Meri Bitiya

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मेरा कोना

गोद में बच्‍चा लिये मछली बोली, स्‍वामी ! यह मकरध्‍वज है

: झमाझम बारिश का क्रेडिट हनुमान जी को है,  बकलोल पर अभी पूंछ तरेर दूं तो फौरन चड्ढी गीली कर बैठेगा कि ठर्रे में हनुमान बसते हैं : रंभा-मेनका नाचेंगी, हाहा-हूहू गायेंगे, इंद्र ड्रिंक्‍स लेंगे , विष्‍णु जी लक्ष्‍मी जी से गोड़ दबवायेंगे : काला भैंसा लेकर यमराज जी वारंट तामील करते हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तो दोस्‍तों, सच बात तो यही है कि मैं इसीलिए भगवान-वगवान और ईश्‍वर-फिश्‍वर पर बहुत आस्‍था रखता हूं। बल्कि भगवान और ईश्‍वर ही नहीं, उनकी फेमिली के जितने देवि-देवता हैं, उन पर भी मेरी कड़ी आस्‍था, प्रेम, दोस्‍ती वगैरह है। दरअसल यह सब लोग बहुत सिस्‍टम के साथ काम करते हैं। हंसी-ठिठोली भी करेंगे, गुस्‍सा भी करेंगे, दोस्‍ती भी करेंगे, झंझट भी करेंगे और सामान्‍य कामधाम भी करेंगे। रंभा-मेनका नाचेंगी, हाहा-हूहू गायेंगे, इंद्र जी ड्रिंक्‍स लेते रहेंगे, विष्‍णु जी शेषनाग पर लेकर लक्ष्‍मी जी से अपना गोड़ दबवाते रहेंगे। सरस्‍वती जी वीणा बजायेंगी। अपना काला भैंसा लेकर यमराज जी झोंटा पकड़ कर फाइनल वारंट तामील करने निकल जाया करेंगे।

भोजन-पानी तो चलता ही रहता है, उसके बिना तो किसी सम्‍पादक और जज ही नहीं बल्कि मंत्री-राज्‍यपाल तक का काम नहीं चलता। यकीन न हो तो संपादक उपेंद्र राय, पीके तिवारी, तरूण तेजपाल, बाबा आसाराम बापू, राधे मां, हिमाचल वाले वीरभद्र, हरियाणा वाले गोपाल कांड़ा, आंध्रप्रदेश राजभवन वाले विश्‍वविख्‍यात नरायण दत्‍त तिवारी, तमिलनाडु वाली जयललिता, सपरिवार दुराचारी अमरमणि त्रिपाठी, बांदा वाले पुरूषोत्‍तम द्विवेदी, अनन्‍त मिश्र अंटू, दिल्‍ली वाला मंत्री संदीप बंसल, अदालतों वाले ओपी मिश्रा और एसपी शुक्‍ला, यूपी के मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल, पुराने आलोक रंजन, प्रदीप शुक्‍ला वगैरह-वगैरह। छोडि़ये आखिर किसका-किसका नाम बताया जाए।

खैर, मैंने मंगलवार को लिखा था कि गर्मी-उमस बेहिसाब है, लेकिन भगवान कुछ नहीं कर रहे हैं। मानसून की बारिश वाले डिपार्टमेंट वाले प्रमुख मेघनाथ और उनकी मेघनथनी जी से मैंने अप्‍लीकेशन लगायी थी। लिखा था कि वे अब रहम करें मानवों-प्राणियों को। उस पत्र का मजमून मैं निम्‍नलिखित चिपकाये दे रहा हूं।

"हे मेघनाथ और मेघनथनी जी !

हमें आपकी यह फोटू (फोटोशॉप ही सही) देख कर ही पता चल गया था कि आप लोग आजकल बहुत बिजी चल रहे हैं। लेकिन गुजारिश है कि इसी बीच आप लोगों को अगर अपनी इश्क़बाजी से थोड़ी फुरसत मिल जाए तो हम लोगों पर भी तनिक कृपा बरसा लेना!

