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सैड सांग

"बिटिया जनी है" सुन कर मां ने नवजात को मार डाला

: ससुराल के लोग बोले कि बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन : बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है : अल्टीमेटम मिल चुका था कि इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए : हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती : बेबस मां -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : (गतांक से आगे ) इसी बीच पीठासीन अधिकारी उस महिला से एक सवाल पूछ बैठा कि क्या तुम्हें अपनी नन्ही बच्ची का गला दबोचने और उसे मार डालने के पूरे दौरान एक बार भी उस बच्ची पर दया नहीं आई ?

सच बात यह है कि यह एक ऐसा माकूल सवाल था, जिसका जवाब हर शख्‍स चाहता था। सभी जानना चाहते थे कि उस बच्ची की हत्या करते समय उस महिला पर क्या भाव रहा होगा। उधर यह सवाल उठते ही इस महिला में मानो एक भयानक विस्‍फोट हो गया। उसके सब्र का बांध टूट गया। उसे फफक-फफक कर रोते देख पहले तो सारा न्‍याय-कक्ष भौंचक्‍का हो गया, लेकिन जल्‍द ही सभी लोग नम आंखों से हिचकियों की ओर बढ़ने लगे। भावावेश में बुरी तरह रोती हुई महिला ने जो कुछ भी बयान किया वह मौजूद सभी लोगों को भीतर तक हिला दिया। वहां मौजूद सभी लोग शर्म के मारे जमीन पर गड़े जा रहे थे। कोई भी एक दूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहा था सभी लोग कनखियों से लेकिन भरी आंखों से उस महिला को देखने की कोशिश कर रहे थे सभी लोग सुनने को उतावले थे और महिला हिचकियों में अपने शब्द टप-टप गिरा रही थी।

महिला ने जो भी किस्सा बताया, उसके मुताबिक उसकी शादी गरीब 16 साल पहले हुई थी। ससुराल वाले बड़े अरमान के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे कि उनकी बहू की गोद कब भरेगी और कब एक सलोना मुन्ना खिलखिलाता सभी के हाथों पहुंच जाएगा, पूरे घर को अपने किलकारियों से गुंजा देगा। लेकिन साल भर बाद जब इस परिवार में एक जन्‍म हुआ तो लोगों के मन पर जैसे कोई पक्षपात हो गया। वजह नहीं कि उस महिला ने कोई जीवित प्रसव नहीं किया बल्कि सच यह थी कि उस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्‍नी जनी थी। यह घटना इस परिवार पर किसी गहरे तुषारापात से कम नहीं रही। सभी ससुरालीजन भी आखिर क्या करते। उन्हें अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी थी, जब मुन्नी नहीं बल्कि घर का चिराग जन्मेगा। दो साल बाद फिर इस महिला ने फिर जन्म दिया। लेकिन हा-दैवयोग की ही बात तो थी कि इस बार भी इस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्नी को जन्म दे दिया था।  पूरे घर पर जैसे कोई श्‍मशान बन गया हो। हर व्यक्ति गमगीन था। लेकिन फिर भी वक्त को बढ़ना ही था। अगले जन्म में लोग अपनी उम्मीदें पूरी होते देखना चाहते थे लेकिन इस महिला ने तीसरी संतान के तौर पर फिर एक मुन्नी पैदा कर दी। और उसके बाद फिर चौथी जन्‍मी मुन्नी, पांचवी भी मुन्‍नी, छठवीं भी मुन्‍नी, सातवीं मुन्‍नी और आठवीं भी मुन्‍नी ही पैदा हुई।

हर बार वह महिला गर्भवती होती गई, हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती। हर बार ऐसी सारी उम्मीद बुरी तरह टूटती। हर बार पिछले बार के मुकाबले पूजा, पाठ, मनौती, पनौती, संकल्प जैसे कार्यक्रम शुरू होते गए और हर बार ऐसे पाखंडों, टोटकों की असलियत टूटती रही। लेकिन सबसे ज्यादा प्रताड़ना तो उस महिला की होती थी जो पूरे परिवार के लिए जन्म भी दे रही थी और जन्म देने के बाद भी उस पर तानों और आरोपों का सैलाब थोपा जाता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे। परिवार के लोग आखरी बार अल्टीमेटम दे चुके थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए। अब वह महिला अगर कुछ करती भी तो क्या करती। बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है। अगर दैव-इच्छा नहीं होती तो कृष्णजी अपनी मां देवकी के पहले ही प्रसव में जन्म में ही न पैदा हो जाते। क्यों उसके एवज में 8 बच्चियों को मौत के घाट उतारा जाता। वह महिला हमेशा चाहती थी कि अपने ससुराल के वालों की एक बच्चा पैदा कर उनकी बोलती बंद कर दे। लेकिन हर बार वह हार जाती थी। फिर अवसाद, अपनी ही शर्म से जमीन धंसने की लालसा पालने लगती थी।

