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सक्सेस सांग

सच है कि अधिकांश महिला पीसीएस अफसर होती हैं बेहद तर्रार, ईमानदार

: काश यही तेवर सभी पीसीएस अफसरों में होता जो निधि ने दिखाया : चंदा निगम तो साक्षात नर्क रहीं, लेकिन रेखा गुप्‍ता, मंजू चन्‍द्रा, श्रद्धा, पुष्‍पा, संघमित्रा जैसी महिलाओं ने पीसीएस अफसरों की नाक बचायी : बधाई दीजिए, सीतापुर की ईमानदार और बहादुर एसडीएम को, जिसे एक मंत्री ने सस्‍पेंड करा रखा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पश्चिम और बुंदेलखंड के लोग शब्‍दावली और उनके बहुअर्थी भावों को समझ पाने में अक्‍सर गच्‍चा खा जाते हैं, लेकिन पूर्वांचल और अवध में पीसीएस का अर्थ अलग लगाया जाता है, और एसडीएम का अर्थ दूसरा। बहरहाल, हकीकत यही है कि एसडीएम वाले पीसीएस अफसरों का चरित्र गजब पलटा खाता रहता है। उनकी मजबूरी भी होती है, सरकार और आईएएस अफसरों का भारी बोझा उनकी पीठ पर होता है कि उसके चलते वे सीधे खड़े भी नहीं पाते। ऐसे में उनमें चारित्रिक स्‍खलन बहुत जल्‍दी हो जाता है। लेकिन गनीमत यह है कि इस सेवा की नाक को हमेशा इसी सेवा की महिलाओं ने बचाये रखा है। लखनऊ की एडीएम ( वित्‍त-राजस्‍व) निधि श्रीवास्‍तव ने कल जो गरज कर ललकार दी है जो आजकल के अफसरों में बिरला ही है। लखनऊ में वकीलों द्वारा पीसीएस अफसरों और अदालत-कक्षों में हुए हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए निधि बोलीं:- हम अपनी गरिमा और इज्‍जत बेच कर नौकरी नहीं करेंगे।

सलाम है लखनऊ की ऐसी बहादुर एडीएम निधि श्रीवास्‍तव को। हकीकत यही है कि पीसीएस अफसरों की नाक इस संवर्ग की महिला अफसरों ने ही बचायी है। चाहे वह उनकी कार्यशैली हो, मेहनत हो, समर्पण हो, और या फिर वह बहादुरी-जाबांजी, जो निधि ने दिखायी है। हालांकि इस संवर्ग के इतिहास में ऐसी कलंक जैसी महिलाएं भी अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं, जो जीवन और सेवा के हर क्षेत्र में किसी भद्दे और डरावने काला धब्‍बा से कम नहीं है। इस छोटी सी लिस्‍ट में चंदा निगम जैसी चंद महिला अफसरों का नाम पहले पायदान में दर्ज हैं।

लेकिन सच बात तो यही है कि इस संवर्ग में महिलाओं की शासकीय निष्‍ठा और गम्‍भीरता हमेशा हमेशा सर्वोच्‍च रही है। चाहे वह रेखा गुप्‍ता रही हों, या फिर मंजू चंद्रा, श्रद्धा मिश्रा,  पुष्‍पा सिंह, संघमित्रा शंकर और ऐसी कई महिलाएं। इनमें से कई महिलाओं को षडयंत्र के तहत कई बार दंडित भी किया गया और उनकी छवि धूमिल करने की साजिशें की गयीं, लेकिन यह महिलाएं अपना बनाये रहीं, और अपने संवर्ग की शान बनी ही रहीं। आज भी इन महिलाओं का नाम समाज और उनके संवर्ग में बेहद सम्‍मान और गर्व के साथ लिया जाता है।

रेखा गुप्‍ता ने लखनऊ में पूरी नौकरी भले ही जीवन भर की, लेकिन इस लखनऊ को खूब दिया भी। भाजपा सरकार में नगर विकास मंत्री रहे लालजी टंडन ने रेखा गुप्‍ता को आयरन लेडी के नाम से पुकारना शुरू कर दिया था। मंजू चंद्रा, श्रद्धा मिश्रा का पूरा जीवन बेदाग रहा, हालांकि श्रद्धा पर नौकरी के अंतिम दौर में निलम्‍बन की तलवार चल गयी, लेकिन इसमें भी वे बेदाग निकलीं। यही हालत पुष्‍पा सिंह और संघमिश्रा शंकर की भी रही। हालांकि यह इन दोनों के पास एक राजनीतिक विरासत मौजूद थी, लेकिन इसके बावजूद इन लोगों ने उसका कभी भी प्रयोग अपनी नौकरी पर नहीं किया।

