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सक्सेस सांग

मोहब्‍बत में धोखा, कीमत दो एकड जमीन

सुप्रीम कोर्ट ने शादीशुदा आरोपी पर लगाया अनूठा जुर्माना

बेवफा प्रेमी देगा प्रेमिका को २ एकड़ जमीन

मोहब्‍बत के नाम पर शारीरिक शोषण और उसके बाद धोखाधडी की सजा अब ऐसे लोगों की जेब ढीली कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शादी का वादा करके प्रेमिका के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले एक व्यक्ति को प्रेमिका को दो एकड़ जमीन देने का फैसला सुनाया है। प्रेमिका का आरोप था कि इस व्यक्ति ने उसके साथ करीब सौ बार शारीरिक संबंध बनाए और फिर शादी का वादा तोड़ दिया। देश की सर्वोच्‍च अदालत का यह फैसला फिलहाल तो सरगर्मियों में है।

यह फैसला आयद किया गया है। केपीथिमप्पा गौड़ा नामक यह आरोपी शादीशुदा है। 1996 में उसकी प्रेमिका रथनम्मा गर्भवती हो गई थी। उसके बाद रथनम्मा ने गौड़ा के खिलाफ शादी का वादा करके दुष्कर्म करने का आरोप लगाकर आपराधिक मामला दर्ज कराया। ट्रायल कोर्ट ने गौड़ा को बरी कर दिया। लेकिन 2004 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए उसे दुष्कर्म के आरोप में सात साल की कैद और वादा तोडऩे के आरोप में एक साल की कैद की सजा सुनाई।

गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। अपील में उसके वकील ने कहा कि 1996 में रथनम्मा 20 साल की थी और उसने अपने बयान में कहा था कि उसने अपनी मर्जी से गौड़ा के साथ करीब 100 बार शारीरिक संबंध बनाए थे। इसलिए गौड़ा के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला नहीं बन सकता। चूंकि वह 16 साल से अधिक उम्र की थी इसलिए दुष्कर्म का मामला नहीं बनता क्योंकि यह शारीरिक संबंध सहमति से बने थे। गौड़ा को संदेह का लाभ देते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधार मिश्रा ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि वह किसी दूसरी महिला के साथ शादीशुदा है। लेकिन उसे संदेह का लाभ मिलना ही चाहिए। साभार दैनिक भास्‍कर

बेटियां बचाने के लिए जमाने से जूझ गयी मीतू

ससुरालियों के खूनी पंजों से बचा लीं बेटियां
अपने साथ हुए अत्याचार को बनाया हथियार
P.C-P.N.D.T ACT के तहत खुद ही शिकायत दर्ज करायी
कार्रवाई के लिए दरदर भटक रही है एक जुझारू मां
लगातार लटकायी जा रही है शिकायत पर कार्रवाई
भ्रूणपरीक्षण के खिलाफ ससुरालियों भी खूब लडी मर्दानी

