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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

सरकारी भूमि की लूट-गंगा: हर पत्रकार ने डुबकी लगायी

: चोर का दिल कित्‍ता, बस इत्‍ता भर। पकड़े जाने की भनक मिली, तो प्‍लॉट-श्‍लॉट छोड़ भाग निकले बड़े-बड़े पत्रकार : क्‍या न्‍यूज चैनल, क्‍या हिन्‍दुस्‍तान और क्‍या दैनिक जागरण और अमर उजाला, लूट में सब ने अपना हाथ धोया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तो गोंडा के बकैत और दबंग समाजवादी पार्टी के नेता तथा पूर्व मंत्री पंडित सिंह की सल्‍तनत जब चकनाचूर होकर भाजपा की सरकार की तूती बजने लगी, तो पंडित सिंह अपनी सारी हेकड़ी भूल गये और अपने में ही सिमट होने को मजबूर हो गये। जिले का प्रशासन और पुलिस महकमा अब नये वजीरों-सिपहसालारों की शह पर चलने लगा। प्राथमिकताएं बदलने लगीं। मौके की नजाकत देखते हुए एक वकील ने प्रशासन के पास एक अर्जी लगा दी कि सरकारी जमीन पर पत्रकारों ने अवैध कब्‍जा कर लिया है। सूत्र बताते हैं कि कहने की जरूरत नहीं कि इस नये विवाद से जुड़े लोगों को बदले समीकरणों के मद्देनजर बाकायदा राजनीतिक शरण भी थी। ऐसे में पहले प्रशासन के दफ्तरों में फंसी इस मामले से जुड़ी फाइलों पर धूल झाड़ने-फूंकने की कवायद शुरू हो गयी।

सूत्र बताते हैं कि नये प्रशासन के तेवर देख कर पंडित सिंह से जुड़े लोग खुद ही हैरान हो गये थे। उनके खेमे की समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे अब अपनी खाल बचायें, या पत्रकारों को सौंपी गयी अवैध सल्‍तनत की पैरवी करें। नतीजा, पंडित सिंह ने इस विवाद से अपना पल्‍लू झाड़ लिया। यह देखते ही लाभान्वित हो चुके पत्रकारों की छुच्‍छी ही निकल गयी। अफरा-तफरी का माहौल हो गया पत्रकारों के खेमे में। अब चूंकि यह पत्रकारों की एकजुटता के चलते जमीन पर कब्‍जा नहीं हुआ था, बल्कि पंडित सिंह की करीबी ही उनके लाभान्वित होने की पहली और इकलौती शर्त बन गयी थी। ऐसे में लुटे-पिटे पत्रकारों ने अपनी इज्‍जत बचाये रखने का ही फैसला कर लिया और एक के बाद एक अधिकांश पत्रकार इस जमीन से अपना दावा चुपचाप छोड़ कर भाग गये।

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पत्रकार पत्रकारिता

सूत्र बताते हैं कि पंडित सिंह की इस योजना में तकरीबन 20 पत्रकारों को लाभ मिला। जिन पत्रकारों को बड़े-बड़े और मनचाहे साइज के प्लाट थमाये गये थे और प्‍लॉट मिलने के बाद जो पत्रकार उस अवैध जमीन पर अपना मकान बनाने के सपने पाले घूम रहे थे, इनमें दैनिक जागरण के धनंजय तिवारी, हिंदुस्तान के कमर अब्बास, अमर उजाला के अरुण मिश्र, न्‍यूज नेशन  और डीडी न्‍यूज के कैलाश वर्मा, बदलता स्वरूप के नरेंद्रलाल गुप्ता, पीटीआई के जानकी शरण द्विवेदी, हिंदुस्तान के ही संजय तिवारी के अलावा ओम शर्मा, यदुनंदन त्रिपाठी, दैनिक जागरण वाले गोविंद मिश्रा, जो सीतापुर चले गए हैं, ईटीवी और नेटवर्क- 18 के देव मणि त्रिपाठी और जी-समूह के अंबिकेश्वर प्रताप पांडे समेत कई पत्रकार शामिल थे।

