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सक्सेस सांग

निवेश तो रिश्‍तों में करना चाहिए: नया मैनेजमेंट गुरू

: पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान की स्‍टेपिंग आउट सेरेमनी में एक नव-प्रबंधक ने रच डाली मैनेजमेंट पर एक नयी परिभाषा : यूपी के वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश जुआल का बेटा है भरत, कमाल की डगर बुन ली : समग्रता में समझना होगा जीवन को, हर एक महत्‍वपूर्ण। यहां तक कि कुत्‍ते और चिडि़या भी :

कुमार सौवीर

पुणे : प्रबंधकों को मैनेजमेंट की दुनिया में आम तौर पर बेहद कठिन-क्लिष्‍ट और केवल आर्थिक बोझा लादने की मशीन के तौर पर ही देखा और समझा जाता है। जहां की हर डगर हर कदम पर रूखी और केवल काम से काम रखने वाली शर्तें ही बिखरी होती है। पथरीला रास्‍ता केवल भौतिक और आर्थिक उपलब्धियों तक ही सिमटा रहता है, जैसे कोई खच्‍चर-घोड़ा जिसकी आंख को केवल सीध पर ही रखने के लिए एक खास पर्दा लगा दिया जाता है। ऐसे घोड़ों-खच्‍चरों की जिन्‍दगी इससे ज्‍यादा न कुछ देख सकती है, न समझ सकती है, और न ही कुछ कर सकती है।

मगर ऐसी भीड़ में अचानक जब कोई गजब धावक एक ऐसी डगर को तोड़ कर एक अनोखे मानवीय आयामों को मजबूत करने की लाजवाब कोशिश करता है, तो वाकई कमाल हो जाता है। खास तौर पर तब, जब यह धावक सहज-सरल और मानवीय तन्‍तुओं की जमीन पर अपनी शिक्षा-दीक्षा की नींव बुनने जा रहा हो। पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान में बीते दिनों यही हुआ। यहां पढ़ कर निकलने जा रहे एक नव-प्रबंधक ने जीवन को कुछ इस तरह समझा और उसे सार्वजनिक तौर पर प्रस्‍तुत किया, कि सुनने-देखने वाले लोग दंग हो गये। उनकी आंखें गीली हो गयीं।

उस घटना का जिक्र किया है एक वरिष्‍ठ पत्रकार दिनेश जुआल ने। अपनी पत्रकारिता में करीब साढ़े तीन दशक की पारी खेलने के बाद हाल ही अमर उजाला से सेवानिवृत्‍त दिनेश जुआल ने अपने बेटे के शब्‍दों को जिस तरह प्रस्‍तुत किया है, वह लाजवाब और बेहद भावुक भी है। जुआल के बेटे भरत के इस स्‍व-अनुभूत शब्‍दों ने जिन भावों की प्रवाह-धारा पर वहां मौजूद लोगों को झकझोर दिया। पुणे के सिम्‍बोयसिस प्रबंध संस्‍थान की स्‍टेपिंग आउट सेरेमनी में भरत ने जो बोला, वह अनुकरणीय तो है ही, समाज के प्रति उसकी जीवन की प्राप्ति और उसके सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण भी है। कहने की जरूरत नहीं कि भरत ने अपने भाषण में जो कुछ भी बोला, उससे समझा जा सकता है कि हमारे बच्‍चे किसी शुष्‍क-प्रबंध की ठोस-निर्जीव ईंट मात्र नहीं हैं, बल्कि जीवन में मानवीय क्षेत्र में खुद को किसी बेहद भावुक और सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण निवेश से ज्‍यादा बलशाली हैं। इससे साबित होता है कि प्रबंध क्षेत्र में केवल कालेज ही नहीं, परिवारिक पाठशाला भी एक बेहद अहम शिक्षालय होता है, जहां एक नया समीकरण और जीवन-शैली का तानाबाना बुना जा सकता है।

