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सैड सांग

बेशर्म कप्‍तान। रेपिस्‍टों को शह, बच्‍ची फूंक दी गयी

: क्‍यों बड़े दारोगा, इसी बच्‍ची के घर रेपिस्‍टों ने दीवाली की रात पटाखे दगाये थे न ? जौनपुर में गैंग-रेप पीडि़त बच्‍ची को एक साल बाद जिन्‍दा फूंका : साल पहले हुआ दर्ज हुआ था मामला, दबंगों ने बच्‍ची का गर्भ तक गिराया था : जान मारने की धमकी देते रहे दुराचारी, पुलिस उगाही में जुटी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तनिक उस परिवार की मनोदशा की कल्‍पना कीजिए, जिसकी एक नाबालिग बच्‍ची के साथ तीन दबंगों ने सामूहिक बलात्‍कार किया हो, मामले की रिपोर्ट भी पुलिस दर्ज हो चुकी हो, लेकिन नामजद दुष्‍कर्मी न केवल सरेआम घूम रहे हों, बल्कि पिछले कई दिनों से उस बच्‍ची के घर के सामने पटाखे जला कर अपनी ताकत का इजहार कर रहे हों। कहने की जरूरत नहीं कि यह बच्‍ची और उसके परिजन दहशत में रहे हों, और उनकी दीपावली किसी स्‍याह-डरावनी अमावस्‍या की तरह उनके भविष्‍य की रूपरेखा बुन चुकी हो। दुराचारियों के हौसले बढ़े हों, उन्‍होंने पीडि़त बच्‍ची का गर्भ गिरवा दिया हो। दलाल, जनप्रतिनिधि, समाजसेवी, नेता-पनेता और पत्रकार तक पूरे मामले में या तो खामोश हों, या फिर उन दुराचारियों से मोटी उगाही में जुटे हों। लेकिन सबसे शर्मनाक पहलू तो यह हो कि पुलिस और प्रशासन भी रूपहले सिक्‍कों में बिक चुका हो। और नतीजा यह हो कि आखिरकार हौसलेमंद अपराधियों ने सारे सुबूत मिटाने के लिए उस बच्‍ची को जिन्‍दा फूक डाला हो।

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जुल्‍फी प्रशासन

लेकिन असल सवाल तो यह है कि जौनपुर का  बड़ा दारोगा आखिरकार तब क्‍या कर रहा था ? सच बात तो यही है कि केवल बेशर्मी पर ही आमादा था जिला का पुलिस महकमा और उसका मुखिया पुलिस कप्‍तान। इसी कप्‍तान ने ही दुराचारियों को छुट्टा छोड़े रखा था। यह जानते हुए भी कि यह मामला पौने 15 बरस की एक बेहद अल्‍पआयु बच्‍ची का प्रकरण होने के चलते पॉक्‍सो-कानून की कड़ी धाराओं से सम्‍बद्ध है, जिसमें त्‍वरित कार्रवाई की जानी चाहिए थी। हैरत की बात है कि पुलिस मामला दर्ज होने के बाद जब उस बच्‍ची का मेडिकल कराया गया, तो उसमें वह मासूम बच्‍ची दो महीने की गर्भवती पायी गयी थी। लेकिन जौनपुर का बेशर्म बड़ा दारोगा अपनी अलग ही खिचड़ी पकाने में व्‍यस्‍त रहा। जब भी बातचीत की गयी इस कप्‍तान से, जवाब यही मिला कि हम मामले की छानबीन कर रहे हैं।

यह शर्मनाक और दर्दनाक मामला है जौनपुर का। यहां के बदलापुर बाजार में स्‍थानीय तीन धनपशुओं ने एक नाबालिग मासूम बच्‍ची की जिन्‍दगी ही रौंद डाली। हैरत की बात थी कि यह घटना बदलापुर थाने से चंद कदम दूर ही हुई।लेकिन मामले की एफआईआर दर्ज होने के बावजूद पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। नतीजा, यह कि पहले तो रिपोर्ट दर्ज होने के बाद तीनों दुष्‍कर्मी कहीं भाग गये थे, लेकिन अब मामला शांत होता समझ कर वे वापस लौट आये। इतना ही नहीं, इन मनबढ़ बलात्‍कारियों ने पिछले कई दिनों से उस बच्‍ची के घर के बाहर तड़ातड़ पटाखे छुड़ा कर अपनी ताकत का ऐलान किया और अपनी सफलता के झंडे गाड़ना शुरू कर दिया है। जाहिर है कि हर ओर से अकेली पड़ चुकी इस बच्‍ची और उसके परिजन भय से थरथराते हुए घर में ही दुबके रहने पर मजबूर रहे थे।

