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सैड सांग

मंडल-गिरोह ने महिलाओं का ब्रा-हनन कर डाला

: बेरोजगार होते ही दिलीप मंडल का सामने आ गया असली चेहरा : नये मुहावरे गढ़े गये हैं कि कर दी न,ब्राह्म्‍णों वाली बात, और नहाओ, धोओ। क्‍या ब्राह्मण की तरह मुंह बना रखा है : ब्राह्मण को नंगा करने के लिए जो प्रतीक गढ़े हैं इस गिरोह ने, उसका नाम रखा गया है ब्रा हनन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ब्राह्मण जब पतित होने लगता है तो अपने समुदाय के लिए भी कैंसर जैसा घाव पैदा कर देता है। ताजा नजीर हैं दिलीप मण्‍डल। अब यह तो पता नहीं है कि दिलीप मंडल जन्‍मना क्‍या थे, लेकिन इतना जरूर है कि उन्‍होंने शुरूआती जीवन में अध्‍ययन और ब्रह्म पर शोध किया और बाकायदा ब्राह्मण हो गये। तो, दिलीप जब तक पढ़ते-सोचते-लिखते रहे, तब वाकई ब्राह्मण ही थे। इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं में रहे, लेकिन अचानक पढ़ना-लिखना बंद हुआ तो सोचने का क्रमवार रसातल में रपटने-फिसलने लगा। नतीजा, इंडिया टुडे का साथ छूट गया। किसी और पत्रिकाओं ने उन्‍हें घास नहीं डाली। नतीजा, वैचारिक गंदगी में डुबकी लगाते हुए पूर्णकालिक मूर्खता में जुटे हैं।

आज उन्‍होंने कुछ नये मुहावरे गढ़े हैं। मसलन:-

कर दी न,ब्राह्म्‍णों वाली बात

नहाओ, धोओ। क्‍या ब्राह्मण की तरह मुंह बना रखा है।

ब्राह्मण का कुत्‍ता न घर का, न मंदिर का।

मार-मार कर ब्राह्मण बना दूंगा

ब्राह्मण की बुद्धि घुटने में होती है। वगैरह-वगैरह।

आज उनकी वाल पर उन्‍होंने और उनकी टोली ने ब्राह्मणों के खिलाफ एक नया शब्‍द गढ़ लिया है। ब्रा हनन। यानी स्‍तनों को नंगा कर देना।

आपको बता दें कि बौद्धिक चिंतन से जुड़े समुदाय में दिलीप मंडल का नाम एक घटिया सोच के तौर पर दर्ज है। वे समाज सुधार नहीं, समाज को सड़ा-गला डालने की वकालत करते हैं। लेकिन अपने भावातिरेक में मंडल और उनके यार यह भूल गये हैं कि ब्रा तो अब हर जाति की महिलाएं पहनती हैं।

सच बात तो यही है कि इस सोच ने ब्राह्मण पर हमला किया है अथवा नहीं, लेकिन उनकी विष-बौछार सभी समुदाय और जाति की महिलाओं पर अनिवार्य रूप से पड़ी है। ऐसे मुहावरे गढ़ने वालों के घर में भी यही मुहावरा लागू हो सकता है, काश वे यह समझ सकते।

बहरहाल, इस घटना से इतना तो तय हो ही गया है कि जाति नजरिया से समाज सुधारने का दम्‍भ-घमंड पाले लोगों की मानसिकता महिलाओं पर स्‍नेहशील नहीं, आक्रामक और बलात्‍कारी ही होती है।

पत्रकार हैं बांगड़-बिल्‍ला, आज फिर मनायेंगे श्रमिक-दिवस

: अभी भी वक्‍त है। कलम में ईमानदारी की स्‍याही भर कर मैदान में उतरो और दल्‍लागिरी बंद करो : क्‍या तुम्‍हें पता है कि समाज में आज कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई खबरंडी : अधिकांश लोग तो पत्रकारिता की अर्थी सजाने में व्‍यस्‍त हैं : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बाकी बात तो बाद में होगी, सबसे पहले तो उन झंडाबरदारों की जमात से कुछ सवाल पूछना लाजमी और बेहद जरूरी है जो खुद को समाज का सबसे जिम्‍मेदार कहते-कहलाने में दर्प-घमंड पाले घूमा करते हैं। यह न इधर के होते हैं, और न ही उधर के। मगर खुद को दोनों ही ओर के लोगों में शुमार होने के दावे करते हैं। यह लोग खुद को पीडि़त-उत्‍पीड़त सर्वहारा श्रमिक समाज का नुमाइंदा और उनकी आवाज उठाने वाला होने का दावा करते हैं। जबकि दूसरी ओर आसन लगाये और पूंजी पर काबिज लोगों की जी-हुजूरी करते हैं। मकसद यह कि कैसे भी हो, उनका पेट भरता रहे। यह सरकारी रकम हड़पने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। मगर कभी भी श्रमिक वर्ग के बारे में कोई भी आवाज नहीं उठाते।