‘अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर, लोग आते गए कारवां बनता गया।’ ये पंक्तियां दो वर्ष पूर्व भ्रूण परीक्षण व कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली डॉक्टर मीतू खुराना पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। अपने साथ हुए अत्याचार को हथियार बनाकर अकेले ही कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहिम शुरू करने वाली दिल्ली की इस महिला डॉक्टर के साथ आज देश विदेश की हजारों महिलाएं जुड़ी हैं। और इसके खिलाफ लोगों में अलख जगा रही हैं। हालांकि सबकुछ इतना आसान नहीं था। शुरू में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन डॉ. मीतू खुराना ने हार नहीं मानी। कन्याडभ्रूण परीक्षण के खिलाफ बनाये गये P.C-P.N.D.T ACT के तहत मीतू पहली ऐसी महिला बन गयी हैं जिन्होंेने खुद के गर्भ में पल रही बेटियों का भ्रूण परीक्षण करने वाले अस्पिताल, अपने डॉक्टभर पति, सास, ससुर और देवर-नंदों के खिलाफ भी मामला दर्ज कराया है। यह दीगर बात है कि अब तक अदालत से पति के खिलाफ आठ हजार रूपया महीने का भरणपोषण करने के अलावा कानून उन्हेंज कुछ नहीं दे पाया, लेकिन मीतू को अब जन समर्थन तो जबर्दस्तन मिल रहा है।
यह आपबीती है जनकपुरी ए ब्लॉक में रहने वाली डॉ. मीतू खुराना की। डॉ. एसी खुराना की दो बेटियों में से एक मीतू ने वर्ष 2000 में पुणे से एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर राजधानी के रेलवे अस्पताल में नौकरी शुरू की। वर्ष 2004 में घरवालों ने उनकी शादी राजधानी के ही एक चिकित्सक डॉ. कमल खुराना से कर दी। वर्ष 2005 में जब वह गर्भवती हुई तो ससुरालवालों ने भ्रूण परीक्षण के लिए दबाव डालना शुरू किया। विरोध करने पर बहाने से भ्रूण की जांच करा ली गई और गर्भ में जुड़वां बच्चियों की बात पता लगते ही गर्भपात के लिए दबाव डालने लगे। मना करने पर उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया जाने लगा। अंत में उन्हें घर से निकाल दिया गया। इतना होने के बावजूद मीतू ने हार नहीं मानी और पति व ससुराल के लोगों सहित अस्पताल प्रशासन के खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
तमाम धमकियों व दबावों को झेलते हुए मीतू अकेले ही अपनी दो बेटियों के साथ अदालत, पुलिस व महिला आयोग के चक्कर काटती रहीं। अंतत: उच्च न्यायालय ने उनके पति को प्रतिमाह 8 हजार गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है। मीतू की जुड़वां बेटियां आज पांच वर्ष की हो चुकी हैं। मीतू ने बाद में अपने जैसे हालात की शिकार महिलाओं की सहायता शुरू की। आज देश विदेश की 12 हजार से अधिक महिलाएं उनकी मुहिम में शामिल हैं। डाक्ट र मीतू सिंह पिछले दो वर्ष से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन वाशिंगटन सिटी, सैन फ्रांसिस्को, मेलबर्न, सिंगापुर व दुबई व दिल्ली सहित कोलकाता, चेन्नई, मुंबई व अन्य शहरों में महिलाएं कन्या भ्रूण हत्या व लिंग परीक्षण के खिलाफ तमाम जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं।
डॉ. मीतू खुराना जो कुछ भी कर पाईं इसका सारा श्रेय अपने पिता डॉ. एसी खुराना व परिवार के अन्य सदस्यों को देती हैं। प्रताड़ना के दिनों को याद करते हुए मीतू कहती हैं कि पढ़ी लिखी व सक्षम होने के बावजूद उनकी बच्चियों को बोझ समझा गया और उनकी हत्या करने की साजिश की गई। शासन प्रशासन के रवैये से वह काफी आहत हैं। फिर भी उन्होंने चुप रहने के बजाय लड़ने का और दूसरों को जागरूक करने का फैसला लिया।

पीडिता ने सरेआम दबोच लिया बलात्‍कारी

अपराधी पर बेखौफ टूट पडी बांदा की बहादुर बालिका

रिपोर्ट दर्ज होने के महीनों बाद भी पुलिस ने नहीं की थी कार्रवाई

छुट्टा घूमते अभियुक्‍तों ने जीना हराम कर रखा था बालिका का

सहेली की मदद से पुलिस क्षेत्राधिकारी के दफ.तर के सामने दबोचा अपराधी को

मामले की रिपोर्ट भी मीडिया के दबाव में ही लिखी थी पुलिस ने

अभी भी फरार हैं बलात्‍कारी के दूसरे साथी, पुलिस बनी मददगार

बलात्‍कारी पर पुलिस ने जब कई महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं की तो आखिरकार पीडित बालिका खुद ही रणचंडी बन गयी। पुलिसिया कार्रवाई को तमाचा मारते हुए उसने खुद पहलकदमी ली और सरेबाजार अभियुक्‍त पर टूट पडी। पहले तो उसे जमकर पीटा और फिर सीधे थाने पहुंचा दिया। यानी जो काम पुलिस को करना था, वह उस बहादुर बालिका ने कर दिखाया। बांदा की इस घटना पर अब पीडित बालिका की जहां जयजयकार हो रही है, वहीं लोगबाग अब पुलिस को लानतें भेज रहे हैं।

