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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

मूर्तियों से पूछो न कि कुमार सौवीर क्‍यों हारा ?

: जिन्‍दा समाज हारे हुए शख्‍स को हमेशा याद करता है, अनैतिक रूप से जीतने वाले को नहीं : राणाप्रताप, रानी लक्ष्‍मीबाई, शिवाजी, गुरूगोविंद सिंह जैसे शख्सियतों की प्रतिमाओं को स्‍थापित करने का मकसद समाज को नैतिक बनाना होता है : जीत गया कुमार सौवीर -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कभी दिल्ली से गुड़गांव जाइये। रास्ते में आपको कई अजीबोगरीब अनुभव होंगे। गजब की रफ्तार, कार-वाहनों की भारी रेलमपेल, और देश के हिस्‍से में पसरी विलासिता-ऐश्वर्य प्रमाणित करती लकदक दुनिया। साफ लगेगा कि भारत का यह हिस्सा विजयी हो चुके लोगों की जागीर है। इसी रास्ते में ही आपको मिलेंगी इतिहास पुरुष बन चुके लोगों की विशालकाय प्रतिमाएं। ऐसी सजीव प्रतिमाएं, मानो जैसे आप आधुनिक काल में नहीं, बल्कि भारत के गुप्‍त-वंश काल में बनायी गयी हों।

बस अब इन चीजों को बेहतर तरीके से सोचने और खोजने की कोशिश कीजिएगा। हल्‍की सी कोशिश में ही आप को सब पता चल जाएगा कि यह जो कुछ भी हो रहा है या दिख रहा है वह असलियत में क्या है। इन चीजों के बीच जो लहलहाती सब्‍जबागों की फसल आपको दिखेगी, दरअसल वही तो वह खाई है। तब आपको दिखाई पड़ेगी, इस उल्लास में छिपी भारत के अतीत की असलियत।

तो सबसे पहले तो देखिए महाराणा प्रताप जी की कद्दावर प्रतिमा। फिर आप देखेंगे उस महिला की विशालकाय प्रतिमा, जिसने अपने दत्तक पुत्र छत्रसाल को अपने पीठ में बांध कर नंगी तलवार लहराई और झांसी के किले से करीब डेढ़ सौ फीट के नीचे अपने घोड़े के साथ कूद गई। जी हां, झांसी की मर्दानी रानी लक्ष्‍मीबाई। इसके बाद दिखाई पड़ेंगे शिवाजी जिन्होंने अपने मराठा साम्राज्य को जीतने के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दे दी। वहीं पर दिखाई पड़ेगी आपको गुरु गोविंद की प्रतिमा जिन्होंने अपने धर्म स्थापना के लिए उसूल, नैतिकता,आदर्श को सुरक्षित करने के लिए अपने परिवार ही नहीं बल्कि अपने जीवन का भी अंत कर दिया था। और फिर यूपी और दिल्‍ली-गुड़गांव ही क्‍यों, ऐसी प्रतिमाएं तो हर शहर तक में दिख जाएंगी।

कहने की जरूरत नहीं कि चाहे वह महाराणा प्रताप रहे हो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, वे मराठा शिवाजी रहे हो या फिर सिक्खों के गुरु गोविंद जी, इतिहास गवाह है इन सभी ने हर बार अपनी हार का स्वाद चखा है। मगर अपने नैतिकता, ईमानदारी, आस्था, विश्‍वास और आदर्शों पर तनिक भी ठेस न लगायी। प्राण दे दिया मगर अपने आदर्श नहीं छोड़े और वह भले ही अपने जीवन को खत्म कर चुके हों, हमेशा हारते ही रहे हों, लेकिन सच बात यही है कि उनके हर आदर्श, हर नैतिकता और हर उसूल हमेशा जीतते ही रहे हैं। अब यह दीगर बात है कि उनके बाद की संतानों ने उनकी हार से उपजे जीत अपने गले में लटकाये हैं।