जी हां, सही सोचा आपने। मेरा यह सवाल उपत्रकार-बिरादरी से जुड़े अधिकांश लोगों से ही है। ऐसा नहीं कि सारे पत्रकार घटिया हैं और पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं। यह कहना गलत होगा। लेकिन यह भी सच है कि इस बिरादरी के अधिकांश लोगों के बारे में आम आदमी की राय बेहद गम्‍भीर है। कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई तुम्‍हें खबरंडी पुकारता है। कोई भांड़ कहता है, तो कोई घुटिया बिचौलिया। जो चुल्‍लू भर दारू में अपनी आत्‍मा बेचने पर आमादा होता है। लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्‍ता जीएल यादव ने आज लिखा है कि, "भारतीय मीडिया गूँगी , अन्धी और बहरी हो गयी है। इनकी आत्मा तक बिक गयी है। देश की दुर्दशा पर ऐसी चुप्पी!"

तो ऐसा है पत्रकार जी, तुम बताओ तो कि, तुम श्रमिक दिवस मनाने वाली नौटंकी काहे करते हो? खुद को इजारेदारों के खिलाफ आवाज उठाते हो, मगर कभी भी तुमने अपने समाचार-संस्‍थान के मालिकों की करतूतों पर कोई आवाज ? तुम बताओ न कि ओवर-टाइम और बोनस जैसे शब्‍द अब तुम्‍हारी आवाजों से गायब कैसे हो गये? किसी भी संस्‍थान में चल रहे उत्‍पीड़न पर तुम अपनी आवाज उठाने के बजाय सीधे सम्‍पादक के तलवे चाटने पर ही क्‍यों आमादा रहे हो? मजीठिया आयोग ने तो तुम्‍हारे लिए सारे रास्‍ते खोल दिये थे, लेकिन तुम ही लपक कर मालिकों के पक्ष में चिट्ठी-पत्री लिखना शुरू कर देते हो, आखिर काहे? तुम्‍हारे सारे नेता क्‍यों कलंकित चेहरा काहे रखे घूमा करते हैं? झूठे नारे, झूठे दावे। किसकी रकम से तुम देश-विदेश घूमा करते हो? कौन होता है तुम्‍हारा फाइनेंसर? और उसका मकसद क्‍या होता है ऐसे आर्थिक सहयोग देने का? अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए खुद को श्रमिक कहलाते हो? जबकि हो पक्‍के नपुंसक। कापुरूष। खैर, जल्‍दी ही तुम लोगों पर तो अब एक श्रंखलाबद्ध आलेख रिपोर्ट तैयार कर ही रहा हूं। प्रतीक्षा करना।

तुम ठेके पर काम करते हो, यानी ठेकेदार हो। है न?  विज्ञापन का काम करते हो, इसलिए विज्ञापन प्रतिनिधि हो। है न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? गड़बड़ काम कराने का जिम्‍मा लेते हो, इसलिए दलाल हो। हो न? आम आदमी से पैसा उगाहते हो, तो ब्रजेश सिंह और मुन्‍ना बजरंगी हो। हो न? अफसरों-नेताओं का चरण-चुम्‍बन करते हो, तो भांड हो। हो न? चलो, मान लिया कि तुम सजग पत्रकार हो। तो फिर यह बताओ कि मुख्‍तार अंसारी को पिछले महीनों जब तबियत खराब होने के दावे पर लखनऊ भेजा गया था, तो उसकी असलियत क्‍या थी? उस पर तुमने कौन सी खबर लिखी? वह क्‍या वजह है कि एक-समान घटना पर अलग-अलग झूठों वाले तथ्‍यों वाली रिपोर्टिंग तुम कैसे लिख पाते हो। क्‍या वजह है कि तुम्‍हारे जैसों की अधिकांश खबरें आखिरकार झूठी या बकवास साबित हो जाती हैं।

जो काम तुम्‍हारा काम है वह तुम करते नहीं, और जो काम तुम्‍हारा नहीं है वही काम तुम लपक-लपक कर करते घूमा करते हो। आज से दो-ढाई दशक पहले तक श्रमिक जगत की खबरें अक्‍सर और खूब छपा करती थीं, लेकिन अब उन्‍हें जगह नहीं मिल पाती है। वजह तुम बताओ न कि आखिर ऐसा क्‍यों हो रहा है। खबरें लिखते वक्‍त कहां घुस जाती है तुम्‍हारी श्रमिक-संवेदनशीलता?

