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सैड सांग

मुस्लिम महिलाओं में खतना, सुप्रीम कोर्ट ने पूछे सवाल

: दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में लड़कियों के जननांग विघटन की परम्‍परा पर सवाल : यूएसए, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत करीब 27 अफ्रीकी देशों में इस परम्‍परा पर कड़ी रोक : केरल और तेलंगाना समेत कई राज्‍यों में बोहरा मुस्लिम समाज में स्‍त्री-खतना जारी :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्‍ली : स्‍त्री-खतना की परम्‍परा पर सुप्रीम कोर्ट ने आज गहरी चिंता जतायी है। दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में अबोध लड़कियों के मादा जननांग विघटन की परम्‍परा पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि यह परम्‍परा लड़की के शारीरिक "अखंडता" का उल्लंघन करता है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल को केंद्र का प्रतिनिधित्व करते हुए बताया कि यह अभ्यास लड़की बच्चों को अपूरणीय नुकसान पहुंचाता है और उन्हें प्रतिबंधित करने की आवश्यकता है।

खतना तो सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान है, रोगों का इलाज नहीं

उन्होंने खंडपीठ को बताया, जिसमें जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचुद भी थे, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और लगभग 27 अफ्रीकी देशों जैसे देशों ने इस अभ्यास पर प्रतिबंध लगा दिया है। मुस्लिम समूह के लिए उपस्थित वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी ने कहा कि मामला संविधान बेंच को संदर्भित किया जाना चाहिए क्योंकि यह धर्म की आवश्यक अभ्यास के मुद्दे से संबंधित है जिसे जांचने की आवश्यकता है।

खंडपीठ ने कहा, "एक व्यक्ति की शारीरिक अखंडता धर्म और उसके आवश्यक अभ्यास का हिस्सा क्यों होनी चाहिए," इस अभ्यास ने एक लड़की के शरीर के "अखंडता" का उल्लंघन किया। "किसी और का नियंत्रण क्यों होना चाहिए एक व्यक्ति की जननांगों पर, "यह कहा। संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, वेणुगोपाल ने केंद्र के रुख को दोहराया और कहा कि इस अभ्यास ने बालिका के विभिन्न मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया और इसके अलावा, इस तरह के जननांग विघटन के उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।

आइये जुझारू वकील सुनीता तिवारी का स्‍वागत कीजिए, और स्‍त्री-खतना की दर्दनाक तस्‍वीरें देखना चाहते हों तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

महिला का खतना का मतलब है बेरहमी से कत्‍ल

दूसरी ओर सिंघवी ने इस्लाम में पुरुष खतना (खटना) के अभ्यास को संदर्भित किया और कहा कि सभी देशों में इसकी अनुमति है और यह स्वीकार्य धार्मिक अभ्यास है और सुनवाई स्थगित करने की मांग की गई है। खंडपीठ ने अब पीआईएल तय कर दी है 16 जुलाई को सुनवाई के मुद्दे पर वकील सुनीता तिवारी ने दायर किया। इससे पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने केरल और तेलंगाना को पीआईएल के पक्ष बनाने का आदेश दिया था, जिसने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों की महिला जननांग उत्परिवर्तन के अभ्यास को चुनौती दी है। इसने आदेश दिया कि केरल और तेलंगाना जैसे राज्य, जहां बोहरा मुस्लिम समुदाय रहते हैं, को मुकदमेबाजी के पक्ष भी बनाया जाना चाहिए और उन्हें भी नोटिस जारी करना चाहिए। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के मामले में पहले से ही राज्य हैं।

अदालत ने 8 मई को दिल्ली स्थित वकील सुनीता तिवारी द्वारा उठाए गए मुद्दों की जांच करने पर सहमति व्यक्त की थी कि महिला जननांग उत्परिवर्तन का अभ्यास "बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील" था। उसने नोटिस जारी किए थे और महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली के अलावा महिला और बाल विकास सहित चार केंद्रीय मंत्रालयों से जवाब मांगा था, जहां शिया मुस्लिम हैं, दाऊदी बोहरा मुख्य रूप से रहते हैं। तिवारी ने अपनी याचिका में केंद्र और राज्यों को देश भर में 'खटना' या "मादा जननांग उत्परिवर्तन" (एफजीएम) के अमानवीय अभ्यास पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। "

