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सक्सेस सांग

इलाहाबाद छात्रसंघ में फहराया सपाई झंडा, एबीवीपी झंडूबॉम

: युवाओं ने खारिज कर दिया भाजपा की सारी कवायदें, संगठन में अब चलेगी समाजवादी पार्टी की रंगबाजी : अवनीश यादव बने अध्यक्ष,  लेकिन महासचिव की कुर्सी एबीवीपी के हाथों :

मेरीबिटियाडॉटकॉम संवाददाता

इलाहाबाद : हालांकि अब वह फिजां नहीं बच पायी है इलाहाबाद की, जो कभी हुआ करती थी। लेकिन आज आये छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने एक गजब क्रांतिकारी रंगत दिखा दी है। गेरूआ-भगवा अंदाज को पूरी तरह खारिज कर यहां के छात्रों ने भाजपाई कवायदों को करीब-करीब खारिज ही कर दिया है। अध्‍यक्ष की कुर्सी समाजवादी पार्टी के अवधेश यादव के खाते में गयी है, और महासचिव का पद छोड़ कर बाकी अहम पदों पर गैर-भगवा रंगत का ही माहौल चस्‍पां हो चुका है।

एक दौर हुआ करता था जब इलाहाबाद को पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था। लेकिन पिछले करीब दो दशकों से यह दावा अब केवल थोथे इतिहास तक ही सिमट चुका है। लेकिन इसके बावजूद इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ के छात्रों ने अपनी पुरवइया का एक जबर्दस्‍त झोंका और अंगड़ाई का प्रदर्शन कर दिया है। विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के परिणाम घोषित हो गए। इस परिणाम में समाजावादी पार्टी के छात्र संगठन का दबदबा रहा।

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संगम

बता दें कि सपा के छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा से अध्यक्ष पद पर अवनीश कुमार यादव, उपाध्यक्ष पद पर चंदशेखर चौधरी , संयुक्त सचिव पद पर भरत सिंह, सांस्कृतिक सचिव पद पर अवधेश कुमार पटेल ने जीत दर्ज की है। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  (RSS) के संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के निर्भय कुमार द्विवेदी ने महामंत्री पद पर जीत दर्ज की है।  जीत दर्ज करने वाले प्रत्याशियों को 15 अक्टूबर को शपथ दिलाई जाएगी।  अध्यक्ष पद पर जीते अवनीश यादव बता दें कि इस परिणाम से ABVP को तगड़ा झटका लगा। वहीं इस दौरान यह अफवाह भी फैली कि उत्तर प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह विश्वविद्यालय परिसर पहुंचे थे।

गौरतलब है कि  ABVP इससे पहले राजस्थान, पंजाब,जेएनयू,डीयू,उत्तराखंड, गुवाहाटी के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का चुनाव हार चुकी है। बता दें कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वोटों की गिनती दोबारा कराई गई। इससे पहले शनिवार को ही विश्वविद्यालय समेत सभी संबंद्ध कॉलेजों में भी चुनाव कराए गए। इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में विवेक कुमार त्रिपाठी अध्यक्ष, आशुतोष गुप्ता उपाध्यक्ष, पंकज दुबे महामंत्री, शिवम मिश्रा संयुक्त मंत्री और ज्योति रावत सांस्कृतिक सचिव चुने गए।   हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के दो प्रमुख सीटों पर जीत से उत्साहित कांग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) का खाता नहीं खुल सका। NSUI पदाधिकारियों का आरोप है कि सरकार ने धांधली की है।

आईएमए की क्रांतिकारी पहल, सूर्यकांत बने मानद प्रोफेसर

: डॉक्‍टरों की शीर्ष संस्‍था ने पहली बार चिकित्‍सकों के रिफ्रेशनरी-एजूकेशन पर किया सटीक हस्‍तक्षेप : केजीएमसी में रिस्‍पेरीटरी-पल्‍मनरी के हेड-प्रोफेसर हैं डॉ सूर्यकांत : प्रोफेसरों की खेप बना कर उसे प्रैक्टिसिंग डॉक्‍टर्स को नयी जानकारियों-चुनौतियों से लैस किया जाएगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : डॉक्‍टरों की शीर्ष संस्‍था आईएमए ने अपने दायित्‍वों में एक जबर्दस्‍त और क्रांतिकारी कदम उठाया है। इस के तहत चिकित्‍सा जगत में समर्पित शिक्षकों को अब आईएमए की ओर से प्रोफसर की उपाधि दी जाएगी, और उनका दायित्‍व होगा जन-स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा के क्षेत्र में सक्रिय डॉक्‍टरों के सामने आने वाली नयी-नयी चुनौतियों को लेकर जानकारियों से लैस करना। अपने इस नये चुनौतीपूर्ण कदम के तहत आईएमए ने मानद प्रोफेसर के तौर पर डॉक्‍टर सूर्यकांत को चुना है। सूर्यकांत किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में पल्मोनरी-रिस्‍पेरिटी विभाग के हेड और प्रोफेसर हैं।

