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सक्सेस सांग

कभी खनकती नर्तकी बनी ग्राम प्रधान

तवायफ से प्रधानी तक के सफर की बेमिसाल नजीर हैं मुधबाला

मनोरंजन नही, गांव का आदर्श बन चुकी हैं कल की नर्तकी मधुबाला
लोकतंत्र ने दे दी एक महिला को बोलने और कुछ कर गुजरने की आजादी

 
:कभी खनकाती थी पैरों की पायल और दिखाती थी अदाएं: अब जलवा बिखेर रही है सीमावर्ती बहराइच के गांव में प्रधान बन कर: समाजसेवा के साथ ही इस पेशे से लडकियों को दूर रखने का संकल्प: भारत-नेपाल सीमा पर बसा है बहराइच जिला। इस निहायत पिछडे, गरीब और सामंती इलाके में अपनी टोली के साथ मर्दों की अश्लील छींटाकशी और सिक्कों की खनके के लिए अपने जिस्म की नुमाइश के साथ ही अदाएं दिखाने वाली मधुबाला के दिन लोकतंत्र ने बदल कर रख दिया है। पहले की बाईजी अब ग्राम प्रधान बन चुकी हैं। पहले था भय और हर क्षण इज्जत लुटने का खतरा, लेकिन अब है जिजीविषा और कुछ ठोस कर गुजरने की ललक। अब तो सिर पर पल्लू डाले यह मधुबाला गांव के विकास के लिए लोगों से एकजुट होने की अपील और खुद प्रयास करती नजर आती हैं। इस हालत से गांव ही नहीं, आसपास का इलाका तक हैरत और जोश में है। आखिर यह एक महिला के खुदमुख्तार होने और एक नयी नजीर कायम कर देने की ऐतिहासिक घटना भी तो है।
कभी  पैरो में घुघुरू बांधकर नाचने-थिरकने वाली मधुबाला ने अब इस पेशे को अलविदा कह दिया है। लोगो के मनोरंजन  के लिए उनकी शाम की  महफिल रंगीन करने वाली मधुबाला अब गांव की प्रधान बन गयी है। वह अब न तो तबले की थाप पर नाचेगी और न गायेगी। इतना ही नहीं, अब गांव के विकास के साथ-साथ बेरोजगारी और महिलाओं को इस पेशे से दूर रखने के अभियान चलायेगी।
सिर पर पल्लू डालकर विनम्रता से हाथ जोड़कर ग्रामवासियों को धन्यवाद देती मिठाई खिलाती कही भी दिख जाएगी  विकास खण्ड महसी के पंचदेवरी ग्राम पंचायत की नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान मधु देवी। इन  पर गांव के लोगों  ने विश्वास कर इन्हें गाँव का प्रधान चुना है। इस ग्राम पंचायत में कुल 2714 मतदाता है। इस आरक्षित सीट के लिए गांव के 10 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। लेकिन मधु देवी 189 मतो से विजयी घोषित हुईं। मधु चुनाव जीतने के बाद काफी खुश और उत्साहित है। वे अब गांव के हर हाथ को रोजगार और हर बच्चे को शिक्षा देने और गाँव के चतुर्मुखी विकास करने का दृढ़ निश्चय की बात कह रही है।  
अब वह लोगो का मनोरंजन नही, आदर्श बन चुकी है। तवायफ कहां किसी के साथ मुहब्बत करती है, वो तो हाय या तो कयामत करती है इसी फिल्मी अंदाज मंधुबाला की मुहब्बत की दस्तान है। मधुबाला की जिन्दगी की दास्तान की किताब के पन्ने अगर पलटे तो वह किसी दर्दीली फिल्म की कहानी से कम नही है। जिले के असवा मुहम्मदपुर में गरीब परिवार मे जन्मी मधु देवी ने परिवार का पेट पालने के लिए कम उम्र में ही पैरों में घुघरू बांधने पर मजबूर हो गई और नाटक-नौटंकी और विवाह समारोह में मुजरे की महफिल सजाकर अपने परिवार का पालन पोषण करने लगी। जल्द ही अपने प्रतिभा से जिले में नर्तकी के रूप में मशहूर ख्याति अर्जित कर ली। काजल की कोठरी में भी रहकर मधुबाला कालिक से दूर रही।