अपने अनुभवों को लेकर दिनेश जुआल लिखते हैं कि:- सिम्बोयसिस पुणे में बेटे भरत की स्टेपिंग आउट सेरेमनी में शामिल होने वाले हम अकेले पेरेंट्स थे। बेटे ने हमारे लिए भी तालियां पिटवा दी।

अपने बैच को रिप्रेजेंट करने के लिए भरत बाबू को मंच पर बोलने के लिए बुलाया गया। जब उन्होंने अपनी एमबीए की पढाई के सबक किनारे छोड़ते हुए अपना निष्कर्ष दिया कि संबंधों यानी रिश्तों में निवेश न किया तो क्या व्यवसाय किया, उनके लिए तालियां बजी। उन्होंने कहा कि कैंपस के दो कुत्तों लीरा और दीनार से भी उन्होंने जीवन के अहम् सबक सीखे हैं, इन दोनों प्राणियों को उन्होंने silent teachers कहा, मुझे उनकी बचपन में लिखी डायरी के पन्ने याद आ गए । यह सुनना मेरे लिए अद्भुत और सुखद था। सबसे अंत में जब उन्हें अपनी क्लास के बेस्ट स्टूडेंट की ट्रॉफी मिली तो पूरे हॉल ने तालियां बजाई। इस ख़ुशी को शेयर करना तो बनता है भाई।

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पत्रकार

दिनेश शर्मा जैसे दोस्‍त हों, तो जिन्‍दगी में भीड़ बेवजह

: उप मुख्‍यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा जैसे मित्रों ने जो मुझे सम्‍बल दिया, वह बेमिसाल : मित्रता का मूल्‍यांकन भौतिक अपेक्षाओं से होगा, फिर तो वह सौदेबाजी होगी : कई लोग आज भी चाहते हैं कि कुमार सौवीर अपने कुमारसौवीरपना यथावत, सुरक्षित और स्‍वस्‍थ बना ही रहे : साशा की शादी के किस्‍से -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मेरी बेटी, यानी साशा सौवीर के पाणिग्रहण समारोह में भारी मित्र-बंधु-बांधव जुटे। न कोई औपचारिकता और न ही कोई हिचकिच। हालांकि इस विवाह कार्यक्रम के आयोजन में कई मित्र जुटे थे मेरा सहयोग करने के लिए। जिससे जो भी हो सकता था, उसने तत्‍काल पूरा किया। जोधपुर के पाली-मारवाड़ तक से ओम टाक से मैंने कहा कि सोजत की मेंहदी चाहिए। तीन दिन के भीतर ही विश्‍वविख्‍यात सोजत की पांच किलो मेंहदी और उसके दो दर्जन कोन कोरियर से आ गये। यह स्‍नेह का रिश्‍ता है, वरना सन-03 में ही मैंने पाली-मारवाड़ छोड़ दिया था। लेकिन रिश्‍तों की गर्माहट 15 बरस के बाद भी जस की तस थी।

बहरहाल, विवाह में मैंने जिसे बुलाया, वह आया। कुछ लोगों को छोड़ कर। हां, तो जिसे नहीं बुला पाया, वह भी पहुंच गया, बेहिचक आया। लेकिन जिस तरह डॉक्‍टर दिनेश शर्मा ने साशा के विवाह में अपनी भागीदारी निभाई, वह किसी भी मित्र के लिए सर्वोच्‍च गर्व का विषय बन सकती है। दिनेश शर्मा भले ही आज यूपी के उप मुख्‍यमंत्री हों, लेकिन मेरा उनसे रिश्‍ता खासा गहरा है। लोगों के लिए विस्‍मयकारी हो सकता है। लेकिन जिस तरह जीवन के एक-एक लम्‍हों को हम दोनों ने जिया है, वे मेरे लिए बेमिसाल रहे हैं। स्‍नेह की डोर की ताकत ही तो है यह, कि डॉ दिनेश शर्मा ने 20 फरवरी को अपने पूर्व-निर्धारित गोरखपुर के अपने दौरे को जैसे-तैसे निपटाया, और सीधे शादी के मण्‍डप पर पहुंच गये। समय से। उस वक्‍त द्वारचार की तैयारी चल रही थी।