आज यह कहने का मकसद यह नहीं है कि हम यूपी के पुरूष पीसीएस अफसरों को कमतर साबित कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि पुरूष पीसीएस अफसर नाकाबिल और नाकारा हैं, लेकिन इतना तो जरूर ही है कि इन अफसरों ने प्रतिकूल हालातों को शायद कम ही महसूस किया होगा। बहरहाल, इस पूरी बात को कहने का मकसद केवल इन महिलाओं का हौसला-आफजाई करना ही है।

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सठियाना तो एक तोहफा है, जिन्‍दगी का असली आनन्‍द है सठियाना

: ढाई दर्जन से ज्‍यादा भाषाओं के प्रकाण्‍ड पण्डित है निहाल मियां : भाषा सिखाने में पूरा जीवन खपा लिया निहाल उद्दीन उस्‍मानी ने : 16 साल तक का वक्‍त क्‍लास में खटने के बावजूद अगर पढ़ना, सीखना, समझना और बोलने की तमीज न हो, तो यकीनन शर्म की बात है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बातचीत में आवाज को अटक-भटक देने वाले, कद इत्‍ता बड़ा कि मानो आसमान से सलमा-सितारा नोंच लायेंगे, चाल ऐसी कि नाजनीनें शरमा जाएं, मुस्‍की ऐसी कि, कि, कि , खैर छोडि़ये। वरना बातचीत किसी और ट्रैक पर पहुंच जाएगी। फिर तो बात शुरू हो जाएगी उनकी कंजूसी पर, उनकी नौकरी पर, उनकी मोहब्‍बत और इश्‍क पर, उनकी मुश्‍क पर, उस्‍मानी पर, जिस्‍मानी पर, झाड़-झंझट पर, वगैरह-वगैरह। हमें इन सब पर क्‍या लेना-देना। है कि नहीं?

तो जनाब, आज हम बात कर रहे हैं निहाल मियां की। निहाल मियां बोले तो निहाल उद्दीन उस्‍मानी। अरे वही निहाल, जो बाराबंकी को भले ही निहाल नहीं कर पाये लेकिन हरिद्वार से लेकर का-नी-का कुम्‍भ तक का कवरेज कर-करा चुके हैं। लेकिन हरिद्वार से ही उन्‍हें भाषा के हरि के दरवाजे का दर्शन करने का मौका मिला, और निहाल उद्दीन उस्‍सानी हमेशा के लिए राहुल सांकृत्‍यायन हो गये। प्रकाण्‍ड पंडित। फिर क्‍या था, निहाल का टेम्‍पो हाई हो गया।

अब थोड़ा पीछे से बात की जाए। निहाल ने अंग्रेजी में एमए किया, और फिर सन-77 में उप्र सूचना विभाग में उन्‍हें अनुवादक के पद पर नौकरी मिल गयी। पोस्टिंग हुई हरिद्वार में। सन-84 में उन्‍हें सूचना अधिकारी के तौर प्रोन्‍नति मिली और फिर कुम्‍भ में गजब मेहनत कर लिया उन्‍होंने। यह दायित्‍व उनके हरि-द्वार में प्रवेशद्वार की दक्षिणा अथवा उनके यज्ञोपवीत के तौर पर देख जा सकता है। जहां उन्‍होंने अपने प्रति सूचना विभाग जैसे सरकारी विभाग में उपेक्षा और अपमान का दंश झेला, जहां नियम तो खूब हैं, लेकिन उनका पालन करने-कराने वाले एक भी व्‍यक्ति नहीं। किसी में साहस तक नहीं है कि इन नियमों का पालन करा सके। थोपे गये अफसर यहां दबंग और दरिंदों की तरह नोंचते-खसोटते रहते हैं, और सूचना विभाग के मूल आदिवासी उन अफसरों के हरम की बेगमों की तरह अपनी शौहर से चंद पल छीनने की जद्दोजहद में सहकर्मियों के बीच अन्‍तर्कलह में जुटे रहते हैं। लेकिन निहाल उन हरम-कलह से असंपृक्‍त रहे, लेकिन इसी हालत ने उन्‍हें स्‍वर्ग-आरोहण के मार्ग पर आगे बढ़ा दिया। सूचना विभाग की नौकरी उन्‍होंने मार्च-10 में हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दी, पिण्‍ड छूटा।

