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सैड सांग

आगरा व बरेली में दी गयी थी रेप पर फांसी की सजा

: आशियाना कांड में जिस तरह अपराधी को बचाने की साजिशें हुईं, उससे न्‍याय के प्रति समाज की आस्‍था ही चकनाचूर हो गयी थी : वकीलों ने पूरे दस बरस तक झूठी दलीलें दीं, और जजों ने उन दलीलों को सुनने में पूरा एक दशक लगा दिया : फास्‍ट ट्रैक कोर्ट से आशा बंधी है, पर सूखी जमीन पर चंद बूंदों सी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : करीब 15 बरस पहले लखनऊ के आशियाना कालोनी में एक बच्‍ची से हुए सामूहिक बलात्‍कार में जिस तरह वकीलों और जजों ने कानून का माखौल उड़ाया था, वह हमारे समाज और वादकारी हित सर्वोच्‍च का नारा देने वाली न्‍यायपालिका के चेहरे पर किसी भयावह कालिख से कम नहीं थी। इस मामले में अपराध और राजनीति से जुड़े एक बड़े खानदान के युवक को बचाने के लिए वकीलों ने भरसक साजिशें बुनी थीं। और शर्मनाक की बात तो यह रही थी कि उस अपराधी के पक्ष में बड़े दिग्‍गज वकीलों की झूठी दलीलों के सामने अदालत के बड़े-बड़े जज भी घुटने टेकते रहे। वकीलों की साजिश थी कि कैसे भी हो, उस मुजरिम को नाबालिग साबित कर दिया जाए, ताकि उसे एकाध बरस की हल्‍की सजा देने के लिए किशोर-गृह भेज दिया जाए। इस साजिश को पूरे करीब एक दशक तो सच साबित करने की कोशिशें हुईं। जबकि किसी भी व्‍यक्ति के बालिग होने अथवा न होने का प्रमाण किसी भी डॉक्‍टर अथवा डॉक्‍टरों की टीम से जांच कराने में चंद घंटे ही पर्याप्‍त होते हैं। वह तो गनीमत रही कि दस साल तक झूठ की इमारत खड़ी होने के बावजूद सच का पलड़ा भारी पड़ गया।

इस अथवा ऐसे मामलों से प्रमाणित होता है कि सच को झूठ और झूठ को सच के तौर पर पेश करने की कवायद में कौन लोग लिप्‍त होते हैं। ऐसे में यह जिम्‍मेदारी केवल जजों की ही होती है कि वह न्‍याय के पक्ष में रहें। और ऐसा भी नहीं है कि अतीत में जजों ने अपने इस दायित्‍व का निर्वहन नहीं किया है। कम से कम फास्‍ट-ट्रैक कोर्ट की अवधारणा ने सुलभ न्‍याय की सम्‍भावनाओं का सुखद सपना पूरा करने की कोशिश तो की ही है। लेकिन ऐसी चंद अदालतों से समस्‍या का समाधान की सम्‍भावनाओं को पूरा नहीं खोजा जा सकता है।

मेरे पास कम से कम दो मामले मौजूद हैं जिसमें न्‍यायाधीशों ने मुकदमों की सुनवाई में न्‍यूनतम समय लगा कर न्‍याय-प्रक्रिया के प्रति अपनी पूरी संवेदनशीलता का गंभीर प्रदर्शन किया था। उन जजों ने ऐसे मामलों पर त्‍वरित सुनवाई कर फैसला किया था। फैसला भी ऐसा, जिसमें कैपिटल पनिशमेंट यानी सर्वोच्च दंड सुनाया गया। अर्थात फांसी की सजा। लेकिन इसके विपरीत अधिकांश मामलों पर न्यायपालिका का जो रवैया होता है उसे समाज में न्यायपालिका और राज्यसत्ता के प्रति दयनीय चरित्र का प्रदर्शन करता है और इन हालातों के चलते ऐसी हालत में समाज में नैराश्य और तदनुरूप अवसाद भाव तक का भयावह संक्रमण हो जाता है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

