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सक्सेस सांग

मुल्‍क के छुटके बप्‍पा के घर से फतवा जारी: तीन तलाक पर मौलाना पहले कुरान पढ़ें

: अब ठीक से कुरान पढ़ना शुरू करें औरतें, ताकि मौलाना उन्‍हें गुमराह न कर सकें : तलाक को गलत बताया उपराष्ट्रपति की पत्नी सलमा अंसारी ने, बोलीं कि ऐसा कुछ भी नहीं है कुरान में : सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ इसी मसले पर 11 मई को करेगी सुनवाई :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मुल्‍क के छुटके बप्‍पा यानी उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के घर से तीन तलाक के मसले पर एक फतवा जारी हो चुका है। यह फतवा जारी किया है हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने। सलमा अंसारी ने आज अलीगढ़ की अपनी यात्रा के दौरान साफ लफ्जों से ऐलान कर दिया कि तीन तलाक पर अब महिलाओं को ही हस्‍तक्षेप करना होगा। अगर ऐसा न हुआ तो जनता और खासकर औरतों को गुमराह करने पर आमादा मौलानाओं की कोशिशों को टाला नहीं जा सकेगा। बेहतर हो कि औरतें अपने हकों के लिए किसी के कहने-सुनने के बजाय सीधे कुरान के पन्‍ने पलटने की कोशिश करें। कुरान की आयतें ही आपको स्‍पष्‍ट कर पायेंगी कि इस मामले में औरतों के खिलाफ क्‍या-क्‍या नहीं अफवाहें बोयी-काटी जा सकी हैं।

तीन तलाक का मामला अभी तक केवल मौलानाओं और धर्म के ठेकेदारों की बपौती माना जाता रहा है। इस हालत से पीडि़त औरतों का जीना जहन्‍नुम कर देने वाले ऐसे मौलानाओं की इन हरकतों के चलते सच बात तो यही है कि इन्‍हीं मौलानाओं ने ही सच का गला घोंटने की हर चंद साजिशें की हैं। लेकिन यह पहला मौका है, जब देश के छोटे बप्‍पा यानी उप-राष्‍ट्रपति डॉ हामिद अंसारी की पत्‍नी से इस मामले पर अंधेरों का सबब बने झूठ के परदे को नोंच डाल दिया।

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने भी तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के एक धड़े की तरफ उठ रही आवाज़ का समर्थन किया है। श्रीमती अंसारी ने तीन तलाक को बेमानी बताते हुए कहा कि कुरान में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है। इसके साथ ही उन्होंने मुस्लिम महिलाओं से कुरान को पढ़ने के साथ समझने को कहा, जिससे कि कोई मौलाना उन्हें गुमराह न कर सकें।

तीन तलाक को लेकर अब तक चले विवाद से जुड़ी खबरों को अगर देखना चाहें तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

तीन तलाक

अलीगढ़ में अल नूर चैरिटेबल सोसायटी की तरफ से चलाए जा रहे चाचा नेहरू मदरसे के कार्यक्रम में शरीक होने आईं सलमा अंसारी ने यहां पत्रकारों से बातचीत में यह बात कही. उन्होंने कहा, 'बस किसी के तीन बार तलाक, तलाक, तलाक बोले देने से तलाक नहीं हो जाता. कुरान पढ़ा है तो खुद ही उसका हल मिल जाएगा. कुरान में तो ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है. इसको बना रखा है बेकार का मुद्दा. जिन्होंने कुरान नहीं पढ़ा उनको मालूम ही नहीं है.'

अंसारी ने इसके साथ ही कहा, 'आप अरबी में कुरान पढ़ते है, और ट्रांस्लेशन तो पढ़ते नहीं आप लोग. जो मुल्ला-मौलाना ने कहा, आपने उसे सच मान लिया. कुरान पढ़के देखिए, हदीस पढ़कर देखिए कि रसूल ने क्या कहा.' उन्होंने कहा, 'मैं तो यह कहती हूं कि औरतों में इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि खुद कुरान पढ़ें, उसके बारे में सोचें, उसके बारे में ज्ञान हासिल करें कि रसूल ने क्या कहा, शरीयत क्या कहता है. किसी को ऐसे ही फॉलो नहीं करना चाहिए.'

