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सक्सेस सांग

फर्जी बाबाओं पर जेहाद छेड़ा था, अब खुद ही रगेदे गये कुशमुनि

: इलाहाबाद के ही बाबा है कुश मुनि बाबा, मालामाल बाबाओं में उनकी गणना अग्रगण्‍य है : अखाड़ा परिषद ने जिन 14 फर्जी बाबाओं की लिस्‍ट जारी कर उन्‍हें पर प्रतिबंध लगाया है, कुश मुनि का नाम भी शामिल है : अब अखाड़ा परिषद पर पानी पीकर गालियां दे रहे हैं कुश मुनि :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कुश मुनि ने एक बिल्‍ली पाल ली थी। उसको सिखाया था कि जिस-तस को पंजा मारना। लेकिन अचानक उस बिल्‍ली ने अपने तेवर गजब दिखा दिये। उसने अपने ही मालिक के चेहरे पर एक दिन एक जोरदार पंजा मार दिया। अब यह मालिक कुश मुनि का चेहरा बुरी तरह लहू-लुहान हो गया है, और वे जहां-तहां अपनी चिल्‍ल-पों करते दिख रहे हैं।

यह मामला है इलाहाबाद का। यहां के एक बाबा हैं कुश मुनि। अक्‍सर ही वे अपने कृत्‍यों को लेकर बहुत चर्चित होते रहे हैं। करीब छह महीना पहले उन्‍होंने यह कह कर सनसनी फैला दिया था कि देश में बेहिसाब और फर्जी शंकराचार्य बन गये हैं कि उनके चलते यह जगत ही छोटा पड़ गया है। ऐसे में ऐसे फर्जी बाबाओं को चिन्हित कर उन्‍हें संत समाज से निकाल बाहर कर हिन्‍दू संस्‍कृति को बचाना अब समय का तकाजा हो गया है। लेकिन हाल ही 11 सितम्‍बर को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने अपनी एक बैठक में देश के जिन 14 फर्जी बाबाओं की लिस्‍ट जारी कर उन्‍हें हिन्‍दू समाज से बहिष्‍कृत करने की कवायद छेड़ी है, उसमें कुश मुनि का नाम भी शामिल है। अब कुश मुनि ने पानी पी-पी कर अखाड़ा परिषद के खिलाफ गालियां देना शुरू कर दिया है।

इसके पहले कुश मुनि ने कहा था कि इस देश मे इतने जगद्गुरू शंकाराचार्य बन गये हैं कि जगत छोटा पड़ गया है। फर्जी जगद्गुरू शंकराचार्यों के बोझ से यह बेचारी धरती दबी जा रही है। संत समाज को फर्जी शंकराचार्यों का बहिष्कार करना होगा। उक्त बातें आचार्य कुशमुनि ने लगातार बढ़ रहे बाबाओं की संख्या और उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर कटाक्ष करते हुए कहीं।

उन्होंने कहा कि हरिद्वार में स्वामी अच्युतानंद तीर्थ ने खुद को शारदा पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया है, मतलब एक फर्जी शंकराचार्य और बढ़ गया। देश मे फर्जी शंकाराचार्यों और फर्जी महामंडलेश्वरों की बाढ़ आ गयी है। जिसके पास कुछ पैसा आ गया, बढ़िया मठ बन गया, गाड़ी-घोड़ा का इंतजाम हो गया, वही खुद को शंकराचार्य या जगद्गुरू घोषित कर देता है। उन्होंने कहा कि मेरी समझ मे नहीं आता कि जब ईसाई समाज का एक पोप से काम चल रहा है, तब हिन्दू समाज को इतने जगद्गुरू शंकराचार्यों की क्यों जरूरत है? भारत के मुस्लिमों में जो हैसियत दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम की है क्या वह हैसियत किसी हमारे शंकराचार्य की है?