पहला मामला तो आगरा का है जहां एक नन्ही बच्ची के साथ एक दुराचारी में इतना यौन-नृशंस व्यवहार किया कि उसकी मौत हो गई। उस बच्ची के गुप्तांगों पर उस दुराचारी ने भारी और जानलेवा हमला किया था। यह मामला जब अदालत में पहुंचा तो उस वक्त जज की कुर्सी पर आसीन थे आलोक कुमार बोस। आलोक बोस ने इस मामले को प्राथमिकता के साथ में सुना, तथ्‍यों का विश्‍लेषण किया और अन्‍तत: दुराचारी को फांसी की सजा सुना दी। जबकि यह एक ऐसा मामला था जिसमें अदालत के फैसले पर किसी ने भी कोई आपत्ति नहीं की। कोई आवाज नहीं उठायी गयी। चंद लोगों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी सभी लोग इस फैसले से संतुष्ट और प्रसन्न थे। इस मामले में अदालत ने जिस तरह तथ्‍यों का विश्‍लेषण कर यह फैसला सुनाया था, उसे सुप्रीम कोर्ट तक में हुई अपील का कोई भी फर्क नहीं पड़ा, और दुराचारी हत्‍यारे को फांसी की सजा बरकरार ही रही। इस वक्‍त उसकी दया याचिका राष्‍ट्रपति के पास लटकी हुई है।

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लर्नेड वकील साहब

दूसरा मामला था यूपी के रुहेलखंड क्षेत्र के बरेली का। इस मामले में भी एक मासूम बच्ची के साथ बेहद डरावना और रोंगटे खड़ा कर देने वाला जघन्य अपराध किया गया था। बच्ची पर इतना अत्याचार किया गया कि उसकी मौत हो गई। इस मामले की सुनवाई की थी तब के जज राजेंद्र सिंह ने। राजेंद्र सिंह ने इस मामले की गंभीरता को देखा और इस मामले के गुण-दोष को परखने के लिए सभी पक्षों को अपनी बात समय बद्ध तरीके से पेश करने का आदेश दिया था। बरेली में हमारे सूत्र बताते हैं कि बहुत ही कम ही समय में राजेंद्र सिंह ने इस मामले की सुनवाई को खत्म किया, और अभियुक्त दुराचारी तथा नराधम हत्‍यारा करार देते हुए अपराधी को फांसी की सजा सुना दी थी। (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला

बच्चियों से रेप: फांसी का प्राविधान तो पहले से है

: सवाल यह है कि जब पर्याप्‍त कानून मौजूद था, फिर केंद्र सरकार ने यह नयी व्‍यवस्‍था वाला अध्‍यादेश क्‍यों जारी किया : मुकदमे का फैसला होने में 25 30 साल लग जाए तो फिर नाकारा और बेशर्म है तुम्हारी सत्ता : ऐसे में कैसे हो सकता है आम आदमी सुरक्षित :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सवाल यह है कि जब किसी भी बलात्कारी पर कड़ी सजा देने के प्राविधान पहले से ही न्यायपालिका के पास है तो फिर बलात्कारों के मामलों पर केंद्र सरकार ने यह नया अध्यादेश क्यों जारी कर दिया कि नन्‍हीं बच्चियों से बलात्‍कार और हत्‍या में दोषी पाये गये मुजरिमों को फांसी तक की सजा दी जा सकती है। इसके कई बरस पहले तक कई मामलों में कुछ संवेदनशील न्‍यायाधीशों ने पहले से मौजूद कानूनों के आधार पर जघन्‍य बलात्‍कार और उसके बाद पीडि़त बच्चियों की नृशंस हत्‍या करने में अपराधी साबित हुए अपराधियों को फांसी की सजा सुनायी थी।

हालांकि इन हालातों के होते हुए भी सच यही है कि जघन्‍य अपराधों की सुनवाई में सामान्‍य तौर पर डेढ़ से तीन दशक तक का वक्‍त लग जाता है। सामान्‍य तौर पर इन हालातों का ठीकरा सीधे न्‍यायपालिका पर भी फोड़ा जाता है। ऐसी हालत को देखा जाए तो न्यायपालिका को और ज्यादा गम्‍भीर, सक्रिय और संवेदनशील बनाने की जरूरत है, ताकि वह वादियों और समाज को सहज और सुलभ न्‍याय मुहैया कर, और अपराधियों के खिलाफ कड़ा दण्‍ड दिला सके। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसा करने के बजाय हम लगातार नए-नए और अनावश्यक कानूनों को घिरते बुनते रहे हैं। पिछले हफ्ते केंद्र सरकार द्वारा बलात्‍कार के मामलों पर कड़े दण्‍डों के प्राविधानों वाला जो अध्‍यादेश जारी कर मुजरिमों को फांसी की सजा दिलाने का ऐलान किया है, वह उसी मकड़जाल का एक नमूना ही तो है।