बलात्‍कार की शिकार बालिकाओं के प्रति पुलिस का रवैया कितना निर्मम और अमानवीय है, इसकी मिसाल वैसे तो पूरे यूपी के किसी भी कोने में कभी भी देखी जा सकती है, जहां रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद पुलिस की अकमर्ण्‍यता के चलते पीडित पक्ष खुद ही बेबस और अपमान का शिकार बन जाता है। ना जाने कितनी लडकियां पुलिस की इसी कार्यशैली का शिकार होकर आत्‍महत्‍या तक करने पर मजबूर हो चुकी हैं। लेकिन बांदा में तो पुलिस के मुंह पर तब तमाचा पड गया जब एक बलात्‍कार पीडित बालिका को रिपोर्ट लिखाने के कई मास बाद भी जब पुलिस पुलिस की ओर से कोई जवाब नहीं मिला और लाख शिकायतों के बाद भी अभियुक्‍त खुलेआम घूमते हुए इस बालिका और उसके परिवारीजनों को धमकाते रहे, सडक पर इस बालिका का निकलना दूभर कर दिया गया तो इस बालिका के धीर ज का बांध ही टूट गया। नतीजा यह हुआ कि यह बालिका अचानक चंडी बन गयी और एक दिन उसने एक अभियुक्‍त को सरेराह पकड लिया, उसे चप्‍पलों से पीटा और फिर थाने लाकर पुलिस के हवाले कर दिया। हालांकि पहले तो पुलिस ने इस बालिका  की इस हरकत को गैरकानूनी बताते हुए  उसे अर्दब में लेने की कोशिश की, लेकिन जब वहां भीड इकट्ठा होने लगी तो आखिरकार पुलिस को झुकना पडा। य हां बताते चलें कि पुलिस तो पहले इस मामले की रिपोर्ट ही नहीं लिखने को तैयार थी, लेकिन मीडिया के दबाव में उसे रिपोर्ट लिखने पर मजबूर होना पडा

कहा गया है कि जब नारी काली बना जाए तो उससे काल भी घबराता है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला यूपी के बांदा जिले में। यहां एक लड़की के साथ एक महीने पहले गैंग रेप हुआ। लड़की ने इस बाबत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। पर हमेशा की तरह यूपी पुलिस इस मामले में अपने रवैये पर कायम रही। महीने भर बीतने के बाद भी अपराधी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े। ल ेकिन लेकिन उधर दूसरी ओर इन अपराधियों और उनके सहयोगियों ने इस लडकी और उसके घरवालों को सरेबाजार अपमानित करना शुरू कर दिया। इसकी भी शिकायत पुलिस से की गयी लेकिन पुलिस ने इन लोगों की एक भी नहीं सुनी और इसका नतीजा यह हुआ कि अपराधियों के हौसले लगातार बढते गये। पीडित बालिका और उसके घरवालों का बाजार निकलना दूभर हो गया। लेकिन ऐसा आखिर कब तक चलता।

ऐसे में लड़की ने अपने मन में अपराधियों को खुद सजा देने की ठानी। वह उन्हें खोजने लगी। एक दिन उसे अपराधी दिख गए। हैरत की बात तो यह रही कि उसे यह अपराधी कहीं और नहीं, बल्कि खुद पुलिस के ही क्षेत्राधिकारी कार्यालय के सामने मिले। फिर क्‍या था। पीडित लडकी ने अपनी एक सहेली की मदद से उस अपराधी को धर दबोचा, हालांकि अभियुक्‍त ने खुद को छुडाने की पूरी कोशिश की, लेकिन इसीबीच जनता भी जुट आयी। मामला समझ कर जनता ने भी अभियुक्‍त को जमकर धुना और इसके बाद इन लडकियों के साथ उसे पकड़ कर थाने ले गई।

मिली जानकारी के मुताबिक, 28 जनवरी की शाम को 23 वर्षीय इस लड़की को छह लड़कों ने किडनैप करके नशीला पदार्थ खिलाया और गैंगरेप किया। मामला पुलिस के पास गया। हमेशा की तरह पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। जब मीडिया ने दबाव बनाया तो पुलिस को गैंगरेप का केस दर्ज करना पड़ा।पुलिस ने इसके बावजूद आरोपियों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। विगत दिनों को लड़की ने इन अपराधियों को डीएसपी ऑफिस के पास देखा और उन्हें सहेली की मदद से घसीटते हुए सीधे थाने ले गई। रेप करने वाले युवक की पहचान पंडित मिश्रा के रूप में हुई है। इसके अन्य साथी अभी भी गिरफ्त से बाहर हैं।

