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सक्सेस सांग

कहर बरपातीं इंदौर की छप्पन-छुरियां

गुजराती कालेज की लडकियों के नाम से थर्राते हैं शोहदे

छेडखानी के बारे में तो कोई शोहदा सोच ही नहीं सकता: अपनी इन बिंदास बेटियों पर गर्व करते हैं अभिभावक: तनिक कल्पना तो कीजिए उस जगह के बारे में जहां छेडखानी तो दूर, उल्टे लडकियां ही बात बात पर चाकूबाजी पर उतर आती हों और अबे-तबे से बात करती हों। एक ऐसी जगह जहां फटकने के नाम से भी लडकों के छक्के छूट जाते हों। लेकिन यह कोई कपोल-कल्पना नहीं, बल्कि बाकायदा एक हकीकत है। जी हां, इंदौर के गुजराती कालेज के पास तो शोहदे फटकते तक नहीं हैं। यह कालेज लडकियों का है और इसके नाम से ही शहरी शोहदों के पसीने छूटने लगते हैं। वजह, लडकियों का साम्राज्य। मजाल है किसी की कि इधर की ओर आंखें भी लगाये। हां, यहां के किस्से शहर के लोगों के लिए मनोरंजन का कारण जरूर बन जाते हैं। इंदौर में लम्बे समय तक रहे और फिलहाल महुआ न्यूज चैनल के लखनऊ स्थित राज्य ब्यूरो कार्यालय में तैनात विज्ञापन प्रभारी कमल ओमर बताते हैं कि इन बिंदास बालाओं की हरकतों पर खफा होने के बजाय उनके अभिभावक उन पर गर्व करते है।
गुजराती कॉलेज में लड़कियों द्वारा आपसी झगड़े में चाकू निकाल लिए जाने से शहर में लड़कियों के बदलते तेवर चर्चा में है। चाकूबाजी की घटना से सभी आहत हैं लेकिन उनके बिंदासपन पर किसी को ऐतराज नहीं।
शहर में कुछ साल पहले यदि कोई बदमाश किसी लड़की पर फिकरे कसता था तो वह रोते हुए घर पहुंच जाती थी, अब मामला दूसरा है। बातचीत के तौर-तरीकों से लेकर पहनने-ओढ़ने के अंदाज भी पूरी तरह बदल चुके हैं। अबे ओए.., बताऊं क्या..?, ढंग से रहो, समझा ना?. जैसे शब्द हो या किसी बदमाश को सबक सिखाना वे कहीं पीछे नहीं है।
पहले हाल कुछ और थे। हाउस वाइफ मीनाक्षी चौहान कहती है जब मैं कॉलेज में थी तो भैया मुझे लेने और छोड़ने जाया करते थे। एक बार जब वो साथ नहीं आ पाए तो एक लड़के ने मुझे अकेला समझकर रास्तेभर मुझे कमेंट किया। उस दिन मैं खूब रोई और कई दिनों तक डरी-सहमी रही। आज ऐसा ही हादसा मेरी बेटी के साथ होता है तो वो उस लड़के के कमेंट का जवाब इस तरह देती है कि लड़के भी डरकर भाग जाते हैं।
छेड़ने वालों को बांध दी राखी:होस्टल में रहने वाली लड़कियां हो या दूर कॉलेज जाने वाली. पैरेंट्स अब अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर काफी हद तक निश्चिंत हैं। फैशन डिजाइनिंग की स्टूडेंट शालिनी तिवारी बताती है मैंने लाठी चलाने की ट्रेनिंग ले रखी है। उसे आजमाने की नौबत तो नहीं आई है लेकिन किसी स्थिति में मैं घबराती नहीं। मरीज जैसे होते हैं, उन्हें दवाई भी वैसी ही देना पड़ती है।
वे कहती हैं यूं तो आते-जाते कई बार परेशान करने वालों से बहस हो जाती है लेकिन राखी वाला दिन मुझे याद है। कॉलेज के बाहर हम फ्रेंड्स ने छेड़ने वाले लड़कों को जबरदस्ती राखी बांधी थी। उसके बाद उन्होंने परेशान करना बंद कर दिया।
मंदिर के बाहर ही कर दी पिटाई: कॉलेज स्टूडेंट राखी चौरसिया के बात करने का स्टाइल भी हट कर है। इस कारण उससे कई लोग डरते हैं। ओए.ढंग से रहना तो जैसे उनका तकिया कलाम है। वे बताती हैं नवरात्रि पर हम फ्रेंड्स बिजासन गए थे वहां परेशान करने वाले लड़कों को सभी ने जमकर पीटा था। मुझे पूरा भरोसा है कि जिन्होंने भी ये देखा था, वो कभी लड़कियों को नहीं परेशान करेंगे।
हिम्मत देख और लोग भी साथ आ गए.
कक्षा 12वीं की स्टूडेंट निम्मी अग्रवाल ने बताया मैं और मेरी दीदी डिम्पी ने मिलकर 5-6 महीने पहले चौराहे पर एक बदमाश की खूब पिटाई की थी। बंदा साइड से गुजरते हुए हमें कमेंट करके गया तो दीदी भी तेज गाड़ी चलाकर उसके पास पहुंची। उसके सामने स्कूटी खड़ी की। उसे कॉलर पकड़कर गाड़ी से उतारा और खूब पिटाई की। उन्हें मारते देख आसपास वाले भी आ गए और उस लड़के की हालत खराब कर दी।