खैर, यह तो रही पत्रकारों की यह राम-कहानी। लेकिन इससे भी ज्‍यादा दिलचस्‍प किस्‍सा तो उन लोगों का है, जो खुद को बहुत तेज-तर्रार और बहादुर साबित करने की डींगें हांका करते थे। सरकारी जमीन की इस लूट का खुलासा होने के बाद पत्रकारों ने डर के मारे अपना दावा तो उन प्‍लॉटों पर तत्‍काल छोड़ दिया। लेकिन मजेदार बात यह रही कि उनमें से अधिकांश अब इस बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहते हैं। प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने गोंडा के ऐसे प्रभावित पत्रकारों से सवाल पूछना शुरू किया, तो अधिकांश पत्रकारों ने इस बात से ही साफ इनकार कर दिया कि वे इस जमीन घोटाले में संलिप्‍त थे। ऐसे पत्रकारों ने हकलाते हुए जवाब दिया कि उन्‍होंने ऐसे धोखेबाजी वाले घोटाले का शुरू से ही विरोध किया था। ( क्रमश:)

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विशाल ककड़ी: हाथ का हथियार, पेट का भोजन

पत्रकार होते हैं तुर्रम-खां, माफी नहीं मांगते

: खुद को साक्षात ब्रह्म जी की लेखनी से उपजे, अमिट भाग्‍यविधाता का घमंड पाले हैं पत्रकार : लेकिन जब कोई उन को हौंक देता है, तो छींकें निकल जाती हैं पत्रकारों की : चैनलों के रिपोर्टर या सम्‍पादक तो बड़े-दिग्‍गज बाहुबली से कमतर नहीं समझते : धंधा थूक-चटाई -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक दौर हुआ करता था जब पत्रकार अपने आप को तुर्रम-खां समझने के बजाय स्‍वयं को किसी सहज जिज्ञासु अथवा शोधकर्ता मान कर ही व्‍यवहार करता था। हां, उसकी भाषा में प्रांजल-भाव होता था, और साहस से परिपूर्ण होती थी उसकी लेखनी। उनके लिखे अक्षरों का झुण्‍ड अपने पाठकों में विश्‍वसनीयता का प्रवाह दिलाता था। आज भी ऐसे पाठक लोग आपको मिल जाएंगे, जिन्‍होंने अपनी भाषा और शैली को सीखने के लिए अखबारों का ही सहारा लिया था। जाहिर है कि तब खबरों और अखबारों तथा उसमें प्रकाशित खबरों के प्रति पाठकों में एक जबर्दस्‍त आस्‍था हुआ करती थी।

लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। कोई भी ऐसा अखबार आपको नहीं मिलेगा, जिसकी खबर में वर्तनी या समझ के स्‍तर में परिपूर्णता मौजूद हो। खबरों की विश्‍वसनीयता के संदर्भ में तो आज के पत्रकारों ने पूरा गोबर ही लीप रखा है। हिन्‍दी अखबार और चैनल तो इस मामले में सबसे रसातल की ओर बढ़ गये थे, लेकिन अब अंग्रेजी के समाचार-संस्‍थान भी खुद को दो-कौड़ी के पत्रकार रखने की होड़ पालते दिख रहे हैं। हालत यह है कि अब किसी को समझ में ही नहीं आता है कि किस समाचार संस्‍थान की किस रिपोर्ट वाकई सच और यथार्थ-सत्‍यपूर्ण है और कौन सी नहीं। भाषा की दुर्गति का अंदाजा केवल इसी से लगाया जा सकता है कि लखनऊ से ही हाल ही संचालित हो चुके एक टीवी चैनल के सम्‍पादक ने अपने एक चर्चित कार्यक्रम का नाम  fool proof के बजाय full-proof के तौर पर पेश कर दिया। वह भी मोटे-मोटे हरफों में।

इतना ही नहीं, पहले तो किसी भी गलती के प्रति सार्वजनिक क्षमा-याचना की एक परम्‍परा हुआ करती थी। लेकिन अब यह धीमे-धीमे होते हुए लगातार लुप्‍त होने की कगार तक पहुंच चुकी है। अब अव्‍वल तो कोई भी अखबार अपनी करतूतों की माफी-नामा छापने को ही तैयार नहीं होता। यानी क्षमा-चायना। लेकिन अगर कोई बहुत ज्‍यादा दबाव पड़ने लगा भी, तो भी वे क्षमाचायना अथवा खेद-प्रकाश तक नहीं छापते। इधर तो इनसे भी निम्‍न स्‍तर की एक शैली विकसित होकर भी जल्‍द ही दम तोड़ गयी, जिसमें किसी खबर के खंडन के प्रति स्‍पष्‍टीकरण छाप दिया जाता था।