कुछ ही दिनों बाद ही ससुराल वालों को पता चल गया कि बहू के पांव फिर भारी हैं। फिर टोटके लगाने शुरू हो गए, फिर पूजा-पाठ, फिर संकल्प, फिर पाखंड और फिर बार-बार यह ताईद करने की सख्त कोशिश कि चाहे कुछ भी हो, इस बार मुन्ना, और सिर्फ मुन्‍ना।

जो जैसे-जैसे दिन प्रसव के आने लगे, महिला की बेचैनियां और घरवालों के उत्साह मिश्रित आशंकाएं पूरे घर में जब जोड़ती जा रही थी। ऐन वक्‍त पर दाई बुलायी गयी। ससुराल वाले के लोग कान लगाये  धड़कनें थामे परेशान थे। दाई ने कुछ ही देर में अपना काम निपटाया, और फिर मायूस भाव में ऐलान किया कि:- बिटिया जनी है।

यह सुनते ही पूरा परिवार सन्नाटे में आ गया सभी लोग अपने-अपने कमरे में शोकाकुल हो गए। दाई अपने काम निपटा कर चली गई। बची वह महिला और उसकी वह बाकी आठ बच्चियां, जो आपस में हंसना, खेलना, रोना, चिल्लाना, झगड़ने में व्‍यस्‍त थीं। जबकि उधर महिला की मनोदशा बेहद गंभीर थी। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि उस से कौन सा अपराध हुआ। वह खुद को असहाय और निरर्थक मानने लगी। उसे खुद पर शर्म आ रही थी कि वह इतना भी नहीं कर पाई कि वह अपने ससुराल वालों की अपेक्षाओं के अनुरूप उन्हें गुड्डा दे पाती। इस महिला को पश्‍चाताप और अवसाद के साथ ही साथ धीरे-धीरे इस नई नवजात बच्ची के प्रति घृणा और क्रोध की ज्वाला की तरह धड़कने लगी। घृणा और उपेक्षा के चलते उसने इस नई जन्मी बच्ची को अपनी छातियों तक छूने तक की इजाजत नहीं दी। बच्ची रोती रही, लेकिन घर के बाकी लोग उसकी ओर बिल्कुल उपेक्षा भाव में थे। कौन उस अभागी बच्‍ची की ओर ध्‍यान देता।

पूरा दिन दिन बीत गया। अब वह बच्ची धीरे-धीरे रोने की आदत भूलती जा रही थी। वजह यह कि भूख-प्यास से वह अशक्‍त होती जा रही थी। इतना भी नहीं कर पा रही थी कि रो भी सके। साफ था कि वह भूख-प्यास से बेदम होती जा रही है। लेकिन इस महिला में क्रोध-घृणा और नैराश्‍य भाव लगातार बढ़ता जा रहा था।

और आखिरकार उसने सबके घरवालों के सामने ही उसे पटक कर मार डाला। घरवाले यही समझे कि उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है, वह पगला गयी है और अब अपनी इस बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

महिलाओं के अरमानों का कत्‍ल कर गयी पीयूष की मौत

: दिलों का राजा था पीयूष आर दुबे, फरीदाबाद में हुई मौत से सदमे में हैं प्रशंसक : इस अनोखे चातक की चाहतें देश भर में पसरी पड़ी थीं : कई महिलाओं की जिन्‍दगी में सिर्फ पीयूष ही पीयूष भरा पड़ा था : मेरा इश्क मलंग..बंजारा दिल, मैंने मोहब्बत का मकबरा नहीं देखा ... :

