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सैड सांग

कित्‍ती मासूम है यह बच्‍ची, इसे बेडि़यों में जकड़ दिया

: देवरिया रेलवे प्‍लेटफार्म पर लावारिस मिली थी यह बच्‍ची को पत्रकार प्रवीण यादव ने खोजा : मऊ के बुनकर अबरार की छह बेटियों में से पांचवीं है यह फरहीन : बाप ने ही पहनायी थी बेडि़यां :

गौरव कुशवाहा

देवरिया : पैरों में लोहे की जंजीरें जैसे मानो बचपन को कैद कर मासूमियत और वात्सल्य मोह का गला घोंटने की भरजोर कोशिश की गई हो।कुछ ऐसा ही हैं 9 साल की फरहीन का दर्द। जिसे पता तक नहीं कि उसके पैरों में लगी लोहे की जंजीरें कब से हैं और क्यों हैं! उसे बस इतना याद है कि उसके पिता ने ही खिलौनों किताबों की जगह उसके पैरों में लोहे की जंजीरे पहना दी। फरहीन को ये दर्द उसके अपने ही पिता से मिली हैं। मिली जानकारी के अनुसार उसे महज इसीलिए जंजीरों से जकड़ दिया गया कि वह बाहर ना जा सके,दूसरे बच्चों की तरह खेल न सके।

शनिवार की देर शाम देवरिया सदर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर लगभग 9 साल की फरहीन लावारिस अवस्था में आरपीएफ के कांस्टेबल को मिली। जिसकी तत्काल सूचना आरपीएफ इंस्पेक्टर अभय राय को दी गई।मासूम बच्ची के पैरों में लगी जंजीरें देख सभी अवाक रह गए।उस समय डरी सहमी फरहीन अपने या अपने परिवार के बारे में कुछ भी बता पाने में अक्षम दिख रही थी।उसके बाद आरपीएफ इंस्पेक्टर अभय राय ने बाल कल्याण समिति देवरिया को उक्त बच्ची के बारे में सूचित किया। देर रात को आरपीएफ ने फरहीन को बाल कल्याण समिति की सदस्य कनकलता द्विवेदी के आवास पर प्रस्तुत किया।जहाँ सुपुर्दगी की कार्यवाही की गई।कनकलता द्विवेदी ने सहमी फरहीन को अपनी बेटी समझ खूब दुलारा खाना खिलाया और अपने साथ ही रखा। कनकलता के पूछने पर उस मासूम बच्ची ने अपना नाम फरहीन और अपने परिवार के बारे ने बताया। बच्ची के अनुसार उसकी माता नूरजहाँ पिता अबरार अहमद साड़ी बुनाई का कार्य करते हैं। छः बहनो में फरहीन पांचवे नंबर की है।वह शनिवार सुबह घर से निकल गई और मऊ रेलवे स्टेशन पर किसी ट्रेन में चढ़ गई।और देवरिया सदर स्टेशन पर उतर गई। उसका घर मऊ जिले के डोमनपुरा स्थित फैजी गेट के पास हैं।साथ ही उसके पैरों में लगी जंजीर के बारे में फरहीन ने बताया कि उसे ये याद नही की ये जंजीरे उसके पैरों में कब से हैं। पर इतना जरूर पता है कि जंजीरे उसके पिता ने ही पहनाई थीं।

रविवार को देवरिया के स्थानीय पत्रकार प्रवीण कुमार यादव ने लोहे की जंजीर से बधि लावारिस अवस्था मे पाई गई बच्ची के बारे में एसपी रोहन पी कनय को अवगत कराया। इस मामले की गंभीरता देख एसपी रोहन पी कनय ने सीओ सदर राजाराम महिला थानाध्यक्ष शोभा सिंह और तरकुलवा थानाध्यक्ष शशांक शेखर रॉय को उक्त मामले की जांच के लिए भेजा। मौके पर पहुँच सीओ सिटी सदर ने मऊ पुलिस से फरहीन के बताये पते की जानकारी की।जिससे उसे जल्द से जल्द उसके घर पहुँचाया जा सके। पुलिस जांच में फरहीन के घरवालो ने बताया कि फरहीन कई बार घर से भाग चुकी है इसलिए उसके पैरों में जंजीरे लगा दी गई थी। वहीं बाल कल्याण समिति की सदस्य कनकलता द्विवेदी और प्रतिभा श्रीवास्तव ने अग्रिम कार्यवाही सुनिश्चित करते हुए महिला हेल्प लाइन के द्वारा फरहीन को उसके परिजनों को सुपुर्द कर दिया गया हैं।