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हर सू जौनपुर

आइये, हम आपको इस हादसे के बारे में तफसील से जानकारी देते हैं। 20 अक्‍तूबर-17 की सुबह-सुबह मेरे पास जौनपुर के मछलीशहर के करीब बरईपार गांव के रहने वाले सुनील कुमार पाण्‍डेय का फोन आया। सुनील पाण्‍डेय यहां सिंगरामऊ स्थित हरपाल सिंह डिग्री कालेज में एमएड कर रहा है और छात्र राजनीति के साथ सामाजिक दायित्‍वों को लेकर भी सक्रिय है। सुनील ने प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को इस हादसे के बारे में विस्‍तार से बताया। और यह भी बताया कि इस मामले में पुलिस, कतिपय पत्रकार और तहसील के कुछ अफसरों के साथ ही साथ कई अन्‍य सरकारी अधिकारी-कर्मचारी तथा अन्‍य सामाजिक नेता मामले में मिट्टी डालने पर आमादा हैं। इनमें से कई ने तो मामले में लिप्‍त अभियुक्‍तों और उनके परिजनों से भारी उगाही भी कर ली है।

मैंने इस मामले छानबीन शुरू कर दी, और अपने निष्‍कर्षों से जुड़ी खबरें छापना शुरू किया। इसी बीच एक डरावनी खबर मिली कि मामले में वांछित दुराचारियों ने इस बच्‍ची का चार महीने का गर्भ गिरा दिया है। गरीब परिवार की यह बच्‍ची आखिर क्‍या करती, लेकिन उसकी मां ने भरसक दौड़भाग किये रखी। वह पुलिस थाने से लेकर पुलिस कप्‍तान तक से मिलती रही। मगर कप्‍तान ने बाद में तो उससे मिलने तक से इनकार कर दिया था।

नतीजा यह हुआ कि पुलिस की शह के चलते हौसलों से भरे दुराचारियों ने आखिरकार एक ऐसा डरावना काण्‍ड कर दिखा दिया कि सुनने वालों पर भय फैल जाए। खबर है कि पिछली 26 अप्रैल-17 को इस बच्‍ची को जिन्‍दा फूंक दिया गया।

इसमें शर्मनाक हादसा तो जौनपुर के पुलिस कप्‍तान का ही रहा, जिसने अपराधियों को इतनी शह दे दी और उन्‍हें जेल में बंद करने के बजाय बाहर छुट्टा घूमने दिया। ( क्रमश: )

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस सूचना के आधार पर अपनी पड़ताल शुरू की, तो कई डरावने सच सामने आ गये। यह मामला अब श्रंखलाबद्ध प्रकाशित किया जाएगा। इस शर्मनाक हादसे से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए आप से अनुरोध है कि आप से लगातार जुड़े ही रहें।

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बदलापुर-हादसा

पहले गैंगरेप, फिर एबॉर्शन। अब बच्‍ची को जिन्‍दा फूंका

: अब बीएचयू में अंतिम सांसें ले रही है यह अनाथ बच्‍ची : एक बरस से न्‍याय के लिए भटक रही इस बच्‍ची को अब इलाज के भी लाले : जौनपुर का मामला दबाने को प्रशासन-पुलिस, दलाल और पत्रकारों ने भी खूब रकम ऐंठी : बच्‍ची मौत की कगार पर पहुंची, तब दुराचारी पकड़े गये :