कुमार सौवीर

लखनऊ : न जाने कितनी महिलाएं उसके इश्‍क में बेहाल थीं। उसके एक इशारे पर ही नहीं, बल्कि उसके नाम पर भी वे अपना घर-दुआर छोड़ने तक तैयार थीं। उनमें से अधिकांश ने तो उसे देखा तक नहीं था। उसके प्रति उनकी जो भी वाकफियत थी, वह या तो फोन के माध्‍यम से थी, या फिर उसके शब्‍दों और फोटोज पर निर्भर थी। लेकिन बेमिसाल समर्पण और प्रेम। उसकी एक आवाज पर ही वे अपनी जान देने तक पर आमादा थीं। वह भी तब, जबकि उनमें से ज्‍यादातर को न तो पीयूष नाम का अर्थ पता था, और न ही उसमें दर्ज आर शब्‍द का मतलब।

सच बात तो यही है कि मैंने अपनी पूरी जिन्‍दगी में ऐसा एक भी शख्‍स नहीं देखा है, जिस पर लोग दिल फेंक कर मारते हों। महिलाएं खास तौर पर। कुछ तो ऐसी भी हैं, जो पीयूष के लिए कुछ भी कर बैठने को तैयार रहती हैं। उनके तन-मन में केवल और केवल पीयूष ही पीयूष। ऐसा भी नहीं कि वह कोई फिल्‍मी हीरो रहा हो। कविताएं और सहज व्‍यवहार और हल्‍के-फुल्‍के अंदाज दिखाती फोटोज। बस्‍स्‍स्‍स। शायद अविवाहित रहे पीयूष आर दुबे का निधन पिछली 8 मई को हो गया। वजह थी दिल या फेफड़े में संक्रमण।

करीब न जाने कितनी महिलाओं की फेसबुक वाल पर केवल उनका नाम ही दर्ज था। लेकिन उन पर हर शब्‍द, हर हर्फ, हर फोटो और हर मर्म उनके इश्‍क का ही था। किसी का इश्‍क उसके बदन को लेकर था, किसी का उसकी आवाज को लेकर था, कोई उसके शब्‍दों पर दीवानी थी, तो कोई उसकी फोटोज पर जान देती थी। हैरत की बात है कि इन महिलाओं ने अपनी वाल पर अपनी नहीं लगायी, बल्कि या तो पीयूष की छवि थी वहां, या फिर वहां एक खालीपन का सा अहसास है। एक-दूसरे के क्षेत्र, भाषा, रहन-सहन और जलवायु से कोसों दूर पीयूष के ऐसे प्रशंसक-मित्र देश भर में थे। लेकिन भीड़ नहीं, बल्कि चुनिंदा। पीयूष की फालोइंग केवल 31 तक ही सिमटी है। हालांकि फरीदाबाद में रहते थे पीयूष, लेकिन उनके लिखने का अंदाज बिहारी था।

महाराष्‍ट्र में रहने वाली मेरी एक महिला शुभ्रा देशपाण्‍डे ने 14 को मुझे फोन करके बताया कि पीयूष की मृत्‍यु हो गयी है, और वे चाहती हैं कि उनके बारे में कुछ शब्‍द श्रद्धांजलि स्‍वरूप लिख दें। इसके दो दिन बाद ही दिल्‍ली की मेरी एक महिला मित्र अर्चना दुबे ने यही अनुरोध किया। मेरे साथ समस्‍या यह थी कि बिना किसी शख्‍स को जाने-समझे में किसी के बारे में क्‍या लिख सकता हूं। मैं कभी भी पीयूष से नहीं मिला। हां, करीब तीन बरस पहले बोकारो की रहने वाली मित्र डॉ राजदुलारी की एक पोस्‍ट पर चर्चा के दौरान पीयूष की रचनाओं का जिक्र किया था। उनका कहना था कि वे व्‍यक्ति नहीं, बल्कि विचार-भाव से प्रभावित थीं।

