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सक्सेस सांग

बसपाई छियो-राम छियो-राम: मोदी को साबुन लगाकर खूब धोया मायावती ने

: आजमगढ़ रैली में बिलकुल टोटल मेच्‍योर नेता दिखीं मायावती और उनके तेवर : अंडर-करंट अभी भी दौड़ रहा है बसपा का यूपी की रग-रग में : यूपी सरकार को भी नंगा किया, जैसे ही बोलने को उठीं सुप्रीम-माया बिजली ही काट दिया प्रशासन ने :

यशवंत सिंह

लखनऊ : मायावती ने आजमगढ़ में बसपा की रैली में नरेंद्र मोदी को साबुन लगा लगा कर खूब धोया। सवाल उछाले कि तुमने किया क्‍या है अब तक। जाहिर कर दिया मायावती ने यूपी की जनता में आज भी बसपा का अंडर-करंट है। वे बिलकुल अभी-अभी आजमगढ़ रैली में बोल कर उठी हैं। पूरे दौरान बिलकुल टोटल मेच्‍योर नेता की तौर पर दिखीं मायावती और उनके तेवर। अपने भाषा में मायावती ने मोदी के साथ ही यूपी सरकार को भी नंगा किया। हालत तो यह रही कि जैसे ही वे बोलने को उठीं, बिजली ही काट दिया प्रशासन ने।

आजमगढ़ में केवल भीड़ ही नहीं, बल्कि मायावती भी सभा में आयी लाखों की भीड़ को देख कर खूब उत्‍साहित थीं। अपने उद्बोधन में उन्‍होंने जनता के सामने दिल्‍ली और यूपी सरकार को आइना दिखाया। बार बार पूछा कि महंगाई घटी है या नहीं। राशन सस्ता हुआ, नौकरी मिली, मकान मिला, रुपया एकाउंट में आया... जनता ने हर बार ना कहा. व्यापम घोटाला, विजय माल्या घोटाला, ललित मोदी घोटाला, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के घोटालों का जिक्र कर मायावती ने बताया कि यह मोदी सरकार भी कम घोटालेबाज नहीं है.

मायावती ने देर तक जमकर बोला. उनको टीवी पर शुरू से अंत तक सुनने के बाद समझ में आया कि वह बहुत मेच्योर नेता हैं जो अपने वोट बैंक या अपने टारगेट आडियेंस को बहुत ही कायदे से समझती हैं और उसे कायदे से समझा ले जाती हैं, कनवींस कर ले जाती हैं. मुलायम की छाती पर यानि आजमगढ़ में इतनी सफल रैली करके मायावती ने दिखा दिया है कि यपी में बसपा का अंडरकरंट है और वह लीड ले चुकी हैं..

सर्वे, मीडिया वाले चाहे जो करें और सोशल मीडिया वाले अपर कास्टी चाहें जो नारे लगाएं.. एक सूचना ये भी है कि मायावती ने ज्योंही अपना भाषण आजमगढ़ में शुरू किया, यूपी के कई इलाकों में बत्ती गुल हो गई. कुछ लोगों ने भड़ास निकाली कि शायद अखिलेश बुरी तरह डर चुके हैं अपनी बुआ से इसीलिए लाइन कटवा दिए ताकि प्रदेश के दूसरे इलाके के लोग अपने अपने टीवी पर बुआ का लाइव भाषण न सुन सकें. भगवान जाने क्या सच है क्या झूठ।

(यशवंत न्‍यूज पोर्टल भडास4मीडिया के सम्‍पादक हैं। उनके तेवर देखने हों तो उनके ब्‍लॉग पर पधारिये।)

साले, नीच, कमीने, हरामजादे हैं पब्लिक सर्विस कमीशन वाले, 50 लाख का नुकसान करा दिया

: यकीन मानिये कि यह तो सिर्फ एक कहानी है, लेकिन कितनी सच है। है न : यह कहानी चंद्रशेखर त्रिपाठी ने मुझे भेजी है, जिसे गिरमिटिया मजदूरों को पूरी दुनिया से खोज निकालने में महारत है : सरकारी नौकरी मिलते ही कमीनगी एकदम उछल जाती है हमारे मध्‍यवर्ग समाज में :

