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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

"नेशनल वायस" चैनल का नया भतार, शैली मुताह सी

: जन्‍म से पहले ही बेहद कुपोषित और शायद गुणसूत्र की गड़बड़ी से डगमगाता रहा है यह न्‍यूज चैनल : अब तक तीन बार बिक्री हो चुकी इस चैनल की, चटखारों में यह गंठबंधन मुताह की शैली में चलेगा क्‍या : पांच महीने के संबंध के बाद ब्रजेश मिश्र ने हाल ही इस चैनल को तलाक दिया था :

कुमार सौवीर

लखनऊ : अपने जन्म से ही बुरी तरह कुपोषित और गंभीर संक्रमणों में फंसे रहे नेशनल वायस नाम के न्‍यूज चैनल की हालत मुताह-निकाह तक सिमट गयी है। खबर है कि इस चैनल को अब फिर एक नया भरतार मिल गया है। खबर है इस बार नया निकाह पिछली सरकार में एक बड़े हाई-फाई नेता के घर हुआ है। वैसे यह तो पता नहीं चल पाया है कि इस नये चैनल ने निकाह के लिए कितना मैहर तय कुबूल किया है, लेकिन इतना जरूर है एक बड़ी मोटी डील जरूर हो गई है।

अब आप सुन लीजिए किस्सा। मेरठ से लेकर अपना झंडा उठाने वाले विजेंद्र सिंह ने अपने धंदे की शुरुआत एक मोबाइल फोन कंपनी से दी थी। साथ ही साथ विजेंद्र ने इलेक्ट्रॉनिक चैनल के लिए घर-घर कनेक्शन खींचने वाली कंपनी में भी हिस्सेदारी ली। दरअसल, यह पता चल गया था कि किसी दीगर धंधे से बेहतर धंधा तो न्‍यूज चैनल का होता है, जहां किसी दूसरे धंधे से ज्यादा पैसा तो उसे चैनलों के खबरों को बेचकर किया जा सकता है। ऐसे में बिजेंद्र सिंह ने एक नया चैनल लांच कर दिया और उसका नाम रखा नेशनल वायस।

शुरूआत में तो छह महीने तक तो यह चैनल ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन उसके बाद ही उसे पता चल गया उसका यह इस चैनल पर राहु-केतु की टेढी नजर है, और इसीलिए वह अपने जन्म से पहले यानी भ्रूण अवस्था से ही काफी कुपोषित था या फिर उसके डीएनए में ही कुछ गड़बड़ घुस गयी थी। सूत्र बताते हैं क‍ि जल्‍दी ही आर्थिक संकट बहुत खराब होने लगे। कर्मचारियों को वेतन भुगतान का भी गंभीर संकट आ गया। चैनल के दीगर खर्चे भी सुरसा की तरह भयावह मुंह खोलने लगे थे।

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पत्रकार पत्रकारिता

इसी बीच ईटीवी लखनऊ में रहे संपादक बृजेश मिश्र ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। ब्रजेश लखनऊ छोड़ना नहीं चाहते थे और लखनऊ में कोई समुचित नौकरी की संभावनाएं लगातार सिकुड़ती जा रही थीं। ऐसे में ब्रजेश मिश्र ने तय किया था कि वह अब नौकरी नहीं करेंगे। लेकिन फिर क्या करेंगे, यह सवाल उन्हें परेशान कर रहा था। ऐसे में उन्होंने किया कि वह अपना खुद का चैनल शुरू करेंगे।

लेकिन यह योजना खासी दिक्कत तलब थी, झंझट भी बेहिसाब थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि नया चैनल शुरू करने से मैं काफी समय लग सकता था। चुनाव सिर पर थे, और ब्रजेश की प्‍लानिंग चुनाव से ही पहले अपने को लांच कर देना था। ऐसे में बृजेश ने तय किया कि किसी गरजू को दबोचा जाए। सामने खड़े दिख गए विजेंदर सिंह जो पहले से ही अपना कटोरा लिए बैठे थे। बातचीत शुरू हुई, दोनों ही लोग इसमें भागीदारी पर सहमत हो गये। ( क्रमश: )

