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सक्सेस सांग

दृष्टिहीन रामपाल बनाते हैं मां दुर्गा की मूर्तियां, प्रदूषण से कोसों दूर

: दृष्टिहीन रामपाल दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं, हैरत में हैं बस्‍ती वाले : रामपाल का कमाल देखना हो तो सीधे बस्‍ती की हर्रेया पधारिये : कलकत्‍ता के शांतिपुर में तीन भाइयों के साथ रहते हैं रामपाल :

बीएन मिश्र

बस्ती : आप जिस शख्स को देख रहे हैं वो रामपाल हैं। रामपाल जो जन्म से ही दृष्टिहीन हैं पर आज सबके लिये मिशाल बने हुये हैं। दृष्टिहीन रामपाल दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं। जाहिर सी बात है, दृष्टिहीन पैदा होने पर परिवार वालों का उत्साह अचानक निराशा में बदल जाता है। लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनके साहस और हौसले के सामने शीरीरिक विकलांगता कभी बांधा नहीं बन पाती। वह अपने पूरे परिवार का सिर्फ सहारा ही नहीं बनते बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं । इन्हीं में से एक है कोलकाता के रामपाल।

रामपाल पैदाइशी दृष्टिहीन होने के बावजूद अपने हुनर से दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं। इन दिनों रामपाल अपनी टीम के साथ हर्रैया इलाके के बबुराहवा चौराहे पर दुर्गा मूर्तियों का निर्माण कर रहे हैं। रामपाल की बनाई हुई मूर्तियों की इतनी मांग है कि नवरात्री शुरू होने से पहले ही सभी मूर्तियां बुक हो गई हैं।

मूर्ति कलाकार रामपाल कोलकता में शांतिपुर इलाके के निकुंजनगर के रहने वाले हैं। रामपाल ने बताया कि उनके पिता विजय कृष्णपाल के तीन बेटे हुए। तीनों जन्म से ही दृष्टिहीन थे। तीनों बेटों के विकलांग पैदा होने पर पहले तो पिता को बहुत निराशा हुई, लेकिन कुछ दिन बाद नई उम्मीद और विश्वास के साथ उन्होंने अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने की ठानी।

रामपाल के मुताबिक जब वह और उनके भाई 10-12 साल की उम्र के हुए। तभी पिताजी ने उन्हें मूर्ति बनाने की कला सीखाना शुरू किया। इस कला को सीखने में तीनों भाइयों को करीब 10 साल लग गए। ट्रेनिंग के दौरान पिता जी ने बांस की फट्टी काटना, जोड़ना और घास से बांधना सीखाया। इसके बाद मिट्टी का लेप करने की बारीकी सीखाकर एक काबिल कलाकार बनाया।

बतौक रामपाल, मूर्ति बनाते वक्त कभी कोई गलती होती थी तो पिता जी पिटाई भी कर देते थे। लेकिन बाद में लाड़ करना भी नहीं भूलते थे। रामपाल ने बताया मूर्ति बनाने में पारंगत होने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी और दो बच्चों को साथ लेकर छह लोगों की टीम तैयार की। इसके बाद नवरात्री से पहले मूर्ति बनाने के लिए अलग-अलग शहरों की तरफ निकल पड़ते। पिछले पांच साल से वह लगातार बस्ती जिले में आकर मूर्ति बनाकर बेचने का कारोबार कर रहे हैं।

रामपाल ने बताया कि, वह मूर्ति बनाने के दौरान प्लास्टर आॅफ पैरिस और घातक रंगों का इस्तेमाल नहीं करते। वह सिर्फ खेत की मिट्टी से ही मूर्तियों का निर्माण करते हैं और रंगाई के लिए हर्बल कलर का उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि, नदियों और तालाबों में विसर्जन के बाद उनकी बनाई मूर्तियां पूरी तरह पानी में गल जाती है और प्रदूषण नहीं फैलने देती।