बता दें कि मुस्लिम समुदाय में जारी तीन तलाक की प्रथा का पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है. इस प्रथा को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और 11 मई को एक संविधान पीठ मामले की अगली सुनवाई होने वाली है.

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक को लेकर अपने रुख पर अड़ा हुआ है. बोर्ड ने 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि मुस्लिमों के बीच प्रचलित इन परंपराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं विचारणीय नहीं हैं, क्योंकि ये मुद्दे न्यायपालिका के दायरे के बाहर के हैं.

(अपने आसपास पसरी-पसरती दलाली, पत्रकारों की अराजकता, अफसरों की लूट, नेताओं के भ्रष्‍टाचार, टांग-खिंचाई और किसी प्रतिभा की हत्‍या की साजिशें किसी भी शख्‍स के हृदय-मन-मस्तिष्‍क को विचलित कर सकती हैं। समाज में आपके आसपास होने वाली कोई भी सुखद या  घटना भी मेरी बिटिया डॉट की सुर्खिया बन सकती है। चाहे वह स्‍त्री सशक्तीकरण से जुड़ी हो, या फिर बच्‍चों अथवा वृद्धों से केंद्रित हो। हर शख्‍स बोलना चाहता है। लेकिन अधिकांश लोगों को पता तक नहीं होता है कि उसे अपनी प्रतिक्रिया कैसी, कहां और कितनी करनी चाहिए।

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जब 11 महीने की फीस का अदालती फैसला है, तो फिर स्‍कूलों में यह लूट कैसी

: दूसरों के मासूम बच्‍चों की पढ़ाई को भटक रहा है एक जवान, जरा मदद करो न : बूचड़खानों से ज्‍यादा खतरनाक है गली-मोहल्‍लों में उगने वाले स्‍कूली कुकुरमुत्‍ते :  मान्‍य किताबों और पांच साल तक ड्रेस न बदलने के आदेश भी सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर फेंक रहे हैं स्‍कूल के मालिक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हिन्‍दुस्‍तान के हर-एक अभिभावक के दिल पर हर महीने एक जोरदार थप्‍पड़ पड़ता है, कि अभिभावक बुरी तरह बिलबिला जाता है। लेकिन ऐसे तमाचों को बर्दाश्‍त कर लेता है अभिभावक। यह तमाचे उसके बच्‍चों के स्‍कूल के प्रबंधक के होते हैं। करारे तमाचे। इतना ही नहीं, इन तमाचों के बदले हर अभिभावक ऐसे स्‍कूली प्रबंधकों के हाथों में नोटों की गड्डी भी थमा देता है। राजी-खुशी होता है यह भुगतान। सिर्फ इस राहत वाले आश्‍वासन के लिए कि उसका बच्‍चा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा, उसका भविष्‍य सुनहला बना दिया जाएगा और बाद में वह उसके सपनों की जिन्‍दगी में सैर कर सकेंगे। लेकिन इसी सपने, राहत और आश्‍वासनों के गुबार में अभिभावक लगातार लुटता-पिटता ही रहता है। स्‍कूलों की मांग लगातार बढ़ती ही जाती है और जल्‍दी ही हर अभिभावक किसी गधे की तरह अपने बच्‍चों को पालने नुमा मजबूरी में बिक-तबाह होना शुरू कर देता है।

यह हकीकत है इस देश के अभिभावकों की। बच्‍चों के सपनों को सुधारने-तराशने की आपाधापी में हर अभिभावक यह भूल जाता है कि उसके दायित्‍वों के साथ ही साथ उसके हक भी इस देश में मौजूद हैं। इन्‍हीं हकों को जान-पहचान कर कोई भी अभिभावक अपने बच्‍चों के लुटेरे स्‍कूली प्रबंधकों की गुण्‍डागर्दी, लूट और माफियागिरी पर तत्‍काल अंकुश लगा सकता है। मसलन, नौ साल पहले सर्वोच्‍च न्‍यायालय से जारी हुआ एक आदेश, जिसमें अभिभावकों के सुकून की गारंटी दी गयी है।

