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सक्सेस सांग

हरियाणा में पराली जलाने पर हंगामा: बेटी ने बाप पर लगवा दिया जुर्माना

: आइये, इन बेटियों के लिए तालियां बजायी जाएं : दिल्‍ली की नन्‍हीं बेटी ने साफ मना कर दिया, मैं नहीं जलाऊंगी पटाखे : सुप्रीम कोर्ट तक सख्‍त हो चुकी है वायु-प्रदूषण के कारक पराली जलाने के अपराधों पर :

दिल्‍ली : राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इन दिनों प्रदूषण का लेवल काफी बढ़ा हुआ है। दीपावली से पहले दिल्ली में प्रदूषण का लेवल बढ़ने की एक वजह किसानों द्वारा हरियाणा और पंजाब में पराली जलाना माना गया था. ऐसे में सरकार ने किसानों को पराली जलाने से मना किया था। लेकिन इसके बावजूद जब एक किसान ने पराली जलाई तो उसके खिलाफ उसकी बेटी ही कमर कस कर खड़ी हो गयी। हालत यह हुई कि पराली जलाने पर आमादा किसान की कोशिशो के खिलफ उसकी बेटी सीधे सरकारी अफसरों से मिली और अपने ही पिता के खिलाफ शिकायत करके उनपर जुर्माना ठुंकवा दिया।

मतलब यह कि बेटियों के मामले में अब तक अभागे ही रहे हरियाणा की बेटियों ने अपने पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए बाकायदा जेहाद छेड़ दिया है। लेकिन इसके बावजूद यह कोशिश केवल एक नन्‍ही सी किरण मात्र ही है। इस बच्‍ची की कोशिश के मुकाबले हरियाणा के किसान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। उनका कहना है कि चाहे अदालती आदेश हो या फिर प्रशासनिक कोशिशें, हम हर कीमत पर पराली जलाते रहेंगे। इतना ही नहीं, इन किसानों ने यह तय किया है कि वे प्रशासन को बाकायदा ज्ञापन देकर खुलेआम पराली जलायेंगे और ऐसा करने के पहले प्रशासन को समय के बारे में बाकायदा सूचित भी कर देगे।

इन किसानों की हठधर्मी ने दिल्‍ली एनसीआर में किसी भयावह हादसे के हालात पैदा कर दिये हैं। पिछले एक हफ्ते से छाये हुए जहरीले धुंआ के घने बादलों ने धुंध का गहरा खतरा पैदा कर दिया है। सुबह के समय तो पूरी दिल्‍ली की हालत तो किसी अंधे की तरह ही दिख रही थी। चंद फीट तक की दूरी देखने की क्षमता दिल्‍लीवालों में खत्‍म हो चुकी थी। यही हालत पिछले  एक हफते से जारी है।

लेकिन इस बीच किसी सुनहरी सुबह की तरह बेटियों ने कमर कस ली। हरियाणा के जींद की एक बेटी ने बार-बार मना करने के बाद भी पराली जलाने पर अपने ही पिता की कृषि विभाग में की शिकायत कर दी. जिसके बाद विभाग के अधिकारियों ने इसकी जांच की और पराली जलाने का दोषी पाए जाने पर विभाग ने पिता पर 2500 रूपये का जुर्माना लगाया. बेटी का कहना है कि, ”गलत तो गलत होता है, चाहे वह पिता ने किया हो या फिर भाई ने.” इसके साथ ही बेटी ने की सभी माताओं और बहनों से अपील की कि जहां भी प्रदूषण हो रहा हो उसे रोकें. बेटी ने अपने पिता को कई बार समझाया था।