मधुबाला के जिन्दगी के रूख को नौटला के एक नृत्य समारोह ने बदल दिया। उस समारोह में पंचदेवरी के तेज नरायन शुक्ल उफ अल्हा भैया भी गये थे। जहा उन्हें मधुबाला अपने  बेहतरीन नृत्य और मासूम अदाओं से भा गयी। धीरे-धीरे दोनों मुहब्बत परवान चढ़ने लगी। आल्हा भैया उसके हर कार्यक्रम में जाने लगे।
एक बार किसी मामलों में आल्हा भैया को जेल हो गयी। जब इसकी सूचना मधुबाला को हुई तो उसने जमानत में पैरवी कर उनकी और गाव के चार अन्य लोगों की जमानत लेकर जेल से छुड़वाया। इसके बाद में आल्हा भैया ने उसे इस दलदल से निकालने की ठानी । और उसके उपकार के बदले में गांव में एक मकान देकर पुरस्कृत किया।
अचानक एक दिन चुनाव की घोषणा हुई तो जैसे मधुबाला के हौसलों को तो पंख ही लग गए. फिर एक दिन वह आया जब वह मधुबाला से ग्राम प्रधान मधुदेवी बन गयी। अब वो मधु देवी किसी भी महिला को गरीबी और लचार महिला के पैरों में घुघुरू नहीं बाधनें देगी। वो उनके लिए मेहनत मजदूरी कर सम्मान की जिन्दगी जीने के लिए अभियान चलायेगी।

 