कुमार सौवीर

जौनपुर : बधाई हो योगी जी, आपकी ओपी-पुलिस अपने मिशन में बिलकुल खरी उतरी है।  जो बच्‍ची आपकी सरकार, आपके प्रशासन, आपकी पुलिस और पुलिस के चहेतों की प्रतिष्‍ठा पर बाकायदा एक बेहद पीड़ाजनक फांस बनी हुई थी, अब उसे हमेशा-हमेशा के लिए राह से हटाने का रास्‍ता साफ कर दिया गया है। पुलिस की शह पर दबंगों ने जिन्‍दा फूंक डाला है। बीएचयू के मेडिकल कालेज में बर्न-वार्ड में तड़प रही यह बच्‍ची की जुबान अब बोलने लायक तक नहीं बची है। घर-घर चूल्‍हा-चौका करने वाली उस बच्‍ची की मां की समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपने बाकी तीन मासूमों का पेट पाले, या फिर अस्‍पताल में भर्ती अपनी इस बच्‍ची की सेवा करे। उसके पास पैसा भी तो नहीं है। जबकि अभियुक्‍तों को बचाने के लिए पुलिस-प्रशासन से लेकर पत्रकार और दलालों तक की पौ-बारह हो गयी।

यह हादसा है जौनपुर का। बड़े घरों में झाड़ू-पोंछा का काम कर अपने परिवार की दाल-रोटी का जुगाड़ करने वाले वाली उर्मिला की करीब पौने 15 बरस की बच्‍ची को एक दोपहर तीन बिगड़े नवाबों ने दबोचा था।उन तीनों ने उस बच्ची के साथ सामूहिक दुराचार किया। बाद में उसे एक सौ रूपया थमा कर धमकी दी, कि घरवालों को मत बताना। यह घटना है अप्रैल के मध्‍य की किसी तारीख की। और घटना स्‍थल है जौनपुर के बदलापुर तहसील कस्‍बा नुमा बाजार का।

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जुल्‍फी प्रशासन

नतीजा यह हुआ कि यह बच्ची गर्भवती हो गई। डेढ़ महीने बाद मां को पता चला तो वह सीधे थाने पर पहुंची। कुछ दिनों तक पुलिस ने मामला गोल-गोल नचाया। अभियुक्‍तों पर दबाव बनाने के लिए उसके घरवालों को खबर दी। पूरी कोशिश हुई कि ले-दे कर निपटा दिया जाए। बिचौलिया के तौर पर पुलिस ने अपनी सेंधमारी की पूरी गुंजाइश पैदा की। लेकिन मामले पर जब राजनीतिक रंग चढ़ना शुरू हुआ तो पुलिस ने मामला दर्ज किया, मगर गिरफ्तारी नहीं की। लेकिन पाक्‍सो का मामला होने के बावजूद अभियुक्‍तों को सुरक्षित भाग निकालने के लिए पुलिस ने रेड-कार्पेट बिछा दिया।

यह दबाव बनाये रखा कि किसी भी तरह दबाया जाए और बच्ची अपना बयान बदल दे। इसके लिए कुछ लोग सक्रिय हो गए। इनमें से कुछ लोग तो स्‍थानीय वकील थी, कोई वैद्य थे, कोई दलाल थे, तो कोई बहती गंगा में हाथ धोने को लालायित थे। सूत्रों के अनुसार इन दलालों ने इस बच्ची का गर्भ गिराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने का पूरा नाटक किया। यह भी भय दिखाया गया कि अगर यह गर्भ नहीं गिराया गया तो इन अभियुक्तों को बचाने से कोई नहीं तरीका होगा। पुलिस तो उन दुराचारियों की अभिभावकों की भूमिका में थी, इसलिए उन्‍हें खुला छुट्टा ही रखा गया। इतना ही नहीं, पिछली दीपावली की रात में इन दुराचारियों ने उस पीडि़ता के घर के सामने बम-पटाखे और छुड़छुडियां-फुलझडि़यों भी फूंकी थीं।

