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सक्सेस सांग

बांस-विकास योजना का उपयोग मुझ पर ही कर डाला

: जहां का अन्‍न-रोटी खायी है, वहां की सेवा करूंगा। शब्‍द-सेवा करूंगा, वाक्‍य-संयोजन संवारूंगा : अब तक 43 मामले मेरे खिलाफ अदालतों में दर्ज हो चुके : चमक-दमक से दूर हट कर सहज लोगों से दोस्‍ती करना सहज व्‍यक्ति का जीवन आसान कर देता है : साशा की शादी के किस्‍से -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बहरहाल, तय किया था कि पत्रकारिता में मैंने अपने 38 बरस खपाये हैं। मेरा पहला लेख दैनिक स्‍वतंत्र भारत में प्रकाशित हुआ था अक्‍टूबर-1980 में। नवम्‍बर-80 से दैनिक अमृतप्रभात, दैनिक नवजीवन के साथ ही साथ अमर उजाला और जनसत्‍ता तथा दिनमान वगैरह में भी मैं नियमित रूप से छपने लगा था। और उसके बाद 2 जून-82 से साप्‍ताहिक सहारा में प्रूफ-रीडर के तौर पर नियमित नौकरी शुरू कर दी। आज पूरे दौरान आधा वक्‍त तो नौकरी में खपा, जबकि बाकी आधा वक्‍त बेरोजगारी में जीवन को समझने-देखने में लग रहा है। यानी मुझे दोनों ही अनुभव हैं, रोजगार में कठोर परिश्रम जनित अनुभव और कठोर बेरोजगारी जनित दुर्धष साहस। तो संकल्‍प ले लिया कि अब नौकरी के बजाय उस क्षेत्र में पूरा जीवन अर्पित कर दूंगा, जिसने मुझे इंसान बनाने की कोशिश की। यानी पत्रकारिता। पूरा जीवन अर्पित कर दूंगा। जहां का अन्‍न-रोटी खायी है, वहां की सेवा करूंगा। शब्‍द-सेवा करूंगा, वाक्‍य-संयोजन संवारूंगा। नि:शुल्‍क। हां, सबसे मांगूंगा जरूर, मगर दक्षिणा-दान या भिक्षा के तौर पर। पारिश्रमिक के तौर पर हर्गिज नहीं।

इसलिए तो मैंने मेरी बिटिया डॉट कॉम शुरू किया और उन खबरों पर काम किया, जो खबरों का धोखा होता है, गड़बड़-झाला। उन पर खुलासा करना शुरू किया, उनकी हरकतों को बेपर्द करना शुरू कर दिया। खास तौर पर ऐसे पत्रकारों और सम्‍पादकों को, जो खबर-समाचार जगत में कलंक हैं और उसे लगातार कलंकित करते ही रहते हैं। खबरों को दबाना, उसे मोड़ना-मरोड़ना, फर्जी खबर बुनना और उसे छापना, पत्रकारिता से इतर आगे कींचड़ में घुसना, ठेका-दलाली हासिल करना। ऐसे पत्रकार तो ऐसे भी हैं जो उगाही और रंगदारी तक उगाहते हैं, उन पर बेहिचक हमला करना शुरू कर यिा मैंने। मगर इसके साथ ही साथ उन पत्रकारों पर भी काम शुरू किया जो वाकई पत्रकारिता करते हैं, और समाचार-सेवा के तौर पर पत्रकारिता के साथ ही साथ अपने जीवन को भी धन्‍य करने के अभियान में जुटे हैं। मैंने ऐसे भी और वैसे भी लोगों को चिन्हित करना शुरू किया।

यह एक बड़ा अभियान था। इसलिए भी, क्‍योंकि इससे पहले ऐसा कोई भी साहस कभी किसी पत्रकार ने नहीं किया है। ऐसी हालत में समाज के हर कोने से मेरे पक्ष में भारी सक्रिय एकजुटता का भाव उमड़ना चाहिए था, जैसा कि मैं अपेक्षा कर रहा था, या जो अपेक्षित था। मगर ऐसा हुआ नहीं। हां, जिनके लोगों के कामों-चरित्रों की सराहना की, उन्‍होंने तो मुझे तनिक भी कोई मदद नहीं की, लेकिन जिन पर हमला किया, वे मुझ पर हमलावर हो गये। जिन्‍हें साजिश के तहत फंसाया गया था, उनके बारे में मैंने निर्दोष भाव में अपनी कलम उठायी, लेकिन अधिकांश मामलों में वे भी अपना काम निकलने के बाद अपने कंधे उचका कर अलग खड़े हो गये। लेकिन उनकी सहभागिता और सहयोग के साथ मैंने उनके पक्ष में युद्ध छेड़ा, अब तक 43 मामले मेरे खिलाफ अदालतों में दर्ज हो चुके हैं। मगर वे भी छिटक कर अलग हो गये।