देवरिया बाल कल्याण समिति की सदस्य कनकलता द्विवेदी और प्रतिभा श्रीवास्तव के अथक प्रयासों की ही देन है कि फरहीन को महज 36 घण्टो के अंदर ही उसके परिजनों तक पहुँचा दिया गया।

तेलू-चिंटू ने उस्‍तरा लेकर "आका" की नाक काट डाली

: पत्रकारों की भाषा और संवेदनाओं का खुलासा करती इस पोस्‍ट को निहारिये तनिक : अपनी ही कार्यकारिणी सदस्‍य को भिखमंगा साबित कर दिया हेमंत तिवारी के तेल-लगाऊ चंटू ने : अल्लाह आपको फिर पहले वाला बिंदास संजोग वाल्टर बना दे :

कुमार सौवीर

लखनऊ : जिन लोगों को क्षेत्रीय या ग्रामीण पत्रकारों की भाषा पर ऐतराज होता है, उनके लिए एक हकीकत आपके सामने है। इस हकीकत से साबित होता है कि राजधानी में सत्‍ता की दलाली के चक्‍कर में धमाचौकड़ी मचाने वाले पत्रकारों की असलियत क्‍या होती है। खुद को राज्‍य मुख्‍यालय पर मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार का बिल्‍ला चिपकाये लोगों ने एक वरिष्‍ठ पत्रकार के प्रति जिस तरह की संवेदनहीनता का प्रदर्शन किया है, वह घटिया तो है ही, साथ ही भाषा की ऐसी की तैसी करते हुए उनके पत्रकारीय दावों की छुच्‍छी भी निकाल कर फेंके दे रहा है।

मामला है एक पत्रकार संजोग वॉल्‍टर का। संजोग उप्र राज्‍य मुख्‍यालय पत्रकार समिति के कार्यकारिणी सदस्‍य हैं। संजोग पिछले कई बरसों से मुख कैंसर से पीडि़त हैं। दो साल पहले उनका एक बड़ा ऑपरेशन दिल्‍ली में हुआ था, जिसमें उनके जबड़े का एक बड़ा हिस्‍सा काट कर फेंक दिया गया था। उसके बाद एक अन्‍य ऑपरेशन की सलाह डॉक्‍टरों ने की थी, मगर उसमें आने वाले खर्च का वहन कर पाने में असमर्थ संजोग ने सरकार से अर्जी लगायी थी और मुख्‍यमंत्री सहायता कोष से तकरीबन चार लाख रूपयों की रकम जारी करने का अनुरोध किया था। हाल ही संजोग को सरकार की ओर से इस इलाज के फीसदी हिस्‍से का भुगतान मिल गया था। लेकिन इसके बीच अचानक समिति के अध्‍यक्ष हेमंत तिवारी के एक चेले ने हेमंत को मक्‍खन-पॉलिश के लिए एक कमेंट कुछ वाट्सऐप समूहों में प्रचारित-प्रसारित कर दिया, जिसकी भाषा और अभिव्‍यक्ति की शैली निहायत गंवारू, अभद्र, घटिया और संवेदनहीन और अपमानजनक भी थी। इस पर बेहद शालीनता के साथ संजोग ने एक पोस्‍ट अपनी फेसबुक वाल पर की है, जिस पर अब ऐसे कमेंट करने वाले पत्रकार की थूथू हो रही है।

यह पोस्‍ट डाली है एक शाश्‍वत नामक पत्रकार ने, जो हेमंत तिवारी के खेमे का खासमखास माना जाता है। इस पत्रकार ने लिखा कि :- "हेमंत जी को बहुत बधाई। उनके सफल प्रयासों से संजोग वॉल्‍टर को 196000 रूपयों की एक बड़ी रकम इलाज के लिए मिली गयी है। ( सभी जानते हैं कि संजोग काफी समय से माउथ कैंसर से जूझ रहा है। वह लम्‍बे समय से पैसे के लिए इधर-उधर भटक रहा था। "