जी हां, वे लोग भले ही बार-बार हारते रहे, लेकिन केवल इसलिए ताकि उनकी हार लोगों के लिए एक सबक बन जाए। उनके लिए सफलता की एक नई दिशा-मुकाम बन जाए। उनका जीवन लगातार और उत्तरोत्‍तर विकसित होता जाए। इंसानियत हिसाब से और भी मजबूती के साथ बढ़ती जाए। वह भले ही मर जाएं लेकिन उनकी औलादें हमेशा के लिए खुश रहें, सुरक्षित रहें और खुद को विजयी जाति के तौर पर गर्व महसूस कर सकें। इन मूर्तियों को स्‍थापित करना किसी भी समाज की सर्वोच्‍च प्राथमिकता होती है। क्‍योंकि समाज खूब जानता है कि आदर्शों की लहरें ही समाज को जिन्‍दा रख सकती हैं। इसीलिए कोई भी समाज हारे हुए शख्‍स को हमेशा याद करता है। आप पायेंगे कि अपने आदर्शों-मूल्‍यों के बल पर युद्ध करने वाला व्‍यक्ति महापुरूषों-योद्धा होता है, जबकि उसे हराने वाला कायर। इसलिए समाज और इतिहास हमेशा जीते को याद नहीं कर पाता है, मगर हारे हुए नैतिक शख्‍स को खूब याद रखता है।

अब इस सारी चर्चाओं का मकसद भी है जिसे मैंने उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के हाल ही हुए चुनाव के नतीजों से महसूस किया और जोड़ा भी है। मैंने इस चुनाव-युद्ध में अपने आदर्श, नैतिकता, और सारे आदर्शो- उसूलों के साथ बिगुल बजाया था। मैंने तय किया था कि अपने बीते जीवन की ही तरह इस चुनाव में भी खुद को बिल्कुल साफ-सुथरा ही बनाए रखूंगा। एक भी धब्बा अपने दामन में ना रखूंगा, चाहे कुछ हो जाए। मैंने साफ कह दिया था कि मैं अपने आदर्शों से कतई नहीं डिग सकूंगा। भले ही हार का स्वाद चखना पड़े। और मुझे गर्व है यह मेरे आदर्श और संकल्‍प जबर्दस्‍त ढंग से जीत गए, और क्‍या हुआ जो मेरे मुंह मतदान परिणाम की हार के कसैले स्‍वाद से कड़वा हो गया।

मुझे गर्व है कि मैं जीत गया। चुनावी दंगल में नहीं, बल्कि सिद्धांतों और आदर्शों की रणभूमि में। आप क्या समझते हैं मुझे मिले करीब ढ़ाई दर्जन पत्रकारों ने मुझे सेंत-मेंत में ही यह वोट दे दिया होगा?  सत्‍ता के गलियारों में खबरों को लेकर दलाली और चापलूसी कर अपनी अस्मिता तक को बेचने पर आमादा पत्रकार-नुमा लोगों की भीड़ में अगर ढाई दर्जन से भी ज्यादा मेरे साथ कदमताल करते रहे, तो क्‍या यह मजाक था? हर्गिज नहीं। मेरे साथ जो भी पत्रकार सामने आए, उन्होंने मुझे मेरे चरित्र और संघर्ष का समर्थन किया है। किसी पार्टी, दारूबाजी, उपहार, तोहफों पर नहीं बिके यह ढाई दर्जन पत्रकार। मुझे बिना शर्त समर्थन दिया इन पत्रकारों ने।

इतने लोगों ने मेरे आदर्श, नैतिकता और सारे उसूलों के साथ मेरे पक्ष में बिगुल बजाया। यह जानते हुए भी इन लोगों ने मुझे समर्थन दिया, कि कुमार सौवीर किसी भी खबर पर कोई समझौता नहीं करते हैं, और न ही कभी ऐसा करेंगे। फिर तो इतने पत्रकारों ने यह खतरा क्‍यों उठाया ? इसका जवाब मुझसे या उन पत्रकारों से मत पूछिये जिन्‍होंने मुझे सारे खतरे उठा कर भी मुझे वोट दिया। आपको पूछना ही हो, तो सीधे उन विशालकाय मूर्तियों से पूछियेगा कि आखिर उन्‍होंने अपने आदर्शों और मूल्‍यों के लिए क्‍यों अपनी जिन्‍दगी को भस्‍म किया। यह मर्म दलाल पत्रकार नहीं समझ पायेंगे, लेकिन हमारे साथ खड़े पत्रकार और वह मूक-मूर्तियां साफ-साफ बोल पड़ेंगी।

