Meri Bitiya

Thursday, May 24th

Last update05:24:48 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

मेरा कोना

सुपाड़ी जर्नालिज्‍म: अखबार पास करेगा कालोजियम की लिस्‍ट ?

: इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोलेजियम द्वारा भेजे गये नामों पर टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने सवाल उठाये : कई प्रस्‍तावों पर हस्‍तक्षेप, जजों के रिश्तेदार हैं : अगर किसी वकील का रिश्‍तेदार जज है, तो उसकी अर्हता पर आक्षेप कैसे : अखबार में छपी इस सूची का स्रोत क्‍या है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हाईकोर्ट में पूरी जिन्‍दगी खपा चुके वकीलों को खुद को जज की कुर्सी हासिल करने के लिए अब केवल कोलोजियम की ही अनुमति ही पर्याप्‍त नहीं होगी। बल्कि उसके लिए उन्‍हें एक अनिवार्य बाधा पार करनी ही होगी। वहां से अपना चरित्र-प्रमाणन कराने के बाद ही यह तय हो पायेगा कि कौन वकील हाईकोर्ट में वकील बनने लायक है अथवा नहीं। इस बाधा का नाम है टाइम्‍स ऑफ इंडिया। इस अखबार की कवायदों को देखते हुए तो यही साबित होता दिख रहा है कि हाईकोर्ट में जस्टिस बनने के लिए अंतिम बैरियर अखबार ही उठायेगा, और तय करेगा कि अमुक को जज बनाया जाना होगा और अमुक को बाबा जी का ठिल्‍लू थमाया जाएगा।

सोमवार 12 फरवरी-18 को सुबह अंग्रेज़ी के एक बेहद प्रतिष्ठित अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने जो खबर छापी है, उससे तो यही साबित होता है कि अब हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में भी यह अखबार अपना हस्‍तक्षेप करने पर आमादा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस अखबार को लेकर अब वकील समुदाय में अब गहरा आक्रोश फैल रहा है।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

इस अखबार के अनुसार हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कोलेजियम ने जो 33 वकीलों के नाम हाईकोर्ट जज बनाने के लिये सुप्रीम कोर्ट को भेजे थे उनमें से अधिकांश नाम ऐसे हैं जो किसी न किसी सिटिंग या रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज के संबंधी हैं। कोई वकील किसी जज का लड़का है तो कोई भतीजा। कोई किसी बड़े नेता की पत्नी का बिज़नेस पार्टनर है तो कोई किसी बड़े वकील का जूनियर।

हो सकता है कि यह बातें सही हों, और यह सारे प्रस्‍ताव उन वकीलों के अटूट परिश्रम, उनके अध्‍ययन, और उनकी प्रैक्टिस के परिणामों के आधार पर तैयार किये गये हों। उधर यह भी हो सकता है कि  कि यह नाम सिफारिश से आये हों। वैसे भी कई बार यह आरोप लगते ही रहे हैं कि कई जजों के रिश्‍तेदार वकालत में लिप्‍त हैं और उनके जजों के प्रभाव के चलते ही उन वकीलों की प्रैक्टिस फलती-फूलती रहती है। कई बार तो विभिन्‍न मंचों से ऐसे जजों और उनके रिश्‍तेदारों की सूची तक सार्वजनिक हो चुकी है।

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार

मगर उधर दूसरी ओर सवाल यह भी उठता है कि अगर यह सब बातें सच हैं तो इन सब तथ्यों की जांच के लिये केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। वैसे भी जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा आइबी द्वारा दी गई गोपनीय रिपोर्ट भी होती है जिसके आधार पर ही हर एक वकील का बैकग्राउंड चेक किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है की जब ये सारी प्रक्रिया अभी चल ही रही थी, तो ऐसे में इस अंग्रेजी अखबार को क्या जरूरत पड़ी ऐसी खबर छापने की?

इसको लेकर कई संशय और आरोप भी उठने लगे हैं। सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या ये किसी के इशारे पर हो रहा है?