डॉक्टर सूर्यकांत सूर्यकांत लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज यह पढ़े-लिखे हैं और उसके बाद इसी कॉलेज में पल्मोनरी डिपार्टमेंट के शिक्षक पद से होते हुए प्रोफैसर तक बन गए कई बरस पहले ही वह उन्हें यहां के पल्मनरी ऐंड रिस्‍पेरिटरी डिपार्टमेंट का हेड बनाया गया था।

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com संवाददाता से बातचीत में सूर्यकांत ने बताया कि बहुत खुश है कि आईएमए ने उन्हें उन्हें ऐसा मौका दिया जहां वे पीड़ित मरीजों को बेहतर तरीके से सेवा कर सकते हैं। डॉक्टर सूर्यकांत बताते हैं यह पहला मौका है जब आईएमए ने मानद प्रोफेसर की नयी उपाधि की शुरुआत की, और हर्ष का विषय है उसका पहला मानद प्रोफेसर का सम्मान मुझे मिला।  डॉसूर्यकांत खुद को मिले इस सम्मान से प्रसन्न और आनंदित हैं।

डॉ सूर्यकांत ने बताया कि आईएमए के अध्‍यक्ष केके जैन की परिकल्‍पना के तहत यह कार्यक्रम शुरू किया और यूपी में पहला मानद प्रोफेसर का सम्‍मान उन्‍हें मिला। वे बताते हैं कि देश के करीब तीन लाख डॉक्‍टरों की शीर्ष संस्‍था आईएमए अपने सदस्‍यों को चिकित्‍सा जगत में शोध एवं जानकारियों को लेकर उनमें जागरूकता फैलाने का अभियान छेड़ने को कृत-संकल्पित है। ताकि वह समाज में दूरदराज तक जन सेवा में जुड़े जुड़े और पीड़ित मरीजों की सेवा में समर्पित चिकित्सकों के बीच अपने अनुभव शेयर कर सकें।  अध्‍यक्ष केके जैन के इस फैसले के तहत आईएमए अपने विभिन्‍न क्षेत्र में महारत हासिल कर चुके मानद प्रोफेसरों की टीम तैयार करने की शुरुआत करेगा, ताकि चिकित्सकों के लिए आवश्यक सूचनाएं सुगमता के साथ पहुंचाई जा सके।

दृष्टिहीन रामपाल बनाते हैं मां दुर्गा की मूर्तियां, प्रदूषण से कोसों दूर

: दृष्टिहीन रामपाल दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं, हैरत में हैं बस्‍ती वाले : रामपाल का कमाल देखना हो तो सीधे बस्‍ती की हर्रेया पधारिये : कलकत्‍ता के शांतिपुर में तीन भाइयों के साथ रहते हैं रामपाल :

बीएन मिश्र

बस्ती : आप जिस शख्स को देख रहे हैं वो रामपाल हैं। रामपाल जो जन्म से ही दृष्टिहीन हैं पर आज सबके लिये मिशाल बने हुये हैं। दृष्टिहीन रामपाल दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं। जाहिर सी बात है, दृष्टिहीन पैदा होने पर परिवार वालों का उत्साह अचानक निराशा में बदल जाता है। लेकिन कई ऐसे भी हैं जिनके साहस और हौसले के सामने शीरीरिक विकलांगता कभी बांधा नहीं बन पाती। वह अपने पूरे परिवार का सिर्फ सहारा ही नहीं बनते बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं । इन्हीं में से एक है कोलकाता के रामपाल।

रामपाल पैदाइशी दृष्टिहीन होने के बावजूद अपने हुनर से दुर्गा मूर्तियों में जान भर देते हैं। इन दिनों रामपाल अपनी टीम के साथ हर्रैया इलाके के बबुराहवा चौराहे पर दुर्गा मूर्तियों का निर्माण कर रहे हैं। रामपाल की बनाई हुई मूर्तियों की इतनी मांग है कि नवरात्री शुरू होने से पहले ही सभी मूर्तियां बुक हो गई हैं।

मूर्ति कलाकार रामपाल कोलकता में शांतिपुर इलाके के निकुंजनगर के रहने वाले हैं। रामपाल ने बताया कि उनके पिता विजय कृष्णपाल के तीन बेटे हुए। तीनों जन्म से ही दृष्टिहीन थे। तीनों बेटों के विकलांग पैदा होने पर पहले तो पिता को बहुत निराशा हुई, लेकिन कुछ दिन बाद नई उम्मीद और विश्वास के साथ उन्होंने अपने बच्चों को स्वावलंबी बनाने की ठानी।

रामपाल के मुताबिक जब वह और उनके भाई 10-12 साल की उम्र के हुए। तभी पिताजी ने उन्हें मूर्ति बनाने की कला सीखाना शुरू किया। इस कला को सीखने में तीनों भाइयों को करीब 10 साल लग गए। ट्रेनिंग के दौरान पिता जी ने बांस की फट्टी काटना, जोड़ना और घास से बांधना सीखाया। इसके बाद मिट्टी का लेप करने की बारीकी सीखाकर एक काबिल कलाकार बनाया।

