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सैड सांग

इंसान पर करारा तमाचा है आबादी में तेंदुआ का आना

: भूख-प्‍यास से तड़पते प्राणी को मौत देना हमारी इंसानियत पर कलंक, असफलता और पाखण्‍ड है : यह पुलिस की क्रूर-निर्मम कार्यशैली की प्रतिबिम्‍ब है, जिसकी शुरूआत भले ही ऐसे जानवरों से हो, अंत आम निरीह-निर्दोष आदमी तक होता है : गोली मार देना तो आपकी असफलता का प्रतीक है, फर्जी पुलिस-एनकांउटर की तरह :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आबादी में तेंदुआ का आना इंसान पर करारा तमाचा है।

सहनशीलता के मामले में जंगली जानवरों का वाकई कोई सानी नहीं होती। जानवरों की आबादी में जब इंसान हस्‍तक्षेप करता है, तो भी जानवर उसे बर्दाश्‍त कर लेते हैं। लेकिन तब मुश्किल तब होती है, जब जंगल में होने वाले जानवरों के भोजन पर इंसान झपटता है। ऐसे में जानवर भूख मिटाने के लिए जंगल से बाहर निकलने पर मजबूर हो जाते हैं। इसके बावजूद ऐसे जानवरों का निशाना इंसान नहीं होता, वे तो कुत्‍ते, बकरी, बछड़ों की फिराक में होते हैं। आप इतिहास टटोलिये तो, कि कब जंगली जानवर ने इंसान पर हमला किया। जानवर तब ही इंसान पर हमला करता है, जब इंसान खुद ही इन जानवरों पर हमलावर हो जाते हैं।

ताजा प्रमाण है लखनऊ। जहां गोसाईंगज इलाके में एक भूखा तेंदुआ अपनी भूख मिटाने और अपनी जान बचाने के भयावह संघर्ष से दो-चार हो रहा है। आपको बता दें कि यह कोई अनोखा किस्‍सा नहीं है लखनऊ का। अभी एक महीना पहले भी एक तेंदुआ लखनऊ में आ गया था। हालांकि करीब दो महीनों पहले से ही उसकी पदचाप माल, काकोरी, इटौंजा, कुर्सी आदि सुनायी पड़ रही थी। इतना ही नहीं, आईआईएम के पीछे के आसपास नयी विकसित हो रहीं बड़ी कालोनियों में भी वह पहुंच गया था। लेकिन हैरत की बात है कि वह इस पूरे दौरान केवल अपने भोजन तक ही सीमित रहा। इंसान पर हमला करना तो दूर, उसने तो इंसान को डराने के लिए एक बार भी दहाड़ नहीं मारी।

अपनी इसी छटपटाते पेट की भूख शांत मिटाने के लिए यह तेंदुआ अमौसी के आसपास के इलाके तक पहुंच गया। तो वन विभाग ने उसे दबोचने के लिए हर कोशिश करनी शुरू कर दी। इसमें सबसे बड़ा दर्दनाक तरीका था इस पूरे इलाके के जल-स्रोतों को बंद कर देना। आप कल्‍पना कीजिए कि कोई भूखा प्राणी बिलबिला रहा हो, और उसको राहत दिलाने के बजाय हम उस बेचारे को पानी तक न दें। तुर्रा यह कि उसके सामने प्राण तक के खतरे पग-पग में बिछा दिये गये हों, तो आपको कैसा लगेगा।

तेंदुआ एक ओर तो भूख से बिलबिला रहा था, और बिना पानी के छटपटा रहा था। इसी बीच एक दारोगा जी ने निकाली अपनी पिस्‍तौल और। दाग दिया उस निरीह पर गालियां। एक ही क्षण में उसका प्राणान्‍त हो गया। इसके पहले भी एक तेंदुआ ठाकुरगंज के पास मूसाबाग के इलाके में पहुंच गया था। हालांकि यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया कि यह वही तेंदुआ था जो अमौसी में मारा गया या फिर दूसरा।