तुम्‍हारा काम खबर लिखना है, लेकिन तुम मालिकों को तेल लगाने से ही फुरसत नहीं पाते हो न? जहां मालिक कमजोर हुआ, तो वहां सम्‍पादकों के लिए धंधाबाजी करना शुरू कर देते हो न? फर्जी खबरें लिखने में तुम्‍हें महारत है। आम आदमी की खबर को डस्‍टबिन पर फेंकते हो, जबकि कोई बड़ा-बाबू टाइप अफसर अगर पाद भी मारे तो उस पर बाकायदा कालिदास की तरह पाद-शाकुंतलम जैसा महाग्रंथ तक लिख मारोगे। कुछ दिन पहले ही वरिष्‍ठ फोटो-पत्रकार आरबी थापा ने पत्रकारों से चुनौती दी थी कि पत्रकारिता में जुटे लोगों में अधिकांश लोगों को अगर राष्‍ट्र-गीत लिखने को कहा जाए तो वे बगलें झांकना शुरू कर देंगे।

तो गुजारिश है तुमसे मेरे दोस्‍त। अभी भी सम्‍भल जाओ। दल्‍लागिरी बंद करो। कलम उठाओ, और पैनी खबरें लिखने की कोशिश करो।

हालांकि मुझे पता है कि यह कर पाना तुम्‍हारे वश की बात नहीं रही है अब। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस

श्रमिक दिवस आज: काहे बे मादर.... इत्‍ती मजूरी?

: कड़ी मेहनत से निकले पसीने से बनियाइन में छेद बनते हैं। मतलब यह कि अब आप श्रमिक नहीं रहे : सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान आज बन चुका है घर-घुस्‍सू : झूठों और मक्‍कारों का उल्‍लास-पर्व बनता जा चुका है विश्‍व मजदूर दिवस : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज अचानक करीब तीस बरस पुरानी बात याद आ गयी है। तब लोगों की बनियाइन-गंजी दो-एक महीनों में ही झर्रीदार यानी छलनी जैसी हो जाती थी। पहले छोटे-छोटे दाना साइज के छेद बनते थे, फिर मटर-नुमा और फिर बाकायदा किसी छोटी तश्‍तरी तक जैसे फटही हो जाती थी वह गंजी-बनियाइन। शुरूआत होती थी पैबंद-थेलगी लगाने से। लेकिन दो-तीन थेलगी के बाद ही अहसास हो जाता था कि ऐसे प्रयास निष्‍फल ही होंगे। वजह यह कि जल्‍दी ही एक छोटे-नन्‍हें छेद एकसाथ मिल कर एक बड़े-बड़े छेदों में तब्‍दील हो जाते थे। तब वह बनियाइन लुगदी की शक्‍ल ले लेती थी। उसका इस्‍तेमाल तब घर की महिलाएं पोंछा लगाने तक से परहेज करती थीं। नतीजा यह कि सायकिल या स्‍कूटर की साफ-सफाई में ही उसका इस्‍तेमाल हो जाता था।

क्‍या आप यह जानना चाहेंगे कि आखिर क्‍यों ऐसा होता था?  इस सवाल का जवाब देते हैं गोमतीनगर स्थित राजकीय होम्‍योपैथी कालेज के प्रोफेसर डॉक्‍टर एसडी सिंह। अपनी क्‍लीनिक में मरीजों से बातचीत से बातचीत के दौरान प्रो सिंह बताते हैं कि तब लोग परिश्रम करते थे, पसीना निकलता था। और उसकी क्षारीय गुणों का असर बनियाइन पर पड़ता था, जिसे उनकी बनियाइन बड़े छेद-दार बन जाती थी।