आचार्य कुशमुनि ने कहा कि यदि हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने जल्दी ही इसका हल नही निकाला तो हिन्दू समाज का बहुत नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि मैं अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरि और अखाड़ा परिषद के महंतों और हरिद्वार की स्थानीय जनता की सराहना करता हूँ कि उन्होंने फर्जी शंकराचार्य अच्युतानंद तीर्थ के तथाकथित पट्टाभिषेक कार्यक्रम का बहिष्कार किया और इस फर्जी कार्यक्रम में सन्नाटा रहा। अंत में उन्होंने संत समाज से निवेदन किया है कि फर्जी शंकराचार्य अच्युतानंद तीर्थ का बहिष्कार करें।

यह सेक्‍स-विकृत बच्‍चा है। गुरूजी, आप यही कहना चाहते हैं न?

: जिस पत्र को शिक्षकों ने प्रेम-पत्र मान कर बच्‍चे को पीट दिया, वह मूल क्रियेटिविटी का परिचायक है : नजर पर सेक्‍स ही है, किसी सकारात्‍मक चश्‍मे का इस्‍तेमाल कैसे करें : वसीली अलांक्जांद्रोविच सुखोम्लिस्‍की की किताब पढ़ो गुरू जी। नाम है, बाल-हृदय की गहराइयां : सेक्‍स-जागृति एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : किसी भी कक्षा में प्राथमिक शिक्षा प्रक्रिया के तहत जिन क्रिया-विधियों और प्रक्रमों को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दी जाती है, वह है उनमें मौलिक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास की प्रणालियां। इन्‍हीं प्रक्रियाओं के तहत बच्‍चे में पहले तो तस्‍वीरों से वस्‍तुओं को पहचानना, रटाना, खेलना सिखाना, अनुशासन सिखाना आदि प्रमुख गतिविधियां संचालित और सम्‍पादित की जाती हैं। इसके बाद श्रेणी आती है सोच कर लिखना सिखाना। लेकिन इस स्‍तर तक आने में तय किया जाता है कि बच्‍चे में न्‍यूनतम प्राथमिक शिक्षा का क्रम सम्‍पूर्ण हो चुका हो। सरकारी स्‍कूलों में यह स्‍तर कम से कम कक्षा दो तक माना जाता है। इसके बाद से ही इमला और सुलेख का क्रम आता है, जो कम से कम कक्षा पांच तक पूरी तरह निपटा लिया जाता है। मान लिया जाता है कि इस स्‍तर तक बच्‍चों का विकास हो चुका होगा।

इसके बाद शुरूआत होती है उस शिक्षा की, जो अब उसके मनोभावों को उकेर सके, ऐसा किया जाए ताकि बच्‍चे में मनोविकास की पींगें तेज हों, त्‍वरित हों और वह अपनी सोच-अभिरूचियों का प्राकट्यीकरण कर सके। उसे सिखाया जाए और फिर जांचा-परखा जाए कि उसने जो कुछ भी देखा, महसूस किा है, उसे वह बच्‍चा अभिव्‍यक्‍त कर भी सकता है या नहीं। ताकि उसकी प्रगति का नियमित परीक्षण-निरीक्षण कर उसे और भी विकसित, परिवर्द्धित और परिष्‍कृत किया जा सके। सोने को तपा कर उसे कुन्‍दन की तरह दमकाया-चमकाया जा सके। निर्दोष तैयार किया जा सके।

कहने की जरूरत नहीं कि इस स्‍तर तक शुरू की जा रही इन प्रक्रियाओं की शुरूआत निबन्‍ध से होती है। निबंध किसी भी विषय पर बोला, बताया और लिखाया जाता है। निबन्‍ध किसी भी विषय अथवा प्रकरण पर हो सकता है। सामान्‍य तौर पर निबन्‍ध के प्राथमिक विषय होते हैं गाय, मेरे मित्र, मेरी मां, मेरी बहन, मेरे पिता, मेरे भाई। कहने की जरूरत नहीं यह सब निपट निजी रिश्‍ते होते हैं, ताकि छात्र में महसूस किये जा चुके निजी अनुभवों को शब्‍दों में पिरोया जा सके, जिसमें उसकी भावनाओं को सार्वजनिकीकरण हो सके।