विद्यापति की मिथिला में संभावना सेठ की अश्‍लीलता परोस दी जागरण ने

: महानतम संस्‍कार-भूमि में दैनिक जागरण ने संभावना सेठ की वाचाल टीम को परोस दिया लालुप स्‍वाद वाला छौंक पकवान : ऐसी कोशिशों के चलते ही जल्‍दी ही इस क्षेत्र में उन्‍मुक्‍त यौनाचार की फसल उगने लगे, तो चिल्‍ल-पों मत कीजिएगा :

शेषमणि पाण्‍डेय और बीएन मिश्र

दरभंगा : मधुबनी क्षेत्र के मैथिल संस्कृति में महा कवि-ज्ञानी विद्यापति और उनकी संस्‍कृति के पहरूए 200 साल बाद भी आज भी चमत्कार करते हैं। और यह यूं ही मजाक में नहीं है कि विद्यापति और मैथिल संस्‍कृति दरभंगा से सैकड़ों मील दूर घर-घर गायी-सुनायी जाती हैं। लेकिन दैनिक जागरण ने शायद तय कर रखा है कि वे क्षेत्र में इस महान विद्यापति सम्राट की कोशिशें और मैथिल संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके ही दम छोड़ा जाएगा।

ताजा मामला है गरबा- डांडिया के गुजरात का। धर्म से शुरू, लेकिन बाद में धर्म को पूरी तरह विसर्जित कर देने वाला यह पर्व पहले तो महाराष्ट्र और उसके बाद दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में उसने अपनी पैठ जमाने शुरू कर दिया।  कहने की जरूरत नहीं कि मुंबई महाराष्ट्र और गुजरात में गरबा यानी डांडिया पर्व फ्री-सेक्स का एक बहुत बड़ा उन्‍मु‍क्‍त मेला माना जाने लगा है। इन इलाकों में यह पर्व एक ऐसा मेला के तौर पर स्‍थापित होता जा रहा है, जो खुले और उन्‍मुक्‍त यौनाचार से ढंक चुका है।

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पत्रकार पत्रकारिता

आपको बता दें कि सरकारी दावों के अनुसार उस दौरान गर्भपात की संख्‍या कई गुना बढ़ जाती है और गर्भनिरोधक दबाव तथा उपकरणों की बिक्री कई सौ गुना तक बढ़ जाती है। यहां आपको बता दें कि बिहार और यहां के मैथिल क्षेत्र ऐसे यौनाचार से कोसों दूर ही रहते हैं, जहां उन्मुक्त यौनाचार की गुंजाइश सर्वाधिक होती है। मुझे मिली खबरों के अनुसार दरभंगा और मैथिल के नाम पर मशहूर इस क्षेत्र में ऐसेकदाचार और भ्रष्टाचार से कोसों दूर हैं। मैथिल क्षेत्र पढ़ाई लिखा समाज माना जाता है।

लेकिन पिछले सितंबर दैनिक जागरण पे दरभंगा में जिस तरह गरबा और डांडिया का बड़ा आयोजन किया वह मैथिली संस्कार को काफी चकनाचूर करने वाले षड्यंत्रों में से एक है। जागरण ने फिल्मी अदाकारा संभावना सेठ और उनके समूह के लड़कियों को रात भर नचाया। कम कपड़ों में और बेहूदा तथा अश्लील संकेताक्षर और मुद्राओं के चलते पूरा मैथिल क्षेत्र उत्तेजित होता है। हो हल्ला हुआ शोर उल्लू हुई धमाचौकड़ी हुई और इस दौरान बिहार और मैथिल संस्कृति लहूलुहान होती रही।