यहाँ गर्मी से मरे जा रहे हम यार।

बाई गॉड की कसम, अब तो इतना पसीना भी नहीं निकल रहा है, जितना हमारे किसान सूखे के अंदेशे से आंसू बहाने शुरू कर चुके हैं।

तुम तो देवि-देवता लोग हो। तुम्हारा तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। लेकिन किसान बर्बाद हो जाएंगे। सूखा-राहत को लेकर मारामारी होगी। अमीन, तहसीलदार, एसडीएम और डीएम लोग जश्न मनाएंगे। मुनाफाखोर बनिया दोनों हाथों से रुपया लूटेंगे। सचिवालय के छोटे -बड़े बाबू फाइलें लटकाएँगे।

जनता अपनी छाती पीटेगी"

अब देखिये न, कि कितनी गम्‍भीरता से वहां त्‍वरित कार्रवाई होती है। रात को ही हनुमान जी ने मुझे सपने में आकर तब दर्शन दिया, जब मैं हजरतगंज का जायजा ले रहा था। गांधी प्रतिमा पार्क पर ही रखीं बेंच पर मैं बैठा था, सम्‍मान में उठ कर खड़ा हो गया। उन्‍होंने आत्‍मीयता के साथ मेरा कंधा थपथपाया, और बोले कि बस आज आपकी अर्जी मिली जो आपने भेजी थी, मेघनथनी ने अपना नोट लेकर मुझे फारवर्ड कर दिया था। खैर, यह रही आपकी अर्जी, अब बताइये कि मुझे क्‍या करना है।

मैं झुंझला पड़ा। बोला:- हन्‍नू जी, आपने तो बिलकुल वही बात कर दी जो अभिषेक गुप्‍ता की अर्जी पर राज्यपाल नाइक और मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल के मामले में भाजपा के संदीप बंसल के सपोर्टरों ने किया था। मैंने बारिश के लिए अर्जी मेघनाथ को भेजी थी, और आप मुझे हौंकने आ गये। खैर, अब आ ही गये हैं तो बताइये कि क्‍या स्‍वागत किया जाए आपका।

हनुमान जी हड़बड़ा गये, उन्‍होंने आनन-फानन अपने लंगोट से निकलते मूंज के जनेऊ को मरोड़ा और कंधे से जुम्बिश देकर गदा को सम्‍भाला और बोले:- नहीं नहीं। अरे आज मंगलवार है भाई। मंगल के दिन मैं न तो कुछ ऐसा-वैसा खाता हूं, और न ही कुछ पीता-शीता हूं। वह तो हरदोई वाला बकलोल नरेश अग्रवाल है न, जो संसद में अपना चूतियापंथी कर गया, कि ठर्रे में हनुमान। अभी पूंछ तरेर दूं तो फौरन चड्ढी गीली कर बैठेगा। और हैरत की बात तो देखिये कि राम-भक्‍त होने के नाम पर अयोध्‍या में राममंदिर बनाने का सपना बेचने वालों ने उसे भाजपा में ज्‍वाइन करा दिया है।

तो अब मैं आपकी क्‍या सेवा करूं हन्‍नू बाबा? यहां तो अशोक-वाटिका भी नहीं है, और यहां कोई सीता भी नहीं है। क्‍या किया जाए? और रही बात अर्जी की, तो गलती तो हम लोगों से भी हो जाती है। है कि नहीं? अगर ऐसा न होता तो मैं सूरज को पका सेब समझ कर मुंह में ले लेता। हालांकि मम्‍मी बचपन में यही सब समझाती रहती थीं, लेकिन उसके बाद से तो कसम खा ली थी मैंने कि जलता हुआ बल्‍ब मुंह में नहीं लेना चाहिए।

फिर?

फिर क्‍या? कुछ नहीं। मगर यह बताइये कि बारिश कब होगी? अच्‍छा-खासा आदमी एक ही झटके में भुना भुट्टा बना जा रहा है। हन्‍नू बाबा, अब तो बारिश करवा दीजिए। प्‍लीज।

