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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

अखिलेश दास के सुशील बने दूध की मक्खी, हटाये गये

: अखिलेश दास के बाद से ही बेटे ने भंग कर दी दास-मंडली, कई को दरवाजे से बाहर किया गया : वायस आफ लखनऊ के मुख्‍य मुनीजर सुशील दुबे का पत्‍ता : अखबार के नये गवर्नर बनाये गये हैं रामेश्‍वर पाण्‍डेय उर्फ काका :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : डॉ अखिलेश दास की मृत्‍यु के बाद उनके बेटे ने जो अपनी सल्‍तनत में लगा दी झाडू़, उसमें अखिलेश दास के के कई खासमखास का काम तमाम हो गया। विराज के इस स्‍वच्‍छता अभियान में दास-मंडली का लगभग पूरा सफाई ही हो गया है। सबसे बड़ी गाज गिरी है, दास के अखबार वायस आफ लखनऊ के मुख्‍य सर्वे-सर्वा सुशील दुबे। विराज के इस सफाई अभियान के दौरान सुशील बाहर हो गये हैं।

हालांकि यह खबर काफी विलम्‍ब से मिली थी। उसके बाद सुशील दूबे से सम्‍पर्क होने में खासा वक्‍त लग गया। फिर सुशील ने वायदा किया कि वे अपना पक्ष रखने के लिए वे खुद ही जल्‍दी ही सम्‍पर्क करेंगे, लेकिन ऐसा भी नहीं हो पाया। आखिरकार प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस खबर को प्रकाशित करने का फैसला कर लिया है।

तो पता चला है कि अखिलेश दास के अखबार में एकछत्र राज करने वाले सुशील दुबे को पूरी बेदर्दी के साथ निपटा दिया गया है। कई और भी लोग निकाले गए हैं इस यज्ञ में। लेकिन इसमें सुशील दुबे पर इस अखबार के संपादन से लेकर प्रबंधन तक का जिम्मा था। सुशील की विदाई से पूरे अखबार ही नहीं, बल्कि दास-मंडली के बाकी बचे सदस्‍यों के लिए काफी चौंकाने वाली रही है।

आपको पता दें कि लखनऊ में अपने जीवन की पारी एक सहकारी बैंक से शुरू करने वाले अखिलेश दास को कांग्रेस ने लखनऊ में मेयर की कुर्सी अता फरमायी थी। इसी बाद से कांग्रेस के कई सभासदों से दास की करीबी हुई। दास लगातार आगे बढ़ते रहे, हालांकि उनके सहकारी बैंक की हालत लगातार पतली ही होती रही

आज से दस बरस पहले डॉ अखिलेश दास से कुमार सौवीर ने लम्‍बी बातचीत की थी। उस वक्‍त डॉ दास लखनऊ से लोकसभा चुनाव के प्रचार में व्‍यस्‍त थे। यदि आप उस बातचीत को देखने में इच्‍छुक हों, तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-'

चिडि़या बदनाम हुई डॉ अखिलेश दास तेरे लिये: दास्‍तान-ए-बैडमिंटन

अखिलेश दास की टीम में सुशील दुबे वगैरह लोग शुरू से भी शामिल थे। उनके चुनाव के लिए इन सब लोगों ने प्‍लानिंग की। मसलन, होली पर मिठाई, रंग, ईद और दीपावली में काजू की बर्फी और करवा चौथ पर पूरा झमाझम पैकेज पूरे शहर के हर घर-घर तक पहुंचाने में इन्हीं लोगों की सोच का नतीजा था। लेकिन यह योजना फेल हो गई और अखिलेश दास धड़ाम से गिर चुके, मगर दास-मंडली बनी ही रही।

मगर अब विराज ने दास की मृत्‍यु के बाद से पूरे संस्‍थान में सफाई कार्यक्रम छेड़ कर दिया। अब सुशील दुबे की जगह अब दस्तरखान पर मौजूद हैं रामेश्वर पांडे। रामेश्वर पांडेय उर्फ काका दैनिक जागरण के प्रदेश संपादक पद से हटने के बाद कुछ दिन उन्होंने जनसत्तान्‍यूज डॉट कॉम में काम कर चुके हैं।