पूरा मामला जींद के ढाकल गांव का है. जहां एक किसान शमशेर श्योकंद अपने खेत में पड़ी पराली को जलाना चाहता था. यह बात शमशेर की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी सोनाली के कानों में खबर पड़ी तो उसने अपने पिता को कहा कि वह ऐसा न करें क्योंकि पराली जलाना अपराध करना है. बेटी ने पिता को कई बार समझाया लेकिन पिता ने एक नहीं सुनी और खेत में पड़ी पराली को आग लगा दी. बेटी जब सुबह गांव से दूर नरवाना शहर के आर्य कन्या स्कूल में पढ़ने के लिए निकली तो वह पहले सीधा नरवाना स्थित कृषि विभाग पहुंची. उसने विभाग को पिता की शिकायत दी. शिकायत मिलने पर कृषि विभाग के अधिकारी हरकत में आएं. ब्लॉक एग्रीकल्चर ऑफिसर के मुताबिक विभाग के लोगों ने मौके का मुआयना किया और दोषी पाए जाने पर पिता को 2500 रूपये का जुर्माना लगाया गया.

बेटी सोनाली का कहना है कि पिता की शिकायत करना मेरे लिए बड़ा मुश्किल था लेकिन गलत तो गलत होता है चाहे वह पिता ने किया हो या फिर भाई ने. सोनाली का साथ ही यह भी कहना है कि पराली जलाने से प्रदूषण फैलता है इसलिए वह सभी माताओं और बहनों से भी अपील करती है कि जहां इस प्रकार का प्रदूषण हो रहा है उसे तुरंत रोका जाएं. सोनाली ने एक बात और कही है. वह यह है कि सरकार कब बजट का कोई ऐसा समाधान ढूढे़ ताकि किसानों को पराली न जलानी पड़े.

नितीश कटारा की मां बोली:- मुझे देश की बेटियों से शिकायत है

: पश्चिम उत्‍तर प्रदेश का कुख्‍यात अपराधी माना जाता है डीपी यादव : जो जानते थे वे कतरा कर चले गये, और जो अनजान थे, उम्‍मीद की किरण बन गये : एक जुझारू मां की बात सुनिये जिसने अपने बेटे के हत्‍यारों को हमेशा के लिए जेल तक ठूंसने का संघर्ष किया :

निर्मल पाठक

नई दिल्‍ली: चौदह साल के लंबे संघर्ष के बाद वह कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं। अपने बेटे के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए नीलम कटारा ने जो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, वह उनके जज्बे को तो बताती ही है, व्यवस्था के प्रति हमारी आस्था भी बढ़ाती है। नीतीश कटारा हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने के बाद जब नीलम कटारा अपने अगले सफर की तैयारी कर रही हैं, तो उनसे बातचीत की दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक ने।

- नीतीश कटारा हत्याकांड के मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसका असर कहां तक पड़ेगा?

फैसले के बाद मुझे ऐसे बहुत से लोगों की तरफ से भी प्रतिक्रियाएं मिली हैं, जिन्हें मैं जानती तक नहीं। यह केवल कानूनी लड़ाई की वजह से नहीं। लोगों के जीवन में कई तरह के संघर्ष हैं। लोग कई बार छोटे-छोटे मसलों पर भी परेशान हो जाते हैं। वे अब मुझसे बात करते हैं और कहते हैं कि कैसे मैंने उनका मनोबल बढ़ाया है, उन्हें प्रेरणा दी है। कुछ समय पहले एक रेस्तरां में एक पिता अपनी 12 वर्ष की बेटी को मेरे पास लाए और कहा कि यह आपसे मिलना चाहती थी। उस बच्ची ने बताया कि किस तरह वह इस केस में दिलचस्पी ले रही थी। ऐसे बहुत से किस्से हैं।

- जिस तरह के लोग इस मामले में शमिल थे, उसे देखते हुए इतनी लंबी लड़ाई लड़ना आसान नहीं था। कहां से ताकत मिली आपको?