चंद्र शेखर त्रिपाठी

बलिया : चौबे जी का लड़का है; अशोक, एमएससी पास| नौकरी के लिए चौबे निश्चिन्त थे, कहीं-न-कहीं तो जुगाड़ लग ही जायेगा| ब्याह कर देना चाहिए।

मिश्रा जी की लड़की है - ममता| वह भी एमए, पहले दर्जे में पास है| मिश्रा जी भी उसकी शादी जल्दी कर देना चाहते हैं।

सयानों से पोस्ट ग्रेजुएट लड़के का भाव पता किया गया। पता चला, वैसे तो रेट पांच से छः लाख का चल रहा है, पर बेकार बैठे पोस्ट ग्रेजुएटों का रेट तीन से चार लाख का है। सयानों ने सौदा साढ़े तीन में तय करा दिया।

बात तय हुए अभी एक माह भी नहीं हुआ था कि कमीशन से पत्र आया कि अशोक का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हो गया है।

चौबे जी - साले, नीच, कमीने, हरामजादे हैं पब्लिक सर्विस कमीशन वाले|

चौबन - लड़के की इतनी अच्छी नौकरी लगी है, नाराज क्यों होते हैं?

चौबे - अरे, सरकार निकम्मी है| मैं तो कहता हूँ इस देश में क्रांति होकर रहेगी| यही पत्र कुछ दिन पहले नहीं भेज सकते थे? डिप्टी कलेक्टर का 40-50 लाख रुपया यूँ ही मिल जाता|

चौबन - तुम्हारी भी अक्ल मारी गई थी| मैं न कहती थी कि महीने भर रुक जाओ, लेकिन तुम न माने| हुल-हुला कर सम्बन्ध तय कर दिया| मैं तो कहती हूँ मिश्रा जी को पत्र लिखिये वे समझदार आदमी हैं|

प्रिय मिश्रा जी,

अत्र कुशलं तत्रास्तु!

आपको प्रसन्नता होगी कि अशोक का चयन डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया है| विवाह के मंगल अवसर पर यह मंगल हुआ| इसमें आपकी सुयोग्य पुत्री के भाग्य का भी योगदान है|

आप स्वयं समझदार हैं, नीति व मर्यादा जानते हैं। धर्म पर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है| मनुष्य का क्या है? जीता-मरता रहता है| पैसा हाथ का मैल है| मनुष्य की प्रतिष्ठा बड़ी चीज है| मनुष्य को कर्तव्य निभाना चाहिए, धर्म नहीं छोड़ना चाहिए और फिर हमें तो कुछ चाहिए नहीं, आप जितना भी देंगे अपनी लड़की को ही देंगे|

मिश्रा जी के परिवार ने पत्र पढ़ा, विचार किया और फिर लिखा:

प्रिय चौबे जी,

आपका पत्र मिला, मैं स्वयं आपको लिखने वाला था| अशोक की सफलता पर हम सब बेहद खुश हैं| आयुष्मान अब डिप्टी कलेक्टर हो गया हैं| अशोक चरित्रवान, मेहनती और सुयोग्य लड़का है| वह अवश्य तरक्की करेगा|

आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ममता का चयन आईएएस के लिए हो गया है| आयुष्मति की यह इच्छा है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से वह विवाह नहीं करेगी| मुझे यह सम्बन्ध तोड़कर अपार हर्ष हो रहा है|

यूपी की ब्यूरोक्रेसी से जुड़ी खबरों को अगर देखना-पढ़ना चाहें तो कृपया इसे क्लिक करें

लो देख लो, बड़े बाबुओं की करतूतें

दल्‍लों ने दल्‍लों की मीटिंग में दलाली की, बांटा ज्ञान

: मंत्री के खौफनाक बेटे ने नागरिकों और पत्रकार को सरेआम पीटा, दलाल-श्री अपनी दलाली में जुटे रहे : दलालों को वरिष्‍ठ की मान्‍यता दिलाने वाली फैक्‍ट्री हैं हेमन्‍त तिवारी : लखनऊ में मंत्री के पीए बन कर एक युवती से बलात्‍कार करने वाले रतनलाल का मामला सुलटा लिया हेमन्‍त ने : जनगणमन के गान से शुरू की गयी जनगणमन की छीछालेदर : पत्रकार का पिछवाड़ा लाल कर दिया मंत्री के मनबढ़ बेटे ने, दलाल-श्री बिल में घुसे :