चलते-चलते आपको बता दें कि दास-मंडली को अपने इस अवसान का इलहाम पहले ही हो गया था। करीब चार महीना पहले ही सुशील दुबे ने पत्रकारों के एक नवजात संगठन के बैनर पर विराज दास को मंच पर बिठा कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश की थी। इस समारोह में कई पत्रकारों को सम्‍मानित करते हुए यह संदेश दिया गया था कि सुशील की पकड़ पत्रकारों में खासी है। लेकिन विराज ने इस सब को खारिज कर दिया और साबित कर दिया कि वे विराज हैं, अखिलेश दास नहीं। वैसे दास-मंडली के एक सदस्‍य ने मेरीबिटिया डॉट कॉम को बताया कि दास-मंडली को भंग कराने का फैसला विराज का नहीं, बल्कि विराज की मां का है। खैर, इस बारे में जानकारी देने के लिए न तो सुशील मुंह खोल रहे हैं, और न ही दास परिवार से कोई सम्‍पर्क ही हो पा रहा है।

पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को देखने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

पत्रकार पत्रकारिता

अधिवक्ता हत्याकांड में आरोपी गया जेल

: 19 अप्रैल-18 को चांदा के इंदौली निवासी वकील ओंकारनाथ यादव की हुई थी गोली मार कर हत्‍या : प्रतापगढ़ के आसपुर दवसरा निवासी आरोपी लबिशंकर मिश्र को पुलिस दबोचा था : पुलिस टीम को कप्‍तान ने दिया पंद्रह हजार का इनाम :

मेरी बिटिया संवाददाता

सुलतानपुर : अधिवक्ता ओंकारनाथ हत्याकांड में चांदा पुलिस ने दूसरे आरोपी को गिरफ्तार कर आलाकत्ल के साथ सीजेएम कोर्ट में पेश किया। जिसकी रिमांड स्वीकृत कर प्रभारी सीजेएम अनुराग कुरील ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया है।

मालूम हो कि चांदा थाना क्षेत्र के इंदौली निवासी अधिवक्ता ओंकारनाथ यादव की बीते 19 अप्रैल को गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस मामले में प्रकाश में आये आरोपी लबि शंकर मिश्रा निवासी अकारीपुर थाना आसपुर देवसरा प्रतापगढ़ को 315 बोर  तमंचा व जिंदा कारतूस के साथ शनिवार की सुबह कोथरा तिराहे के पास से गिरफ्तार कर पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में पेश किया। आरोपी की रिमांड स्वीकृत कर अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया।

थानाध्यक्ष एसके मिश्र ने बताया कि पुलिस की इस सफलता पर टीम को एसपी ने 15 हजार का पुरस्कार दिया है।

अफसरों की भर्ती: मगर जिम्‍मेदारी कौन लेगा

: सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश की वकालत तो सन-05 में की थी प्रशासनिक आयोग ने, 13 बरस लग गये सोचने में : सीधे और चयनित नौकरशाहों में होगा झोंटा-नुचव्‍वर : लोक प्रशासन के बजाय यह लोग कारपोरेट हितों पर ही ज्‍यादा जोर देंगे :

अविनाश पांडेय

इलाहाबाद : नौकरशाही के शीर्ष  क्षेत्र मे पार्श्व प्रवेश को संस्थागत बनाने का मोदी सरकार का निर्णय देश के सभी क्षेत्रों में नौकरशाही की गड़बड़ी  और लालफीताशाही को रोकने तथा भारतीय नौकरशाही में कुशलता  को बढाने के लिए है। वर्ष 2005 दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने  सिविल सेवाओं में लेटरल प्रवेश  ( पार्श्व प्रवेश )  की अनुशंसा की थी। लेकिन तब इस प्रस्ताव का भारी विरोध मुख्य रूप से आई ए एस अधिकारीयों द्वारा किया गया था।

यह निर्णय मुख्य रूप से नौकरशाही को कार्पोरेट हितों के अनुरूप बनाने के लिए है। जिससे  आगे चलकर  आम जनता का हित नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है और कल्याणकारी  राज्य की अवधारणा को क्षति पहुंच सकती है। पार्श्व प्रवेश के द्वारा  आये नौकरशाह और यूपीएससी के द्वारा चयनित  नौकरशाहों के बीच  आपसी टकराहट बढेगी जो समस्त कार्यपालिका की कार्यप्रणाली को नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर शक्तियों के पृथक्कीरण के सिद्धांत को नुकसान पहुंचा सकती है। अतीत का अनुभव  और अन्य देशों के  उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि इससे निजीकरण का गति में और तीव्रता  आएगी।