तस्दीक देखने के लिए तस्दीक के लिए मुझे लगता है यह निम्न फोटो ही पर्याप्त होंगी

फर्जी बाबाओं पर जेहाद छेड़ा था, अब खुद ही रगेदे गये कुशमुनि

: इलाहाबाद के ही बाबा है कुश मुनि बाबा, मालामाल बाबाओं में उनकी गणना अग्रगण्‍य है : अखाड़ा परिषद ने जिन 14 फर्जी बाबाओं की लिस्‍ट जारी कर उन्‍हें पर प्रतिबंध लगाया है, कुश मुनि का नाम भी शामिल है : अब अखाड़ा परिषद पर पानी पीकर गालियां दे रहे हैं कुश मुनि :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कुश मुनि ने एक बिल्‍ली पाल ली थी। उसको सिखाया था कि जिस-तस को पंजा मारना। लेकिन अचानक उस बिल्‍ली ने अपने तेवर गजब दिखा दिये। उसने अपने ही मालिक के चेहरे पर एक दिन एक जोरदार पंजा मार दिया। अब यह मालिक कुश मुनि का चेहरा बुरी तरह लहू-लुहान हो गया है, और वे जहां-तहां अपनी चिल्‍ल-पों करते दिख रहे हैं।

यह मामला है इलाहाबाद का। यहां के एक बाबा हैं कुश मुनि। अक्‍सर ही वे अपने कृत्‍यों को लेकर बहुत चर्चित होते रहे हैं। करीब छह महीना पहले उन्‍होंने यह कह कर सनसनी फैला दिया था कि देश में बेहिसाब और फर्जी शंकराचार्य बन गये हैं कि उनके चलते यह जगत ही छोटा पड़ गया है। ऐसे में ऐसे फर्जी बाबाओं को चिन्हित कर उन्‍हें संत समाज से निकाल बाहर कर हिन्‍दू संस्‍कृति को बचाना अब समय का तकाजा हो गया है। लेकिन हाल ही 11 सितम्‍बर को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने अपनी एक बैठक में देश के जिन 14 फर्जी बाबाओं की लिस्‍ट जारी कर उन्‍हें हिन्‍दू समाज से बहिष्‍कृत करने की कवायद छेड़ी है, उसमें कुश मुनि का नाम भी शामिल है। अब कुश मुनि ने पानी पी-पी कर अखाड़ा परिषद के खिलाफ गालियां देना शुरू कर दिया है।

इसके पहले कुश मुनि ने कहा था कि इस देश मे इतने जगद्गुरू शंकाराचार्य बन गये हैं कि जगत छोटा पड़ गया है। फर्जी जगद्गुरू शंकराचार्यों के बोझ से यह बेचारी धरती दबी जा रही है। संत समाज को फर्जी शंकराचार्यों का बहिष्कार करना होगा। उक्त बातें आचार्य कुशमुनि ने लगातार बढ़ रहे बाबाओं की संख्या और उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर कटाक्ष करते हुए कहीं।

उन्होंने कहा कि हरिद्वार में स्वामी अच्युतानंद तीर्थ ने खुद को शारदा पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया है, मतलब एक फर्जी शंकराचार्य और बढ़ गया। देश मे फर्जी शंकाराचार्यों और फर्जी महामंडलेश्वरों की बाढ़ आ गयी है। जिसके पास कुछ पैसा आ गया, बढ़िया मठ बन गया, गाड़ी-घोड़ा का इंतजाम हो गया, वही खुद को शंकराचार्य या जगद्गुरू घोषित कर देता है। उन्होंने कहा कि मेरी समझ मे नहीं आता कि जब ईसाई समाज का एक पोप से काम चल रहा है, तब हिन्दू समाज को इतने जगद्गुरू शंकराचार्यों की क्यों जरूरत है? भारत के मुस्लिमों में जो हैसियत दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम की है क्या वह हैसियत किसी हमारे शंकराचार्य की है?