कुमार सौवीर

जौनपुर : ठहाके बाद में लगाना। फिलहाल तो आपसे गुजारिश है कि पहले मेरी बात सुन लीजिए। यह बयान ठहाके और मूर्खता का पुलिन्‍दा है, लेकिन जब आपको पता है कि यह बात वह कह रहा है कि वह मूलत: दल्‍ला है तो फिर काहे की टेंशन। खुद को महान पत्रकार के तमगे टांगे इस जमूरे का नाम है हेमन्‍त तिवारी। अभी चंद दिन पहले ही जौनपुर में हेमंत ने अपने चिन्‍टू-पिन्‍टू को बुलाकर पुलिस, पब्लिक और पत्रकार की मीटिंग की, जिसमेंं पुलिस की चरण-वन्‍दना झूम-झूम कर की गयी।

हां, तो चुटकिला यह है कि, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे तथाकथित यूपी प्रेस मान्यता समिति के फर्जी अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने कहा कि, "आज विश्व के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में हमारी पुलिस दिन रात जनता के बीच में रहकर काम करती है पत्रकार भी उनसे अछूते नहीं रह गये है लेकिन जिस तरह से आज सूचना क्रांति का दौर चल रहा है उससे अब कोई भी बात छुपी नहीं रह सकती। यही वजह है कि शासन-प्रशासन ने जनता से सीधे जुड़ने के लिए सोशल मीडिया का भी सहारा लेना शुरु कर दिया है अब जनता सीधे अपनी शिकायत अथवा अपनी बातें शासन प्रशासन के उच्च अधिकारियों तक पहुंचा सकती है।"

सुन लिया आपने पत्रकारिता के जगत में आज स्‍थापित हो चुके इस दलाल-श्री का बयान। यह है हेमन्‍त तिवारी। बेहद बेशर्म। मुझे हमेशा शर्म आती है कि हेमन्‍त तिवारी जैसे घटिया लोग लगातार पत्रकारिता को वेश्‍यालय में तब्‍दील करने हैं और उसे बाकायदा धंधा साबित करने में जुटे रहते हैं। यह वही हेमन्‍त तिवारी है जो धर्म, कर्म, और शर्म के बलबूते पर केवल और सिर्फ केवल दलाली किया करता है। आम पत्रकार की अस्मिता को लूट और उसका बलात्‍कार कर चुके इस हेमन्‍त तिवारी अब एक घटिया प्राणी-नुमा आदमी है, यकीन नहीं आता। कहना कुछ, करना कुछ। घटिया गिरगिट। शाहजहांपुर में जिन्‍दा फूंक डाले गये पत्रकार जागेंद्र सिंह ही नहीं, ऐसे न जाने कितने मामलों पर केवल दलाली करायी है हेमन्‍त ने।

अब असल सवाल पर निगाह डाल लीजिए। दो दिन पहले मडि़याहूं में अमर उजाला और ईटीवी के पत्रकार ब्रजराज चौरसिया की सरेआम पिटाई हुई। यह पिटाई की थी यहां के मंत्री पारसनाथ यादव के गुण्‍डे लक्‍की यादव और उसके एक नाजायज गनर ने। लेकिन हेमंत तिवारी अपनी दारू लेकर लखनऊ में टल्‍ली हो कर फिर---। पुलिस कप्‍तान अतुल सक्‍सेना केराकत में बिजी हो गया। दीपू एंड कम्‍पनी ने इनफार्मर यानी अफसरों व मंत्रियों के बीच धंधा तेज कर लिया। यह वही लोग-पत्रकार हैं जो 17 जुलाई-16 को सामूहिक बलात्‍कार से पीडि़त बच्‍ची को न्‍याय देने के बजाय, जुल्‍फी प्रशासन को मर्दाना ताकत देते में जुटे रहे, ताकि उस बच्‍ची के मामले को सामूहिक बलात्‍कार के आरोप के बजाय उसे पागल साबित करते हुए उसे बनारस के पागलखाने तक भेज दिया जाए।