आप सिर्फ कोशिश तो कीजिए उनसे पूछने की।  (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखा रहा हूं, और उसकी व्‍याख्‍या भी कर रहा हूं। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

... फिर तुम किस खेत की मूली हो कुमार सौवीर ?

: आदर्श हमेशा स्‍थाई भाव में जीत जाते हैं, जबकि व्‍यावहारिकता हर मोड़ पर हारती है : अपनी बेढब पराजय को जीवन की शानदार जीत में शामिल करने का हौसला रखिये मेरे दोस्‍त : आपका नजरिया ही सत्‍य-असत्‍य की दिशा बदलती है, किसी भी हार से जीत की नयी दिशा-कोंपलें फूटती हैं : जीत गया कुमार सौवीर -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज कोई प्रवचन नहीं। बस चंद घटनाएं आपके सामने रखना चाहता हूं। पहली घटना है देश के महानतम शिक्षाविद् आचार्य नरेंद्र देव से जुड़ी है। आजादी की जंग में अपनी जबर्दस्‍त भूमिका निभाने वाले आचार्य जी का मतभेद नेहरू जी से हुआ था, नतीजा उन्‍होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। अगले चुनाव में प्रजा सोशलिस्‍ट पार्टी ने आचार्य को फैजाबाद से चुनाव लड़ाया, तो नेहरू जी कांग्रेसियों से साफ कह दिया कि उनके खिलाफ कांग्रेस का कोई भी प्रत्‍याशी नहीं लड़ेगा। मगर कानूनची गोविंद वल्‍लभ पंत जी चूंकि अपनी पकड़ पार्टी में मजबूत करना चाहते थे, इसलिए उन्‍होंने एक कट्टर हिन्‍दूवादी कांग्रेसी राघव दास को आचार्य जी के खिलाफ खड़ा कर दिया। नेहरू जी पार्टी में कलह नहीं चाहते थे, मगर उन्‍होंने फैसला जरूर ले लिया कि वे आचार्य जी के खिलाफ प्रचार करने फैजाबाद नहीं जाएंगे। आचार्य जी हार गये। अगली बार फिर आचार्य जी चुनाव लड़े, तब पंत जी ने वैद्य मदन गोपाल को खड़ा किया, तो नेहरू जी फिर फैजाबाद नहीं आये। दुर्भाग्‍य कि आचार्य जी फिर हार गये। बुरी तरह।

अब असली कहानी भी सुन लीजिए। आचार्य जी की हर पराजय पर नेहरू जी दहलते रहे। आखिरकार उन्‍होंने अपने भाषण में कह ही दिया कि जब आचार्य जी जैसे महान लोग चुनाव हार गये हैं, तो फिर इस सवाल का जवाब हमें खोजना ही होगा कि आखिर हम और हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है, हमारे मूल्‍य क्‍या हैं और हमारा भविष्‍य किस राह पर है। और फिर आचार्य जी ही क्‍यों, मोरारजी देसाई भी चुनाव मैदान में चित्‍त हो चुके हैं। 1952 में मोरारजी देसाई के आम चुनाव में बम्‍बई विधानसभा का चुनाव हारे थे। लेकिन इसके बावजूद  उनके योगदान को देखते हुए हार के बावजूद विधायकों ने देसाई को नेता चुना और वे मुख्यमंत्री बने। बाद में मोरारजी उप चुनाव में जीत कर विधायक बने थे।