हां, तेंदुआ को मारने वालों की हिमायत करने वालों की यह बात सही है कि तेंदुआ जंगल छोड़ कर आबादी में क्‍यों घुसा और वहां शहरी जानवरों पर कहर क्‍यों बरपा रहा था। लेकिन इस बात का जवाब कोई नहीं दे रहा है कि तेंदुआ, शेर, बाघ जैसे जंगली जानवरों के लिए जंगल में जब प्रचुर मात्रा में भोजन योग्‍य शिकार होने चाहिए, तो उसने सैकड़ों मील दूर लखनऊ जैसे महानगरों पर क्‍यों हाथ-पांव फैलाये। आप को बता दें कि शेर या बाघ जैसी बड़ी बिल्लियां की प्रवृत्ति जंगल के केंद्र-स्‍थल में आवास खोजने की होती है, जबकि जंगलों के बाहरी इलाकों में तेंदुआ, चीता आदि अपना ठीहा खोजते हैं।

फिर सवाल तो इंसानों से ही है कि सन-84 में एक बबर शेर बहराइच, लखीमपुर, श्रावस्‍ती, पीलीभीत जैसे घने जंगलों को छोड़ कर क्‍यों इंदिरानगर और क्‍यों महीनों तक घूमता रहा। और आखिरकार सरकारी शिकारियों ने उसे गोली मार कर हमेशा के लिए सुला दिया। आज भी उस शेर की खाल में भूसा भर कर कुकरैल के म्‍यूजियम में उसे प्रदर्शन की सामग्री के तौर पर पेश किया जाता है। पिछले पांच बरसों के बीच में एक बाघ जंगलों को सैकड़ों मील की दूरी नाप कर लखनऊ के ककोरी, माल आदि बस्तियों में मटरगश्‍ती करता रहा था।

इन तर्कों की बिना पर सवाल तो हर शख्‍स से होना ही चाहिए कि क्‍या ऐसे में इन जानवरों को इतनी निर्दयता के साथ पेश होना चाहिए। जंगल के प्राणी भी हमारे आश्रित होते हैं। इसलिए हम ने उनके रहवास को सुरक्षित रखा है। लेकिन इसके बावजूद जिस तरह घुसपैठ जंगलों में होती है, वह इंसान की निष्‍ठुरता की पराकाष्‍ठा है, स्‍वार्थता की सीमा से परे है। जो जंगल छोड़ कर आबादी में घुसपैठ कर रहे हैं, उनके प्रति हमें संवेदनता के स्‍तर पर देखना-सोचना चाहिए।

सच बात यह है कि हम ऐसे घुपैठिये जानवरों को अपने शिशु की तरह स्‍नेह नहीं दे सकते। सच बात है। लेकिन उनके प्रति ऐसा व्‍यवहार तो कर ही सकते हैं, जिसमें हम अपने इंसान होने की शर्त को पूरा कर दें। संवेदनशील हो सकें। तरीके खोजें कि भविष्‍य में ऐसे जंगलों से इन जानवरों को अपना घर छोड़ कर आबादी की ओर न आना पड़े। और अगर आ ही जाएं, तो ऐसी प्रभावी कोशिशें अपना कर उन्‍हें वापस उनके रहवास तक सुरक्षित करवा दिया जाए।

यह उनकी उनकी सुरक्षा का मामला तो है ही, लेकिन उससे भी ज्‍यादा हमारी सुरक्षा, हमारी संवेदनशीलता और इस सृष्टि में सह-अस्तित्‍व का भी प्रश्‍न है। आबादी में घुस आ गये जानवर को मौत के घाट उतार दिया जाना हमारी इंसानियत पर कलंक है, असफलता है, पाखण्‍ड है।

एक महीना हो चुका है अमौसी में तेंदुआ को मौत के घाट उतारे हुए। लेकिन हत्‍याकाण्‍ड की जांच के लिए एक जांच-कमेटी भी बनायी गयी थी। जिसे पता करना था कि जब तेंदुआ को पकड़ने की पूरी तैयारियां थीं, तो उसे क्‍यों मारा गया। क्‍या कारण थे उसकी हत्‍या के। लेकिन शर्मनाक बात यह है कि इस कमेटी इस मामले में एक भी जिम्‍मेदार विभाग के किसी भी अफसर का बयान तक नहीं ले पायी है, जबकि उसे यह रिपोर्ट एक पखवाड़े में ही सौंप देनी थी। अब जरा उस हत्‍याकांड को अपने किसी आत्‍मीय शख्‍स की घटना के तौर पर देख-मानिये, जिसे एनकाउंटर में मौत के घाट उतार दिया गया हो। तब ही आपको अहसास हो पायेगा कि किसी मौत का दंश कैसा होता है। सच बात यह है कि हादसे में पुलिस के इंस्‍पेक्‍टर ने बाकायदा अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए ही इस तेंदुए को मार डाला था। यह हत्‍याकांड हमारी पुलिस की क्रूर और निर्मम कार्यशैली की प्रतिबिम्‍ब है, जिसकी शुरूआत भले ही ऐसे जानवरों से हो, लेकिन उसका अंत आम निरीह-निर्दोष आदमी तक होता है।