न्यायपालिका को कुछ जानने-समझने वाले लोग और न्‍यापरिसरों व अदालतों से जुड़े लोगों को खूब पता है कि न्यायपालिका के पास पर्याप्त अधिकार है। लेकिन इस बात का जवाब किसी के पास भी नहीं है कि इतने पर्याप्त और सक्षम कानूनों के होते हुए भी न्यायपालिका क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। क्या वजह है कि समाज के लिए गंभीर और जघन्‍य-नृशंस अपराध साबित हो सकने वाले मामलों पर अदालत लम्‍बे समय तक खामोश रहती है। और नतीजा यह कि ऐसे मामलों को निपटाने मैं उसे 10-20 साल नहीं, बल्कि अक्सर तो 25-30 साल तक लग जाता है। विलम्‍ब से गवाही होने से अधिकांश गवाह अपना बयान बदल देते हैं, या फिर उनकी याददाश्‍त गड़बड़ाने से मुकदमा संदेहों में घिर जाता है। नतीजा, मुकदमे छूट जाते हैं और अपराधी अदालतसें से छूट कर समाज का चरित्र विद्रूप रचने में जुट जाता है।

लखनऊ के आशियाना कालोनी में करीब 15 बरस पहले हुए उस हादसे की याद तो आपकी स्‍मृति-पटल पर शायद अब तक दर्ज होगी, जब एक एक नन्ही मजदूर बच्‍ची के साथ चंद बड़े और असरदार लोगों की निरंकुश औलादों ने दुराचार कर उसे मरणासन्‍न हालत तक पहुंचा दिया था। यह पूरा हौलनाक हादसा आज भी आशियाना बलात्‍कार-काण्‍ड के तौर पर जाना-पहचाना जाता है। शाम के धुंधलके में शहर के एक बड़े दबंग और राजनीति लखनऊ के आशियाना में हुआ था। अदालत में इस मामले की धज्जियां तो खूब उधेड़ने की तैयारियां थीं, लेकिन उस सामूहिक दुराचारी लोगों में से एक व्‍यक्ति भी शामिल था, जिसके चाचा समाजवादी पार्टी के बड़े असरदार नेता था।च

फिर क्‍या था। लखनऊ के चंद बड़े वकीलों ने मिलकर इस मामले को संवेदनशीलता की जमीन पर नहीं, बल्कि अपने मुअक्किल के रसूख और उनकी खनखनाती रूपहली थैली की भौतिकता के सामने घुटने टेक दिये। कितने शर्म की बात है कि इन वकीलों ने इस मामले को करीब 10 बरसों तक केवल इसी मुद्दे पर लटकाये ही रखा, कि उस सामूहिक दुराचार-काण्‍ड का मुख्‍य अभियुक्‍त हादसे के वक्‍त नाबालिग था। हैरत की बात है कि इन वकीलों की दलीलों का सिक्‍का अदालतों में लगातार पूरी बेशर्मी की धमक के साथ चलता ही रहा। जबकि किसी भी व्‍यक्ति के नाबालिग होने की बात साबित करने के लिए केवल एक डॉक्‍टरी-जांच से ही पर्याप्‍त थी, जिसे अधिकतम एक घंटे में निपटाया जा सकता था। इतना ही नहीं, उन वकीलों ने उस दुराचारी के उम्र को छुपाने की सारी कोशिशें कीं, लेकिन आखिरकार उस दुराचारी की हाईस्‍कूल का प्रमाणपत्र ही इस तथ्‍य को साबित करने के लिए पर्याप्‍त था, जिसमें वह दुराचारी पूरी तरह बालिग था। मगर जज लोग वकीलों के ऐसे षडयंत्रों की ओर से मुंह मोड़े बैठे हीरहेेे (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला

शायद मर्दाना दवा ले रहे हैं यूपी के जनप्रतिनिधि

: कहीं विधायक, तो कहीं उनके प्रतिनिधियों ने यूपी की जनता का जीना मुहाल कर डाला : एक माननीय पर चढ़ा एक विवाहिता से इश्‍क का भूत, जुनून में उसके पति को बर्बाद करने की धमकी दे डाली : बहराइच से लेकर बांदा, गोंडा से मेरठ और जौनपुर तक हर जगह जनप्रतिनिधियों का हंगामा : जोगीजी आह-आह एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : कभी यह लोग बेवजह हूटर बजा कर आम आदमी का जीना हराम कर देते हैं, तो कभी लाठियां लेकर किसी न किसी की हड्डियां चटका देते हैं। अपने खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश करने के लिए यह लोग किसी की भी मौत का सौदागर बन सकते हैं, तो कभी किसी को इतना पीट देते हैं कि दो-चार दिनों में उसकी दर्दनाक मौत हो जाए। हैरत की बात है कि इन लोगों का लखनऊ से लेकर अपने डीएम-एसपी और थाने तक जबर्दस्‍त धमक है। प्रशासन और पुलिस पर उनकी धमक है, इसलिए किसी को भी दो-चार दर्जन गंभीर मुकदमों में फंसा कर उसे जेल में ठूंस देना उनके बांये हाथ का काम है। किसी को एक व्‍यक्ति की विवाहित बीवी की दरकार है, और इसके लिए वह किसी भी कीमत अदा करने पर आमादा है। कोई एसपी तक को दुष्‍चरित्र साबित होने का सार्टिफिकेट बांट रहा है, तो कोई बड़े ओहदेदार अफसर को उसके दफ्तर में नोटों का हार थमा कर उसे महाभ्रष्‍ट साबित करने की कवायद में जुटा है। ऐसे लोग अपनी राह पर कंकड़ तक को बर्दाश्‍त करने को तैयार नहीं, बात-बात पर बेशुमार गालियां देते हैं, तो कभी सरेआम अपनी गुंडागर्दी का बेखौफ और बेशर्म प्रदर्शन करते हैं।

सरकार तब तक खामोश रहती है, जब मामला खुद सरकार की गर्दन का फंदा न बन जाए। जी हां, यह बेलगाम हरकतें कोई सड़कछाप गुण्‍डा, मवाली या अपराधी ही नहीं, बल्कि समाज में संवैधानिक हैसियत हासिल किये जनप्रतिनिधियों की करतूतें हैं। सच बात तो यह है कि इनकी हरकतों को देख-सुन कर शातिर-घुटे अपराधियों के भी छक्‍के छूट जाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इनमें से अधिकांश लोग या तो विधायक हैं, या फिर उनके पति हैं। ऐसे करीबी रिश्‍तेदारों में वे लोग हैं जो किन्‍हीं न किन्‍हीं कारणों से चुनाव नहीं लड़ पाये, लेकिन जनता की कसर निकालने के लिए उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को चुनाव लड़ा कर विधायक बनाया। आजकल राजधानी लखनऊ स्थित सचिवालय और सत्‍ता के गलियारों में यूपी के जनप्रतिनिधियों के किस्‍सों के चटखारे लिये जा रहे हैं।

हालत यह है कि प्रदेश के कई विधायक या तो आम आदमी को धमकी देने पर आमादा है या लाठियों को लेकर मैदान पर आ गए हैं। कुछ ऐसे विधायक भी हैं जिनकी खासी खानदानी आपराधिक पृष्ठभूमि  है। आम आदमी को लोगों को जानलेवा धमकियां देना और फोन पर भद्दी गालियां देने की गतिविधियों में लिप्त फिलहाल तो ऐसी-ऐसी हरकत करने पर आमादा हैं, जिन्‍हें सुन कर लोग शर्म से गड़ जाएं। ऐसे लोगों से अपनी जानमाल की मांग करने के लिए जब त्रस्‍त लोग सत्‍ता, शासन या स्‍थानीय प्रशासनिक अफसरों तक जाने की हिमाकत करते हैं, तो उन्‍हें उसकी खासी कीमत भी चुकानी पड़ती है।

प्रदेश के कई इलाकों में कई ऐसी भी घटनाएं हुई हैं जहां विधायकों ने अपनी हैसियत से बाहर अपनी हरकतों का प्रदर्शन किया है। इन लोगों ने प्रशासन तक को धमकी देते हुए चेतावनी दी है कि उनके इलाके में आपराधिक गतिविधियों के जिम्मेदार तो वहां के खुद अफसर ही हैं। एक विधायक ने तो सरेआम एक बड़े अफसर के ऑफिस में घुसकर नोटों की एक माला तक गले में डाल दी और कहा यह अफसर बहुत खुश मांगता है इसलिए उसे घूस की माला थमा दी गई है। एक अन्य विधायक पति ने एक फैक्ट्री में लाठी लेकर अफसरों को जमकर पीटा और अन्य एक इंजीनियर को हाथ-पैर तोड़ देने की कोशिश की। (क्रमश:)