आपकी बात तो मैं सपने में भी टाल सकता हूं। कभी टाला हो तो बताइये। आपको याद होगा कि 34 साल पहले जब सहारा इंडिया सुब्रत राय साप्‍ताहिक सहारा अखबार को बंद कर गया था और श्रमिकों को धेला भर पैसा नहीं देना चाहता था। तब रात को आपके घर पहुंचा था, और इसके पहले सुब्रत राय को भी बता आया था कि बे इसकी टोपी, उसके सिर वाले फ्राडिया। भूल गया कि कब कुमार सौवीर ने पीएसी और हजारों कर्मचारियों के सामने तुम्‍हारे भाई जयब्रत राय को जूतों से कूटा था। इसलिए इस बार दोबारा हरकत मत करो। कुमार सौवीर बहुत गुस्‍सैल आदमी है। तुम भी पिट जाओगे तो कैसे किसी के सामने अपना मुंह दिखाओगे। इसलिए इस बार भी दिमाग से काम करो, और सारे कर्मचारियों का पैसा फौरन अदा करो। और सौवीर जी, अगले ही दिन सुब्रत राय ने आप सब को बुला कर सारा हिसाब चुकता कर दिया था। कुछ याद आया या नहीं? तब एक मंगलवार को आप शाम को हनुमान सेतु वाले मंदिर के सामने दूसरी पटरी के फुटपाथ पर सायकिल टिका कर मुझे भल-भर गरिया रहे थे कि मैं तुमको अब तनिक भी भरोसा नहीं करता, तुम हनुमान नहीं, फ्राड हो। भगवान नहीं, ढोंगी हो। कुछ याद आया सौवीर जी या नहीं? आपने करीब डेढ़ घंटे तक मेरे ही सामने गरियाया था, लेकिन खामोश रहा। आप शायद उस समय समझ रहे थे कि मैं पाषाण-प्रतिमा हूं। लेकिन मैं क्‍या करता। प्रतिमा न बना रहता तो यह भक्‍तगण के नाम पर जिन लोगों की भीड़ मेरे आसपास मंडराती है, वह मुझे नोंच डालती। कि यह काम करो, वह काम करो। घर का घरेलू नौकर बना लेते कि कलुआ जाओ लकड़ी ले आओ, खेत जोत डालो, नाली साफ करो, यह करो, वह करो। धत्‍तेरी की। अरे यह भक्‍त नहीं, बवाल हैं। स्‍वार्थी परले दर्जे के। पहले सिर नवाते थे, फिर बेसन के लड्डू लेकर आये, फिर काजू की बर्फी अब पूरा टोकरा फल-फ्रूट लेकर आते हैं। कहते हैं कि बिजनेस बढ़वा दो, प्रमोशन करवा दो, मकान करवा दो, शादी करवा दो। चूतिया समझ रखा है इन ससुरों ने मुझको। जो लेकर मिठाई-सिठाई लेकर आते हैं, वापसी में वही लेकर लौट जाते हैं। किसी गरीब पर चवन्‍नी नहीं देते। धत्‍त तेरी की, मन तो करता है कि....

अरे छोडि़ये बाबा। गुस्‍सा नक्‍को करते। बारिश की बताइये न, प्‍लीज

सौवीर बाबा, आज तो मुझे बख्‍श दीजिए, प्‍लीज। मेरी भी कुछ फैमिली प्रॉब्‍लम समझने की कोशिश कीजिए प्‍लीज।

कौन सी प्रॉब्‍लम ? आपकी कौन सी प्रॉब्‍लम हन्‍नू बाबा?

आप मुझे बारिश करवाने की बात कर रहे हैं। जबकि मुझे पानी से डर लगता है।

आपको लगता है डर? वह भी पानी से? जरा खुलासा समझाइये न।

अरे सतयुग में जब मैं श्रीलंका गया था न, तब एक दिन पूरी लंका ही फूंकनी पड़ी थी मुझे। बचने-बचाने के चक्‍कर में पूंछ जल गयी थी। गर्मी से राहत हासिल करने के लिए मैं समंदर में कूद गया था। फिर अब मुझे तो पक्‍का पता नहीं कि पूरा मामला क्‍या था, लेकिन कुछ दिन बाद रोहित शेखर की माता उज्‍जवला देवि की तरह एक उलझन फंस गयी। एक मछली अपनी गोद में एक बच्‍चा लेकर आयी और बोली कि यह मकरध्‍वज है। बड़ा टेंशन, खैर छोडि़ये। कल बुधवार है, मैं अभी सीधे मेघनाथ-मेघनथनी के पास जाता हूं, और उनसे कह कर बुधवार की बारिश का सेशन शुरू करा देता हूं। डोंट वरी सौवीर जी। हनुमान पर यकीन रखियेगा। बारिश होगी और कल बुधवार को ही होगी। प्रॉमिस।

और देखिये तो हनुमान जी का वचन कि इस वक्‍त लखनऊ में हनहनउव्‍वा बारिश झमाझम चल रही है।

अरे ओ मोदी भाई ! बारिश शुरू हो गयी है, जरा गरमागरम और कम चीनी वाली चाय और दो पकौड़ा तो लपक कर ले आओ।

एक दिन सम्‍पादक के घर

: कानपुर, देहरादून और अमर उजाला में कानपुर, देहरादून तथा बरेली में सम्‍पादक रह चुके हैं दिनेश जुआल : लैब्राडोर तो ऐसा कूदा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो : वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ का हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं :

कुमार सौवीर

देहरादून : किसी से सहमति अथवा असहमति तो अलग बहस बन सकती है। लेकिन इतना जरूर है कि दिनेश जुयाल से भेंट करना किसी को भी एक अलहदा अनुभूति करा सकता है।

बरेली के अमर उजाला में संपादक पद से रिटायरमेन्ट के बाद जुयाल जी अब देहरादून में बस गए हैं। यहां देहरादून में भी वे हिंदुस्तान दैनिक में सम्पादक रह चुके हैं। मिला, तो लगा कि मुझसे मिलने की ख्वाहिश उन्हें मुझसे ज्यादा थी। एक ही बड़े भूखंड में तीनों भाइयों के परिवार रहते हैं। सब का अलग मकान, लेकिन एक ही परिसर। रसोई भी एक।

गेट से घुसते ही दो-मंजिले मकान की सीढ़ियों पर खड़े जुयाल जी देख कर चहक पड़े। कंधे पर सवार थी एक पालतू बिल्ली, और नीचे भौंकता कुत्ता लैब्राडोर। स्वर आत्मीय। बाद में पता चला कि दोनों एक ही थाली में खाना खाते हैं, बिना गुर्राए। नो झंझट, नो लपड-झपड़।

इधर जुयाल जी से हाथ मिलाने की कोशिश की ही थी, कि बिल्ली उचक कर मेरे कांधे पर सवार हुई। बिना टिकट। लैब्राडोर तो इतना कूदने लगा, मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। उम्र बमुश्किल एक बरस, मगर स्नेह और ऊर्जा का विशाल भंडार। शिशुवत।

कोई भी औपचारिकता नहीं। जिसके जो मन करे, करता रहे। कुछ देर तक मेरे कंधे पर मुफ्त सफर करने के बाद बिल्ली तो राजाजी अभ्यारण्य में रहने वाली अपनी बड़ी भांजियों ( शायद बड़ी बिल्लियों ) से भेंट-मुलाकात करने निकल गयी, लेकिन इधर कुत्ता अपने जात-बिरादरी यानी हम जैसे वाच-डॉग्स से चुहल करने लगा। रिमोट और जुयाल जी का चश्मा मुंह में दबोचना उसका खास शगल है। बेधड़की इत्ती, कि जिस प्लास्टिक वाली पाइप से उसे डांटा जाता है, उसे वह चबा लेता है।

रागिनी भाभी तो जन्मना प्रसन्न व्यक्तित्व। बिना मुस्कान के उनकी कोई भी बात शुरू ही नहीं होती। भोजन तो कुछ ऐसी खास रुचिकर प्रविधि से बनाती हैं कि कोई भी शख्स 25 फीसदी अतिरिक्त राशन उठा ले। मोटे लोग सावधान। बातचीत में अव्वल, जुआल जी की वाकई अर्धांगिनी। जुयाल जी के जीवन के हर लम्हे-मोड़ उन्हें न केवल याद हैं, बल्कि उसका हर स्पंदन, दंश और आनंद भी खूब जानती हैं भाभी। अभी कुछ दिनों से वे बीमार हैं। इसलिए हमारे आने की खबर सुनकर उनकी देवरानी किचन में जुट गई। वह भी गजब की व्यक्तित्व निकली।

दिनेश जी से लंबी बात हुई। रिकार्ड किया। वे खुलकर बोलते हैं, जो सवाल आप न पूछ पाए, उसका भी जवाब दे देंगे। बेहिचक। लेकिन कई मसलों पर साफ कह देंगे कि:-यह ऑफ द रिकार्ड है।

रात को शर्बत-ए-जन्नत हचक कर आत्मसात किया। आधा पेग एक्स्ट्रा खींच लिया मैंने। भोजन के बाद सुबह स्वादिष्ट पोहा। लैब्राडोर से नातेदारी बन ही गई थी। अब शायद उसे विदाई का अहसास हो चुका था, वह शांत लग रहा था। गम के बादल छंट जाएं, यह सोच कर मैंने चलते वक्त उसका माथा चूम लिया।

बस फिर क्या था, अपनी औकात में आ गया। आदमकद छलांगे-कुलांचें मुझ पर भरने लगा। उसकी लार से सारा कपड़ा भीगने के डर से मैं जुयाल जी के भाई की कार में झपट कर घुस गया, जो मुझे पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी परिसर छोड़ने जा रहे थे।

आधा घंटा के सफर के दौरान जुयाल जी के छोटे भाई ने मुझे पहाड़ के बारे में कई मोटी-मोटी मगर गहरी जानकारियां थमा दी।