चलते-चलते आपको मैं आपको अपनी फेसबुक अपडेट भी पढ़वा दूं:-

क्‍या कहा ! लखनऊ में फिर एक तेंदुआ घुस आ गया है? तो क्‍या हुआ? याद नहीं है कि पिछले महीने भी तो एक तेंदुआ आया था? फिर क्‍या, फारेस्‍ट वाले टापते ही रह गये, लेकिन दारोगा जी ने पिटपिटिया निकाली और दाग दिया ससुरे के पिछवाड़े पर पांच गोली। राम राम सत्‍त हो गया ससुरे का।

तो भइया, टेंसन मत लो। जोगी-पुलिस के जाबांज पुलिसवालों को बुलाओ। एक सेकेंड में तियां-पांचा कर देंगे इस तेंदुआ का।

हमारे दारोगा लोग सूरमा-भोपाली हैं। एनकाउंटर स्‍पेशलिस्‍ट।

गोली अंदर, प्राण बाहर

चल बे, जल्‍दी चल। काम निपटा कर चलो थानों में गाली-सत्‍संग करने भी जाना है यार।

"जो थाने पर आये, वह रंडी की औलाद"

: योगी सरकार में पुलिस स्‍टेशनों पर अपनी समस्‍याओं को कुछ इस तरह निपटाती है योगी की पुलिस : हर समस्‍या का समाधान सैकड़ों गालियां और अर्जियों को फाड़ने की कवायद से होता है थानों में : नजीर बन गयी है गाजीपुर के बरदह थाने के कोतवाल की शर्मनाक हरकतें :

मेरी बिटिया संवाददाता

गाजीपुर : आइये, आज हम आपको दिखाते हैं कि योगी सरकार की बहादुर पुलिस की मर्दानगी किस तरह दिखायी पड़ती है। इसके बाद आप बहुत अच्‍छे तरह से समझ पायेंगे कि जिस एनकाउंटरों पर सरकार अपने गाल बजा रही है, उसकी असलियत क्‍या है। इतना ही नहीं, इससे आपको यह भी अहसास हो जाएगा कि थाने पर अपनी समस्‍याओं को लेकर आने वाले आम फरियादियों के साथ इस योगी-पुलिस का सुलूक क्‍या होता है।

किस्‍सा एक:- "क्‍या है, यह क्‍या है। तुम कौन हो। भाग यहां से मादर..., रंडी की औलाद हो तुम। अभी बीस लाठियां तुम्‍हारी गां.... में रसीद की जाए, तो शिकायत करना भूल जाओगे।"

किस्‍सा दो :- "हां, तुम बताओ, कैसे आये। अर्जी नहीं, अबे काम बता ना, काम। तुम हो कौन मादर..... रंडी की औलाद कहीं के। और कहीं अपनी मां..... कराने का मौका नहीं मिल पाता है तुमको। भाग यहां से वरना तुम्‍हारी गां.... में सारी लाठियां पेल दूंगा। "

किस्‍सा तीन:- "यह अर्जी तुम्‍हारी है, फाड़ इस अर्जी को, मादर.... कहीं का। अर्जी लिखेगा यह मादर....। आओ इस बेटी..... को आज मैं अर्जी लिखवाना सिखाता हूं बहनचो..... कहीं का।"

किस्‍सा चार:- "अर्जी देने का शौक बहुत है तुमको ने, आज मैं तुम्‍हारी गां..... में यह शौक घुसड़ता है। जरा लपक कर पकड़ तो इस मादर.... को, इसकी गां..... में उसकी अर्जी न पेल दिया तो मेरा भी नाम एके राय नहीं। और सुन बेटीचो...... तुम यहां अपनी मां चु......आये हो न। तो उसके पहले 1090 पर फोन क्‍या अपनी मइया चु........ के लिए किया था। "