कांग्रेस अध्यक्ष के तोर पर दिग्‍गज नेता रहे कामराज को 1967 में एक अदने से छात्र नेता ने हरा दिया था। यूपी में भी कमाल हो चुका है। सन-71 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी त्रिभुवन नारायण सिंह मनीराम क्षेत्र में विधानसभा उप चुनाव हार गए थे। 1971 में जब इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनावी लहर हरहरा कर बहने लगी थी, उस वक्‍त प्रतिपक्ष के कई बड़े-बड़े नेता धूल चाट गये। इतना ही नहीं, पूरी दुनिया में अपनी ताकत का डंका बजा देने वाली इंदिरा गांधी को भी सन-77 में रायबरेली से करारी हार का सामना करना पड़ा था।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने तो 1962 में हारने के लिए ही चुनाव लड़ा था। डॉ. लोहिया ने अपने दल के प्रचार के लिए फूलपुर में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

डॉ लोहिया उससे पहले 1957 का चुनाव भी चंदौली में कांग्रेस के त्रिभुवन नारायण सिंह से हार चुके थे। डॉ भीमराव आंबेडकर जी 1952 में उत्तरी बंबई से लोकसभा चुनाव हार गये थे। इतना ही नहीं, अगली बार यानी 1954 में वह भंडारा से लोकसभा उप चुनाव भी गंवा गये। दीन दयाल उपाध्याय भले ही देश में एक महानतम नेता और विचारक के तौर पर पहचाने जाते हों, लेकिन सच बात यह भी है कि उन्‍होंने भी अपनी करारी हार का स्‍वाद चखा था। उपाध्याय जी 1963 में जौनपुर से लोकसभा का उप चुनाव लड़ रहे थे।

1984 की कांग्रेसी आंधी में तो अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, हेमवती नंदन बहुगुणा और कर्पूरी ठाकुर भी लोकसभा का चुनाव हारे थे। कर्पूरी की वह पहली चुनावी हार थी। एस.के.पाटिल को 1967 में हरा कर जाइंट किलर बने जार्ज फर्नांडिस 1984 में बंगलोर में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारे थे। 1988 के इलाहाबाद के लोकसभा उप चुनाव में बोफोर्स की हवा में कांसीराम, वीपी सिंह से हार गए थे। (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखाऊंगा, और उसकी व्‍याख्‍या भी करूंगा। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

मंत्री जी ! मरीज बदतमीज होते हैं, या तुम्‍हारे डॉक्‍टर ?

: यूपी के मेडिकल शिक्षा मंत्री ने नहीं दिया असल सवालों का जवाब : निजी मेडिकल कालेजों के ट्रामा सेंटरों पर तो कभी भी हंगामा नहीं, सरकारी संस्‍थानों में रोज बवाल : नये मेडिकल कालेज समेत एम्‍स मिला कर कुल 13 संस्‍थान बनाये जाएंगे, संख्‍या तो बहुत शुभ है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : डॉक्‍टर के प्रति किसी भी मरीज के बीच ठीक वही भावना और श्रद्धा होती है, जो जिन्‍दगी देने वाले के प्रति होती है। लेकिन तब क्‍या कहा जाए, जब जिन्‍दगी देने वाला समुदाय यानी डाक्‍टर लोग मरीजों के प्रति शैतान बन कर बाकायदा हमलावर की भूमिका में आ जाएं। यूपी के सरकारी मेडिकल कालेजों में मरीजों के मन में डॉक्‍टरों के प्रति ठीक वही भावना घर आती जा रही है। शायद ही कोई दिन ऐसा न होता हो, जब किसी ने किसी मेडिकल कालेज में मरीजों या उनके परिवारी जनों की पिटाई न हो जाती हो। और खास बात यह है कि ऐसी सारी हरकतें जूनियर डॉक्‍टर ही करते हैं। तड़पते मरीज की आह डॉक्‍टर तक पहुंचाने जाने की तनिक भी कोशिश अगर किसी तीमारदार ने डॉक्‍टर से की, तो वहां मौजूद डॉक्‍टरों का आपा पैजामा खोल कर बाहर आ जाता है। फिर होती है, लेत्‍तेरी की, धत्‍तेरी की। जूतमपैजार होती है। ट्रामा सेंटर युद्धक्षेत्र में तब्‍दील हो जाते हैं। मगर इकतरफा। केवल मरीज और तीमारदारों की पिटाई होती है, और डॉक्‍टर हिंसक हमलावर की भूमिका में आ जाते हैं।