भाषा सीखना, बोलना, लिखना, सिखाना और पढ़ाना उनके सिर पर किसी जिन्‍न-भूत की तरह चढ़ा रहता है। आज हालत यह है कि निहाल मियां ढाई दर्जन से ज्‍यादा भाषाओं के प्रकाण्‍ड पण्डित माने जाने हैं। भाषा सिखाने में पूरा जीवन खपा लिया निहाल उद्दीन उस्‍मानी ने। निहाल तो भाषा की एडवांस टीचिंग के हिमायत करते हैं। उन्‍होंने इसके लिए खासी मेहनत की है, अथक। वरना मजाल है किसी की, कि कोई किसी को महज 7 दिनों में भाषा सिखा दे। उर्दू तो वे सिर्फ चार दिनों में सिखा देते हैं, बशर्ते छात्र भी उतनी ही मेहनत करे। इतना ही नहीं, निहाल का दावा है कि वे किसी भी भाषा को तीन महीने में बखूबी और पूरी बारीकी के साथ सिखा सकते हैं। शर्त वही, कि छात्र में भी माद्दा-ख्‍वाहिश और दम-खम हो। निहाल बताते हैं कि 16 साल तक का वक्‍त क्‍लास में खटने के बावजूद अगर किसी में पढ़ना, सीखना, समझना और बोलने की तमीज न हो, तो यकीनन शर्म की बात है।

निहाल उद्दीन उस्‍मानी इस क्षेत्र में अकेले नहीं हैं। उनकी टोली में दिव्‍यरंजन पाठक और डॉ आरती बरनवाल भी शामिल हैं। इन तीनों ने भाषा सिखाने के कई कैम्‍प एकसाथ भी चलाये हैं। दिव्‍य रंजन पाठक और डॉ आरती भी भाषा पढ़ते नहीं, जीते हैं। पाठक तो फ्रीलांसर शिक्षक हैं, जबकि डॉ आरती कानपुर के सेंट्रल स्‍कूल में शिक्षिका हैं। इन दोनों पर बाद में अलग-अलग खबरें लिखी जाएंगी। लेकिन इतना जरूर बता दें कि इन लोगों को आपस में बातचीत करते वक्‍त आप समझ ही नहीं पायेंगे कि वे किस भाषा में बातचीत कर रहे हैं। जैसे अंग्रेजी, उसी तरह, उर्दू, गुजराती ही नहीं, बल्कि संस्‍कृ‍त भी।

तीन बच्‍चे है निहाल के। एक सबा, एक निदा और एक सदफ। सूचना विभाग में संयुक्‍त निदेशक रह चुकीं कुलश्रेष्‍ठ उनकी पत्‍नी है। लेकिन दूसरी मोहब्‍बत का नाम है भाषा। उन्‍हें हिन्‍दी, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी, बांग्‍ला, तमिल, कन्‍नड, गुजराती, मराठी, अरबी, पंजाबी, स्‍पेनिश, फ्रेंच समेत करीब ढाई दर्जन से ज्‍यादा भाषाओं में महारत है। निहाल ने अरबी जैसी निहायत क्लिष्‍ट भाषाओं से हिन्‍दी सिखाने की एक नायाब तकनीकी इजाद की है। वे अब अपने अपनी तकनीकी को वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर अपलोड कर चुके हैं, जिनकी तादात करीब ढाई हजार से ज्‍यादा है।

पराली पर बवाल: दिल्‍ली में भी मौजूद हैं बड़ी-बड़ी छोटी-सोनालियां पलाक्षियां

: सोनाली को चंडीगढ़ सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 11 हजार का पुरस्‍कार दिया : पत्रकार की पोती नन्‍हीं परी पलाक्षी की प्रदूषण विरोधी युद्ध की सबसे बड़ी सेनानी है : इस बच्‍ची ने अपनी शिक्षक और मां का कहना माना, और पटाखा को नो कह दिया :

दिल्‍ली : एक तरफ चंडीगढ से खबर आ रही है कि फसल का अवशेष (पराली) जलाने पर पिता की शिकायत करने उस पर जुर्माना कराने वाली किशोरी को प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड सम्मानित किया जाएगा। बोर्ड उसे 11 हजार रुपये और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित करेगा। दीपावली पर लोगों खासकर बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए यह कदम उठाया गया है। उसी दूसरी ओर दिल्‍ली की एक नन्‍हीं बच्‍ची पलाक्षी ने दिल्‍ली के प्रदूषण के खिलाफ बाकायदा जेहाद छेड़ दिया है। इस नन्‍हीं पर्यावरण-परी ने संकल्‍प लिया है कि वह न तो पटाखा चलायेगी, और न ही इस बारे में लोगों को जागरूक भी करेगी।

