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सक्सेस सांग

हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज तरुण बनेंगे मेघालय के मुख्य न्यायाधीश

: 2 मार्च को रिटायर होने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिया तोहफा, औपचारिक आदेश जारी होना बाकी : भले ही चंद दिनों के लिये पर चीफ जस्टिस बनने का मौका मिलेगा : पेंशन आदि सुविधाओं में भी होगा इजाफा :

मेरीबिटिया संवाददाता

लखनऊ : इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश तरुण अग्रवाल जल्द ही मेघालय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट कलेजियम ने मोहर लगा दी है। अब बस कानून मंत्रालय द्वारा आइबी रिपोर्ट आने के बाद औपचारिक वौरेंट निकलना बाकी है।

चूंकि जस्टिस अग्रवाल दो मार्च 2018 को रिटायर होने जा रहे हैं इसलिये एसी चर्चा है की केंद्र सरकार भी इनके प्रमोशन में रोड़ा नही अटकायेगी और फरवरी के मध्य तक इनका वौरेंट निकल जायेगा। बहरहाल, इस फैसले से तरूण अग्रवाल को पेंशन आदि सुविधाओं पर खासा लाभ मिल सकता है।

गौरतलब है की जस्टिस तरुण अग्रवाल ने 7 जनवरी 2004 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अतिरिक्त जज की शपथ ली थी। मूलत: इलाहाबाद के ही रहने वाले जस्टिस अग्रवाल ने अपनी वकालत भी इलाहाबाद में की और 2004 में बतौर जज हाईकोर्ट में एलीवेट हो गये।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

सुलखान सिंह को राकेश शंकरों की जरूरत थी, या वैभव कृष्‍णों की ?

: वैभव ने जो नयी डगर बनायी है, काश सुलखान सिंह उस दिशा में सोच भी सकते : पुलिस को संवेदनशील बनाने की जो शुरूआत वैभव ने की है, राकेश शंकर उसका पासंग भी नहीं : पत्रकारों-वकीलों पर निर्मम लाठीचार्ज और अनाथ बच्चियों को निपटाने की साजिश बुनते हैं राकेश शंकर जैसे लोग :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कहां पवित्र केला, और कहां बेर अथवा बबूल की झाड़। एक को घर के दरवाजे, आंगन, दालान, कुएं की जगत, मंदिर अथवा घर के पवित्र स्‍थान पर लगाया जाता है, जबकि दूसरे को गांव की आबादी से दूर। गांव अथवा किसी घर में, या फिर घर के आसपास वह अपने-आप जम भी जाए, तो देखते ही उसे उखाड़ कर या तो नष्‍ट कर देते हैं, या फिर कहीं विस्‍थापित कर देते हैं। कारण यह कि एक का स्‍थान और उसकी उपयोगिता पवित्रतम मानी जाती है, जबकि बेर अथवा बबूल को विपत्तिजनक माना जाता है। एक को पद-त्राण अर्थात जूते दूर हटा कर ही छुआ जाता है, जबकि जूते के पास आते ही जूतों की सख्‍त जरूरत महसूस हो जाती है, स्‍वत: और स्‍फूर्तिजनक भी।

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अनाथ बच्चियों को गुर्राते हुए धमका रहा है एसपी-क्राइम, कि बाहरी बदमाशों को बुला कर तेरा हाथ-पैर तुड़वाऊंगा

इटावा में एक मासूम बच्‍चे के साथ जो व्‍यवहार वहां की पुलिस और वहां के बड़ा दारोगा ने किया है, वे बेमिसाल है। ऐसा नहीं है कि ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं पुलिस महकमें में इससे पहले नहीं हो पायी हैं। लेकिन सच बात तो यह है कि जिस तरह इटावा के बच्‍चे के साथ वहां की पुलिस ने अपनी भूमिका पूरे समाज में एक घनिष्‍ठ और निहायत आत्‍मीय, संवेदनशील और उत्‍तरदायित्‍व अभिभावक के तौर पर पेश की है, वह वाकई बेमिसाल है।