हराम है कन्याभ्रूण हत्या: शिया लॉ बोर्ड

गर्भवती की जान को खतरा होने पर ही अबार्शन जायज

हेल्पलाइन भी शुरू कर दी शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने

निकाह के वक्तल ही अदा करें मेहर की रकम

ससुरालवाले ना माने तो सामाजिक बहिष्कार की धमकी

ऐसे लोगों से रोटी-बेटी का रिश्‍ता ही खत्म कर देना चाहिए

बेटियों को बचाने के लिए आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड खुल कर सामने आ गया है। लखनऊ में हुई अपनी एक बैठक में बोर्ड ने केवल बेटियों के ही हक की नहीं, बल्कि मां के पेट में पल रहे कन्या  भ्रूण के संरक्षण को लेकर कमर कस ली। बोर्ड ने ऐलान कर दिया कि कन्या भ्रूण की हत्या हराम की श्रेणी में आती है और इसे किसी भी कीमत पर शिया समुदाय बर्दाश्त  नहीं करेगा। बोर्ड ने कहा कि केवल एक ही वजह से इसे स्वीकार किया जा सकता है जब गर्भवती की जान को खतरा हो और उसकी जान बचाने के लिए गर्भपात जरूरी हो जाए।

बोर्ड की बैठक में पारित प्रस्तावों में कहा गया कि अगर गर्भवती के ससुराल वाले उसके गर्भ का लिंग परीक्षण कराना चाहें या उस पर गर्भपात के लिए जोर डालें तो उस महिला को फौरन बोर्ड की हेल्पंलाइन पर इसकी खबर करनी चाहिए। बाकी का काम बोर्ड खुद करेगा। कानूनी कार्रवाई के साथ ही ऐसे परिवारों के साथ रोटीबेटी का रिश्‍ता खत्मर किया जाएगा और उसके सुखदुख से समुदाय कोई भी सरोकार नहीं रखेगा।

बोर्ड के अध्य क्ष मिर्जा मोहम्मनद अतहर ने शिया समुदाय से अपील की कि वे मेहर की रकम शादी के वक्त  ही अदा करें।  यह सुन्नम ए रसूल है। बोर्ड ने महंगी शादियों पर भी ऐतराज जताया और कम खर्च पर ऐसे आयोजन करने की अपील की।

हवेली से फूटी जनसेवा की गंगोत्री

पगडंडियों पर धूल फांकती हैं अंजू सिंह

महिला सशक्तिकरण की जीती जागती मिसाल है जौनपुर की यह महिला

स्वयं सहायता समूह द्वारा हजारों गरीब महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

गरीबों की मदद के लिये रहती है तैयार, भ्रूण हत्या को रोकने की चला रही हैं मुहिम

यूपी के जौनपुर में महिला सशक्तिकरण एक नये और अनोखे दौर में है। आज हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गये है और पूरा विश्व महिला सशक्तिकरण की बात कर रहा है और वो भी तब जब आज ही के दिन जब पूरा विश्व महिला दिवस मना रहा हो ऐसे में हमारा भी फर्ज है कि उन महिलाओं को वो दर्जा दिया है जिसके लिये उन्होंने ना सिर्फ अपने परिवार को समय देने के साथ साथ समाज के लिये भी कुछ कर दिखाया। इन्हीं में से एक है डाक्‍टर अंजू सिंह। कहने को तो वे सिंगरामऊ जमींदार परिवार से जुडी है पर उनकी समाजसेवा व महिलाओं को आत्मनिर्भर करने की ललक ने ना सिर्फ उन्हें यहां की हवेली से निकलकर गांव की पगडंडियों पर चलने पर मजबूर किया। बल्कि उन्होंने हजारों गरीब महिलाओं व दलितों का उत्थान कर उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया जिसके चलते आज उनके परिवार में दो वक्त की रोटी के साथ साथ समाज में सर उठाकर चलने की आदत बना दी है।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर सिंगरामऊ जमींदारी में राजा हरपाल सिंह की बहू के रूप में डा. अंजू सिंह वर्ष 1984 में यहां पहुंची तो उन्होंने कुछ सपने सजो रखे थे। वो चाहती थीं कि भारत में जब 21वीं सदी की बात होती है और महिलाओं को आत्मनिर्भर करने के लिये तमाम कार्यक्रम चलाये जाते है पर ना जाने क्यों आज भी महिलाओं को वो मुकाम नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार होती है। ऐसे में उन्होंने अपनी हवेली से ही जनसेवा की गंगोत्री बहाने का फैसला किया और निकल पड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर करने के लिये आज उनके प्रयास से ना सिर्फ सिंगरामऊ में बल्कि पूर्वांचल के हजारों महिलाओं ने उनके साथ मिलकर ना सिर्फ समाज में अपना मुकाम हासिल किया बल्कि महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिये उनकी मुहिम सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिये उनकी मुहिम में शामिल हो गयी।