जी हां, इस वीडियो को देखिये तो आपके कान गरम हो जाएंगे। इसके बाद तो आपको सपने में भी अगर थाने का नाम सुना पड़ा तो आप चौंक कर बैठ जाएंगे। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, कोई भी फरियादी आइंदा थाने की ओर रूख नहीं कर पायेगा।

यह वीडियो है गाजीपुर जिले की मरदह थाना पुलिस का। इस थाने का प्रभारी है एके राय। दिन रात शराब के नशे में धुत्‍त रहने वाले इस दारोगा किसी भी शख्‍स को मां-बहन-बेटी की गालियों के नीचे कोई बात ही नहीं करता है। विगत दिनों एक नागरिक ने इस थाने पर फरियादियों के साथ हो रहे सुलूक की वीडियो बना ली।

आइये, आप भी इसे देखिये, सुनिये और भाजपा और योगी सरकार का जयजय कारा लगाना शुरू कर दीजिए।

गाजीपुर के मरदह थाने पर दिल दहला देने वाली हादसे को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

फरियादी , मतलब रंडी की औलाद

गाजीपुर की खबरों को पढ़ने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

लाटसाहब वाला गाजीपुर

कोई तवज्‍जो न दे, तो मौत बेहतर है: सुशील सिद्धार्थ

: सुशील सिद्धार्थ को तवक़्क़ो ही नहीं मिली, तो दम तोड़ दिया : : जिन्‍दगी भर लखनऊ में बेगारी की इस साहित्‍यकार ने, पर मुआवजा मिला दिल्‍ली में : घर के दरवज्‍जे पर सटी देसी दारू की दूकान हटाने के लिए जी-जान लडा़ये रहे, मगर असफल रहे : साहित्‍य सम्‍मेलनों के संचालन को लेकर सुशील का नाम हमेशा विवादित रहा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सुशील सिद्धार्थ को तो कोई भी लाखों की भीड़ में खोज सकता है। अपनी स्‍मृतियों के पन्‍ने खोलिये-टटोलिये तो तनिक। बस दो-चार निशानियां जरूरी हैं। एक जिन्‍दादिल शख्‍स। हल्‍की सनातनी दाढ़ी पर एकाध उंगली के सहारे खुजलाने की दिलकश अदा। पौने पांच फीट का हल्‍का सा थुलथुल बदन, साहित्‍य पर चर्चा के वक्‍त चुटीली कविताओं की छौंक। गहन साहित्यिक चर्चाओं के बीच भी बात-बात पर ठहाकों की गूंज।

खैर, ताजा खबर यह है कि सुशील सिद्धार्थ अब हमारे बीच से हमेशा के लिए विदा हो चुके हैं। इसके बाद वे और उनकी स्‍मृतियां ही हमारे आप के बीच रहेंगी। खबर आयी है कि दिल्‍ली में ही उन्‍होंने अपना प्राण त्‍याग दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि सुशील के इस दैहिक अवसान ने पूरा हिन्‍दी साहित्‍य जगत आर्तनाद कर बैठा है। अश्रुपूरित श्रद्धांजलियों का समंदर उमड़ने लगा है। दयानंद पांडेय ने लिखा  है कि:- आज की सुबह रुला गई । संघर्ष ही जिन की कथा रही वह सुशील सिद्धार्थ आज सुबह-सुबह हम सब से विदा हो गए । संघर्ष का समुद्र उन्हें बहा ले गया । उन की ठिठोलियां, गलबहियां याद आ रही हैं । छोटी-छोटी नौकरियां , छोटे-छोटे दैनंदिन समझौते करते हुए सुशील अब थक रहे थे । दिल्ली उन्हें जैसे दूह रही थी । सुई लगा-लगा कर । वह व्यंग लिखते ही नहीं थे , जीते भी थे । एक अच्छे अध्येता , लेखक , कवि , वक्ता , व्यंग्यकार और एक अच्छे दोस्त का इस तरह जाना खल गया है । उम्र में हम से छोटे थे सुशील सिद्धार्थ , जाने की उम्र नहीं थी फिर भी चले गए । वह दिल्ली में रहते थे , पत्नी लखनऊ , बेटा अहमदाबाद । ज़िंदगी में उन की यह बेतरतीबी देख कर मैं अकसर उन से कहता था कि दिल्ली छोड़ दीजिए , लखनऊ लौट आइए । वह मुस्कुरा कर ज़िंदगी की दुश्वारियां गिनाते और कहते बस जल्दी ही आप के आदेश का पालन करता हूं बड़े भाई । लेकिन दिल्ली क्या वह तो दुनिया छोड़ गए । बड़े ठाट के साथ मुझे बड़े भाई कहने वाले सुशील की आब याद रह गई है । उन के शेर याद आते हैं ।