एक विश्‍वस्‍त सूत्र यह सवाल उठाते हैं कि जिन जजों पर बातचीत इस अखबार ने छेड़ी है, उसका स्रोत क्‍या है। क्‍या यह सूचना हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा तैयार की गयी है। और अगर हां, तो फिर वह गोपनीय जानकारी कैसे सार्वजनिक हो रही है। सूत्र बताते हैं कि कोलोजियम को शामिल किये जाने वाले वकीलों के नामों की लिस्‍ट गोपनीय तोर पर सीलबंद लिफाफे होकर ही सुप्रीम कोर्ट को भेजी है। फिर क्‍या ऐसी ही कोई सूची इस अखबार के हाथों कैसे लग गई? क्या जजों की नियुक्ति को लेकर कोई राजनीति चल रही है? अगर ऐसी राजनीति चल भी रही है तो क्या किसी प्रतिष्ठित अखबार को इसका हिस्सा बनना चाहिये?

एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता का सवाल यह है कि:- क्या ये सुपाड़ी जर्नलिस्म नही हैं?

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

 

लर्नेड वकील साहब

चित्‍त-निर्मल कर गयी सहवाग की क्षमा-याचना

: केरल में सांप्रदायिक बढ़ा देने वाली एक टिप्‍पणी को न केवल हटाया, बल्कि सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी : क्रिकेट-प्रशंसकों के भगवान हैं सहवाग, ट्विटर पर हैं 1.6 करोड़ फॉलोअर : क्रिकेट या फिल्मी लोगों भी दूसरे क्षेत्रों पर राय रखने का पूरा हक है, लेकिन सतर्कता जरूरी :

रामचंद्र गुहा

नई दिल्‍ली : मैं अमूमन इतिहास और राजनीति पर टिप्पणियां करता रहता हूं, पर मैं एक क्रिकेट लेखक भी हूं। ज्यादातर मौकों पर मेरा पेशा और मेरा जुनून दो ध्रुवों पर होते हैं, मगर कभी-कभार वे आपस में टकराते भी हैं।

ऐसा ही एक मौका 24 फरवरी को आया, जब मैंने ट्विटर पर देखा कि वीरेंदर सहवाग ने केरल में हुए एक नफरत-प्रेरित अपराध के बारे में आधा सच बताया। वहां मधु नामक एक लड़के को हिंदू और मुस्लिमों की एक मिली-जुली जमात ने बुरी तरह पीटा था। अपराधियों के नाम पहले से ही कई अखबारों और ट्विटर पर उजागर हो गए थे। फिर भी, सहवाग ने दो मुस्लिम नाम चुने, उन्हें पीड़ित हिंदू के नाम से जोड़ा और घटना को ‘सभ्य समाज के लिए शर्मनाक’ घोषित कर दिया।मैं सहवाग की बैटिंग का महान प्रशंसक रहा हूं। जब उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया गया था, तब मैंने उनकी प्रशंसा में अपनी शैली से इतर एक काव्यात्मक ‘कॉलम’ भी लिखा था।

मगर उनके उस ट्वीट ने मुङो काफी निराश किया। ऐसा महज इसलिए नहीं कि उन्होंने ‘सेलेक्टिव’ रुख अपनाया था, बल्कि इसलिए कि हरियाणा के नफरत-प्रेरित अपराधों पर उनकी चुप्पी बरकरार थी, जबकि वहां पर वह अपना स्कूल भी चलाते हैं। लिहाजा मैंने उनकी भूल को लेकर ट्वीट किए और लिखा, ‘अगर सहवाग में थोड़ी सी भी इंसानियत है, तो उन्हें अपना ट्वीट हटा लेना चाहिए’। ट्विटर पर सहवाग के करीब 1.6 करोड़ फॉलोअर हैं। जाहिर है, इनमें से कई के लिए उनके शब्द अक्षरश: सत्य होंगे। मैं परेशान था कि क्रिकेट की उनकी यह प्रसिद्धि सांप्रदायिक तनाव को हवा दे सकती है। इसलिए खुद ट्वीट करने के अलावा मैंने वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को सहवाग की इस गंभीर गलती के बारे में बताया।