बहुत कम ही लोग सामने आये हैं जो मेरे काम की प्रशंसा कर उसमें अपना योगदान कर रहे हैं, लेकिन बाकी लोगों ने तो मोदी सरकार की बांस-बैम्‍बू विकास योजना का पूरा उपयोग केवल मेरे खिलाफ ही उठाया है। (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


जीवन का रिपोर्ट-कार्ड तो मित्रों से बनता है

: सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक कीजिए : मित्रता का मूल्‍यांकन भौतिक अपेक्षाओं से करेंगे, तो वह सौदेबाजी ही होगी : अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें कुमार सौवीर, यह सामाजिक जरूरत है : साशा की शादी के किस्‍से -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : किसी भी शख्‍स की जिन्‍दगी के रिपोर्ट-कार्ड का मूल्‍यांकन करना हो तो सबसे पहले उसके दोस्‍तों को चेक करना चाहिए। लेकिन दोस्‍तों में सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक किया जाना चाहिए। वजह यह कि ताजे-नवेले मित्र को उसकी वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर जुड़ते-घटते ही रहते हैं। आज हैं, तो कोई गारंटी नहीं कि कल वे होंगे ही जरूर। मगर असल दोस्‍त तो जिन्‍दगी हर सांस की तरह आपको हर क्षण मजबूत करता ही रहता है। जिन्‍दगी में उसकी भूमिका में लाभ-नुकसान की भावनाएं कोंसों-योजनों दूर होती है। मकसद सिर्फ यह कि अपने मित्र को उर्जा देता ही रहे, हर कीमत पर।

तो लब्‍बोलुआब यह कि अगर किसी की जिन्‍दगी में बचपन के सारे दोस्‍त बिना किसी लाग-लपेट के मौजूद दिख रहे हों, तो फिर तो मौजां ही मौजां। अजी, ऐसे में तो आप सिर्फ मौज कीजिए। बेशक मान लीजिए कि आप डिस्टिंक्‍शन नम्‍बरों से जीत गये। अव्‍वल नम्‍बर से। सच कहूं, तो ऐसी बेमिसाल जीत बहुत कम लोगों को ही नसीब होती है।

बीती 20 फरवरी-2018 को हुई मेरी बिटिया साशा सौवीर की शादी में तो यही सब हुआ था।

सन-11 में तय कर लिया था कि अब नौकरी नहीं करूंगा। "फिर अब तुम क्‍या करोगे?" यह सवाल कई लोगों ने मुझ पर उछाला था, और उनके सवालों की झड़ी आज भी मुझे कीचड़-वर्षा सी महसूस होती है। लेकिन ऐसे सवाल मुझे इसलिए कष्‍ट नहीं देते कि उनके सवाल का मकसद मुझे प्रताडि़त करने लगने जैसा लगता है, बल्कि इसलिए कि शायद उन्‍हें मेरी क्षमताओं का आंकलन नहीं किया होता है। वे मेरे प्रति स्‍नेह-प्रेम के अतिरेक में मुझको लेकर भयभीत हो जाते हैं।

अरे नौकरी करने-छोड़ने के मामले में खासा हिस्‍ट्री-शीटर हूं। सन-84 में जब सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय को उसके आफिस में घुस कर अपने जूतों से रौंदा था, तब भी नौकरी गंवा गया था। उसके बाद सन-92 में दैनिक जागरण के सम्‍पादक विनोद शुक्‍ला ने अपनी कमीनगी का प्रदर्शन किया, तो मैं ने भी उसका विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि मेरा तबादला बरेली कर दिया गया। मगर मैंने नौकरी करने के बजाय, जागरण को ही अलविदा कर दिया और जागरण की नौकरी को लात मार कर बेरोजगारी से आलिंगनबद्ध हो गया था मैंने।

पूरे करीब दस बरस तक बेहद कष्‍ट में रहा, मगर समझौता नहीं किया।

हां, केवल वे मित्र ही हैं, जो हमेशा यही चाहते और करते रहे कि कैसे भी हो, कुमार सौवीर अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें। किसी ने मुझे आर्थिक मदद की, तो किसी ने हौसला। आज तक यही हो रहा है, कोई मुझे सहयोग कर रहा है, तो कोई दान-दक्षिणा। जीवन का प्रवाह कलकल बहता ही जा रहा है। झरने पर उछल-कूद करते जल-बूंदों के छोटे-मोटै झुण्‍डों की तरह। कहीं फंस जाता हूं, तो कहीं कुछ अरमान सूखने लगते हैं। कभी इस पत्‍थर से अपना सिर फोड़ बैठता हूं, तो कभी अपनों का झुण्‍ड बना कर आनंदोत्‍सव मनाते हुए आगे बढ़ जाता हूं।