जाने किस बात पर हंसे थे हम

आज तक यह शहर परीशां है।

हाकिमे शहर कितनी नेमते लुटाता है

नींद छीन लेता है लोरियां सुनाता है।

अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि !

कुछ भी हो, करीब 78 से मैं सुशील सिद्धार्थ को जानता हूं। अलीगंज की पुरनिया रेलवे क्रासिंग से सटा उनका मकान है। पिता शिक्षा थे, और उन्‍होंने ही यह मकान गांव के बाहर बनाया था, जो अब तो शहर की गोद में आ बैठा है। सुशील ने लखनऊ विश्‍वविद्यालय से हिन्‍दी साहित्‍य पीएचडी की, और पेट पालने के लिए हर सम्‍भव काम छेड़े, मगर हर प्रयास पर उन्‍हें ठोकर ही मिली। पत्‍नी और बच्‍चों का दायित्‍व उन्‍हें बार-बार आजीविका के लिए बाध्‍य करता था। इसके लिए उन्‍होंने एक बार तो ज्‍योतिषी का धंधा भी किया, बेहद तन्‍मयता से। लेकिन वह भी टांट-टांय फुस्‍स। पिता से कभी बहुत अच्‍छे सम्‍बन्‍ध नहीं रहे।

हार कर वे दिल्‍ली पहुंचे, तो मानो लॉटरी ही मिल गयी। नाम भी कमाया, पैसा भी कमाया। लखनऊ के अखबार सुशील को घास तक नहीं डालते थे, दिल्‍ली ने उन्‍हें आंखों पर बिठाया। लेकिन इसके बावजूद सुशील ने कभी भी लखनऊ से नाता नहीं तोड़ा। नियमित रूप से आना-जाना बना ही रहा। हां, इसी बीच सुशील ने अपना एक नया अंदाज एडॉप्‍ट किया। वह था चर्चा में घुसपैठ करना और वहां से अपना वजूद खिलाने की कोशिश करना। इसमें वे सफल हो गये। लेकिन उसका रास्‍ता उन्‍होंने विवादों के राजमार्ग से खोजा। कई सम्‍मेलनों में वे खासे चर्चित और विवादित भी हो गये।

फिर क्‍या वजह है कि इस मोड़ पर अचानक सुशील ने इस दुनिया को बाय-बाय कर दिया। इसका संकेत करीब चार महीना पहले उनकी फेसबुक अपडेट में छिपा है। जिसमें अपनी फोटो के साथ सुशील ने लिखा है कि:-

जब तवक़्क़ो ही उठ गई ग़ालिब

क्यों किसी का गिला करे कोई।

लेकिन फिर सवाल यह है कि आखिर किस तरह की अहमियत और पहचान के लिए लालायित थे सुशील, यह फिलहाल अंधेरों में ही है। खुदा जाने,  न जाने किस दर्द की टीस तड़प रही थी सुशील को। लेकिन अपनी मौत से चंद घंटों पहले ही सुशील ने अपने एक व्‍यंग्‍य लेख का एक हिस्‍सा फेसबुक पर शाया किया था जिसमें उनकी मनोवृत्ति का हल्‍का का अंदाजा लगाया जा सकता है। सुशील ने लिखा था कि:

बस ने आधा घंटा बाद जहां उतारा वहां से घर लगभग एक मील होगा,ऐसा लगा।

उतरने के बाद दो बातें लगीं।एक तो यह कि वह यहां तन्हा उतरा है।दूसरा यह कि स्ट्रीट लाइट लगभग लापता है।अंधेरा है।भीगा भीगा सहमा सहमा अंधेरा।एक रिक्शा वाला खड़ा था।उसने जगह सुनते ही चलने से मना किया।उसे गुस्सा आते आते रह गया।सोचने लगा कि गांव होता तो लठिया देता।ख़ैर दाएं बाएं देखकर चल पड़ा।आज अजब सन्नाटा था।इधर दुकानें भी नहीं थीं।दूर तक अकेली सड़क।फिर दो तीन सोसाइटी। सोसायटियां भी एकदम अकेली।चुप और सावधान।