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पत्रकार पत्रकारिता

दरअसल, अब नये दौर की पत्रकारिता के सेनानियों ने अपने तेवर ही खासे सख्‍त और अक्‍खड़ बना डाला है। अब यह लोग अपने अपराधों को मान कर उसकी माफी मांगने तक को तैयार नहीं होते हैं। न ही खेद-प्रकाश अथवा स्‍पष्‍टीकरण। यह सारे शब्‍द-संयोजन अब बेकार लगते हैं इन नये खबर-प्रबंधकों की नजर में।

लेकिन यह भी केवल उसी हालत में होता है, जब दबाव डालने वाला शख्‍स या समूह उस पत्रकार की खंझड़ी बजा सकने की क्षमता रखता हो। न्‍यूज चैनल तो इस गर्त में सबसे नीचे तक धंस चुके हैं। (क्रमश:)

खबरों की दुनिया जिस तरह तेजी से चकाचौंध से भरती जा रही है, उसमें विश्‍वसनीयता का अमृत-जल सूखता ही जा रहा है। अधूरी-बचकानी और अधकचरी खबरों की भीड़ में अब झूठी और गढ़ी खबरों ने भी जमकर सेंध लगाना शुरू कर दिया है। खबर-कर्मी अहंकार में हैं, और प्रताडि़त लोगों की सुनवाई ही नहीं हो पाती। ऐसे में जब कोई अक्‍खड़ अपनी बात पर अड़ जाते हुए सीधे अदालत में अपनी अरज लगाता है, तब पत्रकार-जगत में सांप सूंघ जाता है।

यह खबर इसी नव-स्‍थापित कुत्सित परम्‍परा को बेपर्द करने की कोशिश है, जहां विश्‍वसनीयता के व्‍यवसाय को लगातार गंधले धंधे में तब्‍दील करने की गटर-गंगा बहायी जा रही है। यह श्रंखलाबद्ध है, और लगातार आपको इसके अगले अंक मिलते रहेंगे। इसके अगले अंक को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

थूक-चटाई

साईं-भक्‍तों पर दंडी-स्‍वामियों ने छेड़ा धर्मयुद्ध

: हम शास्‍त्र-सम्‍मत देवता को ही मान्‍यता देंगे, कोई व्‍यक्ति अथवा मू्र्तिपूजा नहीं : साईं वैदिक धर्म के विरुद्ध भयानक षड्यंत्र, इससे वैदिक पौराणिक मन्त्रों-शास्त्रों को विकृत कर धर्म क्षति : धर्मक्षेत्र में होती हलचल देखने का हमें पूरा अधिकार : उपदेश का अधिकार हमारा ही है। हम धर्म भी जानते हैं, कानून भी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : भले ही सांईं पूजक समुदाय अपना आकार किसी बड़े सम्‍प्रदाय के स्‍तर तक पहुंचा चुका हो, लेकिन सनातन विद्वान उन्‍हें शास्‍त्र-सम्‍मत नहीं मानते। उनका साफ मानना है कि धर्म वही है जो शास्त्र में विहित है। केवल शास्त्र वर्णित देवता ही पूज्य हैं। और इसमें शास्त्र ही प्रमाण हैं। धर्म में आस्था सम्बन्धी कल्पना की स्वतंत्रता नहीं। और यदि कोई इन शास्‍त्रों से इतर कोई कार्य-कर्म करता है, तो वह शास्‍त्र विरोधी ही माना जाएगा। ऐसे में उसका बहिष्‍कार किया जाना ही उचित और शास्त्र-सम्‍मत है।

हालांकि दंडी-समुदाय अपने शास्‍त्रीय मान्‍यताओं के अनुसार उससे अलग किसी पूज्‍य को शास्‍त्र-सम्‍मत नहीं मानते रहे हैं। लेकिन एक प्रख्‍यात न्‍याय-विधि वेत्‍ता स्‍वामी सदाशिव ब्रहम्नेंद्र सरस्‍वती ने अपने फेसबुक पर एक ताजा अपडेट कर इस बात को नये तरीके से प्रस्‍तुत कर दिया है। उन्‍होंने साफ लिखा है कि :- कृपया ध्यान दें! साईंपूजक हमारी मित्रसूची से हट जायें। जो कोई साईं का नाम लेता या प्रचार करता दिखेगा उसे हम तत्काल अनफ्रेन्ड और ब्लाक करेंगे।