शुक्रवार को मुख्‍यमंत्री सचिवालय एनेक्‍सी भवन स्थित मीडिया सेंटर में इसी मसले पर मैंने प्रदेश के चिकित्‍सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन उर्फ गोपाल से सवाल उठाये। आशुतोष टंडन ने अपने विभाग की उपलब्धियों का ढिंढोरा बजाने के लिए एक प्रेस-कांफ्रेंस आयोजित किया था। प्रेस-कांफ्रेंस की शुरूआत में आशुतोष ने घोषणाओं और योजनाओं का पिटारा खोला। बताया कि जल्‍दी 13 अन्‍य चिकित्‍सा संस्‍थान यूपी में काम करने शुरू हो जाएंगे। मैंने इस पर सवाल उठाते हुए पहले तो आशुतोष पर टिप्‍पणी की, कि उन्‍होंने 13 जैसी "शुभ संख्‍या" को अपनी योजनाओं से आबद्ध कर लिया है। मेरा कहना था कि मेडिकल कालेजों में मरीजों के प्रति मानवीय सम्‍बन्‍धों को विकसित किये जाने की कोशिश किये बिना ऐसी तेरहवीं जैसी योजनाएं आम आदमी को बहुत ज्‍यादा मलहम नहीं दिला पायेंगी।

बहरहाल, मेरा सवाल थोड़ा अलहदा था। सामान्‍य से अलग। मेरी चिंता का विषय यह है कि आखिर क्‍या कारण होते हैं जब मेडिकल कालेजों में डॉक्‍टर लोग अपनी मरीजों और उसके तीमारदारों से हिंसक मारपीट हो जाती है। ऐसे वारदातों में केवल मरीज या उसके तीमारदार ही पीटे जाते हैं। मतलब साफ है कि ट्रामा सेंटर केवल वहां तैनात जूनियर डॉक्‍टरों जैसे कसाईबाड़ा में तब्‍दील हो चुके हैं। जाहिर है कि यह आम आदमी को स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा की कल्‍पनाएं और उनकी योजनाएं इस मामले में पूरी तरह ध्‍वस्‍त हो चुकी हैं।

मैंने साफ पूछ लिया कि जो भी हादसे होते हैं, वह सरकारी मेडिकल कालेजों में ही होते हैं। ऐसी हालत में सवाल तो यह है कि ऐसी घटनाओं के लिए जिम्‍मेदार कौन होता है। क्‍या मरीज या उनके तीमारदार अभद्र, बदतमीज और हमलावर हैं, या फिर वहां तैनात डॉक्‍टर ही बदतमीजी पर आमादा होते हैं।

मंत्री आशुतोष कहना था कि ट्रामा सेंटरों पर मरीजों की भीड़ बेहद होती है, ऐसे में संयम बिगड़ जाता है। हालांकि आशुतोष ने इस बात का खुलासा नहीं किया जब ऐसी हालत है, तो उसके निदान क्‍या क्‍या कोशिश हो रही है।

कहने की जरूरत नहीं कि मेरे इन सवालों पर आशुतोष टंडन गोपाल ने पहले तो डॉक्‍टरों की सेहत को लेकर पैबंद टांकना शुरू कर दिया, लेकिन जैसे ही सवालों की झड़ी लगने लगी, तो वे इन सवालों पर टाल कर प्रेस-कांफ्रेंस से कतरा कर निकल गये।