यानी गणेश चौक से वाया नया नुक्कड़ वाया धर्मा ध्रुवा अपार्टमेंट ।फिर सुनसान। पुरानी बस्ती को जाने वाली सड़क।आगे एक जगह नाला।उससे थोड़ा आगे एक मोड़।फिर गली।फिर वह मकान जिसके एक कमरे का वह बाशिंदा है।

गणेश चौक से नया नुक्कड़ आते आते अंधेरा और घना हो गया था।लोग बताते रहते हैं कि यह नुक्कड़ रात्रिकालीन सेवाओं के लिए गुपचुप तरीके से जाना जाता है।यहां कमसिन लड़कियां और ठीकठाकसिन औरतें गश्त करती रहती हैं।नेटवर्क गजब है।कब शिकार फंसा।कब जाल सहित कबूतर उड़ा।कब बहेलिया उड़नछू हुआ कोई जान न पाता।पुलिस वाले भी नहीं।पुलिस के ज्ञान को कभी कभी झटका भी लगता।फिर उगाही के मरहम से झटका ठीक हो जाता।

लेकिन अजब है उसने कभी यहां ऐसा कुछ नहीं देखा। इस समय यहां एक औरत खड़ी थी।अंधेरा था।उसका चेहरा नदारद था।यानी साफ़ दिख नहीं रहा था।ऐसा लग रहा शताब्दियों से अंधेरा इतना गहरा है कि लोग स्त्री का चेहरा नहीं देख पाते।बहरहाल, उसने अपनी ओर से मान लिया कि औरत चरित्रहीन है।और पटने या पटाने के लिए खड़ी है।एक मन ने कहा कि हो सकता है यह किसी का इंतज़ार कर रही हो--पति,भाई या बेटा बेटी का।तभी दूसरे मन ने कहा कि ऐसा मानने से मज़ा नहीं आएगा।औरत को गिरी गई गुज़री चालू टाइप की मान लो तो मन भांति भांति से मौज लेता रहता है।

मिश्रिख मेला में अवैध उगाही पर फंसे पत्रकार जी, हंगामा

: दूकानदारों ने किया मेला का बहिष्‍कार, सूनी हो गयीं मिश्रिख की सड़कें : आरोप कि हिन्‍दुस्‍तान अखबार के कई पत्रकारों ने मिल कर किया था लूट का धंधा : मामला पुलिस में, नगर पालिका पर प्रदर्शन : दूकानदारों ने दी धमकी, कि भविष्‍य में न आयेंगे मिश्रिख : मेलाधिकारी पर मिलीभगत का आरोप :

मेरी बिटिया संवाददाता

सीतापुर : मिश्रिख के धार्मिक मेले में एक प्रतिष्ठित अखबार के कुछ तथाकथित पत्रकारों ने सहयोग के नाम पर दुकानदारों से की अवैध वसूली पर आज यहां जमकर हंगामा हुआ। दूकानदारों का आरोप है कि इस अवैध उगाही में हिन्‍दुस्‍तान अखबार के कुछ पत्रकार शामिल हैं। खफा दूकानदारों ने आज इसी मसले पर अपनी दूकानें उखाड़ लीं, और उसके बाद नगर पालिका कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। बाद में यह लोग कोतवाली पर भी अपनी शिकायत करने पहुंचे। पुलिस ने मामले को दर्ज तो नहीं किया है अभी तक, लेकिन यह आश्‍वासन दिया है कि जांच की जाएगी। लेकिन इस आश्‍वासन से असहमत और क्षुब्‍ध दूकानदारों का फैसला है कि भविष्‍य में यहां होने वाले मेले पर शिरकत नहीं करेंगे।