बता दें कि जींद जिले के गांव ढाकल निवासी सोनाली श्योकंद ने स्थानीय प्रदूषण नियंत्रक अधिकारियों को पिता द्वारा पराली जलाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। सोनाली ने कहा कि समझाने के बावजूद पिता मानने को तैयार नही थे और धान की फसल काटने के बाद खेत में ही पराली जला दी। किसान को 2500 रुपये का जुर्माना लगाया गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारिय के अनुसार, पर्यावरण बचाने के लिए किशोरी की सोच को सलाम करते हुए उसे सम्मानित किया जाएगा। बोर्ड अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे अन्य बच्चों, युवाओं और किसानों को फसल अवशेष जलाने से रोकने की प्रेरणा मिलेगी।

बता दें कि हरियाणा सहित कई राज्यों में खेतों में पराली जलाने से भारी वायू प्रदूषण होता है और ठंड के मौसम में यह घने कोहरे में तब्दील हो जाता है। इससे लोगा को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार ने खेतों में पराली जलाने पर रोक लगा रखी है, इसक बावजूद किसान इससे बाज नहीं आ रहे। सोनाली श्योकंद को रांंज्य में फसलों के अवशेष न जलाने के लिए दिए गए अपने इस महत्वपूर्ण योगदान के लिए 11,000 रुपये की नकद राशि देकर सम्मानित किया जाएगा।

राष्ट्रीय राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल, नई दिल्ली ने राज्य प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड और राज्य सरकार को फसल के अवशेष जलाने के बारे में जिला स्तर पर जागरूकता लाने के लिए कमिटी गठित करने के निर्देश दिए थे। ये कमिटियां कैंपेन के माध्यम से पराली जलाने के मामलों की रोकथाम के लिए निगरानी करेंगी। बोर्ड अधिकारियों को आशा है कि इससे अन्य बच्चों, युवाओं और किसानों को वर्तमान कटाई मौसम में फसलों के अवशेष जलाने को रोकने के लिए प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि बच्चों को ग्रीन दीपावली मनाने को प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि पटाखों का कम से उपयोग हो और दिल्ली व एनसीआर क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को कम किया जा सके।

उधर दक्षिण दिल्‍ली में एक बच्‍ची ने पटाखों को नो कह दिया। एक पत्रकार शीतल सिंह की पोती पलाक्षी दक्षिण दिल्‍ली के वसंत कुंज में रहती है। नाम है आनंद निकेतन वाला माउंट कार्मल स्‍कूल।  उसने इस बार तय कर लिया कि वह दीपावली में प्रदूषण के कारक तत्‍वों का बहिष्‍कार कर लेगी। कक्षा एक में पढ़ने वाली इस बच्‍ची को उसके दादा शीतल पर्यावरण-परी कहते हैं। शीतल ने बताया कि इस नन्‍हीं सी परी पलाक्ष ने इस साल एक भी पटाखा नहीं चलाया। इतना ही नहीं, उसने आसपास की कालोनियों के बच्‍चों को भी प्रदूषण के खतरों को लेकर उन्‍हें जागरूक किया और अपील की कि आइंदा वे भी पटाखा ही नहीं, बल्कि ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे, जिससे दिल्‍ली या हमारे समाज के आसपास प्रदूषण बढ़े। उसकी अपील है कि वे सब मिल कर पौधारोपण करें।

हरियाणा में पराली जलाने पर हंगामा: बेटी ने बाप पर लगवा दिया जुर्माना

: आइये, इन बेटियों के लिए तालियां बजायी जाएं : दिल्‍ली की नन्‍हीं बेटी ने साफ मना कर दिया, मैं नहीं जलाऊंगी पटाखे : सुप्रीम कोर्ट तक सख्‍त हो चुकी है वायु-प्रदूषण के कारक पराली जलाने के अपराधों पर :

दिल्‍ली : राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इन दिनों प्रदूषण का लेवल काफी बढ़ा हुआ है। दीपावली से पहले दिल्ली में प्रदूषण का लेवल बढ़ने की एक वजह किसानों द्वारा हरियाणा और पंजाब में पराली जलाना माना गया था. ऐसे में सरकार ने किसानों को पराली जलाने से मना किया था। लेकिन इसके बावजूद जब एक किसान ने पराली जलाई तो उसके खिलाफ उसकी बेटी ही कमर कस कर खड़ी हो गयी। हालत यह हुई कि पराली जलाने पर आमादा किसान की कोशिशो के खिलफ उसकी बेटी सीधे सरकारी अफसरों से मिली और अपने ही पिता के खिलाफ शिकायत करके उनपर जुर्माना ठुंकवा दिया।