दूल्‍हा सौमित्र को दोनों ही पक्षों के पण्डित-ब्राह्मणों के सामने बिठाया जा चुका था। ब्राह्मणों ने मुझे बुलवाया। पुकार होते ही मैं जाहिर हो गया। अभी बैठने ही जा रहा था कि दिनेश शर्मा का काफिला आने का हल्‍ला मच गया। आसन से उठ पाना अब मुमकिन नहीं था। उनके साथ कोई औपचारिकता की भी जरूरत नहीं थी। पता ही था कि मुझसे मिले बिना दिनेश जी वापस नहीं जाएंगे। इसलिए मैंने पाल्‍थी मार कर ली और अपने कपड़ों को व्‍यस्थित करना शुरू कर दिया।

हुआ हो ही रहा था कि अचानक शोर-गुल मेरी ओर बढने लगा। अचानक मेरे कंधे पर डॉ दिनेश शर्मा जी ने अपना हाथ रखा और फुसफुसाते हुए बोले कि, "मैं पहुंच गया हूं। देख लो, बिलकुल समय पर पहुंचा हूं।" मैं मुस्‍कुराया, उनका हाथ थपथपाया। कि तभी डॉ दिनेश शर्मा मेरे पीठ से होते हुए मेरे और पंडित जी के बीच की जगह में अपना स्‍थान बनाते हुए पालथी मार कर बैठ ही गये। मंत्रोच्‍चार प्रारम्‍भ हो गया। करीब बीस मिनट तक औपचारिकताएं पूरी होती रहीं। दिनेश जी लगातार उस कार्यक्रम में अपने सक्रिय भागादारी निभाते ही रहे। ऐसा लगा ही नहीं कि यूपी सरकार का कोई बड़ा ओहदेदार और खासी बड़ी राजनीतिक शख्सियत हमारे बीच मौजूद है।

द्वारचार की यह प्राथमिक औपचारिक के बाद दोनों ही पक्षों के ब्राह्मणों-पंडितों को दक्षिणा देने की परम्‍परा शुरू होने लगी। मैंने बेटी बकुल और मित्र एसबी मिश्र वगैरह की ओर इशारा किया। वे लोग अभी पैसा निकालने ही जा रहे थे कि डॉ दिनेश शर्मा ने मामला भांपा, और बोले कि नहीं, नहीं। दक्षिणा मैं दे रहा हूं। आखिरकार हम अपने बिटिया की शादी कर रहे हैं। सब मिल कर करेंगे यह पवित्र अनुष्‍ठान। यह कहते ही डॉ दिनेश शर्मा ने अपनी सदरी की भीतरी जेब से पर्स निकाला। उसमें से रूपये निकाले और दोनों ही पक्षों के ब्राह्मणों को सामान्‍य तौर पर दिये जाने वाली दक्षिणा से भी काफी ज्‍यादा ही अर्पित कर दिया। यह औपचारिकता नहीं, बल्कि उनका एक संकल्‍प ही था कि साशा-बकुल उनकी भी बेटियां हैं।

बहरहाल, इस कार्यक्रम के बाद दिनेश शर्मा ने वहां मौजूद सभी लोगों में से सभी जगह घूम-घाम कर वहां मौजूद हर-एक गणमान्‍य लोगों से भेंट-मुलाकात की। फोटो सेशन चले। (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