किसी बड़े खेल के मैदान में दर्जनों खिलाडि़यों के बीच बार-बार पर लात खाने पर अभिशप्‍त हो चुका है यूपी का पहला न्‍यूज चैनल नेशनल वायस। खबरों की दुनिया में शायद इतनी बदतरीन किस्‍मत किसी भी चैनल की नहीं रही होगी, जितनी इस नेशनल वायस की हुई है। बार-बार निकाह, और फिर बार-बार मुताह। गजब छीछालेदर फैल रही है इस चैनल में।

यह श्रंखलाबद्ध रिपोर्ट है। इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नेशनल वायस चैनल का नया मुताह

इसे पहचानो, जिसने पत्रकार-साथी की मौत बेच डाली

: साथी पत्रकार की मौत के नाम पर इस बड़े पत्रकार ने मोटा माल उगाहा है : शिक्षा समेत कई विभागों और अफसरों से मदद के लिए गुहार लगायी थी, और रकम लेकर रफूचक्‍कर हो गया : पत्रकार संघ ने भी ठोस मदद नहीं, सिर्फ श्रद्धांजलि-समारोह कर अनुष्‍ठान सम्‍पन्‍न करा दिया :

मेरी बिटिया संवाददाता

जौनपुर : आपको याद होगा कि कुछ महीना पहले जौनपुर के एक पत्रकार की मौत हो गई थी। सड़क दुर्घटना में। इतनी गंभीर चोटें आई कि मौके पर ही उसने दम तोड़ दिया। अस्पताल तक जाने की नौबत ही नहीं आएगी। इस पत्रकार का नाम था यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज"।

इस पत्रकार की मौत पर जाहिर है कि पत्रकार बिरादरी काफी दुखी थी। उसके असमय काल कलवित होने की घटना के बाद पत्रकार बिरादरी ने अपनी शोक श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पत्रकार संघ भवन पर एक बैठक बुलाई थी। सभी दुखी थे। सभी ने यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" को याद किया और उससे जुड़ी अपनी यादें साझा किया। बैठक में पत्रकारों ने तय किया कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के शोक संतप्त परिवारीजनों को आर्थिक सहायता दिलाने के लिए सरकार से अपील की। इस बारे में तय किया गया कि संघ के लोग एक अर्जी मुख्यमंत्री कोष से आर्थिक सहायता हासिल करने के लिए भेजेंगे। अब उस अर्जी का क्या हुआ इस बारे में तो किसी को कोई अता पता ही नहीं, लेकिन लोग कहते हैं कि संघ के महामंत्री ने यह अर्जी लिखने का वायदा किया था और जिसे संघ अध्यक्ष के हस्ताक्षर से लखनऊ भेजने की बात की गई थी। इतना ही नहीं, उस आर्थिक सहायता देने वाली अर्जी के साथ जौनपुर के बड़े भाजपाई, नेताओं, विधायक, मंत्रियों के साथ ही साथ जिला प्रशासन के लोगों को भी अग्रसारित करा कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भेजने की बात हुई थी। लेकिन अब तक यह पता नहीं पाया कि ऐसा हुआ या नहीं।

मगर इतना जरूर हो गया यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत कुछ निकृष्ट पत्रकार की मुट्ठी गरम कर गई, यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के घर का चूल्‍हा भले ही ठण्‍डा पड़ा हो, लेकिन इस निकृष्‍ट पत्रकार के घर नोटों की बारिश हो गई। और इस तरह मनोज दुबे की मौत इस निकृष्‍ट पत्रकार के घर खुशाली की बयार ले आई। कई दिनों तक मौज ही मौज मनाया इस पत्रकार और उसके परिवार ने।