अब बताइए, कि अब कोई कैसे भूल सकता है जुयाल जी के परिवार को।

(दिनेश जुयाल जी से कई मसलों पर मैंने लम्‍बी बातचीत की है। लेकिन लैपटॉप न होने के चलते उन्‍हें मैं अपलोड नहीं कर पाया। अब उसे विभिन्‍न विषयों पर अलग-अलग वीडियो-क्लिप लगाने की कोशिश करूंगा। )

भूमिहारी-झण्‍डा लेकर दौड़े एसएसपी दीपक कुमार

: छन्‍द-फन्‍द और जोड़-तोड़ में माहिर दीपक कुमार ने भूमिहारों का गृह-कलह सुलझाया : संपादक के घर एसटीएफ की गुंडागर्दी, 13 तथ्‍यों पर निगाह डाल लो, वरना तेरहवीं की तैयारी तो हो ही चुकी : एसटीएफ की करतूत की माफी दीपक ने क्‍यों मांगी, सवाल गरम है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह स्‍वादिष्‍ट पंचमेली चाट है। इसे जो भी चखा है, बरबस चटखारे लगाने लगता है। एक ही मसाला, एक ही नमक, एक ही आलू, एक ही दोना-पत्‍तल, एक ही चम्‍मच, और एक ही स्‍वाद। अलग-अलग आंच वाले अलग-अलग स्‍टोव में विशेष तासीर में पकाई और फिर तली और भूनी गयी है यह चाट। भई वाह, जिसे भी चखा है, मस्‍त हो गया है। सूत्र बताते हैं कि लखनऊ में यह चाट फिलहाल प्रयोग के तहत तैयार की गयी है। इसके आविष्‍कारक हैं भूमिहार चाट कार्नर, जिसने अपनी एक धमाकेदार इंट्री ले कर अपने स्‍वाद के अपने झण्‍डे फहरा दिया है।

गोमती नगर में राकेश तिवारी नामक एक दबंग भूमिहार अपना मकान बना रहा था। उसने भवन निर्माण सामग्री अपने भूमिहार पड़ोसी सुभाष राय के दरवज्‍जे पर कुछ इस तरह ढेर लगा दिया कि रास्‍ता ही जाम हो गया। आना-जाना दूभर हो गया। कार फंस गयी, तो सुभाष राय ने इस पर ऐतराज किया। कई बार डायल-100 पर फोन करने अपनी दिक्‍कत बतायी। हर बार पुलिस ने राकेश को चेतावनी दी कि वह सुभाष राय के घर के सामने लगाये ढेर को हटा ले। पहले तो राकेश तिवारी ने इस पर सदाशयता दिखायी, लेकिन बाद में गुंडई पर आमादा हो गया। सुभाष राय दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स के सम्‍पादक हैं।

कई दिन तक तो सुभाष राय ने सहन किया, लेकिन बाद में उसे कड़े शब्‍दों कहना शुरू कर दिया। इस पर राकेश तिवारी अपनी औकात में आ गये। अगले दिन राकेश तिवारी का एक रिश्‍तेदार रणजीत राय कई गाडि़यों में सुभाष राय के घर धमक पड़ा। पता चला कि रणजीत राय एसटीएफ में इंस्‍पेक्‍टर है, और उसके साथ सुभाष राय के घर घुसे लगे एसटीएफ के ही पुलिसवाले थे। उन लोगों ने सुभाष राय और उनकी पत्‍नी को बुरी तरह अपमानित और आतंकित किया। इतना ही नहीं, चेतावनी भी दी कि उनकी पत्रकारिता यथास्‍थान पर घुसेड़ दी जाएगी।

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बड़ा दारोगा

आहत सुभाष राय ने इस पूरे हादसे को अपनी वाल पर दर्ज किया, तो पूरा पत्रकार जगत में तूफान उमड़ पड़ा। विरोध व्‍यक्‍त करने के लिए गांधी प्रतिमा पर कड़ी धूप में भी भारी संख्‍या में पत्रकार जुट गये। सुभाष राय ने एसटीएफ के आईजी को पत्र लिखा, लेकिन उसका कोई भी जवाब नहीं आया। थाने पर भी वे मुकदमा दर्ज कराने पहुंचे, लेकिन पुलिस ने एफआईआर ही दर्ज नहीं की। हालांकि शासन स्‍तर पर हंगामा पहुंचा, तो डीजीपी ओपी सिंह ने रणजीत राय को कानपुर तबादले पर भेज दिया। उधर पुलिस ने इस मामले में गलती मानने की पेशकश की।