लेकिन अब ऐसा होना बंद हो चुका है। इसलिए नहीं कि आज की बनियाइनें ज्‍यादा मोटी और टिकाऊ होती जा रही हैं। आज तो और भी महीन और बेहद हल्‍की गंजी-बनियाइनों का दौर आ चुका है। मगर मजाल है कि उन पर कोई छेद बन भी सके? बरसों-बरस तक उस पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता। पुरानी बनियाइन होकर मटियाली और फेड हो जाती है, लेकिन फटती नहीं। वजह है मेहनत की गैरहाजिरी। शारीरिक परिश्रम करना हमारे संस्‍कार से दूर छूट चुका है। अब तो कोई परिश्रम करता ही नहीं। आरामदेह जीवन शैली है। सामाजिक प्राणी कहलाने वाला इंसान इस वक्‍त घर-घुस्‍सू बन चुका है। हर घर कूलर-एसी। कम्‍प्‍यूटर और इलेक्‍ट्रानिक सामान और लकदक सोफा-बिस्‍तर है। धूल नहीं पड़नी चाहिए, इसलिए घर को पिंजरा बना दिया। पैक्‍ड। जो कुछ भी होना है, घर के भीतर ही करो। न मेहनत होगी, और न निकलेगा पसीना। हचक कर भोजन करो, और जाम छलकाओ। यूरिक और ट्राइग्लिसराइड बड़ जाएगा और दिल बात-बात पर हांफना शुरू कर देगा। दिक्‍कत हुई, तो डॉक्‍टर मोटी रकम का खर्चा बता कर बोलेगा:- आराम करो।

फिर क्‍या? फिर यह कि मेहनत और वर्जिश करना बंद, जो पहले से ही बंद था। पहले भी यही सब हो रहा था, जिसके चलते आज इसकी नौबत आ गयी।

लेकिन हां, समाज में हमारे समाज में कुछ तबका-समुदाय आज भी मौजूद है, जिसकी बनियाइन हमेशा की तरह छेददार ही होती है। वह तबका है मजदूर और श्रमिक। वह भी वह तबका जो संगठित नहीं, बल्कि असंगठित क्षेत्र में काम करता है। यानी दिहाडी पर पर काम करने वाला मजदूर। मानव-मंडी पर बैठते मेहनतकश लोगों का हुजूम। गलाफाड़ आवाजें निकाल कर सब्‍जी बेचने वाले लोग। रिक्‍शाचालकों और ठेलियावालों का झुण्‍ड। जिसके मजूरी मांगते ही आपकी छाती फटने लगती है:- काहे बे मादर---- इत्‍ता पैसा?

ऐसे में पहली मई के दिन श्रमिक-दिवस मनाने, जश्‍न मनाने, जुलूस निकालने और सड़क पर लकदक वेशभूषा में दुनिया के मजदूरों एक हो, मजदूर की आजादी जिन्‍दाबाद जैसे नारे लगाने-उछालने का क्‍या औचित्‍य है। कार्ल्‍स मार्क्‍स ने ही यह नारा दिया था कि दुनिया के मजदूरों एक हो, लेकिन अगर मार्क्‍स को यह अलहाम हो जाता कि उनकी कल्‍पनाओं वाला श्रमिक-नेता ऐसा होता, तो मैं तो दावा करता हूं कि कार्ल्‍स मार्क्‍स यह नारा तो हर्गिज नहीं देते। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस

हाईकोर्ट में फिर गरमाने लगी है महाभियोग-कव्‍वाली

: अनियमित सुनवाई के मामले में पिछले तीन महीना से जबरन अवकाश पर बैठे हैं जस्टिस एसएन शुक्‍ल : दीपक मिश्र ने शुक्‍ला पर महाभियोग चलाने की सिफारिश केंद्र सरकार को उसी वक्‍त कर दी थी : सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश पर छिड़े हंगामे से लटक गया था शुक्‍ला वाला मामला, खबर कि शुक्‍ला ने छुट्टी की अर्जी दी है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : महाभियोग को लेकर पूरे देश में खूब जमकर हुई थी नौटंकी। देश के सर्वोच्च न्यायाधीश दीपक मिश्रा को येन-केन-प्रकारेण कुर्सी से खींच कर नीचे उतार देने वाली कव्वाली को लेकर भले ही अब चर्चाएं और विवाद खड़े हो गए हों लेकिन इस प्रक्रिया में एक जज पर महाभियोग चलाने का मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है। अब तो यहां तक हालत हो गई है कि इस जज को कब तक नौकरी पर बनाए रखा जाएगा, यह सवाल फिर से सिर उठाने लगा है। हालत यह है कि इस जस्टिस के पास कोई काम-धाम भी नहीं रह गया है, और दूसरी ओर गौरतलब बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के ही निर्देशों के तहत इस जस्टिस को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था।