जाहिर है कि इस अपमानजनक भाषा-शैली से संजोग का काफी दुख हुआ, लेकिन इसके बावजूद संजोग वाल्‍टर  ने बेहद संयमित तरीके से अपना रोष व्‍यक्‍त किया। संजोग ने लिखा था कि:- "भाई अध्यक्ष जी को 24 मई को ही धन्यवाद् दे दिया । पर यह भाषा उचित नहीं है हम लोग अपने नौकरों से भी इस शब्दवाली का प्रयोग नहीं करते हैं."भटक रहा था"वक्त सबका एक सा नहीं रहता है। भाषा पर ध्यान दें। इस कार्य के मिठाई नहीं बाटी जा सकती है। बुरे वक्त में सरकार के सहयोग की सराहना की जा सकती है। लेकिन धन राशि मेरे इलाज के लिए नहीं थी। यह राशि बहुत बड़ी नहीं 50 फीसदी है। रातों के राजा के लिए यह शब्दवाली ठीक नहीं हैं। अच्छा बुरा वक्त सबके साथ होता है।"

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार पत्रकारिता

Ajay Kumar Maurya : Din aur samay ek se ni rhte hain

Rajesh Singh : संजोग भाई आपने बिल्कुल सही कहा। रात के बाद सुबह होती है

Shafaeen Quraishi Shafaeen : Kuch log pade likhe jahil hote hai...

Obaid Nasir : अपना जर्फ़ दिखा रहे हैं

Tauqeer Siddiqui : sanjog bhai agar aapko koi madad mili hai to jayaz mili hai. baqi baton pr dhyan mat deejiye. dunia mein har tarah ke log hote hain.

Sheebu Nigam : सही कहा बिल्कुल गलत है

Shabahat Vijeta : संजोग भाई, दिल पर मत लें, जब अच्छा वक्त नहीं रहता तो बुरा भी नहीं रहेगा. इस बीमारी में आपने बहुत तकलीफ सही है. अल्लाह आपको फिर पहले वाला बिंदास संजोग वाल्टर बना दे.

Muhammad Parwaan Ansari : Agree with you Sanjog bhai.....

Tauqeer Siddiqui : sanjog bhai tum to hamesha raton ke raja raje ho, 25 saal se to main hi jaanta hoon. waise shabd achchhe hon to buri baat bhi buri nahin lagti, par shabdon ke chayan kala sabko nahin aati.

Naved Naqvi : बीमारी अौर गरीबी वक़्त देख कर नही आती

Rizwan Khan : कमीने पन की भाषा , घमण्ड इंसान के अंदर है अल्लाह न करे इसको कभी कुछ हो , बस वर्ना ये तो कहि का नही रहेगा। अखिलेश चन्द्रा शब्दों का चयन उनकी पत्रकारिता का स्तर दिखा रहा है मित्र.... अन्यथा न लें और कार्य पर ध्यान दे

Ikrar Husain : आप पत्रकार कह रहे हैं मुझे तो पत्रकार के रूप में दलाल प्रतीत होता है यह शख्स इसकी भाषा शैली का अध्यन करने के बाद।

Neena Alini : yeh to sansakar hai jo ma bap daetae hai jaisa sikha waisa hi to bolega

Neeraj Mishra : निम्न स्तरीय भाषा

कुकुरमुत्‍ते पत्रकारिता के

Journalist Ajay Srivastava Ajeya : दोस्तों..सभी को अपने से वरिष्ठों और बड़ों का सम्मान करना चाहिए। दर्द संजोग जी का केवल इतना है जो लाज़मी है। वो हर हाल में मिलना ही चाहिए

Ashish K Yadav : सही कहा बिल्कुल गलत है जर्फ़ दिखा रहे हैं।

Saira Banu : Ghatiya soach

Zishan Haider Rizvi : अत्यन्त निन्दनीय

Ahmad Jafar : Sahi kaha Sanjog Walter bhai. Kabhi ke din bade kabhi ki raatain

R.S. Sharma : ye bhasa ghatia mansikta ka prateek hai.

Afroz Agha : Kya saashwat bhi ab journalist ho Gaya ?