कल 20 जून की शाम लखनऊ के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार अपने लाव-लश्‍कर के साथ सुभाष राय के घर पहुंचे। हालांकि उनके आने से पहले ही सुभाष राय ने अपने कई मित्रों को बुला लिया था। ड्राइंगरूम भर गया था। दीपक कुमार ने सुभाष राय से इस घटना पर खेद व्‍यक्‍त किया और रणजीत राय की करतूत पर माफी मांगी। इस बारे में एक लिखित पत्र भी दीपक कुमार ने सुभाष राय को दिया है, लेकिन सुभाष राय ने इस पत्र को अपनी वाल पर सार्वजनिक नहीं किया है।

यहां कुछ तथ्‍य और कुछ सवाल उठ रहे हैं। पहले तो यह कि राकेश तिवारी, रणजीत राय, दीपक कुमार और सुभाष राय एक ही जाति यानी भूमिहार हैं। ( हालांकि इन चारों में इकलौते सुभाष राय ही ऐसे हैं, जो जाति-धर्म से परे सोचते हैं। उनकी छवि कभी भी किसी जाति-विशेष व्‍यक्ति के तौर पर नहीं रही। वे विशुद्ध लेखक, चिंतक और कवि-साहित्‍यकार हैं, जो अपना पेट पालने के लिए पत्रकारिता की दूकान पर मुनीमी करने बैठने पर मजबूर है। )

दूसरी बात यह कि लखनऊ में कानून-व्‍यवस्‍था की हालत यह है कि कई बार डायल-100 अपनी शिकायत दर्ज कराने का कोई भी मतलब नहीं रह गया है। तीसरी बात यह कि रणजीत को राकेश तिवारी के पक्ष में इतनी गुंडई करने का मकसद क्‍या था, क्‍या वह वाकई राकेश तिवारी का मित्र है, या फिर उस गुंडागर्दी की एवज में उसे मोटी रकम भी मिली थी। चौथी बात कि एसटीएफ या पुलिस के किसी इंस्‍पेक्‍टर की इतनी औकात कैसे हो सकती है कि वह कानून को धता देते हुए किसी गुंडे-मवाली की तरह व्‍यवहार करे। पांचवी बात कि सुभाष राय की अर्जी पर एसटीएफ के आईजी ने क्‍या कार्रवाई की। छठवीं बात कि थाने पर अर्जी देने के बावजूद विभूति खंड थाने ने एफआईआर दर्ज क्‍यों नहीं की।

सातवीं बात यह कि यह मामला तो एसटीएफ के इंस्‍पेक्‍टर और उसके एसटीएफकर्मियों की गुंडागर्दी का था, ऐसी हालत में लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने किस आधार पर प्रायश्चित किया, माफी मांगी और बाकायदा लिखित माफीनामा भी सुभाष राय को थमाया। आठवीं बात यह कि उस माफीनामा पर ऐसा क्‍या है, जिसे न तो दीपक कुमार ने सार्वजनिक किया और न ही सुभाष राय ने अपनी वाल पर शाया करने की जरूरत नहीं समझी। नौंवी बात यह कि इस माफीनामा केवल वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष राय के मामले में होने के चलते लिखा गया है जिनके पक्ष में पूरा पत्रकार समुदाय एकजुट हो गया था। दसवीं बात यह कि अपने लोगों की ऐसी करतूतों पर भी क्‍या भविष्‍य में दीपक कुमार इसी तरह शर्मिंदा होते रहेंगे।

ग्‍यारहवीं बात अपने पुलिसवालों की अतीत या भविष्‍य में होने वाली किन्‍हीं भी करतूतों पर दीपक कुमार सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करते रहेंगे। बारहवीं बात यह कि एसटीएफ के इंस्‍पेक्‍टर सहित अन्‍य एसटीएफकर्मियों पर क्‍या कार्रवाई की जाएगी। और तेरहवीं बात यह कि मुख्‍यमंत्री के प्रमुख सचिव पर रिश्‍वत मांगने का आरोप लगाने वाला अभिषेक गुप्‍ता और हाईकोर्ट के ख्‍यातिनाम अधिवक्‍ता प्रिंस लेनिन के घर घुसकर उनके बुजुर्ग माता-पिता और उनकी बहन के साथ हुई घटना के दोषी पुलिसवालों पर क्‍या कार्रवाई होगी, और दीपक कुमार इस मामले में ऐसा क्‍या करेंगे कि भविष्‍य में ऐसी हालत न हो पाये।