याचिका ने एफजीएम को एक अपराध बनाने की दिशा मांगी है जिस पर कानून प्रवर्तन एजेंसियां ​​स्वयं पर संज्ञान ले सकती हैं। इसने कठोर सजा के प्रावधान के साथ अपराध को "गैर-संगत और गैर-जमानती" बनाने की भी मांग की है। कानून और न्याय मंत्रालय, सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय को याचिका के पक्ष भी दिए गए हैं, जो संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न सम्मेलनों को संदर्भित करते हैं, जिन पर भारत हस्ताक्षरकर्ता है। याचिका में कहा गया है कि मादा जननांग उत्परिवर्तन के अभ्यास के परिणामस्वरूप पीड़ितों के बुनियादी मौलिक अधिकारों के गंभीर उल्लंघन हुए हैं, जो इन मामलों में नाबालिग हैं। एफजीएम "अवैध रूप से लड़कियों (पांच साल के बीच और युवावस्था प्राप्त करने से पहले) पर" अवैध रूप से "किया जाता है और" बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, मानव अधिकारों के संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक घोषणा के खिलाफ है, भारत भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है ", याचिका ने कहा, इस अभ्यास को "एक लड़की के शरीर के लिए स्थायी रूप से अक्षमता" के कारण जोड़ा गया।

गंगा तो पहचान है बनारस की, इसे गंदा मत करिये प्लीजः प्रो रिजवी

"खटना 'या' एफजीएम 'या' खफद 'का अभ्यास लिंगों के बीच असमानता पैदा करने और महिलाओं के प्रति भेदभाव करने के लिए भी है। चूंकि यह नाबालिगों पर किया जाता है, इसलिए यह बच्चों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन का भी उल्लंघन करता है क्योंकि यहां तक ​​कि नाबालिग याचिका में कहा गया है कि व्यक्ति की सुरक्षा, गोपनीयता का अधिकार, शारीरिक अखंडता और क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार से स्वतंत्रता का अधिकार है। "यह किसी भी चिकित्सा कारण के बिना दाऊदी बोहरा धार्मिक समुदाय के भीतर हर लड़की के बच्चे पर एक अनुष्ठान किया जाता है और कुरान में कोई संदर्भ नहीं है। यह बच्चे और मानवाधिकारों के अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का भी उल्लंघन करता है और 1 99 6 के अवैध आप्रवासन सुधार और आप्रवासी उत्तरदायित्व अधिनियम के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका में एक अपराध है और अब ऑस्ट्रेलिया और कुछ में अपराध अन्य देशों के साथ ही, "यह दावा किया। भारत में अवैध कानून घोषित करने के लिए एफजीएम या खटना पर प्रतिबंध लगाने का कोई कानून नहीं है।"

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खतना

छिछोरे लफंगों से कम नहीं हैं यह वरिष्‍ठ पत्रकार

: नौकरी छोड़ने पर इस पत्रकार ने भेजी एक कड़ी चिट्ठी : रश्मि का टर्मिनेशन गम्‍भीर सवाल उठाता है, गजेंद्र अवसाद में : एग्जिट इंटरव्यू में लिखा कि नौकरी न छोड़ी, तो उसकी मौत हो जाएगी : लांछन सब पर, पूरा क्रेडिट खुद लेने की साजिशें अखबार को नष्‍ट करेंगी : मासिक-धर्म- दो :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्‍ली : (गतांक से आगे) राजुल सर, क्या हम लड़कियां इसलिए रिक्रूट हो रही हैं?  क्या यह संस्थान की प्रमाणिकता पर धब्बा नहीं लगाता?

मेरे सीनियर गजेंद्र जी तो संपादक जी के व्यवहार के कारण अवसाद में चले गए थे, जिसका उन्हें इलाज कराना पड़ा। बाद में अच्छा अवसर मिलने पर इस्तीफा दे गए। यहां भी विनीत जी ने खेल किया, इस्तीफे की बात पूरी टीम से छुपाकर रखी, आरबी लाल जी , अनूप जी , शशांक जी और  अशोक वैश्य जी से प्रचारित कराया कि गजेंद्र डरकर भाग गए, बिना सूचना दिये! उन्हें भगोड़ा तक कह गया! एक बार गजेंद्र जी से हो रहे बर्ताव पर मैंने अपनी बात रख दी थी तो  मेरे पीछे मुझे उनकी 'सहेली' बता दिया गया। ये बहुत ही हल्की बातें हैं पर शायद वे इसको भी तर्कों से ढंक सकते हैं।

बहुत ही योग्य व्यक्ति चीफ सब नीरज श्रीवास्तव जी को भी जूनियर्स के सामने बहुत प्रताड़ित किया गया, वो झुके नहीं तो साइड लाइन कर दिए गए।  कागज़ मजबूत रखने को वो दो डाक के हेड थे पर वास्तविकता में उनसे उस टीम में जूनियर के साथ बैठाकर काम लिया गया, जिस पूरी टीम के वह दो साल तक वह क्लस्टर हेड रहे।