संस्था के अध्यक्ष असलम शेर खान सहित अन्य पदाधिकारियों ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। अब यह मत पूछियेगा कि यह असलम शेर खान कौन है। स्वागत भाषण कार्यक्रम संयोजक आशीष चौरसिया व आभार फैसल हसन तबरेज ने प्रकट किया। कार्यक्रम का संचालन हसनैन कमर दीपू ने किया। दीपू वह वही पत्रकार हैं, जो 18 अगस्‍त-04 को सोंधी ब्‍लाक चुनाव के मतदान के दौरान स्‍थानीय नेता ललई यादव की लात खाकर कूं कूं कूं कर रहे थे, लेकिन आजकल बड़े पत्रकार बन चुके हैं। लोग बताते हैं कि अपनी पत्रकारिता का धंधा मंदा देख कर दीपू ने इनफार्मर का धंधा सम्‍भाल लिया है। इन्‍फार्मर का मतलब, हर मतलब वाले बड़े हैसियत शख्‍स तक जरूरी सूचनाएं पहुंचाना।

पुलिस, पब्लिक और पत्रकार के बीच ऐसा सामंजस्य बनाने की जरुरत है जिससे की पूरे समाज को इसका लाभ मिल सके और हमारा विभाग इसके प्रति दृढ़ संकल्प लेकर काम कर रहा है। यही वजह है कि जनता और पुलिस के बीच सीधा संवाद स्थापित करने के लिए जल्द ही सभी थाना क्षेत्रों में स्पेशल पुलिस अधिकारी (एसपीओ)  की तैनाती की जाएगी। जनता के बीच से ही अच्छा काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों व अन्य सम्भ्रांत लोगों को लेकर यह काम जल्द ही किया जाएगा। यही नहीं तहसील व गांव स्तर पर भी जनता व पुलिस के बीच सीधे संवाद स्थाापित करने के लिए गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। उक्त बातें पुलिस अधीक्षक अतुल सक्सेना ने कही।

उन्होंने कहा कि जनता व पुलिस के बीच जो गलतफहमियां व डर का माहौल बना हुआ है उसे दूर करने के लिए शासन-प्रशासन ने कई निर्देश जारी किये है। अपराधियों में भय का माहौल बना रहे इसलिए जनता को भी चाहिए कि वे ऐसे लोगों को चिन्हित कर पुलिस को सूचित करें जिससे कि समाज में फैली बुराइयों को दूर किया जा सके। सूचना देने वालों की पहचान गुप्त रखी जाएगी। संस्था की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक अच्छी पहल है जिससे पुलिस, पब्लिक और पत्रकार तीनों मिलकर समाज में फैली बुराइयों को दूर करने का काम करेंगे।

लेकिन हैरत की बात है कि इस लक्‍की यादव जैसे गुण्‍डों की करतूतों और पत्रकारों की दलाली, खामोशी और बिचौलियों की भूमिका पर एकजुट हमला नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह सिर्फ यह है कि पत्रकार खुद ही ऐसे धंधे में लिप्‍त हैं। ऐसे में आम पत्रकार की आवाज दब जाती है। बहरहाल, ऐसे हादसों-हमलों पर www.meribitiya.com लगातार सतर्क और सक्रिय है।

लक्‍की यादव की गुण्‍डागर्दी से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:- गुण्‍डा भस्‍मासुर

अवसादों से निकलने का इकलौता रास्‍ता है, जो भी मन में आये, लिख डालो

:  प्रतिबंधों की सांकलों को लांघकर आती आवाज़ें बनती हैं क्रांति : आस को ठौर बहुतेरे की अलख जगाती हैं शुभ्र शुभा की रचनाएं : मुजफ्फरनगर की रहने वाली हैं शुभ्र शुभा :

विनय समीर

सम्‍भल : "प्रतिबंधों की सांकलों को लांघकर आती आवाज़े अक्सर क्रांति का सबब बनती हैं" ..अब वो प्रतिबंध घर का हो, समाज का हो अथवा रूढ़िवादी पारंपरिक सोच का ..भले ही सामंती विचारधारा के ठकुरई समाज में घर की महिला का मुखर होना शायद विद्रोह की निशानी समझा जाता हो लेकिन प्रतिभा का उदीप्त प्रकाश बंद दरवाजों में भी दरार खोजकर फूट पड़ता है, वो कहा गया है न कि .."आस को ठौर बहुतेरे" ..बस इन्ही आस के ठौरों में ठहराती गहराती प्रतिभा की लहरें जब अपने आवेग को प्राप्त कर स्वच्छंदता की ओर पींगें बढाती हैं तो जन्म होता है एक नवक्रांति का ..एक ऐसी आवाज़ का.. जिसकी गूंज तमाम बंधनों के बावजूद अपने प्रहार से ख़ामोशी के सारे शीशे चकनाचूर कर देती है ..