Nayi Pehchaan : Afsos ke jo log dusro ko Rasta batate hain unko bhatka hua kon kah sakta haie sanjog Bhaie ap ne Accha kea jo bhatke hue ko Rasta Bata diea

Kumar Sauvir : इसमें बुरा क्या है संजोग जी? बुरा मत मानिए। राजा-महाराजों के इशारे पर जीने-सोचने-बोलने वाले लोग हमेशा अशिष्ट ही होते हैं। कोसना हो तो रिंग-मास्टर को तलब कीजिये न। सरेआम।

Kumar Sauvir : वैसे इस सहायता का श्रेय किस को जाता है। अध्यक्ष अथवा आपके प्रयास को?

और जहां तक मेरी जानकारी है कि इस बारे में असल अर्जी तो आपने खुद ही सरकार को भेजी थी

Touqir Qidwai : कुछ लोग ज़मीन पर अमृत पीकर आये है ना वो बीमार होंगे और न ही,,,

Sanjay Azad : गुस्ताख़ी माफ करें इसके पहले अध्यक्ष कौन थे ??????????? संजोग भईया ये आप के अथक प्रयासों का ही नतीजा है।  एक बात कहना चाहूंगा वो ये कि जब देना ही था तो मेरे हिसाब से 100% देकर खत्म कर देते ।

Amir Ali जिसकी जैसी सोंच थी, उसने उतना जाना मुझे।।।

बुरा वक़्त देख कर नहीं आता मियाँ, वक्त ही मारता है ज़ालिम के मुँह पर ज़ननाटे दार थप्पड़

जो साक्षात देवराज था, शैक्षिक-साजिशों ने मार डाला

: पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के पूर्व रजिस्‍ट्रार का निधन, देर शाम हुई इस घटना से शैक्षिक जगत में हाहाकार : सरल, विद्वान, कर्मठ कुलसचिव से कुलपति से तनातनी की चर्चाएं : पिछले बरस शिक्षक दिवस के आसपास ही हुआ था उनका निलम्‍बन, कारण अब तक अनजान :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यूपी के शिक्षा-आगारों में शिक्षकों या गैर-शिक्षणेत्‍तर कर्मचारियों-अधिकारियों की हरकतों के किस्‍से किसी भी शिक्षालय के किसी भी कोने-कुतरे में बिखरे मिल जाना किसी भी दुर्गन्‍ध की तरह कभी भी महसूस किया जा सकता है। भले वह शिक्षक-अशिक्षक की गतिविधियां हों, या फिर यौन-शोषण। न्‍यूनतम पायदान तक लगातार फिसलती जा रही शिक्षा हो, या फिर भारी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भ्रष्‍टाचारों की कहानियां। हर किस्‍से के केंद्र में शिक्षक अथवा गैरशिक्षक ही होता है। लेकिन शिक्षा जगत में एक ऐसा भी कुलदीपक था, जिसके ज्ञान, सरलता, शिक्षा, विद्वता के सामने हर शख्‍स शीश झुकाता था, जाति, पद, धर्म की सीमाओं से कोसों दूर।

लेकिन आज वही शिक्षा-प्रशासक का आज प्राणान्‍त हो गया। उनका नाम था डॉक्‍टर देवराज। पिछले नौ महीनों से सतत प्रशासनिक और सरकारी उत्‍पीड़न की गहरी साजिशों से जूझ रहे रजिस्‍टर देवराज कई लगातार गहरे अवसाद में चले गये थे। विश्‍वविद्यालय में चल रही चर्चाओं के अनुसार डॉ देवराज की मृत्‍यु पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय में चल रही घटिया शैक्षिक-साजिशों का परिणाम है। खबर है कि शनिवार की देर शाम उन्‍होंने अपना प्राण त्‍याग दिया और ब्रह्माण्‍ड-व्‍यापी हो गये। कुलसचिव के तौर अपने दायित्‍वों पर हमेशा खरे उतरे जाते रहे देवराज को गीता और भागवत का भावार्थ तक कण्‍ठस्‍थ था।