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पत्रकार पत्रकारिता

विश्‍स्‍त सूत्रों के अनुसार मामला है बड़ा संगीन। हुआ यह इस बड़बोले पत्रकार ने जिले के कुछ दफ्तरों और अफसरों के पास जाकर यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत पर खूब आंसू बहाए थे और यह कहा था कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" चूंकि ईमानदार पत्रकार-सेनानी था इसलिए उसके शोक संतप्त परिवारीजनों को कुछ आर्थिक सहयोग जरूर दिया जाना चाहिए। निजी तौर पर कुछ अफसरों ने क्या लेनदेन किया, इसका तो कोई पुख्ता खबर नहीं है लेकिन शिक्षा विभाग के एक दफ्तर में यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" की मौत उस पत्रकार के घर छप्पर फाड़ के खुशहाली हो गयी।

सूत्र बताते हैं कि खुद को बड़ा पत्रकार कहलाने वाले इस शख्‍स ने इस बड़ा दार्शनिक अंदाज में तमाम घडि़याली आंसू बहाते हुए आर्त स्वर में अपील की थी कि मृत यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के परिवार का सहयोग करना मानवता ही नहीं, बल्कि पत्रकार हित और उनके ईमानदार सेनानियों को भी बल भी देगा। इसके लिए उस पत्रकार ने चंदा भी जुटाया। बताते हैं कि एक दिन के भीतर केवल अकेले एक दफ्तर से 25000 रूपयों से ज्‍यादा की कर ली थी। इस ववरिष्ठ पत्रकार तो दूर, कुछ अन्‍य हवा-हवाई पत्रकारों ने भी अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों से यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के घरवालों के नाम पर भारी पैसा उगाया था।

गौरतलब बात यह है कि यादवेन्द्र दत्त दुबे "मनोज" के परिवारी जनों तक इन दफ्तरों या व्यक्तियों से जुटायी गई रकम का एक धेला तक नहीं पहुंचा।

मेहरबान ! आज होगी नौटंकी "आला अफसर"

: लखनऊ के रंगमंच पर 35 बरस के बाद होगा इस नौटंकी का मंचन : मुद्राराक्षस कृत इस नौटंकी का निर्देशक हैं प्रख्‍यात रंगकर्मी आतमजीत सिंह : गोमती नगर के पर्यटन भवन के सामने स्थित संत गाडके प्रेक्षागृह में सायंकाल सात बजे से होगा "आला अफसर" का मंचन : प्रवेश नि:शुल्‍क। प्रथम आगत, प्रथम स्‍वागत :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक वक्त हुआ करता था जब स्‍वांग-सफेड़ा और नौटंकी जैसे सांस्कृतिक माध्यम समाज में सशक्त माने जाते थे। केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि जन जागरण के लिए भी इनका प्रयोग इन माध्यमों ने इस्तेमाल किया जाता था। चाहे वह आजादी आंदोलन का मामला रहा हो, या फिर सामाजिक जागरूकता का, इन माध्यमों ने अपनी उपयोगिता और उपादेयता लगातार साबित साबित की है। स्‍त्री-सश‍क्‍तीकरण, दहेज, विधवा विवाह, सती प्रथा, कन्‍या विवाह और छुआछूत व जातिपांति को लेकर भी इन सांस्‍कृतिक माध्‍यमों ने बेहद प्रभावशाली भूमिका निभायी है। एक जमाने में तो नौटंकी किसी भी छोटे-मोटे मेले-ठेले का भी अनिवार्य अंग हुआ करती थी। बहराइच और बाराबंकी के देवा समेत किसी भी मेले में नौटंकियों की एकाधिक प्रेक्षागृह तैयार किए जाते थे जो पूरी तरह स्थाई रूप से होते थे। नगाड़े की थाप और हारमानियम सुर-लहरियों से लैस नौटंकी का सबसे बड़ा स्तंभ अंतिम रूप में कानपुर का गुलाबो नौटंकी एंड कंपनी माना जाता है।