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पत्रकार पत्रकारिता

इंटर्न से ट्रेनी तक का मेरा सफर बहुत आदर्श और सीख भरा रहा। पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में कोई भी एक जुनून के कारण आता है, वह पनपता तब ही है जब उसके जोश में पत्रकारिता के सिद्धांत और व्यवहारिक हालात बताते हुए तपाया जाए, उससे खबरों पर बात की जाए। उसे समझने, लड़खड़ाकर फिर उठने का समय दिया जाए। दो साल ट्रेनी रहने के दौरान मुझे मॉड्यूल के मुताबिक हर चरण में हर बात सिखाई गयी। मैं खुद को लकी मानती हूँ इस माहौल के लिए।

उदय सर आपको शायद ही याद हो पर मैंने आपको बताया था कि मेरे लिए दो साल कितने महत्वपूर्ण रहे । इंटरव्यू के दौरान मुझे प्रेरित करने को आपने अपने शुरुआती दौर के अनुभव बताकर मुझसे ऐसे ही मेहनत करने को कहा। आप बोले कि मुझमें आपको भविष्य का संपादक दिख रहा है। किसी भी फ्रेशर की तरह यह सुनना और वह इंटरव्यू मेरे जीवन के लिए ख़ास बन गया। पर अगर संपादक विनीत सक्सेना जैसे होते हैं तो मैं कभी नहीं चाहूँगी कि मैं यह बनूं।

जुयाल सर और उस समय के सभी वरिष्ठ साथियों ने जो माहौल दिया, उसके लिए मैं खुद को लकी मानती हूं। पर सर्वेश लकी नहीं रहा, करियर के शुरुआती दौर में उसे निराश होकर इस्तीफा देकर जाना पड़ा। उसकी ट्रेनिंग में कोई मॉड्यूल का पालन नहीं हुआ, वो मेहनती था, जल्दी समझ लेता था तो उसे जोत दिया गया। उसे प्रेशर हैंडल करने गिरने और संभलने का मौका ही नहीं मिला। इस बीच उसने उदय सर आपको कॉल और लिखित में हालात भी बताए। रश्मि जी को अचानक टर्मिनेट किये जाने और ऑफिस की मुर्दा चुप्पी से वह बहुत टूट गया। उसे शशांक वर्मा ने बाकायदा निकलवा देने की धमकी दी। वो किस हाल में पहुंच गया था यह समझने के लिए इतना ही काफी है कि उसने अपने एग्जिट इंटरव्यू में लिखा कि अगर कुछ दिन और यहां काम किया तो उसकी मौत हो जाएगी! मुझे नहीं पता एचआर को यह कितना गंभीर मामला लगा हो? पर ट्रेनी बैच में मेरा जूनियर होने के नाते मेरे लिए यह बेहद निराशाजनक था। मैं समझती हूँ कि अगर किसी ट्रेनी को इतना सहकर जाना पड़े तो यह किसी भी संस्थान के फेल होने की स्थिति है।

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सुरमा वाले बरेली का झुमका

रश्मि जी के साथ क्या हुआ और क्यों हुआ , इसकी असलियत से सब वाकिफ़ हैं। मैं सिर्फ इतना समझना चाहती हूँ कि क्या संस्थान में व्यक्तिगत हित साधना इतना आसान है?

विनीत सक्सेना ने दो लोगों को चमचा बना दिया, अनूप शर्मा और शशांक वर्मा। दोनों कभी ऐसे नहीं थे, यह मेरा नहीं सबका अनुभव है। ऐसा लगता है कोई गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है, दोनों जानते हैं कि दूसरों को नहीं काटा तो खुद मारे जाएंगे। विनीत सक्सेना जब कभी बरेली से जाएंगे तो इस दोनों को कोई स्वीकार नहीं कर पायेगा। खुद को अमर उजाला में ह्यूमन रिसोर्स क्लीनर की भूमिका में मानने वाले विनीत सक्सेना फक्र से बताते हैं कि उनके आने पर छटनी होती है। वह हर टीमवर्क का क्रेडिट खुद लेते हैं, कहते हैं कि सिर्फ एक दो स्ट्रिंगर से पूरा अखबार निकल सकते हैं, उन्हें अमर उजाला की पद व्यवस्था में विश्वास नहीं। गाड़ी से ज़रूरी पहिये निकाल लिए जाएं तो क्या गाड़ी चल सकती है? क्या नोएडा कार्यालय का वर्क कल्चर भी यही है, क्या वहां भी अवकाश की जगह गालियां मिलती हैं,