आचार्य कुशमुनि ने कहा कि यदि हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने जल्दी ही इसका हल नही निकाला तो हिन्दू समाज का बहुत नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि मैं अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरि और अखाड़ा परिषद के महंतों और हरिद्वार की स्थानीय जनता की सराहना करता हूँ कि उन्होंने फर्जी शंकराचार्य अच्युतानंद तीर्थ के तथाकथित पट्टाभिषेक कार्यक्रम का बहिष्कार किया और इस फर्जी कार्यक्रम में सन्नाटा रहा। अंत में उन्होंने संत समाज से निवेदन किया है कि फर्जी शंकराचार्य अच्युतानंद तीर्थ का बहिष्कार करें।

यह सेक्‍स-विकृत बच्‍चा है। गुरूजी, आप यही कहना चाहते हैं न?

: जिस पत्र को शिक्षकों ने प्रेम-पत्र मान कर बच्‍चे को पीट दिया, वह मूल क्रियेटिविटी का परिचायक है : नजर पर सेक्‍स ही है, किसी सकारात्‍मक चश्‍मे का इस्‍तेमाल कैसे करें : वसीली अलांक्जांद्रोविच सुखोम्लिस्‍की की किताब पढ़ो गुरू जी। नाम है, बाल-हृदय की गहराइयां : सेक्‍स-जागृति एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : किसी भी कक्षा में प्राथमिक शिक्षा प्रक्रिया के तहत जिन क्रिया-विधियों और प्रक्रमों को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दी जाती है, वह है उनमें मौलिक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास की प्रणालियां। इन्‍हीं प्रक्रियाओं के तहत बच्‍चे में पहले तो तस्‍वीरों से वस्‍तुओं को पहचानना, रटाना, खेलना सिखाना, अनुशासन सिखाना आदि प्रमुख गतिविधियां संचालित और सम्‍पादित की जाती हैं। इसके बाद श्रेणी आती है सोच कर लिखना सिखाना। लेकिन इस स्‍तर तक आने में तय किया जाता है कि बच्‍चे में न्‍यूनतम प्राथमिक शिक्षा का क्रम सम्‍पूर्ण हो चुका हो। सरकारी स्‍कूलों में यह स्‍तर कम से कम कक्षा दो तक माना जाता है। इसके बाद से ही इमला और सुलेख का क्रम आता है, जो कम से कम कक्षा पांच तक पूरी तरह निपटा लिया जाता है। मान लिया जाता है कि इस स्‍तर तक बच्‍चों का विकास हो चुका होगा।

इसके बाद शुरूआत होती है उस शिक्षा की, जो अब उसके मनोभावों को उकेर सके, ऐसा किया जाए ताकि बच्‍चे में मनोविकास की पींगें तेज हों, त्‍वरित हों और वह अपनी सोच-अभिरूचियों का प्राकट्यीकरण कर सके। उसे सिखाया जाए और फिर जांचा-परखा जाए कि उसने जो कुछ भी देखा, महसूस किा है, उसे वह बच्‍चा अभिव्‍यक्‍त कर भी सकता है या नहीं। ताकि उसकी प्रगति का नियमित परीक्षण-निरीक्षण कर उसे और भी विकसित, परिवर्द्धित और परिष्‍कृत किया जा सके। सोने को तपा कर उसे कुन्‍दन की तरह दमकाया-चमकाया जा सके। निर्दोष तैयार किया जा सके।

कहने की जरूरत नहीं कि इस स्‍तर तक शुरू की जा रही इन प्रक्रियाओं की शुरूआत निबन्‍ध से होती है। निबंध किसी भी विषय पर बोला, बताया और लिखाया जाता है। निबन्‍ध किसी भी विषय अथवा प्रकरण पर हो सकता है। सामान्‍य तौर पर निबन्‍ध के प्राथमिक विषय होते हैं गाय, मेरे मित्र, मेरी मां, मेरी बहन, मेरे पिता, मेरे भाई। कहने की जरूरत नहीं यह सब निपट निजी रिश्‍ते होते हैं, ताकि छात्र में महसूस किये जा चुके निजी अनुभवों को शब्‍दों में पिरोया जा सके, जिसमें उसकी भावनाओं को सार्वजनिकीकरण हो सके।