पता नहीं...। दैवीय ताकत ही होगी कोई। मैंने तो कभी परेशानी देखी ही नहीं थी। बचपन में, स्कूल में, पढ़ाई से लेकर शादी होने और बच्चों के बडे़ होने तक कभी किसी दिक्कत का सामना करना ही नहीं पड़ा था। और अचानक एक दिन पूरी दुनिया ही बदल गई। मुझे लगता है कि मैंने जिस हाल में अपने बेटे (लाश) को देखा, वह क्षण था, जब मुझे लगा कि मैं अगर टूट गई, तो इस बच्चे को न्याय नहीं मिलेगा। जब वह घर से निकला था, तो एक शादी के समारोह में जाने के लिए पूरी तरह सज-धजकर निकला था। और यहां... मैं वहां गई थी शिनाख्त के लिए और मुझे आधा मिनट भी नहीं लगा पहचानने में। दृश्य देखकर मैं हिल गई थी, मेरे पांव कांपने लगे थे। लेकिन फिर मैंने सोचने में जरा भी देर नहीं की। वह खुद भी कहीं अन्याय होते देखता, तो परेशान हो जाता था। मैंने सोचा, उसके लिए लड़ना पड़ेगा। और फिर किसी दूसरे के बच्चे के साथ ऐसा न हो। मैं तो घर से बाहर के हर काम के लिए हमेशा अपने पति पर निर्भर रही। इसलिए मुझे लगता है कि भगवान ने ही मुझे शक्ति दी। पोस्टमार्टम, डीएनए टेस्ट वगैरह कानूनी औपचारिकताओं को लेकर मैं जिस तरह के सवाल कर रही थी, मेरे साथ वाले भी आश्चर्यचकित थे। मुझे ध्यान आया कि जेसिका लाल के प्रकरण में डीएनए से छेड़छाड़ की खबरें आई थीं। मैंने वहीं फैसला किया कि डीएनए टेस्ट गाजियाबाद में नहीं, दिल्ली में होगा।

- बेटे के साथ हादसा, फिर आपके पति नहीं रहे। 14 साल के संघर्ष में आपको कभी लगा कि अब हिम्मत जवाब दे रही है?

लगता था कभी-कभी। बहुत सारी दिक्कतें थीं। मैं खुद नौकरी कर रही थी। आर्थिक दिक्कतें थीं। केस लड़ने के लिए अच्छे वकील की जरूरत होती है और पैसा भी लगता है। इसलिए कभी-कभी लगता था कि बस हो गया। पर ऊपर वाला समस्याएं हल कर देता था। फिर एक स्टेज ऐसी आ गई थी, चार-पांच साल बाद, जब लगा कि अब छोड़ा, तो पिछली सब मेहनत बेकार चली जाएगी। भारती यादव को गवाही के लिए लाना सबसे थकाऊ प्रक्रिया साबित हुई। 30-40 आदेश हैं, ढेर सारी चिट्ठियां हैं। उसमें बहुत दौड़-भाग करनी पड़ी। उसको लाने में सफलता मिली, उससे भी आत्मविश्वास बढ़ा। तब तक मुझे यह फीडबैक मिलने लगा था कि जो मैं कर रही हूं, वह केवल एक कोर्ट केस नहीं है। मीडिया ने साथ दिया, जिससे मुझे लगा कि मैं अकेली नहीं हूं।

- आपके सामने आपराधिक बैकग्राउंड और राजनीतिक रसूख वाले लोग थे। कभी धमकियां मिलीं? डर लगा?

हां, धमकियां मिलीं। शुरू में तो मुझे आपराधिक बैकग्राउंड के बारे में इतना पता भी नहीं था। यह पता था कि नेता हैं और जैसी धारणा है नेताओं के बारे में कि भ्रष्ट होते हैं। बस उतना ही पता था। विकास यादव के बारे में जानकारी थी कि जेसिका लाल केस में शामिल है, पर उसके आपराधिक इतिहास के बारे में पता नहीं था। नीतीश ने कभी इस तरह से जिक्र नहीं किया था अपने और भारती के अफेयर के बारे में। जब डीपी यादव पर मकोका के तहत मामला दर्ज हुआ, तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। तीन तरह के फोन और पत्र आते थे। कुछ मदद करना चाहते थे, पर सामने नहीं आना चाहते थे। दूसरे सीधे धमकी वाले होते थे कि आपको और आपके पति को बाइज्जत आपके बेटे के पास पहुंचा दिया जाएगा। और तीसरे होते थे, जो कहते थे कि हमने भी लड़ाई लड़ी, पर बर्बाद हो गए। ये सब अज्ञात थे, कोई खुलकर सामने नहीं आया, इसलिए मैंने भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी।

- राजनीतिक दलों की ओर से किसी ने कभी मदद की पेशकश की?