लड़कियों को रात के दो-दो बजे तक घर अपने रिस्क पर जाना होता है, लड़कियों के बाथरूम जाने के टाइम तक पर नज़र रखी जाती है???  मुझे पता है ऐसा नहीं है पर फिर छोटे शहरों में मनमानी क्यों, यह जानना चाहूँगी। जो भी लोग वहां काम कर रहे हैं सब सिर्फ अपनी-अपनी मजबूरी में। मैं भी मजबूर थी अपने कमिटमेंट से कि जिस संस्थान ने मुझे ज़िन्दगी दी उसे किसी के व्यवहार के कारण भर से नहीं छोडूंगी पर बाद में जो हुआ वो अस्वीकार्य था।

मैंने सोचा था कि जो हो रहा है वो सब आप तक पहुंचता ही है इसलिए कुछ कहने का मतलब नहीं। पर संदेश शायद मोल्ड हो रहे हैं। इसलिये यह लंबा लेटर लिखा है। साथ में वह मेल अटैच है जिसपर स्पष्टीकरण मांगा गया। मैं घुटन से निकल चुकी हूं, जानती हूं कुछ होगा भी नहीं। बस एक विनती है कि वहां बचे लोग अब और न घुटें।

सादर

आपकी ही एक सम्‍पादकीय सहयोगी

(नाम गोपनीय)

नोट:- यह है उस महिला पत्रकार का इस्‍तीफा, जिसमें अपनी नौकरी तब छोड़ी, जब उसे बदतर हालात तक उत्‍पीडि़त किया गया। उस महिला पत्रकार के अनुरोध का सम्‍मान करते हुए हम उसका नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, हालांकि मूल पत्र में इस महिला ने अपना नाम दर्ज किया था। यह अंक में इस पत्र का आखिरी हिस्‍सा दर्ज है। इसके पहले वाले हिस्‍से को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

मासिक-धर्म की बात सुनते ही अपना ही धर्म भूल गया संपादक

इस महिला पत्रकार ने तो अपने साथ लगातार होते जा रहे अपमान, और उत्‍पीड़न को एक सीमा तक सहन किया, लेकिन पानी जब नाक से ऊपर जाने लगा तो उसने अपने संस्‍थान के प्रबंधन तक अपनी शिकायत दर्ज की, और उस संस्‍थान को बाय-बाय कर दिया। आपके आसपास भी ऐसी घटनाएं पसरी ही होती होंगी। हो सकता है कि वह उत्‍पीडि़त महिला आप खुद हों, या फिर आपकी कोई सहेली-सहकर्मी अथवा कोई अन्‍य। इससे क्‍या फर्क पड़ता है कि आप किसी अखबार, चैनल में काम करती हैं, या फिर किसी आउटसोर्सिंग या मल्‍टीनेशनल कम्‍पनी की कर्मचारी हैं।

अगर आपको ऐसी किसी घटना की जानकारी हो तो हमें भेजिएगा। नि:संकोच। आपके सहयोग से हम ऐसे हादसों-उत्‍पीड़नों के खिलाफ एक जोरदार अभियान छेड़ कर ऐसी घिनौने माहौलों को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। आप हमें हमारे इस ईमेल पर सम्‍पर्क कर सकते हैं। आप अगर चाहेंगे, तो हम आपका नाम नहीं प्रकाशित करेंगे।

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बातें भले ही बड़ी-बड़ी होती हों खबरों की दुनिया में, लेकिन सच बात तो यही है कि समाचार-संस्‍थानों में आज भी लैंगिक-भेदभाव मौजूद है, और खूब है। बरेली के दैनिक अमर उजाला नामक समाचारपत्र में एक महिला पत्रकार के साथ जो हरकत हुई, वह पत्रकारों की दुनिया में अनोखी नहीं मानी जा सकती है। इससे सम्‍बन्धित एक वीडियो हम आपको दिखा रहे हैं, जिसे देखने के लिए आप कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं:-

थोथा चना, बाजै घना

यह है उस महिला पत्रकार का इस्‍तीफा, जिसमें अपनी नौकरी तब छोड़ी, जब उसे बदतर हालात तक उत्‍पीडि़त किया गया। उस महिला पत्रकार के अनुरोध का सम्‍मान करते हुए हम उसका नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, हालांकि मूल पत्र में इस महिला ने अपना नाम दर्ज किया था। यह पहला अंक उस पत्र का पहला हिस्‍सा है। पत्र का बाकी हिस्‍सा पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

मासिक-धर्म की बात सुनते ही अपना ही धर्म भूल गया संपादक

मासिक-धर्म की बात सुनते ही अपना ही धर्म भूल गया संपादक

: एक बड़े अखबार-समूह के प्रबंधन पर एक महिला पत्रकार ने उछाले कई गम्‍भीर सवाल : तो इस तरह मैं अपनी मेंस्ट्रुअल लीव के लिए दोषी साबित हो गयी : चुप्पी सिर्फ खुद को सेफ रखने का भ्रम भर है, एक दिन इस चुप्पी में ही सब खत्म हो जायेंगे : मासिक-धर्म- एक :