विश्‍वविद्यालय में देवराज के निलम्‍बन की खबर किसी पहाड़ टूटने जैसी महसूस की गयी। सबसे बड़े आश्‍चर्य की बात यह रही कि उप मुख्‍यमंत्री के निर्देश पर देवराज का निलम्‍बन हुआ था। बताते हैं कि विश्‍वविद्यालय के कुलपति डा राजाराम यादव से उनकी तनातनी शुरू से ही बनी रही थी। हालांकि कोई प्रत्‍यक्ष कारण तो सामने नहीं आया, लेकिन सूत्र बताते हैं कि देवराज के विरूद्ध कोई भी कदम उठाने से कुलपति यादव हिचकते नहीं थे। विश्‍वविद्यालय में चल रही चर्चाओं के अनुसार कुलपति को यह देवराज फूटी कौड़ी भी पसंद नहीं करते थे, और हमेशा इसी जुगत में रहते थे कि देवराज को सड़क के कंकड़ की तरह नजर से दूर कर दिया जाए। उधर एक सूत्र ने बताया कि कुलपति द्वारा विश्‍वविद्यालय में हो रही पदस्‍थापन सम्‍बन्‍धी कार्रवाइयों से कुलपति असहमत बताये जाते थे।

कुछ भी हो, एक देव-तुल्‍य शख्‍स थे देवराज, यानी डॉक्‍टर देवराज। प्रतापगढ़ के रहने वाले देवराज जाति के तौर पर तो पटेल यानी कुर्मी अर्थात कूर्मि-क्षत्रिय कुल में जन्‍मे, लेकिन शिक्षालयों के विशालकाय जगत माने जाने वाले वीरबहादुर सिंह पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय, जौनपुर के कुल सचिव के ओहदे पर थे।

देवराज प्रदेश के किसी भी विश्‍वविद्यालय में कुल सचिव के पद पर सुशोभित करने वाले इकलौते शीर्ष अधिकारी थे, जिन्‍हें डी-लिट की उपाधि हासिल थी। देवराज की पहचान एक प्रशासक के तौर पर तो थे ही, लेकिन उससे ज्‍यादा उनकी ख्‍याति उनकी विद्वता और सरलता को लेकर भी रही। अपने जीवन में पारिवारिक तानाबाना पर बेहद प्रताडि़त शख्‍स माने जाने वाले देवराज की छवि मूलत: बेहद भावुक, खुला दिल और लोगों के प्रति स्‍नेही भाव रखने वालों की थी। भागवत और गीता के श्‍लोक और उनकी व्‍याख्‍याएं उन्‍हें कण्‍ठस्‍थ हैं, ऐसा उन्‍हें जानने-पहचानने वाले शिक्षक और कर्मचारी भी मानते थे।

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हर सू जौनपुर

ऐसा भी नहीं कि देवराज में कोई कमी ही नहीं हो। लेकिन सच बात यही है कि जो भी उनकी कमी या गलतियां हैं, वे मूलत: उनकी सरलता के चलते ही थीं। करीब दस साल पहले जब वे कानपुर में सहायक रजिस्‍ट्रार हुआ करते थे, एक भीषण दुर्घटना में उनके हाथ-पैरों की हड्डियां बुरी तरह टूट गयीं। इस हादसे में उनके भाई की मौत भी हो गयी थी। उसके बाद वे डिप्रेशन में आ गये। लम्‍बे समय तक इलाज चला उनका। अन्‍तर्मुखी होते गये देवराज। बाद में उन्‍हें बियर पीने की लत आ गयी। ऐसा नहीं कि वे इसमें टल्‍ली हो जाते थे। लेकिन लोग बताते हैं कि दो-चार बार वे बियर पीकर आ गये थे दफ्तर। लेकिन कभी भी कोई बेईमानी या किसी से कोई बेअदबी उन्‍होंने नहीं की। हालांकि जानकार बताते हैं कि मौजूदा कुलपति से उनकी पटरी जरा कम ही खाती थी। उधर चर्चाओं के अनुसार मौजूदा कुलपति डॉ राजाराम यादव ने डॉ देवराज के खिलाफ यूपी के उप मुख्‍यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा से अपनी प्रगाढ़ता के चलते खूब खाद-पानी डाला था।इस खबर पर प्रकाशित यह फोटो पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो राजाराम यादव की है।

सच बात तो यह है कि इस यूनिवर्सिटी की स्‍थापना के तीस साल के दौरान देवराज इकलौले कुलसचिव थे, जिन पर कोई गम्‍भीर आरोप नहीं लगा था।

और सबसे नीचे है डॉ देवराज की तस्‍वीर। बहरहाल, हम अगले कुछ अंकों तक आपको बतायेंगे कि डॉ देवराज की मौत के मुख्‍य कारक तत्‍व कौन थे, वे शिक्षक थे, क्‍लर्क थे, बाबू थे, बड़े हैसियतदार लोग थे और उन सब ने मिल कर क्‍या-क्‍या नहीं किया। जिसके चलते डॉक्‍टर देवराज इतना अवसाद पर आ गये कि उनके अंग-प्रत्‍यंग तक फेल होते जाते रहे। लेकिन इन कारक-तत्‍वों ने पूरे दौरान खूब मलाई चाटी।


यूपी सचिवालय में काम नहीं, खूब होती है दलाली?