लखनऊ में बसी है 51 बेटियों की मां

मां ! तेरे हौसले को सलाम---


ममता और करूणा की प्रतीक हैं लखनउ की सरोजनी अग्रवाल: 14 नवंबर को मिलेगा राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार: गोमती नगर में बना है अनाथ बालिकाओं का मनीषा मंदिर: अपनी बेटी की मौत के बाद हर बेटी को अपना लिया सरोजनी ने:अब तक नौ बेटियों का विवाह भी करा चुकी हैं डॉक्टर अग्रवाल

जहां हर रोज हजारों-लाखों बेटियां गर्भ में ही मार डाली जा रही हों और पूरी दुनिया इन हादसों को लेकर मगजमारी में जुटी हो, वहीं लखनउ में एक मां ऐसी भी है जिसने अब तक कुल 51 बेटियों को न केवल पाला-पोसा बल्कि उनमें से कई को आत्मनिर्भर बनाकर उनका विवाह भी कर दिया। डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल का मां बनने का यह अभियान पिछले 32 साल से निर्बाध चल रहा है। अब 14 नवम्बर को राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल उन्हें सम्मानित करेंगी। उन्हें वहां पर राष्ट्रीय राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

लखनऊ की पॉश कालोनी गोमती नगर में किसी से भी पूछ लीजिए। मनीषा मंदिर बहुत फेमस है। डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल ने इस मनीषा मंदिर की स्थापना 32 साल पहले तब की थी जब उनकी बेटी मनीषा की मौत एक दुर्घटना में हो गयी। बेटी की मौत ने सरोजनी अग्रवाल को गहरे तक दहला दिया, लेकिन वे अवसाद या महज शोक में ही नहीं डूबी रहीं। उन्होंने फैसला किया कि अब हर बेटी उनकी होगी। खासकर अनाथ बेटियां। बस एक काफिले की तरह यह अभियान चल निकला और आज हालत यह है कि 73 साल की डॉक्टर सरोजनी अग्रवाल 51 बेटियों की मां बन चुकी हैं। उन्हें जहां भी किसी बेसहरा बच्ची की खबर मिलती है, दौड पडती हैं उसे अपनाने के लिए। हाल ही एक नवजात बच्ची को उन्होंने सडक के किनारे पाया था। सधन देखभाल के चलते आज वह बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है। हां, मनीषा मंदिर में काम करने वाले बताते हैं कि वह बच्ची दूध आज भी रूई के फाहे से ही पीती है।

डॉक्टर अग्रवाल अब तक अपनी नौ बेटियों का विवाह भी कर चुकी हैं। लेकिन यह सारे विवाह दहेज रहित ही हुए। वे महिला सशक्तिकरण और बालिका शिक्षा को लेकर भी चल रहे कई अभियानों से जुडी हुई हैं। डॉक्टर अग्रवाल ने तो विधवा महिलाओं को उनके अधिकारों को लेकर आंदोलन भी छेड रखा है।