सच बात तो यह है कि जिस तरह से इटावा के एक मासूम बच्‍चे की आंसू को पोंछने के लिए केवल सिर्फ अपना रूमाल ही नहीं दिया, बल्कि उस बच्‍चे के साथ ही साथ उसके अभिभावक, समाज के अभिाावकों और पुलिसवालों के साथ ही पूरे समाज को भी यह एक सशक्‍त संदेश दे दिया, कि किसी भी समाधान के लिए क्रूरता का भाव पाप-कर्म साबित होगा। किसी भी समस्‍या की उपेक्षा कर अपने जीवन-ध्‍येय को दूषित कर देते हैं। जबकि भावुकता और संवेदनशीलता के बल पर कोई भी पुलिसवाला ऐसे ऐसे प्रतिमान स्‍थापित कर सकता है, जो स्‍वर्णिम अक्षरों में अपना डंका तक बजवा सके।

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तो हमारे सामने पुलिस के दो चरित्र स्‍पष्‍ट तौर पर मौजूद हैं। एक तो हैं इटावा का बड़ा दारोगा यानी एसएसपी वैभव कृष्‍ण, जो अपनी बड़ा दारोगाई के बजाय खुद को अपने जिले के पुलिस महकमे का सर्वोच्‍च अधिकारी होने का अर्थ खोजने में जुटा है। उसकी कोशिशें जन सामान्‍य में सुरक्षा का माहौल मुहैया करने जैसी कवायदें हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ वह एक अबोध बच्‍चे के आंसू पोंछने का दायित्‍व पूरी निष्ठा और प्राथमिकता के तौर पर अपनाता है।

जबकि दूसरी ओर है देवरिया का बड़ा दारोगा राकेश शंकर, जिसका जीवन-लक्ष्‍य और आनंद की अनुभूति ही दूसरों के प्रति हिंसा और आतंक का भाव जागृत रखने के माध्‍यम से ही मुमकिन है। अपनी टोपी को आतंक के पर्याय के तौर पर बदल डालने में राकेश शंकर बेमिसाल हैं।

सैडिस्‍ट प्‍लेजर, यानी दूसरों के दुख में अपना अट्ठहास खोजने की पाशविक प्रवृत्ति। अपने लखनऊ के महानगर में दो अनाथ पड़ोसी बच्चियों के प्रति भयावह आतंक और प्रताड़ना की जो कुत्सित साजिशें राकेश शंकर ने रचीं, वे किसी भी सभ्‍य समाज के चेहरे पर एक निहायत बदनुमा कालिख से ज्‍यादा क्रूर ही मानी जाएगी। निकाय चुनाव की मतगणना के दौरान जिस तरह से राकेश शंकर के नेतृत्‍व वाली पुलिस ने निरीह पत्रकारों और वकीलों को दौड़ा-दौड़ा कर लाठियों से पीटा, उससे जनरल डायर तक शर्मिंदा हो सकता है।

उस मामले में राकेश शंकर ने पूरे मामले की लीलापोती की, लेकिन आईजी ने खबर पाते ही मौका पहुंच कर कोतवाल को निलंबित किया और सीओ का तबादला कर संदेश दे दिया कि देवरिया की पुलिस इस मामले में वाकई गलत थी। (क्रमश:)

देवरिया में पत्रकारों पर बर्बर लाठीचार्ज कराने वाली पुलिस के वर्तमान पुलिस अधीक्षक राकेश शंकर से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:- राकेश शंकर

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है।

इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं। यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने।