पूरी सरकार की मां-बहन तौल दिया इस सरकारी डॉक्‍टर ने

: देवरिया के सलेमपुर पीएचसी में अचानक भड़के सर्जन ने मरीजों को भद्दी गालियों से नवाजा : स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री तो दूर योगी तक मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते : एक दबंग पत्रकार के जीजा हैं यह सरकारी डॉक्‍टर, रूआब बेहिसाब : एसडीएम ने वीडियो देख कर पूरा हादसा शर्मनाक बताया :

गौरव कुशवाहा

देवरिया : जिले में अजब गजब के कारनामें देखने को मिल रहे हैं। ऐसा ही एक मामला जिले के सलेमपुर संसदीय क्षेत्र स्थित सीएचसी पर हुई है। यहाँ तैनात सर्जन ब्रजेन्द्र कुमार मिश्रा पर मरीज के परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप क्या लगा दिया। डॉक्टर साहब ये भूल गये कि उनका पेशा एक डॉक्टर का हैं, गुण्‍डे-मवालियों की तरह सरेआम गालियां देना नहीं। हॉस्पिटल में ही सर्जन वी के मिश्रा ने मरीज के परिजनों को जी भर कर मा बहन की गालिया दी और कुछ उखाड़ लेने की धमकी दे डाली। एक मरीज के तीमारदार ने इस सर्जन की बदतमीजी का वीडियो बनाया है, जिसमें वह सर्जन मरीजों को बेहिसाब गालियां देते हुए दिख रहा है। बहरहाल, शिकायत पर एसडीएम ने वीडियो को देखा, और बताया कि यह शर्मनाक हादसा है, इसलिए इस पर कार्रवाई होना आवश्‍यक है।

घटना के अनुसार मझवलिया निवासी चंदन यादव सोमवार की रात गांव के आशीष को पेट मे दर्द होने पर उसे लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सलेमपुर गया था। लेकिन उस समय इमरजेंसी में किसी डॉक्टर के मौजूद ना होने पर वार्ड बॉय ने अस्पताल में तैनात सर्जन ब्रजेश कुमार मिश्र को इलाज के लिए बुलाया। जिससे डॉक्टर आगबबूला हो गए। वही चंदन यादव का आरोप है कि सर्जन ब्रजेश कुमार मिश्र ने वार्ड में आते ही मरीज और उसके साथ आये लोगों को गंदी भद्दी गालियां देने लगे और मरीज का ईलाज ना करने से मना कर दिया। जिससे चिकित्सा विभाग में हड़कम्प सा मचा हैं।

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वीडियो में सर्जन ईलाज ना करने की धमकियों के साथ गंदी भद्दी गालियां देते नजर आ रहे हैं। हैरत होती है कि एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश को रामराज्य की संज्ञा देने में लगे हैं।और दूसरी ओर ब्रजेश मिश्रा जैसे डॉक्टर योगी के रामराज्य के सपने पर पूरी ताकत से कालिख पोतने का कार्य कर रहे हैं।

वही सूत्रों ने दावा किया है कि डाक्टर वी के मिश्रा के रिश्तेदार जिले के वरिष्ठ पत्रकार त्रिपुरेश पति त्रिपाठी के रिश्ते में जीजा लगते हैं। इसी वजह से ये डॉक्टर अपनी मनमानी करने से बाज नही आता और अपना धौस जमाये रखता हैं। यहां सवाल ये है उठता है कि डॉक्टरों को भगवान माना जाता हैं लेकीन ब्रजेन्द्र मिश्रा जैसे डॉक्टरों को क्या समझा जाये?क्या रामराज्य में ऐसे डॉक्टरों का होना जायज हैं?

इस संबंध में सलेमपुर एसडीएम शशिभूषण ने कहा है कि शिकायत पर उन्होंने वीडियो देखा हैं।एक डॉक्टर द्वारा ऐसा कृत्य शर्मनाक हैं। मामले की जांच कर सम्बंधित चिकित्सक के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी। वहीं सूत्रों से खबर हैं कि अंधाधुन गालियां देने वाले डॉक्टर की पैरवी में सत्ताधारी दल के कुछ लोग लग गए है।

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