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अम्‍बेदकरनगर

इसके बाद कई ऐसे विषय होते हैं जो निजी अनुभवों से अलग समूहों के व्‍यवहार पर केंद्रित होते हैं। मसलन बाजार, मेला, मेरा विद्यालय, खेल और लखनऊ व दिल्‍ली आदि-इत्‍यादि। इनमें में उन लोगों की गतिविधियों का प्रदर्शन होता है, जिन्‍हें उन्‍हें सामूहिक तौर पर देखा और समझा होता है। इतना ही नहीं, वह उन समूहों की प्रत्‍येक इकाई और उसके पूरे माहौल पर समवेत विश्‍लेषणात्‍मक आलेख तैयार करने की कोशिश करता है। यह विषय सामान्‍य तौर पर कक्षा आठ के आसपास ही बोले, कहे और व्‍यक्‍त कीजिए जाते हैं।

कक्षा 6 के बच्‍चे ने प्रेमप्रत्र लिखा, तो स्‍कूल के शिक्षकों ने उसे फुटबॉल समझ कर कूटा

उसके बाद नम्‍बर होता है बच्‍चे में भावनात्‍मक विकास से जुड़े विषय का। मसलन, स्‍कूल में पहला दिन, परीक्षा का माहौल, चिडि़याघर की सैर। लेकिन उसके बाद और भी गहन विषयों पर निबन्‍ध लिखवाया जाता है। मसलन, होली, दीपावली, ईद, ईस्‍टर, झगड़ा, दंगा वगैरह। लेकिन यह सारे विषय तो इंटर हाईस्‍कूल तक ही चलते हैं।

लेकिन यूपी के पूर्वांचल के एक जिले अम्‍बेदकरनगर के एक सरकारी विद्यालय में कक्षा छह में पढ़ने वाला बच्‍चा तो सीधे प्रेम पर निबन्‍ध लिख बैठा। अरे ज्‍यादा से ज्‍यादा दस-ग्‍यारह साल का ही होगा न यह बच्‍चा। ऐसे में अगर इस उम्र में किसी बच्‍चे ने कोई पत्र लिखा, भले ही वह प्रेम-पत्र ही क्‍यों न हो, तो क्‍या गलत लिखा गुरू जी। और फिर आपने अपने सारे स्‍कूल के शिक्षक-साथियों के साथ मिल कर उसकी सारे बच्‍चों के सामने जमकर पिटाई कर दी।

गुरू जी, आपसे एक गुजारिश है। आप ने तो बीटीसी की डिग्री हासिल की है न, जहां बच्‍चों के साथ उनके व्‍यवहार को समझने की कोशिश की जाती है? फिर आप उसे सिर्फ सेक्‍स से ही क्‍यों तौल रहे हैं? क्‍यों न उसकी इस हरकत को उसकी क्रियेटिविटी के तौर पर देख रहे हैं?

यह आलेख कम से कम दो कडि़यों पर समेटने की कोशिश की जा रही है। सवाल है कि कक्षा छह के बच्‍चे ने अगर प्रेम पर कोई पत्र लिखा, तो क्‍या अपराध किया। आप सब पाठकों से अनुरोध है कि इस बात पर अपने अनुभव अथवा कोई प्रतिक्रिया देना चाहें तो आप या तो उसे कमेंट-बॉक्‍स पर दर्ज कर दें। अथवा यदि वह आलेख विशेष और विस्‍तृत हो तो सीधे हमें ईमेल कर दें। हम उसे श्रंखलाबद्ध आलेख कड़ी में नये तौर पर जोड़ लेंगे।

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प्रेमपत्र पर शिक्षक ने बच्‍चे को कूट डाला

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