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हर सू जौनपुर

इसी बीच मौका मिलते ही दुराचारियों ने उस बच्‍ची का गर्भ भी गिरा दिया। बताते हैं कि एक दिन बच्‍ची जब बीमार थी, तो धोखे से ऐसी दवा दे दी गयी कि उसका एबॉर्शन हो गया। गौर तलब है कि मामले की रिपार्ट दर्ज होने के दौरान पुलिस ने उस बच्‍ची को जब जिला अस्‍पताल ले जाकर उसका मेडिकल कराया था, उसमें डॉक्‍टरों ने उस किशोरी के पेट में दो महीने के गर्भ होने की तस्‍दीक की थी। इस पर वह बच्‍ची और उसकी मां ने फिर दौड़-भाग की, लेकिन पुलिस और स्‍थानीय लोगों ने उसकी आवाज को दबोचने के लिए हरचंद कोशिशें-साजिशें कीं।

यह श्रंखलाबद्ध समाचार आलेख है। अगर आप इसकी बाकी कडि़यों को पढ़ने में इच्‍छुक हों, तो निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

राग-जौनपुरी

और अब इस बच्‍ची को ही मौत के हवाले करने की साजिशें कर दी गयीं। हमारे संवाददाता को काफी विलम्‍ब से मिली खबर के अनुसार बीती 26 अप्रैल-18 को यह बच्‍ची अपने घर बुरी तरह जली मिली थी। जिला अस्‍पताल से भी उसे बीएचयू रेफर कर दिया गया था, क्‍योंकि बच्‍ची की हालत खासी नाजुक थी। उस बच्‍ची की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है, घर का काम करने वाली उसकी मां अगर यह काम छोड़ कर अस्‍पताल चली जाए, तो उसके बाकी मासूम बच्‍चों का क्‍या होगा। उधर वह बच्‍ची केवल डॉक्‍टरों की कृपा के बीच केवल चीख-चीत्‍कार कर पर मजबूर है। डॉक्‍टर बताते हैं कि इस बच्‍ची इस तरह जली है कि उसके शब्‍द साफ नहीं निकल पा रहे हैं। (क्रमश:)

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस सूचना के आधार पर अपनी पड़ताल शुरू की, तो कई डरावने सच सामने आ गये। यह मामला अब श्रंखलाबद्ध प्रकाशित किया जाएगा। इस शर्मनाक हादसे से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए आप से अनुरोध है कि आप  से लगातार जुड़े ही रहें। और इस खबर की अन्‍य कडि़यों-खबरों को पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

बदलापुर-हादसा

मां: इनकी प्रताड़ना, दशा, पीड़ा और प्रेरणा टटोलिये

: महिलाओं से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएं, जो किसी को भी दहला सकती है : झांसी की एक बेबस मां ने जिस तरह अपनी नवीं बच्‍ची को पटक कर डाला : किस तरह अपने गीले अंत:वस्‍त्रों को लपेटे रहती थीं मेरी मां : बहराइच की लड़कियों को साइकिल चलाने का श्रेय सुशिक्षा अनुपम मिश्र को :  बेबस मां -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : चार दिन बीत गये हैं, लेकिन मातृ दिवस को लेकर अब तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या सोचा, छांटा और लिखा जाए।

ऐसा नहीं कि लिखने के लिए कोई बहुत महत्वपूर्ण बात ही नहीं है। ज्‍यादातर बात हमेशा छोटी ही होती है, हमारी समझ उसे छोटी या बड़ी बनाती है। खासकर मानवीय संदर्भ में तो यही शर्त लागू होती है। हमें खोजना होता है उसके अंतर-विषय को, कि हम किस गहराई तक पहुंचा और देख सकते हैं। आम आदमी की सम्वेदनाओं को प्रभावित करने का जिम्मा संभाले लेखकों, चिंतकों और पत्रकारों की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसे मौके खोजें, उनका छिद्रान्वेषण करें और उन्हें व्याख्यायित कर जनसाधारण तक पहुंचा दें।