राजदीप के ट्वीट करने के बाद सहवाग ने एक माफीनामा लिखा कि उन्हें गलत जानकारी मिली थी। मगर वह मूल ट्वीट उसी तेवर में तब भी मौजूद था। बाद में, राजदीप की गुजारिश के बाद सहवाग ने उसे डिलीट किया।20वीं सदी की शुरुआत में मैनचेस्टर गाजिर्यन के महान संपादक सीपी स्कॉट ने कहा था, ‘टिप्पणी स्वतंत्र होती है, पर तथ्य अक्षय होते हैं’। मगर 21वीं सदी में इस सिद्धांत को हर क्षण सोशल मीडिया पर तार-तार किया जाता है। ट्रॉल करने वाले और खास विचारधारा के लोग तो जान-बूझकर हर वक्त झूठ परोसते रहते हैं, पर नाम व उपलब्धि कमा चुके लोगों को उच्च मानक का पालन जरूर करना चाहिए। बेशक एक नागरिक होने के नाते क्रिकेटरों या फिल्मी कलाकारों को भी अपने क्षेत्र से इतर बातें रखने का पूरा हक है, लेकिन भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव जैसे मसलों पर अपनी राय जाहिर करने से पहले उन्हें यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तथ्य सही हों और बिना किसी भेदभाव के लोगों के सामने परोसे गए हों। (क्रमश:)

( क्षमा-याचना से चित्‍त निर्मल कर देने वाले इस आलेख का पहला हिस्‍सा आप गतांक में पहले ही पढ़ चुके हैं। अब इस आलेख का दूसरा और अंतिम हिस्‍सा अगले अंक में पढि़येगा। क्रमश:- जाफरी-बेटियों को निर्वस्त्र कर फूंका गया, झूठ लिखा था अरूंधति ने )

बहु-आयामी प्रतिभा के स्‍वामी रामचंद्र गुहा का नाम देश में चोटी के इतिहास-लेखकों में गिना जाता है।

जाफरी-बेटियों को निर्वस्त्र कर फूंका गया, झूठ लिखा था अरूंधति ने

: ‘हम सब सन्न और स्तब्ध हैं। हम सभी भाई-बहनों में सिर्फ मैं भारत में रह रहा हूं.. मेरे भाई व बहन अमेरिका में रहते हैं.’ : अहमदाबाद दंगे पर साफ झूठ लिखा अरूंधति राय ने : कोई आपकी गलती बताए, तो अच्छा यही है कि उसे सुधारें और माफी मांग लें :

रामचंद्र गुहा

नई दिल्‍ली : ( क्षमा-याचना से चित्‍त निर्मल करने वाले इस आलेख का पहला हिस्‍सा आप गतांक में पहले ही पढ़ चुके हैं। अब इस आलेख का दूसरा और अंतिम हिस्‍सा पढि़ये)

वीरेंदर सहवाग के प्रसंग ने मुझे एक पुरानी घटना याद दिला दी। उसमें एक सेलिब्रिटी ने अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए आधा-अधूरा सच नहीं, बल्कि सरासर झूठ बोला था। वह वाकया साल 2002 में गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद हुआ था। उस हिंसा में हजारों मुस्लिमों के साथ पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी मारे गए थे। जब अहमदाबाद में उनके घर को हिंसक भीड़ ने घेर लिया था, तब उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं को मदद के लिए फोन किया। मगर उन्हें सहायता नहीं मिली और सोसायटी में रहने वाले अन्य तमाम लोगों के साथ वह भी भीड़ की भेंट चढ़ गए।

दंगा थमने के बाद उपन्यासकार अरुंधति राय ने उन पर एक लेख लिखा। उन्होंने लिखा था कि भीड़ ने सांसद को मारने से पहले ‘उनकी बेटियों को निर्वस्त्र किया और जिंदा जला दिया’।