नहीं। बिल्कुल नहीं। जिनको मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती थी, जैसे कांग्रेस की नेता मोहसिना किदवई। उनकी बेटी और मैं साथ पढ़े थे लखनऊ में। इस नाते वह जानती थीं। नीतीश की तेरहवीं में वह आई थीं। ऐसे ही कुछ और भी थे, पर वह केवल मिलने तक सीमित था। एक और नेता, जो उस समय भाजपा सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री थे, उनके सबसे नजदीकी सहायक को मैं जानती थी। उन्हें जरूर मैंने फोन किया। वह मिलने भी आए, लेकिन जो सलाह उन्होंने दी, उससे मुझे बड़ी हैरत हुई। उन्होंने कहा, आप मीडिया के चक्कर में ज्यादा न पड़ें, इससे आप परेशानी में भी आ सकती हैं। अब मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूं कि मैंने उनकी सलाह नहीं मानी, वरना यह केस तो आगे बढ़ता ही नहीं।

- इस दौरान कभी विकास यादव, विशाल यादव या डीपी यादव से कहीं आमना-सामना हुआ?

उस तरह से तो नहीं, पर कोर्ट में तो वे रहते ही थे। डीपी यादव ट्रायल के दौर में नहीं आते थे। जब भारती आई, तब आए। बाद में, जब हाईकोर्ट में मामला चल रहा था, तब भारती आती थी। आखिरी बार जिस दिन फैसला आया, उस दिन सुप्रीम कोर्ट में मुझे उस परिवार से कोई नहीं दिखा। ट्रायल कोर्ट तक काफी लोग आते थे। पांच-सात को तो रोज देखते-देखते मैं पहचानने लगी थी। शुरुआत में अजीब लगता था, पर बाद में मैं नजरअंदाज करने लगी।

- भारती यादव के व्यवहार ने आपको निराश किया?

मुझे भारती से ज्यादा अपने बेटे नीतीश से निराशा हुई कि उसने ऐसी लड़की चुनी। मुझे ऐसा लगता है कि उस रात, जब नीतीश की हत्या हुई, वह चाहता तो भारती के भाइयों को झूठ बोलकर बच सकता था। लेकिन उसने भारती से संबंधों को स्वीकार किया होगा और तब उनकी बात बढ़ी होगी। मुझे देश की ऐसी बेटियों से शिकायत है, जो संपन्न घरों से हैं, अच्छे स्कूल-कॉलेज से पढ़ी हैं, अपने पैरों पर खडे़ होने में सक्षम हैं, बावजूद इसके सच बोलने की हिम्मत नहीं करतीं। मुझे उसका बुरा लगा। भारती को तो पता था उसका परिवार कैसा है? नीतीश का तो तर्क होता था कि इसमें भारती की क्या गलती? वह तो वहां से निकलना चाहती है। वह अपने नाम के आगे यादव नहीं लगाती। भारती सिंह लिखती है। अपने भविष्य के लिए वह कुछ भी करती, पर नीतीश और अपने संबंधों के बारे में सच तो बोल सकती थी। आखिर उसकी वजह से नीतीश की जान गई थी।

- आप खुद अच्छे घर से हैं, कॉन्वेंट से पढ़ी हैं। आपके पति प्रशासकीय सेवा में रहे। क्या इस वजह से आपको कोई मदद मिली?