आपको बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा सर्वोच्‍च न्‍यायालय में प्रमुख अधिवक्‍ता होने के साथ ही विधिवेत्‍ता के तौर पर एक खासी शोहरत जुटा चुके डॉ वीएन त्रिपाठी ने अपने अधिवक्‍ता जीवन की शुरूआत इलाहाबाद हाईकोर्ट से ही की थी। करीब तीन बरस पहले ही डॉ वीएन त्रिपाठी ने संन्‍यास ग्रहण कर लिया और वे दंडी-स्‍वामी हो गये हैं। अपने विचारों को लेकर बेहद स्‍पष्‍ट और बेधड़क स्‍वामी सरस्‍वती ने अभी अपना ताजा अपडेट दर्ज किया है कि :- यदि तुमको कपटी मित्र और स्पष्ट शत्रु में से एक को चुनना हो तो हम कहेंगे, शत्रुका चयन करो। धर्मको किस पार्टी से अधिक खतरा है, इस विन्दु पर पुनर्विचार करना आवश्यक है।

स्‍वामी सदाशिव ब्रहम्नेंद्र सरस्‍वती ने सांई प्रकरण पर अपनी बात स्‍पष्‍ट की है, और उस पर आयी शंकाओं का उत्‍तर भी दिया है। उन्‍होंने साफ लिखा है कि सामान्य दृष्टांत ले सकते हैं वर्तमान न्यायिक प्रक्रिया का। पक्षकार सारवान् विधि (substantive law) के अन्तर्गत अधिकार कर्तव्यों को न्यायालय के समक्ष स्थापित करते हैं। उन अधिकार कर्तव्यों को स्थापित करने के लिए कौन सा साक्ष्य ग्राह्य है कौन नहीं, यह साक्ष्य अधिनियम से निर्धारित होता है। मनमाना साक्ष्य तो नहीं दे सकते न! इसीलिए अनेक बार सामान्यजन की धारणाओं और न्यायिक निर्णय में अन्तर भी देखा जाता है।

पुनश्च , क्या आप किसी भी विवाद या प्रशासनिक समस्या का निर्णय अपने मन से कहीं भी करा सकते हैं?

इसी प्रकार धर्म वही है जो शास्त्र में विहित है। केवल शास्त्र वर्णित देवता ही पूज्य हैं। और इसमें शास्त्र ही प्रमाण हैं। धर्म में आस्था सम्बन्धी कल्पना की स्वतंत्रता नहीं।

धर्म सम्बन्धी प्रश्न पर तीन प्रकार के प्रमाण मान्य होते है- प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम (शास्त्र)। इनमें भी आगम ही सर्वोपरि है। अनुमान पूर्ववर्तीप्रत्यक्ष पर ही आधारित होता है । प्रत्यक्ष और अनुमान दोषयुक्त हो सकते हैं, आगम में दोष की कल्पना नहीं।

अतः जो बात शास्त्र विरुद्ध हो, वह धर्म विरुद्ध है। हम उस समाज को धार्मिक नहीं कह सकते जो वेद शास्त्र को न मानता हो अथवा इनकी निन्दा करता हो।

आप संविधान और कानून को अस्वीकार करते हुए न्यायालय से अधिकार पा सकते हैं क्या?

Akshat Sinha : Guru ji pranam.. Aap mere guru bhi rahe.. Phir mere senior bhi.. Parantu is post se main bahut aahat hun.. Maine hamesha aapme ek guru hi dekha hai.. Isliye shayad dukh hua.. Main SAI BHAKT hun.. Unpe vishwas hai.. Isliye sabse pehle mujhe hi block karen! Pranam evam charan sparsh

Swami Sadashiva Brahmendranand Saraswati ठीक बात वत्स! उस समय हम केवल शैक्षिक गुरु थे, अब धर्मगुरु भी हैं। किन्तु हम साईंभक्त का प्रणाम स्वीकार नहीं करेंगे। हमें विश्वास है शीघ्र तुम्हारी चित्तशुद्धि होगी और साईं ही नहीं, अपितु सभी अशास्त्रीय काल्पनिक विचारों का त्याग करोगे जो सनातन धर्म को विकृत करते हुए नष्ट करने में लगे हैं।

Ramesh Chandra Deora : !!.NAMO NAMAH.!!

अति सुंदर. एसे दृष्टांत की आवश्यक्ता थी, सही भगवन् से मिल गया. कोटी कोटी नमन भगवन्.