बांस-विकास योजना का उपयोग मुझ पर ही कर डाला

: जहां का अन्‍न-रोटी खायी है, वहां की सेवा करूंगा। शब्‍द-सेवा करूंगा, वाक्‍य-संयोजन संवारूंगा : अब तक 43 मामले मेरे खिलाफ अदालतों में दर्ज हो चुके : चमक-दमक से दूर हट कर सहज लोगों से दोस्‍ती करना सहज व्‍यक्ति का जीवन आसान कर देता है : साशा की शादी के किस्‍से -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बहरहाल, तय किया था कि पत्रकारिता में मैंने अपने 38 बरस खपाये हैं। मेरा पहला लेख दैनिक स्‍वतंत्र भारत में प्रकाशित हुआ था अक्‍टूबर-1980 में। नवम्‍बर-80 से दैनिक अमृतप्रभात, दैनिक नवजीवन के साथ ही साथ अमर उजाला और जनसत्‍ता तथा दिनमान वगैरह में भी मैं नियमित रूप से छपने लगा था। और उसके बाद 2 जून-82 से साप्‍ताहिक सहारा में प्रूफ-रीडर के तौर पर नियमित नौकरी शुरू कर दी। आज पूरे दौरान आधा वक्‍त तो नौकरी में खपा, जबकि बाकी आधा वक्‍त बेरोजगारी में जीवन को समझने-देखने में लग रहा है। यानी मुझे दोनों ही अनुभव हैं, रोजगार में कठोर परिश्रम जनित अनुभव और कठोर बेरोजगारी जनित दुर्धष साहस। तो संकल्‍प ले लिया कि अब नौकरी के बजाय उस क्षेत्र में पूरा जीवन अर्पित कर दूंगा, जिसने मुझे इंसान बनाने की कोशिश की। यानी पत्रकारिता। पूरा जीवन अर्पित कर दूंगा। जहां का अन्‍न-रोटी खायी है, वहां की सेवा करूंगा। शब्‍द-सेवा करूंगा, वाक्‍य-संयोजन संवारूंगा। नि:शुल्‍क। हां, सबसे मांगूंगा जरूर, मगर दक्षिणा-दान या भिक्षा के तौर पर। पारिश्रमिक के तौर पर हर्गिज नहीं।

इसलिए तो मैंने मेरी बिटिया डॉट कॉम शुरू किया और उन खबरों पर काम किया, जो खबरों का धोखा होता है, गड़बड़-झाला। उन पर खुलासा करना शुरू किया, उनकी हरकतों को बेपर्द करना शुरू कर दिया। खास तौर पर ऐसे पत्रकारों और सम्‍पादकों को, जो खबर-समाचार जगत में कलंक हैं और उसे लगातार कलंकित करते ही रहते हैं। खबरों को दबाना, उसे मोड़ना-मरोड़ना, फर्जी खबर बुनना और उसे छापना, पत्रकारिता से इतर आगे कींचड़ में घुसना, ठेका-दलाली हासिल करना। ऐसे पत्रकार तो ऐसे भी हैं जो उगाही और रंगदारी तक उगाहते हैं, उन पर बेहिचक हमला करना शुरू कर यिा मैंने। मगर इसके साथ ही साथ उन पत्रकारों पर भी काम शुरू किया जो वाकई पत्रकारिता करते हैं, और समाचार-सेवा के तौर पर पत्रकारिता के साथ ही साथ अपने जीवन को भी धन्‍य करने के अभियान में जुटे हैं। मैंने ऐसे भी और वैसे भी लोगों को चिन्हित करना शुरू किया।