मेरी बिटिया संवाददाता

नई दिल्‍ली : आदरणीय एमडी सर एवं ग्रुप एडिटर सर,

नमस्कार। मैं अमर उजाला संस्‍थान के बरेली संस्‍करण की यूनिट में वर्ष 2015 से काम कर रही थी। दो साल ट्रेनी रहने के बाद अगस्त 2017 में मुझे जूनियर सब एडिटर पद दिया गया। पिछले मंगलवार यानी 17 अप्रैल को मैंने पद से इस्तीफा दे दिया या कहूं ऐसे हालात पैदा किये गए जो मेरे पास कोई और उपाय नहीं बचा।

जाने आप अवगत हैं या नहीं, अगर नहीं तो क्यों नहीं .... संपादकीय विभाग के हालात बदतर हो गए हैं। अनुशासन और बड़ों के सम्मान के नाम पर शुरू हुई सख्ती कब बेइज़्ज़ती और बंधुआ मजदूरी में बदल जाएगी, इसका अंदाज़ा शायद ही संपादकीय विभाग के किसी साथी को रहा हो। जब से विनीत सक्सेना जी ने प्रभार संभाला, रिपोर्टिंग टीम में किसी को भी साप्ताहिक अवकाश तक नहीं दिया जा रहा है। पहले अमूमन रात दस बजे तक घर चले जाने वाले रिपोर्टर अब रात दो बजे तक यहां बैठे झींकते रहते हैं।

मैं लगातार 14 दिन से काम कर रही थी, मेंस्ट्रुअल टाइम पर भी काम करने से तबीयत बिगड़ गयी। इसलिए पिछले सोमवार 9 अप्रैल को मैं संपादक जी से अवकाश मांग कर घर गयी। अगले दिन भी तबीयत ठीक न होने पर मैंने उन्हें कार्यालय न आ पाने की सूचना दी। फिर शुक्रवार को उन्हें सूचित किया कि शनिवार से ऑफिस आऊंगी। बावजूद इसके शनिवार को ऑफिस आने पर मुझे प्रताड़ित किया गया। सिटी चीफ अनूप जी ने संपादक जी को मेल करके मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की। मंगलवार के बाद हुए अवकाश के बारे में कोई सूचना न होने की बात दर्शाकर स्पष्टीकरण भी मांगा गया।

बातें भले ही बड़ी-बड़ी होती हों खबरों की दुनिया में, लेकिन सच बात तो यही है कि समाचार-संस्‍थानों में आज भी लैंगिक-भेदभाव मौजूद है, और खूब है। बरेली के दैनिक अमर उजाला नामक समाचारपत्र में एक महिला पत्रकार के साथ जो हरकत हुई, वह पत्रकारों की दुनिया में अनोखी नहीं मानी जा सकती है। इससे सम्‍बन्धित एक वीडियो हम आपको दिखा रहे हैं, जिसे देखने के लिए आप कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं:-

थोथा चना, बाजै घना

शाम के समय जब वह कार्यालय आये तो मेरा जवाब पढ़ने से पहले ही उन्होंने आदेश दे दिया कि मुझसे अब सिटी में काम नहीं लिया जाएगा। न्यूज़रूम में सिटी रिपोर्टिंग, सिटी डेस्क, डाक, पेज 1, सेलेक्ट और पीटीएस टीम के सदस्यों के सामने उन्होंने बहुत खराब ढंग से बात की। बोले , मैं तुम्हें सिटी टीम में नहीं देखना चाहता, तुम्हारी खबरों की यहां मुझे ज़रूरत नहीं है। उन्होंने मुझे अपनी सीट से तुरंत चले जाने को कहा। मैंने उनको बोला भी कि अगर आप मुझसे काम लेना नहीं चाहते हैं, तो संपादक जी से बात करने दीजिए (वह उस वक़्त व्यस्त थे), अगला आदेश मिलने तक क्या मुझे मेरी सीट पर भी नहीं बैठने दिया जाएगा?