हुस्न पर नहीं, हुनर पर इतराती हैं प्रेमवती

नवाबी शानो-शौकत बनाम बिजली मिस्त्री प्रेमवती


बिजली के कई उपकरण दक्षता से ठीक कर लेती हैं प्रेमवती:लखनऊ की महिला 'बिजली मिस्त्री' : लखनउ की एक नयी तवारीख लिख रही हैं प्रेमवती:  62 साल की उम्र में भी हौसला कुछ नया कर गुजरने का:स्त्री सशक्तिकरण की जीती-जागती मिसाल हैं प्रेमवती: 35 सालों से बिजली के उपकरण ठीक कर रही हैं प्रेमवती : जब भी हमारे घर पर किसी बिजली के उपकरण में नुक्स आता है तो आम तौर पर हम इलेक्ट्रीशियन यानी बिजली के मिस्त्री को बुलाते हैं. लेकिन हम आपको बताते हैं एक महिला बिजली मिस्त्री के बारे में. महिला बिजली मिस्त्री सुनने में थोड़ा हैरान तो करता है लेकिन लखनऊ की प्रेमवती सोनकर ये काम पिछले पैंतीस वर्षों से कर रही हैं. बासठ साल की प्रेमवती को बचपन से बिजली की झालरें और उपकरण आकर्षित करते थे. उनकी भी इच्छा होती थी कि काश वो ये काम सीख पातीं.
नैनीताल की रहने वाली प्रेमवती की शादी हुई लखनऊ के प्यारे लाल से जिन्हें बिजली के काम की अच्छी खासी जानकारी थी. प्यारे लाल लखनऊ में ही जल संस्थान में कर्मचारी थे.
हौसले की जंग: शादी के बाद प्रेमवती दिन भर घर पर खाली बैठी रहती थीं. घर के आर्थिक हालात भी कुछ ठीक नहीं थे. ऐसे में प्रेमवती ने अपने पति को बिजली के उपकरणों की मरम्मत करने का सुझाव दिया. दुकान पर एक महिला का बैठना किसी को भी पसंद नहीं आता था. लेकिन पति के सहयोग से धीरे-धीरे सब ठीक हो गया
प्रेमवती, महिला बिजली मिस्त्री: इस तरह उन्होंने एक दुकान खोल ली और प्रेमवती खाली समय में उनका हाथ बंटाने लगीं. पति के हौसले से प्रेमवती के बचपन का शौक कब हुनर में बदल गया इसका एहसास उन्हें ख़ुद भी न हुआ. रोटी बेलने वाले हाथ जल्दी ही मोटर की वाइंडिंग और बिजली के दूसरे साज़ो-सामान बनाने लग गए. अब तो उन्हें बिजली के करंट का झटका और रोटी बेलते वक्त हाथ का जलना एक ही जैसा लगता है.
खास बात ये है कि प्रेमवती बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नहीं हैं. बिजली की झालर, सजावट के बोर्ड, पंखे-कूलर की मरम्मत और मोटर वाइंडिंग का काम वो पूरी दक्षता से कर लेती हैं.
बिजली के करंट का झटका और रोटी बेलते वक्त हाथ का जलना एक ही जैसा लगता है :प्रेमवती. लेकिन प्रेमवती का ये सफ़र इतना आसान भी नहीं रहा है. ये बताते हुए प्रेमवती भावुक हो जाती हैं.