आज इस परिचय श्रृंखला "लिक्खाड़ शख्शियतें" की इक्कीसवीं पायदान पर ऐसी ही एक आवाज़ शुभ्रा विभा शिशौदिया का ज़िक्र है, जिसने ठकुरई के समस्त सामाजिक अवरोध आवरणों को स्वीकार करते हुए अपने समाजधर्म को निबाहने के साथ अपनी आवाज़ को भी इस दर्जा मुखर किया कि उनकी कलम की कोख से जन्मी रचनाएँ एक दायरे में रहने के बावजूद अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुई हैं! पश्चिमी उत्तरप्रदेश के गुड़ गन्ना ओर गुणों की धरती मेरठ मुजफ्फरनगर अंचल के ग्रामीण परिवेश में जन्मी, और इसी संस्कृति में पल बढ़कर, इसी ठकुरई निगरानी में ब्याहकर अपने विचार प्रवाह और शब्द सामर्थ्य को तमाम झंझावातों के मध्य मुखर करने वाली शुभ्र शुभा शिशोदिया से मेरा कोई खास परिचय तो नहीं है परंतु यहाँ फेसबुक की टहल के दौरान निगाह से गुज़री उनकी रचनाओं ने मुझे विवश किया कि मैं उनको परदे के पीछे से निकालकर प्रबुद्ध पाठक वर्ग के समक्ष लाऊं और इसी प्रयत्न के क्रम में उनसे प्राप्त उनका सफरनामा, उन्ही के शव्दों में आप तक पहुंचा रहा हूँ !

"मेरा पूरा नाम विभा शिशौदिया है, मैं मूलतः जिला मुज़फ्फरनगर यूपी के बिरालसी गाँव से ताल्लुक रखती हूँ । सन् 1980 में मेरा जन्म एक ठाकुर परिवार में हुआ। मेरे पिता एक अध्यापक , एक किसान , एक बहुत अच्छे गायक , एक बहुत अच्छे खिलाडी ,और एक बहुत अच्छे एक्टर थे। मेरी माँ एक घरेलू महिला हैं । मेरे पिताजी अकसर अमृता जी को पढ़ा करते थे और मैं उन्हें बड़ी उत्सुकता से देखा करती थी और जब पिताजी कहीं चले जाते तो मैं छुपकर अमृता जी की किताबें पढ़ा करती थी, मेरी उम्र उस टाइम कोई यही 12 ,13 साल रही होगी, जिस उम्र में मेरी सहेलियाँ गुड्डे गुड़िया खेला करती थीं, मैं उस उम्र में माँ पिताजी से छुपकर अमृता जी को पढ़ा करती थी।

मेरी माँ बिलकुल साधारण सी एक घरेलू महिला हैं। बचपन से ही मैं अपने पिता के बहुत करीब रही। लेकिन पिता का साथ ज्यादा लंबे समय तक नही मिल पाया, सन् 2000 जनवरी में मेरे पिता जी की आकस्मिक मृत्यु ने मुझे तोड़ कर रख दिया, बस यहीं से मन में एक टूटन सी हुयी और मैं खुद से विरक्त सी हो गयी। मैं घर की बड़ी बेटी थी तो पिताजी के बाद पूरे घर की ज़िम्मेदार मेरे ऊपर थी जो मैंने बखूबी निभायी लेकिन मन में एक अथाह पीड़ा घर कर गयी थी जो मैं कभी किसी से कहती नही थी । पिताजी की मृत्यु के बाद मैंने दोनों भाई बहनो को भी पढ़ाया और खुद भी अंग्रेजी से एमए किया । मुझे गाने का बेहद शौक था इसलिए स्कूल और कालेज तक हर प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेती थीं और हमेशा फर्स्ट आती थी । लेकिन एक ठाकुर परिवार की बेटी होने के कारण हमें विचारो की अभिव्यक्ति की आज़ादी नही थी इसलिए मैं चाहते हुए भी कभी कुछ नही लिख सकी । सन् 2004 में मेरी शादी मेरठ हैंमें एक ठाकुर परिवार में ही हुयी । मेरा एक बेटा और एक बेटी है ।"