सात बरस से बेरोजगारी। किसी को भी विचलित कर सकती है। अच्‍छे-अच्‍छों को हिला सकती है, चकनाचूर कर सकती है। दुनिया के विशालतम सबाना जंगल के जेब्रा या भैंसों पर शेरों की टोली के अचानक हमलों की तरह छिन्‍न-भिन्‍न जानवरों की तरह कुछ मित्र आपके संकट के दिनों में धूल झाड़ते हुए रफू-चक्‍कर हो जाते हैं। सबसे आक्रमण होता है मित्रों को लेकर भावनात्‍मक धरातल पर। कुछ मित्र कर्कश हो जाते हैं, खास कर पुरूष-मित्र। वे चंद लोग मेरी जिन्‍दगी में सिर पर पांव रख कर भाग निकले थे, तो उनका क्‍या किया जा सकता है।

जबकि ज्‍यादातर महिला मित्र तो मुझ पर दयनीय भाव का प्रदर्शन करती हैं। च्‍च्‍च्‍च्‍च्‍ बेचारा, कैसे चलेगा तुम्‍हारा जीवन, समझ ही नहीं पाती हूं। लेकिन कभी मेरे लायक कोई जरूरत महसूस हो तो बताना जरूर। कुछ तो ऐसी हैं कि मोबाइल पर बातें तो घंटों तक बतियाएंगी, कि हर बार में सैकड़ों का बिल गिर जाए, लेकिन ब्‍लाउज से बटुआ नहीं निकालेंगी। वे चाहे इलाहाबाद वाली हों या फिर जौनपुर वाली, अथवा सोनभद्र, इलाहाबाद, वाराणसी, बाराबंकी, कानपुर, मुरादाबाद, आगरा, दिल्‍ली, छपरा अथवा अमृतसर या जोधपुर वाली। हां, हल्‍का-फुल्‍का खर्चा तो बायें हाथ की बात है।

बस्‍स्‍स। इससे ज्‍यादा नहीं।

मगर ओहदा, ऐश्‍वर्य, वैभव या धन-दौलत से मित्रता का मूल्‍यांकन क्‍या किया जा सकता है?

हर्गिज नहीं।

है न? (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


सवाल समाधानों का नहीं, समाधानों के लिए जमीन बनाने का है

: इटावा की पुलिस ने जो किया, वह भविष्‍य में पुलिस के प्रति विश्‍वास जमाने में एक बड़ी पहल साबित होगी : ऐसा हर्गिज नहीं कि ऐसी कवायदें हमारे समाज के सवालों का हर समाधान खोज डालेंगी : ऐसी घटनाएं बहुत कम है और इसीलिए जब भी ऐसी कोई घटना होती है तो वह समाज को हिलोर देती है : लखनऊ विश्‍वविद्यालय की डीन प्रो निधिबाला का विश्वास है कि इससे समाज में परिवार-भाव उमड़ेगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इटावा से शुरू हुई निकली हुई गंगोत्री के खासे दूरगामी परिणाम निकलेंगे। लखनऊ विश्वविद्यालय की डीन प्रोफेसर निधि बाला का विश्वास है कि इस घटना से सभी पक्षकार लाभान्वित होंगे। सभी में यह से एक भाव जरूर उमड़ेगा कि सब एक ही परिवार के अंग है जिसमें पुलिस और परिवार भी अनिवार्य पक्षों में शामिल है। प्रो निधिबाला कहती हैं कि जरा उस दौर को फिर से गहरी निगाह से निहारने की कोशिश कीजिए, जब परिवार में एक भी असंतुष्‍ट इकाई को तत्‍काल किसी दूसरी इकाई लपक कर थाम लेती थी। परिवार के किसी भी सदस्‍य को अगर कोई शिकायत होती थी, तो दूसरा कोई सदस्‍य उसकी ग्रिवांस को फौरन सुनता और उसका समाधान कर देता था। और फिर उसी प्रक्रिया से ही उस असंतोष का एक नया निदान खोजना शुरू हो जाता था। यही हालत तब के आसपड़ोस, गांव, समुदाय और समाज में भी लागू हो जाता था। कोई भी तनाव हो, किसी भी कोने उसे उमड़े, समाधान मिलते ही क्षणिक साबित हो जाते थे।