इस जज का नाम है जस्टिस एसएन शुक्ला। शुक्‍ला जी पिछले कई दिनों से न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि किसी भी गांव, कस्बे के मोहल्ले-नुक्कड़ पर भी खासे चटखारे की तरह इस्‍तेमाल किये जाने लगे हैं। जातिगत आधारों को लेकर भी जबर्दस्‍त उठापटक चल रही है। वकील तो सीधे-सीधे तौर पर दो-फाड़ हैं, या फिर वे लखनऊ के वकील हों, या फिर इलाहाबाद के। अन्‍य प्रदेशों में भी शुक्‍ल जी का नाम खासा गरमी दे देता है। फिलहाल हालत तो यह है कि देश के सर्वोच्‍च न्‍यायाधीश दीपक मिश्रा और एसएन शुक्ला के साथ ही साथ कुद्दूसी की चर्चाएं भी खूब चल रही हैं। बहुत दूर क्यों जाते हैं, यूपी में खनन माफिया के तौर पर अपनी ख्याति जमा चुके समाजवादी पार्टी के मंत्री और अकूत संपत्ति के मालिक बन चुके दो-कौड़ी के गायत्री प्रजापति को जमानत देने के मामले में लखनऊ के पाक्सो जज ओपी मिश्रा जैसे न्‍यायाधीश भी अपनी नौकरी और अपने नाम-प्रतिष्‍ठा तक को अदालत-परिसरों में पोंछा लगाने लायक बन चुके हैं।

आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद जस्टिस एस एन शुक्ला ने जो फैसले सुना दिया वह अपने आप में बेहद आश्चर्यजनक और अदालतों में चल रहे गंभीर अराजकता का एक बड़ा नमूना है जहां न्याय की बिक्री ठीक इसी तरीके से हो जाती है जैसे मध्य युगीन समाज में मानव मंडी। जिसके पास पैसा है आज वह कुछ भी खरीद सकता है। कम से कम जस्टिस शुक्ला और ओपी मिश्रा जैसे जजों ने उसे चरितार्थ कर दिया था। अरूणाचल के पूर्व मुख्‍यमंत्री कलिखो पुल ने वहां के मुख्‍यमंत्री पद रहते हुए भी जिस तरह आत्‍महत्‍या कर ली थी, और उसके पहले 60 पन्‍ने का सुसाइड-नोट लिख कर देश की न्‍यायपालिका की चूलें हिला दी थी, वह बेशर्म न्‍यायपालिका की दिशा ही मजबूत कर रहा है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

इस मामले में हंगामा और गंभीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं। चर्चाओं के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के बड़े न्यायाधीश का प्रश्रय जस्टिस एसएन शुक्ला पर था। और जस्टिस शुक्ला द्वारा कुछ अभियुक्‍तों को जमानत देने का वह फैसला उस न्यायाधीश के संकेत पर ही किया गया था। कुछ भी हो, यह मामला खुला तो दीपक मिश्रा ने एसएन शुक्ला को न्यायकार्य से विरत करने का आदेश जारी कर दिया और उन्हें फोर्स-लीव यानी जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया। पिछले करीब 3 महीनों से ऐसे ही शुक्ला ऐसे जबरन अवकाश पर हैं। मतलब यह कि उन्हें वेतन और सुविधाएं तो दी जा रही हैं। मगर कोई भी फाइल उनके पास नहीं पहुंच रही है। सही शब्दों में कहें तो एक एस एन शुक्ला फिलहाल एक ढक्कन की तरह है बनकर रह गए, जिनकी कोई भी उपयोगिता हाईकोर्ट को नहीं बच पायी।

आश्चर्य की बात है कि ऐसे माहौल में कि जब अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है और उस के मुकाबले जजों की संख्या न्यूनतम है, ऐसी हालत में लंबे समय तक जज को खाली पर बैठाना बेहद दुखद हालातों का परिचायक होता है। अगर न्याय प्रशासन ने यह फैसला किया था कि किसी जज को जबरन छुट्टी पर भेजा जाएगा या उसे महाभियोग के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा तो फिर उस महाभियोग कार्रवाई को अब तक क्यों नहीं क्रियान्वित किया गया। क्या वजह है कि पिछले कई महीनों से ऐसे ही शुक्ला का मामला दिल्ली की सत्ता गलियारों में दबाए बैठा है और सरकार न तो नए जजों की भर्ती कर रही है और नहीं महाभियोग चलाने का कोई फैसला ही कर पा रही है।

इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ यह आया है कि एसएन शुक्ला ने अपनी छुट्टी की अर्जी और बढ़ा दी है। विश्‍वस्‍त सूत्र बताते हैं कि शुक्ला ने अपनी छुट्टी की अवधि और बढ़ाने की दरख्‍वास्त चीफ जस्टिस को भेज दी है। लेकिन न्याय प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि न्याय प्रशासन इस मामले में जस्टिस शुक्ला को अब अधिक छुट्टी देने के पक्ष में नहीं है।

कुछ भी हो यह हालत बेहद गंभीर और दयनीय भी है।

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लर्नेड वकील साहब

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