ये तथ्य बिना पुष्ट किए लिखे गए थे, जिस पर सर्वप्रथम ऐतराज जाफरी के बेटे ने जताया। उन्होंने लिखा, राय के लेख को पढ़ने के बाद । ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘हम सभी भाई-बहनों में सिर्फ मैं भारत में रह रहा हूं.. मेरे भाई व बहन अमेरिका में रहते हैं..’।

साल 2002 के फरवरी व मार्च में गुजरात में हुए दंगे वाकई बहुत भयानक थे। अंग्रेजी मीडिया ने उसकी खूब (और संवेदनशीलता से) रिपोर्टिग की थी। तब राज्य और केंद्र, दोनों जगह भाजपा की सरकारें थीं और वह रक्षात्मक मुद्रा में आ गई थी। मगर राय की अपुष्ट लेखनी ने उसे जवाबी हमला करने का मौका दे दिया। पार्टी के नेता कहने लगे कि मीडिया नए तथ्यों को ‘गढ़कर’ सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में दिलचस्पी ले रहा है। एक बड़े नेता ने तो यह भी कहा कि राष्ट्रवादी तत्वों को गलत रूप में चित्रित करने के लिए लेखक कल्पनाशीलता का सहारा ले रहे हैं।

बहरहाल, लेख छपने के तीन हफ्ते के बाद अरुंधति राय ने माफी मांग ली।

सहवाग सौभाग्यशाली थे कि जब उन्होंने यह गंभीर गलती की, तो ट्विटर जैसा मंच अस्तित्व पा चुका था, इसीलिए वह संभल सके। मुङो उम्मीद है कि सहवाग प्रकरण पर वे तमाम अन्य सेलिब्रिटी भी ध्यान देंगे, जिन्होंने अपने क्षेत्र में मुकाम हासिल कर लिया है और इतर विषयों पर टिप्पणी करने की इच्छा रखते हैं। यदि वे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं या नजरअंदाज करते हैं, फिर चाहे वह जान-बूझकर किया गया हो या अज्ञानता में, तो वे न सिर्फ अपनी छवि खराब करते हैं, बल्कि देश के नाजुक सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

यह तो सहवाग प्रकरण का पहला सबक है। दूसरा सबक यह कि अगर कोई आपकी गलती बताए, तो अच्छा यही है कि उसे सुधारें और माफी मांग लें। मुझे कुछ संतोष हुआ, जब सहवाग ने आंशिक माफी मांगी, पर खुशी तब मिली, जब दूसरे के दबाव में ही सही, उन्होंने उस ट्वीट को हटा लिया।

गलती करना इंसानी फितरत है, पर हमारे कुछ फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और सबसे ऊपर राजनेताओं को यह लगता ही नहीं कि वे कभी गलती भी करते हैं। गलती बताने के बाद सहवाग ने जो किया, वह उन्हें याद रखना चाहिए। ऐसा करना उन्हें और मानवीय ही नहीं, अधिक से अधिक पसंदीदा भी बनाएगा। ( समाप्‍त )

बहु-आयामी प्रतिभा के स्‍वामी रामचंद्र गुहा का नाम देश में चोटी के इतिहास-लेखकों में गिना जाता है।

हाईकोर्ट: चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

: अमां यार। क्‍या इसी को ज्‍यूडिसरी कहते हैं ? : इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश को भेजा गया गोपनीय पत्र मीडिया तक पहुंचा : नाबालिग से रेप में गायत्री प्रजापति ऐंड कम्‍पनी पर पॉक्‍सो जज ने दी थी जमानत : हाईकोर्ट ने दंडित किया था दो जिला जजों को :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कहावतें तो बेहिसाब हैं, जो किसी भी मसले को बेहद खूबसूरती के साथ और अपने मन्‍तव्‍य को प्रभावशाली ढंग से प्रस्‍तुत कर सकती हैं। मसलन, बात करो ईरान की तो बोलेंगे तूरान की, गये गजोधर झांड़ा फिरने, ड्यूढै पहुंची बरात तो समधन लगै हगास, तब क्‍या पछतावे जब चिडि़या चुग गयी खेत। वगैरह-वगैरह। सच बात तो यही है कि किसी भी पूरे किस्‍से को एक छोटी सी लाइन में समझाने में पर्याप्‍त होती है सशक्‍त कहावतें। लेकिन ताजा मसले में जो कहावत मैं पेश करने जा रहा हूं, उससे बेहतर कोई भी कहावत नहीं हो सकती। कहावत है:- सत्‍ते ने लेटर भेजा फत्‍ते को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर।