एक बरस में ही यूपी सरकार की कलई उतरने लगी है। समाजवादियों की सरकार की भीषण गुण्‍डागर्दी से त्रस्‍त होकर जनता ने लपक कर अपने वोट भगवा-कटोरे में झरझरा कर उड़े लिया था, कि चाहे कुछ भी हो जाए, दमघोंटू अखिलेश सरकार से पिंड छूट जाए। लेकिन एक बरस होते-होते ही भाजपा सरकार ने सपा-सरकार के रिकार्ड तक चकनाचूकर कर दिये। फिलहाल तो बलात्‍कारों और हत्‍याओं की बाढ़ से यूपी सुलग रहा है, तो अराजकता का माहौल से जनता त्राहि-माम त्राहि-माम चिल्‍ला रही है। उधर सत्‍ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों की गुण्‍डागर्दी ने यूपी का कमल सुखा डालने की साजिश बुन दी है। यह एक श्रंखलाबद्ध आलेख है, जिसको हम लगातार क्रमश: प्रकाशित करने जा रहे हैं।

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जोगीजी आह-आह

भाजपा नेता ने बताया बहराइच को पाकिस्‍तान, कप्‍तान को लंगोट का ढीला

: बहराइच के नानपारा से भाजपा विधायक के पति ने पार कर दी मर्यादाओं की सारी सीमाएं, लगाये अनर्गल संगीन आरोप : कई आपराधिक मामलों में सजायाफ्त है पूर्व विधायक दिलीप वर्मा, अब बीवी को विधायक बनाया : साहसी कप्‍तान जुगल किशोर का चरित्र व छवि साफ-सुथरी और पुलिस विभाग में अनुकरणीय :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बहराइच को अपनी जागीर मानने वाली भाजपा विधायक और उनके प्रतिनिधि और पति की निगाह में नानपारा एक मिनी पाकिस्‍तान है। जहां देश-विरोधी गतिविधियां खुलेआम संचालित होती हैं। इतना ही नहीं, इस पाकिस्‍तान को बनाये रखने के लिए प्रशासन के लोग कमर कसे रहते हैं। खास कर जिले के पुलिस अधीक्षक जुगुल किशोर तिवारी। यह कप्‍तान लंगोट का कच्‍चा है, और एक महिला सिपाही को अपना सीयूजी मोबाइल थमा कर बेडरूम में घुसा रहता है।

यह आरोप है उस भाजपाई नेता को, जो खुद ही एक सजायाफ्ता अपराधी है। यह पहले विधायक था, लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय के प्राविधानों के मुताबिक सजा मिलने के बाद चूंकि चुनाव लड़ने के लिए अयोग्‍य हो गया तो अपनी पत्‍नी को चुनाव लड़ा दिया। बीवी जब विधायक बन गयी, तो वह खुद ही अपनी पत्‍नी का प्रतिनिधि की कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन उसकी हरकतें आज भी आपराधिक ही हैं। लेकिन अपनी ऐसी हरकतों को जायज ठहराने के लिए वह कभी तो साम्‍प्रदायिक माहौल बनाने पर आमादा होता है, तो कभी संवेदनशील प्रशासनिक अधिकारियों पर बेहद आपत्तिजनक और संज्ञेय आरोप लगाने तक में नहीं हिचकता। फिलहाल तो बहराइच में इसने खासा हंगामा खड़ा कर दिया है।

इस शख्‍स का नाम है दिलीप वर्मा। उसकी पत्‍नी का नाम है माधुरी वर्मा, जो नानपारा विधानसभा से भाजपा की विधायक हैं। कुछ समय पहले डिगिहा दोनक्‍का में दिलीप वर्मा ने एक दलित सिपाही को पीट दिया था। यह हादसा तब हुआ जब कुछ गन्‍ना किसान अपने ट्रक को लेकर चीनी मिल लेकर जा रहा था। उस समय ट्रैफिक दुर्व्‍यवस्‍था को दुरूस्‍त करने में जुटे इस सिपाही ने जब गन्‍ना गाडि़यों को रोकने की कोशिश की थी। दिलीप वर्मा ने आरोप लगाया था कि वह सिपाही अवैध उगाही कर रहा था, और इसी आरोप पर दिलीप ने उस सिपाही को बुरी तरह पीट दिया था। दिलीप वर्मा का आरोप था कि गन्‍ना लेकर जाने वाले किसानों को उगाही के लिए पुलिसवाले गन्‍ना गाडि़यों को रोकने की साजिश करते हैं। इसके साथ ही साथ कई अन्‍य अपराधों में भी दिलीप को सजा हो चुकी है।