यह एक बड़ा अभियान था। इसलिए भी, क्‍योंकि इससे पहले ऐसा कोई भी साहस कभी किसी पत्रकार ने नहीं किया है। ऐसी हालत में समाज के हर कोने से मेरे पक्ष में भारी सक्रिय एकजुटता का भाव उमड़ना चाहिए था, जैसा कि मैं अपेक्षा कर रहा था, या जो अपेक्षित था। मगर ऐसा हुआ नहीं। हां, जिनके लोगों के कामों-चरित्रों की सराहना की, उन्‍होंने तो मुझे तनिक भी कोई मदद नहीं की, लेकिन जिन पर हमला किया, वे मुझ पर हमलावर हो गये। जिन्‍हें साजिश के तहत फंसाया गया था, उनके बारे में मैंने निर्दोष भाव में अपनी कलम उठायी, लेकिन अधिकांश मामलों में वे भी अपना काम निकलने के बाद अपने कंधे उचका कर अलग खड़े हो गये। लेकिन उनकी सहभागिता और सहयोग के साथ मैंने उनके पक्ष में युद्ध छेड़ा, अब तक 43 मामले मेरे खिलाफ अदालतों में दर्ज हो चुके हैं। मगर वे भी छिटक कर अलग हो गये।

बहुत कम ही लोग सामने आये हैं जो मेरे काम की प्रशंसा कर उसमें अपना योगदान कर रहे हैं, लेकिन बाकी लोगों ने तो मोदी सरकार की बांस-बैम्‍बू विकास योजना का पूरा उपयोग केवल मेरे खिलाफ ही उठाया है। (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


जीवन का रिपोर्ट-कार्ड तो मित्रों से बनता है

: सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक कीजिए : मित्रता का मूल्‍यांकन भौतिक अपेक्षाओं से करेंगे, तो वह सौदेबाजी ही होगी : अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें कुमार सौवीर, यह सामाजिक जरूरत है : साशा की शादी के किस्‍से -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : किसी भी शख्‍स की जिन्‍दगी के रिपोर्ट-कार्ड का मूल्‍यांकन करना हो तो सबसे पहले उसके दोस्‍तों को चेक करना चाहिए। लेकिन दोस्‍तों में सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक किया जाना चाहिए। वजह यह कि ताजे-नवेले मित्र को उसकी वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर जुड़ते-घटते ही रहते हैं। आज हैं, तो कोई गारंटी नहीं कि कल वे होंगे ही जरूर। मगर असल दोस्‍त तो जिन्‍दगी हर सांस की तरह आपको हर क्षण मजबूत करता ही रहता है। जिन्‍दगी में उसकी भूमिका में लाभ-नुकसान की भावनाएं कोंसों-योजनों दूर होती है। मकसद सिर्फ यह कि अपने मित्र को उर्जा देता ही रहे, हर कीमत पर।

तो लब्‍बोलुआब यह कि अगर किसी की जिन्‍दगी में बचपन के सारे दोस्‍त बिना किसी लाग-लपेट के मौजूद दिख रहे हों, तो फिर तो मौजां ही मौजां। अजी, ऐसे में तो आप सिर्फ मौज कीजिए। बेशक मान लीजिए कि आप डिस्टिंक्‍शन नम्‍बरों से जीत गये। अव्‍वल नम्‍बर से। सच कहूं, तो ऐसी बेमिसाल जीत बहुत कम लोगों को ही नसीब होती है।

बीती 20 फरवरी-2018 को हुई मेरी बिटिया साशा सौवीर की शादी में तो यही सब हुआ था।

सन-11 में तय कर लिया था कि अब नौकरी नहीं करूंगा। "फिर अब तुम क्‍या करोगे?" यह सवाल कई लोगों ने मुझ पर उछाला था, और उनके सवालों की झड़ी आज भी मुझे कीचड़-वर्षा सी महसूस होती है। लेकिन ऐसे सवाल मुझे इसलिए कष्‍ट नहीं देते कि उनके सवाल का मकसद मुझे प्रताडि़त करने लगने जैसा लगता है, बल्कि इसलिए कि शायद उन्‍हें मेरी क्षमताओं का आंकलन नहीं किया होता है। वे मेरे प्रति स्‍नेह-प्रेम के अतिरेक में मुझको लेकर भयभीत हो जाते हैं।