प्रेमवती कहती हैं, “ दुकान पर एक महिला का बैठना किसी को भी पसंद नहीं आता था. लेकिन पति के सहयोग से धीरे-धीरे सब ठीक हो गया.”बिजली के करंट का झटका
वो कहती हैं, “ मेरा हाथ मेरा भगवान है, महिलाओं को अगर आगे आना है तो उन्हें अपनी मदद ख़ुद करनी होगी. अगर समाज के सभी लोगों के पास कुछ न कुछ हुनर रहेगा तो देश में होने वाले अपराध अपने आप कम हो जायेंगे.”
ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ प्रेमवती का दर्शन भर है. बल्कि वो लगभग तीन सौ लोगों को ये काम सिखा भी चुकी हैं. खास बात ये है कि इसके लिए उन्होंने किसी तरह की कोई फ़ीस भी नहीं ली है.
प्रेमवती बताती हैं, “जाड़े में कमाई कम होती है लेकिन गर्मियों में काम ज्यादा आता है और औसतन तीन से चार हज़ार रुपए की कमाई हो जाती है.”
हुनर: आठ साल पहले पति की मौत के बाद भी उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया और अपने काम को बदस्तूर जारी रखा है. चार बेटों और चार बेटियों की माँ प्रेमवती ने अपने सारे बच्चों को ये हुनर सिखा रखा है.
बिजली के कई उपकरण दक्षता से ठीक कर लेती हैं प्रेमवती: लखनऊ की पुलिस लाइन में काम करने वाले भवानी प्रसाद पिछले दो साल से अपने बिजली के सामान की मरम्मत यहाँ करा रहे हैं. भवानी प्रसाद कहते हैं, ''प्रेमवती की दुकान पर बिजली के उपकरण बेहद ही वाजिब कीमत में सही हो जाते हैं.''
लेकिन इतने साल गुज़र जाने के बाद भी प्रेमवती की दुकान पर कोई बोर्ड नहीं लगा है. इस पर प्रेमवती कहती हैं, “ इतने पैसे कभी बचे नहीं कि बोर्ड बनवा सकें, लेकिन उनका काम ही उनकी पब्लिसिटी कर देता है.” ज़िंदगी को एक संघर्ष मानने वाली प्रेमवती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से बड़ी उम्मीदें हैं. आने वाले वक्त में प्रेमवती लड़कियों के लिए एक बिजली ट्रेनिंग सेंटर खोलना चाहती हैं. उनका कहना है कि पैसा आते ही वो ये काम सबसे पहले करेंगी. प्रेमवती की कहानी ये साफ़ बयां करती है कि इंसान किसी भी काम को अंजाम दे सकता है, बस ज़रूरत है जज़्बे और थोड़ी सी हौसला अफ़ज़ाई की.
(लेखक मुकुल श्रीवास्तव लखनउ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जन-संचार विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। साभार bbc)