बदायूं के जांबाज पत्रकार और नवयुवक राहुल गुप्‍ता ने आम बेहाल अभिभावकों को त्राण दिलाने के लिए बाकायदा एक अभियान छेड़ दिया है। अब आम अभिभावकों की यह जिम्‍मेदारी है कि वे लोग भी राहुल गुप्‍ता के अभियान में सहभागी बनें, और स्‍कूली प्रबंधकों की लूट का विरोध करने के लिए अपना योगदान करें। राहुल का संकल्‍प ऐसे ही स्‍कूली प्रबंधकों की लूट पर अंकुश और अराजकता पर स्‍थाई प्रतिबंध लगाना ही है।

इसके लिए राहुल ने एक अपील जारी की है। आप भी देखिये:- आप मित्र लोगो से एक मदद चाहिए, 9 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक आर्डर किया था, स्कूल के बारे में।

जिसमें साफ-साफ हुक्‍म जारी किया गया था कि:-

1. स्कूल 11 महीने की फीस लेंगे,

2 . स्कूल तिमाही के आधार पर फीस न लेंगे। बल्कि चक्र महीने के हिसाब से लेंगे।

3. स्कूल 5 साल से पहले ड्रेस नही बदल सकते है।

4. स्कूल बाले किसी फिक्स दुकान से किताबे लेने को बाध्य नही कर सकते है। साथ ही स्कूल से भी किताबे बिक्री नही कर सकते है।

5. जिस बोर्ड से मान्यता है, उसमे बोर्ड से मान्यता बाली किताबे ही पढ़ाई जाए, यह नही प्राइवेट लोगो की किताबें।

सर अगर यह आर्डर मिल जाये, बहुत सहूलियत होगी।

क्योकि बूचड़खाने भी अगर उच्चतम न्यायालय के आदेश पर रोक लग सकती है। तो इन कुकुरमुत्तों की तरह उगने बाले इन प्राइवेट स्कूल पर क्यो नही।

आप लोगो से माफी चाहता हूं, आपको टैग करने के लिए।

सुप्रीमकोर्ट ने क्या रूलिंग बनाई थी ?

और तो और निजी स्कूलों की मनमानी के चलते तकरीबन 9 साल पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में गर्मियों की छुट्टी में ली जाने वाली फीस पर प्रतिबन्ध लगते हुए कहा था कि इस दौरान जब स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है तो उसकी फीस क्यों ली जाती है. मालूम हो कि कोर्ट ने छुट्टी के दौरान ली जाने वाली फीस पर रोक लगते हुए प्राइवेट स्कूलों और मिशनरी स्कूलों पर ये रोक लगायी थी. यही नहीं इसके साथ इस तरह के स्कूलों और कालेजों पर लगाम कसते हुए कोर्ट ने ये भी आदेश पारित किये थे कि प्राइवेट स्कूल और कालेज अभिवावकों को इस बाबत मजबूर नहीं कर सकते कि वह एक विशेष दुकान से ही अपने बच्चों कि कॉपी-किताबें खरीदें.

यही नहीं, स्कूल और कालेज में हर साल बदली जाने वाली ड्रेस पर रोक लगते हुए 5 साल से पहले ड्रेस न बदले जाने के आदेश प्राइवेट स्कूल और कालेजों के प्रबन्धन तन्त्र को दिए थे. बावजूद इसके स्कूल और कालेजों के प्रबन्धतन्त्र अपनी मनमानी पर आमादा हैं. फिलहाल दल के नेताओं ने यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ से सुप्रीम कोर्ट की आयी रूलिंग का अनुपालन कराये जाने की मांग की है.