तो दोस्‍तों। यह तो है तेरह बिन्‍दु वाले प्रश्‍न और तथ्‍य।

इनका समाधान हो जाए तो ठीक, वरना प्रशासन और पुलिस की करतूतों के चलते राजधानी समेत पूरे यूपी में कानून-व्‍यवस्‍था की तेरहवीं आयोजित करने का तो पूरी व्‍यवस्‍था तैयारी चल ही रही है।

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पत्रकार पत्रकारिता

आप मासूम बच्‍चों को धर्म की घुट्टी क्‍यों पिला रहे हैं

: वंदना हो ही क्यों ? बच्चे तो स्वयं भगवान की प्रतिमूर्ति : मातृभाषा में ही शिक्षा देते हैं, धार्मिक समूहों को अपने संस्थान चलाने की इजाज़त : अलीगढ़ के मिशनरी स्कूलों को ये आदेश दिए गए हैं कि स्कूल के हिन्दू बच्चों को ईसाई धर्म की शिक्षा :

शीतल पी सिंह

नई दिल्‍ली : मेरी पोती दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ती है जिसे क्रिश्चियन मिशनरी चलाते हैं । क्रिसमस-अवकाश के दौरान वहां क्रिसमस-उत्‍सव की तैयारियाँ चल रही थीं। एक भजनों की डायरी उसके हाथ में थमा दी गयी। पता चला कि उसके स्कूल के हर बच्चे के पास है जिसमें यीशु मसीह की वन्दना करते भजन हैं । अगर वह “शिशु मंदिर”में पढ़ती होती तो दूसरे क़िस्म के भजन गा रही होती और किसी मदरसे में पढ़ रही होती तो तीसरे क़िस्म के !

सवाल यह है कि शिक्षा संस्थानों में बच्चों को ज़बरन धर्म की घुट्टी पिलाने वाले किसी भी करतब की अनुमति एक धर्म निरपेक्ष देश में क्यों होनी चाहिये ?

शीतल की इस वाल पर इस पोस्‍ट होते ही विचारों का तांता लग गया। किसी ने लिखा कि इजराइल और जापान ,न केवल शिक्षा में एकरुपता है, बल्कि अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा देते हैं। एक का कहना था कि धार्मिक समूहों को अपने संस्थान चलाने की इजाज़त है जहाँ वे अपनी श्रद्धा के हिसाब से भजन गवाते हैं। उधर एक ने बताया कि अलीगढ़ के मिशनरी स्कूलों को ये आदेश दिए गए हैं कि स्कूल के हिन्दू बच्चों को ईसाई धर्म की शिक्षा न दें। जबकि एक अन्‍य का कहना था कि जबरदस्ती धर्म-ईश्वर का अफीम चटा रहे हैं बच्चों को। अधिकांश गार्जियन इससे बड़े खुश हो जाते हैं।

आइये देखिये कि बाकी लोगों का इस पोस्‍ट पर क्‍या-क्‍या कहना है: -

Gaurav Singh Rathore नही होनी चाहिए .. सहमत सर ।।

Vikas Tailor Feeding religion via education is the root cause of making it legalized! It should be ended

Prabhat Kumar जो सेंसस कराया था उसके भी आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।

शिखा अपराजिता इसीलिए हम कॉमन स्कूल सिस्टम की मांग करते हैं

Pinto CP Ignatius Government school zindabad

शिखा अपराजिता Government school भी कॉमन , केन्द्रीय विद्यालय , नवोदय , नेतरहाट , जिला स्कूल , वरीय स्कूल , इतने सारे संस्तर का कोई मतलब नहीं , जब सब नागरिक समान हैं

Deepak Singh sahi kaha aapne

Pankaj Srivastava धार्मिक समूहों को अपने संस्थान चलाने की इजाज़त है जहाँ वे अपनी श्रद्धा के हिसाब से भजन गवाते हैं...सरकारी स्कूलों में सब प्रार्थनाएँ हिंदू धर्म की चलती हैं...बेहतर हो कि प्रार्थनाओं का रिवाज ही बंद हो...या फिर सभी धर्मों की जानकारी दी जाए और बच्चे आगे चलकर अपना धर्म खुद चुनें...नास्तिकता के तर्कों से भी परिचित कराया जाए...पर इन बातों का कोई अर्थ नहीं..अभी सबके लिए ब्लैकबोर्ड भी नहीं है...

Raj Kumar सिखाएं, लेकिन अन्य धर्म के पर्व-त्योहार पर भी उसी जोश, उत्साह से सिखाएं, ताकि बच्चे धर्म के साथ संस्कृति को जान सकें।

Ratan Pandit भाई आपकी लिस्ट में कोई भक्त तो नहीं???