मिश्रित होली परिक्रमा मेले में नगर पालिका परिषद के कर्मदुकानदार कपिल दीक्षिक , कृष्ण कुमार , मो . इलियास , मो. जावेद , प्रदीप कुमार , गोपीलाल, शिवशंकर , हनीफ, शिवकुमार, शकील, दीनानाथ आदि सैकड़ो दुकानदारो ने एक प्रतिष्ठित अखबार के कई पत्रकारों को खुलकर कराई गयी अवैध वसूली में आज एकजुट होकर अपनी दुकानों के परदे गिरा दिए। नगरपालिका गेट पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। मेला प्रशासन की चिरौरी भी दुकानदारों के आगे बौनी ही साबित हुई।  अंततः किसी तरह दिन के तीन बजे मेला प्रशासन की तरफ से मेला सचिव दुकानदारों को मनाने में कामयाब हो पाए तब जाकर दुकानें खुली। इन दुकानदारों ने मेला के दो कर्मचारियों के साथ ही अवैध वसूली करने वाले एक ही अखबार के कई पत्रकारों के विरुद्ध कोतवाली में तहरीर दी है, इस मामले की जांच दरोगा कृष्ण मोहन सिंह को सौंपी गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि से 84 कोसीय धार्मिक मेला परिक्रमा शुरु होता है जिसमें देश विदेश के लाखों परिक्रमार्थी भाग लेने आते है। इस परिक्रमा का समांपन पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन के साथ हो जाता है।  फिर यह मेला सामाजिक मेले के रूप में परिवर्तित होकर लगभग एक माह तक चलता रहता है जिसमें प्रदेश के अनेक स्थानों से आए सैकड़ों दुकानदार एवं खेल तमाशा आदि की दकाने मेले की रौनक बढ़ाती हैं। इस सामाजिक मेले में मेला अधिकारी प्रभाकांत अवस्थी की शह पर मेला सचिव आर.पी.सिंह ने अपने अधीनस्थ कर्मचारी शालिकराम मौर्य और विजय पाण्डेय को भेजकर लखनऊ से प्रकाशित प्रतिष्ठित अखबार हिंदुस्तान के कुछ कथित संवाददाताओं का सहयोग करने के लिए प्रति बड़े दुकानदार 1000 रुपये तथा मझोले दुकानदार से 500 रुपये और छोटे दुकानदार से 200 रुपये खुलेआम वसूली करा रहे थे।

मेले के दुकानदार बताते हैं कि लगभग 35 से 40 ,000 रुपये के मध्य यह अवैध वसूली उक्त अखबार के कथित संवाददाताओं का सहयोग करने के नाम पर कराई गई है लेकिन अवैध वसूली का यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था जिससे मेले में आए सभी दुकानदार आज आक्रोशित हो उठे और गांधीनगर नौबस्ता कानपुर के कपड़े दरी कालान व कम्बल के व्यवसाई दीनानाथ शुक्ला पुत्र विशंभरनाथ शुक्ला की अगुवाई में सभी दुकानदारों ने अपनी दुकानों के पर्दे गिरा दिए और नगरपालिका गेट पर एकत्र होकर अवैध वसूली के विरुद्ध जमकर विरोध प्रदर्शन करने लगे जिससे दुकानदारों के आगे पूरा मेला प्रसाशन चिरौरी करता नजर आया।

लेकिन आक्रोशित दुकानदारों ने मेला प्रशासन की एक भी नही सुनी और कार्यवाही की मांग पर बराबर डटे रहे तो मेला प्रशासन के सभी अस्थि पंजर ढीले हो गये और पुलिस प्रशासन ने पीड़ित दुकानदारों से तहरी लेकर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर कार्यवाही करने की बात कही है जिसकी विवेचना का दायित्व दरोगा कृषण मनमोहन सिंह को सौंपा गया है इस सिकायत की रसीद प्राप्ती सं. 14 0 36 पर है मेला प्रशासन व्दारा कार्यवाही के आश्वासन पर सायं 3 बजे के लग भग दुकानदार काफी मान मनौवल के बाद दुकान खोलने पर राजी हुए है वहीं जहां पर मेला प्रशासन ने इन दुकानदारों को अवैघ वसूली करने के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है वही दुकानदारों ने भी कार्यवाही के अभाव में अगले वर्ष इस धार्मिक मेले में न आने की कड़ी चेतावनी दे डाली है जिससे यह मामला क्षेत्र में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है और शासन प्रशासन की क्षेत्र मे जमकर किरकिरी हो रही है।

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