभी भी काफी वक्‍त है, जब इन हालातों के खिलाफ युद्ध छेड़ा जा सकता है। हम पूरी गंदी नदी को एकदम से साफ नहीं कर सकते हैं, यह श्रम-साध्‍य और समय-साध्‍य कार्य होता है। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि इन नेताओं को अपदस्‍थ करें, और कम से कम शुरूआती दौर में इन पत्रकारिता की नदी में शामिल होने वाले गंदे नालों पर रोक लगाने की कोशिश करें।

12 अप्रैल-18 को उप्र हिन्‍दी अकादमी पर पत्रकारिता पर आसन्‍न खतरों को लेकर एक कार्यशाला आयोजित की गयी थी। मैंने भी इस समारोह पर अपनी राय पूरी बेबाकी के साथ पेश कर दी। मेरे इस पूरे व्‍याख्‍यान को अगर आप सुनना-देखना चाहें तो कृपया नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बदलती पत्रकारिता पर कुमार सौवीर का व्‍याख्‍यान

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