शिक्षा बहुत बड़ा कारण है। मुझे घर या स्कूल में जो शिक्षा मिली, उसने मुझे हमेशा सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया। मैं चाहे कोर्ट में वकील हों या जानने वाले, उनसे सवाल पूछती रहती थी। मुझमें यह आत्मविश्वास था, जो हर व्यक्ति में नहीं होता। कोर्ट में ऐसे लोग मिलते थे, जिन्हें अपने केस के बारे में उतनी ही जानकारी होती थी, जितना उनके वकील बताते थे। दूसरा कारण डीपी यादव की वजह से इस केस में मीडिया की दिलचस्पी बनी हुई थी। राजनीति और अपराध का घालमेल होना। आम आदमी अपराधी किस्म के नेताओं से घृणा करता है। मीडिया को शायद नीतीश से कुछ सहानुभूति भी थी.. फिर धीरे-धीरे मीडिया के लोगों से मेरी भी अच्छी बनने लगी थी। ज्यादातर उनमें नीतीश के ही उम्र वाले थे और घर पर उनका आना-जाना लगा रहता था। पर प्रशासनिक तौर पर मदद मिली हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। थोड़ी-बहुत जान-पहचान के चलते कहीं सहूलियत हुई होगी, पर वह ऐसी नहीं।

- आपने कहा है कि अब आप ऑनर किलिंग के खिलाफ अभियान में जुड़ना चाहेंगी। किस तरह से करेंगी?

बहुत से सुझाव हैं, पर अभी अंतिम रूप से कुछ तय नहीं है। मुझे लगता है कि इस पर रोक के लिए सख्त कानून की जरूरत है। और जिस तरह का बहुमत इस समय सरकार के पास है, उसमें यह हो सकता है। स्वयंसेवी संगठन सेमिनार वगैरह करते रहते हैं और उनमें मुझे बुलाया जाता है, तो मैं इस मसले को उठाना चाहूंगी और चाहूंगी कि मीडिया भी इसमें साथ दे। अगर इस विषय पर कुछ कर पाई, तो यह इस केस की बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। अपनी तरफ से मैं पूरी कोशिश करूंगी।

- आपको नहीं लगता कि ऑनर किलिंग के साथ यह मामला धनबल, बाहुबल के अहंकार का भी था?

बिल्कुल था...। मैं राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ भी लड़ना चाहूंगी। पर एक समय में एक ही मुद्दा लूं, तो बेहतर है। आप देखिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल में बलात्कार का एक आरोपी पूरे दो साल रहा। कोई कुछ नहीं कर पाया। क्या इतना समय सुबूतों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा? यह गलत है कि जब तक अपराध साबित न हो जाए, तब तक अपराधी नहीं मान सकते। विधायक, सांसद जैसे पदों पर बैठे लोगों के ऊपर तो इस तरह के गंभीर आरोप लगना ही इस्तीफे के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए। अगर ऐसे लोग एक चुनाव नहीं लडे़गे, तो क्या हो जाएगा? विकास या विशाल यादव को भी यही लगता होगा कि उनके पिता के खिलाफ कई मुकदमे होने के बावजूद वह सांसद बन सकते हैं, तो अपराध करने से उनका क्या बिगड़ जाएगा? उनकी पूरी भाव-भंगिमा में यह अहंकार झलकता रहा है। मैं अब भी आश्वस्त नहीं हूं कि यह कौन सुनिश्चित करेगा कि जितने साल तक उन्हें जेल में रखे जाने की सजा हुई है, उतने साल वे रहेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि किसी दिन किसी सार्वजनिक जगह पर वे लोग मेरे बगल में खड़े नहीं मिलेंगे?

- इस केस के चलते पिछले 14 साल में आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह के बदलाव आए?

अच्छी-खासी नौकरी कर रही थी। केंद्रीय विद्यालय संगठन में एजुकेशन ऑफिसर के तौर पर मेरा प्रोमोशन भी हो चुका था। और अचानक बैकफुट पर आ गए। अदालतों की तारीखें, और दौड़-भाग वगैरह। ऑफिस में लोग अच्छे थे, लेकिन वहां भी काम तो करना ही था। यह एक और अहम मसला है कि आम आदमी कोर्ट में क्यों नहीं लड़ पाता? तारीख के लिए आप छुट्टी लेते हैं और पता चलता है कि उस दिन सुनवाई हुई ही नहीं। दूसरे दिन आधे दिन की छुट्टी ली, तो पता चला कि सुनवाई दोपहर बाद होगी। पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम तो बिल्कुल ही बंद हो गए। टीचर ट्रेनिंग का मुझे जुनून था। अब मैं वापस जाना भी चाहूं, तो नहीं जा पाऊंगी।