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भरों की बहराइच

अब जरा अभी दो दिन पहले इस दिलीप वर्मा की हरकतों पर निगाह डालिये। उस दिन भाजपा विधायक माधुरी वर्मा के पति दिलीप वर्मा अपने दर्जनों साथियों के साथ नानपारा चीनी मिल में पहुंचे और जमकर हंगामा किया। दिलीप वर्मा का आरोप था कि चीनी मिल में किसानों के गन्ने की तौलाई में बेईमानी की जा रही है। इसी बात पर दिलीप वर्मा मिल में जबरन घुसने लगे। वहां मौजूद मिल के मुख्‍य सुरक्षा अधिकारी ने जब दिलीप वर्मा और उसके साथियों को रोकने की कोशिश की, तो दिलीन ने खुद ही एक सुरक्षाकर्मी की लाठी छीन कर मिल के कर्मचारियों को पीटना शुरू कर दिया। कर्मचारियों ने दिलीप वर्मा को रोकने की जब कोशिश की दिलीप वर्मा ने मुख्‍य सिक्योरिटी अफसर पर भी कहर तोड़ा। आरोप है दिलीप वर्मा ने मिलकर सिक्योरिटी अफसर ही नहीं, वहां मौजूद कई अधिकारियों पर भी जानलेवा हमला किया है।

लेकिन हैरत की बात है कि इस घटना के बाद प्रशासन खुद ही बैकफुट पर आ गया। पुलिस अधीक्षक ने यहां के पुलिस क्षेत्राधिकारी को नानपारा से हटा लिया। डीएम ने भी एसडीएम को भी रिलीव कर दिया, वैसे भी एसडीएम का पहले ही तबादला हो चुका था। मगर इससे मामला निपटाने के बजाय दिलीप वर्मा ने प्रशासन और खास कर पुलिस अधीक्षक पर ही हमला बोल दिया। आइये, इस वीडियो को देखिये कि उस हादसे के बाद दिलीप वर्मा ने किस तरह बहराइच में सांप्रदायिक आग को भड़काने की कोशिश की, और पुलिस प्रशासन की खिल्‍ली उड़ाते हुए कप्‍तान तक को नंगा करने की नापाक कोशिश की। आरोप लगाया कि नानपारा अब मिनी पाकिस्‍तान बन चुका है, और कप्‍तान चरित्रहीन है, जो महिला पुलिस सिपाहियों के साथ अपने बेडरूम में सीयूजी फोन लेकर घुसा रहता है।

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के प्रांतीय पुलिस अधिकारी एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके जुगल किशोर तिवारी के चरित्र और उनकी छवि हमेशा से ही साफ-सुथरी और पुलिस विभाग में अनुकरणीय रही है। इतना ही नहीं, सरकारी दायित्‍वों के निष्‍पादन के दौरान जुगल किशोर के अदम्‍य साहस और सूझबूझ की मिसाल दी जाती है। आज से 9 साल पहले चित्रकूट के राजेपुर गांव में घनश्याम केवट नामक एक कुख्यात और दुर्दांत डकैत के साथ करीब 52 घंटे तक चली पुलिस की मुठभेड़ में जुगल किशोर तिवारी ने जिस साहस का प्रदर्शन किया था, उससे लोग दंग रह गये थे। इस मुठभेड़ में आखिरकार घनश्याम डाकू मारा गया था। लेकिन साथ ही साथ एक आईजी, एक डीआईजी समेत कई अन्य पुलिस वालों को भी गंभीर छोटें आई थीं। घायलों को हेलीकॉप्‍टर से लखनऊ और दिल्‍ली रवाना गया था। इस हादसे में कई पुलिसवाले शहीद भी हुए थे।

अब जरा देखिये दिलीप वर्मा के बयान के वीडियो को, जिस पर दिलीप ने बेहद संगीन आरोप लगाये हैं। इस वीडियो को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

किस्‍सा गुण्‍डागर्दी और ढीली लंगोट का

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