Ahmad Kamal Siddiqui स्कूल के फार्म पर धर्म वाला कालम ही नहीं होना चाहिए,,,,

Manika Mohini शाम टी वी में कुछ ऐसी ही खबर आ रही थी कि अलीगढ़ के मिशनरी स्कूलों को ये आदेश दिए गए हैं कि स्कूल के हिन्दू बच्चों को ईसाई धर्म की शिक्षा न दें।

Kapilesh Prasad ऐसी अनुमति बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।

Santosh Kr. Pandey Prashn ye Hai ki aap bitiya ko Christian school me kyo bhejte haiN jabki naam see aap Hindu haiN ? Isi me aapke prashn ka uttar Hai. Bakiya siddhant tou upar Kai logoN ne thela Hai lekin wahan se koi raah na niklegi aur na hi milegi.

Sheetal P Singh दिल्ली में स्कूल चुनना किसी के हाथ में नहीं । स्कूल में दाख़िला मिलना एक असाधारण प्रतियोगिता है । नेबरहुड मेरिट में उसे यह स्कूल मिला था !

SO U R Abh गर वो शिशु मंदिर में पढ़ती तो 'वंदे सदा वत्सले मातृभूमि' पढ़ती जिसमे मातृभूमि की आराधना है. क्या गलत पढ़ती. आज प्राइवेट व मिशनरी स्कूल की भारी भरकम फीस के मुकाबले शिशु मंदिर की सस्ती फीस मे उच्च गुणवत्ता की पढ़ाई मिल जाती हैं.बिटिया को वहीं भेज दीजिए. शिशु मंदिर वाले ना जात देखते हैं ना धर्म. याद है ना आसाम का मुस्लिम धर्मावलंबी छात्र जोकि शिशु मंदिर में पढ़ता था इंडिया टॉपर था.

Vijay Kumar बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। आज मेरी बेटी ने बताया कि उसके स्कूल (CMS) में आज कोई बाबाजी आये थे और उन्होंने सभी बच्चों को गीता पढ़ाई है। ये स्कूल, जहां हमलोग अपने बच्चों को शिक्षा पाने को भेजते हैं, जबरदस्ती धर्म-ईश्वर का अफीम चटा रहे हैं बच्चों को। अधिकांश गार्जियन इससे बड़े खुश भी होंगे, की चलो कम-से-कम स्कूल ने महान सनातन संस्कृति का ख्याल तो रखा..

Avanish Mishra Cms m gandi ji roj gita padate lkin sir sb jagh prob hai ap prob jan k bhi wahi bhejenge padne k lie

Shamim Ansari kisi ke liye ye choot nhi honi chahiye .....it should be private

Imraan Imran मैं भी जिस कैथोलिक्स स्कूल में पढ़ा हू वहां की डायरी के पहले दस पंद्रह पन्नो पे यीशु के गुणगान करते भजन लिखे होते थे जिन्हे हम सब असेम्ब्ली में ऱोज गाते थे

अच्छी बातें ही लिखी होती थी उनमे तो कभी किसी ने ऐतराज़ भी नहीं किया.! पर ये ग़ैर ज़रूरी चीज़ बंद कर देनी चाहिये स्कूलों में ..!

Saurav Sharma सब फर्जी हैं ये

Parveen Abbasi मुझे नही लगता मिशनरी स्कूलों से अच्छी training कहीं होती हे

Sheetal P Singh विषय पर रहें ।

Prakash Govind सवाल ये है कि स्कूल के माहौल में/पाठ्यक्रम में वंदना हो ही क्यों ?? ये बच्चे तो स्वयम में भगवान की प्रतिमूर्ति हैं

Gati Upadhyay Maaf kijiyega sir Kya ap missonry likhte waqt smjh nhi paye ki missionary ka primary mission Kya h secondary mission educate krna... Siksha agr dharm se nhi judegi... To mass education impossible h... Is bat ka Rona rone ka Kya mtlb h kuch smjh nhi pa rhi hu.. Apki bato se pahli bar asahmat hu

Suvesh Verma शिक्षा ही एकता के सूत्र में बाँधती है। लेकिन भारत ही शायद विश्व का एकमात्र देश होगा,जहाँ शिक्षा की ही एकता नही है और मनमानी शिक्षा दी जा रही है। इजराइल और जापान ,न केवल शिक्षा में एकरुपता है, बल्कि अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा देते हैं,अपनी शिक्षा के बलबूते ही खड़े हैं।

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