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वर्दी में धड़कता दिल


इटावा: सामाजिक दायित्‍व की गंगा प्रवाहित की पुलिस ने

: बच्‍चे का हठ उसकी निजी ख्‍वाहिशों के लिए होता है, जबकि अभिभावकों का कदम सामूहिक : हर ख्‍वाहिश पूरी कर पाना हर बाप के वश की बात नहीं होती : इटावा का यह बड़ा दारोगा न होता, तो यूं ही चलता रहता ढर्रा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह नया दौर है जनाब। वरना सोचिए तनिक, कि पहले का कोई बच्‍चा अपने पिटने के बाद कहीं किसी से शिकायत करने की सोचता था। अजी, वह या तो टेसुए बहाता है, और बाद में अपने दोस्‍तों के साथ घर से पैसा चुरा कर अपनी ख्‍वाहिशों को पूरा कर लेता है। वह मान बैठता था कि अगर बाप ने उसे पीटा है, किसी आग्रह को टाल दिया है, या उसे खारिज कर दिया है, तो वह उसका बदला लेकर ही मानेगा। जाहिर है कि उसका यह फैसला प्रतिशोध के स्‍तर पर होता था, और जाहिर है कि उसमें उसका निजी-पन ही हावी होता था।

लेकिन इटावा में ऐसा नहीं हुआ। एक मासूम बच्चे पर जब उसके पिता ने उसकी जिद पर पीटा डाला, तो इस बच्‍चे ने इस मामले को निजी झगड़े के बजाय उसे सामाजिक स्‍तर पर पहुंचाने और उसका निदान खोजने की पहल छेड़ दी। वह सीधे थाने पर पहुंचा। बेधड़क निसंकोच। बोला कि मुझे पिता परेशान कर रहे हैं। परेशानी का आशय उसके शब्दों में यह था कि उसके पिता उस की अपेक्षाएं-इच्‍छाएं पूरी नहीं कर रहे हैं। वह चाहता था कि उसके पिता उसको नुमाइश घुमाने ले जाएं। और अगर ऐसा न भी हो सके, तो कम से कम ऐसा कर दें ताकि वह नुमाइश की सैर कर सके। लेकिन आखिरकार अगर ऐसा किसी भी हालत में मुमकिन न हो पा रहा हो, तो वह चाहता था कि ऐसा न करने पर उसके बाप की पिटाई हो जाए, उसे हवालात पर बंद कर दिया जाए।

सामान्य तौर पर बच्चे के ऐसे किसी हठ को केवल उसके अभिभावक ही नहीं, बल्कि आस-पड़ोस और दूरदराज के लोग भी उसकी जिद के तौर पर देखते हैं। साथ ही साथ, इतना जरुर साबित हो जाता है कि वह बच्चा पूरी तरह अराजक और बदमाश हो चुका है, जिसे औकात में लाकर खड़ा कर देना वक्त की सख्त जरूरत होती है। उनका अटूट विश्‍वास हो चुका होता है कि अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो उस बदमाश बच्‍चे की ऐसी ख्वाहिशें सामाजिक तन्‍तुओं को तबाह कर देंगी। अभिभावकों का जीना हराम हो जाएगा और समाज ऐसे अराजक बच्चों की भरमार से बिखर जाएगा। ऐसे लोगों का मानना होता है कि बच्‍चे की ऐसी जिद का कोई इलाज नहीं होता। सिवाय छड़ी अथवा तमाचे, लात-घूंसे।

मगर ऐसा हुआ नहीं। थाने में पुलिसवाले ने अपनी परंपराओं को तोड़ दिया। अपनी मूंछ को नीचा कर दिया, डंडा दूर फेंक दिया, राइफल की सारी गोलियां निकालकर बिखेर दिया, जुबान की कड़वाहट को धो दिया, और दिल-दिमाग में मिश्री ही नहीं, बल्कि उसे गंगाजल-आबेजमजम से पवित्र भी कर दिया। कुछ इस तरह, ताकि जीवन भर यह बच्‍चे उसे भूल नहीं सकेंगे।

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इटावा की पुलिस ने इस बच्चे में अपने दिल में अपने ही बच्चे को बचपन को जगा दिया और इस पूरी बातचीत वीडियो बनाकर वायरल कर दिया। इटावा का बड़ा दरोगा इस मामले में अपनी अफसरी छोड़ उस बच्‍चे की भावनाओं को सहलाने और उसे संतुष्‍ट करने लगा। लेकिन इस बात की भी पूरी कोशिश की कि उसका यह कदम केवल भावुकता से प्रेरित न हो, बल्कि उसे दूरगामी नतीजे भी अपनी अमिट छाप डाल दें। जिला का बड़ा दारोगा और उसकी पुलिस टीम ने इस घटना को एक सरल, निष्पाप और प्रगतिशील पिता के तौर पर देखा-समझा और क्रियान्वित कर डाला।