अरे नौकरी करने-छोड़ने के मामले में खासा हिस्‍ट्री-शीटर हूं। सन-84 में जब सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय को उसके आफिस में घुस कर अपने जूतों से रौंदा था, तब भी नौकरी गंवा गया था। उसके बाद सन-92 में दैनिक जागरण के सम्‍पादक विनोद शुक्‍ला ने अपनी कमीनगी का प्रदर्शन किया, तो मैं ने भी उसका विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि मेरा तबादला बरेली कर दिया गया। मगर मैंने नौकरी करने के बजाय, जागरण को ही अलविदा कर दिया और जागरण की नौकरी को लात मार कर बेरोजगारी से आलिंगनबद्ध हो गया था मैंने।

पूरे करीब दस बरस तक बेहद कष्‍ट में रहा, मगर समझौता नहीं किया।

हां, केवल वे मित्र ही हैं, जो हमेशा यही चाहते और करते रहे कि कैसे भी हो, कुमार सौवीर अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें। किसी ने मुझे आर्थिक मदद की, तो किसी ने हौसला। आज तक यही हो रहा है, कोई मुझे सहयोग कर रहा है, तो कोई दान-दक्षिणा। जीवन का प्रवाह कलकल बहता ही जा रहा है। झरने पर उछल-कूद करते जल-बूंदों के छोटे-मोटै झुण्‍डों की तरह। कहीं फंस जाता हूं, तो कहीं कुछ अरमान सूखने लगते हैं। कभी इस पत्‍थर से अपना सिर फोड़ बैठता हूं, तो कभी अपनों का झुण्‍ड बना कर आनंदोत्‍सव मनाते हुए आगे बढ़ जाता हूं।

सात बरस से बेरोजगारी। किसी को भी विचलित कर सकती है। अच्‍छे-अच्‍छों को हिला सकती है, चकनाचूर कर सकती है। दुनिया के विशालतम सबाना जंगल के जेब्रा या भैंसों पर शेरों की टोली के अचानक हमलों की तरह छिन्‍न-भिन्‍न जानवरों की तरह कुछ मित्र आपके संकट के दिनों में धूल झाड़ते हुए रफू-चक्‍कर हो जाते हैं। सबसे आक्रमण होता है मित्रों को लेकर भावनात्‍मक धरातल पर। कुछ मित्र कर्कश हो जाते हैं, खास कर पुरूष-मित्र। वे चंद लोग मेरी जिन्‍दगी में सिर पर पांव रख कर भाग निकले थे, तो उनका क्‍या किया जा सकता है।

जबकि ज्‍यादातर महिला मित्र तो मुझ पर दयनीय भाव का प्रदर्शन करती हैं। च्‍च्‍च्‍च्‍च्‍ बेचारा, कैसे चलेगा तुम्‍हारा जीवन, समझ ही नहीं पाती हूं। लेकिन कभी मेरे लायक कोई जरूरत महसूस हो तो बताना जरूर। कुछ तो ऐसी हैं कि मोबाइल पर बातें तो घंटों तक बतियाएंगी, कि हर बार में सैकड़ों का बिल गिर जाए, लेकिन ब्‍लाउज से बटुआ नहीं निकालेंगी। वे चाहे इलाहाबाद वाली हों या फिर जौनपुर वाली, अथवा सोनभद्र, इलाहाबाद, वाराणसी, बाराबंकी, कानपुर, मुरादाबाद, आगरा, दिल्‍ली, छपरा अथवा अमृतसर या जोधपुर वाली। हां, हल्‍का-फुल्‍का खर्चा तो बायें हाथ की बात है।

बस्‍स्‍स। इससे ज्‍यादा नहीं।

मगर ओहदा, ऐश्‍वर्य, वैभव या धन-दौलत से मित्रता का मूल्‍यांकन क्‍या किया जा सकता है?

हर्गिज नहीं।

है न? (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


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