साभार: हिन्‍दुस्‍तान

डेंगू से ग्रसित एक महिला की जिन्‍दगी खतरे में, दौड़ पड़ी बच्चियां

: जिनकी डीएनए में यह आदत है, नियमित रक्‍तदान करना आपको संतोष और दूसरों को जिन्‍दगी देता है : सवाल प्रशंसा जुटाना नहीं, किसी का जीवन बचाना खुद को प्रेरणा दे जाता है : मैं केवल आत्‍म-स्‍तुति नहीं मानता, लेकिन अगर जो अगर यह करना भी चाहें तो इसमें हर्ज क्‍या :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज अचानक शिवानी कुलश्रेष्‍ठ ने अस्‍पताल में भर्ती डेंगू से ग्रसित एक बिटिया की खबर पोस्‍ट की है, जिसकी हालत काफी नाजुक है और उसे तत्‍काल पांच यूनिट खून की जरूरत है। मैंने स्‍वाभाविक तौर पर न केवल अपनी सहमति दे दी, बल्कि यह भी कह दिया कि दूसरा यूनिट ब्‍लड मेरी बड़ी बिटिया बकुल दे देगी। डोंट वरी। शिवानी मेरी बेटी की तरह है और लखनऊ हाईकोर्ट में बिलकुल अभी अभी प्रेक्टिस करने पहुंची है। हालांकि उसका मकसद न्‍यायिक सेवा अधिकारी बनना है। बहरहाल।

लेकिन यह केवल लफ्फाजी नहीं, यह सब मेरी आदतों में शामिल है। और सिर्फ मैं ही नहीं, मेरे परिवार के डीएनए में, रग-रग में शामिल हैं यह गुण। केवल बड़ी़ बेटी बकुल सौवीर ही नहीं, मेरी छुटकी बिटिया साशा सौवीर भी इस अभियानों में बढ़-चढ़ कर सक्रिय रहती है।

खैर, आइये। इस वीडियो को निहारिये। यह वीडियो, छह साल पुराना है और सात सितम्‍बर के दिन का ही है।

नियम से रक्त-दान करने वाली मेरी बेटी बकुल के चेहरे पर कितनी मुस्कुराहट और आत्मविश्वास है। है ना ? यह फोटो उन लोगों के लिए तो खासतौर पर प्रेरणा-स्रोत बन सकती है, जिनके मन में रक्तदान किसी हौवे की तरह बैठ चुका है। आपका खून किसी के काम आ जाए, इससे बढकर और क्या हो सकता है? भइया आप किसी की जान बचा रहे हैं, किसी का घर अंधेर ...के घेरे से निकाल रहे हैं। यह पुण्य है। खूब कीजिए। बेहिचक।

वैसे मैं यह काम किसी प्रशंसा के लिए नहीं करता हूं। लेकिन यह भी मानता हूं कि पीठ थपथपाया जाना एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेरणास्पद बात होती है। हां, एक बात और, किसी घटना को होता हुआ देखना भी उससे कई गुना ज्यादा प्रेरणा दे जाती है। मेरी बडी बेटी का नाम बकुल सौवीर है। बीए थर्ड इयर में पढती है। इसी साल जुलाई के पहले हफ्ते में मेरे एक मित्र की मां को खून की जरूरत थी। मेरे साथ मेरे सहयोगी कुलदीप द्विवेदी ने भी रक्त दिया। फिर भी कम पडा तो बकुल पहुंच गयी। आप देख सकते हैं कि नियम से खून दान करने वाली बकुल के चेहरे पर कितनी मुस्कुराहट और आत्मविश्वास है। यह फोटो उन लोगों के लिए तो खासतौर पर प्रेरणा-स्रोत बन सकती है, जिनके मन में रक्तदान किसी हौवे की तरह बैठ चुका है।

बकंल द्वारा किया गया रक्‍तदान का नजारा अगर आप देखना चाहें तो निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए। इससे बकुल के चेहरे पर तनाव-रहित और दमकता उल्‍लास दिखेगा। इसे आप अपने घर-पड़ोस-मोहल्‍ले की बच्चियों को दिखा कर उन्‍हें प्रोत्‍साहित कर सकते हैं:- बे‍टी के लिए बेटी का रक्‍तदान

 

धंधेबाज सुब्रत राय फिर शिकंजे में। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, कहां से मिली इत्‍ती रकम?