जाहिर है कि उसके बाद मैंने पीयूष की वाल को टटोलना शुरू किया। सहज प्रेम से जुड़े दुख, हर्ष, आनंद, विछोह, आंसू, और उठापटक जैसे भाव पसरे हुए थे। यह भी हो सकता है कि एक पुरूष होने के नाते मैं पीयूष को अधिक समझने लायक नहीं समझ पाया। लेकिन अचानक जब एकसाथ शुभ्रा और अर्चना ने यह आग्रह किया, तो मैं चौंक पड़ा। डॉ राजदुलारी का अता-पता तक नहीं था। न फोन, न मैसेंजर। वाट्सऐप पर वे रहती नहीं, और फेसबुक लगता है कि उन्‍होंने आजकल ऑपरेट करना बंद कर रखा है। ऐसे में मैंने पीयूष के मित्रों को टटोलना शुरू कर दिया। लेकिन हैरत की बात थी कि उनमें से अधिकांश ने मेरे मैसेंजर पर एक भी संदेश का कोई भी जवाब नहीं दिया। सिवाय राजस्‍थान की रहने वाली मित्र डॉ भावना अस्तित्‍व ने, जिन्‍होंने केवल हल्‍की-फुल्‍की बातें ही बतायीं। मगर वे बताती हैं कि पीयूष एक बेहद संजीदा और समझदार व्‍यक्ति थे।

हालांकि अधिकांश के लिए पीयूष का इश्‍क सूफियाना था। पीयूष की मौजूदगी का अहसास उनमें जीवन की हिलोरों की तरह था। भोपाल में पीयूष की एक महिला मित्र ने मुझे बताया कि उन्‍होंने जब पीयूष की मृत्‍यु वाली पोस्‍ट लिखी, तो तीन-चार महिलाओं ने मित्र-प्रस्‍ताव आ गये। वे बताती हैं कि इन सभी वाल में केवल पीयूष की रचनाएं ही भरी पड़ी थीं। उन से मैसेंजर पर उन्‍होंने जब इस बारे में चर्चा शुरू की थी, तो उन महिलाओं का कहना था कि वे केवल पीयूष को प्‍यार ही नहीं करतीं, बल्कि पीयूष उनकी सम्‍पूर्ण दुनिया थे। पीयूष की एक कविता काफी आकर्षक है:- मैंने मोहब्बत का मकबरा नहीं देखा ...

हैरत की बात है कि पीयूष के पास कोई बड़ी मित्र-मंडली नहीं थी। लेकिन उसमें महिलाओं की सक्रियता बेहिसाब थी। पीयूष की मृत्‍यु के बाद जो पीड़ा का प्रदर्शन लोगों ने किया, उनमें महिलाएं आगे थीं। जिन भी महिलाओं से मैंने बातचीत की, उन्‍होंने शुरूआत में तो यह कुबूल किया कि वे मैसेंजर पर पीयूष से बात करती थीं। लेकिन उन सबने आखिरकार यह भी स्‍वीकारा कि उनकी बातचीत फोन पर अक्‍सर होती रहती थी। कई महिलाओं ने यह भी बताया कि वे अपना फोन नम्‍बर किसी को भी नहीं देती हैं, लेकिन पीयूष को खुद दिया था अपना नम्‍बर। हालांकि यह सभी महिलाएं इस बात से इनकार करती हैं कि उन्‍हें पीयूष से इश्‍क था, मगर वह यह नहीं बता पायीं कि तब वे लम्‍बे फोन कॉल्‍स पर उससे किस विषय पर बातचीत करती रहती थीं। पीयूष ने अपनी वाल पर स्‍लोगन दर्ज किया है:-  मेरा इश्क मलंग..बंजारा दिल।

फरीदाबाद का रहने वाला था पीयूष। उसके ज्‍यादा उसके बारे में कोई भी जानकारी नहीं। सिवाय इसके कि उसकी आखिरी पोस्‍ट पर इश्‍क के ठुकराने जैसा भाव था।

" तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा "

मैं कई दिन से बीमार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

बहुत ही बेबस, बहुत लाचार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

असीम पीड़ा, बदन में दर्द लिए बेचैनी

मुझे तेज बुखार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

क्योंकि तुम मग्न थी, थी विचर रही बहारों में

मैं कराहता हुआ, था कैद उन दीवारों में

बस तुम्हारे , एक फोन का इंतजार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

शायद तुम्हें मेरी खबर नहीं होगी

या कहूँ , मुझ पर नजर नहीं होगी

शायद की तुम भी , व्यस्त होगी कामों में

या तुम्हें, मेरी फिकर नहीं होगी

मगर मैं उस पल भी बेकरार था

और तुमने मेरा हाल तक नहीं पुछा

एक अन्‍य लाइनें:-

खूबसूरत तो बेहिसाब हो तुम !