"सब कुछ होने के बावजूद भी, मन में कहीं एक खालीपन एक उदासी हमेशा सालती थी, मैं पिता की यादों से कभी पीछा नही छुड़ा सकी और अवसादग्रस्त हो गयी । फिर अब से 10 महीने पहले मेरे एक फेसबुक मित्र आदरणीय सूरज रॉय सूरज जी जो कि मेरे गुरु जी भी हैं उन्होंने मुझसे कहा कि 'इस अवसाद से निकलने का एक ही तरीका है कि तुम लिखा करो जो भी दिल में आये बस लिखा करो.. देखना सुकून मिलेगा।' उनके कहने से 19 अक्‍तूबर-15 में अपनी पहली कविता यहाँ पोस्ट की । मैं नही जानती उसे कविता कहेंगे कि क्या कहेंगे, मैंने तो बस सीधे सीधे अपने मन के भाव लिख दिए थे । और सच में बेहद सुकून मिला । और आज भी मुझे लिखने का कोई नियम कोई क़ायदा नही पता बस जो दिल में आता है जैसे आता है सच्चे भाव जैसे के तैसे लिख देती हूँ । "

"मैंने प्रेम को जीया है , मैंने विरह को जीया है, मैंने सामाजिक प्रतिबंधों का भयानक रूप देखा है और भोगा है, इसीलिए मेरी कवितायेँ थोड़ी विद्रोही होती हैं, क्योंकि कोई भी इंसान जो जीता है वही लिखता है । मैं प्रेम कम ही लिख पाती हूँ । अकसर थोड़ी विद्रोही हो जाती हूँ। मेरी कविताओं मे विरह, वेदना, छल कपट का भोग आदि ये सब होता है । मैंने कभी भी अपने नाम के लिए या मशहूर होने के लिए नही लिखा, ना ही मैं झूठी वाहवाहियां चाहती हूँ, मैं लिखती हूँ तो बस जीने के लिए ..और ..लिखती हूँ तो ज़िन्दा हूँ" ...

"मैंने जब लिखना शुरू किया तो एक नए नाम "शुभ्रा शुभा" के नाम से लिखना शुरू किया क्योंकि मेरे परिवार में घर की बहु बेटियों को लिखने की अपने विचार व्यक्त करने की आज़ादी नही है इसलिए किसी दूसरे नाम से लिखना शुरू किया जिसमे मुझे मेरे पति रोहित शिशौदिया जी ने बहुत सपोर्ट किया और मेरा साथ दिया। मेरे मायके और ससुराल में मेरे पति के अलावा आज तक भी किसी को ये नही पता कि मैं लिखती हूँ। मुझे समाज की अपने परिवारो की इसी संकीर्ण सोच पर बड़ा दुःख होता है । अभी मुझे लिखना शुरू किये 10 महीने ही हुए हैं, कोशिश जारी रहेगी कि हमेशा कुछ अच्छा लिख सकूँ ।"

चलते चलते आप सभी मित्रों से एक बात कि "मुझे दिल से पढ़ें दिमाग से नही" मैं नियम या कायदों में बंधकर नही लिख सकती इसलिए मुझे बहर,रदीफ़, काफ़िया का कोई ज्ञान नही । इसके बावजूद भी आप सबने मुझे जितना पसंद किया और जितना स्नेह दिया सराहा ,,उसके लिए मैं आप सबकी सदा आभारी रहूँगी। वर्तमान में, मैं एक गृहणी होने के साथ साथ एक मेकअप आर्टिस्ट ,और nomind publication में managing director हूँ। लेखन में अमृता जी और गुलज़ार जी मेरी प्रेरणा रहे हैं, मुझे पुराने गीत और ग़ज़लें सुनना बेहद पसंद है । मैं जब कभी उदास होती हूँ तो जगजीत सिंह जी, मेहँदी हसन जी , गुलाम अली साहब , आबिदा परवीन जी , और नुसरत फ़तेह अली खान साहब को सुनती हूँ। लेखन का उद्देश्य मैं खुद नही जानती ...बस लिखती हूँ....लिखती रहूंगी .... जाने क्यों ??

तो मित्रों ये थी शुभ्रा शुभा की कलमयात्रा की कहानी उन्ही की जुबानी ..अब सुधि साथी इनकी रचनाओं के रसास्वादन हेतु निम्न लिंक ओपन कर देखें/पढ़ें ...

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