(अपने आसपास पसरी-पसरती जा रही अराजकता, लूट, भ्रष्‍टाचार, टांग-खिंचाई और किसी प्रतिभा की हत्‍या की साजिशें किसी भी शख्‍स के हृदय-मन-मस्तिष्‍क को विचलित कर सकती हैं। हर शख्‍स ऐसे हादसों पर बोलना चाहता है। लेकिन अधिकांश लोगों को पता तक नहीं होता है कि उसे अपनी प्रतिक्रिया कैसी, कहां और कितनी करनी चाहिए।

अब आप नि:श्चिंत हो जाइये। आइंदा के लिए आप अपनी सारी बातें हम www.meribitiya.com पर आपको सीधे हमारे पास और हम तक पहुंचाने का रास्‍ता बताये देते हैं। आपको जो भी अगर ऐसी कोई घटना, हादसा, साजिश की भनक मिले, तो आप सीधे हमसे सम्‍पर्क कीजिए। आप नहीं चाहेंगे, तो हम आपकी पहचान छिपा लेंगे, और आपका नाम-पता किसी को भी नहीं बतायेंगे।

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सम्‍पादक:- This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it )

अखिलेस जी! ई का यूपी में हो त

: चुनाव में बलियाटिक-भोजपुरी चाशनी में राजनीतिक हास्‍य और व्‍यंग्‍य शैली : यूपी में चुनावी माहौल क्‍या गरमाया है, जनार्दन यादव की बांछें खिल गयीं : बीएसएफ वाले जनार्दन ने सम्‍भाल लिया है चुनावों में गीतों के साथ तरन्‍नुम वाली सीढ़ी : अपना वीडियो-एल्‍बम की शुरूआत मेरी बिटिया डॉट कॉम से शेयर किया इस बलियाटिक जवान ने :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आप अगर जनार्दन यादव को नहीं जानते हैं, तो भी कोई दिक्‍कत नहीं। फिकिर नॉट। क्‍योंकि अब जनार्दन यादव अपने ही गीतों को अपने ही बुने तरन्‍नुम के साथ गूंथ कर चुनावी-दंगल में अपनी बेमिसाल गायन-शैली में अपना वीडियो-एल्‍बम तैयार कर रहे हैं। जल्‍दी ही यह एल्‍बम बाजार में दिखेगा। और फिर उसके बाद ही मचेगी धूम, झमाझम भोजपुरी बोली में राजनीतिक गीतों का धमाका होगा।

जी हां, यह कमान सम्‍भालने जा रहे हैं जनार्दन यादव। बलिया के सहतवार के रहने वाले जर्नादन यादव पहले सीमा सुरक्षा बल में तैनात रहे हैं, लेकिन जर्नादन ने हाल ही अपनी 25 साल की नौकरी से इस्‍तीफा देकर अपना बाकी जीवन भोजपुरी गीतों को समर्पित करने का फैसला किया है। वे अपने जीवन के इस प्रयास को जीवन की एक नयी चुनौती के तौर पर देख रहे हैं। वे कहते हैं कि :- अब चाहे कुछ भी हो जाए। भोजपुरी गीतों को एक नये अंदाज में पेश करने का अभियान छेड़ कर ही मानूंगा, जहां भोजपुरी गीत की प्रचलित अश्‍लीलता वाली धारा के खिलाफ एक नये हास्‍य और व्‍यंग्‍य का स्‍तम्‍भ स्‍थापित किया जाएगा। इसमें राजनीतिक चुटीले गीत ही प्रमुख होंगे। हां, सामाजिक और आर्थिक मसले भी शामिल किये जाएंगे।

जनार्दन इस समय दिल्‍ली में रह रहे हैं। सपरिवार। एक बेटी शालिनी आजमगढ़ मेडिकल कालेज में एमबीबीएस में दूसरे वर्ष में पढ़ रही है। पत्‍नी साथ में हैं और इस दम्‍पत्ति के साथ छोटे दो बेटे दिल्‍ली में पढ़ रहे हैं। वैसे तो जनार्दन की पढ़ाई ग्‍वालियर में हुई, और अपनी बीएसएफ की नौकरी के चलते वे देश भर में जहां-तहां राष्‍ट्रसेवा में मस्‍त रहे। लेकिन गीतों को बुनना और उन्‍हें तरन्‍नुम में गाना उनका शौक रहा। चूंकि जनार्दन का पैत्रिक घर बलिया ही है, इसलिए जनार्दन के गायन में माध्‍यम भोजपुरी ही रहा। आपको बता दें कि जनार्दन को बीएसएफ में वाद-विवाद प्रतियोगिता में कई बार राष्‍ट्रीय पदक और सम्‍मान मिल चुके हैं।