दिक्कत तब होती है जब किसी लेखक के पास लिखने के लिए विषयों का बेशुमार भंडार तो हो, लेकिन उसकी लेखनी और वाणी स्तब्ध हो सन्निपात की हालत तक पहुंच चुकी हो, जुबान और दिमाग सुन्‍न हो जाए। आप लिखना तो चाहें, लेकिन लिख नहीं पाते हालत किसी भी और अवसाद की हालत से कम नहीं होती। मेरे पास भी कई गहरे मसले हैं जो घटनाओं के स्तर पर बेहद मार्मिक होने के चलते समाज को गहरे तक प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे भी नहीं, ये इतने पीड़ाजनक भी हैं कि उसे सुन कर आम आदमी अपना चेहरा भी न छुपा पाएगा।

खैर, विलम्‍ब के लिए आप सभी से दिल से और संवेदना रूप से भी क्षमा याचना चाहता हूं कि मैंने इतना विलंब कर दिया। साथ ही संकल्प भी लेता हूं कि आइंदा ऐसा नहीं होगा। तो दोस्तों, मेरे पास फिलहाल तीन प्रमुख घटनाएं हैं, जिनसे मैं शुरूआत करने की इजाजत चाहता हूं। पहले तो झांसी की एक महिला की घटना है। इस महिला ने भरी अदालत में एक ऐसा सच कुबूल कर लिया, जो भले ही उसको आजीवन कारावास तक पहुंचा सके लेकिन उसके इस सच ने हमारे समाज को उसकी सभ्यता उसकी संवेदनशीलता उसकी भावुकता और उसकी असल औकात चिंदी-चिंदी तार-तार कर डाला। इस श्रंखला के पहले अंक में हम उस घटना का जिक्र करेंगे।

बाकी दूसरी और तीसरी घटनाएं हमारे परिवार से जुड़ी हुई हैं। इनमें हमने भरसक ऐसे माहौल को दिखाने की कोशिश की है जिसे समाज सामान्य तौर पर उचित-अनुचित के दायरे में कस लेता है, लेकिन मैं उस पूरे माहौल को पूरे संयमित भाव शब्दों में जगजाहिर करने की कोशिश करूंगा।

इसमें मैं मेरी ननिहाल में सबसे बड़ी मौसी से लेकर उनके पूरे जीवन-काल का किस्सा बयान करूंगा, जो इस वक्त भले ही मुंबई के एक ओल्ड-एज होम में अपनी अंतिम सांसें ले रही हैं, लेकिन उस महिला ने 70 साल पहले जिस जिजीविषा का प्रदर्शन किया था वह बेमिसाल था। इतिहास में यह घटनाएं भले ही दर्ज न हो पायें, लेकिन बहराइच और गोंडा जैसे बेहद पिछड़े इलाकों में आज स्‍त्री-सशक्‍तीकरण की ज्‍वाला आपको धधकती दिख रही है, उसका श्रेय अगर किसी एक व्‍यक्ति पर है। और वह हैं मेरी मौसी। नाम है सुशिक्षा अनुपम मिश्र।

श्रंखला के चौथे अंक में मैं खुद अपनी मां के साथ जुड़े कुछ किस्से बयान करना चाहता हूं जो किसी भी महिला के अंतरंग वस्त्रों से जुड़े हैं। याद पुरानी शायद 50 साल पहले की है, तब किसी भी स्त्री या महिला का अपने अंतरंग वस्त्र का तनिक भी दिख पड़ जाना ही उसके अभद्र, अश्‍लील, चालू व्‍यवहार का स्‍वत: प्रदर्शन माना जाता था।

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

पति हो तो क्‍या? पायरिया का इलाज कराओ, या तलाक

: जरा उन महिलाओं की बदहाली के बारे में सोचिये तो आपका दिल-दिमाग हिल जाए, जिनके पति पायरिया से पीडि़त हैं : अगर मैं अपने मित्र की ब्‍याहता होती तो, पहली ही रात केवल यही लानत-मलामत करती कि जब मुंह इलाज की तमीज नहीं है, तो शादी काहे कर लिया बे : महिलाएं कितना बर्दाश्‍त करती हैं पायरिया से सड़ते मुंह को :

कुमार सौवीर

लखनऊ : मेरा एक मित्र है। घनिष्‍ठ। पत्रकार है वह। हम दोनों एक-दूसरे को बहुत बरसों से बहुत करीबी में देखते-समझते रहे हैं। निजी रिश्‍ते बेहिसाब मजबूत हैं।