मामला है यूपी की न्‍यायापालिका में पैसा उगाह कर फैसला देने को लेकर चल रही चर्चाओं का। इस पर सबसे भोंड़ा प्रदर्शन तब हुआ जब पूर्व समाजवादी पार्टी की सरकार में शामिल और अब तक के सबसे बड़े बेईमान खनन माफिया के तौर पर कुख्‍याति हासिल कर चुके पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति समेत तीन अभियुक्‍तों को लखनऊ के पॉक्‍सो कोर्ट के जज ने जमानत दे दी गयी। गजब बात यह है कि इससे पहले गायत्री ऐण्‍ड कम्‍पनी ने अपनी गिरफ्तारी को लेकर सर्वोच्‍च न्‍यायालय में एक याचिका लगायी थी, जिसमें कहा गया था कि उन्‍हें गिरफ्तार नहीं किया जाए। लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस याचिका को खारिज किया था। गायत्री और उसके इन साथियों पर आरोप है कि उन्‍होंने एक नाबालिग बच्‍ची के साथ दुराचार किया।

आपको बता दें कि इस मामले में इलाहाबाद उच्‍चन्‍यायालय के चीफ जस्टिस दिलीप बी भोंसले ने गायत्री प्रजापति को गैर-कानूनी तरीके से जमानत देने वाले पॉक्‍सो कोर्ट के एडीजे ओपी मिश्र को मुअत्‍तल कर दिया था, जबकि लखनऊ जिला एवं सेशंस जज राजेंद्र सिंह को हटा कर उन्‍हें चंदौली भेज दिया गया था। माना गया कि हाईकोर्ट प्रशासन ने इस मामले में भारी गड़बड़ और मोटी रकम का लेनदेन की बात मानी थी।

न्‍यायपालिका की खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जस्टिस और न्‍यायपालिका

हाईकोर्ट के इस फैसले से जिस ओपी मिश्र पर जो गाज गिरी, उन्‍हें 16 दिन पहले ही यह कुर्सी मिली थी। लेकिन सबसे ज्‍यादा नुकसान तो राजेंद्र सिंह को हुआ था। उन्‍हें राजधानी के जिला व सेशंस जज की कुर्सी से तो हटाया गया ही, हाईकोर्ट ने कोलोजियम को भेजे गये उस प्रस्‍ताव को भी खारिज कर दिया जिसमें राजेंद्र सिंह को हाईकोर्ट में जस्टिस के पद पर पदोन्‍नत किया जाना था। कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी शख्‍स को अपने जीवन में इससे बड़ा कोई भी धक्‍का नहीं हो सकता है, कि उसे हाईकोर्ट कुर्सी पर बिठाने की प्रक्रिया को रद कर दिया जाए।

बहरहाल, जस्टिस दिलीप बी भोंसले ने इसी मामले पर एक गोपनीय पत्र देश के तब के सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर को भेजा था। इसमें गायत्री ऐंड कंपनी को जमानत देने के पूरे प्रकरण का जिक्र किया गया था, साथ ही इसमें इन दोनों जजों पर दायित्‍व भी निर्धारित किये गये थे। खास बात यह है कि यह पत्र पूरी तरह गोपनीय था। और ऐसे प्रवृत्ति के पत्र को सुरक्षा की परम्‍पराओं के तहत चीफ जस्टिस द्वारा सील बंद कर विशेष पत्रवाहक द्वारा सीधे सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश के हाथों में ही थमाया जाता है।