खैर, मैं तुरंत संपादक जी के पास गई और कहा कि इस तरह का अवकाश लेना तो मेरा राइट है, इस पर कार्रवाई किस तरह हो सकती है? वह सुनते ही भड़क गए कि मैं इस तरह अधिकारों की बात न करूँ। मुझे बताया गया कि मेरा व्यवहार बहुत खराब है, आदि। बताया गया कि अनूप जी के साथ पहले कभी मेरा व्यवहार ऐसा ज़रूर रहा है, जिससे वह भड़के हैं (हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ) और इस तरह उनका व्यवहार जस्टिफाई हो गया! अनूप जी ने सोमवार को साप्ताहिक बैठक में यह भी घोषित कर दिया कि क्योंकि उन्हें अवकाश की कोई सूचना नहीं इसलिए यह 'लीव विद ऑउट पे मानी जायेगी।

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पत्रकार पत्रकारिता

तो इस तरह मैं अपनी मेंस्ट्रुअल लीव के लिए दोषी साबित हो गयी! फिर स्पष्टीकरण किस खानापूरी के तहत था, यह मैं जानना चाहूँगी। शनिवार को संपादक जी ने अपने केबिन में अनूप जी से कहा गया कि यह महिला अपनी गलतियों के लिए सार्वजनिक माफी मांगने को तैयार है, उसे आखिरी मौका दिया जाए। यह भी कहा गया कि हो सकता है उसके फादर ने उसे सीनियर की इज़्ज़त करना न सिखाया हो, जो अब वो सब मिलकर सिखाएंगे। मैं उस वक़्त किस मानसिक स्थिति में थी, शायद सही तरह लिख नहीं पाऊंगी पर उस रात मैं सो नहीं पाई। बड़ा एहसान करते हुए मुझे आख़िरी मौका जो दिया गया था।

ख़ास बात यह भी है कि जवाब अच्छा न लगने पर मुझसे उस मेल उत्तर दोबारा देने को कहा गया जो मैंने नहीं किया।

जेंडर विषय की विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए यह पैटर्न समझना बड़ा आसान है और पत्रकार के रूप में बेहद दुखद। किस तरह एक लड़की का ऐसे शब्दों को बिना झिझक बोलना, अपनी बात रखना, अपने अधिकार जानना दूसरों की नज़र में लड़की के गिरे हुए संस्कार बन जाता है। फिर पित्तसत्तात्मक मानसिकता उसमें लड़की के मां-बाप की कमी बताती है कि उसे होमली नहीं बनाया जा सका, बिल्कुल किसी ससुराल के जैसे।

मुझे याद है जब पहली बार मैंने विनीत सक्सेना को मेरी तबीयत ठीक न होने का स्पष्ट कारण लिखा तो वो विचित्र तरीके से बोले कि क्या मैं विदेश में पैदा हुई हूँ, क्योंकि हमारे (उनके) संस्कार तो इस बेतुके खुलेपन की इजाजत नहीं देते। उस वक़्त जो बात उन्हें संस्कृति के खिलाफ लगी थी, बाद में मुझे यह भी पता लगा कि उस स्वास्थ्य संबंधी सूचना पर सार्वजनिक चटकारे लिए गए थे! संपादक होने के नाते उनसे गोपनीयता अपेक्षित थी, खैर उन्होंने किसी भी स्तर पर खुद को संपादक की गरिमा के अनुसार नहीं ढाला। मुझे हमेशा वह किसी गुमटी पर पान चबाते छुटभैय्ये क्राइम रिपोर्टर के जैसे लगे जो कुछ भी बोल सकता है, गालियां भी। डांट और दंड से मैं कभी नहीं डरती, ये सुधार के सबसे ईमानदार तरीके हैं। पर जब बात सिद्धांत की आती है तो मुझे यह स्वीकार्य नहीं। ऐसे में सोमवार को तय किया कि अब मुझे यहां और नहीं रहना चाहिए।

विनीत सक्सेना के अपने अनुभवों का असर है या कुछ और, वह हमेशा बहुत खेल करते हैं। नियम के हिसाब से मेरा प्रोबेशन पीरियड 31 जनवरी 2018 को समाप्त हो गया। 1 फरवरी को मुझे जानकारी दे दी जानी चाहिए थी कि मैं कन्फर्म हुई या मुझे एक्सटेंशन मिला है। पर करीब दो महीने मुझे कंफ्यूजन में रखा गया। यह वह समय था जब सीनियर साथी रश्मि भंडारी जी को अचानक टर्मिनेट कर दिया गया था। मैं बहुत मानसिक दबाव में रही कि न जाने कब मुझे भी रश्मि जी की तरह यह सब झेलना पड़े। इस दौरान दो बार एचआर विभाग से मैंने जानकारी ली, बताया गया कि जनवरी में ही उनकी ओर से संपादक को मेल करके प्रोबेशन के संबंध में फैसला लेने को पूछा गया था। रिमाइंडर भेजे जाने पर भी मेल पेंडिंग में है। फिर मध्य मार्च में एक सप्ताहिक बैठक में घोषणा की गई कि अब मेरा काम बेहतर है, मुझे कन्फर्म किया जाएगा, जो 17 अप्रैल तक प्रक्रिया में ही रहा।

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सुरमा वाले बरेली का झुमका

मुझे यकीन है कि अगर चुपचाप 'यस सर' मोड पर काम करती रहती तो ज़रूर किसी रोज़ बैक डेट में कन्फर्मेशन लेटर पकड़ा दिया जाता। न चाहते हुए भी मुझे उस पर दस्तखत करना होता। क्या मानसिक दबाव किसी गिनती में नहीं आना चाहिए?