ताजा गीत यूपी में अखिलेश यादव की सरकार की समीक्षा के तौर पर है। यह गीत 1090 चौराहा के सामने हम लोगों ने तब रिकार्ड किया था, जब वे हमसे मिलने लखनऊ पधारे थे। उसी दौरान कार पर बैठे-बैठै ही उन्‍होंने अपना यह ताजा गीत सुनाया था। जाहिर है कि मैंने भी उनके गीत के साथ संगत दी और कार को तबले की तरह बजाना शुरू कर दिया। रही-बची कसर मैंने अपने मुंह से ढोलक की आवाज से निकाल कर किया। सुन कर बताइयेगा जरूर कि कैसा रहा जनार्दन का यह गीत।

इस गीत को सुनने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा :- अखिलेस जी! ई का यूपी में हो त

शलभ अब भाजपाई भये, अमित शाह से भेंट के बाद दिया इस्‍तीफा

: गजब पत्रकार रहा है शलभ। हमेशा रहेगा भी : आईबीएन-7 के धमाकेदार पत्रकारों में शुमार रहे हैं शलभ मणि त्रिपाठी : मित्र बनना और मित्र बनाना शलभ के डीएनए में रहा : इकलौता पत्रकार रहे हैं शलभ, जिसके पीछे बाकायदा पत्रकारों का एक तूफान हिलोरें लेता है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : शलभमणि त्रिपाठी अब भाजपा में शामिल हो गये हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह से हुई मुलाकात के बाद शलभमणि त्रिपाठी ने भाजपा में शामिल होने का फैसला कर लिया। इसके साथ ही उन्‍होंने अपने संस्‍थान आर्इबीएन-7 के राज्‍य प्रमुख के पद से इस्‍तीफा दे दिया। हालांकि यह पता नहीं चल पाया है कि उनकी रणनीति क्‍या होगी। लेकिन समझा जाता है कि शलभ पूर्वांचल के किसी न किसी इलाके से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। जरूर।

यूपी ही नहीं, बिहार, झारखंड, छत्‍तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश और उत्‍तराखंड की पत्रकारिता में शलभ मणि त्रिपाठी का नाम बाकायदा किसी धमक के तौर पर माना-जाना और पहचाना जाता है। मूलत: गोरखपुर के रहने वाले शलभ मणि त्रिपाठी ने दैनिक जागरण से अपनी पत्रकारिता की पारी शुरू की और कई पड़ावों-मोड़ों से होते हुए वे आखिरकार आईबीएन-7 के राज्‍य प्रमुख तक के पद तक पहुंच गये। निष्‍पाप, निर्दोष, ईमानदार, तेज-तर्रार और तीखी नजर, सधी नजर, खोजी अंदाज, तय निशाना लगाने में माहिर और मशहूर शलभ शायद यूपी के पहले ऐसे पत्रकार हैं, जो पत्रकारिता के शीर्ष पहुंचने के बावजूद अपने पत्रकारीय कैरियर को छोड़ कर अब सक्रिय राजनीति में उतर रहे हैं।

शलभ का नाम अपने पेशे के साथ ही साथ अपने हम-पेशा लोगों के प्रति अगाध प्रेम, आस्‍था, श्रद्धा और स्‍नेह रखने वालों में से शीर्ष पर दर्ज है। शलभ ने अपने निजी हितों को छोड़ कर केवल खबर के अलावा किसी और क्षेत्र में दखल किया है, तो वह है मित्रता और भाईचारा। अपने लोगों के साथ हमेशा खड़े रहने वाले शलभ इकलौते ऐसे पत्रकार हैं, जिनकी एक आवाज में सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों पत्रकार एकजुट आत्‍मोसर्ग कर सकते हैं। करीब सात साल पहले लखनऊ में हजरतगंज में एक एसपी-सिटी की करतूत पर जब शलभ ने हांका लगाया था, शलभ के साथ हजारों लोग हजरतगंज से मार्च करते हुए सीधे मुख्‍यमंत्री आवास तक जुलूस की शक्‍ल में पहुंच गये थे।