मतलब यह कि बेटियों के मामले में अब तक अभागे ही रहे हरियाणा की बेटियों ने अपने पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए बाकायदा जेहाद छेड़ दिया है। लेकिन इसके बावजूद यह कोशिश केवल एक नन्‍ही सी किरण मात्र ही है। इस बच्‍ची की कोशिश के मुकाबले हरियाणा के किसान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। उनका कहना है कि चाहे अदालती आदेश हो या फिर प्रशासनिक कोशिशें, हम हर कीमत पर पराली जलाते रहेंगे। इतना ही नहीं, इन किसानों ने यह तय किया है कि वे प्रशासन को बाकायदा ज्ञापन देकर खुलेआम पराली जलायेंगे और ऐसा करने के पहले प्रशासन को समय के बारे में बाकायदा सूचित भी कर देगे।

इन किसानों की हठधर्मी ने दिल्‍ली एनसीआर में किसी भयावह हादसे के हालात पैदा कर दिये हैं। पिछले एक हफ्ते से छाये हुए जहरीले धुंआ के घने बादलों ने धुंध का गहरा खतरा पैदा कर दिया है। सुबह के समय तो पूरी दिल्‍ली की हालत तो किसी अंधे की तरह ही दिख रही थी। चंद फीट तक की दूरी देखने की क्षमता दिल्‍लीवालों में खत्‍म हो चुकी थी। यही हालत पिछले  एक हफते से जारी है।

लेकिन इस बीच किसी सुनहरी सुबह की तरह बेटियों ने कमर कस ली। हरियाणा के जींद की एक बेटी ने बार-बार मना करने के बाद भी पराली जलाने पर अपने ही पिता की कृषि विभाग में की शिकायत कर दी. जिसके बाद विभाग के अधिकारियों ने इसकी जांच की और पराली जलाने का दोषी पाए जाने पर विभाग ने पिता पर 2500 रूपये का जुर्माना लगाया. बेटी का कहना है कि, ”गलत तो गलत होता है, चाहे वह पिता ने किया हो या फिर भाई ने.” इसके साथ ही बेटी ने की सभी माताओं और बहनों से अपील की कि जहां भी प्रदूषण हो रहा हो उसे रोकें. बेटी ने अपने पिता को कई बार समझाया था।

पूरा मामला जींद के ढाकल गांव का है. जहां एक किसान शमशेर श्योकंद अपने खेत में पड़ी पराली को जलाना चाहता था. यह बात शमशेर की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी सोनाली के कानों में खबर पड़ी तो उसने अपने पिता को कहा कि वह ऐसा न करें क्योंकि पराली जलाना अपराध करना है. बेटी ने पिता को कई बार समझाया लेकिन पिता ने एक नहीं सुनी और खेत में पड़ी पराली को आग लगा दी. बेटी जब सुबह गांव से दूर नरवाना शहर के आर्य कन्या स्कूल में पढ़ने के लिए निकली तो वह पहले सीधा नरवाना स्थित कृषि विभाग पहुंची. उसने विभाग को पिता की शिकायत दी. शिकायत मिलने पर कृषि विभाग के अधिकारी हरकत में आएं. ब्लॉक एग्रीकल्चर ऑफिसर के मुताबिक विभाग के लोगों ने मौके का मुआयना किया और दोषी पाए जाने पर पिता को 2500 रूपये का जुर्माना लगाया गया.

बेटी सोनाली का कहना है कि पिता की शिकायत करना मेरे लिए बड़ा मुश्किल था लेकिन गलत तो गलत होता है चाहे वह पिता ने किया हो या फिर भाई ने. सोनाली का साथ ही यह भी कहना है कि पराली जलाने से प्रदूषण फैलता है इसलिए वह सभी माताओं और बहनों से भी अपील करती है कि जहां इस प्रकार का प्रदूषण हो रहा है उसे तुरंत रोका जाएं. सोनाली ने एक बात और कही है. वह यह है कि सरकार कब बजट का कोई ऐसा समाधान ढूढे़ ताकि किसानों को पराली न जलानी पड़े.

नितीश कटारा की मां बोली:- मुझे देश की बेटियों से शिकायत है

: पश्चिम उत्‍तर प्रदेश का कुख्‍यात अपराधी माना जाता है डीपी यादव : जो जानते थे वे कतरा कर चले गये, और जो अनजान थे, उम्‍मीद की किरण बन गये : एक जुझारू मां की बात सुनिये जिसने अपने बेटे के हत्‍यारों को हमेशा के लिए जेल तक ठूंसने का संघर्ष किया :

निर्मल पाठक

नई दिल्‍ली: चौदह साल के लंबे संघर्ष के बाद वह कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं। अपने बेटे के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए नीलम कटारा ने जो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, वह उनके जज्बे को तो बताती ही है, व्यवस्था के प्रति हमारी आस्था भी बढ़ाती है। नीतीश कटारा हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बाद जब नीलम कटारा अपने अगले सफर की तैयारी कर रही हैं, तो उनसे बातचीत की दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक ने।

- नीतीश कटारा हत्याकांड के मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसका असर कहां तक पड़ेगा?