हाँ सच है की लाजवाब हो तुम ! !

एक उम्र गुज़ारी है , इन आँखों ने इंतजार में !

हाँ वही , वही एक ख्वाब हो तुम ! !

कुछ अन्‍य:-

तुम्हारे बाद , जीवन का , गुजारा हो ना पायेगा ।

अब तो , इश्क भी हमसे , दोबारा हो ना पायेगा ।।

कैसे ! बाँट लूँ बिस्तर , तुम्हारी ओर का बोलो ।

तुम्हे ही चाहता है दिल , आवारा हो ना पायेगा ।।

फिर यह भी:-

तू मेरी फिक्र में हर पल , तू मेरे जिक्र में हर-सू

तू मेरे हिज्र में तड़पे , मैं तेरे हिज्र में तड़पू

चढ़ा , प्रीत-रंग , मेरे अंग-अंग

मैं प्रेम रंग में रंग गई रे

तू मुझ सा दिखने लगा सजन

मैं तुझ सी दिखने लग गई रे

एक अन्‍य लाइनें:-

सूखी हुई एक शाम की टहनी से !

बिखरे जो तेरी याद के पत्ते गिर कर !

फिर जमीं पर दिल के कुछ बूंदें टपकी !

बेवज़ह मेरी आँख से आँसू बनकर ! !

हसरतों पर चर्चा:-

थक गये हैं ख़्वाब को आराम देना चाहिए !

हसरतों को शीघ्र ही विराम देना चाहिए ! !

कब तलक गुमनामियों के तम में भटकेगी उमर !

इस सफर , इस जिंदगी को नाम देना चाहिए ! !

हत्‍या-व्‍यथा। क्रूर मां नहीं, हत्‍यारे आप खुद हैं

: बेबस झांसी की रानी वाली यह दारूण-गाथा पूरे समाज की क्रूरता का प्रतीक है : मातृ दिवस पर नमन की नौटंकी नहीं, ठोस संकल्‍प लीजिए : नमन के बजाय अगर आप अपने स्‍वार्थों के बजाय समाज की महिलाओं की भावनाओं को सम्‍मान दें तो कितना भव्‍य माहौल बन जाए : बेबस मां -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इसके पहले कि घरवाले कुछ समझ पाते, अपनी सौरी ( प्रसव-कक्ष ) में लेटी वह महिला अचानक तेज आवाज में चीखी। उसने उस नवजात को उसकी टांगों से पकड़ा। बच्‍ची को उसी तरह उल्‍टा लटकाये हुए वह घर के आंगन तक चीखती हुई पहुंची। शोर सुन कर घर के लोग आंगन पर आ गये। इसके पहले कि वहां मौजूद कुछ लोग समझ पाते, धोबीपाट की शैली में महिला ने उस बच्‍ची को उस जमीन पर जोरों से पटक दिया। कई बार। तब तक, जब तक उस बच्‍ची लहू-लुआन होकर मौत के हवाले न हो गयी।

घरवाले यह समझ गये कि उस महिला की मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है। वह पगला गयी, और अब अपनी इस नवीं बच्‍ची को खा गयी यह डायन।

मैं हमेशा आजीवन आभारी रहूंगा यूपी हाईकोर्ट में वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश रह चुके अपने अग्रज समान शख्‍स का, जिन्‍होंने मुझे इस महिला की कहानी से पहचान करायी। इस श्रंखला में मैं इस महिला को हत्‍यारिन या डायन के तौर पर पुकारने का अपराध सपने में भी नहीं कर सकता। मेरे लिए तो यह महिला बाकायदा झांसी वाली बेबस रानी-मां थी। इस झांसी की रानी मां इतिहास में भले कोई प्रभाव नहीं डाल पायी, लेकिन उसने अपने क्रूरतम व्‍यवहार से अपने आसपास के समाज पर एक जोरदार तमाचा तो जरूर ही मारा। भले ही यह स्‍वीकारोक्ति उस महिला ने अपने पूरे भोलेपन में और अनजाने में ही कर डाली थी, लेकिन उसने उस भयावह सच का खुलासा कर दिया जिसे सुन कर मेरी आत्मा कांप उठी। भय और आत्‍मग्‍लानि से रोंगटे खड़े हो गए कि हम जैसे लोग ही समाज नामक ऐसी बेहद संवेदनशील संगठन को अपने निम्‍नतम व्‍यवहार के चलते ही उसे क्रूरतम संस्था का रूप देने में नहीं हिचकते हैं।