अधिवक्‍ता-जगत से जुड़ी खबरों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लर्नेड वकील साहब

अब हालत यह है कि यह तो अब तक नहीं पता चला है कि दिलीप बी भोंसले का यह गोपनीय पत्र जेएस खेहर के हाथों तक पहुंचा भी या नहीं। लेकिन अब यह पत्र मीडिया के हाथों में है, जो उसकी प्रतियां बना कर कभी पानी में जहाज बना रही है, या फिर उसकी बत्‍ती बना कर जहां-तहां बुन-सिल कर प्रयोग कर रही है। इससे बड़ा मजाक और क्‍या होगा, जब  इस तथाकथित पत्र की कॉपी प्रतिवादी टाइम्‍स ऑफ इंडिया के वकील ने इस मामले में भरी अदालत में मामले के वादी के हाथों में थमा दी। इस पत्र में जो कुछ भी भोंसले द्वारा लिखा गया बताया जाता है, उस पर अब कड़ी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गयी हैं। क्‍योंकि इस कथित पत्र का हवाला देते हुए विभिन्‍न मीडिया संस्‍थानों ने जो खबरें प्‍लांट की हैं, उसमें का‍फी विवाद खड़ा हो गया है। इतना ही नहीं, आरोप तो यहां तक लगाये जा रहे हैं कि यह एक साजिश के तौर पर पत्र लीक किया गया है, ताकि एक जज को हाईकोर्ट में प्रोन्‍नत करने की प्रक्रिया को रद कराया जा सके। कुछ भी हो, सवाल तो यह है कि इन दोनों शीर्ष जस्टिस के बीच होने वाले इस पत्रचार का खुलासा मीडिया में हो जाना खासा संवेदनशील मसला बताया जा रहा है।

अब जरा देखिये तो तनिक, कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के उस गोपनीय पत्र को किस-किस बड़े मीडिया समूहों ने अपनी सुर्खियां बना कर पेश किया था:- टाइम्‍स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्‍स यानी एनबीटी, जागरण डॉट कॉम, आई नेक्‍स्‍ट, हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, अमर उजाला, मेन स्‍ट्रीम, इंडिया टुडे, आजतक समेत दर्जनों आदि। सारा झंझट इसी कवायद को लेकर अब अदालत से लेकर सड़क तक फैलता जा रहा है।

है न हैरत की बात ?

इसी प्रकरण पर यह कहावत समीचीन है कि:- चुम्‍मन ने लेटर भेजा जुम्‍मन को, बांच रहे हैं लड़हू-जगधर

पुनश्‍च: खास बात यह है कि कहावतें हमेशा वक्‍त की लम्‍बी सान पर चढ़ा कर ही जन-सामान्‍य में अपनी मान्‍यता हासिल कर पाती है, जबकि मैं आपको जानकारी दे दूं कि यह कहावत मैंने बिलकुल ताजा तैयार की है।

जज बोला, ईमानदारी की तो फांसी पर लटकाये जाओगे

एक आलोक बोस हैं, और एक थे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस

जो जीवन भर न्‍याय देती रही, आज इंसाफ की मोहताज

हैट्स ऑफ जिला-जज जया पाठक। मैं तुम्‍हारे साथ हूं और रहूंगा भी

बीमार जज ने दिया इस्‍तीफा। इलाज सरकार से नहीं, मैं खुद कराऊंगा

बधाई हो जज साहब, मगर आपको कैसे वापस मिली आपकी बिकी हुई आत्‍मा ?

ह्वाट डू यू वांट टू से योर ऑनर ! कि आपको अब किसी बाहरी हस्‍तक्षेप की जरूरत नहीं ?

मी लार्ड, अहंकार छोडि़ये। ठोस और सकारात्‍मक विचार-विमर्श का रास्‍ता खोजिए

जज पर दबाव : मामला गंभीर, दबाव तो पड़ता ही है

बरेली सीजेएम के घर झंझट, जमानत अर्जी खारिज

Page 4 of 137