Diwakar Tiwari : कृपया कर हमें अनफ्रेंड कर दे क्योंकि हमें साई से ज्यादा आप में पाखंड नजर आ रहा है चर्चा में बने रहने की अच्छी पहल है महोदय कृपया कर कोई क्या कर रहा क्या नहीं इसपे ध्यान न देते हुए आप अपने को स्वामी कहते तो भगवन में लीनं रहने का काम करे किसी को उपदेश न दे कौन किसकी पूजा किसकी नहीं धर्म के ठेकेदार नहीं है आप आप से ऐसी आशा नहीं थी

Swami Sadashiva Brahmendranand Saraswati : हमें यह आशा थी कि आप ब्राह्मण ही होंगे और वेद शास्त्र का सम्मान करते होंगे। किन्तु आपका कमेन्ट सिद्ध करता है कि आप छद्मवेशी हैं, जन्म कर्म विचार प्रत्येक दृष्टि से अब्राह्मण और धर्मद्रोही हैं ।

Swami Sadashiva Brahmendranand Saraswati : हम घोषित रूपसे धर्म के ठेकेदार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं। धर्मक्षेत्र में कौन क्या कर रहा है, यह देखने का हमें पूरा अधिकार है। उपदेश देने का भी अधिकार हमारा ही है, आपका नहीं। हम धर्म भी जानते हैं, कानून भी। आप दोनों में से एक भी नहीं जानते। धर्म को नष्ट करने वाली अपनी एजेन्सी बन्द कीजिए। सन्त समाज में अब हमारे जैसे न्यायवेत्ता भी हैं।

दण्डी स्वामी : साईं वैदिक धर्म के विरुद्ध भयानक षड्यंत्र है। इसके माध्यम से वैदिक पौराणिक मन्त्रों और शास्त्रों को विकृत कर धर्म को जितनी क्षति पहुंचाई जा रही है, उतनी कभी किसी अन्य प्रकार से नहीं हुयी।

Basant Mahoday : नमो नारायण मेरी मित्र सुची में भी चाँद भगत हैं मेरी पोस्ट और शेयर पढ़ कर चुपचाप साई को विसजर्न कर आये

Rakesh Dubey : सनातन हिन्दु धर्म में जब कुरीतियाँ जकड़ने लगी तब इन जैसी संस्थाओं का जन्म हुवा जो स्वयं को स्वयंभू समझने लगे ।वास्तव में इनका सनातन धर्म से कोई लेना देना नहीं बल्कि ये तो स्वयम् आज धनार्जन के साधन बन गए है इसलिए इनसे जुड़े हुवे लोग मत भिन्नता रखने वालों का विरोध करने लगते है ।

Avnish Shukla : जय श्री राम।स्वामी जी धन्य हुए हम जब आपने इस साईं के पाखंड को उजागर करती ये पोस्ट डाली।नमन प्रभु।

दबंग-नेता के फुसलाने से पत्रकार बर्बाद, पूंजी भी लुटी

: फ्री-फण्‍ड की जमीन की लूट-खसोट में अपना मन नहीं मार पाये पत्रकार, शनि की ढैया ने सपने बिखेर डाले : दबंग मंत्री की हुक्‍मउदूली कर पाने का साहस नहीं पाया था प्रशासन : किसी ने किसी से उधार लिया, तो किसी ने अपनी बीवी-मां के गहने गिरवीं-रहन कर पैसा जुटाया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आपको बता दें कि करीब 4 साल पहले गोंडा के एक बकैत और दबंग ठाकुर नेता के करीबी लोगों ने सरकारी जमीन का कब्जा किया था। उस वक्‍त यह नेता समाजवादी पार्टी में मंत्री की कुर्सी पर काबिज था। इसी नेता ने सोचा था कि अगर भविष्‍य में उसकी सरकार जमीन सूंघ गयी, तो उस सरकारी जमीनों का क्‍या होगा, जो उनके कब्‍जे में शामिल हो चुकी है। ऐसे में फैसला यह हुआ कि बाद में भी उनकी सरकार हटने की हालत में भी इस नेता के लोगों का कब्‍जा इस जमीनों पर बरकरार रहे, इसके लिए उन्होंने करीब 5 एकड़ जमीन का बंटवारा अपने कुछ खास पत्रकारों को दिलाने की कोशिश की थी। खास बात यह थी कि तब के प्रशासन ने इस कब्जे को विधिमान्य नहीं माना। मगर सरकार के दबंग मंत्री की हुक्‍मउदूली कर पाने का साहस नहीं पाया था प्रशासन। इसलिए सरकारी जमीन पर लालायित लोगों को इतनी सहूलियत जरूर मुहैया करा दी कि यह पत्रकार उस जमीन पर कब्जा करते रहें, लेकिन प्रशासन अपनी आंख नहीं खोलेगा।