इस तरह का कदम कम योग्यता वाले लेकिन राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों के लिए पिछला दरवाजा खोलकर उच्चतम स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करेगा। सिविल सेवक,जिन्होंने बहुत ही प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से सिस्टम में प्रवेश किया है, हतोत्साहित होंगे क्योंकि इन संयुक्त सचिव (जेएस) स्तरों पर उनकी पदोन्नति संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।सरकार कुछ चयनित कंपनियों और निगमों के सीईओ का पक्ष ले सकती है और  ये लोग  आगे चलकर सार्वजनिक हित में निर्णय लेने की बजाय अपनी कंपनी के हित में निर्णय लेना प्रारंभ कर दे।।

पार्श्व मार्ग से प्रवेश पाये नौकरशाहों  से अनुशासन, जवाबदेही और प्रतिबद्धता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि उनके पास सदैव एक बेहतर विकल्प  उपलब्ध है। जो ज्यादा दबाव में हो, वो त्यागपत्र देकर अपने दायित्व से मुक्त हो।

आप न्‍याय-मित्र हैं ? तीन बरस से जेल में सड़ रहा है शैलेंद्र

: तीन साल से जेल में बंद है यूपी का एक दारोगा : इलाहाबाद की जिला अदालत परिसर में शैलेंद्र सिंह ने नबी वकील को मारी थी गोली : अजमल कसाब को वकील मिल गया, लेकिन शैलेंद्र के खिलाफ वकील एकजुट :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : उत्तर प्रदेश पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह जो लगभग विगत 3 साल से जेल में निरुद्ध हैं। पुलिस सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का नाम तब चर्चा में आया था जब उनके ऊपर आरोप लगा कि उन्होंने इलाहाबाद की जिला अदालत में नबी अहमद नाम के एक वकील को गोली मार दी थी।

ये वो समय था जब न सिर्फ इलाहाबाद के बल्कि पूरे भारत के वकील सड़कों पर आ गए थे। दिल्ली , बंगलौर तक एक स्वर में शैलेन्द्र सिंह को फांसी की मांग की गयी थी और कई वकीलों ने शैलेन्द्र सिंह का केस न लड़ने तक का फरमान सुना दिया था। दहशत कुछ यूं बन गयी थी की खुद शैलेन्द्र सिंह की रिश्तेदारी में पड़ने वाले वकीलों ने भी नबी के समर्थन वाली लॉबी के आगे घुटने तक दिए थे और केस लड़ने से मना कर दिया था। यहाँ ये जानना जरूरी है की इस देश में वकील अजमल कसाब को भी मिल गए , आतंकी और कई निर्दोषों के कातिल याकूब के लिए तो रात दो बजे कोर्ट भी खुलवा देते हैं। यद्द्पि इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमे साफ़ साफ़ शैलेन्द्र सिंह को कई वकीलों से अकेले जूझते देखा जा सकता है और उसमे नबी अहमद नाम के वकील की आवाज साफ़ तेज तेज सुनाई दे रही थी। शैलेन्द्र सिंह के परिवार के अनुसार तो किसी मुकदमे में नबी अहमद के मनमाफिक रिपोर्ट न लगाने के चलते नबी अहमद ने शैलेन्द्र सिंह को कचेहरी बुलाने का पूरा ताना बना बुना था और जैसे ही शैलेन्द्र सिंह कचेहरी पहुंचे उन पर हमला बोल दिया गया जिसके बाद ये दुर्घटना घटी।

यहाँ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी जो घोरतम तुष्टिकरण के चलते अक्सर चर्चा में रहती थी। शैलेन्द्र सिंह को आनन फानन में गिरफ्तार कर लिया गया और मृतक नबी अहमद के परिवार को तत्काल अखिलेश सरकार द्वारा सरकारी सहायता राशि उपलब्ध करवाई गयी। शैलेन्द्र सिंह बार बार कहता रहा कि वो राष्ट्रभक्त है और उस की ही जान को खतरा था पर उसकी एक नहीं सुनी गयी और हालात ये हो गए कि उसे ना पा कर उसके बदले नबी अहमद के कुछ बहुत ख़ास लोगों द्वारा एक सिपाही नागर को गोली मारी गयी। जिसका विरोध कई राष्ट्रवादी वकीलों ने खुद किया और इस हिंसा को गलत ठहराया।