वैभव कृष्ण। जी हां, इटावा का बड़ा दरोगा, जिसे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कहा जाता है। वैभव कृष्‍ण के इस कदम ने इस मासूम के प्रति अपनी भावनाओं का समंदर उछाल दिया। इस बच्चे की ख्वाहिश को पूरी कर डाला। नतीजा यह हुआ कि पुलिसवाले उसके घर गए, और उसके मां-बाप को समझाया। इतना ही नहीं, आसपास के हमउम्र बच्चों को भी इकट्ठा किया और फिर यह पूरा रेला एक मेटाडोर पर लद कर पहुंचा दिया गया प्रदर्शनी स्‍थल तक, जहां इन बच्चों ने प्रदर्शनी का लुत्‍फ लिया, जहां-तहां झूला-झुलनी किया, विभिन्‍न खेलों का आनंद लिया। और सबसे बड़ी बात यह इस दौरान पुलिस वाले बच्चों के चाचा, मामा, मौसा, फूफा की भूमिका में मुस्‍तैद रहे। पुलिसवालों ने इन बच्‍चों के लिए आइसक्रीम से लेकर उनकी हर पसंदीदा चीजें मुहैया करायीं।

मगर साथ ही साथ, इन बच्‍चों को यह भी पूरे प्‍यार-दुलार के साथ यह भी समझा दे दिया कि मां-बाप की हैसियत की भी एक सीमा होती है। दुनिया की हर ख्‍वाहिश पूरी कर पाना हर बाप के वश की बात नहीं होती है। पुलिसवालों ने भी इन बच्‍चों के मां-बाप को भी यह समझाया कि वे अपने बच्‍चे के साथ किस तरह का व्‍यवहार करें। ( क्रमश:)

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं। यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

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जिद बच्‍चे की, सामर्थ्‍य अभिभावक की: बड़ा लोचा है यार

: अभिभावक के सामने सामर्थ्‍य का संकट होता है, जबकि बच्‍चे की ख्‍वाहिशें सर्वोच्‍च : दोनों ही पक्ष जमीन पर सितारे तोड़ लाना चाहते हैं, जबकि अभिभाव अपने बच्‍चे के लिए, जबकि बच्‍चा सिर्फ अपने लिए : निम्‍न मध्‍य वर्ग व निचले के आय वर्ग से ताल्‍लुक वाले परिवारों में यह द्वंद्व अनर्थकारी होता जा रहा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इटावा के इस बच्चे की ख्वाहिशें ठीक उसी तरीके से भड़की हैं जैसे कोई भी बच्चा, जो अपनी ख्वाहिश पूरी ना होने पर अपना पूरा आक्रोश अपने अभिभावकों पर निकाल देता है। वह चाहता है उसका मसला सबसे पहले निपटा लें। सबसे पहले उसकी ख्वाहिश पूरी की जाए। सबसे पहले उसकी बात सुनी जाए और उसकी इच्छाओं को प्राथमिकता पर सुना जाए और पूरा जाए।

लेकिन ऐसा नहीं कि कि हर मांग जायज ही हो। किसी भी अपेक्षा और उसकी पूर्ति के बीच एक गहरी खाई भी हो सकती है। खास कर बच्‍चों की ख्‍वाहिशें, जो आसमान के हर तारे-सितारे को तोड़ कर अपने कदम में डाल देना चाहते हैं। ऐसी हर ख्वाहिश को पूरा कर पाना हर अभिभावक के बस की बात नहीं होती। विशेष तौर पर उन परिवारों में तो यह संकट सबसे ज्‍यादा होता है, जो निम्‍न मध्‍य वर्ग अथवा उसके नीचे के आय वर्ग से ताल्‍लुक रखते हैं।