जबकि स्‍वांग-सफेड़ा की घुसपैठ छोटे-मोटे गांव और पुरवा में भी धमक मचा देती थी। वजह एक तरफ जहां नौटंकी का आयोजन एक बड़े संगठन हित रूप में ही हो पाता था, और उसमें तकरीबन एक दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ता व कलाकार अपनी भूमिका निभाते थे, वहीं स्‍वांग-सफेड़ा दो से लेकर अधिकतम पांच लोगों से ही सम्‍पन्‍न हो जाता था। नौटंकी रात भर चलती थी जबकि स्वांग सफेड़ा का समय अधिकतम आधी रात तक ही चलता था। नगाड़ा और हारमोनियम के अलावा लाउडस्‍पीकर और पंचलैट इस के आयोजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण यंत्र हुआ करते थे।

अभी करीब पहले 35 साल पहले तक लखनऊ में नौटंकी का आयोजन हुआ था। हालांकि आज भी लखनऊ के दूर-दराज कभी-कभार नौटंकी के नगाड़ों की आवाजें सुनायी जाती हैं, लेकिन वह लगातार सिमटती ही जा रही हैं। वजह यह कि नए-नए मनोरंजन माध्यमों ने नौटंकी की जमीन खोदकर उन्हें बहुत दूर तक खदेड़ दिया है। सच बात कही जाए तो नौटंकी जड़ें ही खुद चुकी हैं, और उससे जुड़े कलाकार अब दीगर कामों में भिड़ चुके हैं।

मगर आम आदमी के सरोकारों से जुड़े लोगों और कलाकारों ने नौटंकी को अपने माध्यम के तौर पर हमेशा अपनाया, और आम आदमी से जुड़े मसलों और समाज के विभिन्‍न पहलुओं को मनोरंजन के माध्‍यम के तौर पर वह चुटीले अंदाज में पेश किया। यह ऐसा अनोखा माध्यम लखनऊ से 35 साल पहले खत्म हो गया, लेकिन उसके पहले मुद्राराक्षस और आतमजीत सिंह जैसे दुर्दमनीय और निष्‍ठावान कलाकारों ने इसे अपने जीने और अपने दिल-दिमाग को खुराक का मकसद बना दिया। अपनी जिजीविषा के चलते मुद्राराक्षस में अपनी नौटंकी आला अफसर को तैयार किया था।

और अब आतमजीत सिंह उसी आला अफसर नौटंकी को लेकर लखनऊ में धमाके करने जा रहे हैं। नाम है आला अफसर। इस का निर्देशन आतमजीत सिंह कर रहे हैं। आपको बता दें कि आतमजीत सिंह केवल लखनऊ और प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के संस्कृतिकर्मी हैं और उन्होंने दर्जनों नाटकों नौटंकियों को मंच तक उतारा है।

आजम के बुरे दिन शुरू, नौकरी घोटाले में मुकदमा दर्ज

: यूपी जल निगम में 13 सौ पदों को अनियमित तरीके से भर्ती करने का आरोप, भारी घोटाले का आरोप : मामले में आजम खान और पूर्व एमडी पीके आसुदानी पर भी तलवार गिरी : अब तक सवा सौ इंजीनियरों को अनियमित भर्ती के आरोप में बर्खास्‍त कर चुकी है योगी सरकार :

कुमार सौवीर

लखनऊ : भाजपा के अच्‍छे दिन भले ही न आये हों, लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के बुरे दिनों का आगाज हो गया है। अपने विरोधियों और खास तौर पर जयाप्रदा जैसी महिलाओं के खिलाफ मुंह से आग बरसाने में कुख्‍यात आजम खान के खिलाफ एक मुकदमा दर्ज हो गया है। अखिलेश यादव की सपा-सरकार में जल निगम में 13 सौ लोगों को नौकरी देने के मामले में आजम खान और तब के एमडी पीके आसुदानी के विरूद्ध चल रही जांच पूरी होने जाने के बाद पुलिस ने यह मामला दर्ज किया है।