बतौक रामपाल, मूर्ति बनाते वक्त कभी कोई गलती होती थी तो पिता जी पिटाई भी कर देते थे। लेकिन बाद में लाड़ करना भी नहीं भूलते थे। रामपाल ने बताया मूर्ति बनाने में पारंगत होने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी और दो बच्चों को साथ लेकर छह लोगों की टीम तैयार की। इसके बाद नवरात्री से पहले मूर्ति बनाने के लिए अलग-अलग शहरों की तरफ निकल पड़ते। पिछले पांच साल से वह लगातार बस्ती जिले में आकर मूर्ति बनाकर बेचने का कारोबार कर रहे हैं।

रामपाल ने बताया कि, वह मूर्ति बनाने के दौरान प्लास्टर आॅफ पैरिस और घातक रंगों का इस्तेमाल नहीं करते। वह सिर्फ खेत की मिट्टी से ही मूर्तियों का निर्माण करते हैं और रंगाई के लिए हर्बल कलर का उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि, नदियों और तालाबों में विसर्जन के बाद उनकी बनाई मूर्तियां पूरी तरह पानी में गल जाती है और प्रदूषण नहीं फैलने देती।

विद्यापति की मिथिला में संभावना सेठ की अश्‍लीलता परोस दी जागरण ने

: महानतम संस्‍कार-भूमि में दैनिक जागरण ने संभावना सेठ की वाचाल टीम को परोस दिया लालुप स्‍वाद वाला छौंक पकवान : ऐसी कोशिशों के चलते ही जल्‍दी ही इस क्षेत्र में उन्‍मुक्‍त यौनाचार की फसल उगने लगे, तो चिल्‍ल-पों मत कीजिएगा :

शेषमणि पाण्‍डेय और बीएन मिश्र

दरभंगा : मधुबनी क्षेत्र के मैथिल संस्कृति में महा कवि-ज्ञानी विद्यापति और उनकी संस्‍कृति के पहरूए 200 साल बाद भी आज भी चमत्कार करते हैं। और यह यूं ही मजाक में नहीं है कि विद्यापति और मैथिल संस्‍कृति दरभंगा से सैकड़ों मील दूर घर-घर गायी-सुनायी जाती हैं। लेकिन दैनिक जागरण ने शायद तय कर रखा है कि वे क्षेत्र में इस महान विद्यापति सम्राट की कोशिशें और मैथिल संस्कृति को छिन्न-भिन्न करके ही दम छोड़ा जाएगा।

ताजा मामला है गरबा- डांडिया के गुजरात का। धर्म से शुरू, लेकिन बाद में धर्म को पूरी तरह विसर्जित कर देने वाला यह पर्व पहले तो महाराष्ट्र और उसके बाद दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में उसने अपनी पैठ जमाने शुरू कर दिया।  कहने की जरूरत नहीं कि मुंबई महाराष्ट्र और गुजरात में गरबा यानी डांडिया पर्व फ्री-सेक्स का एक बहुत बड़ा उन्‍मु‍क्‍त मेला माना जाने लगा है। इन इलाकों में यह पर्व एक ऐसा मेला के तौर पर स्‍थापित होता जा रहा है, जो खुले और उन्‍मुक्‍त यौनाचार से ढंक चुका है।

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पत्रकार पत्रकारिता

आपको बता दें कि सरकारी दावों के अनुसार उस दौरान गर्भपात की संख्‍या कई गुना बढ़ जाती है और गर्भनिरोधक दबाव तथा उपकरणों की बिक्री कई सौ गुना तक बढ़ जाती है। यहां आपको बता दें कि बिहार और यहां के मैथिल क्षेत्र ऐसे यौनाचार से कोसों दूर ही रहते हैं, जहां उन्मुक्त यौनाचार की गुंजाइश सर्वाधिक होती है। मुझे मिली खबरों के अनुसार दरभंगा और मैथिल के नाम पर मशहूर इस क्षेत्र में ऐसेकदाचार और भ्रष्टाचार से कोसों दूर हैं। मैथिल क्षेत्र पढ़ाई लिखा समाज माना जाता है।

लेकिन पिछले सितंबर दैनिक जागरण पे दरभंगा में जिस तरह गरबा और डांडिया का बड़ा आयोजन किया वह मैथिली संस्कार को काफी चकनाचूर करने वाले षड्यंत्रों में से एक है। जागरण ने फिल्मी अदाकारा संभावना सेठ और उनके समूह के लड़कियों को रात भर नचाया। कम कपड़ों में और बेहूदा तथा अश्लील संकेताक्षर और मुद्राओं के चलते पूरा मैथिल क्षेत्र उत्तेजित होता है। हो हल्ला हुआ शोर उल्लू हुई धमाचौकड़ी हुई और इस दौरान बिहार और मैथिल संस्कृति लहूलुहान होती रही।

तस्दीक देखने के लिए तस्दीक के लिए मुझे लगता है यह निम्न फोटो ही पर्याप्त होंगी

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