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अम्‍बेदकरनगर

इसके बाद कई ऐसे विषय होते हैं जो निजी अनुभवों से अलग समूहों के व्‍यवहार पर केंद्रित होते हैं। मसलन बाजार, मेला, मेरा विद्यालय, खेल और लखनऊ व दिल्‍ली आदि-इत्‍यादि। इनमें में उन लोगों की गतिविधियों का प्रदर्शन होता है, जिन्‍हें उन्‍हें सामूहिक तौर पर देखा और समझा होता है। इतना ही नहीं, वह उन समूहों की प्रत्‍येक इकाई और उसके पूरे माहौल पर समवेत विश्‍लेषणात्‍मक आलेख तैयार करने की कोशिश करता है। यह विषय सामान्‍य तौर पर कक्षा आठ के आसपास ही बोले, कहे और व्‍यक्‍त कीजिए जाते हैं।

कक्षा 6 के बच्‍चे ने प्रेमप्रत्र लिखा, तो स्‍कूल के शिक्षकों ने उसे फुटबॉल समझ कर कूटा

उसके बाद नम्‍बर होता है बच्‍चे में भावनात्‍मक विकास से जुड़े विषय का। मसलन, स्‍कूल में पहला दिन, परीक्षा का माहौल, चिडि़याघर की सैर। लेकिन उसके बाद और भी गहन विषयों पर निबन्‍ध लिखवाया जाता है। मसलन, होली, दीपावली, ईद, ईस्‍टर, झगड़ा, दंगा वगैरह। लेकिन यह सारे विषय तो इंटर हाईस्‍कूल तक ही चलते हैं।

लेकिन यूपी के पूर्वांचल के एक जिले अम्‍बेदकरनगर के एक सरकारी विद्यालय में कक्षा छह में पढ़ने वाला बच्‍चा तो सीधे प्रेम पर निबन्‍ध लिख बैठा। अरे ज्‍यादा से ज्‍यादा दस-ग्‍यारह साल का ही होगा न यह बच्‍चा। ऐसे में अगर इस उम्र में किसी बच्‍चे ने कोई पत्र लिखा, भले ही वह प्रेम-पत्र ही क्‍यों न हो, तो क्‍या गलत लिखा गुरू जी। और फिर आपने अपने सारे स्‍कूल के शिक्षक-साथियों के साथ मिल कर उसकी सारे बच्‍चों के सामने जमकर पिटाई कर दी।

गुरू जी, आपसे एक गुजारिश है। आप ने तो बीटीसी की डिग्री हासिल की है न, जहां बच्‍चों के साथ उनके व्‍यवहार को समझने की कोशिश की जाती है? फिर आप उसे सिर्फ सेक्‍स से ही क्‍यों तौल रहे हैं? क्‍यों न उसकी इस हरकत को उसकी क्रियेटिविटी के तौर पर देख रहे हैं?

यह आलेख कम से कम दो कडि़यों पर समेटने की कोशिश की जा रही है। सवाल है कि कक्षा छह के बच्‍चे ने अगर प्रेम पर कोई पत्र लिखा, तो क्‍या अपराध किया। आप सब पाठकों से अनुरोध है कि इस बात पर अपने अनुभव अथवा कोई प्रतिक्रिया देना चाहें तो आप या तो उसे कमेंट-बॉक्‍स पर दर्ज कर दें। अथवा यदि वह आलेख विशेष और विस्‍तृत हो तो सीधे हमें ईमेल कर दें। हम उसे श्रंखलाबद्ध आलेख कड़ी में नये तौर पर जोड़ लेंगे।

इस आलेख की अगली कड़ी कल प्रकाशित की जाएगी। उस कड़ी को पढ़ना चाहें तो निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

प्रेमपत्र पर शिक्षक ने बच्‍चे को कूट डाला

विश्‍व फिजियोथेरेपी दिवस आज : होशियार। वरना साथ छोड़ देगीं तुम्‍हारे बदन से खुशियां