: जुगाड़ लगाना है तो सचिवालय आइये, दलाली कराने का अड्डा बन चुका है उत्तर प्रदेश सचिवालय : जो काम बड़े-बड़े नेता नहीं करा पाते, वो चुटकियों में करा देते हैं सचिवालय के अफसर और बाबू : लोक सेवा आयोग पर सीबीआई जांच को प्रभावित करने की साजिशें :

कुमार सौवीर

लखनऊ : क्या? आपका मनचाहे जिले में ट्रांस्फर नही हो रहा? आपको पीडब्लूडी वाले ठेका नही दे रहे? आपके मोहल्ले की सड़क नही बन रही? घर पर बिजली नही आती? अगर आपके पास भी इस तरह की समस्यायें हैं और कोई आपकी मदद नही कर पा रहा तो हम आपको एक सलाह दे रहे हैं। वो भी बिल्कुल मुफ्त ! किसी सचिवालय कर्मी को पकड़ लीजिए। किसी को भी, भले वह कोई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हो या फिर समीक्षा अथवा उसके ऊपर का कोई अफसर-बाबू। उससे बात कीजिए, डील कीजिए। फिर क्‍या, आपका काम चुटकियों में हो जाएगा, कागज-पत्‍तर आपके घर तक पहुंचा दिया जाएगा। अच्छा आप समीक्षा अधिकारी को जानते है? अरे वाह तब तो क्या कहनें। तब इंतजार किस बात का? मिठाई लेकर जाइय्ये और काम निकलवाइये।

जी हां, ये सौ फीसदी सच बात है। दरअसल वर्षों से उत्तर प्रदेश सचिवालय लॉबींग का गढ़ बन चुका है। कोई भी काम हो कैसा भी काम हो, सचिवालय कर्मों की मदद से वो मिनटों में हो जाता है। और अब हाल ही में खबर आई है की कुछ अधिकारी जो 2012-2017 के दौरान उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा विभिन्न परीक्षाओं के जरिये चयनित हुए हैं और वर्तमान में आयोग में चल रही सीबीआई जांच से परेशान हैं, वे सब अधिकारी एकजुट हो रहे हैं। एक सचिवालय के समीक्षा अधिकारी के माध्यम से जांच की आंच से बचने का जुगाड़ लगा रहे हैं।

एक जानकार ने यह जानकारी प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम के संवाददाता को दी है। उसका कहना है कि हालात अब लगातार बदतर होते जा रहे हैं, और ऐसी हालत में सरकार को इस बात का तुरंत संज्ञान लेना चाहिये और जांच करानी चाहिये। दरअसल सचिवालय में तैनात कर्मचारी व अधिकारी दिनभर सत्ता शीर्ष के करीब रहते हैं। चाहें व मंत्री हों, मुख्यमंत्री हों अथवा नौकरशाही के प्रमुख सचिव या मुख्य सचिव। सबके इर्द-गिर्द फाइल लेकर दिनभर सचिवालय के ही अफसर घूमते हैं। एसे में बहुत से सचिवालय कर्मी शासन के दुलरुआ हो जाते हैं जिसका फायदा वे बखूबी उठा लेते हैं।

सचिवालय कैडर के एक रिटायर्ड विशेश सचिव तो अपने ज़माने में इतने ताकतवर कहे जाते थे की लोग बताते हैं की उनकी शिकायत पर कई जिलों के कलेक्टरों के भी तबादले हो जाया करते थे। हमारा मानना है की अगर आपको ईश्वर ने ताकत दी है तो उसे लेकर आग मूतना ठीक नही है। उससे बेहतर है आप उसका सदउपयोग करें। अगर आप दिनभर मुख्य सचिव के पीछे टहल रहे हैं तो आप किसी अधिकारी के लिये दलाली करने के बजाय किसी गरीब की समस्या का निपटारा कर दीजीये। आपको पैसा तो नही मिलेगा पर दुआयें खूब मिलेंगीं।

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