सच बात कहूं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वह यह कि मैं शलभ के लिए अपनी जान तक दे सकता हूं। शलभ जैसा शख्‍स जन्‍म-जन्‍मान्‍तरों में ही मिल पाता है। वह भी अपने पुण्‍य-प्रसाद के तौर पर।

बहरहाल, अगर किसी को यह सीखना हो कि किसी को सम्‍मान कैसे दिया जाता है, तो उसे सीधे शलभ को समझना, देखना और महसूस करना होगा। रही बात मेरी, तो मुझे तो गर्व है कि शलभ मेरा भाई है। वैसे एक बात और बता दूं आपको। शलभ की बेमिसाल जोड़ी अगर किसी के साथ चली, तो वह था मनोज रंजन त्रिपाठी। दोनों ही दोनों बेमिसाल।

क्‍या जाने। खुदा क्‍या जाने। हो सकता है कि आजकल में ही मनोज भी शलभाई हो जाएं। हा हा हा

एडीएम साहब ! झुंड नहीं, हौसलों से जीती जाती है अस्मिता की लड़ाई

: मांगों की तोप का लाइसेंस लेने गये थे, चाकू से संतुष्‍ट हो गये पीसीएस अफसर : अमिताभ ठाकुर को देखिये, कमाल की तलवारबाजी की है बाजीराव मस्‍तानी की तरह : उसके संवर्ग का एक भी सदस्‍य उसके साथ खुल कर नहीं आया, लेकिन मुलायम सिंह यादव तक को पानी पिला दिया अमिताभ ने :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यूपी के पीसीएस अफसरों के कुछ सदस्‍यों को लखनऊ जिलाधिकारी कार्यालय की भरी कोर्ट में वकीलों के झुण्‍ड ने जमकर पीट दिया। इनमें से एक अपर नगर मैजिस्‍ट्रेट और तीन अन्‍य अपर जिलाधिकारी स्‍तर के अधिकारी भी शामिल थे। हंगामा खड़ा हो गया। इस हादसे को लेकर लेखपाल संघ, राजस्‍व निरीक्षक संघ, कलेक्‍ट्रेट कर्मचारी संघ समेत अनेक कर्मचारी संघों ने हड़ताल कर दी। चूंकि यह मामला सीधे पीसीएस अफसरों पर हमले का था, इसलिए पीसीएस अफसरों की एसोसियेशन ने इस मामले को अपनी प्रतिष्‍ठा का सवाल बनाया और इस मामले पर हड़ताल का फैसला कर लिया। तय किया गया कि सोमवार 19 दिसम्‍बर से प्रदेश भर के पीसीएस अफसर अनिश्चितकालीन कलमबंद हड़ताल शुरू कर देंगे।

लेकिन इस फैसले के चंद घंटों बाद ही इन अफसरों की एसोसियेशन ने इस हड़ताल को वापस ले लिया। अपनी सारी मांगों को करीने से बाकायदा तह कर किनारे रख कर वे काम पर लौट आये। हड़ताल वापसी की वहज यह बतायी गयी कि प्रमुख गृह सचिव डीके पाण्‍डा ने इन अफसरों की एसोसियेशन के पदाधिकारियों को अपने कार्यालय में बुलाया कि हड़ताल खत्‍म करने की अपील की। आधार यह दिया गया कि कलेक्‍ट्रेट क्षेत्र के क्षेत्राधिकारी पुलिस और सम्‍बन्धित कोतवाल को तत्‍काल स्‍थानां‍तरित कर दिया गया है। उधर बरेली में एक कोटेदार की बेईमानी पर जब वहां की एसडीएम ने छापा मारा तो उससे नाराज यूपी के एक मंत्री ने उस एसडीएम को ही सस्‍पेंड करा दिया। बहरहाल, डीके पाण्‍डा ने इस एसडीएम का निलम्‍बन रद कराने, और कलेक्‍ट्रेट हादसे में दोषी वकीलों को गिरफ्तार किये जाने का वायदा कर पीसीएस अफसरों की हड़ताल खत्‍म करा दी।