: सुप्रीम कोर्ट तक को मूर्ख बनाने का दुस्‍साहसी सुब्रत राय आज फिर सवालों की चूहेदानी में फंसा : कोर्ट ने पूछा कि 24 हजार करोड़ के भुगतान का जरिया बताओ, सुनवाई अब 15 दिन बाद होगी : सहारा इंडिया के वकील कपिल सिब्‍बल के ऐतराजों पर सहमत नहीं हो पायी कोर्ट, जरिया तो बताना ही पड़ेगा : सर्वोच्‍च अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी रकम आसमान से तो नहीं ही टपकी होगी :

संवाददाता

नई दिल्‍ली : धोखा और तिकड़ीबाज सहारा इंडिया का मुखिया की पूंछ आज फिर सुप्रीम में फंस गयी। देश के भोले-भाले निवेशकों की 24 हजार रूपयों की खून-पसीने की रकम को अपनी टोपीबाजी के चक्‍कर में लूटने के चक्‍कर में सवा दो साल तक तिहाड़ जेल में चक्‍की पीसने बावजूद सुब्रत राय की तिकड़मबाजी खत्‍म नहीं हो पायी। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सुब्रत राय की करतूतों को दबोच ही लिया, जैसे भागता चूहा चूहेदानी में फंसता है।कोर्ट ने आज साफ कहा कि यह बात हमें यह हजम नहीं हो रहा कि सहारा समूह ने दो महीने के भीतर लाखों निवेशकों के पैसे वापस कर दिए। शीर्ष अदालत ने कहा  कि 24000 करोड़ रुपये आसमान से नहीं गिरे होंगे।

अदालत ने समूह को इतनी रकम लाने का स्रोत बताने के लिए कहा है। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय सहारा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल से कहा कि हम दो महीने के भीतर लाखों निवेशकों के पैसे वापस लौटने के आपके मुवक्किल की क्षमता पर संदेह नहीं कर रहे हैं लेकिन हमें यह बात हजम नही हो रही है। पीठ में न्यायमूर्ति एआर दवे और न्यायमूर्ति एके सीकरी भी शामिल हैं. पीठ अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को करेगी.

पीठ ने सहारा समूह को अदालती आदेश केदो महीने के भीतर निवेशकों के पैसे वापस लौटाने के लिए 24000 करोड़ रुपये का इंतजाम करने का स्रोत बताने के लिए कहा है। पीठ ने कहा, इतनी रकम का इंतमाज करने का स्रोत क्या है। क्या आपने अन्य कंपनियों से रुपये लिए हैं। क्या आपने यह रकम बैंकों से निकाला है या अपनी संपत्ति बेचकर इसका जुगाड़ किया है। आप प्रमाणित कर दें तो हम मिनटों में निपटा देंगे मामला। पीठ ने कहा कि रुपये तो इन्हीं तीन विकल्पों से आए होंगे, कोई आसमान से तो नहीं टपके होंगे। पीठ ने यह भी कहा कि अगर आप प्रमाण देते हैं कि सभी निवेशकों के पैसे वापस कर दिए गए हैं तो हम मिनटों में मामले को रफा-दफा कर देंगे।