: बैठने का अंदाज और उंगलियों की नाराजगी अगर आपने नहीं समझी, तो भविष्‍य भयावह होगा : नयी सदी में उभरी नयी शारीरिक दिक्‍कतों से बेहाल होता जा रहा इंसान : कुर्सी-तोड़ परिश्रम और मस्‍ती से पैदा लापरवाहियों ने जिन्‍दगी में सुविधा के साथ शारीरिक दुश्‍वारियां भी बढ़ी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : नये माहौल में घुसने में कई-कई घनघोर मस्तियों का दौर शुरू हो जाता है। और उनके साथ ही अलग-अलग तरह की चुनौतियां भी हमेशा सामने आ जाती हैं। शुरूआत में ही तो बदन को इशारा मिल जाता है कि मामला गड़बड़ होने को है। लेकिन ऐसे लोग भी होते हैं जो बदन को बेहाल-बर्बाद कर देने वाले तूफानों वाले इशारों को इग्‍नोर कर देते हैं। संकट इसके बाद ही शुरू होता है। सच बात तो यही है कि इन चेतावनियों के बावजूद अगर लोग अपने शरीर को लेकर अगर संतुलन नहीं बनाये रखा जाएं, तो उनका जीना दुश्‍वार हो जाता है।

आज विश्‍व फिजियोथेरेपी दिवस है। यानी आपकी भौतिक सक्रियता को जांचने का अभियान नुमा दिन। जहां से आप शुरूआत कर सकते हैं उन शारीरिक संकेतों को समझने और सुधारने की, जो आपके आपकी अब तक की लापरवाहियों-मजबूरियों के चलते भविष्‍य में हो सकने वाले अराजक गीतों-सुरों को और भी ज्‍यादा बदहाल करने पर आमादा है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बदहाली किसी भी अच्‍छे-खासे शख्‍स को गम्‍भीर शारीरिक संकट में डाल सकता है।

लखनऊ के टीएसएम मेडिकल कालेज में फिजियोथेरेपी विभाग के प्रमुख डॉ गौरव श्रीवास्‍तव और हिन्‍द मेडिकल कालेज में फिजियोथेरेपी के प्रमुख डॉ जैनेंद्र श्रीवास्‍तव मानव के आधुनिक जीवन शैली में किसी तूफान की तरह आये बदलावों पर विस्‍तार से बात करते हैं। डॉ गौरव और डॉ जैनेंद्र बताते हैं कि सच बात यह है कि पिछली सदी में यांत्रिकीय-करण ने औद्योगिकीकरण को काफी समृद्ध किया और इसका समाज के विकास पर विस्‍तृत सुखद प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। हर क्षेत्र में यह विकास बहुत तेजी से दिखाया पड़ा, जिसने पूरे मानव समाज को ही बुरी तरह खदबदा दिया। भोजन से लेकर पेयजल, सड़क से हवाईजहाज या फिर घर से लेकर होटल तक। नयी फैक्ट्रियां, नये अवसर, नयी जीवन-शैली और उसके नये-नये अनुभव और उसे भोगने को तैयार और तत्‍पर समाज। बदलावों का आनंद लेने के लिए लोगों में एक होड़ सी लग गयी थी उस पिछली सदी में। चाहे वह भोजन का मामला हो, या फिर रहन-सहन का विषय।

कहने की जरूरत नहीं कि उस सदी में हुए विकास ने आम आदमी की दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित किया था। लेकिन इस नयी सदी ने तो उससे भी कई गुना चुनौतियां और दुश्‍वारियां आम आदमी के सामने खड़ी कर दी हैं। सच बात तो है कि कम से कम शहर में रहने वाले लोगों में अधिकांश इस वक्‍त अपने शरीर पर होने वाले अनजान से दिक्‍कतों और दर्दों से बेहाल हैं। चाहे वह गर्दन या पीठ में दर्द वाली टीस का मामला हो, या फिर दोहरी होती जा रही कमर। चाहे वह ऊंगलियां का संकट है, या फिर जोड़ों का भयावह दर्द। लेकिन सबसे दर्दनाक पहलू तो यह है कि हमारा समाज ऐसी टीस या दर्द को सामान्‍य पीड़ा के तौर पर देखता है और उसके निदान के लिए किसी सामान्‍य दर्दशामक दवाई का सेवन कर लेता है। बिना यह जाने-समझे कि यह वाकई दर्द है, अथवा किसी गम्‍भीर शारीरिक संकट का पूर्व-संकेत।