यह सज्जन हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस रह चुके हैं। बेहद सहज, सरल, तार्किक और माननीय भावों का समावेश है इन में। अपने न्‍यायिक जीवन में उन्‍होंने न केवल किसी घटना उसके पूरे कानूनी परिवेश में ही विवेचन कर फैसला देने की भरसक कोशिश की। लेकिन साथ ही साथ, जब कभी ऐसी घटनाओं का जिक्र होता है तो वह अपने फैसलों को दरकिनार कर उस घटना के मानवीय पक्षों को समझने के लिए अपने दिल को टटोलते हैं, और फिर खोजने की कोशिश करते हैं कि असल पीड़ा क्‍यों-कब-कैसे-कितनी-कहां है। सहज भी है, कोई व्यक्ति भले ही किसी पद पर हो, कभी न कभी अपने अंतर्मन को तो टटोलता ही है।

जैसा उन्‍होंने मुझे बताया, अपने एक नवजात बच्चे की हत्या के मामले में एक महिला अदालत में पेश की गई थी। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि उस उसी नवजात मृत बच्ची की मां थी। कहने की जरूरत नहीं थी कि खचाखच न्याय कक्ष में मौजूद सभी लोग यह जानना चाहते थे कि यह महिला कैसे इतनी क्रूर हो गई जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को अपनी छाती का दूध पिलाने, उसकी किलकारियों को सुनने और उसको दुलराने-सहलाने-चूमने के बजाय सीधे उनके मौत के घाट उतारने का फैसला कर लिया।

बस शुरू हो गई। वकीलों के बहस तर्क-वितर्क शुरू हुए। पूछताछ में महिला ने भी स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी नवजीत बच्ची को मौत के घाट उतारा है। उसने कुबूल किया कि उस महिला ने उसने जो कुछ भी किया है, वह उसके लिए कुछ भी सजा भुगतने को तैयार है। साफ हो गया कि उस बच्ची की असली हत्यारिन वह महिला ही थी। उसकी इस स्‍वीकारोक्ति के बाद अब एक वकील का कहना था कि यह हत्‍यारिन है, इसलिए उसे फांसी दी जानी चाहिए। जबकि दूसरे पक्ष का तर्क था कि उस महिला का यह कृत्‍य उसके पागलपन के चलते हुआ है, इसलिए उसे पागलखाने में भेजा जाना चाहिए।

कुछ भी हो, कोई भी पक्ष इस बच्‍ची को उसकी ससुराल या उसके मायके में भेजने को तैयार नहीं था। सभी भयभीत थे कि न जाने कब यह महिला किसी अन्‍य पर भी इसी तरह का कातिलाना हमला कर दे, कोई भी भरोसा नहीं। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

60 % झुलसे बदन में तब्‍दील है गैंगरेप पीडि़त किशोरी

: किसी भी सामान्‍य किशोरी बच्‍ची की तरह इस बच्‍ची में भी थे अनगिनत सपने, लेकिन अब झुलसे मांस में तब्‍दील हो चुकी है यह जौनपुर की अल्‍हड़ बच्‍ची : हे भगवान। मेरी हालत के जिम्‍मेदारों के आश्रितों की हालत कभी भी मेरी दर्दनाक मौत जैसी न करना देना मेरे प्रभु :