हैरत की बात है। तीन एडीएम समेत चार पीसीएस अफसरों की सरेआम और भरी कोर्ट में पिटाई हो गयी, और हल्‍का-फुल्‍का लॉली-पॉप पाकर यह पीसीएस अफसर संतुष्‍ट हो गये। कमाल है। गये थे कि मांगों की तोप का लाइसेंस लेने गये थे, कि लखनऊ की एसएसपी मंजिल सैनी को सस्पेंड कराये बिना शांत नहीं होंगे, लेकिन चाकू-ढेला मात्र से संतुष्‍ट हो गये पीसीएस अफसर और उनकी पूरी एसोसियेशन। कहने की जरूरत नहीं कि पीसीएस अफसरों की एसोसियेशन में 11 सौ से ज्‍यादा सदस्‍य हैं। इतना ही नहीं, इस हादसे के बाद कई कर्मचारी संघों ने भी विरोध में हड़ताल का ऐलान कर दिया था। लेकिन गृह विभाग के अफसरों ने उन्‍हें पुचकारा, और यह पीसीएस अफसर संतुष्‍ट हो गये। जबकि इस बैठक में गृह सचिव मणिप्रसाद मिश्र भी मौजूद थे, जो मूलत: पीसीएस संवर्ग से हैं। और तो और, लखनऊ के जिलाधिकारी सत्‍येंद्र सिंह यादव का मूल संवर्ग पीसीएस ही है। लेकिन इस हादसे के बाद अपनी ही मुंह खाकर लौट आये पीसीएस एसोसियेशन के पदाधिकारी। उधर दूसरे पक्ष यानी वकीलों की ओर से लखनऊ के सारे वकील अब दो दिन की हड़ताल पर चले गये हैं।

अब जरा अमिताभ ठाकुर को देखिये। डायरेक्‍ट आईपीएस हैं अमिताभ। बसपा के अफसरों की करतूतों और उनके अपमानजनक व्‍यवहार से क्षुब्‍ध होकर अमिताभ ने विरोध का झंडा फहरा दिया। लेकिन आईपीएस एसोसियेशन ने अमिताभ के मसले से पल्‍ला झाड़ लिया। किसी भी आईपीएस अफसर की हिम्‍मत नहीं पड़ी कि वह अमिताभ के समर्थन में खड़ा हो सके या बोल भी पाये। लेकिन कमाल यह देखिये कि बिलकुल अकेले पड़ चुके अमिताभ ने दुन्‍दुभि बजा दी और सीधे यूपी सरकार से ही टक्‍कर कर बैठा। वह तलवारबाजी की  अमिताभ ठाकुर ने बाजीराव मस्‍तानी फेल हो जाए। नितान्‍त अकेले अमिताभ ठाकुर ने समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव तक को पानी पिला दिया। नतीजा यह हुआ कि बरसों से लटका हुआ अमिताभ का मामला निपटने लगा और पहले चरण के तहत सरकार बाध्‍य हो गयी कि अमिताभ को सीधे आईजी बनाया जाए।

अमिताभ ठाकुर का संघर्ष अभी जारी है। उसके समर्थन में है उसकी पत्‍नी नूतन ठाकुर, जिसने अपने पति की लड़ाई के लिए अपना पल्‍लू कस लिया, और खुद एलएलबी करके सीधे अदालत वाला मोर्चा पर डट गयी। हां, पत्रकार समुदाय के लोगों से अमिताभ को जरूर सहानुभूति रही। अमिताभ को परास्‍त कराने के लिए सतर्कता विभाग और पुलिस के बड़े अफसर भी सदल-बल जुटे रहे। कई बार अमिताभ को परेशान करने के लिए बवाल खड़ा किया गया। एक बार तो सीधे पुलिस ने अमिताभ के घर छापा तक मार दिया। लेकिन जीत हमेशा अमिताभ की ही रही।

चाहे कुछ भी हो, अमिताभ ने इतना तो साबित कर ही दिया कि किसी भी जीत का आधार झुण्‍ड या तादात नहीं, बल्कि इसके लिए हौसलों की जरूरत पड़ती है।

क्‍यों एडीएम साहब, आपकी क्‍या राय है ?

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