फिर परिस्थितियां इतनी विषम हो गयी की शैलेन्द्र सिंह को इलाहाबाद जेल में भी रखना उनकी जान के लिए खतरा माना जाने लगा। मृतक नबी अहमद दुर्दांत अपराधी अशरफ का बेहद ख़ास था। शैलेन्द्र सिंह को उनकी जान के खतरे को देखते हुए इलाहाबाद से बहुत दूर रायबरेली जेल में रखा गया , उनका साथ देने जो भी सामने आया उसको अदालत परिसर में बेइज्ज्ज़त किया गया जिसमें आईजी अमिताभ ठाकुर की धर्मपत्नी श्रीमती नूतन ठाकुर तक शामिल हैं।  शैलेन्द्र सिंह के परिवार का कहना है की यदि उनके पक्ष को विधिपूर्वक , न्यायपूर्वक और निष्पक्षता से सूना जाय तो निश्चित तौर पर शैलेन्द्र सिंह मुक्त करने योग्य पाए जाएंगे। सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के परिवार के हालात देखें तो अब बेहद दयनीय हालात में पहुंच गया है। उनकी दो बेटियां कभी अपने पिता से मिलने जब जेल में जाती हैं तो वो पुलिस अधिकारी चाह कर भी इसलिए नहीं रो पाता क्योकि उसको पता है की उसके बाद उसकी बेटियां रोयेंगी तब उन्हें बाहर कोई चुप करवाने वाला भी नहीं है। एक बेटी तो ठीक से जानती भी नहीं कि पिता का प्रेम क्या होता है। क्योकि जब वो महज तीन माह की थी तब से ही उनका पिता जेल में है।

ख़ास कर तथाकथित अल्पसंख्यकों के खिलाफ पुलिस विभाग के हाथ पैर बांध कर रखने वाली पिछली अखिलेश सरकार में हुई इस घटना के समय सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह इलाहाबाद के शंकरगढ़ थाने के अंतर्गत आने वाली नारीबारी पुलिस चौकी के प्रभारी थे। शैलेन्द्र सिंह के माता पिता की मृत्य हो चुकी है और उनका एकभाई विक्षिप्त हो गया है। इस प्रकार कभी अपने जिले के सबसे जांबाज़ और तेज तर्रार पुलिस सब इंस्पेक्टरों में से गिना जाने वाले शैलेन्द्र सिंह का पूरा परिवार अब बेहद ही डांवाडोल हालत में है।

हालात इतने विषम हैं की उनकी पत्नी श्रीमती सपना सिंह को अपने तीन मासूम बच्चो के साथ अपने पिता के घर रहना पड़ रहा है जहाँ जैसे तैसे इस परिवार का गुजारा हो रहा है। हालात ये भी हैं की अब तीनों बच्चो की पढ़ाई आदि भी खतरे में पड़ती जा रही है क्योकि अपने पति का मुकदमा लड़ते लड़ते इस परिवार का सब कुछ बिक चुका है और यही हाल रहा तो कल खाने के लिए भी दिक्कत पैदाहो जायेगी। एक पुलिस वाले जो कानून और समाज की रक्षा के लिए वर्दी पहना हो उसकी व् उसके परिवार की ये दुर्दशा किसी पत्थरदिल का भी कलेजा पिघलाने के लिए काफी है।

एकमात्र पुलिस समर्थक न्यूज़ चैनल सुदर्शन न्यूज़ द्वारा उठाई गयी न्याय की इस आवाज को आगे बढाने का संकल्प लीजिये ...  सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह को वर्तमान योगी सरकार #YogiAdityanath से, पुलिस विभाग से और उतना ही राष्ट्रवादी विचारधारा के वकीलों से आशा है की वो उन्हें न्याय दिलाएंगे। यद्द्पि विगत तीन वर्षो में आर्थिक व् सामाजिक रूप से टूट चुके इस परिवार के पास अब पैरवी के लिए मात्र शैलेन्द्र सिंह जी की पत्नी सपना सिंह जी ही हैं जो शायद ही ऐसी कोई चौखट हो जहाँ मत्था टेक कर ना आ चुकी हों अपने पति को न्याय दिलाने की मांग को ले कर। यहाँ सवाल तथाकथित मानवाधिकारियों से भी है, जो नक्सलियों व आतंकवादियों तक के पक्ष में खड़े हो जाते हैं पर निर्दोष पुलिसकर्मियों के पास में नहीं इंस्पेक्टर के परिवार का मोबाइल नम्बर है-  09918366628

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( यह खबर शैलेंद्र सिंह की पैरवी में जुटे पुलिसवालों ने मेरी बिटिया डॉट कॉम तक पहुंचायी है।)

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