एक जनवरी 1962 को जन्मी डा. अंजू सिंह के पिता श्री विरेन्द्र नारायण सिंह बिहार के छपरा में वरिष्ठ अधिवक्ता है और बार काउसिंल के अध्यक्ष भी रह चुके है। हालांकि वे छपरा जिले की रहने वाली है पर उनका परिवार पटना में ही रहता है। चार बहनों व एक भाई में तीसरे नम्बर पर रहने वाली रानी डा. अंजु सिंह जब सिंगरामऊ पहुंची तो उन्होंने अपने गांव की उन गरीब महिलाओं का दर्द देखा जिन्हें ना सिर्फ काम काज से रोका जाता था बल्कि शिक्षा से वंचित रखा जाता था। पर इन महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिये उन्होंने हवेली को छोड़ा और निकल पड़ी गांव की पगडंडियों पर धूल फांकने के लिये। यही वजह है कि यहां शासन का नहीं बल्कि सामाजिक आर्थिक प्रयास की चमक गांव के लोगों में देखी जा सकती है।

डा. अंजू सिंह ने बताया कि उनके पिता श्री विरेन्द्र नारायण सिंह ने उन्हें जो संस्कार दिये वे उसे आज पूरे समाज को बांटने के लिये निकल पड़ी है और इसमें लोगों का बहुत बड़ा सहयोग मिल रहा है। उन्होंने कहा कि उनका भाई लंदन में आर्थोसर्जन है और तीन बहने अपने ससुरालों में खुशी के साथ जीवन बीता रही है। सिंगरामऊ घराने की अंजू सिंह ने अपनी पढ़ाई मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालय से की थी जबकि मेडिसिन में कलकत्ता विश्व विद्यालय से की थी जबकि मेडिसिन में कलकता विश्वविद्यालय से उन्होंने डिग्री हासिल की और श्रीलंका से उन्होंने मेडिसिन में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की। रानी डा. अंजू सिंह को कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उनका कहना है महिलाओं को आत्मनिर्भर करने के लिये समाज को मिलकर काम करना होगा। तभी हम भ्रुण हत्या दहेज व सामाजिक बुराईयों को दूर कर सकेंगें। जिसके चलते आज भी महिलाओं को नीचा दिखाया जाता है जरूरत है उन महिलाओं को आत्मनिर्भर करने की जिनके पास कुछ कर गुजरने की तमन्ना है पर उनके परिवार वाले उन्हें रोकते है।

डा. अंजू सिंह ठाकुरवाणी महिला विकास समिति के जरिये ना सिर्फ गरीबों की मदद करती है बल्कि गांव के बेसहारा व बीमार लोगों का इलाज करने के लिये हमेशा तैयार रहती हे यहीं वजह है कि आस पास के लोग उनका बहुत सम्मान करते है। देखा जाय तो आज के इस युग में जिस तरह से राजनीति के सहारे सत्ता के कुर्सी पर पहुंचे लोग गांव के पैदल चलने से गुरेज करते है वहीं हवेली की शानों शौकत व आराम को छोड़कर रानी डा. अंजू सिंह समाज की निःस्वार्थ भाव से सेवा कर रही है ऐसे में उनसे लोगों से सबक लेना चाहिये जो लोग सत्ता के गलियारों में बैठक हजारों करोड़ों रूपया जनता का अपने ऐसों आराम में बरबाद कर देते है। संशोधनों के साथ राष्‍ट्रीय सहारा से साभार

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