अपनी टीम से हमेशा विश्वास की अपेक्षा रखने वाले विनीत सक्सेना इतने इनसिक्योर हैं कि आपस में साथी बातें भी करें तो उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ साजिश की जा रही है! बाकायदा बैठक में यह कह भी चुके हैं कि लोग उनके खिलाफ साज़िश कर रहे हैं।  इन सब के बाद अब आफिस में हर कोई एक-दूसरे से बात करने से बचता है। ऑफिस का माहौल सर्विलांस सेल जैसा बन चुका है । जिस जगह रिपोर्टर अपने दिन के 14 से 18 घंटे बिता रहा है, वो एक पल हल्के मन से मुस्कुरा तक नहीं सकता। बाकी डेस्क पर भी हाल समान है। लड़कियां ज़ोर से बोले या हंस दें तो नसीहत दी जाती है कि उन्हें जीवन भर नौकरी तो करनी नहीं, बच्चों को संस्कार देने के लिए तो समझ ही लें।

विनीत जी के पास हर एक कर्मी का चिट्ठा है, बिना बात के मेल और उनका मनमाफिक स्पष्टीकरण। कोई जुबान चलाने की जुर्रत नहीं करेगा क्योंकि हर मंडे मीटिंग में बताया जाता है कि यह पत्रकारिता नहीं नौकरी है। सबकी गलतियों के मेल उनपर हैं, कोई शिकायत तो करके देखे , वह ऊपर जस्टिफाई कर देंगे। इस मानसिक दवाब की भी कोई गिनती नहीं??

नियमों के नाम पर दादागिरी चला रहे विनीत सक्सेना ने अमर उजाला के नियमों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। साप्ताहिक बैठक के मायने अब सिर्फ भाषण देना और गुस्से में गालियां देना भर रह गया है। प्लानिंग मीटिंग में प्लान पर कभी कोई बात ही नहीं होती। बेचारे एनई सर ज़रूर प्लानिंग पूछने की कोशिश करते हैं पर वैश्य जी की समीक्षा और विनीत सक्सेना जी के भाषण के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। लोगों की गलतियों पर सबके सामने उनकी पोस्ट और अनुभव पर सवाल खड़ा किया जाता है। यह किस तरह का सुधारात्मक प्रयास है? मैंने मीटिंग में लोगों को रोते देखा है। पवन चंद्र जी और अभिषेक टंडन जी  को सबके सामने रोते देखना मेरे लिए सबसे दुखद पलों में से है। विनीत सक्सेना जी  ने एक साप्ताहिक मीटिंग में बोल कि जब भी वह सुधार के लिए डांटते हैं तो उसे अभद्रता मान लिया जाता है इसलिए अब वह गांधीगिरी करेंगे। उन्होंने गांधीगिरी को जिस रूप मे परिभाषित किया वो शर्मनाक था। बोले- अब से जो भी गलती करेगा उसकी दिन में दो बार आरती उतरवाई जाएगी, जिसके लिए मैं नोएडा से लड़कियां बुलवा लेता हूँ।  उस दिन मीटिंग में बैठीं हम तीन लड़कियां सन्न रह गईं। (क्रमश:)

यह है उस महिला पत्रकार का इस्‍तीफा, जिसमें अपनी नौकरी तब छोड़ी, जब उसे बदतर हालात तक उत्‍पीडि़त किया गया। उस महिला पत्रकार के अनुरोध का सम्‍मान करते हुए हम उसका नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, हालांकि मूल पत्र में इस महिला ने अपना नाम दर्ज किया था। यह पहला अंक उस पत्र का पहला हिस्‍सा है। पत्र का बाकी हिस्‍सा पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