कुमार सौवीर

जौनपुर : यह करीब एक बरस पहले की बात है, जब किसी भी सामान्‍य बच्‍ची की तरह इस किशोरी की कल्‍पनाओं में भी आकर्षक सुनहले-रूपहले सपने हुआ करते हुए होंगे। घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली अपनी मां की बड़ी दुलारी इस बच्‍ची को तब दिन में भी गजब सपने जरूर आते रहते होंगे। बैठे-बैठे भी उस अनाथ बच्‍ची को दूसरे सम्‍पन्‍न परिवार के बच्‍चों की किलकारियां, खेल-कूद, और मौज-मस्‍ती की हिलोरें उमड़ती रही होगी। सोचती रही होगी कि उसके पास भी अच्‍छे कपड़ों का ढेर होगा। लकदक स्‍कूली ड्रेस होगी, जूते चमचम करते रहते होंगे। स्‍कूली बस में आना-जाना होगा। किताब-कॉपियों का बैग, और बेहिसाब सहेलियां होंगी। हर दिन होली, रात दिवाली मनायी जाएगी। भरपेट और स्‍वादिष्‍ट भोजन का ढेर होगा। बड़ा मकान, हर सुख-सुविधा, और और और। सिर्फ आनंद ही आनंद होगा।

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जुल्‍फी प्रशासन

क्‍या क्‍या नहीं सोचती रही होगी वह किशोर वय की बच्‍ची। लेकिन इस बच्‍ची की कल्‍पनाओं में अब ऐसी खुशियां हमेशा-हमेशा के लिए दम तोड़ गयी हैं, जहां कल्‍पनाओं का कोई अस्तित्‍व तक नहीं हो सकता। वजह यह है कि इस बच्‍ची के पास अपनी छटपटाहती असह्य पीड़ा और अपने झुलसे-संड़ाध मारते मांस की बदबू के बीच सुखद कल्‍पनाओं की गुंजाइश ही नहीं रह बची होगी। अपने छोटे से शहर में अपने सपने संजोने वाली बात को दोबारा दुहरा पाने की ताकत ही उसके दिमाग में नहीं आ सकती। कोई अगर कोई उसे उसकी कल्‍पनाओं का जिक्र भी करना चाहे, तो वह उन्‍हें सुन पाने तक की क्षमता खो चुकी है। वह केवल दर्द से छटपटाती है, बस। और इसके अलावा कुछ भी नहीं।

दरअसल, यह बच्‍ची पिछले करीब 20 दिनों से हिन्‍दू काशी विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कालेज के बर्न-वार्ड में भर्ती है। उसका पूरा बदन पूरी तरह जल चुका है, चमड़ी उधड़ चुकी है, पूरा बदन फूल गया है। वह अब न कुछ सोच सकती है, न कर सकती है, और न ही कुछ बोल पाने की ताकत ही बची है उसमें। दवाओं का असर जब तक रहता है, वह बेहोश पड़ी रहती है, लेकिन अधिकांश वक्‍त तक तो वह केवल अपनी दर्दनाक चीखों को ही निकालती रहती है, जिसे आसपास के मरीज और उनके तीमारदार भी दहलते रहते हैं।

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हर सू जौनपुर

काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के मेडिकल कालेज में भर्ती इस बच्‍ची की देखभाल में जुटे डॉक्‍टरों का कहना है कि वह बच्‍ची 60 फीसदी तक जल चुकी थी। हालांकि डाक्‍टर लोग उसकी देखभाल में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन सच बात तो यही है कि आज भी उसकी हालत बिगड़ती ही जा रही है। उसके भविष्‍य के बारे में पूछने पर उसके डॉक्‍टर केवल अपने हाथ आसमान की ओर देख कर इशारा करते हैं कि अब जो कुछ भी होगा, ऊपर वाला ही करेगा।

हैरत की बात यह है कि जिला प्रशासन और पुलिस कप्‍तान की करतूतों का खामियाजा अपनी दर्दनाक मौत की दहलीज तक पहुंच चुकी इस बच्‍ची को अब इस बात तक की समझ नहीं बची है कि वह अपने साथ हो चुके गैंगरेप और पुलिस-प्रशासन के व्‍यवहार पर लानत तक भेज सके। हां, यह जरूर हो सकता है कि अपनी तेज मगर अस्‍पष्‍ट चीखों को अगर कोई समझ सके, तो वह इतना जरूर कहना चाहती होगा कि:- हे भगवान। मुझे ऐसी सरकार, ऐसे जिलाधिकारी, पुलिस कप्‍तान और दलालों को इतना जरूर समझा देना कि किसी बच्‍ची के साथ के साथ ऐसा अन्‍याय नहीं किया जाना चाहिए, जहां तड़पते-बिलखते जीवन की हालत मौत से भी बदतर हो जाए। ( क्रमश: )

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बदलापुर-हादसा

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