सूत्र बताते हैं कि इस बकैत नेता का नाम है पंडित सिंह। सूत्रों के अनुसार मुलायम सिंह यादव ने एक मामले में बीमारी की हालत में अस्‍पताल पहुंचाने के लिए सरकारी हेलीकॉप्‍टर क्‍या दिला गया, पंडित सिंह की तूती बजने लगी। पंडित सिंह की पहचान अपने विरोधियों को अपने विरोधियों को एक ऐसे अभद्र और अश्लील बातें करने और फोन पर गालियां देने की रही है। पंडित सिंह ने अपनी यह छवि कुछ इस तरह बना ली है,  जो किसी को कहीं भी किसी भी सीमा तक गाली दे सकता है। उसके आक्रमण से बृज भूषण सांसद से लेकर आम पत्रकार और आम आदमी भी बुरी तरह आहत होता रहा है।

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विशाल ककड़ी: हाथ का हथियार, पेट का भोजन

लेकिन कुछ पत्रकारों ने पंडित सिंह की इस योजना को परवान चढ़ा दिया। मंत्री की इजाजत होते ही लेखपाल और तहसीलदार मौके पर पहुंच गये। जब बाकी पत्रकारों को इसकी भनक लगी, तो वे भी परस्‍पर राग-द्वेष भूल कर जमीन की इस लूटमार में शामिल हो गये। सूत्र बताते हैं कि पंडित सिंह को साफ लगा कि उनकी योजना सफलीकृत होने ही वाली है। पत्रकारों को इशारा दिया गया कि वे जल्‍द से जल्‍द अपने-अपने प्‍लॉट पर बाउंड्री बनवा लें, और यथाशीघ्र मकान बनवा लें। ताकि बाद कोई झंझट न हो पाये।

फिर क्‍या था, आनन-फानन सरकारी जमीनों की लूट मच गयी। किसी ने किसी से उधार लिया, तो किसी ने अपनी बीवी-मां के गहने गिरवीं-रहन कर पैसा जुटाया। कुछ लोगों ने इसके लिए दलाली की रकम लगायी, तो किसी ने अपने रिश्‍तों का वास्‍ता देकर मोटी रकम उगाही। जमीन की लूट न हुई, खाला का खजाना हो गया। जिसको देखो, वही फीता-इंची टेप लिये घूम रहा था। देखते ही देखते सभी ने कब्‍जा ले लिया। जिसके पास कम पैसा था, उसने छोटी बाउंड्री बनवायी, लेकिन जिसके पास कुछ ज्‍यादा रकम जुट पायी, उन्‍होंने ऊंची बाउंड्री तैयार करा दी। लेकिन दो पत्रकार ऐसे भी थे, जिन्‍होंने चुटकियों में ही अपने आलीशान मकान खड़े कर दिये। कुछ इस शैली में तत्‍परता दिखायी गयी पत्रकारों की ओर से, कि वे भविष्‍य में बाकी पत्रकारों को सरकारी जमीन पर अवैध कब्‍जा करने के अभियान के प्रति आम पत्रकारों और जन-साधारण में सजग, जागृत और प्रचार में जुटेंगे।

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पत्रकार पत्रकारिता

एक सूत्र ने चुटकी लेते हुए बताया है कि मानो इन पत्रकारों ने फैसला कर लिया है कि वे दीन-हीन पत्रकारों के बीच उन्‍हें अवैध कब्जा-मित्र के तौर पर सभी को बाकायदा  प्रशिक्षण देंगे। इसके लिए वे मौके पर जाएंगे ताकि उन्हें अवैध कब्जों और उस पर निर्माण करने के व्यवहारिक और जमीनी तरीकों से लैस किया जा सके। यह अवैध कब्जा मित्र पत्रकार इन पत्रकारों की उनकी आय के अतिरिक्त भी दीगर स्रोतों को जुटाने के लिए प्रशिक्षित करेंगे। और वह भी बिना हींग फिटकरी के।

जिस भी पत्रकार से इस बर्बाद-किस्‍सा से बातचीत की गयी, उसने बहुत पीड़ा के साथ इस मामले में पंडित सिंह और प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्‍होंने बताया कि वे लालच में फंस गये। एक वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी ने स्‍वीकार किया कि तब के मंत्री पंडित सिंह इस मामले में खासा दबाव बनाये रखे थे। लेकिन पंडित सिंह से बातचीत करने की कई कोशिशें की गयीं, लेकिन उनसे बात नहीं हो पायी। (क्रमश:)

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