मासिक-धर्म की बात सुनते ही अपना ही धर्म भूल गया संपादक

नोट:- इस महिला पत्रकार ने तो अपने साथ लगातार होते जा रहे अपमान, और उत्‍पीड़न को एक सीमा तक सहन किया, लेकिन पानी जब नाक से ऊपर जाने लगा तो उसने अपने संस्‍थान के प्रबंधन तक अपनी शिकायत दर्ज की, और उस संस्‍थान को बाय-बाय कर दिया। आपके आसपास भी ऐसी घटनाएं पसरी ही होती होंगी। हो सकता है कि वह उत्‍पीडि़त महिला आप खुद हों, या फिर आपकी कोई सहेली-सहकर्मी अथवा कोई अन्‍य। इससे क्‍या फर्क पड़ता है कि आप किसी अखबार, चैनल में काम करती हैं, या फिर किसी आउटसोर्सिंग या मल्‍टीनेशनल कम्‍पनी की कर्मचारी हैं।

अगर आपको ऐसी किसी घटना की जानकारी हो तो हमें भेजिएगा। नि:संकोच। आपके सहयोग से हम ऐसे हादसों-उत्‍पीड़नों के खिलाफ एक जोरदार अभियान छेड़ कर ऐसी घिनौने माहौलों को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। आप हमें हमारे इस ईमेल पर सम्‍पर्क कर सकते हैं। आप अगर चाहेंगे, तो हम आपका नाम नहीं प्रकाशित करेंगे।

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यह है उस महिला पत्रकार का इस्‍तीफा, जिसमें अपनी नौकरी तब छोड़ी, जब उसे बदतर हालात तक उत्‍पीडि़त किया गया। उस महिला पत्रकार के अनुरोध का सम्‍मान करते हुए हम उसका नाम सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं, हालांकि मूल पत्र में इस महिला ने अपना नाम दर्ज किया था। यह पहला अंक उस पत्र का पहला हिस्‍सा है। पत्र का बाकी हिस्‍सा पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

मासिक-धर्म की बात सुनते ही अपना ही धर्म भूल गया संपादक

बीजेपी का सीएम: पहले अहंकार, अब बेशर्मी

: उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री ने जो भी किया, शर्म-ओ-हया को दरकिनार करके : बुजुर्ग शिक्षिका उत्‍तरा पंत को अब त्रिवेंद्र रावत सरकार ने किया सस्‍पेंड : मुख्‍यमंत्री से अभद्रता वाली घटना पर आरोप लगाया कि गैरहाजिर थी उत्‍तरा पंत : शिक्षा सचिव ने दिया मूर्खतापूर्ण कारण :

कुमार सौवीर

लखनऊ : घर का पुरखा, यानी गृह-स्‍वामी हमेशा बेहद शांत, सौम्‍य, ईमानदार, पक्षपातविहीन, और भेदभाव से कोसों दूर रहने वाला माना जाता है। लेकिन यह शर्त अब उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर लागू नहीं होती है। पहाड़ के एक दुर्गम क्षेत्र में सरकारी विद्यालय की बुजुर्ग शिक्षिका उत्‍तरा पंत के साथ जो व्‍यवहार उत्‍तराखंड की सरकार ने की है, इससे एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्‍यमंत्री रावत से कथित अभद्रता के मामले में सरकार ने उस घटना को छिपा लिया है, मगर उस पर केवल इस आधार पर निलम्बित कर दिया है, कि वह काम से गैरहाजिर चल रही थी।

इस मामले में सरकार की तरफ से प्रदेश की शिक्षा सचिव डॉ भूपेंद्र कौर ने स्‍पष्‍टीकरण दिया है। यह पूरा बयान सिरे से बेवकूफी भरा है। कौर बोलीं हैं कि उत्‍तरा पंत काम ही नहीं करती थी, हमेशा गैरहाजिर रहती थी। सन-08 और सन-11 में भी काम से लापता होने पर उसे सस्‍पेंड किया जा चुका है। लेकिन इसके बावजूद सन-15 से सन-17 के बीच वह कई महीनों तक ड्यूटी पर से लापता रही। विगत 9 अगस्‍त-17 को वह फिर लापता रही। लेकिन सन-15 के बाद से उत्‍तरा पंत पर क्‍या कार्रवाई की गयी, उसका कोई भी जवाब डॉ कौर के पास नहीं है। कौर बोली हैं कि उत्‍तरा पंत के गैरहाजिर होने से शिक्षा तबाह होती रही, लेकिन उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की थी त्रिवेंद्र रावत सरकार ने।

उधर उत्‍तरा पंत लगातार त्रिवेंद्र सरकार पर हमला कर रही हैं। उनका आरोप है कि यह अपराधियों की सरकार हैं, और उसके चलते पूरी व्‍यवस्‍था ही तबाह होती जा रही है। स्‍वार्थलिप्‍सा असमान पर है। मुख्‍यमंत्री अपनी पत्‍नी की तो पोंस्टिंग करा ले गये लेकिन मेरे जैसे तमाम लोगों का काम जानबूझ कर बिगाड़ा जा रहा है।

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