आईपीएस अफसरों से जुड़ी खबरों को देखने के लिए क्लिक कीजिए:-

बड़ा दारोगा

हम यह नहीं कहना चाहते हैं कि इटावा की पुलिस की पहलकदमी के बाद से भविष्य में कोई ऐसा बच्चा अपने किसी अभिभावक के प्रति गुस्सा नहीं करेगा। हम ऐसा भी नहीं कहते कि कोई बच्चा थाने तक जाने की हैसियत नहीं जुटा पाएगा। यह भी नहीं कहना चाहता हूं मैं, कि उसकी अर्जी अगर थाने पर जाएगी तो हर पुलिसवाले का दिल मोम की तरह पिघल पड़ेगा। हमारे कहने का यह मकसद कत्‍तई यह नहीं है कि इस समाधान के बाद ऐसी घटनाओं के प्रति हमारे परिवार और समाज में करुणा का संचार हो ही जाएगा। और अगर हो भी जाएगा तो उसे पूरी गंभीरता के साथ पुलिसवाला भी करेगा भी या नहीं, यह भी मौलिक प्रश्‍नों में शामिल है। और आखिर में यह प्रश्न  जरूर उठेगा कि एक जिले का बड़ा दरोगा क्या इतना वक्त निकाल पायेगा कि अपने सरकारी दायित्व के कर्कश भाव से अलग हट जाए और एक मासूम की आशाओं के आंसुओं को पोंछने और उसके चेहरे पर रुदन की बजाय उल्लास और मुस्कान की फसल लहरा सके।

मगर इतना जरूर है कि इन सारे सपनों के बीज बोने की कोशिश के तहत हम जमीन को उर्वर बनाने की ईमानदार कोशिश तो कर ही सकते हैं।

सामाजिक सामंजस्य की मजबूती के लिए ऐसी कौन सी कोशिश उनमें से ज्‍यादा आपकी नजर में बेहतर तरीके के हो सकती है, अगर आपको पता चले तो बताइएगा जरूर।

हमारा पता है This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं।

यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

वर्दी में धड़कता दिल

बेटियों की सेहत के हानिकारक नहीं, असली बापू साबित हुए हरियाणवी मर्द

: एक हजार लड़कों में आज 914 बेटियां की जीत। शाबाश, छह बरस में ही कायापलट कर दिया : सन-11 में यही आंकड़ा 834 था, सन-16 में 900 : इसके पहले बेटियों के तेज खात्‍मे को लेकर पूरी दुनिया में अपनी छीछालेदर का सामना कर चुका है हरियाणा :

मेरी बिटिया संवाददाता

चंडीगढ़ : अभी चंद पहले ही हरियाणा का नाम सुनते ही लोगों की नजर में कन्‍याओं की हत्‍याओं और उनके मन-मस्तिष्‍क में बच्चियों के खून-खच्‍चर का ही डरावना सपना दीखता था। आम तौर पर पूरे देश में हरियाणा को निहायत घटिया और पुत्री-हंता के तौर पर मशहूर माना जाता था। इस विद्रूप दृश्‍य तब हाहाकार मचा गया, जब हरियाणा के एक मंत्री ने यह बयान दिया कि हमारे राज्‍य में बेटियों की संख्‍या कम है, इसलिए हम अपने पुरूषों की शादी के लिए बिहार की कन्‍याओं से करने का विचार कर रहे हैं। यह बयान आते ही हरियाणा की छीछालेदर शुरू हो गयी थी।

लेकिन आज हरियाणा में चमत्‍कार हो चुका है। भारी कन्‍या भ्रूण-हत्‍या और कन्‍या उपेक्षा के भाव के चलते हरियाणा के चेहरे पर जो कलंक चस्‍पा हुआ करता था, वहां अब कन्‍याओं की किलकारियां गूंज रही हैं। खुशखबरी इस बात की है कि हरियाणा ने अपनी शक्‍ल पर पुती कालिख को धो-पोंछ दिया है और हालत यह है कि महज छह बरस में ही हरियाणा के कन्‍या संख्‍या प्रति हजार पुरूषों के मुकाबले 914 तक पहुंच गयी है। अनुमान है कि आने वाले चंद बरसों में यह संख्‍या एक हजार से भी ऊपर निकल सकती है।

कन्‍याओं के इस साल लिंगानुपात में काफी सुधार देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2017 में लिंगानुपात प्रति 1000 लड़कों पर 914 लड़कियों का रहा। बता दें, साल 2016 में यह 900 था, वहीं साल 2015 में यह केवल 876 था। राज्य के 17 जिलों में 900 या उससे ज्यादा का आंकड़ा देखने को मिला है। वहीं किसी भी जिले में लिंगानुपात का आंकड़ा 880 से कम नहीं है। साल 2011 से राज्य में लिंगानुपात के आंकड़ों में सुधार देखने को मिला है। साल 2011 में राज्य में प्रति 1000 लड़कियों पर 834 लड़के थे। इसके बाद से हर साल लिंगानुपात के आंकड़ों में सुधार देखने को मिल रहा है। साल 2017 में राज्य में 5,09,290 बच्चों का जन्म हुआ। इनमें 2,66064 लड़के और 2,43,226 लड़कियों शामिल हैं।


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