लेकिन मि. प्रसीडेंट ! पाकिस्तान पर आप क्या सोचते हैं।

ओबामा को बोलने पर मजबूर कर ही दिया भारतीय बाला ने


मैं उनके जवाब से संतुष्ट नहीं, वह कूटनीतिक जवाब ही था: आफशीन ईरानी ने आखिरकार तोड ही डाली ओबामा की चुप्पी : मैं जानना चाहती थी कि अमेरिकी लोग चरमपंथ पर क्या सोहते हैं पाकिस्तान के बारे में: आतंक के चरमपंथ के संदर्भ में दुनिया के दबंग बराक ओबामा ने भले ही पाकिस्तान का नाम लेने से परहेज किया हो,लेकिन एक भारतीय बच्ची ने उन्हें इस ज्वलंत मसले पर बोलने पर मजबूर कर ही दिया। ओबामा जब सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज पहुँचे तो मैनेजमेंट की 19 वर्षीय छात्रा अफ़शीन ईरानी ने आखिरकार उनसे पूछ ही लिया कि पाकिस्तान को अमरीका एक आतंकवादी देश क्यों नहीं घोषित करता है।
सवाल पर अचकचाएं ओबामा को आखिरकार पहली बार पाकिस्तान का नाम लेने पर मजबूर होना ही पड गया। और उधर अपने इस सवाल के बाद अफ़शीन ईरानी मीडिया में छा गयी। हालांकि आफशीन अभी भी साफ कहती है कि ओबामा का जवाब केवल कूटनीतिक ही था और वे उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। आफशीन के अनुसार ओबामा का जवाब अच्छा था. एक व्यक्ति के तौर पर मुझे वो बहुत अच्छे लगे.ओबामा ने अपनी यात्रा में पाकिस्तान का कोई ज़िक्र नहीं किया था. लेकिन मैं जानना चाहती थी कि अमेरिकी लोग पाकिस्तान के बारे में क्या सोचते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने बराक ओबामा के बारे में काफ़ी शोध किया था.
मैंने पहले भिन्न सवाल पूछने के बारे में सोचा था कि एक तरफ़ जब रतन टाटा जैसे भारतीय लोग अमरीकी विश्वविद्यालयों को धन मुहैया करवा रहे हैं तो अमरीका इस बदले में भारत के लिए क्या कर रहा है. लेकिन अपने एक दोस्त से बातचीत के दौरान मैने पाकिस्तान के बारे में सवाल करने का फ़ैसला किया.
हालाँकि अफ़शीन कहती हैं कि सवाल पूछने से पहले वो थोड़ा अनिश्चित थीं और झिझक रही थीं क्योंकि सवाल थोड़ा विवादास्पद था. अफ़शीन अपने कॉलेज की अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम समिति की डॉयरेक्टर हैं.साथ ही वो कॉलेज की ष्स्टुडेंट्स इन फ्री इंटरप्राइज़ष् संस्था की भी प्रमुख हैं.ये संस्था गरीब और पिछड़े लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करती है.
उनका कहना था कि मौका मिले तो वो पाकिस्तान ज़रूर जाना चाहेंगी.उनकी माँ एक वकील हैं.जबकि उनके पिता एक बिल्डर हैं. उधर 20.साल की अनम अंसारी ने जेहाद के बारे में राष्ट्रपति ओबामा का मत जानना चाहा और उनका कहना है कि वो ओबामा के जवाब से संतुष्ट हैं. सेंट ज़ेवियर्स की बीएससी तीसरे साल की छात्रा अनम कहती हैं कि सवाल पूछने के पीछे कोई कारण नहीं था और उन्होंने वहीं बैठे.बैठे सवाल सोचा और पूछ लिया.
अनम कहती हैंए ओबामा का जवाब अच्छा था. एक व्यक्ति के तौर पर मुझे वो बहुत अच्छे लगेण् मेरे परिवार वालों ने मुझसे कहा कि उन्हें गर्व है कि मैंने ये सवाल ओबामा से पूछाष्ण्
कालेज के कई छात्र बराक ओबामा से बेहद प्रभावित नज़र आए. सभी छात्रों ने अपने सवालों के लिए कई दिनों तक मेहनत की थी और कार्यक्रम में पहुँचने के लिए कई मुश्किल चरणों से गुज़रे थेण्
मुंबई के अलग. अलग कालेजों से चुने गए क़रीब साढ़े तीन सौ छात्रों में से छह या सात छात्रों को ही अमरीकी राष्ट्रपति से सवाल पूछने का मौका मिल पाया,

नूपुर का ''नमस्ते फ्रांस", देहरादून की यह लड़की फ्रांस में छा चुकी है

नमस्ते फ्रांस" के नाम से भारत की संस्कृति फ्रांस में रंग जमा रही है। 2009 में भारत ने "बोंजोर इंडिया" नाम से फ्रेंच महोत्सव आयोजित किया था। अब "नमस्ते फ्रांस" महोत्सव के जरिए फ्रांसवासी हमारी कला, संस्कृति, नृत्य, साहित्य और सिनेमा की प्रतिभा को करीब से देख रहे हैं। इस सबके पीछे नूपुर की जी तोड़ मेहनत और बुलंद हौसला है। नूपुर फ्रांस में भारत की कला और संस्कृति की राजदूत हैं। शाही घराने से ताल्लुक रखने वाली देहरादून की यह राजपूत लड़की फ्रांस में छा चुकी है। अपने देश की संस्कृति और कला के प्रति गहरे लगाव ने उनको परदेस में भी अपनी मिट्टी की खुशबू से बिछुड़ने नहीं दिया। इसी का परिणाम है "नमस्ते फ्रांस"। जहां फ्रांस का "बोंजोर इंडिया" महोत्सव भारत में तीन महीने तक चला था, वहीं "नमस्ते फ्रांस" 15 महीनों तक पेरिस में चलेगा। यह समारोह जुलाई 2011 में "म्यूजियम ऑफ मॉर्डन आट्र्स" में नोबल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के मूल चित्रों की प्रदर्शनी के साथ खत्म होगा।

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