खैर, मेरे मित्र को पायरिया की शिकायत है। जब वह हमारे साथ लखनऊ में दैनिक जागरण में काम करता था, तो हल्‍की बदबू आया करती थी उसके बोलने पर। लेकिन छह महीने बाद ही यह बदबू तेज ही होती रही। यह करीब 28 साल पहले की बात है। बाद में वह परदेस चला गया, सपरिवार। बीच-बीच में जब भी उससे मेरी मुलाकात हुई तो भी उसकी पायरिया वाली गन्‍दी महक बदस्‍तूर महसूस की। लेकिन पिछले पखवाडा जब वह लखनऊ आया तो उसके गले मिलते ही मुझे उसके मुंह से भयंकर बदबू लगी।

मैंने छिटक कर दूसरी कुर्सी पर बैठा और सवाल उछाला:- अरे यार, दूर रहो मुझसे। कित्‍ती बदबू आती है तुम्‍हारे मुंह से। तुम अपने मुंह का इलाज क्‍यों नहीं कराते हो ?

हैरान मित्र का जवाब आया:- नहीं यार, तुम्‍हें भ्रम होगा। मुझे तो ऐसी कोई दिक्‍कत नहीं है।

मैं बोला:- बिस्‍तुइया इस बारे में तुमसे शिकायत नहीं करती है ? ( बिस्‍तुइया, यानी उसकी बीवी। मैं उसे मारे स्‍नेह के बिस्‍तुइया पुकारता हूं। मतलब छिपकली। बहुत स्‍नेह से मैं कभी उसे बिस्‍तुइया कहता हूं, तो कभी घरैतिन कह कर पुकारता हूं। दुबली-पतली-इकहरी है वह। फूंक मार दो, अलगनी में फैले पेटीकोट की तरह उसका पूरा अस्तित्‍व फड़फड़ा जाए।

न न, बिलकुल नहीं। कभी भी नहीं। :- मित्र का जवाब था

यह सुनते ही मैंने अपनी एक टांग उठायी, अपना जूता निकाला, जूता हाथ में पकड़ा और फिर उसके बाद वही जूता दिखाते हुए उससे कहा:- अबे साले, आज तो सिर्फ जूता दिखा रहा हूं। अगली बार अगर तूने अपने पायरिया का इलाज नहीं कराया तो, यही जूता तुम्‍हारे सिर पर रसीद कर दूंगा। मारूंगा सौ, गिनूंगा एक। और अगर भूला तो फिर से गिनती शुरू करूंगा। उल्‍लू का पट्ठा कहीं का।

( मैंने उसे जमकर गरियाया। लेकिन हैरत की बात है मित्रों ! महिलाएं कितना बर्दाश्‍त करती हैं पायरिया से सड़ते मुंह को। वह भी तब, जब वे अंतरंग क्षणों में हों। और आश्‍चर्य की बात है कि उफ तक नहीं करती हैं। दर्दनाक बलात्‍कार से भी ज्‍यादा क्रूर। हर दिन, रोजाना। मैं अगर महिला होती, तो पहली ही रात तो सारे कार्यक्रम कैंसिल कर पहले लानत-मलामत करती कि जब तुम्‍हें अपने मुंह की तमीज नहीं है, तो शादी काहे कर लिया था बे? उसके अगले ही दिन अपने साथ लेकर उसे अस्‍पताल ले चलती। अल्‍टीमेटम दे देती कि अगर हफ्ते तक मामला नहीं सुधरा, तो जिम्‍मेदार तुम होगे, और मैं तुम्‍हारी शक्‍ल तक कभी पसंद नहीं करूंगी। तलाक की कार्रवाई शुरू कर देती।

और हां, एक सवाल मेरे उन सभी दोस्‍तों से है जो जो सिगरेट पीते हों। जरा अपनी पत्‍नी से पूछना जरूर कि तुम्‍हारे सिगरेट से गंधाये तुम्‍हारे मुंह को वो कैसे सहन कर पाती हैं? )

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