फैसले के बाद मुझे ऐसे बहुत से लोगों की तरफ से भी प्रतिक्रियाएं मिली हैं, जिन्हें मैं जानती तक नहीं। यह केवल कानूनी लड़ाई की वजह से नहीं। लोगों के जीवन में कई तरह के संघर्ष हैं। लोग कई बार छोटे-छोटे मसलों पर भी परेशान हो जाते हैं। वे अब मुझसे बात करते हैं और कहते हैं कि कैसे मैंने उनका मनोबल बढ़ाया है, उन्हें प्रेरणा दी है। कुछ समय पहले एक रेस्तरां में एक पिता अपनी 12 वर्ष की बेटी को मेरे पास लाए और कहा कि यह आपसे मिलना चाहती थी। उस बच्ची ने बताया कि किस तरह वह इस केस में दिलचस्पी ले रही थी। ऐसे बहुत से किस्से हैं।

- जिस तरह के लोग इस मामले में शमिल थे, उसे देखते हुए इतनी लंबी लड़ाई लड़ना आसान नहीं था। कहां से ताकत मिली आपको?

पता नहीं...। दैवीय ताकत ही होगी कोई। मैंने तो कभी परेशानी देखी ही नहीं थी। बचपन में, स्कूल में, पढ़ाई से लेकर शादी होने और बच्चों के बडे़ होने तक कभी किसी दिक्कत का सामना करना ही नहीं पड़ा था। और अचानक एक दिन पूरी दुनिया ही बदल गई। मुझे लगता है कि मैंने जिस हाल में अपने बेटे (लाश) को देखा, वह क्षण था, जब मुझे लगा कि मैं अगर टूट गई, तो इस बच्चे को न्याय नहीं मिलेगा। जब वह घर से निकला था, तो एक शादी के समारोह में जाने के लिए पूरी तरह सज-धजकर निकला था। और यहां... मैं वहां गई थी शिनाख्त के लिए और मुझे आधा मिनट भी नहीं लगा पहचानने में। दृश्य देखकर मैं हिल गई थी, मेरे पांव कांपने लगे थे। लेकिन फिर मैंने सोचने में जरा भी देर नहीं की। वह खुद भी कहीं अन्याय होते देखता, तो परेशान हो जाता था। मैंने सोचा, उसके लिए लड़ना पड़ेगा। और फिर किसी दूसरे के बच्चे के साथ ऐसा न हो। मैं तो घर से बाहर के हर काम के लिए हमेशा अपने पति पर निर्भर रही। इसलिए मुझे लगता है कि भगवान ने ही मुझे शक्ति दी। पोस्टमार्टम, डीएनए टेस्ट वगैरह कानूनी औपचारिकताओं को लेकर मैं जिस तरह के सवाल कर रही थी, मेरे साथ वाले भी आश्चर्यचकित थे। मुझे ध्यान आया कि जेसिका लाल के प्रकरण में डीएनए से छेड़छाड़ की खबरें आई थीं। मैंने वहीं फैसला किया कि डीएनए टेस्ट गाजियाबाद में नहीं, दिल्ली में होगा।

- बेटे के साथ हादसा, फिर आपके पति नहीं रहे। 14 साल के संघर्ष में आपको कभी लगा कि अब हिम्मत जवाब दे रही है?

लगता था कभी-कभी। बहुत सारी दिक्कतें थीं। मैं खुद नौकरी कर रही थी। आर्थिक दिक्कतें थीं। केस लड़ने के लिए अच्छे वकील की जरूरत होती है और पैसा भी लगता है। इसलिए कभी-कभी लगता था कि बस हो गया। पर ऊपर वाला समस्याएं हल कर देता था। फिर एक स्टेज ऐसी आ गई थी, चार-पांच साल बाद, जब लगा कि अब छोड़ा, तो पिछली सब मेहनत बेकार चली जाएगी। भारती यादव को गवाही के लिए लाना सबसे थकाऊ प्रक्रिया साबित हुई। 30-40 आदेश हैं, ढेर सारी चिट्ठियां हैं। उसमें बहुत दौड़-भाग करनी पड़ी। उसको लाने में सफलता मिली, उससे भी आत्मविश्वास बढ़ा। तब तक मुझे यह फीडबैक मिलने लगा था कि जो मैं कर रही हूं, वह केवल एक कोर्ट केस नहीं है। मीडिया ने साथ दिया, जिससे मुझे लगा कि मैं अकेली नहीं हूं।

- आपके सामने आपराधिक बैकग्राउंड और राजनीतिक रसूख वाले लोग थे। कभी धमकियां मिलीं? डर लगा?