गनीमत है कि स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर मिलने वाली ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए चिकित्‍सा जगत खुद को वाकई बहुत गम्‍भीरता के साथ सजग और मुस्‍तैद है। अब बस सिर्फ यह समझने की जरूरत है कि ऐसी शारीरिक शिकायतों का निदान कराने के लिए वह शख्‍स किससे सम्‍पर्क करे। जाहिर है कि ऐसी अधिकांश दिक्‍कतें फिजियोथेरेपी की ही होती हैं, इसलिए मरीजों को यह समझना होगा कि वे सीधे आसपास के किसी फिजियोथेरेपी सेंटर या किसी कुशल फिजियोथेरेपिस्‍ट से सम्‍पर्क करें।  डॉ गौरव और डॉ जैनेंद्र चेतावनी देते हैं कि किसी क्‍वेक या झोलाछाप डॉक्‍टर से सलाह लेना किसी आत्‍मघाती कदम से कम नहीं होगा।

तो बस आखिर में सिर्फ इतना ही कहना है कि:- हैप्‍पी वर्ल्‍ड फिजियोथेरेपी डे। खुश भी रहिये, और अपने शरीर को भी खुश रखिये। यह दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

बाढ़ में फंसे युवकों को बचाने में जुटा डीएम, खर्राटे भरते रहे हरामखोर पत्रकार

: सलाम का हकदार बहराइच का डीएम, पत्रकारों की खाल खींचूंगा : मिहींपुरवा इलाके में उफनाये जरई नाले में फंसे दो युवकों के लिए जागते रहे डीएम अजयदीप, मगर एक भी पत्रकार का फोन नहीं उठा : बरसों बाद मेकअप-गर्ल और मवाली डीएम से मुक्‍त हो पाया है भरों की राजधानी यानी बहराइच :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बहराइच शहर से करीब 55 किलोमीटर दूर है मिहींपुरवा नगर। और यहां से चंद मील दूर है जरई नाला। रविवार को यहां शारदा यानी घाघरा नदी अचानक उफनाने लगी। हाहाकार मचाती यह नदी अपनी सारी मर्यादाएं हमेशा की तरह ही तोड़ती और तहस-नहस करे हुए आसपास के इलाके को लीलने में आमादा दिख रही थी। वक्‍त रहा था रात का करीब बारह बजे। बाढ़ की रफ्तार से भयभीत लोग अपने आशियाने को छोड़ कर प्रभावित क्षेत्र से जल्‍दी से जल्‍दी बाहर निकलने की कोशिश में थे। कि अचानक मोटरसायकिल पर सवार दो युवक इस बाढ़ में फंस गये। न वापस जा सकते थे, और न ही आगे बढ़ जा पा रहे थे। सबसे बड़ी दिक्‍कत की बात तो यह थी कि अगर यह लोग वहीं पर रूक जाते, तो इस बात की पूरी आशंका थी कि बाढ़ का प्रवाह उन्‍हें भी हमेशा-हमेशा के लिए अपने काल के गाल में समेट कर खत्‍म कर देता।

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पत्रकार पत्रकारिता

लेकिन अचानक इसी बीच जिला प्रशासन को खबर मिली कि इस विनाशकारी बाढ़ में दो युवक फंस गये हैं। खबर पाते ही जिला प्रशासन तत्‍काल सक्रिय हुआ और बाढ़ में फंसे इन युवकों को बचाने के लिए मोटरबोट, गोताखोर, और बाढ़ से निपटने में माहिर विशेषज्ञों की टोली मौके पर रवाना कर दी। जिला प्रशासन तब तक सक्रिय रहा, जब तक उन दोनों बाढ़ पीडि़तों को सुरक्षित बाहर निकालने की खबर न पहुंच गयी।

यह तो किस्‍सा है जिला प्रशासन की सतर्कता की। लेकिन खबर के धंधे में जुटे लोगों के शर्मनाक खर्राटों ने पूरी पत्रकारिता को कलंकित कर दिया। इस मामले में जिलाधिकारी ने जिस तरह मेरे जैसे अनजान शख्‍स के मोबाइल से आये फोन को महज दो घंटी पर ही रिस्‍पांस कर दिया, और खबर पाते ही मामले को आम आदमी की पीड़ा के बजाय खुद अपने परिवार की समस्‍या के तौर पर देखा और निपटाया, वह तो वाकई लाजवाब है। लेकिन जिस तरह पूरे बहराइच के पत्रकारों ने अपनी संवेदनहीनता का प्रदर्शन इस रात किया, वह उनकी गैरजिम्‍मेदार-पूर्ण दलालीग्रस्‍त और हत्‍यारी पत्रकारिता का बेहद घिनौनी तस्‍वीर ही है।