 

कभी खनकती नर्तकी बनी ग्राम प्रधान

तवायफ से प्रधानी तक के सफर की बेमिसाल नजीर हैं मुधबाला

मनोरंजन नही, गांव का आदर्श बन चुकी हैं कल की नर्तकी मधुबाला
लोकतंत्र ने दे दी एक महिला को बोलने और कुछ कर गुजरने की आजादी

 
:कभी खनकाती थी पैरों की पायल और दिखाती थी अदाएं: अब जलवा बिखेर रही है सीमावर्ती बहराइच के गांव में प्रधान बन कर: समाजसेवा के साथ ही इस पेशे से लडकियों को दूर रखने का संकल्प: भारत-नेपाल सीमा पर बसा है बहराइच जिला। इस निहायत पिछडे, गरीब और सामंती इलाके में अपनी टोली के साथ मर्दों की अश्लील छींटाकशी और सिक्कों की खनके के लिए अपने जिस्म की नुमाइश के साथ ही अदाएं दिखाने वाली मधुबाला के दिन लोकतंत्र ने बदल कर रख दिया है। पहले की बाईजी अब ग्राम प्रधान बन चुकी हैं। पहले था भय और हर क्षण इज्जत लुटने का खतरा, लेकिन अब है जिजीविषा और कुछ ठोस कर गुजरने की ललक। अब तो सिर पर पल्लू डाले यह मधुबाला गांव के विकास के लिए लोगों से एकजुट होने की अपील और खुद प्रयास करती नजर आती हैं। इस हालत से गांव ही नहीं, आसपास का इलाका तक हैरत और जोश में है। आखिर यह एक महिला के खुदमुख्तार होने और एक नयी नजीर कायम कर देने की ऐतिहासिक घटना भी तो है।
कभी  पैरो में घुघुरू बांधकर नाचने-थिरकने वाली मधुबाला ने अब इस पेशे को अलविदा कह दिया है। लोगो के मनोरंजन  के लिए उनकी शाम की  महफिल रंगीन करने वाली मधुबाला अब गांव की प्रधान बन गयी है। वह अब न तो तबले की थाप पर नाचेगी और न गायेगी। इतना ही नहीं, अब गांव के विकास के साथ-साथ बेरोजगारी और महिलाओं को इस पेशे से दूर रखने के अभियान चलायेगी।
सिर पर पल्लू डालकर विनम्रता से हाथ जोड़कर ग्रामवासियों को धन्यवाद देती मिठाई खिलाती कही भी दिख जाएगी  विकास खण्ड महसी के पंचदेवरी ग्राम पंचायत की नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान मधु देवी। इन  पर गांव के लोगों  ने विश्वास कर इन्हें गाँव का प्रधान चुना है। इस ग्राम पंचायत में कुल 2714 मतदाता है। इस आरक्षित सीट के लिए गांव के 10 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। लेकिन मधु देवी 189 मतो से विजयी घोषित हुईं। मधु चुनाव जीतने के बाद काफी खुश और उत्साहित है। वे अब गांव के हर हाथ को रोजगार और हर बच्चे को शिक्षा देने और गाँव के चतुर्मुखी विकास करने का दृढ़ निश्चय की बात कह रही है।  
अब वह लोगो का मनोरंजन नही, आदर्श बन चुकी है। तवायफ कहां किसी के साथ मुहब्बत करती है, वो तो हाय या तो कयामत करती है इसी फिल्मी अंदाज मंधुबाला की मुहब्बत की दस्तान है। मधुबाला की जिन्दगी की दास्तान की किताब के पन्ने अगर पलटे तो वह किसी दर्दीली फिल्म की कहानी से कम नही है। जिले के असवा मुहम्मदपुर में गरीब परिवार मे जन्मी मधु देवी ने परिवार का पेट पालने के लिए कम उम्र में ही पैरों में घुघरू बांधने पर मजबूर हो गई और नाटक-नौटंकी और विवाह समारोह में मुजरे की महफिल सजाकर अपने परिवार का पालन पोषण करने लगी। जल्द ही अपने प्रतिभा से जिले में नर्तकी के रूप में मशहूर ख्याति अर्जित कर ली। काजल की कोठरी में भी रहकर मधुबाला कालिक से दूर रही।

मधुबाला के जिन्दगी के रूख को नौटला के एक नृत्य समारोह ने बदल दिया। उस समारोह में पंचदेवरी के तेज नरायन शुक्ल उफ अल्हा भैया भी गये थे। जहा उन्हें मधुबाला अपने  बेहतरीन नृत्य और मासूम अदाओं से भा गयी। धीरे-धीरे दोनों मुहब्बत परवान चढ़ने लगी। आल्हा भैया उसके हर कार्यक्रम में जाने लगे।
एक बार किसी मामलों में आल्हा भैया को जेल हो गयी। जब इसकी सूचना मधुबाला को हुई तो उसने जमानत में पैरवी कर उनकी और गाव के चार अन्य लोगों की जमानत लेकर जेल से छुड़वाया। इसके बाद में आल्हा भैया ने उसे इस दलदल से निकालने की ठानी । और उसके उपकार के बदले में गांव में एक मकान देकर पुरस्कृत किया।
अचानक एक दिन चुनाव की घोषणा हुई तो जैसे मधुबाला के हौसलों को तो पंख ही लग गए. फिर एक दिन वह आया जब वह मधुबाला से ग्राम प्रधान मधुदेवी बन गयी। अब वो मधु देवी किसी भी महिला को गरीबी और लचार महिला के पैरों में घुघुरू नहीं बाधनें देगी। वो उनके लिए मेहनत मजदूरी कर सम्मान की जिन्दगी जीने के लिए अभियान चलायेगी।

 