हां, धमकियां मिलीं। शुरू में तो मुझे आपराधिक बैकग्राउंड के बारे में इतना पता भी नहीं था। यह पता था कि नेता हैं और जैसी धारणा है नेताओं के बारे में कि भ्रष्ट होते हैं। बस उतना ही पता था। विकास यादव के बारे में जानकारी थी कि जेसिका लाल केस में शामिल है, पर उसके आपराधिक इतिहास के बारे में पता नहीं था। नीतीश ने कभी इस तरह से जिक्र नहीं किया था अपने और भारती के अफेयर के बारे में। जब डीपी यादव पर मकोका के तहत मामला दर्ज हुआ, तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। तीन तरह के फोन और पत्र आते थे। कुछ मदद करना चाहते थे, पर सामने नहीं आना चाहते थे। दूसरे सीधे धमकी वाले होते थे कि आपको और आपके पति को बाइज्जत आपके बेटे के पास पहुंचा दिया जाएगा। और तीसरे होते थे, जो कहते थे कि हमने भी लड़ाई लड़ी, पर बर्बाद हो गए। ये सब अज्ञात थे, कोई खुलकर सामने नहीं आया, इसलिए मैंने भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी।

- राजनीतिक दलों की ओर से किसी ने कभी मदद की पेशकश की?

नहीं। बिल्कुल नहीं। जिनको मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती थी, जैसे कांग्रेस की नेता मोहसिना किदवई। उनकी बेटी और मैं साथ पढ़े थे लखनऊ में। इस नाते वह जानती थीं। नीतीश की तेरहवीं में वह आई थीं। ऐसे ही कुछ और भी थे, पर वह केवल मिलने तक सीमित था। एक और नेता, जो उस समय भाजपा सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री थे, उनके सबसे नजदीकी सहायक को मैं जानती थी। उन्हें जरूर मैंने फोन किया। वह मिलने भी आए, लेकिन जो सलाह उन्होंने दी, उससे मुझे बड़ी हैरत हुई। उन्होंने कहा, आप मीडिया के चक्कर में ज्यादा न पड़ें, इससे आप परेशानी में भी आ सकती हैं। अब मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूं कि मैंने उनकी सलाह नहीं मानी, वरना यह केस तो आगे बढ़ता ही नहीं।

- इस दौरान कभी विकास यादव, विशाल यादव या डीपी यादव से कहीं आमना-सामना हुआ?

उस तरह से तो नहीं, पर कोर्ट में तो वे रहते ही थे। डीपी यादव ट्रायल के दौर में नहीं आते थे। जब भारती आई, तब आए। बाद में, जब हाईकोर्ट में मामला चल रहा था, तब भारती आती थी। आखिरी बार जिस दिन फैसला आया, उस दिन सुप्रीम कोर्ट में मुझे उस परिवार से कोई नहीं दिखा। ट्रायल कोर्ट तक काफी लोग आते थे। पांच-सात को तो रोज देखते-देखते मैं पहचानने लगी थी। शुरुआत में अजीब लगता था, पर बाद में मैं नजरअंदाज करने लगी।

- भारती यादव के व्यवहार ने आपको निराश किया?

मुझे भारती से ज्यादा अपने बेटे नीतीश से निराशा हुई कि उसने ऐसी लड़की चुनी। मुझे ऐसा लगता है कि उस रात, जब नीतीश की हत्या हुई, वह चाहता तो भारती के भाइयों को झूठ बोलकर बच सकता था। लेकिन उसने भारती से संबंधों को स्वीकार किया होगा और तब उनकी बात बढ़ी होगी। मुझे देश की ऐसी बेटियों से शिकायत है, जो संपन्न घरों से हैं, अच्छे स्कूल-कॉलेज से पढ़ी हैं, अपने पैरों पर खडे़ होने में सक्षम हैं, बावजूद इसके सच बोलने की हिम्मत नहीं करतीं। मुझे उसका बुरा लगा। भारती को तो पता था उसका परिवार कैसा है? नीतीश का तो तर्क होता था कि इसमें भारती की क्या गलती? वह तो वहां से निकलना चाहती है। वह अपने नाम के आगे यादव नहीं लगाती। भारती सिंह लिखती है। अपने भविष्य के लिए वह कुछ भी करती, पर नीतीश और अपने संबंधों के बारे में सच तो बोल सकती थी। आखिर उसकी वजह से नीतीश की जान गई थी।

- आप खुद अच्छे घर से हैं, कॉन्वेंट से पढ़ी हैं। आपके पति प्रशासकीय सेवा में रहे। क्या इस वजह से आपको कोई मदद मिली?