सच बात तो यही है कि किसी भी अभिभावक की अपनी सीमाएं होती हैं। और उसकी हर सीमा उसके व्यवसाय से जुड़ी हो सकती है। उसकी नौकरी की दिक्कतों से जुड़ी हो सकती है। उसके मानसिक तनाव से जुड़ी होती है। उसकी आर्थिक बदहाली या अशक्तता को लेकर हो सकती है। उसके समय क्या उसकी मनोभाव को लेकर हो सकती। पारिवारिक हालातों को लेकर हो सकती है। ऐसी कोई भी सीमाएं उसकी अपनी उस समय की मनोस्थिति पर पर भी निर्भर करता है कि वह अपने पर परिवार पर और खास तौर पर अपने बच्चे के साथ क्या व्यवहार कर रहा है। अथवा उस बच्‍चे अथवा परिवार के किसी सदस्‍य, उसके खानदान का रवैया और उसके आसपास यानी पड़ोस के लोगों के साथ उसके रिश्‍ते क्‍या हैं। इन्‍हीं सारी चीजों में से किसी एक अथवा अनेकानेक दिक्‍कतों से ही किसी भी अभिभावक के फैसले संचालित हो सकते हैं। चाहे यह फैसले अनायास हों, अथवा सायास।

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किसी भी अभिभावक की सीमाओं में उसकी शारीरिक क्षमता भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसके साथ ही साथ, आर्थिक मसला भी बहुत जरूरी होता है। हो सकता है कि बच्चा जिस समय जिस चीज की मांग कर रहा हो या अपेक्षा कर रहा हो उस समय उसकी सुनवाई या प्रतिपूर्ति कर पाना उसके अभिभावक की बस की बात न है। सामान्य तौर पर ऐसी घटनाएं हमारे आस पास होती हैं। जहां अभिभावक अपनी सीमाओं को तोड़ नहीं पाते हैं। जबकि दूसरी ओर बच्चे की अपेक्षाएं हर सीमा को तोड़ देना चाहती है। यह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव का सम्मेलन करा देने जैसी हालत होती है, जिसे निपटाना अक्सर नामुमकिन होता है। नतीजा, विद्रोह शुरू हो जाता है जिसकी परिणति क्रोध से होती है। और विध्वंस से उसका अनुष्ठान संपूर्ण हो जाता है।

उधर दूसरी तरफ देखें। एक व्यक्ति अपनी किसी अपेक्षा को लेकर पुलिस यह थाने के पास पहुंचता है तो सामान्य लोगों की भावना यही होती है कि उसे समाधान के बजाय दुत्कार ही मिलेगी। धन उगाही और ऊपर से अपमान बेहिसाब होगा। और फिर वह एक ऐसी मनोस्थिति तक पहुंच जाएगा, जहां लंबे भविष्य काल तक उसकी सारी रगें दुखती ही रहेंगी। थाना पुलिस और आम आदमी के बीच जो रिश्ता समझदारी का होना चाहिए या सोचा गया था वह आज बुरी तरह बिखर जाता दिख रहा है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा ( क्रमश:)

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं। यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

वर्दी में धड़कता दिल

अराजक पुलिस की भीड़ में वैभव कृष्‍णों की जरूरत अपरिहार्य

: भावुकता से कोसों दूर वैभव कृष्‍णा ने अपनी संवेदनशीलता से इस छोटी सी घटना को अप्रतिम बना डाला : इटावा से फूट कर बह निकल पड़ी इस गंगोत्री के खासे दूरगामी परिणाम निकलेंगे :  इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश :

कुमार सौवीर

लखनऊ : थाने में पहुंचे एक मासूम बच्‍चे की आंख में उमड़े आंसुओं को पोंछने की कवायद करना ऐसा कोई ऐतिहासिक घटना नहीं है, जिसके लिए आने वाली सदियों प्रभावित होती रहें। ऐसा काम तो ऐसा कोई भी काम कर सकता है कि जिसके सीने में दिल धड़कता होगा। ऐसा करने वाले के बारे में इतना जरूर है कि वह व्‍यक्ति निहायत भावुक है। लेकिन इतना जरूर है कि जिस तरह इस पूरे मामले में इटावा के बड़ा दारोगा वैभव कृष्ण ने कार्रवाई की है, वह उनकी भावुकता नहीं, बल्कि उनकी संवेदनशीलता का प्रतीक है। और यही संवेदनशीलता इस छोटी सी घटना को आने वाली पुश्‍तों-सदियों तक गहरे तक प्रभावित करती रहेंगी।

मैं कभी भी वैभव कृष्‍ण से नहीं मिला। लेकिन इटावा की घटना से लगता है कि अंतरमन के स्‍तर पर वैभव से मेरी खासी करीबी रिश्‍तेदारी है। अपने जिले के मुखिया के तौर पर वैभव कृष्‍ण के नेतृत्‍व में उनकी टोली ने जो काम किया है वह ऐतिहासिक है। यह घटना से भविष्य में बच्चे और उस जैसे अभिभावकों के साथ ही साथ समाज में पुलिसिंग का दायित्‍व सम्‍भाले लोग हमारे दीगर सामाजिक तंतुओं को जोड़ने में यह घटना बेहद महत्वपूर्ण साबित करेंगे। जहां अभिभावक वर्ग अपनी भूमिकाओं में संशोधन करने पर बाध्य होगा, जहां एक बच्चों को अपनी आजादी का नया सेनानी बनने का मार्ग प्रशस्‍त होगा, जहां पड़ोस में भी ऐसे सामाजिक मसलों पर जागरूकता फैलाने का रास्‍ता खुलेगा, जहां समाज के विभिन्‍न तन्‍तुओं-पक्षों की बातों को सुनने के लिए समाज के दीगर पक्ष-लोग भी मौजूद होंगे, वहीं पुलिसवाले भी इस बारे में सोचेंगे जरुर, कि ऐसे मसलों पर उनका नजरिया और लाइन ऑफ एक्शन क्या हो। कहने की जरूरत नहीं कि इसी सिलसिले के बढ़ने से ही समाज में परस्‍पर विश्‍वास, एकजुटता और आंतरिक सामाजिक कसाव का भाव उमड़ेगा।

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देखिये, समस्या यह है कि पिछले कुछ दशकों से हम परिवार को निजी जागीर तौर पर देखने लगे हैं। खासतौर से तब जब से गांव का ढांचा बिखरने लगा है, पारिवारिक रिश्‍ते बुरी तरह खदबदाने लगे हैं। उसके साथ ही साथ, जब से संयुक्‍त पारिवारिक इकाइयां ध्‍वस्‍त होने लगी हैं, तब से ही समाज की सबसे कमजोर कड़ी साबित बनता जा रहा है परिवार का बच्‍चा, और दूसरे स्‍तर पर वृद्ध-जन। पारिवारिक तनाव उपजने, भड़कने लगे हैं। झगड़ों का सिलसिला बेहिसाब बढ़ने लगा है। जो पड़ोसी हमारे सोचने खाने-पीने रहने-सोचने के हमसफ़र हुआ करते थे, अब उपभोक्ता संस्कृति में समाज में खुद अपने आप में रहते हुए भी समाज में कट से जाते हैं। जब परिवार एकल और सूक्ष्‍म परिवार इकाई में तब्‍दील हुआ, तो पड़ोसी में भी भाईचारा के सारे रिश्‍ते बिखर गये। वह पुलिस वाले, जिनका दायित्व लोगों की बातचीत सुनना और उनका समाधान खोजना होता था, पीडि़त जन को सुरक्षा देना हुआ करता था, वह अब अक्‍सर सरेआम लूट, मनमानी और हिंसा पर आमादा होते हैं दिख जाते हैं। पुलिस का चरित्र आम आदमी को इंसान नहीं बल्कि अब हलाल होने की हालत पहुंच चुके मुर्गा समझने की प्रवृत्ति पाल बैठा है।

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं। यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

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