लेकिन मि. प्रसीडेंट ! पाकिस्तान पर आप क्या सोचते हैं।

ओबामा को बोलने पर मजबूर कर ही दिया भारतीय बाला ने


मैं उनके जवाब से संतुष्ट नहीं, वह कूटनीतिक जवाब ही था: आफशीन ईरानी ने आखिरकार तोड ही डाली ओबामा की चुप्पी : मैं जानना चाहती थी कि अमेरिकी लोग चरमपंथ पर क्या सोहते हैं पाकिस्तान के बारे में: आतंक के चरमपंथ के संदर्भ में दुनिया के दबंग बराक ओबामा ने भले ही पाकिस्तान का नाम लेने से परहेज किया हो,लेकिन एक भारतीय बच्ची ने उन्हें इस ज्वलंत मसले पर बोलने पर मजबूर कर ही दिया। ओबामा जब सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज पहुँचे तो मैनेजमेंट की 19 वर्षीय छात्रा अफ़शीन ईरानी ने आखिरकार उनसे पूछ ही लिया कि पाकिस्तान को अमरीका एक आतंकवादी देश क्यों नहीं घोषित करता है।
सवाल पर अचकचाएं ओबामा को आखिरकार पहली बार पाकिस्तान का नाम लेने पर मजबूर होना ही पड गया। और उधर अपने इस सवाल के बाद अफ़शीन ईरानी मीडिया में छा गयी। हालांकि आफशीन अभी भी साफ कहती है कि ओबामा का जवाब केवल कूटनीतिक ही था और वे उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। आफशीन के अनुसार ओबामा का जवाब अच्छा था. एक व्यक्ति के तौर पर मुझे वो बहुत अच्छे लगे.ओबामा ने अपनी यात्रा में पाकिस्तान का कोई ज़िक्र नहीं किया था. लेकिन मैं जानना चाहती थी कि अमेरिकी लोग पाकिस्तान के बारे में क्या सोचते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने बराक ओबामा के बारे में काफ़ी शोध किया था.
मैंने पहले भिन्न सवाल पूछने के बारे में सोचा था कि एक तरफ़ जब रतन टाटा जैसे भारतीय लोग अमरीकी विश्वविद्यालयों को धन मुहैया करवा रहे हैं तो अमरीका इस बदले में भारत के लिए क्या कर रहा है. लेकिन अपने एक दोस्त से बातचीत के दौरान मैने पाकिस्तान के बारे में सवाल करने का फ़ैसला किया.
हालाँकि अफ़शीन कहती हैं कि सवाल पूछने से पहले वो थोड़ा अनिश्चित थीं और झिझक रही थीं क्योंकि सवाल थोड़ा विवादास्पद था. अफ़शीन अपने कॉलेज की अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम समिति की डॉयरेक्टर हैं.साथ ही वो कॉलेज की ष्स्टुडेंट्स इन फ्री इंटरप्राइज़ष् संस्था की भी प्रमुख हैं.ये संस्था गरीब और पिछड़े लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करती है.
उनका कहना था कि मौका मिले तो वो पाकिस्तान ज़रूर जाना चाहेंगी.उनकी माँ एक वकील हैं.जबकि उनके पिता एक बिल्डर हैं. उधर 20.साल की अनम अंसारी ने जेहाद के बारे में राष्ट्रपति ओबामा का मत जानना चाहा और उनका कहना है कि वो ओबामा के जवाब से संतुष्ट हैं. सेंट ज़ेवियर्स की बीएससी तीसरे साल की छात्रा अनम कहती हैं कि सवाल पूछने के पीछे कोई कारण नहीं था और उन्होंने वहीं बैठे.बैठे सवाल सोचा और पूछ लिया.
अनम कहती हैंए ओबामा का जवाब अच्छा था. एक व्यक्ति के तौर पर मुझे वो बहुत अच्छे लगेण् मेरे परिवार वालों ने मुझसे कहा कि उन्हें गर्व है कि मैंने ये सवाल ओबामा से पूछाष्ण्
कालेज के कई छात्र बराक ओबामा से बेहद प्रभावित नज़र आए. सभी छात्रों ने अपने सवालों के लिए कई दिनों तक मेहनत की थी और कार्यक्रम में पहुँचने के लिए कई मुश्किल चरणों से गुज़रे थेण्
मुंबई के अलग. अलग कालेजों से चुने गए क़रीब साढ़े तीन सौ छात्रों में से छह या सात छात्रों को ही अमरीकी राष्ट्रपति से सवाल पूछने का मौका मिल पाया,

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