आजम ने इस खबर पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि अगर 13 सौ लोगों को नौकरी देना जुर्म है, तो वे अपना यह जुर्म कुबूल करते हुए जेल जाने को तैयार हैं। आजम खान का कहना है कि अदालतों के फैसले उनके पक्ष में हैं लेकिन राजनेताओं का फैसला उन जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है. उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे। उधर पुलिस का दावा है कि आजम और आसुदानी ने 13 सौ पदों के लिए बहुत बड़ा षडयंत्र किया और इसमें भारी घोटाला किया गया था।

आज जल निगम भर्ती घोटाले में सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान और तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी के खिलाफ एसआईटी ने योगी सरकार को रिपोर्ट सौंप दी थी। कहने की जरूरत नहीं कि इससे  पूर्व मंत्री आजम खान की मुश्किलें बढ़ सकती है। रिपोर्ट में आजम खान के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई थी कि इस मामले में आजम खान और आसुदानी पर मुकदमा दर्ज कराने की अनुमति दी जाए। उसके बाद से ही आज शाम को ही सरकार के आदेश पर आजम खान व एमडी पीके आसुदानी पर उसी रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश जारी हो गया।

इस मामले में अपना पक्ष जाहिर करते हुए आजम खान का कहना है कि अदालतों के फैसले उनके पक्ष में हैं लेकिन राजनेताओं का फैसला उन जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है। उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे। उनका कहना था उन्‍होंने बेरोजगारों को नौकरी दी है, और ऐसा करना कोई करप्शन का चार्ज नहीं है। आजम बोले कि न हमारे ऊपर और न उस वक़्त के किसी अधिकारी के ऊपर। लेकिन राजनेताओं का फैसला हमारे जैसे लोगों को प्रताड़ित करने का है। आज़म खान ने कहा कि नौकरियां देने के जुर्म में अगर जेल जाना पड़ता है तो जाएंगे।

गौरतलब है कि अखिलेश सरकार में आजम खान जल निगम विभाग के मंत्री थे. उस दौरान उनके विभाग में 1300 पदों पर भर्तियां हुई थीं। जानकारी के अनुसार, एसआइटी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री व जल निगम के तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति मांगी है. आजम खान अखिलेश सरकार में जल निगम के अध्यक्ष थे। अपनी रिपोर्ट में एसआईटी ने कहा है कि आजम के खिलाफ भ्रष्टाचार समेत कई आरोपों के पर्याप्त सबूत हैं. एसआईटी इंचार्ज आलोक प्रसाद ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अभियोग चलाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। सरकार से अनुमति मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

इस मामले में 122 असिस्टेंट इंजीनियर को सरकार बर्खास्त कर चुकी है। इससे पहले 22 सितंबर को एसआईटी का जल निगम के हेडक्वार्टर्स पर छापा पड़ा था और 5 दिसंबर को तत्कालीन एमडी पीके आसुदानी से पूछताछ हुई थी। अब तक इस मामले में 8 अफसरों के बयान एसआईटी दर्ज कर चुकी है। इस घोटाले में सहायक अभियंता- 122, अवर अभियंता- 853, नैतिक लिपिक - 335, आशुलिपिक- 32 समेत 1300 पदों पर भर्तियां की गई थीं।  भर्ती के लिए वित्त विभाग से अनुमति भी नहीं ली गई थी। सरकार के बजाय जला निगम के चेयरमैन के स्तर पर ही भर्ती को मंजूरी दे दी गई थी. जांच में एसआईटी को भर्ती आदेश पर आजम खान के हस्ताक्षर मिले हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही कहा था कि अखिलेश के कार्यकाल में हुई हर सरकारी विभाग की भर्तियों की जांच कराएंगे। जल निगम में हुई भर्तियों की जांच बीते सितंबर महीने में एसआईटी को दी गई थी। इस मामले में अब तक पूर्व नगर विकास सचिव एसपी सिंह के बयान भी दर्ज हो चुके हैं। आईएएस एसपी सिंह अब रिटायर हो चुके हैं।

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