इस पर सिब्बल ने कहा कि विभिन्न स्रोतों से रकम का जुगाड़ किया गया है। हमने पहले ही हलफनामे में इसका ब्योरा दे दिया है। वहीं सेबी की ओर से पेश वरिष् वकील अरविंद दत्ता ने कहा कि हम जाकर निवेशकों का पता नहीं लगा सकते हैं, लेकिन हम रकम के इंतजाम का स्रोत अवश्य जानना चाहते हैं। जवाब में सिब्बल ने कहा कि हमने निवेशकों केपैसे वापस कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि अधिक से अधिक आपको यह लग सकता है कि हमने इसके लिए काले धन का इस्तेमाल किया हो। अगर ऐसा है तो यह देखने का काम आयकर विभाग का है न कि सेबी का। मालूम हो कि सहारा प्रमुख फिलहाल पैरोल पर हैं। पांच हजार करोड़ रुपये नगद और इतनी ही राशि की बैंक गारंटी का इंतजाम न कर पाने के कारण अब तक उन्हें जमानत नहीं मिल सकी है।

सहारा समूह ने बाद में इस बारे में एक बयान में कहा है, 'यह बताना प्रासंगिक होगा कि सहारा देश भर में लगभग 5000 शाखाओं के जरिए परिचालन करता है और यह भुगतान केवल उन्हीं शाखाओं के जरिये किया गया.' इसके अनुसार, 'सहारा की शाखाओं के अखिल भारतीय नेटवर्क के जरिए ही कंपनी ने धन लौटाया (रिफंड किया) है.' समूह ने अपने वकील के माध्यम से कहा है कि इन भुगतान (रीपेमेंट) से जुड़े सभी दस्तावेजों की मूल प्रतियां व निवेशकों द्वारा लौटाए गए मूल ब्रांड प्रमाण पत्र सेबी को सौंप दिए गए हैं.

मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 'आप बताएं कि इस पैसे का स्रोत क्या है? क्या आपको अन्य कंपनियों और अन्य योजनाओं से 24,000 करोड़ रुपये मिले? बैंक खातों से यह राशि निकाली? या फिर संपत्ति बेचकर यह राशि जुटाई? यह इन तीनों में से किसी एक माध्यम से होगी। पैसा उपर से नहीं गिरता। आपको बताना होगा कि यह धन आपको कहां से मिला। पीठ ने सहारा समूह के वकील से कहा, ''हमें आपके मुवक्किल की निवेशकों को करोड़ों रुपये लौटाने की क्षमता पर संदेह नहीं है। वह भी सिर्फ दो महीने में नकद भुगतान। लेकिन, आप इस धन का स्रोत बताएं, उसके बाद भानुमति का पिटारा खोलने की जरूरत नहीं पडे़गी।'

इस बेंच में न्यायमूर्ति एआर दवे और न्यायमूर्ति एके सीकरी भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच इस मामले की सुनवाई अब 16 सितंबर को करेगी। पीठ ने कहा कि आप उस दिन सुनवाई की शुरुआत यह बताकर ही कह सकते हैं कि आखिर आपको इतनी रकम मिली कहां से। सहारा प्रमुख सुब्रत राय के वकील कपिल सिब्बल ने पीठ से कहा कि समूह ने धन जुटाकर निवेशकों को नकद में लौटा दिया है और सेबी करोड़ों निवेशकों को तलाशने से पीछे हट रहा है।

इस पर पीठ ने कहा, 'आप हमें दस्तावेज दिखाएं। अन्य योजनाओं में कैसे धन पड़ा है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि यह आपका दावा है। सेबी का काफी सरल सवाल है। हमें बताएं कि आपको यह पैसा कहां से मिला। आप हमें बताएं हम मामला बंद कर देंगे। आप बताएं कि आपने 25,000 करोड़ रुपये नकद कैसे जुटाए।

सिब्बल ने कहा कि समूह किसी तरह की भी जांच को तैयार है। यदि यह माना जाए कि यह कालाधन था तो भी समूह की जांच की जा सकती है, लेकिन यदि यह कालाधन है तो सेबी जांच करने वाला कौन है। यह आयकर विभाग का मामला है। हालांकि, इस पर पीठ ने कहा कि यह उद्योग घराने को बताना है कि धन का स्रोत क्या है। क्या यह हिसाबी धन है या बेहिसाबी धन है। 'यह आपके बैंक खाते में पड़ा था या फिर आपकी अन्य योजनाओं से आया है।

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