शिक्षा बहुत बड़ा कारण है। मुझे घर या स्कूल में जो शिक्षा मिली, उसने मुझे हमेशा सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया। मैं चाहे कोर्ट में वकील हों या जानने वाले, उनसे सवाल पूछती रहती थी। मुझमें यह आत्मविश्वास था, जो हर व्यक्ति में नहीं होता। कोर्ट में ऐसे लोग मिलते थे, जिन्हें अपने केस के बारे में उतनी ही जानकारी होती थी, जितना उनके वकील बताते थे। दूसरा कारण डीपी यादव की वजह से इस केस में मीडिया की दिलचस्पी बनी हुई थी। राजनीति और अपराध का घालमेल होना। आम आदमी अपराधी किस्म के नेताओं से घृणा करता है। मीडिया को शायद नीतीश से कुछ सहानुभूति भी थी.. फिर धीरे-धीरे मीडिया के लोगों से मेरी भी अच्छी बनने लगी थी। ज्यादातर उनमें नीतीश के ही उम्र वाले थे और घर पर उनका आना-जाना लगा रहता था। पर प्रशासनिक तौर पर मदद मिली हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। थोड़ी-बहुत जान-पहचान के चलते कहीं सहूलियत हुई होगी, पर वह ऐसी नहीं।

- आपने कहा है कि अब आप ऑनर किलिंग के खिलाफ अभियान में जुड़ना चाहेंगी। किस तरह से करेंगी?

बहुत से सुझाव हैं, पर अभी अंतिम रूप से कुछ तय नहीं है। मुझे लगता है कि इस पर रोक के लिए सख्त कानून की जरूरत है। और जिस तरह का बहुमत इस समय सरकार के पास है, उसमें यह हो सकता है। स्वयंसेवी संगठन सेमिनार वगैरह करते रहते हैं और उनमें मुझे बुलाया जाता है, तो मैं इस मसले को उठाना चाहूंगी और चाहूंगी कि मीडिया भी इसमें साथ दे। अगर इस विषय पर कुछ कर पाई, तो यह इस केस की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। अपनी तरफ से मैं पूरी कोशिश करूंगी।

- आपको नहीं लगता कि ऑनर किलिंग के साथ यह मामला धनबल, बाहुबल के अहंकार का भी था?

बिल्कुल था...। मैं राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ भी लड़ना चाहूंगी। पर एक समय में एक ही मुद्दा लूं, तो बेहतर है। आप देखिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल में बलात्कार का एक आरोपी पूरे दो साल रहा। कोई कुछ नहीं कर पाया। क्या इतना समय सुबूतों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा? यह गलत है कि जब तक अपराध साबित न हो जाए, तब तक अपराधी नहीं मान सकते। विधायक, सांसद जैसे पदों पर बैठे लोगों के ऊपर तो इस तरह के गंभीर आरोप लगना ही इस्तीफे के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए। अगर ऐसे लोग एक चुनाव नहीं लडे़गे, तो क्या हो जाएगा? विकास या विशाल यादव को भी यही लगता होगा कि उनके पिता के खिलाफ कई मुकदमे होने के बावजूद वह सांसद बन सकते हैं, तो अपराध करने से उनका क्या बिगड़ जाएगा? उनकी पूरी भाव-भंगिमा में यह अहंकार झलकता रहा है। मैं अब भी आश्वस्त नहीं हूं कि यह कौन सुनिश्चित करेगा कि जितने साल तक उन्हें जेल में रखे जाने की सजा हुई है, उतने साल वे रहेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि किसी दिन किसी सार्वजनिक जगह पर वे लोग मेरे बगल में खड़े नहीं मिलेंगे?

- इस केस के चलते पिछले 14 साल में आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह के बदलाव आए?

अच्छी-खासी नौकरी कर रही थी। केंद्रीय विद्यालय संगठन में एजुकेशन ऑफिसर के तौर पर मेरा प्रोमोशन भी हो चुका था। और अचानक बैकफुट पर आ गए। अदालतों की तारीखें, और दौड़-भाग वगैरह। ऑफिस में लोग अच्छे थे, लेकिन वहां भी काम तो करना ही था। यह एक और अहम मसला है कि आम आदमी कोर्ट में क्यों नहीं लड़ पाता? तारीख के लिए आप छुट्टी लेते हैं और पता चलता है कि उस दिन सुनवाई हुई ही नहीं। दूसरे दिन आधे दिन की छुट्टी ली, तो पता चला कि सुनवाई दोपहर बाद होगी। पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम तो बिल्कुल ही बंद हो गए। टीचर ट्रेनिंग का मुझे जुनून था। अब मैं वापस जाना भी चाहूं, तो नहीं जा पाऊंगी।

साभार: हिन्‍दुस्‍तान

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