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भरों की बहराइच

दरअसल, रविवार की रात मेरे एक मित्र देर रात फोन पर मुझसे बात कर रहे थे। गोरखपुर के एक बड़े गैर-सरकारी संगठन के मुखिया और मूलत: चिकित्‍सक डॉक्‍टर भानु को मेरी बातचीत के बीच ही खबर मिली कि बहराइच के जरई नाले के पास दो युवक बुरी तरह पानी में फंस चुके हैं। उन्‍होंने बताया कि अगर कोई ठोस मदद नहीं पहुंची तो वह दोनों ही प्रलयंकारी बाढ़ में जिन्‍दा बह जाएंगे। डॉक्‍टर भानु ने मुझे उन लोगों के फोन नम्‍बर भी दिये। मैंने तत्‍काल बहराइच के जिलाधिकारी अजय दीप सिंह को फोन किया। हैरत की बात है कि केवल दो घंटी में ही उस डीएम का फोन उठ गया। मैंने अपना परिचय देते हुए पूरे मामले की गम्‍भीरता का जिक्र कर दिया। अजय दीप ने तत्‍काल मेरे फोन को होल्‍ड करते हुए पुलिस और स्‍थानीय प्रशासन को तत्‍काल कार्रवाई करने का आदेश दिया।

लेकिन इस पूरे घटना के बारे में मैंने जब बहराइच के पत्रकारों को सतर्क करने की कोशिश की, तो आप जानते हैं कि मुझे क्‍या नतीजा मिला। ठेंगे। करीब सात सौ पत्रकारों की बाढ़ नुमा भीड़ में से जिस भी पत्रकार से मैंने फोन पर सम्‍पर्क करने की कोशिश की, उसका फोन या तो स्विच-ऑफ रहा, अथवा उनकी घंटी तो बजती रही, लेकिन उठी नहीं। हैरत की बात है कि ऐसा कौन सा धंधा करते हैं बहराइच के पत्रकार, जो रात को घोड़े बेच कर सो जाते हैं, और फिर चाहे पहाड़ टूटे या फिर जमीन फट जाए, उनकी नींद ही नहीं उठती।

बहरहाल, अब आपको दो जानकारियां दे दूं। पहली बार तो यह, कि बाढ़ में फंसे दोनों युवकों की जान बच गयी। प्रशासन की कार्रवाई और मौके पर मदद पहुंचने तक ही स्‍थानीय ग्रामीणों ने उनकी जान बचा ली। और दूसरी बात बात यह कि उसके बाद लगातार 24 घंटों तक मैं यही खोजता रहा हूं कि बहराइच के पत्रकार किस-किस धंधे में शामिल हैं। कोई ठीकेदारी में है, कोई अपने बजाय दूसरे से खबर लिखवाता या रिकार्ड कराता है, कोई अधिशासी अभियंता की पिटाई में लिप्‍त में है तो कोई धमकी देकर इंजीनियर, सरकार और नेताओं से उगाही करने-कराने का धंधा कर रहा है।

तो अब यह मेरी ही जिम्मेदारी है कि मैं ऐसे पत्रकारनुमा धंधे बाजों पर सख्‍त कार्रवाई करूं। विश्‍वास दिलाता हूं कि जल्‍दी ही इस बारे में बाकायदा सीरीज प्रकाशित करूंगा।

यह भी लिखूंगा कि कौन-कौन ऐसे पत्रकार कुल-कलंक हैं, जो खबर के बजाय बाकी धंधों में हाथ चमका रहे हैं। और रोज-ब-रोज बड़ी गाडि़यों में घूम कर बड़े अफसरों के साथ सेल्‍फ खिंचवाने और फेसबुक पर लगा कर अपनी दलाली पर चार चांद लगाने में व्‍यस्‍त हैं। अब बहराइच के लोगों की जिम्‍मेदारी है कि मुझे ऐसे पत्रकारों की करतूतों का खुलासा और तथ्‍य मुझ तक भिजवा दें।

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